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Jul 7, 2024

जल- प्रबंधनः परंपरागत जल- संरक्षण की बढ़ती उपयोगिता

 - भारत डोगरा

इस वर्ष फरवरी के महीने से ही कर्नाटक के एक बड़े क्षेत्र से गंभीर जल संकट के समाचार मिलने आरंभ हो गए थे। दूसरी ओर, पिछले वर्ष बरसात के मौसम में हिमाचल प्रदेश जैसे कई राज्यों में बाढ़ से भयंकर तबाही हुई थी। जलवायु बदलाव के इस दौर में विभिन्न स्तरों पर बाढ़ और सूखे दोनों के संकट अधिक गंभीर हो सकते हैं।

देखने में तो बाढ़ और सूखे की बाहरी पहचान उतनी ही अलग है, जितनी पर्वत और खाई की - एक ओर वेग से बहते पानी की अपार लहरें, तो दूसरी ओर बूँद-बूँद पानी को तरसती सूखी प्यासी धरती। इसके बावजूद प्राय: देखा गया है कि बाढ़ और सूखे दोनों के मूल में एक ही कारण है और वह है उचित जल प्रबंधन का अभाव। 

जल संरक्षण की उचित व्यवस्था न होने के कारण जो स्थिति उत्पन्न होती है, उसमें हमें आज बाढ़ झेलनी पड़ती है, तो कल सूखे का सामना करना पड़ सकता है। दूसरी ओर, यदि हम जल संरक्षण की समुचित व्यवस्था कर लें, तो न केवल बाढ़ पर नियंत्रण पा सकेंगे: अपितु सूखे की स्थिति से भी बहुत हद तक राहत मिल सकेगी।

भारत में वर्षा और जल संरक्षण का विशेष अध्ययन करने वाले मौसम विज्ञानी पी. आर. पिशारोटी ने बताया है कि युरोप और भारत में वर्षा के लक्षणों में कई महत्त्वपूर्ण अंतर हैं। युरोप में वर्षा पूरे साल धीरे-धीरे होती रहती है। इसके विपरीत, भारत के अधिकतर भागों में वर्ष के 8760 घंटों में से मात्र लगभग 100 घंटे ही वर्षा होती है। इसमें से कुछ समय मूसलाधार वर्षा होती है। इस कारण आधी वर्षा मात्र 20 घंटों में ही हो जाती है। अत: स्पष्ट है कि जल संग्रहण और संरक्षण युरोप के देशों की अपेक्षा भारत जैसे देशों में कहीं अधिक आवश्यक है। इसके अलावा, भारत की वर्षा की तुलना में युरोप में वर्षा की औसत बूँद काफी छोटी होती है। इस कारण उसकी मिट्टी काटने की क्षमता भी कम होती है। युरोप में बहुत सी वर्षा बर्फ के रूप में गिरती है जो धीरे-धीरे धरती में समाती रहती है। भारत में बहुत सी वर्षा मूसलाधार वर्षा के रूप में गिरती है, जिसमें मिट्टी को काटने और बहाने की बहुत क्षमता होती है।

दूसरे शब्दों में, हमारे यहा की वर्षा की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि यदि उसके पानी के संग्रहण और संरक्षण की उचित व्यवस्था नहीं की गई, तो यह जल बहुत सारी मिट्टी बहाकर निकट की नदी की ओर वेग से दौड़ेगा और नदी में बाढ़ आ जाएगी। चूँकि अधिकतर जल, न एकत्र होगा, न धरती में रिसेगा, अत: कुछ समय बाद जल संकट उत्पन्न होना भी स्वाभाविक ही है। इन दोनों विपदाओं को कम करने के लिए या दूर करने के लिए जीवनदायी जल का अधिकतम संरक्षण और संग्रहण आवश्यक है। 

इसके लिए पहली आवश्यकता है वन, वृक्ष व हर तरह की हरियाली जो वर्षा के पहले वेग को अपने ऊपर झेलकर उसे धरती पर धीरे से उतारे, ताकि यह वर्षा मिट्टी को काटे नहीं अपितु काफी हद तक स्वयं मिट्टी में ही समा जाए या रिस जाए और पृथ्वी के नीचे जल के भंडार को बढ़ाने का अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य संपन्न करे।

दूसरा महत्त्वपूर्ण कदम यह है कि वर्षा का जो शेष पानी नदी की ओर बह रहा है उसके अधिकतम संभव हिस्से को तालाबों या पोखरों में एकत्र कर लिया जाए। वैसे इस पानी को मोड़कर सीधे खेतों में भी लाया जा सकता है। खेतों में पड़ने वाली वर्षा का अधिकतर जल खेतों में ही रहे, इसकी व्यवस्था भू-संरक्षण के विभिन्न उपायों जैसे खेत-तालाब, मेड़बंदी, पहाड़ों में सीढ़ीदार खेत आदि से की जा सकती है। तालाबों में जो पानी एकत्र किया गया है वह उसमें अधिक समय तक बना रहे इसके लिए तालाबों के आसपास वृक्षारोपण हो सकता है व वाष्पीकरण कम करने वाला तालाब का विशेष डिज़ाइन बनाया जा सकता है। तालाब से होने वाले सीपेज का भी उपयोग हो सके, इसकी व्यवस्था हो सकती है। एक तालाब का अतिरिक्त पानी स्वयं दूसरे में पहुँच सके और इस तरह तालाबों की एक शृंखला बन जाए, यह भी कुशलतापूर्वक करना संभव है।

वास्तव में जल संरक्षण के ये सब उपाय हमारे देश की ज़रूरतों के अनुसार बहुत समय से किसी न किसी रूप में अपनाए जाते रहे हैं। चाहे राजस्थान व बुंदेलखंड के तालाब हों या बिहार की अहर पईन व्यवस्था, नर्मदा घाटी की हवेली हो या हिमालय की गूलें, महाराष्ट्र की बंधारा विधि हो या तमिलनाडु की एरी व्यवस्था, इन सब माध्यमों से अपने-अपने क्षेत्र की विशेषताओं के अनुसार स्थानीय लोगों ने वर्षा के जल के अधिकतम और बढ़िया उपयोग की तकनीकें विकसित कीं। औपनिवेशिक शासन के दिनों में विभिन्न कारणों से हमारी तमाम परंपरागत व्यवस्थाओं का ढाँचा चरमराने लगा। जल प्रबंधन पर भी नए शासकों और उनकी नीतियों की मार पड़ी। किसानों और ग्रामीणों की आत्मनिर्भरता तो अंग्रेज़ सरकार चाहती ही नहीं थी, उपाय क्या करती। फिर भी तरह-तरह के शोषण का बोझ सहते हुए लोग जहाँ-तहाँ अपनी व्यवस्था को जितना सहेज सकते थे, उन्होंने इसका प्रयास किया।

दुख की बात यह है कि स्वतंत्रता के बाद भी जल प्रबंधन के इन आत्म-निर्भर, सस्ते और स्थानीय भौगोलिक विशेषताओं का पूरा ध्यान रखने वाले परंपरागत तौर-तरीकों पर ध्यान नहीं दिया गया। औपनिवेशिक शासकों ने जल प्रबंधन की जो नीतियाँ अपनाई थीं, उसमें उनके अपने स्वार्थों के साथ-साथ युरोप में वर्षा के पैटर्न पर आधारित सोच हावी थी। इस सोच के आधार पर स्थानीय स्तर के जल- संरक्षण को अधिक महत्त्व नहीं दिया गया। बाद में धीरे-धीरे इस क्षेत्र के साथ बड़ी निर्माण कंपनियों, ठेकेदारों व उनसे लाभ उठाने वाले अधिकारियों व नेताओं के स्वार्थ भी जुड़ गए। निहित स्वार्थ जब नीति पर हावी हो गए तो गाँवों के सस्ते और आत्म-निर्भर तौर तरीकों की बात भला कौन सुनता, समझता? 

गाँव की बढ़ती आबादी के साथ मनुष्य व पशुओं के पीने के लिए, सिंचाई व निस्तार के लिए पानी की आवश्यकता बढ़ती जा रही थी, अत: परंपरागत तौर-तरीकों को और दुरूस्त करने की, उन्हें बेहतर बनाने की आवश्यकता थी। यह नहीं हुआ और इसके स्थान पर अपेक्षाकृत बड़ी नदियों पर बड़े व मझोले बाँध बनाने पर ज़ोर दिया गया। पानी के गिरने की जगह पर ही उसके संरक्षण के सस्ते तौर तरीकों के स्थान पर यह तय किया गया कि उसे बड़ी नदियों तक पहुँचने दो, फिर उन पर बाँध बनाकर कृत्रिम जलाशय में एकत्र कर नहरों का जाल बिछाकर इस पानी के कुछ हिस्से को वापिस गाँवों में पहुँचाया जाएगा। निश्चय ही यह दूसरा तरीका अधिक मँहगा था और गाँववासियों की बाहरी निर्भरता भी बढ़ाता था।

इस तरीके पर अधिक निर्भर होने से हम अपनी वर्षा के इस प्रमुख गुण को भी भूल गए कि विशेषकर वनस्पति आवरण कम होने पर उसमें अत्यधिक मिट्टी बहा ले जाने की क्षमता होगी। यह मिट्टी कृत्रिम जलाशयों की क्षमता और आयु को बहुत कम कर सकती है। मूसलाधार वर्षा के वेग को सँभालने की इन कृत्रिम जलाशयों की क्षमता इस कारण और भी सिमट गई है। आज हालत यह है कि वर्षा के दिनों में प्रलयंकारी बाढ़ के अनेक समाचार ऐसे मिलते हैं, जिनके साथ यह लिखा रहता है - अमुक बाँध से पानी अचानक छोड़े जाने पर यह विनाशकारी बाढ़ आई। इस तरह अरबों रुपये के निर्माण- कार्य, जो बाढ़ से सुरक्षा के नाम पर किए गए थे, वे ही विनाशकारी बाढ़ का स्रोत बने हुए हैं। दूसरी ओर, नहरों की सूखी धरती और प्यासे गांव तक पानी पहुँचाने की वास्तविक क्षमता उन सुहावने सपनों से बहुत कम है, जो इन परियोजनाओं को तैयार करने के समय दिखाए गए थे। इन बड़ी और महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के अनेकानेक प्रतिकूल पर्यावरणीय और सामाजिक परिणाम भी स्पष्ट रूप से सामने आ चुके हैं।

जो लोग विकास कार्यों में केवल विशालता और चमक-दमक से प्रभावित हो जाते हैं उन्हें यह स्वीकार करने में वास्तव में कठिनाई हो सकती है कि सैकड़ों वर्षों से हमारे गाँवों में स्थानीय ज्ञान और स्थानीय ज़रूरतों के आधार पर जो छोटे स्तर की आत्म-निर्भर व्यवस्थाएँ जनसाधारण की सेवा करती रही हैं, वे आज भी बाढ़ और सूखे का संकट हल करने में अरबों रुपयों की लागत से बनी, अति आधुनिक इंजीनियरिंग का नमूना बनी नदी-घाटी परियोजनाओं से अधिक सक्षम हैं। वास्तव में इस हकीकत को पहचानने के लिए सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर अपनी विरासत को पहचानने और पूर्वजों के संचित ज्ञान के विनम्र मूल्यांकन की आवश्यकता है।

यह सच है कि इस परंपरा में अनेक कमियाँ भी मिलेंगी। हमारे पुराने समाज में भी अनेक विषमताएँ थीं और ये विषमताएँ कई बार तकनीक में भी खोट पैदा करती थीं। जिस समाज में कुछ गरीब लोगों की अवहेलना होती हो, वहाँ पर अन्याय भी ज़रूर रहा होगा कि उनको पानी के हकों से भी वंचित किया जाए या उनसे भेदभाव हो। एक ओर हमें इन पारंपरिक विकृतियों से लड़ना है और उन्हें दूर करना है। लेकिन दूसरी ओर यह नहीं भूलना चाहिए कि विशेषकर जल -प्रबंधन की हमारी विरासत में गरीब लोगों का बहुत बड़ा हाथ है; क्योंकि इस बुनियादी ज़रूरत को पूरा करने में सबसे ज़्यादा पसीना तो इन मेहनतकशों ने ही बहाया था। आज भी जल प्रबंधन का परंपरागत ज्ञान जिन जातियों या समुदायों के पास सबसे अधिक है उनमें से अधिकतर गरीब ही हैं। जैसे केवट, मल्लाह, कहार, ढीमर, मछुआरे आदि। ज़रूरत इस बात की है कि स्थानीय जल- प्रबंधन का जो ज्ञान और जानकारी गाँव में पहले से मौजूद है, उसका भरपूर उपयोग आत्म-निर्भर और सस्ते जल-व संग्रहण और संरक्षण के लिए किया जाए और इसका लाभ सब गांववासियों को समान रूप से दिया जाए। 

महाराष्ट्र में पुणे ज़िले में पानी पंचायतों के सहयोग से ग्राम गौरव प्रतिष्ठान ने दर्शाया है कि कैसे भूमिहीनों को भी पानी का हिस्सा मिलना चाहिए और पानी का उपयोग बराबर होना चाहिए। परंपरागत तरीकों को इस तरह सुधारने के प्रयास निरंतर होने चाहिए, पर परंपराओं की सही समझ बनाने के बाद। यदि सरकार बजट का एक बड़ा हिस्सा जल- संग्रहण और संरक्षण के इन उपायों के लिए दे और निष्ठा तथा सावधानी से कार्य हो तो बाढ़ व सूखे का स्थायी समाधान प्राप्त करने में बहुत सहायता मिलेगी। (स्रोत फीचर्स)

Jun 1, 2023

जल संकटः सूख रही हैं भारत की नदियाँ

 - प्रमोद भार्गव

अमेरिका के न्यूयॉर्क में पाँच दशकों के बाद शुद्ध और मीठे (ताज़े) पानी के लिए जल सम्मेलन संपन्न हुआ है। इस सम्मेलन में हिमालय से निकलने वाली गंगा समेत दस प्रमुख नदियों के भविष्य में सूख जाने की गंभीर चिंता जताई गई है। सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने आगाह किया कि ‘आने वाले दशकों में जलवायु संकट के कारण हिमनदों (ग्लेशियर) का आकार घटने से भारत की सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियाँ जल-प्रवाह घट जाने से सूख सकती हैं। 

हिमनद पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक हैं। दुनिया के 10 प्रतिशत हिस्से में हिमनद हैं, जो दुनिया के लिए शुद्ध जल का बड़ा स्रोत हैं। यह चिंता इसलिए है, क्योंकि मानवीय गतिविधियाँ पृथ्वी के तापमान को खतरनाक स्तर तक ले जा रही हैं, जो हिमनदों के निरंतर पिघलने का कारण बन रहा है। गुतारेस ने यह वक्तव्य इंटरनेशनल ईयर ऑफ ग्लेशियर प्रिज़र्वेशन विषय पर आयोजित कार्यक्रम में दिया। इस आयोजन में जारी रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक आने वाले जल संकट से प्रभावित होने वाले देशों में भारत प्रमुख होगा।    

गंगा, ब्रह्मपुत्र समेत एशिया की दस नदियों का उद्गम हिमालय से ही होता है। अन्य नदियाँ झेलम, चिनाव, व्यास, रावी, सरस्वती और यमुना हैं। ये नदियाँ सामूहिक रूप से 1.3 अरब लोगों को ताज़ा (मीठा) पानी उपलब्ध कराती हैं। 

पानी की समस्या से प्रभावित लोगों में से अस्सी प्रतिशत एशिया में हैं। यह समस्या भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन में सबसे ज़्यादा है। सीएसई की पर्यावरण स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार देश में 2031 में पानी की प्रति व्यक्ति वार्षिक औसत उपलब्धता 1367 घन मीटर रह जाएगी जो 1950 में 3000-4000 घन मीटर थी। विडंबना है कि जहाँ पानी की उपलब्धता घट रही है, वहीं पानी की खपत बढ़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार 2017 में पानी की ज़रूरत जहाँ 1100 अरब घन मीटर थी, वह बढ़कर 2050 में 1447 घन मीटर हो जाएगी। खेती के लिए 200 घन मीटर अतिरिक्त पानी की ज़रूरत होगी। सीएसई रिपोर्ट के मुताबिक गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना नदी प्रणाली का जलग्रहण क्षेत्र कुल नदी जलग्रहण क्षेत्र का 43 प्रतिशत है। इनमें पानी का कम होना देश में बड़ा जल संकट पैदा कर सकता है। भारत में दुनिया की 17.74 प्रतिशत आबादी है, जबकि उसके पास मीठे पानी के स्रोत केवल 4.5 प्रतिशत ही हैं। तो, नदियाँ सूखने के संकेत चिंताजनक हैं।  

हिमालयी नदियों के सूखने की चेतावनी इसलिए सच लगती है, क्योंकि कनाडा की स्लिम्स नदी के सूखने का घटनाक्रम एवं नाटकीय बदलाव एक ठोस सच्चाई के रूप में छह साल पहले सामने आ चुका है। इस घटना को भू-विज्ञानियों ने ‘नदी के चोरी हो जाने’ की उपमा दी थी। ऐसा इसलिए कहा गया, क्योंकि नदियों के सूखने अथवा मार्ग बदलने में हज़ारों साल लगते हैं, जबकि यह नदी चार दिन के भीतर ही सूख गई थी। नदी के विलुप्त हो जाने का कारण जलवायु परिवर्तन माना गया था। तापमान बढ़ा और कास्कावुल्श नामक हिमनद जो इस नदी का उद्गम स्रोत है, वह तेज़ी से पिघलने लगा। नतीजतन सदियों पुरानी स्लिम्स नदी 26 से 29 मई 2016 के बीच सूख गई। जबकि इस नदी का जलभराव क्षेत्र 150 मीटर चौड़ा था। 

आधुनिक इतिहास में इस तरह से नदी का सूखना विश्व में पहला मामला था। प्राकृतिक संपदा के दोहन के बूते औद्योगिक विकास में लगे मनुष्य को यह चेतावनी भी है कि यदि विकास का स्वरूप नहीं बदला गया, तो मनुष्य समेत संपूर्ण जीव जगत का संकट में आना तय है। 

वाशिंगटन विश्वविद्यालय के भू-गर्भशास्त्री डेनियल शुगर के नेतृत्व में शोधकर्ताओं का एक दल स्लिम्स नदी की पड़ताल करने मौके पर पहुँचा था। लेकिन उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि अब वहाँ कोई नदी रह ही नहीं गई थी। न केवल नदी का पानी गायब हुआ था, बल्कि भौगोलिक परिस्थिति भी पूरी तरह बदल गई थी। इन विशेषज्ञों ने नदी के विलुप्त होने की यह रिपोर्ट ‘रिवर पायरेसी’ शीर्षक से नेचर में प्रकाशित की है। रिपोर्ट के मुताबिक ज़्यादा गर्मी की वजह से कास्कावुल्श हिमनद की बर्फ तेज़ी से पिघलने लगी और इस कारण पानी का बहाव काफी तेज़ हो गया। जल के इस तेज़ प्रवाह ने हज़ारों साल से बह रही स्लिम्स नदी के पारंपरिक रास्तों से दूर अपना अलग रास्ता बना लिया। अब नई स्लिम्स नदी विपरीत दिशा में अलास्का की खाड़ी की ओर बह रही है, जबकि पहले यह नदी प्रशांत महासागर में जाकर गिरती थी।

जिस तरह से स्लिम्स नदी सूखी है, उसी तरह से हमारे यहाँ सरस्वती नदी के विलुप्त होने की कहानी संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों में दर्ज है। गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान के द्वार खुलने के बाद जो ताज़ा रिपोर्ट सामने आई है, उससे पता चला है कि गंगोत्री का जिस हिमखंड से उद्गम स्रोत है, उसका आगे का 50 मीटर व्यास का हिस्सा भागीरथी के मुहाने पर गिरा हुआ है। हालांकि गोमुख पर तापमान कम होने के कारण यह हिमखंड अभी पिघलना शुरू नहीं हुआ है। यही वह गंगोत्री का गोमुख है, जहाँ से गंगा निकलती है। 2526 कि.मी. लंबी गंगा नदी देश की सबसे प्रमुख नदियों में से एक है। अनेक राज्यों के करीब 40 करोड़ लोग इस पर निर्भर हैं। इसे गंगोत्री हिमनद से पानी मिलता है; परंतु 87 साल से 30 कि.मी. लंबे हिमखंड से पौने दो कि.मी. हिस्सा पिघल चुका है। 

भारतीय हिमालय क्षेत्र में 9575 हिमनद हैं। इनमें से 968 हिमनद सिर्फ उत्तराखंड में हैं। यदि ये हिमनद तेज़ी से पिघलते हैं, तो भारत, पाकिस्तान और चीन में भयावह बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है। 

इसी तरह अंटार्कटिका में हर साल औसतन 150 अरब टन बर्फ पिघल रही है, जबकि ग्रीनलैंड की बर्फ और भी तेज़ी से पिघल रही है। वहाँ हर साल 270 अरब टन बर्फ पिघलने के आँकड़े दर्ज किए गए हैं। यदि यही हालात बने रहे, तो समुद्र में बढ़ता जलस्तर और खारे पानी का नदियों के जलभराव क्षेत्र में प्रवेश इन विशाल डेल्टाओं के बड़े हिस्से को नष्ट कर देगा।                                          

अल्मोड़ा स्थित पंडित गोविंद वल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान के वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमखंड का जो अगला हिस्सा टूटकर गिरा है, उसमें 2014 से बदलाव नज़र आ रहे थे। वैज्ञानिक इसका मुख्य कारण चतुरंगी और रक्तवर्ण हिमखंड का गोमुख हिमखंड पर बढ़ता दबाव मान रहे हैं। यह संस्था वर्ष 2000 से गोमुख हिमखंड का अध्ययन कर रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार 28 कि.मी. लंबा और 2 से 4 कि.मी. चौड़ा गोमुख हिमखंड 3 अन्य हिमखंडों से घिरा है। इसके दाईं ओर कीर्ति तथा बाईं ओर चतुरंगी व रक्तवर्णी हिमखंड हैं। इस संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. कीर्ति कुमार ने बताया है कि हिमखंड की जो ताज़ा तस्वीरें और वीडियो देखने में आए हैं, उनसे पता चलता है कि गोमुख हिमखंड के दाईं ओर का हिस्सा आगे से टूटकर गिर पड़ा है। इसके कारण गोमुख की आकृति वाला हिस्सा दब गया है। यह बदलाव जलवायु परिवर्तन के कारण भी हो सकता है, लेकिन सामान्य तौर से भी हिमखंड टूटकर गिरते रहते हैं। 

साफ है, इस तरह से यदि गंगा के उद्गम स्रोतों के हिमखंडों के टूटने का सिलसिला बना रहता है, तो कालांतर में गंगा की अविरलता तो प्रभावित होगी ही, गंगा की विलुप्ति का खतरा भी बढ़ता चला जाएगा। 

गंगा का संकट टूटते हिमखंड का ही नहीं हैं, बल्कि औद्योगिक विकास का भी है। कुछ समय पूर्व अखिल भारतीय किसान मज़दूर संगठन की तरफ से बुलाई गई जल संसद में बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जरिए जलस्रोतों के दुरुपयोग और इसकी छूट दिए जाने का भी विरोध किया था। कानपुर में गंगा के लिए चमड़ा, जूट और निजी बॉटलिंग प्लांट संकट बने हुए हैं। टिहरी बाँध बना तो सिंचाई के लिए था, लेकिन इसका पानी दिल्ली जैसे महानगरों में पेयजल आपूर्ति के लिए कंपनियों को दिया जा रहा है। गंगा के जलभराव क्षेत्र में खेतों के बीचों-बीच पेप्सी व कोक जैसी निजी कंपनियाँ बोतलबंद पानी के लिए बड़े-बड़े नलकूपों से पानी खींचकर एक ओर तो मोटा मुनाफा कमा रही हैं, वहीं खेतों में खड़ी फसल सुखाने का काम कर रही हैं। यमुना नदी से जेपी समूह के दो ताप बिजली घर प्रति घंटा 97 लाख लीटर पानी खींच रहे है। इससे जहाँ दिल्ली में जमुना पार इलाके के 10 लाख लोगों का जीवन प्रभावित होने का अंदेशा है, वहीं यमुना का जलभराव क्षेत्र तेज़ी से छीज रहा है।

ब्रिटिश अर्थशास्त्री ई.एफ. शुमाकर की किताब स्मॉल इज़ ब्यूटीफुल 1973 में प्रकाशित हुई थी। इसमें उन्होंने बड़े उद्योगों की बजाय छोटे उद्योग लगाने की तरफ दुनिया का ध्यान खींचा था। उनका सुझाव था कि प्राकृतिक संसाधनों का कम से कम उपयोग और ज़्यादा से ज़्यादा उत्पादन होना चाहिए। शुमाकर का मानना था कि प्रदूषण को झेलने की प्रकृति की भी एक सीमा होती है। सत्तर के दशक में उनकी इस चेतावनी का मज़ाक उड़ाया गया था; लेकिन अब जलवायु परिवर्तन पर काम करने वाले सरकारी और गैर-सरकारी संगठन शुमाकर की चेतावनी को स्वीकार रहे हैं। वैश्विक मौसम जिस तरह से करवट ले रहा है, उसका असर अब पूरी दुनिया पर दिखाई देने लगा है। भविष्य में इसका सबसे ज़्यादा खतरा एशियाई देशों पर पड़ेगा। एशिया में गरम दिन बढ़ सकते हैं या फिर सर्दी के दिनों की संख्या बढ़ सकती है। एकाएक भारी बारिश की घटनाएँ हो सकती हैं या फिर अचानक बादल फटने की घटनाएँ घट सकती हैं। न्यूनतम और अधिकतम दोनों तरह के तापमान में खासा परिवर्तन देखने में आ सकता है। इसका असर पारिस्थितिक तंत्र पर तो पड़ेगा ही, मानव समेत तमाम जंतुओं और पेड़-पौधों की ज़िंदगी पर भी पड़ेगा। लिहाज़ा, समय रहते चेतने की ज़रूरत है। स्लिम्स नदी का लुप्त होना और 10 हिमालयी नदियों के सूखने की चेतावनी को गंभीरता से लेने की ज़रूरत है। 

जल संरक्षणः रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून

 -  अपर्णा विश्वनाथ

प्रकृति प्रदत्त नि:शुल्क पानी को बढ़ती जनसंख्या और मनुष्यों की लापरवाहियों ने सशुल्क बना दिया। नतीजों की परवाह किए बगैर, हम थोड़े से रुपये अदा करने के एवज में बेहिसाब पानी खर्च करते रहे हैं और आज नल में पानी नहीं है ... या नहीं आएगा सुनते ही हमारा दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। सोचने लगते हैं ...

ओह ! अब क्या होगा ?

फिर क्या, पूरा ध्यान और जद्दोजहद पानी को लेकर और पानी की कवायद शुरू। मौसम गर्मी का हुआ तो फिर क्या ही कहने। इस फ़िराक में कि कहीं से आ जाए पानी, सौ बार हम नल को टटोल आएँगे।

कल्पना कीजिए दो-तीन दिन पानी न आए, तो क्या माहौल होगा घरों में। घर के अंदर ही शीत युद्ध का माहौल-सा बन जाएगा। अशांत मन पानी की तलाश में और फिर पूरी दिनचर्या अस्त- व्यस्त।

लेकिन यह स्थिति बद से बदतर तब और हो जाएगी जब धरती का आँचल ही सूख जाएगा।

एक पल के लिए हम अन्न खाए बिना रहने की सोच सकते हैं, लेकिन बिना पानी के रहना, नहीं और यही अटल सत्य है।

इन सभी बातों का सार यही है कि हम मानव ‘जल के बिना’ की परिकल्पना भी नहीं कर सकते हैं, साथ ही पानी हमारे सामाजिक और आर्थिक प्रगति को प्रत्यक्ष रूप से भी प्रभावित करता है।

*रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून*

वर्षों पुराना यह दोहा मनुष्य के व्यवहार को लेकर कहा गया था; लेकिन आज यह सच साबित होता दिख रहा है, क्योंकि पानी की कमी, बर्बादी या किल्लत को लेकर व्यक्तिगत तौर पर किसी को कोई सरोकार नहीं। हम अक्सर लोगों से यह सुनने को मिलता है कि यह तो सरकार का काम है पानी मुहैया कराएँ। नहीं तो अपना अपना चापाकल ( बोर वेल ) खुदवाएँ।

क्या यह समस्या का समाधान है ?

क्या किसी ने सोचा कि अगर धरती ही सूख जाएगी तो चापाकल या सरकार कहाँ से पानी निकाल हम-आपको देंगें?

क्या हमने कभी यह सोचा कि धरती के अंदर पानी है भी कि नहीं ?

क्या इस साल बारिश हुई ?

अगर हाँ, तो क्या हमने बारिश के पानी को जमा किया ? ताकि अगले बरस बारिश न हो तो जमा किया हुआ पानी काम में आ सकें।

नहीं न,...क्योंकि इन सबको सोचने का जिम्मा हमने सरकारों पर जो छोड़ रखा है, कि निपट लेगी सरकार।

सोचा है किसी ने? कि सरकारें भी तभी कुछ कर सकती हैं जब धरती के अंदर पानी होगा।

हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं कि सूखी धरती पर रहने वालों का जीवन किस कदर बिखर जाएगा। इन विषयों और विवादों की गहराई में अगर हम जाएँ,  तो पानी हमारे सामाजिक और आर्थिक प्रगति को क्यों और कैसे सीधे तौर पर प्रभावित करता है यह स्पष्ट ज्ञात होगा।

*पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा* ने बढ़ते जल संकट और पानी के भयावह स्थिति को देखते हुए एक समय में यह कहा था कि अगला विश्वयुद्ध पानी को लेकर लड़ा जाएगा, अतिशयोक्ति नहीं।

राज्यों के बीच नदी के पानी को लेकर लड़ाई भारत में बड़े अंतर राज्यीय जल विवादों के उदाहरणों से हम में से अधिकतर लोग अवगत हैं। चाहे वह कावेरी जल विवाद, रावी- व्यास नदी जल विवाद, नर्मदा नदी जल विवाद हो या कृष्णा नदी जल विवाद। नदियों के जल को लेकर राज्य और देशों में कलह। क्योंकि पानी तो हर हाल में हर किसी को चाहिए।

अगली बार शायद जल को लेकर ही विश्व युद्ध हो जाए। इसे भी नकारा नहीं जा सकता है। आज अनेकानेक कारणों से, चाहे वह महामारी से हो या युद्ध से अनगिनत लाशों की खबर सबने देखी और सुनी; लेकिन बहुत जल्द ही यह भी दिन देखने, सुनने को मिलेगा कि पानी के अकाल के चलते अनगिनत लोग मरे। सोचिए जब चारों ओर पानी के बिना लाशें ही लाशें नजर आएँगी।

उस वक्त इस देश का क्या होगा ?

सेंटर फॉर साइंस ऐंड इन्वाइरनमेंट (सीएसई) की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 2030 तक देश में पानी का स्रोत ही खत्म हो जाएगा और सिर्फ बेंगलुरु ही नहीं, बल्कि देश के ऐसे कई शहर होंगे जो 2030 तक ‘डे जीरो’ की कगार पर पहुँच जाएँगे।

‘डे जीरो’ का मतलब उस दिन से है जब किसी शहर के पास उपलब्ध पानी के स्रोत खत्म हो जाएँगे और वे पानी की आपूर्ति के लिए पूरी तरह अन्य साधनों पर निर्भर हो जाएँगे; क्योंकि दुनिया भर में जितना मीठा पानी मौजूद है, उसमें से भारत के पास सिर्फ 4 फीसदी ही पीने लायक पानी बचा है।

आपदा कोई भी हो परिणाम गंभीर रूप में सामने आती हैं, लेकिन दूसरे प्राकृतिक आपदाओं की तुलना में सूखे का प्रभाव अधिक गंभीर होता है। सूखे की स्थिति को हम जटिल और खतरनाक इसलिए भी कह सकते हैं कि यह सामाजिक और आर्थिक प्रगति को प्रभावित करने के साथ ही जीवन के लिए जटिल चुनौतियों को भी जन्म देती है।

मौसम संबंधी सूखा तब होता है, जब किसी क्षेत्र में शुष्क मौसम हावी होता है। हाइड्रोलॉजिकल सूखा तब होता है, जब कम पानी की आपूर्ति स्पष्ट हो जाती है, खासकर नदियों, जलाशयों और भूजल स्तरों में; आमतौर पर कई महीनों के मौसम संबंधी सूखे के बाद। कृषि सूखा तब होता है जब फसलें प्रभावित हो जाती हैं और सामाजिक आर्थिक सूखा विभिन्न वस्तुओं की आपूर्ति और मांग को सूखे से जोड़ता है।

मौसम संबंधी सूखा तेजी से शुरू और समाप्त हो सकता है, जबकि हाइड्रोलॉजिकल और अन्य प्रकार के सूखे को विकसित होने में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है। सूखे से होने वाली हानि सभी प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले कुल नुकसान का लगभग 22 प्रतिशत है, जो कि बहुत गंभीर है।

पानी हमारे शरीर के बाहर के साथ- साथ अंदर के लिए भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। मात्र -

‘जल का दुरुपयोग न करें’

‘पानी बचाओ’

‘जल ही जीवन है ‘

‘जल है तो कल है’ आदि स्लोगन का नारा लगाने से पानी नहीं बचता है। रोजमर्रा की जिंदगी में अमल में भी लाना चाहिए। हमें केवल अपने अधिकारों के ही नहीं वरन् कर्तव्यों का भी पालन करना चाहिए।

महात्मा गांधी ने कहा था कि अधिकार एवं कर्तव्य दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू कहा है। पानी को बर्बाद होने से बचाना हमारा ही कर्तव्य है।

इस समय पानी के संरक्षण के लिए सर्वप्रथम वैज्ञानिक आविष्कार की नहीं बल्कि वैचारिक आविष्कारों की आवश्यकता है। कुछ जिम्मेवारी या कर्तव्य को हम अपने घरों में रहकर निभा सकते हैं।

पानी संरक्षण में अगर हर एक व्यक्ति अपनी भागीदारी निभाएँ, तो निःसंदेह धरती को सूखने से बचाया जा सकता है। कहावत कि बूँद-बूँद सागर भरता है। उसी तरह हर एक व्यक्ति की भागीदारी से हम धरती के अंदर पानी को सहेज कर रख सकते हैं और सूखने से बचा सकते हैं।

आज की पीढ़ी प्रकृति प्रदत्त पानी को बोतल में बंद बिकता देख रही हैं। पानी अगर बर्बाद होता रहा तो आने वाली पीढ़ी पता नहीं जल को किस रूप में देख पाएँगे।

क्या यह हमारा कर्तव्य नहीं कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को हरी-भरी धरती सौंपें।

इसके लिए आज हमें जल का उपयोग बुद्धिमानी से करने के साथ कुछ छोटे- छोटे मगर महत्त्वपूर्ण बातों को अमल में लाना होगा।

अपने दैनिक जीवन में इसकी हम शुरुआत कर सकते हैं।

★पानी के संरक्षण में सबसे पहले पानी के अपव्यय को रोकने के लिए निम्नलिखित पर अंकुश लगाकर या कम करके कर सकते हैं :

★नल से पानी के रिसाव को बंद करें।

★नहाने के लिए शॉवर की जगह बकेट में पानी का इस्तेमाल करें।

★वॉश बेसिन में पानी धीरे चलाएँ या ब्रश करने के लिए मग में पानी लें।

★उपयोग में न होने पर नल को खुला न छोड़ें।

★घरेलू उपयोग से या किचन से निकला पानी का निष्कासन सीधे बगीचे में हो ऐसा इंतजाम करना चाहिए।

★वाहनों को साफ करने के लिए कम से कम पानी का इस्तेमाल करें।

★ लॉन या बगीचे में भी पानी का अपव्यय न होने दें।

उपर्युक्त सभी बातें हैं तो साधारण, लेकिन इन्हें अमल में लाकर हम असाधारण जल संकट से निजात पा सकते हैं।

★इसके अलावा वृहत् पैमाने पर अपने- अपने राज्यों में जल- संसाधन विभाग द्वारा कुएँ, तालाब या नहर खुदवाने के सुझाव तथा पुराने जर्जरीभूत जलस्रोत को दुरुस्त करने की कवायद कर सकते हैं।

★वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम घर- घर में तैयार किया जाए।

सरकार द्वारा पेड़ों की अवैध कटाई पर रोक लगाई जाए।

★नए पेड़ उगाएँ ताकि वर्षा का जल इनके जड़ों में जमा होता रहें। पेड़ की गहरी जड़ें पानी को सोख नमी को बरकरार रखते हैं। धरती को सूखने नहीं देते।

★स्थानीय विद्यालयों में जल-संसाधन और संरक्षण के विषयों पर बच्चों को अवगत कराने तथा स्थानीय लोगों में जल संकट और बचाव के प्रति जागरूकता लाने के लिए अभियान या रैलियाँ निकालना।

★वैचारिक तथ्य यह है कि धरती हरी-भरी रहे इसका सारा दारोमदार बारिश पर टिका हुआ है। कलकल बहती नदियाँ भी तभी होंगी और हमारे नलों में पानी।

★ हम सबकी सामूहिक तौर पर यह जिम्मेदारी है कि धरती को सूखने से बचाने के लिए चिंतित होने के बजाय नियंत्रण और प्राकृतिक उपायों पर अमल करें और ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाएँ।

वर्षा जलः बून्द- बून्द अनमोल

 - दीपाली ठाकुर

इस बार पूरा अप्रैल माह बरसाती फुहारों के कारण आषाढ़ सा भरमाता रहा, तपती धरती पर टप टपा टप कर पड़ती बूँदों का संगीत, उनकी सौंधी गंध सबका मन भी जैसे भीगा-भीगा- सा हो जाता है । ऐसे ही एक दिन बहुत अच्छी बारिश के बाद मैं अपनी छत पर खड़ी पीछे एक निर्माणाधीन मकान में चौकीदार के बच्चों को खेलता देख रही थी, कॉलम के बड़े गड्ढों में भरे पानी में गिट्टी फेंकते खुश होते उन भाई बहन को देखते-देखते अचानक मैं सोचने लगी कि अगर द्रोणिका के असर से बारिश न हुई होती, तो रायपुर तो अब तक कैसा तप रहा होता। प्रकृति ने भी वर्षा नामक कैसा सुंदर उपहार दिया है। बारिश के पानी से भरे गड्ढों को देखकर एक बात और याद आ गई। बात नब्बे के दशक की है- बेमेतरा में नल से आने वाले पीने के पानी से दाल नहीं गलती थी। हमारे हैंडपम्प का पानी सूख चुका था, सो हम पड़ोस के बोर से पानी लाकर काम चलाते थे। उन्हीं दिनों जब बारिश होती, तो माँ झट किसी बर्तन-भगोने में वो पानी इकट्ठा कर लेती ओर जब तक बारिश से सहेजा हुआ पानी हमारे पास होता, हम अमीर होते, पड़ोस  में माँगने जो नहीं जाना पड़ता।

सचमुच अगर बारिश से मिलने वाला अधिकांश पानी हम सहेज लें, तो पानी की समस्या ही न रहे। अखबार में आए दिन पानी की किल्लत की खबरों को पढ़कर आज से अधिक आने वाले कल की चिंता सताती है। हम मैदानी भागों में बसे लोग प्राकृतिक आपदाओं से परे, सुविधाओं में रहने वाले प्राकृतिक संसाधनों जैसे पानी का दुरुपयोग कुछ अधिक ही कर जाते है ।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का भूजल स्तर साल दर साल घट रहा है. केन्द्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक रायपुर में पिछले 10 सालों के दौरान भूजल स्तर तेजी से नीचे गिरा है. हर साल रायपुर का औसत जल स्तर 1 मीटर नीचे जा रहा है, जो राजधानी में रहने वालों के लिए अलार्म की स्थिति है. अगर यही हालात रहे, तो आने वाले दिनों में लोगों को ग्राउंड वाटर नसीब नहीं होगा. राजधानी की बढ़ती आबादी ने जमीन के भीतर के पानी को भी नहीं बख्शा। हालात ये है कि धीरे-धीरे भूजल स्तर नीचे चला जा रहा है और रायपुर सीमेंट और कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो गया है। यहाँ के तालाब सिकुड़कर गड्ढों में तब्दील हो गए हैं और अधिकतर कुओं को पाट दिया गया। किसी समय तीन सौ तालाब वाली राजधानी अब पानी के लिए त्राहि- त्राहि कर रही है। नतीजा यह हुआ कि इसका सीधा प्रभाव धरती की जल अवशोषण- क्षमता पर पड़ा और बीते 10 सालों में हर साल एक से डेढ़ मीटर वॉटर लेवल नीचे जाता जा रहा है। क्या यह केवल रायपुर के संबंध में है? भू जल स्तर को लेकर पूरे देश का यही हाल होता जा रहा है। देश का भविष्य पूरी तरह से पानी की उपलब्धता और गुणवत्ता पर टिका हुआ है, फिर भी हम हैं कि अब तक नींद से नहीं जागे। जिसे पानी मिल रहा है, उसके लिए सब ठीक है। बाकी किसकी प्यास बुझ रही है, किसकी नहीं, इससे किसी का कोई लेना देना नहीं। महानगरों में हालात बहुत मुश्किल होते जा रहे हैं। दिन-ब-दिन पानी की समस्या गरीब जनता को शहर छोड़ने पर मजबूर कर रही है। ये अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले 5 सालों में पानी की समस्या एक विकराल रूप ले लेगी। सवा सौ अरब की आबादी वाले देश में पानी की किल्लत किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर कर देती है और पीने के पानी की बात करें, तो लगभग हर शहर में पानी के टैंकर के पीछे बाल्टी और ड्रम लिये लोगों की लंबी कतारें लगती हैं। बीते सालों की तरह इस साल भी सामान्य से कम बारिश का अनुमान लगाया जा रहा है। देश के लगभग सभी इलाकों में ठीक-ठाक बारिश होती है। इसके बावजूद देश में हर जगह का जलस्तर काफी तेजी से नीचे गिर रहा है। फिर हम पानी को बचाने के लिए गंभीर क्यों नहीं हैं? हम पानी के लिए पारंपरिक जल स्रोतों से अलग नए विकल्पों के बारे में क्यों नहीं सोचते?

कौन बनेगा करोड़पति के कर्मवीर विशेष एपिसोड में बैंगलोर निवासी ए आर शिवकुमार से मिलवाया था जो लगभग 22 वर्षों से केवल वर्षाजल संग्रह कर उसी का उपयोग अपने दैनिक जीवन में करते हैं। विजयनगर बेंगलुरु में निर्मित उनका घर ‘सौरभ’ 1994 से पानी के लिए केवल वर्षा के संगृहीत जल पर ही निर्भर है

असल में शिवकुमार जी का पूरा जीवन पर्यावरण के मामले में बहुत ही प्रेरक है। आइए एक नजर उनके काम पर डालते हैं। सन्1994 -95 के दौरान जब वे अपना घर बना रहे थे, तब उनके दिमाग में यह खयाल आया कि बारिश का पानी हम बेकार क्यों होने देंते हैं? उन्होंने सोचा कि कोई ऐसा उपाय खोजा जाए कि जिससे बारिश का पानी बेकार न जाए और उनके काम में लाया जा सके। इसके लिए उन्होंने खूब माथापच्ची की। सबसे पहले उन्होंने यह पता लगाने की कोशिश की कि एक साधारण परिवार में कितने पानी की आवश्यकता होती है? जब वे जानकारियाँ जुटा रहे थे, तो उन्हें पता चला कि एक औसत परिवार की लगभग सभी जरूरतें 500 लीटर पानी में पूरी हो जाती हैं। WHO यानी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन का डेटा भी यही कहता है। फिर उन्होंने गणित लगाना शुरू किया कि पिछले सौ सालों में बेंगलुरु शहर में कितनी बारिश हुई है। उन्हें यह  जानकर आश्चर्य हुआ कि बुरे से बुरे मॉनसून से पानी की सभी जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। बस फिर क्या था शिवकुमार ने ठान लिया कि वे अपने घर में भी RWH (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) सिस्टम लगवाएँगे और बारिश के पानी से ही अपनी जरूरतें पूरी करेंगे। शिवकुमार कहते हैं, 'मैंने थोड़ी सी कैलकुलेशन की, तो मुझे पता चला कि साल में लगभग 90 से 100 दिनों की बारिश होती है। तो इससे मैं लगभग 45,000 लीटर पानी तो इकट्ठा ही कर लूँगा। यदि मैं जमीन के नीचे टैंक बनवाता, तो मुझे मोटर की जरूरत पड़ती और उसके लिए अलग से बिजली का खर्च आता।' बिजली के खर्च से बचने के लिए शिवकुमार ने ज़मीन के नीचे टैंक बनवाने की बजाय छत पर ही टैंक बनवाये हैं। उन्होंने हर टैंक में वॉटर फिल्टर लगा रखा है, जिससे पानी साफ होकर उन तक पहुँचता है। ये फिल्टर उन्होंने खुद बनाए हैं और इसका पेटेंट भी उनके पास है। पानी की एक-एक बूँद की अहमियत समझने वाले शिवकुमार के घर में एक रिचार्ज पिट भी है, जिसमें इस्तेमाल हो चुका पानी पहुँचता है और जमीन का वॉटर लेवल भी सुधरता है। आप जानकर शायद चौंक जाएँ, लेकिन यह सच है कि सिर्फ एक साल के भीतर उनके घर के आसपास का जलस्तर 200 फुट से उठकर 40 फुट तक आ गया है। उन्होंने अपने घर में मोटर भी लगवा रखी है। बारिश के पानी से जमीन का पानी रिचार्ज होता है और वे मोटर के सहारे पानी खींचकर अपनी जरूरतें पूरी करते हैं।

ऐसा ही एक और उदाहरण है, जिन्होंने माइक्रो लेवल पर इसका समाधान निकाल लिया, जिसके बाद ना सिर्फ उनकी सिंचाई की जरूरत पूरी हुई; बल्कि अन्य ग्रामीण भी इसका अनुसरण कर रहे हैं। नैनीताल जिले में ग्रामीणों के समूह जनमैत्री संगठन से जल- संरक्षण का अनोखा तरीका निकाला। ड्राप पर क्रॉप की मुहिम को जनमैत्री संगठन आगे बढ़ा रहा है। जनमैत्री संगठन जल संरक्षण को लेकर अनूठी पहल कर रहा है। संगठन ने अपने क्षेत्र में बारिश के पानी के संरक्षण के लिए 10 से 30 हजार लीटर के 700 जल-संग्रह टैंक  बनाए  हैं।  इस अभियान के तहत ग्रामीण  अपनी जमीन  पर गड्ढा खोदते हैं और उन्हें पॉलीथिन शीट उपलब्ध कराने का कार्य संगठन करता है। यह संगठन 2010 से जल संरक्षण  की मुहिम में जुटा है।  नदी के जलागम क्षेत्र को संरक्षित करने, चाल खाल खोदने, स्रोतों की सफाई करने के साथ ही जल संरक्षण को लेकर जनजागरूकता यात्राएँ और गाँवों में बैठकें भी आयोजित की जा रही हैं। शासन या सरकार अपने स्तर पर इन मुद्दों पर काम कर रहे हैं । हमें भी शिवकुमार जी की तरह निजी तौर पर कोशिश करनी चाहिए।

कुछ प्राचीन उदाहरण हमें अपने पूर्वजों की दूरदर्शिता और उनके ज्ञान को लेकर गर्व का अनुभव कराते हैं, उनमें से एक है-

भारतीय पुरातत्त्व विभाग के अधीन संरक्षित रायसेन किले का निर्माण तीसरी शताब्दी में हुआ था। निर्माण कराने वाले राजा रायसिंह ने राजशाही परिवार के लोगों के लिए शुद्ध पेयजल की व्यवस्था के लिए छत से वर्षा जल-संग्रहण प्रणाली बनवाई। इस जल- संग्रह प्रणाली के तहत भूमि पर 50 फीट लंबा, 30 फीट चौड़ा और 20 फीट गहरा टैंक बना है। इस टैंक में करीब 30 हजार लीटर वर्षा जल एकत्र किया जा सकता है। किले की छत से वर्षा जल को टैंक तक पहुँचाने के लिए नालियाँ बनी हैं। छत से लेकर भूमिगत जल-संग्रहण टैंक की सतह तक का सम्पूर्ण निर्माण लाल बलुआ पत्थर से किया गया है। टैंक से ओवरफ्लो होने पर पानी करीब 500 मीटर दूर बने तालाब में पहुँचता है। यानी अतिरिक्त जल को भी यहां व्यर्थ नहीं जाने दिया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि यह प्राचीन रूफ वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम अब भी सफलतापूर्वक काम कर रहा है। दूसरा है- गुजरात का धौलावीरा नगर, जो वर्षा जल- संग्रहण के दृष्टिकोण से आधुनिक युग के इंजीनियरों के लिए प्रेरणास्रोत है।

क्या आपको अपने दादा, नाना की बातें याद हैं, जो कहते थे पेड़ लगाना पुण्य का काम है, कुएँ या तालाब खुदवाना पुण्य का काम है खैर पाप-पुण्य से परे अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो ये सारे काम अगली पीढ़ी के लिए प्रकृति के इन उपहारों को सँजो लेने भर का सुंदर सराहनीय प्रयास है।

माता- पिता अपने बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए पैसे जमा करते है।  वर्तमान की दशा से अनुमान लगाया जा सकता है कि एक-एक साँस और एक -एक बूँद कितनी कीमती है और हो जाएगी क्या हम कभी इतने रुपये, धन- संपत्ति जोड़ पाएँगे, जो हमारी अगली पीढ़ी का जीवन सुरक्षित कर पाए? अगर उत्तर हाँ में बदलना है, तो हमें प्राकृतिक संसाधनों को अपनी संपदा मानकर उनकी सुरक्षा उनके संरक्षण की तरफ ध्यान देना होगा। यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि जो हमें प्रकृति से मिलाकर उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए भी बचाकर रखा जाए । कोरोना काल के दौरान हर एक व्यक्ति इतना समझ चुका है कि पैसों से सब कुछ, नही खरीदा जा सकता। घर-घर RWH (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) का अमल इसी प्रयास की ओर एक कदम होगा तो आइए हम सब एक कदम बढ़ाएँ।

सम्पर्कः रोहिणीपुरम रायपुर

Mar 24, 2018

अब पानी के लिए लड़ाई

 अब पानी के लिए लड़ाई  
- राजकुमार कुम्भज
दक्षिण अफ्रीका की राजधानी केपटाउन इस समय भीषण जल संकट से जूझ रहा है। हालात इतने भयानक हो चुके हैं कि यहाँ पानी का संकट अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया है। वैसे तो दक्षिण अफ्रीका का यह खूबसूरत शहर पिछले एक दशक से पानी की किल्लत भोग रहा है और समय रहते इसके समाधान हेतु कुछ भी नहीं किया जा सका। 
केपटाउन इस समय भयंकर सूखे की चपेट में है। तकरीबन एक पखवाड़े पहले तक प्रति व्यक्ति जहाँ 87 लीटर पानी जैसे-तैसे उपलब्ध करता जा रहा था, वहीं अब यह आपूर्ति प्रति व्यक्ति मात्र 25 लीटर पर सिमट गई है। हैरानी नहीं होना चाहिए कि जल-संकुचन के कारण पैदा हुआ जल-संकट केपटाउन में जल-दंगों की शक्ल ले ले क्योंकि जल-दंगों की आर्थिक से निपटने के लिए सरकार ने सेना और पुलिस को तैयार रहने का जारी आदेश भी दे दिया है।
केपटाउन में तरह-तरह की पाबन्दियाँ आजकल सामान्य हैं। वहाँ कम-से-कम पानी में ज्यादा-से-ज्यादा नहाना धोना निपटा लेना पड़ता है। दुनिया का कोई खूबसूरत शहर सूखे की वजह से सुर्खियों में आ जाए, यह दिलचस्प हो सकता है; किन्तु उससे कहीं अधिक यह खबर भयावह भी हैं। केपटाउन में घरेलू आपूर्ति लायक भी पानी शेष नहीं है। दरअसल केपटाउन दुनिया के नक्शे में उस स्थान पर स्थित है, जहाँ अटलांटिक और हिन्दमहासागर आपस में मिलते हैं। लेकिन यह पानी अत्यधिक खारा होने की वजह से पीने लायक नहीं हैं और दैनिक उपयोग के योग्य तो बिल्कुल भी नहीं। जिस पानी को यहाँ उपयोग के काबिल बनाया जाता है, उसकी बेहद कमी हो गई है। फिर डीसेलीनेशन (गैर-लवणीकृत) टेक्निक बहुत महँगी भी है।
विश्व बैंक के अनुसार डीसेलीनेशन तकनीक से मिलने वाले पानी की लागत तकरीबन 55 रुपया प्रति लीटर आती है। विश्व का एक फीसदी पेयजल इसी प्रक्रिया से उपलब्ध हो रहा है। सऊदी अरब जहाँ नदी व झील न के बराबर है, डीसेलीनेटेड वाटर का दुनिया में सबसे बड़ा स्रोत है। ये संसाधन (प्लांट) शहरों में इस्तेमाल होने वाला 70 फीसदी पानी उपलब्ध करवाते हैं साथ ही उद्योग धंधों में इस्तेमाल होने लायक जल की आपूर्ति भी करते हैं। सऊदी अरब, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन उन देशों में शामिल हैं जो डीसेलीनेटेड वाटर का इस्तेमाल करते हैं।
दुनिया के तकरीबन 120 देशों में समुद्री पानी को पीने योग्य बनाने वाली तकरीबन सत्रह हजार डीसेलीनेशन वॉटर प्लांट लगे हैं और करीब-करीब बीस करोड़ लोग इन्हीं प्लांट का बना पानी पी रहे हैं। सऊदी अरब एक्वीफर्स प्रक्रिया के जरिए जमीन के नीचे जल संग्रहण करके इस तकनीक का इस्तेमाल करता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक जाहिर हुआ है कि वर्ष 2050 तक चीन और भारत भी जल संकट से जूझा रहे होंगे तब समुद्री खारे पानी को पीने योग्य बनाना ही एकमात्र विकल्प होगा। भारत में भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने भी डीसेलीनेशन तकनीक विकसित की है जिससे समुद्री पानी को पीने योग्य बनाया जा सकता है। इस तरह के कई प्लांट्स पंजाब, पश्चिम बंगाल और राजस्थान में काम कर रहे हैं। भाभा के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई इस तकनीक से प्रतिदिन 63 लाख लीटर पानी पीने योग्य बनाया जा सकता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2030 तक दुनिया के तकरीबन चार अरब लोग पेयजल में परिवर्तित समुद्री खारा पानी इस्तेमाल करने लगेंगे।
पिछले दिनों भारत पहुँचे इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भारत को गल मोबाइल, नामक जो एक डीसेलीनेशन कार भेंट में दी थी, वह प्रतिदिन बीस हजार लीटर समुद्री खारा पानी पीने योग्य बनाती है। इस गल मोबाइल डीसेलीनेशन कार का इस्तेमाल कच्छ के रण में तैनात बीएसएफ के जवान करेंगे। यह कार नब्बे किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से दौड़ सकती है, जिसका स्व-ऊर्जा स्रोत होता है।
दुनिया की चालीस फीसदी आबादी समुद्री किनारों पर बसती है। जबकि दुनिया के दस में से एक व्यक्ति को पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं होता है। यहाँ तक कि बाजार में बिकने वाली बोतलबन्द मिनरल वॉटर भी सौ फीसदी स्वच्छ शुद्ध नहीं है। भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा तय किए चालीस से अधिक मानकों में से यहाँ कई नदारद है जिनसे कई तरह की परेशनियाँ पैदा होती हैं।
यहाँ यह जान लेना बेहद जरूरी हो जाता है कि बोतलबन्द पानी बेचने वाली कम्पनियों के उत्पादन भी भारतीय मानक ब्यूरो की अनिवार्य प्रमाणनता के अन्तर्गत आते हैं। अभी उपभोक्ता मंत्रालय के मुताबिक वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान बी आई एस (भारतीय मानक ब्यूरो) ने पानी बेचने वाली पच्चीस कम्पनियों पर छापेमारी करते हुए जो नमूने एकत्रित किए थे, उनमें से ज्यादातर खरे नहीं रहे। कम-से-कम ग्यारह मामलों में अदालती फैसलों के बाद इस कम्पनियों पर कार्रवाई की गई और कम्पनियों से भारी जुर्माना भी वसूल किया गया। तात्पर्य यही है कि पानी अमूल्य है और पीने का पानी तो अद्वितीय है। पानी बचाना बेहद जरूरी है। पानी बचेगा तो जीवन बचेगा और जीवन बचेगा तो मनुष्य बचेगा। इसीलिए कहा गया है कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए ही होगा। इसका सबसे ताजा उदाहरण दक्षिण अफ्रीका की राजधानी केपटाउन है, जहाँ जल संकट से पैदा होने वाले जल-दंगों के लिए पुलिस और सेना को सतर्क कर दिया गया है।
जल संकट को लेकर दुनिया भर की हालत चिन्ताजनक है। दक्षिण अफ्रीका में एक लम्बे समय से बारिश नहीं हो रही है। इस वजह से केपटाउन को जल-आपूर्ति करने वाले संसाधन बेहद खराब स्थिति में पहुँच गए हैं। इस शहर को जल-आपूर्ति करने वाले नेशनल मंडेलाबे पर बने बाँध में लगभग तीस फीसदी से भी कुछ कम पानी ही अब शेष रह गया है और मौसम वैज्ञानिकों का आकलन है कि हाल फिलहाल यहाँ बारिश होने की कोई सम्भावना नहीं है। प्रबल आशंका बनी हुई है कि जल-आपूर्ति की तमाम पाबन्दियों के बावजूद उक्त बाँध तीन-चार माह में पूरी तरह से खाली हो जाएगा, अगर ऐसा हुआ तो हमारे देखते केपटाउन दुनिया का एकमात्र ऐसा पहला महानगर होगा, जिसके पास दैनिक उपयोग और प्यास बुझाने तक का दो बूँद पानी नहीं होगा।
केपटाउन की तरह सम्पूर्ण संयुक्त अरब अमीरात भी विकराल जल-संकट की चपेट में आ गया है। यहाँ जल-संकट से निपटने के लिए जो योजना बनाई गई है। वह बेहद ही अजीबो गरीब है। यहाँ अंटार्कटिका से समुद्र के रास्ते एक हिमखंड खींचकर लाने की कोशिश की जा रही है। हिमखण्ड को खींचकर लाने की जिम्मेदारी एक निजी कम्पनी का सौंपी जा रही है। इस योजना के तहत 8,800 किलोमीटर दूर यह हिमखण्ड यहाँ पहुँचेगा फिर उसके टुकड़े तोड़-तोडक़र संग्रह किए जाएँगे। अनुमान लगाया जा रहा है कि यह हिमखण्ड लगातार पाँच बरस तक यूएई के लोगों की प्यास बुझाएगा। संयुक्त अरब अमीरात की इस अजीबो गरीब योजना से यह अन्दाज लगाना कठिन होता जा रहा है।
माना कि शेष दुनिया में जल संकट की समस्या भले ही अभी इतनी विकराल नहीं हो किन्तु दुनिया की एक बड़ी आबादी पानी की विकरालता से परेशान तो हो रही है। एक आकलन के अनुसार दुनिया की एक अरब से अधिक आबादी को आज भी पीने का साफ पानी नहीं मिलता है जबकि तीन अरब लोग कम-से-कम एक महीना तो पानी की कमी का सामना करते ही हैं। खबरें बता रही हैं कि वर्ष 2025 तक दुनिया की दो तिहाई आबादी जलसंकट की गिरफ्त में आ जाएगी।
भारत की स्थितियाँ भी कोई कम दयनीय नहीं हैं। देश के अधिकतर कुओं, तालाबों बाँधों ने पिछले दो दशक में तेजी से पानी खोया है। दो दशक पूर्व तक जहाँ पानी 2530 फीट जमीन के नीचे पानी उपलब्ध था वहाँ वह 200-300 फीट तक नीचे उतर चुका है। कहीं-कहीं तो इस गहराई ने भी साथ छोड़ दिया है। देश की लगभग तीन सौ नदियाँ खतरे की सूचना दे चुकी हैं। हिमालय से निकलने वाली साठ फीसदी जलधाराएँ सूखने के कगार पर हैं जिनमें गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियाँ शामिल हैं। वर्ष 2016 में देश के नौ राज्यों के तकरीबन पैंतीस करोड़ लोग जल संकट से प्रभावित हुए थे। आशंका है कि भारत में भी केपटाउन जैसे हालात हो सकते हैं।(सर्वोदय प्रेस सर्विस, इंडिया वाटर पोर्टल से)

Jul 25, 2017

वर्षा जल को रोकना होगा - भारत डोगरा

वर्षा जल को रोकना होगा 
- भारत डोगरा

मई की तपती दोपहर में टीकमगढ़ जिले के जताराब्लाक में स्थित वनगॉय गाँव में पहुँचे तो पाया कि यह गाँव बहुत  गम्भीर जल संकट से गुज़र रहा है। 200 परिवारों के इस गाँव में पेयजल मात्र एक हैंडपंप से ही मिल रहा था और वह भी रुक-रुक कर चल रहा था। एक मटका भरता और हैंडपंप रुक जाता। इस स्थिति में लोग दो-दो कि.मी. दूर से कभी बैलगाड़ी पर, कभी साइकिल पर, तो कभी पैदल ही पानी ला रहे हैं। दूषित पानी के उपयोग को भी मजबूर हैं जिससे बीमारियाँ फैल रही हैं। प्यासे पशु संकट में हैं व पिछले लगभग तीन महीनों में ही यहाँ के किसानों के लगभग सौ पशु मर चुके हैं। गाँव का तालाब सूख चुका है। स्कूल में भी पेयजल उपलब्ध नहीं है। प्यास से त्रस्त बच्चे कभी हैंडपंप की और दौड़ते हैं, तो कभी घर की ओर।
समस्या के समाधान के रूप में गाँव वासियों से पूछो तो वे अस्थायी समाधान के रूप में टैंकर भेजने व स्थायी समाधान के रूप में बोर खोदने या टैंक बनाकर पाइपलाइन से पानी पहुँचाने की बात करते हैं। इस संदर्भ में काम पहले ही आरंभ हो जाना था पर किसी न किसी वजह से देरी होती गई।
अत: एक ओर तो प्रशासन पर समुचित कार्रवाई के लिए दबाव बनाना ज़रूरी है पर दूसरी ओर गाँव समुदाय की अपनी भूमिका भी  महत्त्वपूर्ण है। पिछले वर्ष वर्षा ठीक से हो गई थी, अत: गाँव के तालाब में काफी पानी आ गया था। पर गेहूँ की खेती के लिए इस जल का इतना अधिक उपयोग कर लिया गया कि गर्मी के दिनों में पशुओं की प्यास बुझाने लायक पानी भी नहीं बचा।
इस क्षेत्र में जल संकट दूर करने के लिए प्रयासरत संस्था परमार्थ के स्थानीय समन्वयक रवि प्रताप तोमर बताते हैं कि ऐसी समस्या यहाँ के कई गाँवों में है। अत: पेयजल संकट दूर करने के लिए गाँव समाज का अपना अनुशासन भी ज़रूरी है।
इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे गाँव भी है जहाँ कमज़ोर वर्गों, विशेषकर दलित व आदिवासी समुदाय, के जल अधिकारों की उपेक्षा होती है। उदाहरण के लिए मोटो गाँव में आरंभ में दलित व कमज़ोर वर्ग को एक कुएँ को साफ करने व उसकी मरम्मत करने से दबंगों ने रोक दिया था। इस स्थिति में जल-जन-जोड़ो अभियान के कार्यकर्ताओं ने कमज़ोर वर्ग की महिलाओं की सहायता की व उन्हें प्रोत्साहित किया ताकि वे दबंगों के अवरोध की परवाह न करते हुए कुएँ को ठीक कर सकें।
इस अभियान के राष्ट्रीय संयोजक संजय सिंह कहते हैं कि सामंती असर व विषमता के कारण अनेक गाँवों में स्थितियाँ विकट हैं। यहाँ कमज़ोर वर्ग के जल अधिकारों पर ध्यान देने की विशेष ज़रूरत है। इस स्थिति में बुंदेलखंड के अनेक गाँवों में कमज़ोर वर्ग की अनेक महिलाओं को जल सहेलियों के रूप में चयनित किया गया है व गाँवों में पानी पंचायतों का गठन करते समय कमज़ोर वर्गों को अच्छा प्रतिनिधित्व दिया गया है। इस तरह यह जल संकट हल करने के प्रयासों को सामाजिक स्तर पर समावेशी बनाने का प्रयास है।

परमार्थ संस्था के एक समन्वयक मनीष कुमार अपने अनुभवों के आधार पर बताते हैं कि उपयोग किए गए जल को बेकार बहने से रोक कर सब्ज़ी उत्पादन व किचन गार्डन में उसका उपयोग किया जा सकता है जिससे पोषण सुरक्षा में बहुत मदद मिल सकती है।
सबसे बड़ी ज़रूरत है वर्षा के जल को भलीभांति रोकना जिसके लिए जन भागीदारी से स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप नियोजन ज़रूरी है। जल संरक्षण पर हुए बहुत से खर्च के सही परिणाम नहीं मिलते हैं क्योंकि स्थानीय लोगों, विशेषकर ज़रूरतमंदों व छोटे किसानों से पर्याप्त विमर्श के बिना ही इन्हें जल्दबाज़ी में बनाया जाता है। निर्णय इस आधार पर नहीं लिया जाता कि कहाँ निर्माण करने से अधिकतम जल बचेगा, अपितु इस आधार पर लिया जाता है कि कहाँ निर्माण करने से अधिक पैसा गलत ढंग से बचा लिया जाएगा।
इसी तरह परंपरागत तालाबों का उपयोग सभी लोगों का जल संकट दूर करने के लिए नहीं हो सका है; क्योंकि कई दबंग लोग इन पर व इनके जल-ग्रहण क्षेत्रों पर अतिक्रमण कर लेते हैं। इस स्थिति में इन तालाबों को गहरा करने व इनकी सफाई का कार्य उपेक्षित रह जाता है, व इनमें पर्याप्त पानी का प्रवेश भी नहीं हो सकता है।
इस तरह किसी भी गाँव के जल-संकट को दूर करने के विभिन्न सामाजिक व तकनीकी पक्ष हैं व इन सभी पर ध्यान देकर जल संकट दूर करने की समग्र योजना गाँव व पंचायत के स्तर पर बननी चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

Jun 7, 2017

वर्षा जल की साझेदारी

           वर्षा जल की साझेदारी 

                 - अनुपम मिश्र

कुण्ड या टाँका
(गतांक से आगे)
परम्परागत जल संग्रह में तालाब आदि के निर्माण में जो जगह आगोर की यानी जलागम क्षेत्र की होती है वही जगह समाज ने मरुभूमि के शहरों और गाँवों में घर की छतों पर भी ढूँढ निकाली थी। वर्षा का पानी जैसे भूमि पर गिरकर एक जगह एकत्र हो सकता है, तो उसी तरह छोटी या बड़ी छत या आँगन में गिरने वाला पानी क्यों न एकत्र किया जाए। वर्षा के ऐसे मीठे या पालर पानी का महत्त्व तब और बढ़ जाता है जब हमें पता चलता है कि उन क्षेत्रों में भूजल बिल्कुल खारा हैं और वह पीने के लायक नहीं है।
प्राय: हर घर की छत एक हल्का-सा ढाल लिए बनाई जाती है। वहाँ से एक नाली के जरिए पानी नीचे आता है। नाली में रेत के कण और कचरे को छानने का प्रबन्ध रखा जाता है। उस क्षेत्र में गिरने वाली वर्षा के माप या आँकड़े के अनुसार नीचे जमा करने का टाँका बनाया जाता है। मोटे तौर पर ऐसे टाँकों की क्षमता 50 हजार लीटर से लेकर पाँच लाख लीटर तक रहती है। पुराने समय में इन्हें घड़ों के नाप से देखा जाता और ऐसे घड़ों का आकार एक निश्चित मानक से तय होता था।
राजस्थान ने अनेक शहरों में, कस्बों में कोई 25-30 साल पहले से नगरपालिकाओं ने नलों की व्यवस्था बना दी है। लेकिन हम सभी जानते हैं कि समय के साथ-साथ पानी की उपलब्धता में लगातार गिरावट आई है और जो नल कभी दिनभर चलते थे, अब बड़ी मुश्किल से उनमें एकाध घंटे पानी आ पाता है। ऐसे क्षेत्रों में छतों और आँगनों से भरने वाले टाँकों की व्यवस्था आज भी बहुत व्यावहारिक और आधुनिक सिद्ध हो रही है। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ऐसे क्षेत्र कम वर्षा वाले क्षेत्र हैं।
ऐसे कुण्ड, टाँके सब जगह हैं। ऊँचे पहाड़ों में बने किलों में, मंदिरों में, पहाड़ की तलहटी में बसे गाँव में, गाँव के बाहर निर्जन क्षेत्रों में, और तो और खेतों में भी सब जगह हमें अलग-अलग आकारों के कुण्ड या टाँके मिलते हैं।
जहाँ जितनी भी जगह मिल सके, वहाँ गारे-चूने से लीपकर एक ऐसा ‘आँगन’ बना लिया जाता है, जो थोड़ी ढाल लिये रहता है। यह ढाल एक तरफ से दूसरी तरफ भी हो सकता है और यदि ‘आँगन’ काफी बड़ा है तो ढाल उसके सब कोनों से बीच केंद्र की तरफ भी आ सकता है। ‘आँगन’ के आकार के हिसाब से, उस पर बरसने वाली वर्षा के हिसाब से इस केंद्र में एक कुण्ड बनाया जाता है। कुण्ड के भीतर की चिनाई इस ढंग से की जाती है कि उसमें एकत्र होने वाले पानी की एक बूँद भी रिसे नहीं, वर्ष भर पानी सुरक्षित और साफ-सुथरा बना रहे।
जिस आँगन में कुण्ड के लिए वर्षा का पानी जमा किया जाता है, वह आगोर कहलाता है। आगोर संज्ञा अगोरने क्रिया से बनी है। अगोरना यानी बटोर लेना के अर्थ में। आगोर को खूब साफ-सुथरा रखा जाता है, वर्ष भर। वर्षा से पहले तो इसकी बहुत बारीकी से सफाई होती है। जूते, चप्पल आगोर में नहीं आ सकते। समाज ने कड़े नियम बनाए थे, पानी को सरल ढंग से साफ रखने के लिए।
आगोर की ढाल से बहकर आने वाला पानी कुण्ड के मंडल, यानी घेरे में चारों तरफ बने ओयरों यानी सुराखों से भीतर पहुँचता है। ये छेद कहीं-कहीं झुंड भी कहलाते हैं। आगोर की सफाई के बाद भी पानी के साथ आ सकने वारी रेत, पत्तियाँ रोकने के लिए ओयरों में कचरा छानने के लिए जालियाँ भी लगती हैं। कहीं-कहीं बड़े आकार के कुण्डों में एकत्र होने वाले पानी की शुद्धता के लिए आगोर ठीक किसी चबूतरे की तरफ ऊँचा उठा रहता है।
बहुत बड़ी जोतों के कारण मरुभूमि में गाँव और खेतों की दूरी और भी बढ़ जाती है। खेतों पर दिन-भर काम करने के लिए भी पानी चाहिए। खेतों में भी थोड़ी-थोड़ी दूर पर छोटी-बड़ी कुण्डियाँ बनाई जाती हैं। इनमें एकत्र कर लिया गया पानी कृषक समाज के निस्तार और पीने के काम में आ जाता है।
राजस्थान में जल संरक्षणककुण्ड बनते ही ऐसे रेतीले इलाकों में हैं, जहाँ भूजल सौ-दो सौ हाथ से भी गहरा और प्राय: खारा मिलता है। बड़े कुँड बीस-तीस हाथ गहरे बनते हैं और वह भी रेत में । भीतर बूँद-बूँद भी रिसने लगे तो भरा-भराया कुण्ड खाली होने में देर नहीं लगे।
इसलिए कुण्ड के भीतरी भाग में सर्वोत्तम चिनाई की जाती है। आकार छोटा हो या बड़ा, चिनाई तो सौ टका ही होती है। चिनाई में पत्थर या पत्थर की पट्टियाँ भी लगाई जाती हैं। साँस यानी पत्थरों के बीच जोड़ते समय रह गई जगह में फिर से महीन चूने का लेप किया जाता है। मरुभूमि में तीस हाथ पानी भरा हो पर तीस बूँद भी रिसन नहीं होगी-इसका पक्का और पुख्ता इंतजाम किया जाता रहा है।
आगोर की सफाई और भारी सावधानी के बाद भी कुछ रेत कुण्ड में पानी के साथ चली जाती है। इसलिए कभी-कभी वर्ष के आरंभ में, चैत्र में कुण्ड के भीतर उतर कर इसकी सफाई भी करनी पड़ती है। नीचे उतरने के लिए चिनाई के समय ही दीवार की गोलाई में एक-एक हाथ के अंतर पर जरा सी बाहर निकली पत्थर की एक-एक छोटी-छोटी पट्टी बिठा दी जाती है। नीचे कुण्ड के तल पर जमा रेत आसानी से समेट कर निकाली जा सके, इसका भी पूरा ध्यान रखा जाता है। तल एक बड़े कढ़ाव जैसा ढालदार बनाया जाता है। इसे खमाड़ियाँ या कुण्डलियाँ भी कहते हैं। लेकिन ऊपर आगोर में इतनी अधिक सावधानी रखी जाती है कि खमाडिय़ों में से रेत निकालने का काम पाँच से दस बरस में एकाध बार ही करना पड़ता है। एक पूरी पीढ़ी कुण्ड को इतने सँभाल कर रखती है कि दूसरी पीढ़ी को ही उसमें सीढ़ियों से उतरने का मौका मिल पाता है।
पिछले दौर में सरकारों ने अनेक स्थानों पर अनेक गाँवों में पानी का नया प्रबंध किया है। पेयजल की नई योजनाएँ आई हैं। हैंडपंप या ट्यूबवेल लगे हैं। इंदिरा गाँधी नहर से भी शहरों, गाँवों को पीने का पानी दिया जाने लगा है। ऐसे इलाकों में कुण्ड, टाँकों की रखवाली की, देखरेख की मजबूत परम्परा जरूर कमजोर हुई है। यहाँ के कुण्ड टूट-फूट चले हैं, आगोर में झाड़ियाँ उग आई हैं। लेकिन कहीं-कहीं पानी की नई व्यवस्था अकाल आदि के दौर में फिर से लडख़ड़ा गई है और तब ऐसी जगहों पर लोगों ने टूटे कुण्डों की फिर से मरम्मत की है। राजस्थान में ऐसे भी क्षेत्र हैं जहाँ समाज ने पानी के नए साधन आने पर भी अपने पुराने तरीके कायम रखे हैं।
कुण्ड निजी भी है और सार्वजनिक भी। निजी कुण्ड घरों के सामने, आँगन में, अहाते में और पिछवाड़े बाड़ों में बनते हैं। सार्वजनिक कुण्ड पंचायती भूमि में या प्राय: दो गाँव के बीच बनाए जाते हैं। बड़े कुण्डों की चारदीवारी में प्रवेश के लिए दरवाजा भी होता है। इसके सामने प्राय: दो खुले हौज रहते हैं। एक छोटा, एक बड़ा। इनकी ऊँचाई भी कम ज्यादा रखी जाती है। ये खेल, थाला, हवाड़ों या उबारा कहलाते हैं। इनमें आसपास से गुजरने वाले भेड़-बकरियों, ऊँट और गायों के लिए पानी भर कर रखा जाता है। पशुओं को बाहर ही पानी मिल जाता है और इनके भीतर जाने से जो गंदगी हो सकती है, वह भी रुक जाती है।
सार्वजनिक कुण्ड भी लोग ही बनाते हैं। पानी का काम पुण्य का काम माना जाता है। किसी भी घर में कोई अच्छा प्रसंग आने पर गृहस्थ सार्वजनिक कुण्ड बनाने का संकल्प लेते हैं और फिर इसे पूरा करने में गव के दूसरे घर भी अपना श्रम देते हैं। कुछ सम्पन्न परिवार सार्वजनिक कुण्ड बनाकर उसकी रखवाली का काम एक परिवार को सौंप देते थे। कुण्ड के बड़े अहाते में आगोर के बाहर इस परिवार के रहने का प्रबंध कर दिया जाता था। यह व्यवस्था दोनों तरफ से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती थी। कुण्ड बनाने वाले परिवार के मुखिया अपनी सम्पत्ति का एक निश्चित भाग कुण्ड की सार-संभाल के लिए अलग रख देते थे। बाद की पीढ़ियाँ भी इसे निभाती थीं। आज भी राजस्थान में ऐसे बहुत से कुण्ड हैं, जिनको बनाने वाले परिवार नौकरी, व्यापार के कारण यहाँ से निकल कर असम, बंगाल, मुंबई जा बसे हैं पर रखवाली करने वाले परिवार अभी भी कुण्ड पर ही बसे हैं। ऐसे बड़े कुंड आज भी वर्षा के जल का संग्रह करते हैं और पूरे बरस भर आसपास की आबादी को किसी भी नगरपालिका से ज्यादा शुद्ध पानी देते हैं। ऐसे कुण्डों या टाँकों की क्षमता एक लाख लीटर से ऊपर होती है।
कई कुण्ड टूट-फूट भी गए हैं, कहीं-कहीं उनमें एकत्र पानी भी खराब हुआ है पर यह सब समाज की टूट-फूट के अनुपात में ही मिलेगा। इसमें इस पद्धति का कोई दोष नहीं है। यह पद्धति तो नई खर्चीली और अव्यावहारिक योजनाओं के दोष भी ढँकने की उदारता रखती है। इन इलाकों में पिछले दिनों जल संकट हल करने के लिए जितने भी नलकूप और ‘हैंडपंप’ लगे, उनमें पानी खारा ही निकला। पीने लायक मीठा पानी इन कुण्ड, कुण्डियों में ही उपलब्ध था। इसलिए बाद में अकाल आने पर कहीं-कहीं कुण्डों के ऊपर ही हैंडपंप लगा दिए गए हैं।
चुरू क्षेत्र में ऐसे कई कुण्ड मिल जाएँगे,जो नई पुरानी रीत एक साथ निभाते हैं। बहुप्रचारित इंदिरा गाँधी नहर से ऐसे कुछ क्षेत्र में पीने का पानी पहुँचाया गया है और इस पानी का संग्रह कहीं तो नई बनी सरकारी टंकियों में किया गया है और कहीं-कहीं इन्हीं पुराने कुण्डों में।
हम सभी जानते हैं कि राजस्थान में रंगों के प्रति एक विशेष आकर्षण हैं। लहँगे ओढ़नी और चटकीले रंगों की पगड़ियाँ जीवन के सुख और दुख में अपने रंग बदलती हैं। पर इन  कुण्डियों का केवल एक ही रंग मिलता है - बस सफेद। तेज धूप और गर्मी के इस इलाके में यदि कुण्डियों पर कोई गहरा रंग हो तो बाहर की गर्मी सोख कर भीतर के पानी पर भी अपना असर छोड़ेगा। इसलिए इतने रंगीन पहनावे वाला समाज कुण्डियों को सिर्फ सफेद रंग में रंगता है। सफेद परत तेज धूप की किरणों को वापस लौटा देती है।
इन कुण्डों ने पुराना समय भी देखा है, नया भी। इस हिसाब से वे समय सिद्ध हैं। स्वयंसिद्ध इनकी एक और विशेषता है। इन्हें बनाने के लिए किसी भी तरह की सामग्री कहीं और से नहीं लानी पड़ती। मरुभूमि में पानी का काम करने वाले विशाल संगठन का एक बड़ा गुण है - अपनी ही जगह उपलब्ध चीजों से अपना मजबूत ढाँचा खड़ा करना। किसी जगह कोई एक सामग्री मिलती है, पर कहीं और वह नहीं-लेकिन कुण्ड वहाँ भी मिलेंगे।
जहाँ पत्थर की पट्टियाँ निकलती हैं, वहाँ कुण्ड का मुख्य भाग उसी से बनता है। कुछ जगह ये उपलब्ध नहीं है। पर वहाँ फोग नाम की झाड़ी खड़ी है साथ देने। फोग की टहनियों को एक दूसरे में गूँथ कर फँसा कर कुण्ड के ऊपर का गुम्बदनुमा ढाँचा बनाया जाता है। इस पर रेत, मिट्टी और चूने का मोटा लेप लगाया जाता है। गुम्बद के ऊपर चढ़ने के लिए भीतर गुथी लकड़ियों का कुछ भाग बाहर निकाल कर रखा जाता है। बीच में पानी निकालने की जगह बनाई जाती है। यहाँ भी वर्षा का पानी कुण्ड के मंडल में बने ओयरों, छेद से जाता है। पत्थर वाले कुण्ड में ओयरों की संख्या एक से अधिक होती है लेकिन फोग की कुण्डियों में सिर्फ एक ही रखी जाती है। कुण्ड का व्यास कोई सात-आठ हाथ, ऊँचाई कोई चार हाथ और पानी लेने वाले छेद प्राय: एक बित्ता बड़े होते हैं। वर्षा का पानी भीतर कुण्ड में जमा करने के बाद बाकी दिनों इसे कपड़े या टाट आदि को लपेट कर बनाए गए एक डाट से ढक कर रखते हैं। फोग वाले कुण्ड थोड़े छोटे होते हैं इसलिए प्राय: कुण्डी कहलाते हैं।
फोग की टहनियों से बना गुंबद भी इस तेज धूप में गरम नहीं होता। उसमें चटक कर दरारें नहीं पड़तीं और भीतर का पानी इन सब बातों के साथ-साथ रेत में रमा रहने के कारण ठंडा बना रहता है।
मरुभूमि में जहाँ कहीं भी जिप्सम या खड़िया पट्टी मिलती है, ऐसे क्षेत्रों में इसी कुण्ड का उपयोग कुण्डी बनाने के लिए किया जाता है। खड़िया के बड़े-बड़े टुकड़े खदान से निकाल कर लकड़ी की आग में पका लिए जाते हैं। एक निश्चित तापमान पर ये बड़े डले यानी टुकड़े टूट-टूट कर छोटे-छोटे नरम टुकड़ों में बदल जाते हैं। फिर इन्हें कूटते हैं। आगोर का ठीक चुनाव कर कुण्डी की खुदाई की जाती है। फिर भीतर की चिनाई और ऊपर का गुम्बद भी इसी खड़िया के चूरे से बनाया जाता है। पाँच-छ: हाथ के व्यास वाला यह गुम्बद कोई एक बित्ता मोटा रखा जाता है। इस पर दो महिलाएँ खड़े होकर पानी निकालें तो भी यह टूटता नहीं।
मरुभूमि में कई जगह चट्टाने हैं। इनमें पत्थर की पट्टियाँ निकलती हैं। इन पट्टियों की मदद से बड़े-बड़े कुण्ड तैयार होते हैं। ये पट्टियाँ प्राय: दो हाथ चौड़ी और चौदह हाथ लम्बी रहती है। जितना बड़ा आगोर हो, जितना अधिक पानी एकत्र हो सकता हो, उतना ही बड़ा कुण्ड इन पट्टियों से ढक कर बनाया जाता है।
घर छोटे हों, बड़े हों या पक्के- कुण्ड तो उनमें पक्के तौर पर बनते ही हैं। मरुभूमि में गाँव दूर-दूर बसे हैं। आबादी भी कम है। ऐसे छितरे हुए गाँवों को पानी की किसी केंद्रीय व्यवस्था से जोड़ने का काम सम्भव ही नहीं है। इसलिए समाज ने यहाँ पानी का सारा काम बिल्कुल विकेंद्रित रखा, उसकी जिम्मेदारी को आपस में बूँद-बूँद बाँट लिया। यह काम एक नीरस तकनीक, यांत्रिक, न रह कर एक संस्कार में बदल गया। ये कुण्डियाँ कितनी सुंदर हो सकती हैं, इसका परिचय दे सकते हैं जैसलमेर की सीमा पर बसे अनेक गाँव।
ये इलाके वर्षा के आँकड़ों में भी सबसे कम हैं और आबादी के घनत्व में भी। आबादी का घनत्व यहाँ पर पाँच, सात व्यक्ति प्रति किलोमीटर है। दस-बीस घरों या ढाणियों के गाँव रेत के विस्तार में एक दूसरे से बहुत दूर-दूर बसे हैं। ऐसी बसावट के लिए पीने का पानी घर-घर के लिए जुटाना अपने आप में एक बड़ी चुनौती रही है। लेकिन हमारे परम्परागत समाज में इसको बहुत व्यावहारिक ढंग से हल करके दिखाया है। ऐसे गाँव में हरेक घर के आगे एक बड़ा-सा चबूतरा बनाया जाता है। इसे जमीन से ऊपर कोई दो फुट रखा जाता है और जमीन से नीचे कोई दस फुट गहरा कुण्ड होता है। इनमें घर की छत और आँगन से वर्षा का पानी छानकर एकत्र किया जाता है। जिस घर की सदस्य संख्या ज्यादा होगी उस घर का आकार भी बड़ा होगा और उसी हिसाब से उस घर की छत, उसका आँगन और उसका कुण्ड भी बनाया जाता है। इन कुण्डों के भीतर बहुत सफाई से ऐसी प्लास्ट्रिंग की जाती है कि उसमें एकत्र पानी रिस कर रेत में गायब न हो जाए।
राजस्थान में जल संरक्षण
आज देश के बहुत सारे बड़े शहरों में - दिल्ली चेन्नई, बैंगलोर आदि में सरकारों ने वर्षा के जल का संग्रह करने के लिए नए कानून बनाए हैं। इन कानूनों के कारण अब हर घर को अपनी छत पर बरसने वाले पानी को अनिवार्य रूप से एकत्र करना है या उससे भूजल को रिचार्ज करना है।
लेकिन सर्वे बताते हैं कि ज्यादातर घरों में यह कानून प्रभावशाली ढंग से लागू नहीं हो पाया है। दूसरी तरफ हम देखते हैं कि रेगिस्तान के अनपढ़ और पिछड़े माने गए गाँव और कस्बों में लोगों ने सैकड़ों बरस से इस पद्धति को अपने जीवन का एक अनिवार्य अंग बना लिया था। उन्होंने यह सब किया तो इसीलिए नहीं कि कानून उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य करता है। उन्होंने इसे बाध्य नहीं साध्य माना है। मरुभूमि के लोगों ने अपने पुरखों को ऐसा करते देखा, ऐसा करते सुना। उनकी स्मृति और श्रुति उन्हें इस व्यावहारिक पद्धति की तरफ ले गई। इस स्मृति और श्रुति से यह रीति बन गई और फिर कानून के बराबर बनते रहने वाली कृति भी बन गई।
इन टाँकों के भीतर का डिजाइन भी समाज ने लगातार उन्नत किया है। इनमें भीतर रेत या गाद न जमे, इसका पूरा ध्यान रखा जाता है। इसकी पहली सावधानी छत या आँगन में बरती जाती है - जहाँ से पानी एकत्र होता है। दूसरी सावधानी टाँके में प्रवेश से ठीक पहले बनाई जाने वाली संरचना में देखने को मिलती है। अधिकांश रेत या कचरा इन दोनों जगहों पर रोक लिया जाता है। लेकिन फिर भी यदि कुछ रेत कण मुख्य टाँके में चले जाएँ,  तो उनको सरलता से एकत्र कर निकालने का भी पुख्ता इंतजाम इन टाँकों में देखने को मिलता है। भीतर से टाँके गोल हों या चौकोर उनका तल दीवार या परिधि से नब्बे डिग्री के कोण से नहीं जुड़ता। वह हल्की-सी गोलाई लिए रहता है। फिर यह तल भी पूरी तरह समतल नहीं रहता। कुण्ड के आकार के अनुसार इसके बीच में थोड़ी ढाल के साथ एक कढ़ाईनुमा ढाँचा और बनाया जाता है। इसमें पानी के साथ आए हुए रेत के कण धीरे-धीरे जमा हो जाते हैं। दो-चार वर्षों के अंतर पर इसका निरीक्षण किया जाता है और फिर कुण्ड में नीचे उतरकर आसानी से रेत को अलग कर लिया जाता है। कहीं कोण से उतरती हुई सीढिय़ाँ होती हैं तो कहीं खड़ी सीढ़ियाँ। जगह कम हो तो केवल पंजे रखने लायक खाँचे बनाये जाते हैं।
मरुभूमि में कहीं-कहीं छोटे तालाबों के साथ उनके जलग्रहण क्षेत्र में भी टाँके मिलते हैं। इनको बनाने के पीछे एक बहुत ही व्यावहारिक कारण रहा है। पानी का काम करने वाले नए लोगों को, संस्थाओं को और शासन को भी ऐसी अनोखी बातों को समझने का प्रयत्न करना चाहिेए।
इन क्षेत्रों में वर्षा बहुत कम होती है कभी-कभी इतनी कम कि छोटे जलग्रहण के तालाब पूरी तरह से भर नहीं सकते। इनमें जो थोड़ा पानी आएगा, वह मटमैला होगा और फिर यहाँ की तेज गर्मी और धूप में कीचड़ में बदल सकता है। इसलिए ऐसे छोटे आगोर वाले तालाबों में हमें कहीं-कहीं तालाब में बहकर आने वाले पानी के रास्ते में छोटे कुण्ड या टाँके भी बने मिलते हैं। इनको बनाने का एक ही कारण है - खुले तालाब में जाने से पहले पानी को इन ढके कुण्डों में रोक लेना। ऐसे सभी टाँकों की क्षमता बीस से पचास हजार लीटर तक ही होती है। पक्का बना ढका हुआ टाँका थोड़ी-सी मात्रा में आए पानी को अगले कुछ महीनों तक साफ-सुथरे ढंग से पीने के लिए सुरक्षित रखता है।
पानी का काम करने वाले नए संगठनों को, स्वयंसेवी संस्थाओं को अपने समाज में चारों तरफ बिखरी ऐसी अनोखी समयसिद्ध और स्वयंसिद्ध रचनाओं को बनाने का, फैलाने का पूरा ध्यान रखना चाहिए। इससे उनका काम बहुत कम खर्च में कम पैसे में अधिक से अधिक जगहों में फैल सकता है।
छत से वर्षा के जल का संग्रहण
रेगिस्तानी क्षेत्रों के अनेक भागों और विशेष रूप से दूरस्थ क्षेत्रों में जहाँ अच्छी किस्म का भूजल उपलब्ध नहीं है, अथवा सतही जल संसाधन बहुत दूरी पर अवस्थित है, आने वाले समय में भी घरेलू जल आपूर्ति का वर्षाजल ही एक मात्र स्रोत है। इन क्षेत्रों मे घर की छत पर बरसने वाले जल को वर्षा ऋतु के बाद में उपयोग हेतु अच्छी प्रकार से बनी नालियों एवं पाइपों के द्वारा नियंत्रित कर भंडारण हेतु सतह के ऊपर अथवा अधोसतही पक्के टैंक अथवा टाँकों में एकत्र किया जाता है। यदि भंडारित जल का उपयोग पीने हेतु करना है तो नाली के सामने ही जल के साथ आ सकने वाले कचरे को रोकने का उचित प्रबंध किया जाता है इससे जल छनकर नीचे टाँके में जमा होता है। टाँके का आकार मुख्य रूप से छत के नाप पर आधारित होता है। यथायोग्य टाँकों में जल की इतनी मात्रा भरी जा सकती है, जो आगामी वर्षा के पूर्व तक यथोचित लंबी अवधि हेतु पर्याप्त जल आपूर्ति सुनिश्चित कर सकें और लोगों को मान्य रूप में राहत पहुँचा सके। इस प्रकार से एकत्र और संचित जल से उन क्षेत्रों में जहाँ सिंचाई हेतु जल की प्राप्ति कठिन हो, छोटे भूमि के टुकड़ों में जैसे गृह वाटिकाओं और सब्जी उत्पादन के लिए सिंचाई भी की जा सकती है।
लोहे की चद्दरों केवलू अथवा खपरैल और अन्य सभी प्रकार की पक्की छतें जो चिकनी, कठोर एवं घनी हों, छतों से वर्षा के जल का संग्रहण करने के उद्देश्य से सर्वाधिक उपयुक्त हैं।
इस पद्धति का वास्तविक आकार विभिन्न कारकों पर निर्भर करता है। टाँके के आकार मुख्य रूप से पद्धति की लागत, एकत्रित किए जाने वाले वर्षा के जल की मात्रा, टाँके के मालिकों की आकांक्षाएँ एवं जरूरतें और बाहरी मदद के स्तर से प्रभावित होंगी।
छत से प्राप्त हो सकने वाले जल की मात्रा की गणना इस सूत्र से कर सकते हैं-
एकत्रित जल (लीटर में) = छत का क्षेत्रफल (वर्ग मी.) x वर्षा (मि.मी.)। टैंक अथवा टाँके के आयतन की गणना निम्नांकित सूत्र से की जा सकती है :
V = (t x n x q) + et
जहां V = टाँके का आयतन (लीटर में) t = सूखे मौसम की अवधि (दिनों में) n = उपभोक्ताओं की संख्या, q = उपभोग प्रति व्यक्ति प्रतिदिन (लीटर में, ) और et = सूखे मौसम में वाष्पन द्वारा जल ह्रास।
क्योंकि बंद टैंक से वाष्पन लगभग नगण्य होता है, अतः वाष्पन में होने वाले जल के ह्रास (et) को नजरअंदाज (= शून्य) किया जा सकता है।
राजस्थान में जल संरक्षण आकांक्षित जल ग्रहण क्षेत्र का क्षेत्रफल (यानी छत का क्षेत्रफल) ज्ञात करने हेतु टैंक के आयतन (कुल भराव क्षमता) में पिछले मानसूनों में एकत्रित हुए औसत वर्षाजल की कुल मात्रा (लीटर में) प्रति इकाई क्षेत्र (वर्ग मी.) से भाग देने के बाद उसे अपवाह गुणांक से गुणा कर दें (अपवाह गुणांक, यानी वर्षा का वह भाग जिसका वास्तव में संग्रहण किया जा सकता है, जो 0.8केवलू अथवा खपरैल की छतों से 0.9 लोहे की चद्दरों वाली छतों के अनुसार है)। (समाप्त) जल संग्रहण एवं प्रबंध पुस्तक से साभार