- भावना सक्सैना
अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ़्रेंस का अंतिम दिन था। होटल की लाबी एक व्यस्त नदी की तरह बह रही थी, आवाज़ों का शोर, गले में लटके नाम पट्टों के साथ गुजरते प्रतिनिधि, कहीं हँसते हुए सेल्फ़ी लेते, कहीं औपचारिक मुस्कान के साथ तस्वीरें खिंचवाते लोग, और थकान से भरी शाम।
हर कोई यहाँ एक राही था, किसी अपने शहर से दूर, कुछ पाने या कहने की राह पर। इस बहाव के बीच वह, शांत चेहरे, सधी चाल और थोड़ी थकी आँखों वाली भारतीय प्रतिभागी, जैसे अपनी ही लय में चल रही थी। भीड़ में चलते हुए भी वह किसी से टकराती नहीं थी, जैसे उसकी अपनी एक अदृश्य परिधि हो, जिसमें कोई प्रवेश नहीं कर सकता। लोग पास से गुज़रते, कंधे लगभग छूते, पर वह हर बार एक हल्का- सा मोड़ लेकर खुद को बचा लेती, जैसे उसे अपने चारों ओर की इस नपी- तुली दूरी की आदत हो। उसकी चाल में हड़बड़ी नहीं थी, पर ठहराव भी नहीं, बस एक सधी हुई लय, जिसमें वह भीड़ का हिस्सा होते हुए भी उससे अलग बनी रहती थी।
कभी- कभी कोई हँसी उसके पास आकर ठिठकती, कोई बातचीत उसके कानों से छूकर निकल जाती, पर वह उनमें शामिल नहीं होती, सिर्फ एक शांत दर्शक की तरह उन्हें गुजरते देखती रहती। ऐसा लगता था, मानो उसने अपने भीतर एक छोटा- सा एकांत रच लिया हो, जिसे वह हर जगह अपने साथ लिये चलती है, भीड़ के बीच भी, बिल्कुल सुरक्षित, बिल्कुल अकेला।
उसने अपना हर कार्य मुस्तैदी से पूरा किया था। भाषण, नोट्स, चर्चाएँ, सब होते हुए भी उसे भीतर एक बारीक- सी खलिश खाए जाती थी - घर की। शब्द वह बोलती थी, सुनती थी, लिखती भी थी, पर हर वाक्य के बीच जैसे कोई अधूरा विराम आ जाता, जहाँ मन अनायास ही कहीं और भटक जाता। सामने स्क्रीन पर चल रही प्रस्तुति के ग्राफ़ और आँकड़े धुँधले पड़ जाते, और उनकी जगह घर के छोटे छोटे दृश्य उभर आते - रसोई में रखी आधी भरी चाय की केतली, बच्चों के बिखरे जूते, सुबह की वह जानी पहचानी आवाज़ें।
कभी वह नोट्स बनाते-बनाते रुक जाती, जैसे किसी शब्द के अर्थ नहीं, अपने ही भीतर की कमी को समझने की कोशिश कर रही हो। आसपास लोग उत्साह से बहस कर रहे होते, नए विचारों पर सिर हिला रहे होते, पर उसे लगता वह इस पूरे दृश्य में उपस्थित होकर भी पूरी तरह शामिल नहीं है।
वह एक सप्ताह से इस अनजान शहर में है। उसे याद आया, सुबह की वह जानी पहचानी हलचल, बच्चों का स्कूल के लिए धीरे-धीरे तैयार होना, किसी का जूता ढूँढना, किसी का आख़िरी समय पर कुछ पूछ लेना… और रसोई में चुपचाप उठती चाय की भाप, जो हर दिन की शुरुआत को एक सधे हुए क्रम में बाँध देती थी।
वहाँ कोई विशेष घटना नहीं होती थी, सब कुछ सामान्य, लगभग रोज़ जैसा ही पर शायद वही साधारण सी निरंतरता उसे भीतर से थामे रखती थी। यहाँ, इस सजे सँवरे, व्यवस्थित माहौल में भी, उसे उस अनगढ़- सी दिनचर्या की कमी हल्के से महसूस होती रही।
यहाँ सब कुछ था - सुविधा, साज सज्जा, व्यवस्थित समय, बस वही सहज- सा अपनापन नहीं, जो बिना कहे हर कोने में बसा रहता है।
यह कोई ऐसा दुख भी नहीं था, जिसे वह किसी से कह सके, बस एक महीन- सी कसक, जो हर थोड़ी देर में भीतर कहीं हल्के से चुभ जाती। जैसे कोई धागा हो, जो उसे लगातार खींचकर उस जगह ले जाना चाहता हो, जहाँ उसका असली केंद्र है - उसका घर।
सम्मेलन समाप्त होने के बाद का आख़िरी दिन ख़ाली रखा गया था; ताकि सभी प्रतिनिधि शहर का भ्रमण कर सकें। सभी प्रतिनिधियों ने समूह बनाकर शहर घूमने की योजना बनाई, उसने बस एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “आप लोग जाइए… मैं आज थोड़ा आराम करूँगी।”
किसी ने ज़ोर नहीं दिया, सबको लगा, वह बस थकी है। पर थकान उसके तन की नहीं, मन की थी। वह अपने कमरे में लौटी, बैग एक ओर रखा और खिड़की के सामने जाकर बैठ गई। नीचे दूर- दूर तक उजली सड़कों की हलचल थी और भीतर उसकी स्मृतियों के कोने में घर का शांत प्रकाश। मोबाइल उठाकर उसने बच्चों की तस्वीरें देखीं, बड़ा बेटा हँसता हुआ, छोटा किसी मस्ती में… उन दोनों के बीच उसकी अपनी दुनिया के केंद्र छिपे थे। तभी इंटरकॉम बजा - ट्रिंग… ट्रिंग…
उसने रिसीवर उठाया। एक शांत, परिचित सी आवाज़ थी। वही भारतीय प्रोफेसर, जो सम्मेलन में अक्सर उसके पास बैठता था। औपचारिक बातचीत ही होती थी, पर उसकी आँखों में एक धीमी थकान और गहराई वह कई बार नोट कर चुकी थी।
“आप नीचे नहीं आईं? सब लोग घूमने गए हैं,” उसने पूछा।
“मन नहीं था,” उसने सच में कहा।
“तो… कॉफ़ी?” उसके स्वर में एक सरल- सा आग्रह था।
“क्षमा चाहती हूँ, मुझे चाय पसंद है।”
“यहाँ चाय तो बस रंग मिली गर्म पानी जैसी है।”
वह हल्का- सा हँस पड़ी।
“आप सही कह रहे हैं; लेकिन मैं अपनी व्यवस्था से चलती हूँ।”
वह अचानक बोला, “अच्छा तो आप कोई स्पेशल चाय लेकर आई हैं… इंस्टेंट वाली, घर जैसी?”
“हाँ, है मेरे पास।”
वह थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला, “अजीब लगे तो माफ़ कीजिए… क्या एक पैकेट मिल सकता है?
तलब ऐसी हो रही है कि पूछे बिना रहा नहीं गया।”
वह खुलकर हँस दिया।
“चाय के लिए संकोच कैसा? आइए।”
कुछ ही मिनट में दरवाज़े पर दस्तक हुई।
वह अंदर आया, थका हुआ, पर सहज। कमरे का माहौल शांत और गर्म था, जैसे दो यात्राओं के बीच किसी स्टेशन पर थोड़ी देर का ठहराव।
वह बैठा, उसने केतली में पानी गरम किया और पहले दो कपों में सिर्फ़ गर्म पानी डालकर कपों को गर्म कर दिया। फिर दो चाय के कप बनाकर सामने रख दिए।
कप हाथ में लेते ही जैसे उँगलियों तक एक परिचित गर्मी उतर आई - धीरे धीरे हथेलियों से होती हुई भीतर कहीं ठहरने लगी। उसने कप को ज़रा कसकर थाम लिया, जैसे उस ताप में कुछ अपना- सा पा लिया हो।
दोनों कुछ पल चुप रहे। भाप हल्के हल्के ऊपर उठती रही, और उस छोटे से विराम में कमरे की निस्तब्धता और साफ़ सुनाई देने लगी, जैसे शब्दों की कोई जल्दी नहीं हो। उसने पूछा-“आपका इधर का अनुभव कैसा रहा?”
वह हल्का- सा मुस्कुराई, “अजीब है… हर सम्मेलन की ही तरह। इतने लोगों के बीच होते हैं, फिर भी असली बातें कहने का मौका कहीं नहीं मिलता।”
वह भी मुस्कुरा दिया, “शायद इसलिए… किसी बिल्कुल अनजान से कह देना आसान हो जाता है।”
दोनों हल्के से हँस पड़े, बिना किसी औपचारिकता के, बस उस सहज सहमति पर, जो कब बन गई, पता ही नहीं चला।
वह मेज़ पर रखे कप के किनारे को उँगली से हल्के से घुमाते हुए बोली - “दिन भर इतने लोगों से मिलते हैं… पर शाम होते होते लगता है, जैसे किसी से बात ही नहीं हुई।”
वह हौले से मुस्कुराकर बोला, “हाँ… बातें बहुत होती हैं, पर ज्यादातर बस काम की होती हैं। अपने बारे में कहने का मौका कम ही मिलता है।”
एक पल को दोनों फिर चुप हो गए, पर यह चुप्पी अब अलग थी, उसमें हल्की सी पहचान घुल आई थी।
वह बोला, “और काम का दबाव… वह तो हर जगह एक- सा है, है न?”
वह हल्का- सा हँसी, “हाँ, बस नाम और जगह बदल जाती है।”
फिर थोड़ी देर बाद, जैसे बात अपने आप गहरी हो गई , “आप घर को… बहुत मिस करती हैं?
उसने सिर झुका लिया, “बहुत। शायद जितना कह नहीं सकती। मेरे माता- पिता… जब मैं छोटी थी, तभी गुज़र गए। रिश्तेदारों ने पाला… अच्छा पाला, पर घर जैसा अपनापन? वह कभी नहीं मिला। इसलिए जब अपना घर बना… अपनी दुनिया… तो हर बार उससे दूर होना मुझे किसी खालीपन की याद दिलाता है।”
उसने अनजाने में उसके दर्द के नीचे छिपे साहस को महसूस किया। वह धीरे से बोला, “मैंने भी घर जल्दी छोड़ दिया था। पर परिस्थितियाँ अलग थीं… मेरे पिता बहुत कठोर थे। हर बात पर डाँट, हर सपने पर प्रश्नचिह्न,असंतोष और अविश्वास। मैंने एक दिन बस… भाग जाने जैसा निर्णय लिया।”
उसकी आँखें थोड़ा चौड़ी हुईं ।
“भाग गए थे?”
वह सिर हिलाकर बोला, “अठारह का था, ख़ुद को बड़ा समझने लगा था। जेब में बस तीन सौ रुपये; लेकिन मन में विश्वास बहुत था। जब पैसे ख़त्म हुए, तो पहले अख़बार बेचा, गलियों में घूम घूमकर। एक दिन बारिश में भीगते हुए भी बेचे थे, पन्ने नमी से भारी हो गए थे, किनारे मुड़ने लगे थे… पर लगा, अगर ये निकल जाएँ, तो रात की रोटी की चिंता नहीं रहेगी।”
वह हल्का- सा मुस्कुराया, जैसे कोई दूर की बात याद आ गई हो, “पहली बार जब कुछ पैसे हाथ में आए थे न… तो खर्च करने की जल्दी नहीं हुई। देर तक बस देखता रहा उन्हें। अजीब- सा लगता था कि ये सच में मेरे हैं।”
थोड़ा रुककर उसने आगे कहा, “फिर एक पंक्चर वाले की दुकान में काम मिला, हाथों में ग्रीस, कपड़े मिट्टी और कालिख से सने। कभी-कभी चाय की टपरियों पर भी… बस खाने भर को। कई रातें ऐसी भी रहीं जब ठीक से सोना नहीं हुआ, कहीं भी जगह मिल गई, तो वहीं लेट गया; पर नींद से ज़्यादा यह सुकून होता था कि दिन निकल गया।”
उसने एक हल्की साँस ली, “और हाँ… कभी-कभी काम माँगने जाता था, तो लोग देखे बिना ही मना कर देते।
बात छोटी थी, पर उस वक़्त… थोड़ा अजीब लगता था। जैसे आप सामने होकर भी कहीं दर्ज नहीं हो रहे।”
वह उसकी ओर देखती रही, घृणा या दया से नहीं, बल्कि उस शांत दृढ़ता के प्रति, जो इन साधारण- सी बातों में छिपी थी।
वह आगे बोला, “रात में ट्यूशन पढ़ाकर कुछ पैसे मिलते। किसी ने कहा- टाइपिंग सीख लो, काम आएगी। शुरू में उँगलियाँ बार बार अटकती थीं… बाकी लोग आगे निकल जाते थे। पर मैंने सोचा, रुकना तो वैसे भी नहीं है, तो वहीं बैठकर धीरे धीरे सीखता रहा।” वह हल्का- सा मुस्कुराया, “और पहली बार जब स्टेनो की परीक्षा पास की, तो लगा… जैसे अपनी ज़िंदगी में पहली ईंट खुद रखी है।”
“और अब?” उसने पूछा।
वह मुस्कुराया - ताज्जुब और विनम्र गर्व का मिला- जुला भाव था वह।
“अब… सरकारी कॉलेज में प्रोफेसर हूँ। पर बेरी के पेड़ के नीचे बैठकर फटी उँगलियों से टायर पीटने वाला लड़का अब भी मेरे भीतर ज़िंदा है। शायद अच्छा है… वही मुझे नम्र रखता है।”
कमरे में जैसे शाम और गहरी हो गई।
चाय की भाप ऊपर उठती रही और उसके साथ दोनों की ज़िंदगी की परतें खुलती चली गईं।
वह बोली, “मेरे जीवन में प्रेम, ज़िम्मेदारी, संघर्ष, सब रहा। पर मैंने सीखा कि सबसे ऊँची दीवारें हमारे भीतर ही बनती हैं… और उन्हें गिराने का साहस भी भीतर ही होता है।”
“सही कह रही हैं,” वह बोला, “और शायद यही बात… मुझे हमेशा मेहनतकश बनाए रखती है। जो खोया, वह मेरा भाग्य था। जो पाया, वह मेरा परिश्रम।”
धीरे धीरे दोनों खुलते गए। न कोई बनावट, न कोई दिखावा। अजनबी होते हुए भी वे दो घंटे के लिए एक दूसरे के दर्पण बन गए थे।
जब बातें थम गईं, तो दोनों कुर्सियों पर सीधा बैठ गए, जैसे याद आया हो कि यह ठिकाना नहीं, बस ठहराव है।
दोनों अलग-अलग रास्तों के राही थे, अपनी-अपनी दिशाओं, अपने-अपने अनुभवों और थकानों के साथ चलते हुए। फिर भी उस शाम, अनायास ही, उनकी मंज़िल कुछ देर के लिए एक हो गई थी, जैसे दो रास्ते कहीं आकर हल्के से छू लेते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं।
उस थोड़े से ठहराव में न कोई दावा था, न कोई अपेक्षा, बस साथ होने का एक शांत- सा बोध, जो बिना नाम के भी पूरा लगता था।
रात को टीम के साथ नीचे लॉबी में उतरे, तो दोनों ऐसे चले जैसे कभी मिले भी न हों। वही औपचारिक मुस्कान, वही दूरी। अगले दिन एयरपोर्ट पर चेक इन के दौरान वह उसके पास आया। “कल… आपसे बात करके अच्छा लगा। चाय और समय दोनों के लिए शुक्रिया। ऐसे कोई सुन ले… यह भी कम है जीवन में।”
वह बोली, “हाँ। कल का दिन थोड़ा आसान हो गया।”
फ्लाइट में दोनों दूर बैठे थे।
लैंड करने के बाद सामान बेल्ट के पास उन्होंने एक हल्की मुस्कान के साथ एक दूसरे की ओर सिर झुकाया, “अपना ख़याल रखिएगा।”
“आप भी।”
बस इतना। न कोई वादा था, न भविष्य की राह, न फ़ोन नंबरों का आदान-प्रदान। वे उतने ही अजनबी रहे जितने पहले थे: पर उन दो घंटों ने उनकी ज़िंदगी में एक शांत, अनाम सी जगह भर दी थी, जिसका कोई नाम नहीं था, पर जिसका असर धीमे- धीमे भीतर तक उतर गया। वे फिर अपने अपने रास्तों के राही बन गए।