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Feb 1, 2026

आलेखः छाप तिलक सब छीनी...

 - डॉ. सुशीला ओझा 

आकाश की अनंतता, सागर की विशालता अलौकिक है। आकाश में तारे टिमटिमाते हैं, सागर की गोद में अथाह रत्न भरे हैं। विचित्र है आकाश और पाताल का मर्म.. जब कोई इसमें उतरने की कोशिश करता है, साधना, आराधना, उपासना की सीढ़ियों से नीचे उतरता है तो कितना उज्ज्वल, भव्य, दिव्य तीर्थस्थल को पाता है। और मन....मन तो मंदिर हो जाता है- 

"छाप तिलक सब छिन जाता है।" किनारे पायदान की तरह होते हैं। भावनाओं, इच्छाओं की धूल, छाप, तिलक पायदान में सिमट जाते हैं। नवकंजलोचन की पंखुड़ियों में नील नलिन प्रतिष्ठित हो जाता है। नील सरोवर में नील नलिन की पंखुड़ियाँ खुलती हैं। और एक महारास की रचना होती है, एक अवर्णनीय रूप। नील नलिन का अद्भुत रूप सौन्दर्य, सागर में शेष-शय्या पर लेटे उस सुनील वर्ण से जब आँखें लग जाती हैं, तो "छाप तिलक सब छिनी"- पता नहीं वह बाहरी आवरण कहाँ खो जाता है! उसका खोना ही समर्पण है, विराटता का अमूल्य धरोहर है। ये नवकंज पंखुड़ियाँ भी बड़ी विचित्र हैं! कैसे इन पंखुड़ियों में विराट को समेट लेती हैं! प्रवेश द्वार पर लिखा है- जप, माला, छापा, तिलक- सब का मंदिर में प्रवेश वर्जित है। केवल उत्कृष्ट भावनाओं के पुष्प, ‌अगुरु, चंदन, मन के फूल ही डलिया में रखना है। जब नवकंज पंखुड़ियों पर नील नलिन विकसित होता है तो विष्णु के नाभि केन्द्र में रहता है। ब्रह्मा की सृष्टि वहीं से आरंभ होती है। यह नीरज नमित भाव से वंदना करता है। मृणालिनी विनम्रता से झुककर अर्घ्य निवेदित करती है। नयनों की कोठरी में नील नलिन से मिलना मन-ही-मन भावनाओं की सोलह हजार, एक सौ आठ ऋचाएँ- सब में विष्णु भाव की आभा झलकती है। राधा भाव उसमें निमग्न है। राधा पद्मा है, पद्मासना है, कमलासना है, लक्ष्मी स्वरूपा है, शक्ति स्वरूपा है, प्रकाशिनी है, आह्लादिनी है। लहरों के किनारों को स्पर्श करता वह रूप..अहा! काजल लगे किनारों पर चिपका वह अभूतपूर्व सौन्दर्य! सखि! रख लो ये अपनी छाप तिलक। मैं रीझ गई। इसके नयन द्वार तक ही इसकी आवश्यकता थी। नील सागर की गहराई में तो अनंत रत्न हैं। मैं समेट रही हूँ, अँजुरी भर रही हूँ, छलक रहा है रत्न। मैंने सोचा उसे कोमल, मनोरम, मखमली तिजोरी में रख दूँ। तिजोरी में विशालता है, गहराई है, सब कुछ रखने की क्षमता है। अरे सखि! उस सुनील वर्ण का बिम्ब फल जैसे होठों की लालिमा, उस पर बाँसुरी का अनुपम स्वर! राधा का प्रज्वलित सौंदर्य, बिजली-सी चमक, उस गौरवर्ण की गरिमा में धुल जाती है और आँखों की सारी कालिमा भी। और तुम तो ठहरे छलिया! नटवर नागर! मेरे मन को, अपने नृत्य में पाँव की घुँघरु बना देते हो। हृदय की तिजोरी के द्वार पर तुम्हारी मूर्ति है। नील रंग, पीताम्बर लपेटे हुए, लाल होठों पर वह हरी बाँसुरी, वह पोंगी बाँसुरी- केवल उनके स्पर्श की प्रतीक्षा में तिरछे नैन करके लेटी हुई रहती है। 

वह छलिया भी कितना नृत्य शिरोमणि है! सर्वदा नृत्य मुद्रा में रहता है। देखो ना सखि! कदंब के नीचे, काली धवरी गईयों पर त्रिभंगी मुद्रा में खड़ा है। अपने तो नीला है, पयस्विनी धार को कैसे पी रहा है! गजब का जादू है आँखों में! सम्मोहन शक्ति है। ये बाँसुरी, ये गइयाँ, ये मोर पंख, ये घुंघराली अलकें, ये त्रिभंगी मुद्रा- इसके समक्ष तिलक, छाप सब व्यर्थ है। उसकी विशालता के समक्ष मैंने फेंक दिया सखि! उन सारे बाह्यावरणों को। उन अँखियों के जादू में समर्पित कर दिया स्वयं के जीवन को। समर्पण और अधिकार का सामंजस्य ही तुम्हारा नीलत्व है। बाँसुरी को छूते हो तो मैं तुम्हारी रागिनी बन जाती हूँ। गइयों के गले की घंटियों में मैं ही हूँ। हे सुनील! तुम्हारी गहराई में मैं डूबती हूँ तो राधा बनकर निकलती हूँ। मीरा श्याम रंग में ऐसी डूबती है कि विष भी अमृत में परिवर्तित हो जाता है। ये तुम्हारी कैसी लीला है! तुम लीलामय हो! तुम्हारे स्वर में कितनी ऊँचाई है, कितनी गहराई है! तुम्हारे इस रूप ऐश्वर्य में कितनी अलौकिक क्षमता है जो मेरे लिए महौषधि है। छोड़ो इन बातों में कौन उलझे? मैं तो उलझ गई हूँ श्याम तुम्हारे नयनों में -

"कैसे मैं निकलूँ स्याम तेरे नयनों से,

मैं तो उलझ गई इन कटीली डारों में 

एक तो तुम्हारे सुनील वर्ण, उस पर काले मेघ-सी काजल,

बिजली-सी चमके पीत पट, बिम्ब फल पर बाँसुरिया

मैं तो उलझ गई तमाल बिरिछवा

छाप तिलक सब छिनी रे तोसे नैना मिलाई के!"

नहीं चाहिए मुझे छाप, तिलक.. मैं शाश्वतता के रंग में रंग गई हूँ-

"श्याम की छाप बसी हिय द्वारे, पीत झंगुलिया नयन बीच चमके, 

दसन चमके बिजुरिया, राधा श्याम संग मिल गई।"

"ज्यों ज्यों बूड़े श्याम रंग, त्यों त्यों उज्ज्वल होय।" 

सखि! यह कौन सा श्याम रसायन है जिसमें डूबकर ही तीर्थत्व की प्राप्ति होती है!

अमीर खुसरो ने भी इस अद्भुत रूप का दर्शन किया है। उनकी आँखों में वह माधुर्य, लावण्य- निधि समाहित हो गई है। पूर्ण समर्पित होकर ही तो छाप तिलक को देह के पायदान पर छोड़ दिया है। कितनी अगाध भक्ति है! कितना समर्पण भाव है! उस श्याम रसायन में! रागात्मक चेतना शब्दों के प्याले से छलकते हैं और आँखें कैनवास बन जाती हैं। उसमें श्याम की मूर्ति ‌उत्कीर्ण होने लगती है इसलिए तो छाप, तिलक को दरवाजे पर फेंकने को विवश हो जाते हैं - "छाप तिलक सब छिनी रे, तोसे नयना मिलाई के।"

रसखान भी तो उलझते जा रहे हैं इस रूप माधुर्य पर। वे तो ब्रज भूमि पर स्वयं को समर्पित कर देते हैं। अधिकार और समर्पण का अनूठा संगम -

"मानुष हौं तो वही रसखान< बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।" मनुष्य, पशु किसी भी रूप में वे ब्रज में ही जन्म लेना चाहते हैं। ‌उनको समझ में नहीं आ रहा है कि वह कौन सी अलौकिक छवि है जिससे देवता भी पार नहीं पाते और वह अहीर की छोरियों के बीच नाचता रहता है -

"ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भरी छाछ पर नाच 

नचावत।" 

‌जिसको अनादि, अनंत, अछेद, अभेद कहा जाता है उसे माटी से कितना प्रेम है। वे दामोदर तो माटी खाकर ऊखली में बँधने को भी कितने आतुर हो जाते हैं।■

सम्पर्कः पूर्व विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, माहेश्वरनाथ महामाया महिला महाविद्यालय, बेतिया, प. चम्पारण, बिहार 

Mar 1, 2022

महिला दिवस- या देवि...

 
- डॉ. सुशीला ओझा

(बेतिया, पश्चिम चम्पारण, बिहार, मो. 9123276098)

  जड़ चेतन, समस्त चराचर में पुरुष प्रकृति के मिलन से सृष्टि का संचालन होता है... आकाश निष्क्रिय है... धरती सक्रिय है.. नारियों का सर्वश्रेष्ठ स्थान है...नारियाँ सृजनशील है, शिल्पमयी है... सभी  क्षेत्र में नारियों का वर्चस्व है...
... वैदिक कल से ही नारियों को उच्च शिखर पर प्रतिष्ठित किया गया है.. मैत्रेयी, गार्गी, भारती वैदिक नारियाँ हैं.. मंडन मिश्र की पत्नी भारती ने.. शास्त्रार्थ में शंकराचार्य को पराजित किया था... नारियों का वर्चस्व पुरुषों से ज्यादा है... नरेन्द्र शर्मा के शब्दों में– “एकाकी नर कुछ कर नहीं पाता, रहता सदा किनारा/नर के लिए चलाती नारी, जलधारा पर आरा”...। 
   दुर्गा सप्तशती  नारी की श्रेष्ठता से अनुप्राणित है.. शक्ति की अधिष्ठात्री है... सारी शक्तियाँ नारियों में केन्द्रित है... केवल अपने आत्म दीप को जलाना है... सबसे पहले तो वह जननि है... राष्ट्र के रूप में उसकी पहले वंदना की गई है “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” जननिजन्मभूमिस्वर्ग से भी ऊंची है... दुर्गा ने राष्ट्र के रूप में अपने को व्यक्त किया है- “अहं राष्ट्रीय संग मनी” सारी विद्या स्त्रियाँ हैं, सब शक्ति स्वरूपा हैं-“विद्या समस्तास्तव देवी भेदा:/स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु/”... नारियाँ विधाता की प्रेरणा शक्ति हैं... प्रलय काल में मनु निराश हो कर बैठे हैं... उन्हें कहीं से कुछ प्रेरणा नहीं मिलती है... अकस्मात श्रद्धा का शुभागमन बाल रवि की लालिमा की तरह.. प्रेरणा सेतु बनकर आता है... श्रद्धा ने कहा है “शक्ति शाली हो, विजयी बनो !” यह संदेश विश्व में मंगल सा उद्घोषित हुआ.. रामायण काल में भी स्त्रियों के आदर्श, मान्यताओं, सिद्धान्तों का सम्मान है... आदर है... “देवि, सुमुखी, सुलोचनी, पिकवयनी, गजगामिनी” आदि उत्कृष्ट संबोधनों से नारी को समादृत किया गया है.. 
तुलसी ने कौसल्या को प्राची दिसि की तरह वंदित किया है “वंदे कौसल्या दिसि प्राची”... सीता भूमिजा हैं, जग- जननी हैं... राजा दशरथ की प्रिय पत्नी कैकेयी है, वह विदुषी है, वीरांगना है.. अश्व संचालन, रथ संचालन में दक्ष... देवासुर सग्राम में दशरथ के रथ के पहिये को.. सँभालकर दशरथ को विजय दिलायी है... हर संकट में नारियों ने पुरुषों को प्रेरणा दिया है...
... महाभारत काल में सुभद्रा अश्व संचालन में दक्ष थी... महाभारत युग में नारियों को प्रतिष्ठा नहीं मिली है... दुर्व्यसन, दुराचार, जुआ, छल छद्म में फंसा मनुष्य का चारित्रिक विकास नहीं हुआ है.. जुए में पत्नी को हारना... समाज के पतन को रेखांकित करता है.. ऐसे चरित्रहीन व्यक्ति के मन में नारी के प्रति पूज्य भाव नहीं होते हैं.. जहाँ गांधारी को धृतराष्ट्र को देने में संकोच नहीं है... मुगल काल में स्त्रियों को मान सम्मान नहीं दिया गया है... नारी भोग्या बन गई है.. पर्दा प्रथा से समाज में विकृति आ गई है.. मध्यकाल में नारियाँ केवल भोग विलास की वस्तु मात्र रह गई... समाज में उनकी प्रतिष्ठा नहीं है.. नारियों का उत्थान रुक गया है...
   भारतेन्दु ने अपने नव जागरण में नारियों को सम्मान दिलाया है... रवीन्द्र नाथ टैगोर ने “काव्येर उपेक्षिता उर्मिला” लिखकर  समाज में नारी की प्रतिष्ठा दिलायी है... महावीर प्रसाद द्विवेदी ने उर्मिला विषयक उदासीनता लिखकर नारी के उत्थान को रेखांकित किया है...  छायावादी कवियों में नारी के प्रति उदात्त भावना है.. सात्विक भावना है.. नारी देवी है, सहचरी है, माँ है, प्राण है... हर रूप में पुरुष की प्रेरणा शक्ति है... पंत ने कहा है... " देवि माँ सहचरी प्राण" निराला ने नारी को लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा के रूप में देखा है... “वीणावादिनी” कविता में नारी शुभ्र है, उज्ज्वल है, वरदायिनी है... “राम की शक्ति पूजा” में राम- सीता के पुष्प वाटिका के प्रथम मिलन की बात आती है... दुर्गा कमल चुराकर ले जाती हैं “उद्धार प्रिया का हो न सका धिक् जीवन जो सहता आया विरोध” सीता की आँखें प्रेरणा बनकर विजय दिलायी है.. राधा कृष्ण की बाधा नहीं है... आह्लादिनी शक्ति है, प्रकाशिनी शक्ति है,  उनकी प्रेरणा से कृष्ण लघुता में विराटता का दर्शन देते हैं।
   जयशंकर प्रसाद ने नारी को श्रद्धा से संबोधित किया है “नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में/पीयूष स्रोत- सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में”..आधुनिक युग नारी उत्थान का युग है... मोदी जी ने नारियों को हर क्षेत्र में प्रोत्साहित किया है... स्वर सम्राज्ञी “लता मंगेशकर”  स्वर, ताल, लय, छन्द की अमर सेतु बांधकर कालजयी हो गई... कल्पना चावला ने अंतरिक्ष यात्री का परचम लहराया.. खेल क्षेत्र में पी बी संधु, सानिया मिर्जा, गीता फोगट ने परचम लहराया है... लड़कियाँ हवाई जहाज उड़ा रही हैं .. विदेशों में, चिकित्सा के क्षेत्र में, राजनीति में निर्मला सीतारमण, सुषमा स्वराज विदेश मंत्री बनकर अपनी वक्तृत्व शैली से देश विदेश को आकृष्ट किया है.. इन्दिरा गांधी देश की प्रथम प्रधानमंत्री मंत्री बनी... बांगला देश की लड़ाई में उन्होंने दुर्गा का रूप लेकर विजय का आह्वान किया था...
   मोदी जी का नारा “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” के अन्तर्गत भ्रूण हत्या में कमी आई है... बेटियाँ हर क्षेत्र में अपना कुशल नेतृत्व कर रही हैं... कन्या योजना,  गोद भराई, उज्ज्वला गैस के माध्यम से नारियों में नव जागृति भरा है... आज नारियाँ आत्मनिर्भर हैं... आत्मबल से लबरेज हैं.. पुरुषों से पीछे नहीं हैं नारियाँ... सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं को मूर्त रूप दे रही हैं.. परीक्षा फल में वह लड़कों से अव्वल आ रही हैं... अब नारियाँ कोमल हैं पर कमजोर नहीं है... दंगल में पुरुषों को पीछे छोड़ रही हैं... आजकल हिजाब की राजनीति जोर पकड़ी है... राजनीतिक रोटियाँ सेंके जा रहे हैं... परदा प्रथा, घूँघट प्रथा का प्रचलन समाप्त हो गया है...। नारियाँ जग गई हैं... चौखट के बाहर नहीं निकलती थी... सूर्य नहीं देख पाती थीं... अब तो सूर्य की रोशनी में अपने विकास का रथ हर क्षेत्र में दक्षता से, कौशल से दौड़ा रही हैं... हिजाब का मसला उठाकर उनके विकास को बाधित करना है... सड़े गले रुढ़ियों, बज बजाते  अंधविश्वासों को  निर्मूल करना आवश्यक है.. देश जागा है... जागो नारियाँ ज्योतिपुंज बनकर... राष्ट्र के माथे को सम उज्ज्वल करो.. तुम शक्तिस्वरूपिणी बनकर विश्व विजय का वैजयन्ती धारण करो... अप्पो दीपो भव!