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Jul 20, 2015

रंगकर्म जिनके जीने का जरिया बना

रंगकर्म जिनके जीने का जरिया बना
रामहृदय तिवारी
दुर्ग जिले के उरडहा गाँव में 16 सितम्बर 1943 को जन्मे रामहृदय तिवारी लोककला के क्षेत्र में पिछले चार दशकों से सक्रिय है। एक स्वतंत्र रंगकर्मी के रुप में श्री तिवारी सिर्फ रंगमंच ही नहीं अपितु नाट्यकर्म से जुड़ी अनेकानेक गतिविधियों में निरंतर संलग्न रहें हैं। श्री तिवारी द्वारा निर्देशित अँधेरे के उस पार भूख के सौदागर, भविष्य, अश्वत्थामा, राजा जिंदा है, मुर्गी वाला, झड़ीराम सर्वहारा, पेंशन, विरोध, हम क्यों नहीं गाते, अरण्यगाथा तथा अन्य अनेक हिन्दी नाटक छत्तीसगढ़ के समृद्ध रंगमंचीय इतिहास का हिस्सा तो बने ही, जनता के संघर्षमय जीवन की अंतरंग, सूक्ष्म और संवेदनशील अभिव्यक्ति के वाहक भी बने।
रामहृदय तिवारी ने कसक, सँवरी, स्वराज, एहसास जैसी अनेक टेली फिल्मों का भी निर्देशन किया। उन्होंने छत्तीसगढ़ी नाचा, बोली, लोकगीत, लोककथा, लोक परम्परा, लोक संगीत, लोक नाट्य और लोक अभिव्यक्ति की विभिन्न विधाओं पर निरंतर और सोद्देश्यपूर्ण लेखन भी किया। वे लम्बे समय तक हिन्दी रंगमंच क्षितिज रंग शिविर से जुड़े रहे और वर्तमान में राज्य की अत्यंत प्रतिष्ठित रंग संस्था लोक रंग अर्जुन्दा से संबद्ध है। वे लंबे समय तक दाऊ रामचंद्र देशमुख और दाऊ महासिंग चंद्राकर के सानिध्य में रहे।
 रामहृदय तिवारी ने छत्तीसगढ़ी लोकजीवन की चहल-पहल को अत्यन्त कलात्मक एवं उद्देश्यपूर्ण अभिव्यक्ति प्रदान की है। दाऊ रामचंद्र देशमुख ने जनता के सुख-दुख को जिस अंतरंगता एवं संवेदनशीलता के साथ लोकनाट्य का हिस्सा बनाया, रामहृदय तिवारी ने उसे सार्थक दिशा और अर्थपूर्ण विस्तार प्रदान किया। महत्त्वपूर्ण यह है कि उन्होंने पहले रंगकर्म को अपने जीवन का हिस्सा बनाया, बाद में उनका जीवन ही रंगकर्म का हिस्सा बन गया।

सोनहा बिहान के स्वप्नदर्शी: दाऊ महासिंह चन्द्राकर

सोनहा बिहान के स्वप्नदर्शी:

दाऊ महासिंह चन्द्राकर

- रामहृदय तिवारी

याद आती है- 6 सितम्बर 1997 की, मतवारी में आयोजित सुर श्रद्धांजलि की वह शाम, गोधूलि बेला में गायों के गले की टुनटुनाती घंटियाँ, पक्षियों की चहचहाती बोलियाँ, मंदिर में शंख और झालर की ध्वनियाँ और इन्हीं सबके बीच भीगे लम्हों में गुजरती, बिसुरती अपनी बेबस जिन्दगी का पैगाम भेजा था उनके प्रेमी सुर साधकों ने, संगीत के सुरबइहे दिवंगत दाऊ महासिंह चन्द्राकर के नाम, एक पेड़ आमा, छत्तीस पेड़ जाम, सतरंगी ला मोला तें ओढ़ा दे रे दोस, एक मोरे हीरा, मुँहू पा परे घाम, सतरंगी ला मोला तें ओढ़ा दे रे दोस  तब लगा था- गीत गंगा मरुस्थलों में म्लान होकर रह गई, कोकिला की कंठ भी बेजान होकर रह गई, सिर्फ तुम ही क्या गए इस महफिल से, महफिल एक सूखी नदी सी वीरान होकर रह गई।
हम नहीं जानते लोक स्वर का साधक सूक्षम जगत में आज कहाँ हैं? वे तो निष्ठुरता के साथ अचानक ओझल हुए थे हमारी आँखों से। उन्होंने हमें वक्त ही नहीं दिया उनसे कुछ कह सकें। शायद वे नहीं जान सके कि हम उनसे कितना प्यार करते थे। आज भी  हमारे मन के कोने में बार-बार उनकी यहीं पंक्ति गूँजा करती है- विधि के इही विधान रे संगी, सुख-दुख दोनों मितान रे संगी।
सोनहा बिहान के स्वप्नदर्शी यह दाऊ महसिंह चन्द्राकर ही थे, जिन्होंने भोले छत्तीसगढ़ की पीरा को मंच पर साकार किया था। लोकरंजनी उन्हीं की गायी हुई अमर रागिनी थी। लोरिक चंदा उन्ही की सांस्कृतिक जय यात्रा का तूर्य नाद था, जिससे आज भी निनादित है, अंचल का सांस्कृतिक गगन, जिसके साक्षी हैं- आज भी यहाँ की हवाओं में तैरते छत्तीसगढ़ी गीत, संगीत, नृत्य और उनमें डूबे ऐसे बेशुमार लोग जो इस अंचल की लोककलाओं को जी-जान से प्यार करते हैं। आज जब भी लोक संगीत की महफिल सजती है, तब उस सर्र्जक लोक गायक की, बहुत याद आती है। याद आता है। उनका गाया सदाबाहार गीत-
कोने गुनह में सजा दिन्हें मोहन वो मोला, कोने गुनह में सजा दिन्हा जी। वे जो कभी लोक सांगीतिक महफिल की जान थे, साज और आवाज की शान थे, उनके बिना उनके घर विद्यमान वाद्यों के सदा निनादित रहने वाले स्वर, आज कितने खामोश कितने उदास और वीरान लगते हैं। समर्पण भवन आज भले अस्तित्त्व में न हो, मगर वहाँ के कलागत क्रियाकलापों की सुरमयी स्मृतियाँ हमारे मन मस्तिष्क में सदा के लिए अंकित हैं।
यही वह समर्पण भवन था, जहाँ पहली बार सन् 1975 में उनसे मेरी मुलाकात हुई थी, जहाँ केवल हमारे जैसे ही नहीं बल्कि निजामुद्दीन, दुर्गा भट्ट, जगन्नाथ भट्ट, कबीर साहब, लालू और मदन जैसे न जाने कितने उद्भट कला साधकों को स्नेह और सम्मान मिला करता था। जहाँ बारहों महीने दिन रात नया-नया सीखने और सिखाने वाले प्रेमपूर्वक पनाह पाया करते थे, समर्पण भवन, जिसने ममता, प्रमिला, दीपक लक्ष्मण, शैलजा, मिथिलेश, कुलेश्वर और माया, बसंती, पद्मा जैसे अनगिनत कलारत्नों को तराशा संवारा और उन्हें अनमोल रत्न बनाकर मंच पर पेश किया। तब समर्पण भवन ही नहीं उनके घर आँगन का प्रत्येक कोना, देहरी दरों दीवार और गलियाँ घुँघरु की रुनझुन और तबले की थाप से गुँजायमान थीं।
आज वे सारे स्वर मानों उन्हीं के साथ अनंत में विलीन होकर हमारे लिये केवल स्मृतियाँ बनकर रह गये हैं। लोकस्वर के वे बावले सर्जक शायद हमसे रुठकर बहुत दूर चले गये हैं, हम उन्हें ऐन वक्त पर अलविदा भी न कह सके, पर हमारे अहसासों से, हमारी यादों से वे दूर भला कैसे हो सकते हैं? वे सशरीर हमारे बीच न सही मगर हमारे दिलों में हमेशा समाये रहेंगे। आज हमारे लिये प्रेरक अवशेष हैं- लोक संगीत के लिये उनका दीवानापन, कलाओं के लिये उनका आजीवन समर्पण और अंचल की माटी के लिये कुछ भी कर गुजरने की उनकी अटूट लगन। उनके रोम-रोम से छत्तीसगढ़ बोलता था, उनकी साँस-साँस में छत्तीसगढ़ धडक़ता था। उस सच्चे छत्तीसगढ़ी सपूत और सांस्कृतिक स्वाभिमानी की सीख, समर्पण और लगन, उनसे जुड़े कलाकारों की पूँजी और प्रणम्य धरोहर है।
सच कहा जाये तो महासिंह चन्द्रकर व्यक्ति का नहीं, एक तपस्या का नाम था। लोक मंचीय कलाओं के लिये दिन रात लगे रहने वाले इस महान साधक का देहावसान एक साँस्कृतिक कालखंड का अवसान था। उनके जीवन के व्याकुल क्षणों में जन्मी उनकी तमाम कलागत सर्जनाओं ने उनसे बड़ी-बड़ी कीमतें वसूल कीं। सम्पन्न घर में जन्म लेने के बावजूद उनका सांस्कृतिक सफर सुगम कभी नहीं रहा। पग-पग पर अनगिनत बाधायें,  पिताश्री और परिजन का प्रबल प्रतिरोध, फिर भी वे न कभी विचलित हुए न अपना साधन पथ बदला। जीवन भर, यहाँ तक कि गंभीर अस्वस्थता और वार्धक्य की विवशता के बावजूद सांस्कृतिक मशाल को जलाये अपने हाथों में थामे रहे। यह विलक्षण जीवटपन दाऊजी के व्यक्तित्व की खास पहचान थी, जिसकी मिसाल अंचल के सांस्कृतिक इतिहास में दाऊ, रामचन्द्र देशमुख और मदराजी दाऊ के अलावा दुर्लभ है। भट भेरा साज के गर्भ से जन्में सोनहा बिहान की सांस्कृतिक सुरसरिता के विभिन्न पड़ावों के रुप में गीतांजलि, लोक-रंजनी, फिर लोरिक चंदा का अविरल प्रवाह महासिंह दाऊ की उद्दाम कलानिष्ठा, साधना और समर्पण का अनूठा प्रमाण का प्राण मानने वाले महासिंह जी यह मानते थे कि कला की कोई सीमा नहीं होती, न ही उसे सीखने में उम्र या हैसियत आड़े आनी चाहिये। वे जिज्ञासु भाव से नित्य नई चीजें गुणी लोगों से स्वयं सीखते रहे, साथ ही युवा पीढ़ी को पूरी तल्लीनता के साथ सिखाते भी रहे। लोरिक चंदा का निर्देशन भार सौंपने के साथ कई सीख उन्होंने मुझे भी दी थी। इस प्रोजेक्ट के लिए गड़हा ददरिया उन्होंने स्वयं गाकर जब सुनाया था, मेरी आँखें भीग गयी थीं। कलाकारों के प्रति उनकी  सदाशयता और उदारता अंत तक बनी रही। मैं स्वयं उनसे मिले स्नेह और सम्मान को भूल नहीं पाता हूँ।
यूँ तो इस दुनिया से सबको एक न एक दिन रुखसत होना ही है, मगर ऐसी अंतिम बिदाई और दशगात्र पर दी गई स्वर श्रद्धांजलि जो मैने देखी और सुनी, बिरले को ही नसीब होती है, शायद ऐसे ही किन्हीं क्षणों में नीरज के दिल से ये पंक्तियाँ निकली होंगी:
अब न वो दर्द, न वो दिलन वो दीवाने रहे,
अब न वो सोज, न साज न वो गाने रहे,
साकी, तू अब भी यहाँकिसके लिये बैठा है?

अब न वो जाम, न वो मयन वो पैमाने रहे।

Jul 18, 2009

छत्तीसगढ ज़हाँ जिंदगी नाचती है...

छत्तीसगढ़ ज़हाँ जिंदगी नाचती है...
- रामहृदय तिवारी
छत्तीसगढ़ - भारत का हृदय स्थल - एक प्यारा सा प्रान्त, जिसे इतिहास ने दक्षिण कौशल के नाम से पुकारा है, भूगोल ने धान का कटोरा कहकर स्नेह से दुलारा है, पुरातत्व ने जिसे महाकान्तार की संज्ञा से संवारा है- वहीं संस्कृति ने 'लोक कलाओं का कुबेर' कहकर अंचल का मान बढ़ाया है।
यह एक सच्चाई है कि कला और संगीत ने संभवत: किसी समाज को इतना अधिक प्रभावित और अनुप्राणित नहीं किया होगा, जितना इन्होंने हमें किया है। करमा, ददरिया और सुआ की स्वर लहरियां, पंडवानी, भरथरी, ढोलामारू और चंदैनी जैसी गाथाएं सदियों से इस अंचल के जनमानस में बैठी हुई हैं। यहां के निवासियों में सहज उदार, करुणामय और सहनशील मनोवृत्ति, संवेदना के स्तर पर कलारुपों से बहुत गहरे जुड़े रहने का परिणाम है। छत्तीसगढ़ का जनजीवन अपने पारंपरिक कलारुपों के बीच ही सांस ले सकता है। समूचा अंचल एक ऐसा कलागत लयात्मक- संसार है, जहां जन्म से लेकर मरण तक- जीवन की सारी हलचलें लय और ताल के धागे में गूंथी हुई हैं। कला गर्भा इस धरती की कोख से ही एक अनश्वर लोकमंचीय कला सृष्टि का जन्म हुआ है - जिसे हम सब 'नाचा' के नाम से जानते हैं।
नाचा छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की आबोहवा का एक महकता झोंका है। नाचा इस अंचल के सरल सपनों का प्रतिबिम्ब है। अनगढ़ जन- जीवन से जन्म लेने वाला सुगढ़ नाचा, सच पूछिए तो, ग्रामीण कलाकारों द्वारा पथरीली जमीन पर चन्दन बोने की हिमाकत है। समूचे छत्तीसगढ़ी लोक जीवन की नब्ज को टटोलने का सबसे कारगर माध्यम है नाचा।
नाचा का अलग रंग है, मस्ती है, प्रवाह है। एक ओर जहां इसमें परंपरा निर्वाह की चाह है, वहीं अनचाही परंपरा की चट्टानों को तोडऩे की अदम्य शक्ति भी है। नाचा, नगरीय रंगमंच के बौद्धिक विलास से ऊबे मन की विश्रान्ति है। उसमें लोगों के विमुग्ध करने और मन के तारों को झंकृत करने की अद्भुत क्षमता है और है आंसुओं को पीकर मुस्कान बांटने की सहज सरल चेष्टा। छत्तीसगढ़ अंचल की सम्पूर्ण सहजता, सरलता, मोहकता और माधुर्य जहां एक मंच पर सिमट आए हों, उस मंच का नाम नाचा है। अपनी दीनता, हीनता, अशिक्षा, उपेक्षा और अपमान की आग में तपकर ग्रामीण कलाकर जिस कला संसार की सृष्टि करते हैं, उस संसार का नाम है नाचा। नाचा नृत्य गीत और गम्मत का अनूठा संगम है।
इन सबके बावजूद, सदियों से उपेक्षित, तिरस्कृत और हेय समझे जाने वाले इस नाचा की ओर विद्वानों की दृष्टि अभी हाल के वर्षों में गई। नाचा ने ऐसे भी दिन देखे हैं, जब शिष्ट और सभ्रान्त समाज नाचा देखना अपनी गरिमा के विरुद्ध  समझता था। आज इस विश्वविख्यात नाचा पर बहुत कुछ लिखा गया है। इस पर आज अनेक शोधार्थी शोधकार्य में संलग्न हैं, कई पीएचडी की डिग्री ले चुके हैं। हालत आज यह है कि गांवों के चौपालों से उठकर महानगरों की अट्टालिक मंचों पर नाचा के भव्य प्रदर्शनहो चुके हैं। अपनी अनोखी शैली, सादगी, संप्रेषणीयता और आडंबरहीनता के कारण आज नाचा लोकमंचीय आकाश में एक चमकता हुआ नक्षत्र बन चुका है। 
साहित्यकारों, विद्वानों और कलामनीषियों ने नाचा को अपने-अपने ढंग से अलग-अलग अवसरों पर परिभाषित किया है। डॉ. शिव कुमार मधुर के अनुसार- नाचा अपने नाम के अनुरुप मूलत: नृत्य प्रधान विधा है। निरंजन महावर लिखते हैं- नाचा एक सर्वजातीय रंग विधा है, जिसका उद्भव और विकास ग्रामीण समाज में हुआ है तथा उसमें अनेक परंपरागत विधाओं ने सम्मिलित होकर उसे समृद्ध किया है नाचा मूलत: एक हास्य प्रधान नाट्य विधा है। मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद  से जुड़े नवल शुक्ल कहते हैं- नाचा नृत्य भाव और मुद्राओं का लयात्मक संसार है, यह आदमी की जिजीविषा और अभिव्यक्ति का संसार है। नारायण लाल परमार जी की राय थी कि- नाचा पूर्ण रुपेण एक जीवन केन्द्रित लोक विधा है। मनोरंजन और शिक्षण का जैसा मणिकांचन संयोग इसमें मिलता है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। नाचा अंचल के उत्थान पतन का आरसी है। डॉ. विनय पाठक के अनुसार- लोक नाट्य नाचा की सहजता उसका शृंगार है और उसका अल्हड़ कमनीय सुघड़ रुप उसका आकर्षण।  स्व. रामचन्द्र देशमुख कहते थे- नाचा छत्तीसगढ़ के गांवों में थके हारे ग्राम्य जीवन को नई स्फूर्ति देने वाला माध्यम है। ग्राम जीवन की सहजता, निश्छलता और बेलाग रिश्तों की पृष्ठभूमि है इसके साथ। सापेक्ष के संपादक डॉ. महावीर अग्रवाल लिखते हैं - शिष्ट जीवन की सारी सौजन्यता, रस सिद्धता और कलात्मकता नाचा के चुम्बकीय आकर्षण के सामने फीकी लगती है।  चर्चित कथाकार डॉ.परदेशीराम वर्मा कहते हैं - छत्तीसगढ़ चुप्पे लोगों का अंचल है और वह अपनी चुप्पी जिन माध्यमों से तोड़ता रहा है, उनमें सबसे सशक्त माध्यम नाचा है। अंचल की कल्पनाशीलता का अद्भूत लोकमंचीय विस्तार है नाचा।
यह तो हुई नाचा के द्रष्टा और साक्षी मनीषियों की राय। लेकिन स्वयं नाचा के कलाकारों से पूछें तो वे नहीं बता सकते हैं कि नाचा आखिर क्या है? वे बताने में नहीं दिखाने में माहिर हैं। साहित्य का इतिहास साक्षी है कि राम को भगवान मानकर स्तुतिगान करने वाले महर्षियों से ज्यादा भगवान का वास्तविक हाल उनका वह अभिन्न दास समझता है, जो अपना कलेजा चीरकर बता देता है- भगवान उसके लिए क्या है? ठीक वैसे ही नाचा के विनम्र कलाकार मंच पर अपना हृदय चीरकर बता देते हैं कि देखो नाचा ये है। 
नेमीचन्द्र जैन कहते हैं - रंगमंच कलात्मक अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम है, जिसमें मनोरंजन का अंश अन्य कलाओं की तुलना में सबसे अधिक है। रंगकला हमारे आदिम आवेगों और प्रवृत्तियों को जागृत कर उन्हें एक सामूहिक सूत्र में बांधती है। नि:संदेह कश्मीर से केरल और कच्छ से कामरुप अंचल तक फैली हमारी रंगारंग नाट्य परंपरा विशाल, समृद्ध और जीवन्त है। उनमें  विविधता के बावजूद मौजूद, एक अंतर्सूत्र उनको एक अटूट रिश्ते से जोड़ता है। डॉ. मधुर लिखते हैं कि ईसापूर्व तीसरी शताब्दी का भरत नाट्य शास्त्र कोई आकस्मिक उपज नहीं, वरन पूर्व परंपरा को लेकर की गई एक निश्चित योजना है। समुन्नत नाट्यकला की आधारशिला लोक जीवन में व्याप्त गीत और अभिनय की लोक शैलियां ही है। देश के विभिन्न प्रादेशिक लोकनाट्यों के अतिरिक्त कुछ ऐसी रंग शैलियां भी हैं जो अपने सीमित अंचलों में जन रंजन का माध्यम है। जैसे बंगाल में कीर्तनिया, उडिय़ा में गंभीरा, महाराष्ट्र में गोंधल वैसे ही छत्तीसगढ़ में नाचा है।
स्पष्ट है कि नाचा किसी काव्य की तरह केवल शाब्दिक अभिव्यक्ति नहीं है, न वह किसी चित्र या मूर्तिकला की तरह काल की बाहों में कैद कोई स्थिर रूप है। वह तो गतिशील झरने की तरह लोकजीवन की अनुभूतियों, आवेग, आकांक्षाओं और सपनों को सहज सादगी से अभिव्यक्ति देने वाला जीवंत मंच है।
अशिक्षित या अल्पशिक्षित मगर पारखी नजर वाले नाचा के कलाकार आमतौर पर खेतिहर मजदूर होते हैं। अपने जीवन और समाज की विसंगतियों को उजागर करने के लिए स्वयं अपनी सूझबूझ के अनुसार छोटे-छोटे प्रहसन रचते हैं, सामूहिक रूप से रिहर्सल करते हैं। निर्देशक नाम का कोई निर्दिष्ट व्यक्ति नाचा में नहीं होता। न ही उनकी कोई लिखित स्क्रिप्ट होती है। सब कुछ परस्पर सामंजस्य और साझेदारी में मौखिक रूप से चलता है। कई चुटीले और सटीक संवाद तात्कालिक  रूप में मंच पर ही बनते चले जाते हैं। ठेठ मुहावरों और पैनी लोकोक्तियों के सहारे हास्य व्यंग्य से ओतप्रोत संवादों को सुनकर दर्शक समूह हंस-हंस कर लोट-पोट तो हो ही जाता है, मगर हास्य के बीच कई ऐसी विद्रूपमय स्थितियां सामने आ जाती हैं कि दर्शक तय नहीं कर पाता कि वह हंसे या रोये।
नाचा अपने आप में एक टोटल थियेटर यानि परिपूर्ण नाट्यशैली है। उसमें उन्मुक्तता, चित्रण, रंगरचना तथा दृश्यविधान में यथार्थता के साथ-साथ दर्शकों की कल्पना शीलता को साथ लिए चलने पर बल अधिक समाहित रहता है। अभिनेता और दर्शक वर्ग के बीच घनिष्ट संबंध इसकी दूसरी मौलिक विशेषता है। नाचा में जीवन की मौलिक मान्यताओं और मानवीय मूल्यों को जोड़े रहने की गुंजाइश बराबर बनी रहती है। अपने गम्मतों के माध्यम से कलाकार दैनंदिनी जीवन की विद्रुपताओं और समस्याओं पर कटाक्ष एवं व्यंग्यपूर्ण टिप्पणियां करते चलते हैं।  सूक्ष्म हास्य बोध की अपनी इसी प्रतिभा के बल पर स्वयं पर भी हंसने में सक्षम ये जीवट ग्रामीण कलाकार तमाम विपरीतताओं के बीच आज अपनी अस्मिता के साथ तनकर खड़े हैं। मंच पर इनका इम्प्रोवाइजेशन-प्रत्युपन्नमति की अद्भूत क्षमता देखकर थियेट्रिकल जगत हैरान है।
नाचा का यह एक और उल्लेखनीय पहलू है कि बिना किसी संस्थागत प्रशिक्षण के लगभग सारे कलाकर गायन, वादन, नृत्य, अभिनय एवं रूपसज्जा से लेकर नाचा से संबंधित हर काम कर लेने में सिद्ध हस्त होते हैं। नाचा जैसा आडम्बरहीन मंच ढूंढना मुश्किल है। ग्रामीण परिवेश में उपलब्ध कोई भी भूखंड इनका मंच होता है। यहां पाल परदे पखवाइयां जैसे तामझाम की कोई दरकार नहीं होती। साजिन्दों के बैठने के लिए साधारण सा तख्त मिल जाए तो बहुत है। सारे कलाकारों की वेशभूषा सामान्य ग्रामीणों जैसी ही होती है। अंगराग के लिए सफेद, पीली छुई, खडिय़ा, हल्दी-कुमकुम, काजल, मिट्टी, कालिख, नीला थोथा, मुरदार शंख जैसी सामान्य सुलभ वस्तुओं का इस्तेमाल करते हैं। सारे कलाकार पात्रानुकुल अपना मेकअप स्वयं करते हैं। मंच के तख्त पर संगतकार बैठते हैं और मंच के तीनों ओर दर्शक वर्ग, जो देर रात से शुरु होने वाला नाचा और सुबह की लाली तक पूरी उत्कंठा और सहज  मुग्धता से देखता है और छक कर आनंद लेता है।
नाचा की समूची प्रस्तुति एक थिरकन और लयबद्धता के आरोह-अवरोह में बंधी होती है। कलाकारों की मुद्राओं में हलचल और भावाभिव्यक्तियों में, अभिनय नृत्य और अदाकारी में एक सहज लयबद्धता केवल देखने और महसूस करने की चीज है। नृत्य गीत कब खत्म होकर गम्मत में परिवर्तित हो जाता है, गम्मत फिर कब नृत्य गीत में स्वयमेव ढल जाता है तथा कभी-कभी नृत्य गीत और अभिनय चक्रवात की तरह कैसे एक रस और परस्पर आलिंगित होकर धूम मचा देते हैं- यह नाचा देखकर ही जाना जा सकता है।
नाचा में महिलाओं का निर्वाह पुरुष ही करते हैं। पुरुष ही परी बनते हैं। नचकहरीन और लोटा लिए नजरिया की भूमिका पुरुष ही निभाते हैं। इनकी अदाएं, हावभाव, चालढाल और भावभंगिमाएं इतनी अधिक स्त्रीसुलभ कोमलता और मोहकता के करीब होती हैं कि शिनाख्त करना मुश्किल होता है। नाचा में परी और जोक्कड़ दो ऐसे अद्भूत चरित्र हैं- जिनकी परिकल्पना का निहितार्थ भौंचक कर देता है। परी और जोक्कड़ के वेश विन्यास और रूप सज्जा में कलाकार अपनी पूरी कल्पना शक्ति उड़ेल देते हैं। परी इनके लिए सर्वश्रेष्ठ रूप सौंदर्य और मानवीय सम्मोहन की जीती जागती मिसाल है। उसमें आसमान में उडऩे वाली परी की तरह अलौकिकता का भी हल्का सा स्पर्श रहता है। दर्शक रस विभोर होकर परी की अनोखी अदाओं पर, उसकी लचक और नजाकत पर शुरु से आखिर तक फिदा होकर मुजरे लुटाता है। 'नाचा का जोक्कड़ निरंजन महावर के शब्दों में सर्कस के जोकर, संस्कृत नाटक के विदूषक या अंग्रेजी नाटक के क्लाउन की तरह नहीं है। नाचा का वह सर्वाधिक मुखर और जीवन्त चरित्र होता है। वह हंसाता है, मनोरंजन करता है, हास्य विनोद की सृष्टि बड़ी सहजता से करता है।' पर वह इतना ही नहीं होता। जोक्कड़ छत्तीसगढ़ी नाचा की सम्पूर्ण अस्मिता और अवधारणा के निचोड़ का जीता जागता प्रतीक है। परी और जोक्कड़ ही ऐसे चुम्बकीय चरित्र हैं जो रात-रात भर दर्शकों को बांधे रखने के रहस्य को साथ लिए रहते हैं। ब.व.कारन्त कहते थे कि 'लोक नाट्य का सीधा सादा अर्थ है वह लोगों के साथ रहा है और सदा रहेगा।' नाचा के अपने मूल स्वभाव में देहाती जनता के दैनिक जीवन, सुखदुख, आशा आकांक्षा हास्य उल्लास और आंसू तथा निराशा का एकांतिक एवं परिवेश के प्रति सहज जागरुकता और उसकी बेलाग अभिव्यक्ति देखी जा सकती है। बाल विवाह को रोकने, विधवा विवाह को प्रचलित करने, छुआछूत की भावना का उन्मूलन करने, ऊंचनीच पर आधारित शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद करने में नाचा ने कभी भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई। असहयोग आंदोलन के दिनों में अछूतोद्धार पर आधारित प्रहसन जमादारिन और स्वतंत्रता के आसपास के दिनों में विधवा विवाह पर मुंशी-मुंशइन नाम से खेले जाने वाले नाटक नाचा की चर्चित प्रस्तुतियां हैं। आज भी निरक्षरता और कुष्ठ उन्मूलन जैसे अन्य कई ज्वलन्त विषयों को लेकर अनेक नाचा मंडलियों ने अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता का परिचय बखूबी दिया है और दे रहे हैं। 
नाचा का लोकमंचीय रूप आज जिस मुकाम पर है, वहां से हम पीछे मुड़कर देखते हैं- तो जहां तक हमारी दृष्टि जाती है, इसका स्वरूप ऐसी ही नहीं था जैसा कि वह आज है। अपने युग और परिवेश की बदलती तस्वीर की छाया स्वभावत: उस पर पड़ती रही है। एक युग था जब बिजली की व्यापक सुलभता नहीं थी। मशाल की रोशनी ही मंच का सहारा थी। माइक की व्यवस्था का भी सवाल ही नहीं था। गिने चुने वाद्यों में केवल चिकारा, मंजीरा और तबला जिसे कमर में बांधकर कलाकार खड़े-खड़े ही बजाया करते थे। खड़े साज के नाम से परिचित इस नाचा की शुरुआत ब्रम्हानंद के भजनों से होती थी। मंडई मेलों में, पर्वो, त्यौहारों में इस खड़े साज की अपनी लोकप्रियता थी।
फिर धीरे-धीरे मशाल की जगह गैस बत्ती ने ले ली। कुछ अतिरिक्त वाद्यों को शामिल किया गया। ढोलक और हारमोनियम के शामिल हो जाने से नाचा के आकर्षण में वृद्धि हुई। हारमोनियम मास्टर नाचा पार्टी के मनीजर कहलाने लगे। कई प्रसिद्ध नाचा पार्टियां इसी दौर में सामने आई। गुरुदत्त की नाचा पार्टी, मदराजी दाऊ की रिंगनी रवेली साज जिसमें ठाकुर राम, भुलवा, लालू, मदन जैसे अनमोल रत्न शामिल थे। इसी तरह धरम लाल कश्यप की नाचा पार्टी थी। उन दिनों इन नाचा पार्टियों की खूब धूम थी। इसी दौर में फिल्मी चाल चलन, ढंग, अदाएं और द्विअर्थी  संवादों का चलन भी खूब बढ़ा। यह नाचा में परस्पर प्रतिस्पर्धा, उत्तेजना और सनसनी पैदा करने का दौर था।
इसी बीच लगभग 70 के दशक में छत्तीसगढ़ी की सांस्कृतिक धरती पर नाचा के समान्तर कुछ अनूठे लोक मंचीय प्रयोग हुए। दाऊ रामचंद्र देशमुख जी एवं दाऊ महासिंह चंद्राकर जी जैसे समर्पित, संपन्न और जुनूनी कला साधकों ने क्रमश: चंदैनी गोंदा और सोनहा बिहान जैसी युगांतरकारी छत्तीसगढ़ी -मंचीय प्रस्तुतियां दीं, जिनकी उपलब्धियां अब अंचल के सांस्कृतिक इतिहास की धरोहर बन चुकी हैं। इन प्रस्तुतियों की भव्यता और चकाचौंध के समान्तर श्री हबीब तनवीर द्वारा एक अलग ही किस्म का लोक मंचीय प्रयोग चलता रहा।
हिन्दुस्तानी थियेटर फिर नया थियेटर के बैनर पर छत्तीसगढ़ी नाचा के कलाकारों, वाद्यों, गीतों एवं बोली को कच्चे माल की तरह अपने ढंग से अपनी प्रस्तुतियों में उन्होंने इस्तेमाल किया और अपनी विलक्षण प्रतिभा तथा सुनियोजित व्यूहरचना के तहत राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय ख्याति पायी। कुल मिलाकर आशय यही है कि आज नाचा लोक नाट्य अपने विविध रुपों में पूरी ऊर्जा शक्ति और प्रभाव को लिए युग के साथ कदम मिलाता प्रवहमान है। छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति की यह सरिता किस सागर में समायेगी- कौन कह सकता है। हम केवल कामना कर सकते हैं कि नाचा की यह आत्मीय तरंगिनी तब तक प्रवाहित रहे, जब तक इस अंचल के लोक जीवन में स्पन्दन है।