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Feb 23, 2018

कुछ अलग-थलग-सी 'सफेद कागज'

कुछ अलग-थलग-सी सफेद कागज
-सुमित प्रताप सिंह
लोकप्रिय लोकसेवक एवं युवा कवि शैलेन्द्र कुमार भाटिया जी का हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह 'सफेद कागजको आज मैंने पढ़कर समाप्त किया है। इसमें संकलित 152 कविताएँ विभिन्न विषयों पर केंद्रित हैं। कवि ने स्त्री, पिता व माँ पर अधिक कविताओं का सृजन किया है, जिससे ये भली-भाँति समझा जा सकता है कि कवि के हृदय में स्त्री, पिता व माँ के प्रति आदरभाव व श्रद्धा का कितना समावेश है।  इस कविता संग्रह में लगभग सभी कविताएँ पठनीय हैं। निर्भया, चाँद सुन लेगा, तुम युक्ति हो मेरी, फाइलें, गंगा: एक जीवन जीने की विधि, गन्ने का जूस, गाँव क्यों उदास हो, फिर बचपन क्यों याद है, चीटियाँ व मैं कॉन्वेंट स्कूल हूँ इत्यादि कविताओं को बार-बार पढऩे का मन करता है। कवि की भाषा शैली प्रभावशाली है।
जहाँ 'गन्ने का जूसकविता में कवि ने लिखा है
'लोहे के दो गोलों के बीच
पिसना नियति है
दूसरों को रस व
मिठास देने के लिए
ये गन्ने
अपनी बूँद-बूँद देना
अपना कर्तव्य समझते हैं
वैसे ही जैसे
दो देशों की
सीमा पर तैनात सैनिक
अपने रक्त की एक-एक बूँद
दे देते हैं
अपने-अपने देशों में
जीवन की मिठास का
रस भरने के लिए।
वहीं कविता 'चीटियाँमें कवि ने कहा है
'जीवन में ऊँच-नीच
उतार-चढ़ाव-ठहराव को
लाँघती चीटियाँ
आज फिर से आँगन में
अपने अंडे लेकर निकलीं हैं
यह संकेत है
प्रस्थान का
परिवर्तन का
प्रकृति के बदलाव को
आत्मसात करने का
और एक नए पराक्रम का
अपनी संतति और अस्तित्व को
कायम करने के लिए।
तथा 'मैं कॉन्वेंट स्कूल हूँमें कवि की लेखनी कहती है
'समाजवाद से छूटा हूँ
पूँजीवाद का पोषक हूँ
किसानों और गरीबों से दूर
कुछ अतिविशिष्ट
जनों के लिए ही
उपलब्ध हूँ
मैं कॉन्वेंट स्कूल हूँ।
कुल मिलाकर कवि का यह प्रथम प्रयास सराहनीय है। अभी लेखन जगत को उनसे काफी उम्मीदें हैं और उन उम्मीदों पर कवि का खरा उतरना तय है। कवि शैलेन्द्र कुमार भाटिया जी को सफेद कागज हेतु हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ। ईश्वर करे कि उनकी सफेद कागज पुस्तक उनके साहित्यिक जीवन का सुनहरा अध्याय लिखे। एवमस्तु!
पुस्तक: सफेद कागज (कविता संग्रह), लेखक : शैलेन्द्र कुमार भाटिया, समीक्षक: सुमित प्रताप सिंह, प्रकाशक- पी.एम. पब्लिकेशंस, नई दिल्ली, पृष्ठ : 224, मूल्य - 145/- रुपये

Sep 15, 2017

बॉस का गधा

बॉस का गधा
-सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली
मेरा बॉस अक्सर मुझे गधा कहता है। वैसे तो कहावत है बॉस इका ऑलवेज राइट और मैं इस कहावत को पूरे दिलो-दिमाग से स्वीकार भी करता हूँ पर वो कहते हैं न कभी-कभी कहावत भी गलत साबित हो सकती है और ये कहावत तब बिल्कुल गलत साबित होती है जब मेरा बॉस मुझे गधा कहता है। हालाँकि मैं पूरे दिन बॉस की खातिर इतनी बुरी तरह लगा, खपा और जुटा रहता हूँ कि मेरी इस कड़ी मेहनत को देखकर गधा भी मुझे पूरी इज्जत के साथ सलाम ठोंकने के लिए विवश हो जाए पर मुझे किसी के सलाम की कोई चाहत नहीं है, क्योंकि मैं मेहनती इंसान हूँ और अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए पूरा दिन जी-तोड़ मेहनत करता हूँ। मेरी मेहनत का केंद्र बिंदु सिर्फ और सिर्फ मेरा बॉस होता है। उसकी हर ऐरी-गैरी, उल्टी-सीधी, छोटी-बड़ी और टुच्ची से टुच्ची बात मानना मेरी ड्यूटी है या यूँ कहें कि मेरी मजबूरी है। लोग मजबूरी का नाम पता नहीं किसे-किसे कहते हैं पर मुझे लगता है कि मजबूरी का नाम सिर्फ और सिर्फ मैं ही हूँ। मेरी मजबूरी है अपने बॉस का हुक्म बजाते रहना और उसके इशारों पर हरदम नाचते रहना। वैसे तो मैं सरकारी सेवक हूँ और सरकार के माध्यम से जनता की नौकरी करने के लिए ही भर्ती हुआ हूँ, लेकिन जबसे मैं बड़े सरकारी सेवक यानी कि अपने बॉस के शिकंजे में आया हूँ तबसे मैं उसे ही जनता और जनता की चुनी हुई सरकार मानकर उसकी जी-हुजूरी करने में ही अपना कीमती वक्त बर्बाद कर रहा हूँ। जैसे बॉस मुझे गधा कहता है वैसे ही पूरा दफ्तर उसे गधा कहता है। मतलब कि वो मुझ अकेले को गधा कहता है और दफ्तर के सभी कर्मचारी उस अकेले को गधा कहते हैं। अब लोकतांत्रिक प्रणाली में जिसको अधिक मत मिलते हैं जीतता तो वही है। सो उसके एक मत के मुकाबले दफ्तर के सैकड़ों मत उसका गधा होना सिद्ध करते हैं। शायद इस बात को जानते हुए भी वो इसे स्वीकार नहीं करना चाहता और जब भी मौका मिलता है वो मुझे गधा बोल देता है। कभी-कभी
मेरा जी करता है उस गधे बॉस की गर्दन को किसी मजबूत रस्सी से जकड़कर  उसे उसी की कुर्सी के पाए से जाकर बाँध दूँ और उसके एक जोरदार दुलत्ती मारूँ ; लेकिन फिर मेरा दिमाग ऐसे गधेपन की इजाजत नहीं देता और मैं शांत मुद्रा में बैठकर विचार करता हूँ कि उस गधे को दुरुस्त करने के लिए कुछ न कुछ तो उपाय तो करना ही पड़ेगा लेकिन उसे सुधारने का उसके गले में रस्सी बांधके दुलत्ती जडऩे से बेहतर कोई और उपाय सूझता ही नहीं। फिर मेरे भोले से मस्तिष्क में ये यक्ष प्रश्न कौंधता है कि उस गधे के गले में रस्सी आखिर बाँधे तो बाँधे कौन? और मैं एकदम से उदास हो अपने बॉस को उसके कमरे के दरवाजे में बने गुप्त छेद से बाहर खड़े होकर चुपके-चुपके देखता हूँ और जोर से सांस भीतर खींचकर उसे धीमे -धीमे बाहर छोड़ते हुए बिल्कुल धीमी आवाज में बहुत ही गुस्से में बोलता हूँ 'गधा कहीं का!

Jul 18, 2013

ब से...

ब से...
- सुमित प्रताप सिंह
आज ए बी सी डी की कैद से निकलकर ओलम पढऩे का मन कर रहा है। आप भी मेरे साथ इस कैद से बाहर आइए न। देखिए अपनी चीज में जो अपनापन होता है, वह भला विदेशी चीज में कहाँ। अच्छा यह बताइए कि आपको ओलम में कौन सा अक्षर सबसे अधिक भाता है। ओहो फिर वही जिद, कि शुरुआत मुझसे हो। कभी तो मौका दिया करें, कि शुरुआत आपसे भी हो। खैर आपकी जिद टालने का न तो कभी मन होता है और न कभी साहस। देखिए वैसे तो मुझे पूरी ओलम ही प्रिय है, लेकिन न जाने क्यों ब अक्षर मुझे बहुत आकर्षित करता है। पारंपरिक ओलम में ब से बकरा होता है, लेकिन समय बदलने के साथ-साथ जीवन के अर्थ बदलते जा रहे हैं। जब संसार अपने आपको समय के अनुसार ढाल रहा है, तो हमें भी अक्षरों के साथ कुछ नया प्रयोग करने का साहस तो करना ही चाहिए। अब देखिये ब एक शब्द होता है बड़ा। जो बड़ा होता है वो असल में बड़ा होता है या फिर नहीं यह एक शोध का विषय है, क्योंकि जो बड़े होते हैं, वे स्वयं को बड़ा नहीं मानते और जो बड़े नहीं होते वे स्वयंभू बड़े बन जाते हैं। साहित्यिक जगत में ऐसे बड़े लोग थोक के भाव में मिलते हैं। हालाँकि आने वाला समय अपने आप बता देता है, कि वे वास्तव में बड़े थे अथवा स्वयं ही बड़े बनकर अभिमान से तनकर खड़े थे। ब से बरगद भी होता है। बरगद की विशेषता होती है, कि वह अपने विकास को ही महत्त्व देता है। उसकी छाया में रहने वाले पौधे बेचारे पौधे से वृक्ष बनने की चाहत में समाप्त हो जाते हैं। साहित्यिक बरगदों ने अपने स्वार्थ के लिए न जाने कितने पौधों को विकसित होने से पहले ही अपनी शोषक छाया से बर्बाद कर दिया होगा। ऐसे बरगद जब तक रहते हैं, छोटे पौधे अपने आपको किसी प्रकार से अस्तित्व में बचाए रखने के लिए संघर्ष करते रहते हैं और सत्यनारायण की कथा अथवा कलमा पढ़कर ऊपर वाले से कामना करते रहते हैं , कि कोई ऐसी शुभ घड़ी आए और ये बरगद धड़ाम से टूटकर नीचे गिरें, ताकि वे बेचारे पौधे अपने पौधेपन से मुक्ति पाकर वृक्षपन का आनंद उठा सकें। ब से बंज़र शब्द भी होता है। अं की मात्रा की चिंता किए बिना ध्यान से इस शब्द पर विचार करें तो यह ब से बहुत ही उपयुक्त शब्द है। इस शब्द का प्रयोग लोग अपने-अपने हिसाब से करते हैं। किसान के लिए बंजर शब्द ज़मीन से होता है। कुछ दुष्ट बिन संतान के दम्पति को इस शब्द के प्रयोग से आहत करते हैं, किंतु बंजर नामक इस विशेष शब्द को हम उन महान लेखकों से करेंगे, जो मस्तिष्क से अनुपजाऊ अर्थात बंजर हो चुके हैं। कहते हैं कि वे पहले उपजाऊ थे और लेखन की फसल नियमित तौर पर काटते रहते थे। उन्होंने अपने लेखन की इतनी पैदावार की, कि बेचारे मस्तिष्क से बंजर हो गए और अब दूसरे लेखकों की रचनाओं से माल उड़ाकर अपना गुज़ारा करने लगे। ऐसा भी हो सकता है, कि वे लेखन जगत में प्रवेश करने से पहले ही बंजर हों और इधर-उधर से चोरी-चकारी करके रचनारूपी अनाज का भंडारण करते रहे हों। ऐसे बंजर लेखक युवा लेखकों की रचनाओं पर पैनी नज़र रखते हैं और उनकी रचनाओं के अंजर-पंजर ढीले करके एक नई रचना लिख डालते हैं और झूठी वाहवाही के मंज़र देखते हैं। फिल्म जगत में तो ऐसे बंजर लेखकों की भरमार है और वहाँ नए लेखक अपना गुज़ारा चलाने के लिए अपनी उगी-उगाई फसल इन बंजरों को सौंप देते हैं। नए लेखकों को संघर्ष करने के लिए कुछ धन मिल जाता है और बंजर लेखकों को बंजर न दिखने के लिए रचनारुपी संतान। इन्हीं विचारों को मस्तिष्क की भट्टी में उबालते हुए एक मकान के बगल से निकल रहा था, कि एक पिता को अपने बच्चे को ओलम सिखाते हुए देखा। वह ब शब्द पर आया और बोला ब से बकरा, तो यह सुनकर मन हुआ कि उसके पास जाऊँ और उसके कानों में जोर से चीखकर उससे बोलूँ, कि ब से बकरा नहीं ब से होता है बंजर।                                     
संपर्क:  ई- 1/4, डिफेन्स कालोनी पुलिस फ्लैट्स,     नई दिल्ली 110049 मो. 09818255872, Email- www.sumitpratapsingh.com