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Feb 1, 2026

दोहेः ऋतु वासंती

  - कमल कपूर

पीत पाग जब पहनके, आए संत बसंत ।

धरा कहे कर जोड़के, आओ रति के कंत ।।

 

सौरभ की गगरी उठा, भर आँचल में फूल।

मधु-ऋतु जब पैदल चली, उड़ी बसंती धूल।।

 

मधुबन में है आ खड़ी, मधुर बसंत-बहार।

घूँघट के पट खोलके, कलियाँ रहीं निहार।।

 

बारिश और बसंत का, बड़ा अनोखा मेल।

बगिया के हर फूल से, खेले बरखा खेल।।

 

वासंती ऋतु ने किया, आज अनोखा काम।

सारा गुलशन लिख दिया, अलि तितली के नाम।।

 

आते ही ऋतुराज के, धरा बदलती रूप।

बरसाते रविराज भी, चटक बसंती धूप।।

 

पर्णहीन हर पेड़ पे, उगती मीठी आस।

हरित पात लाकर खड़ा, फिर से यह मधुमास ।। 

 

आते ही ऋतुराज के, हुलस उठे सब बाग।

कोयल बुलबुल गा रहीं, मधुर मिलन के राग।।

 

वसन वसंती धारके, आए जब ऋतु-भूप।

धरती ने धारण किया, नूतन एक स्वरूप।।

 

आते ही मधुमास के, खुले भाव के बंध।

कलमकार लिखने लगे, कविता और निबंध।।

मधुरिम तिथि थी पंचमी, ऋतु बसंत अभिराम।

जब भारत के पटल ने, लिखा 'निराला' नाम।।

 

पाँचवीं तिथि बसंत की, मौसम था खुशहाल ।

'महा निराला' रूप में, मिला धरा को लाल ।।

 

थाती मधुर बसंत की, बचपन वाला गाँव।

हरे चने के खेत सब, अमलतास की छाँव।।

 

माँ रंगती थी चुन्नियाँ, घोल बसंती रंग।

बढ़ जाती थी चौगुनी, जी की मदिर उमंग।

 

माँ के चौके में पका, सर्वोत्तम पकवान।

पीले चावल गुड़- पगे, ऋतु बसंत की शान।

 

कली-कली इतरा रही, छूकर मुखर बयार।

ओढ़ बसंती ओढ़नी, इठलाए ज्यों नार।।

 

धरती-अंबर में घुला, शोख बसंती रंग।

मधुराज यहाँ रँग रहे, खुद को इनके संग।।

 

सरसों के खलिहान में, आया धीर बसंत ।

पीले चोले पहनके, घूम रहे ज्यों संत ।।

 

अभिनंदन मधुमास का, करें रेशमी पेड़।

छू फूलों की डालियाँ, हवा रही है छेड़।।

 

रंग-गगरिया थामके, आ पहुँचे ऋतुराज ।

कलियाँ सज़दे कर रहीं, हवा छेड़ती साज।।


Jan 1, 2026

दोहेः सूरज आने को हुआ

 
- हरेराम समीप

1

आग लगी साहित्य में, बढ़ती जाए आँच 

जलते शब्दों को अगर, बाँच सके तो बाँच

2

शब्द खो रहे मायने, दिल खो रहे उसूल 

नई सोच की आँख में, भरी जा रही धूल

3

किया हुआ है आजकल, शब्दों ने विद्रोह

 लिखता हूँ कविता मगर, लिख जाए व्यामोह

4

जहाँ मिले घर में जगह, रह लेतीं चुपचाप 

ये साहित्यिक पुस्तकें, ज्यों बूढ़े माँ-बाप

5

जिस दिन दृढ़ विश्वास से, खड़े हो गए आप

तभी ख़त्म हो जाएगा, सदियों का संताप

6

अभी सफ़र लम्बा बहुत, तू मत खोज पड़ाव

पौधा बढ़कर पेड़ हो, तब तो देगा छाँव

7

जीवन जीने के लिए, लड़ना है हर हाल

पर्वत से आती नदी, बनकर वाटरफाल

8

जिसको अपने आप पर, है पूरा विश्वास

रहती है हर युद्ध में, जीत उसी के पास

9

अँधियारे की जंग से, पीठ दिखा मत भाग

पत्थर से पत्थर रगड़, पैदा होगी आग

10

चला गया जाने कहाँ, वही युवा आवेश

कब से उसकी खोज में, घूम रहा है देश

11

एक छोर पर जिंदगी, मौत दूसरे छोर

इन दोनों के बीच में, तनी साँस की डोर

12

सब अगवानी कर रहे, पंछी, नदी, पहाड़

सूरज आने को हुआ, तम के खोल किवाड़

13

करे धूप से सामना, आँधी से मुठभेड़

बेलिबास होता नहीं, कभी आस का पेड़

14

उसने रखी सहेजकर, बची-खुची उम्मीद

रोते-रोते सो गई, फिर आँखों में नींद

15

तुझे मिलेगी वह खुशी, पूरी होगी खोज

आशा की उँगली पकड़, चलता चल हर रोज़

16

मन की कंदीलें जलीं, भरने लगा उजास

अवसादी परिवेश में, लौट रही फिर आस

17

दुनिया भर से आपको, अगर चाहिए प्यार

भीतर-बाहर माँज लो, अपना यह किरदार

18

यूँ तो था वह उम्र भर, मामूली मज़दूर

लेकिन वो हर पल रहा, ओछेपन से दूर

19

घर की खिड़की बंद रख, कभी न जाना भूल

यह अंधड़ का दौर है, भर जाएगी धूल

20

केवल सुखदायी नहीं, होते सारे ख़्वाब

संग रहें उद्यान में, काँटे और गुलाब


Feb 1, 2025

दोहेः नेकी कर...


  -  डॉ. उपमा शर्मा

1.

शब्दों के भी हैं यहाँ, तीखे-मीठे स्वाद।

कभी दिलाते मान ये, जन्मे कभी विवाद।

2.

जल लेता वो सिंधु से, करता धरा निहाल।

मेघों से धरती हरी, हारा तभी अकाल।

3.

पीने को पानी नहीं, रख मानव यह ध्यान।

दूषित कीं नदियाँ अगर, खतरे में फिर जान।

4.

नहर, नदी, पोखर सभी, सूख रहे हैं ताल।

पानी बिन जीवन नहीं, रखिए इसे सँभाल।

5.

बूँद- बूँद है कीमती, मत करना बरबाद।

 दूषित पानी देखकर, नदी करे फरियाद।

6.

हुआ स्वयंवर फूल का, तकता अलि की राह। 

वो बगिया मँडरा रहा, उसको मधु की चाह। 

7.

तुम जो मेरे साथ हो, आ जाए ठहराव।

 हिचकोले खाए नहीं, जीवन की यह नाव।

8.

जीते नित ही झूठ अब, सच पर उठे सवाल। 

नेकी कर बस इसलिए, दे दरिया में डाल।

सम्पर्कः बी-1/248,यमुना विहार, दिल्ली-110053


Jan 1, 2025

दोहेः मन में रहे उजास...

  -  सुशीला शील स्वयंसिद्धा 

1. 

हमने तेरा ज़िंदगी, खूब किया शृंगार।

तेरा भी तो फ़र्ज है, तू भी मुझे सँवार।।

2. 

आते-जाते साल से, पूछूँ यही सवाल।

सीधी क्यों होती नहीं, टेढ़ी जग की चाल।।

3. 

बदल गया है साल जी, बदल गई तारीख।

पाठ पढ़ाए खूब ही, खूब सिखाई सीख।।

4.

छोड़ गया यह वर्ष कुछ, खट्टी-मीठी याद।

कुछ छीनीं कुछ दे गया, रिश्तों की बुनियाद।।

5.

 लाना नूतन वर्ष तुम, हर्ष और उल्लास।

 जीवन में शुचिता रहे, मन में रहे उजास।।

6.

पलक सजे सपने नए, बाँध नई उम्मीद।

नए साल तू सुन ज़रा, खुशियों की हो दीद।।

7.

नए साल से कर रहा, दिल इतना इसरार।

ग़ुल हों ग़ुल- सा साथ हो, चुभे न कोई खार।।

8.

जीवन हमने यूँ जिया, ज्यों नदिया के पाट।

कुछ कदमों की दूरियाँ, जीवन भर की बाट।।


Jun 1, 2024

दोहेः नभ बिखराते रंग

  - डॉ. उपमा शर्मा

1.

मत कितने ही भिन्न हों, रहे नहीं मनभेद। 

बन जाएँ संबंध जो, करो नहीं विच्छेद।

2.

'उपमा' ऐसों से बचो, पचा न पाते जीत। 

सुख-दुख देते साथ जो, वही आपके मीत।

3.

मान सभी का तुम रखो, मिले प्यार को प्यार।

जैसा सबसे चाहते, करो वही व्यवहार।

4.

चतुराई उसमें भरी, कहे न छोड़ो आस। 

कंकड़ गागर डालकर, काग मिटाए प्यास। 

5.

कल बदलेगी जीत में, आज लगे जो हार।

थोथा-थोथा सब उड़े, रह जाना है सार।

6.

जीवन दुर्गम पथ रहा, आने अनगिन मोड़।

कर्म किए जा बस मनुज, फल की इच्छा छोड़।

7.

देखो हठी पतंग को, कितनी है मुँहजोर। 

ऊँची भरे उड़ान ये, जब-जब खींची  डोर।

8.

सोच समझकर बोलिए, शब्दों से भी घाव।

मन को मोहे है सदा, जग में मधुर स्वभाव।

9.

जीवन में हर पल नया, 'उपमा' कुछ ले जोड़।

उड़ जाए यह हंस कब, सब कुछ जग में छोड़।

10.

अलक बाँधती यामिनी,थमी चंद्र की चाल।

भोर जागकर आ गई, रवि आया नभ भाल।

11.

हरी मखमली दूब पर, पड़ती तुहिन फुहार।

 भीगे- भीगे पात हैं, पहने मुक्ताहार।

12.

कैनवास पर भोर के, नभ बिखराता रंग।

आई स्वर्णिम रश्मियाँ, जब दिनकर के संग।

13.

मिश्री हो या फिटकरी, लगते एक समान।

परखो तो व्यवहार से, होती है पहचान।

14.

अनुबंधों से मुक्त जो, मुझको करदो आज। 

सच कहती हूँ बोल दूँ, दिल के सारे राज। 


Mar 7, 2024

दोहेः उड़त अबीर गुलाल

 


-  ज्योतिर्मयी पंत

 1

जली होलिका अग्नि में, बचे भक्त प्रह्लाद।

रंगोत्सव के पर्व में, मस्ती संग आह्लाद।।

2

यमुना तट पर गोपियाँ, खेलन आई रास।

कृष्ण प्रेम में रंग गईं, नाचें भर उल्लास।।

3

भर पिचकारी रंग से, भीग रहे सब संग।

ग्वाल बाल की टोलियाँ, मस्ती भरे उमंग।।

4

नभ में रंगी मेघ हैं, उड़त अबीर गुलाल।

सत रंगी धरती हुई, जन जन रंगे भाल।।

5

टेसू सरसों दे रहे , रंगों की सौगात।

बगिया फूलों से सजी, होली की शुरुआत।।

6

ढोल मंजीरे बज रहे, गाएँ फगुआ राग।

घर आँगन रौनक बढ़े, पर्व मिलन अनुराग।।

7

 रंग भरे सब चेहरे, मुश्किल है पहचान।

भेद भाव सब मिट रहे, सब हैं एक समान।।

8

शर्बत ठंडाई मिले, गुजिया संग पकवान।

रंग अबीर गुलाल से, सबका हो सम्मान।।


Feb 3, 2024

दोहेः लौट आये श्री राम

  - शशि पाधा

जन्म स्थली निज भवन में, आए हैं श्री  राम।

मुदित मन जग देखता, मूरत शुभ अभिराम।।


दिव्य ज्योत झिलमिल जली, राम लला के धाम। 

निशितारों ने लिख दिया, कण कण पर श्री राम।।


स्वागत में मुखरित हुई, सरयू की जलधार। 

पावन नगरी राम की , सतरंगी शृंगार।।


शंखनाद की गूँज में, गूंजित है इक नाम।

पहने अब हर भक्त ने, राम नाम परिधान।।


उत्सव मिथिला नगर में, सीता का घर द्वार।

रीझ-रीझ भिजवा दिया, मिष्टान्नों का भार।।।


प्रभु मूरत है आँख में, अधरों पे है नाम।

अक्षर अक्षर लिख दिया, मन पृष्ठों पे राम।।


आँखों में करुणा भरी, धनुष धरा है हाथ।

शौर्य औ संकल्प का, देखा अद्भुत साथ।।


वचनबद्ध दशरथ हुए, राम गए  वनवास।

धरती काँपी रुदन से, बरस गया आकाश।।


राम लखन सीता धरा, वनवासी का वेश।

प्राणशून्य दशरथ हुए, अँखियाँ थिर अनिमेष।।


माताओं  की आँख से अविरल झरता नीर।

 कैसी थी दारुण  घड़ी, कौन बँधाए धीर


पवन पुत्र के हिय बसे, विष्णु के अवतार।

पापी रावण का किया, लंका में संहार।।


जन- रक्षा ही धर्म है, दयावान श्री राम।

 हितकारी हर कर्म है,जन सेवा निष्काम।।


 अभिनन्दन की शुभ घड़ी, जन जन गाए गीत।

  दिशा दिशा में गूँजता,  मंगलमय संगीत।।


घर-घर मंदिर सा सजा, द्वारे  वन्दनवार।

 धरती से आकाश तक,लड़ियाँ, पुष्पित हार।।


वर्जिनिया, यूएसए


Sep 1, 2023

दोहाः निज भाषा उन्नति अहै...

 -भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,

बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।


अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन,

पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ।


उन्नति पूरी है तबहिं, जब घर उन्नति होय,

निज शरीर उन्नति किए, रहत मूढ़ सब कोय ।


निज भाषा उन्नति बिना, कबहुँ न ह्यैहैं सोय,

लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय ।


इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग,

तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग ।


और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात,

निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात ।


तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय,

यह गुन भाषा और मह कबहूं नाहीं होय । 


विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार,

सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।


भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात,

विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात ।


सब मिल तासों छाँड़ि कै, दूजे और उपाय,

उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय ।


Aug 1, 2023

दोहे: 1. आजादी



  




 - रमेश गौतम 

आजादी का आज तक, कब समझे मन्तव्य। 

याद रहे अधिकार बस, भूल गए कर्तव्य।।


चक्रव्यूह कितने रची, छोड़ो कितने तीर। 

महानाट्य रचते रहे, अभिमन्यू -से वीर।।


हम हो जाएँ विहग से, आजादी आकाश। 

मिलकर भरें उड़ान फिर, तोड़े माया-पाश।।


नगर ढिंढोरा पीटते, करते जिन्दाबाद।

समझें ना जनतंत्र का, अब तक अनहद नाद।।


सुख-दुख बाँटो परस्पर, छोड़ो वाद-विवाद। 

आजादी के मूल में, है मानवतावाद।।


मिले पसीने को यहाँ, पूरा उसका दाम। 

आजादी के शेष हैं, ऐसे अभी मुकाम।।


अधिकारों को जब मिले, कर्तव्यों का चूर्ण। 

तब होगी जाकर कहीं, आजादी सम्पूर्ण।।


रखनी थी जनतंत्र की, हमें ठोस बुनियाद। 

तानाशाही के लिए, नहीं हुए आजाद।।





2. सत्ता

रहे राजसी ही सदा, सत्ता के सोपान। 

अधर बीच लटके हुए, लोकतंत्र के प्रान।।


रण-कौशल में निपुण हैं, सारे सत्ताधीश।

गठबंधन बेमेल कर, काटें जनमत-शीश।।


सब कुछ इसके हाथ में, धन वैभव अधिकार। 

बस सत्ता के पास में, होता नहीं विचार।।


जो भी आता टाँगता, बदलावों के चित्र। 

किन्तु व्यवस्था का कभी, बदला नहीं चरित्र।।


चुप्पी पर सौगात है, सच बोले तो जेल। 

सत्ता खिड़की खोलकर, देखे अपना खेल।।


दुष्कर्मों पर डालता, पर्दा विधि-विधान। 

सत्ताधारी की हनक, करती है हैरान।।


बिना भेद सबको सदा, देती रोटी दाल। 

सत्ता के जन से तभी, मिलते हैं सुरताल।।


आते हैं जो द्वार पर, लिए वोट की चाह। 

बन जाते जनतंत्र में, वे ही तानाशाह।।


सम्पर्कः रंगभूमि, 78 बी संजय नगर बरेली- 243005 (उ. प्र.)


May 1, 2023

दोहेः साँसों का यह साज


 - रश्मि विभा त्रिपाठी

तुम बोलो सुनती रहूँ, मधुरिम ये आवाज।

तुमसे ही तो है सधा, साँसों का यह साज।।

2

तकिया तेरी बाँह का, थपकी देते हाथ।

मेरे सुख की नींद का, कारण तेरा साथ।।

3

मेरे दुख से हो दुखी, ढूँढा तुरत निदान।

पाया तेरे रूप में, ज्यों मैंने भगवान।।

4

उल्टा पड़ता आज तो,  लू का हर इक दाँव।

तेरा प्यार मुझे हुआ, वट की प्यारी छाँव।।

5

धन- दौलत, पद, नाम की, कैसी है दरकार।

मुझको बरकत दे रहा, तेरा पावन प्यार।।

6

घोर अँधेरे में धरे, रोज दुआ के दीप।

प्रेम तुम्हारा चाँद- सा, चमका सदा समीप।।

7

इसीलिए तो कट गए,  बाधाओं के जाल।

तुमने छोड़ा ही नहीं, मेरा कभी खयाल।।

8

कैसे मिलता है तुम्हें, मेरे मन का हाल।

दूरी अपने बीच की, धरती से पाताल।।

9

सरगम मेरी साँस की, छेड़ सुनाते राग।

तुमने मन का कर दिया, हरा- भरा यह बाग।।

10

करते हो नित नेम से,  मेरी खातिर जाप।

मीत मुझे लगता नहीं, तभी समय का शाप।।

11

चुभ सकता है क्या भला, मुझको कोई शूल।

मीत तुम्हारा प्यार ये, है पूजा का फूल।।


Jan 1, 2023

दोहेः सुबह सुहानी धूप

 - शील कौशिक

चकाचौंध है शहर में, पर चुप हैं मनमीत।

हवा शहर की ले गई, गौरैया के गीत।।

 

सोई है संवेदना, सोए हैं सम्बन्ध।

वासंती अहसास का, कैसे हो अनुबन्ध।।

 

चिड़िया बैठी डाल पर, रस्ता रही निहार।

बिछुड़े साथी जब मिलें, आए तभी बहार।।

 

हवा निगोड़ी गुम हुई, कहाँ गयी बदजात।

बढ़ी निराशा वृक्ष की, चुप बैठे हैं पात।।

 

ऋतुपति की पदचाप सुन, उपवन करे पुकार।

कोयल-भँवरे, गुल-कली, दौड़े बाँह पसार।।

 

हुलस-हुलसकर कह रही, गेहूँ की हर बाल।

सखी! सयानी हम हुईं, कब पहुँचें ससुराल।।

 

पवन बसंती छू गई, जब से मेरा गात।

चंचल मन उड़ता फिरे, कहने को निज बात।।

 

रंग और मकरंद की, हुई खूब बरसात।

मद में डूबे सब करें, ऋतु बसंत की बात।।

 

पीत चुनरिया ओढ़कर, निखरा सरसों वेश।

हरियाला परिधान है,  दुल्हन- सा परिवेश।।

 

त्याग-भावना फूल की, देती है संदेश।

कुछ दिन का जीवन मिला, महकाओ परिवेश

 

ठिर-ठिर सर्दी आ गई, जमी धूप में खाट।

तेज हवा ज्यों ही चली, लगी धुंध की बाट।।

 

था-थैया कत्थक करे, सुबह सुहानी धूप।

कौतुक यह सब देखते, कैसा रूप अनूप।।

 

करके माथे पर तिलक, सकुचाती है धूप।

मैं भी भैया क्या करूँ, मैका लगे अनूप।।

 

कुहरे का पहरा लगा, प्रकृति हो गई मौन।

सूरज दादा हैं छुपे, टक्कर ले अब कौन।।

Mar 1, 2022

दोहे- फिर खिल उठा पलाश

 - डॉ. सुरंगमा यादव

1.  अमराई यौवन भरी, कोयल भरे मिठास।

हवा वसंती कह रही, आजा छोड़ प्रवास।।

2.  फागुन आया मद भरा, मौसम हुआ हसीन।

इठलाता यौवन हुआ, रंग बिना रंगीन। ।

3.  नेह रंग बरसा सखी, कोरे मन पर आज।

सारे रंग फीके लगें, क्या है इसका राज।।

4. रंगों की वर्षा करे, होली बारह मास।

गले सभी मिलते रहें, मन की मिटे खटास।।

5. चटक प्रीत के रंग-सा, फिर खिल उठा पलाश।

मादक महुआ कह रहा, पिया मिलन की आस।।

6. होरी और कबीर की, मौन हुई आवाज।

डीजे की धुन पर सभी, थिरकें झूमें आज।।

सम्पर्कः 4/27, जानकीपुरम विस्तार, लखनऊ-226031


Jan 1, 2022

दोहे: साल नया गुलजार हो

- डॉ. उपमा शर्मा

1.

नए वर्ष में लें सभी, मिलकर यह संकल्प।

लगन और परिश्रम का, दूजा नहीं विकल्प।

2.

मिटे कष्ट का कोहरा, खुशियाँ मिले सहर्ष

सौगातों की धूप से , भाये फिर नववर्ष।

3.

साल नया गुलजार हो, मिले सभी को प्यार।

मुख पर हो मुस्कान ही, कभी न मानो हार।

4.

आते- जाते हैं बरस, भूलो बीती बात।

नए वर्ष का आगमन, मिलें नई सौगात।

5.

जाने वाला साल भी, बाँट गया है प्यार।

आने वाले साल में, खुशियाँ मिलें अपार।

6.

नया वर्ष भाये तभी, कृपा करें करतार।

कोरोना की अब प्रभु , पड़े नहीं फिर मार।

7.

खट्टी- मीठी याद का, वर्ष गया यह बीत।

नए साल में बस बने, जीवन सुंदर गीत।

8.

अभिनन्दन नव वर्ष का, नया करो आगाज।

छूटे कोई भी नहीं, पूरे हों सब काज।

9.

नए वर्ष का आगमन, मिले खुशी भर थाल।

ऋद्धि-सिद्धि सुख संपदा, मंगलमय हो साल।

10.

नए साल में हर दिशा, छाया है उल्लास।

दुख की कभी न धूप हो, हर पल मिले उजास।

Jan 15, 2020

रसखान के दोहे

रसखान के दोहे
प्रेम प्रेम सब कोउ कहत, प्रेम न जानत कोइ।
जो जन जानै प्रेम तो, मरै जगत क्यों रोइ॥
कमल तंतु सो छीन अरु, कठिन खड़ग की धार।
अति सूधो टढ़ौ बहुरि, प्रेमपंथ अनिवार॥
बिन गुन जोबन रूप धन, बिन स्वारथ हित जानि।
सुद्ध कामना ते रहित, प्रेम सकल रसखानि॥
प्रेम अगम अनुपम अमित, सागर सरिस बखान।
जो आवत एहि ढिग बहुरि, जात नाहिं रसखान॥
अति सूक्ष्म कोमल अतिहि, अति पतरौ अति दूर।
प्रेम कठिन सब ते सदा, नित इकरस भरपूर॥
भले वृथा करि पचि मरौ, ज्ञान गरूर बढ़ाय।
बिना प्रेम फीको सबै, कोटिन कियो उपाय॥
दंपति सुख अरु विषय रस, पूजा निष्ठा ध्यान।
इन हे परे बखानिये, सुद्ध प्रेम रसखान॥
प्रेम रूप दर्पण अहे, रचै अजूबो खेल।
या में अपनो रूप कछु, लखि परिहै अनमेल॥
हरि के सब आधीन पै, हरी प्रेम आधीन।
याही ते हरि आपु ही, याहि बड़प्पन दीन॥

Dec 12, 2019

रहीम के दोहे

 रहीम के  दोहे

अनकीन्‍हीं बातैं करै, सोवत जागे जोय।
ताहि सिखाय जगायबो, रहिमन उचित न होय।।1

अमर बेलि बिनु मूल की, प्रतिपालत है ताहि।
रहिमन ऐसे प्रभु हिंतजि, खोजत फिरिए काहि।।2

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय।।3

कदली, सीप, भुजंग-मुख, स्‍वाति एक गुन तीन।
जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन।।4

कहि रहीम धन बढ़ि घटे, जात धनिन की बात।
घटैबढ़ै उनको कहा, घास बेंचि जे खात।।5

कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत।
बिपति कसौटी जे कसे, ते ही साँचे मीत।।6

खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान।
रहिमन दाबे ना दबैं, जानत सकल जहान।।7

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछू न चाहिए, वे साहन के साह।।8

जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो लगे, बढ़े अँधेरो होय।।9

टूटे सुजन मनाइए, जौ टूटे सौ बार।
रहिमन फिरि फिरि पोहिए, टूटे मुक्‍ताहार।।10

देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन रैन।
लोग भरम हम पै धरें, याते नीचे नैन।।11

नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत।
ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछु न देत।।12

Jul 12, 2018

बदरा जल ले आ रहे

बदरा जल ले रहे
 - डॉ. शील कौशिक
पूरब से आई हवा, करती ये ऐलान।
बदरा जल ले रहे, रखने उसका मान।।
नीर भरे बादल चले, जा बरसेंगे गाँव।
हवा निगोड़ी ले गई, टिकने दिए पाँव।।
चुपके-चुपके कह गई, पवन प्रेम की बात।
बादल संग कल रही, बूँदों की बारात।।
बूँद चल पड़ी वेग से, ज्यों ही सुनी पुकार।
माँ धरती की गोद में, मिलता ज्यादा प्यार।।
तपती धरती ने सुना, ज्यों बादल-संदेश। 
ली करवट खिल गई अब बदले परिवेश।।
आसमान आँगन बना, बादल खेलें खेल।  
काले, भूरे सफेद, रखते अद्भुत मेल।।
सावन सूखा क्यों गया, कुदरत खोले राज।
व्यथा बाँचने के लिए, यह उसका अंदाज।।   
तन से ज्यादा भीगते, अबकी उसके नैन।
सरहद से लौटा नहीं, मन उसका बेचैन।।
झूले कंगन चूडिय़ाँ, मेंहँदी के हाथ।
वो उमंग खुशियाँ नहीं, गर ना सावन साथ।।
रिमझिम बूँदें मेह की, जैसे माँ का प्यार।
बारिश मूसलधार तो, लगे पिता की मार।।
कैसा तिलिस्म रच रही, टँगी तार पर बूँद।
आह्लादित हो देखती, चिडिय़ा आँखें मूँद।।
बरसों बिछुड़े प्रेम की, बारिश लाई आस।
उमड़-घुमड़ यादें सभी, चलकर आईं पास।।
पूरब से आई हवा, करती ये ऐलान।
बदरा जल ले रहे, रखने उसका मान।।
नीर- भरे बादल चले, जा बरसेंगे गाँव।
हवा निगोड़ी ले गई, टिकने दिए पाँव।।
चुपके-चुपके कह गई, पवन प्रेम की बात।
बादल सँग कल रही, बूँदों की बारात।।
बड़े वेग से चल पड़ी, जैसे सुनी पुकार।
माँ धरती की गोद में, मिलता ज्यादा प्यार।।
जल गगरी बादल लिये, जाएँ अब किस ठाँव।
ना पंछी के गीत हैं, ना पेड़ों की छाँव।।
झूला बेटी झूलती, करती यही पुकार।
बरसो बादल झूमकर, हों सपने साकार।।
आसमान के घाट पर, लगता मेला आज।
पुलकित बादल कर रहे, वर्षा का आगाज़।।
मोर-पपीहे ने किया, नृत्य-गान आगाज़।
इन्द्र देवता भेजते, बादल ,बिजली साज।।
बारिश ने आकर लिखे, प्रेम-प्रीत संदेश।
मन की खिड़की भीजती, टप-टप टपकें केश।।
पपीहरा जब बाग में, देता मीठी टेर।
उमड़-घुमड़कर मेघ भी, नहीं लगाते देर।।
सिंधारा कौथली, लेकर आती तीज।
बहू-बेटियाँ खुश हुईं, आँखें जाती भीज।।  
सूरज -चंदा सो रहे, बादल पहरेदार।
सावन रुत में है सजा, बूँदों का दरबार।।
मनमोहक हैं राखियाँ, सावन में चहुँओर।
भ्रात-बहन के भाव में, अद्भुत प्रेम हिलोर।।
रेशम -धागे में बुना, भ्रात-बहन का प्यार।
निश्छल, निर्मल प्यार का, राखी है त्योहार।।
राखी -बन्धन तो लगे, ऐसा निश्चल नेह।
इस दिन बरसे प्यार का, रिमझिम-रिमझिम मेह।।
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