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May 1, 2026

उदंती.com, मई - 2026

वर्ष- 18, अंक- 10

जंगल में घर बहुत ही कम हैं

बोले कैसे वास करेंगे?

घर में जंगल जब उग जाएँ 

जीने की क्या आस करेंगे।

              - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

इस अंक में

अनकहीः गर्मी से भागते हुए… क्या ‘सच’ से भी भाग रहे हैं? - डॉ. रत्ना वर्मा

आलेखः मनोरंजन के बहाने आतंक का पाठ पढ़ते बाल-गोपाल - प्रमोद भार्गव

मनोविज्ञानः बच्चों को सोशल मीडिया की ‘लत’ - स्रोत फीचर्स

कविताः वे दो प्रौढ़ स्त्रियाँ! - अंजू खरबंदा

भाषाः पाँच सौ प्रतियाँ और करोड़ों के प्रतिनिधि - जयप्रकाश मानस

चिंतनः टूटना, बिखरना, समेटना और सँवरना  - डॉ. महेश परिमल

यात्रा वृतांतः कारों धाम की यात्रा कथा - मांडवी सिंह

लघुकथाः साँझा दर्द - सुदर्शन रत्नाकर

लघुकथाः 1. कूप मण्ड़ूक,  2. बैल - सुकेश साहनी

कथाः अंतिम याचना - बसंत राघव

लघुकथाः अगोचर - भीकम सिंह

कविताः बचा रहे जो आवश्यक है - पूनम चौधरी

कहानीः राही  - भावना सक्सैना

व्यंग्यः प्लास्टर वाली टाँग  - डॉ. मुकेश 'असीमित'

कविताः खामोशी - अनिता मण्डा

किताबेंः युवा क्रांतिकारी के  बहुआयामी  व्यक्तित्व से परिचित कराती कृति - प्रो. सुरंगमा यादव

आलेखः प्रेम शब्द का घटता अर्थ और भाषा की जिम्मेदारी - हिना श्रीवास्तव

सॉनेटः इस समय - अनिमा दास

खानपानः कॉफी के स्वाद निराले - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

अनकहीः गर्मी से भागते हुए… क्या 'सच' से भी भाग रहे हैं?

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

इन दिनों मैं पहाड़ों की ओर रोड ट्रिप पर हूँ। जब भी घर या दोस्तों से बात होती है और वे जब उधर का हाल बताते हैं कि यहाँ तो पारा 45-46 डिग्री से भी ऊपर पहुँच गया है, तो एक अजीब-सी द्वंद्वात्मक स्थिति मन में जन्म लेती है। एक ओर मैं हूँ, जो इस भीषण गर्मी से राहत पाने, अपने घुमक्कड़ी शौक को पूरा करने, पहाड़ों की ठंडी हवा में सुकून ढूँढने निकल पड़ी हूँ; दूसरी ओर वे लोग हैं, जो उसी तपिश में झुलस रहे हैं।

सच तो यह है कि मुझे घूमने का शौक है। मौका मिले, साथ मिले, तो बस निकल पड़ती हूँ। इस बार की यात्रा भी कुछ ऐसी ही है- रायपुर से सिलीगुड़ी, फिर कालिम्पोंग, गंगटोक में चंगू लेक और नाथुला दर्रा होते हुए दार्जिलिंग की ओर बढ़ रही हूँ। यहाँ का मौसम मन को हर पल ठंडक देता है। बादलों की ओट में लिपटे पहाड़, हल्की बारिश की फुहारें और ठंडी हवा के झोंके- सब कुछ किसी स्वप्नलोक जैसा लगता है। यहाँ आकर मन प्रसन्न है, आत्मा जैसे तरोताज़ा हो गई हो।

लेकिन जैसे ही नीचे के इलाकों का हाल सुनती हूँ, मन ठहर जाता है। सोचने को विवश हो जाती हूँ- क्या हम सिर्फ़ इस ठंडक का आनन्द लेने के लिए यहाँ आए हैं, या उस तपिश से आँख चुराने के लिए भी, जो अब हर साल और भयावह होती जा रही है?

छह दशक का जीवन बीत चुका है। बचपन से लेकर अब तक हर साल गर्मियाँ देखी हैं। लू के थपेड़े भी नए नहीं हैं; लेकिन पिछले एक- दो दशकों में जो बदलाव आया है, वह सामान्य नहीं कहा जा सकता। अब गर्मी सिर्फ़ असहनीय नहीं रही, बल्कि खतरनाक होती जा रही है। हाल ही में देश के कई हिस्सों से खबरें आई हैं- राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली, छत्तीसगढ़- जहाँ तापमान 45-48 डिग्री तक पहुँच गया। कई शहरों में ‘हीट वेव’ को लेकर रेड अलर्ट जारी किया गया। अस्पतालों में हीट स्ट्रोक के मरीज बढ़ रहे हैं। कुछ जगहों पर तो मौत की खबरें भी सामने आई हैं।

वैज्ञानिक भी लगातार चेतावनी दे रहे हैं। बदलते मौसम और धरती के लगातार गर्म होने की समस्या अब कोई भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि आज की सच्चाई बन चुकी है। दुनिया भर में तापमान बढ़ रहा है, बर्फ के पहाड़ पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर ऊपर उठ रहा है- ये सब संकेत हैं कि प्रकृति का संतुलन बिगड़ चुका है।

पर सवाल यह है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? उत्तर बहुत जटिल नहीं है- हम स्वयं हैं।

विकास की दौड़ में हमने प्रकृति को पीछे छोड़ दिया है। सड़कों के लिए जंगल काटे जा रहे हैं, पहाड़ों को चीर दिया जा रहा है, रेल लाइन बिछाने के लिए पहाड़ों पर कंक्रीट के भारी भारी पिलर खड़े किए जा रहे हैं।  बिजली बनाने के लिए अब भी कोयले पर ज्यादा निर्भरता है। शहरों में ऊँची-ऊँची इमारतें खड़ी हो रही हैं; लेकिन उनके लिए पर्यावरण के कड़े नियमों का पालन अक्सर नहीं दिखता।

विडंबना यह है कि जिन पहाड़ों की ओर हम गर्मी से राहत पाने आते हैं, वहाँ भी वही कहानी दोहराई जा रही है। पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर पहाड़ों को कंक्रीट से ढका जा रहा है। होटल, रिसॉर्ट, सड़कें- सब कुछ इस तरह बढ़ रहे हैं कि पहाड़ों की असली बनावट ही खतरे में पड़ रही है। पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि पहाड़ी इलाकों में अंधाधुंध निर्माण से भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ रही हैं। जल- स्रोत सूख रहे हैं। जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों की विविधता भी खतरे में पड़ रही है।


मौसम विभाग और दुनिया की कई संस्थाएँ बार-बार कह रही हैं कि यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में लू और भी तेज़ और लंबे समय तक पड़ सकती है। सवाल यह भी उठता है कि क्या यह सब चिंता सिर्फ़ पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और सरकारों की जिम्मेदारी रह गई है, क्या हमारी अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। हम अक्सर कहते हैं- “सरकार कुछ नहीं कर रही।” लेकिन क्या हम स्वयं कुछ कर रहे हैं?

क्या हमने अपने स्तर पर पेड़ लगाने की कोशिश की? क्या हमने बिजली और पानी के इस्तेमाल में संयम बरता? क्या हमने प्लास्टिक का उपयोग कम किया? क्या हमने अपने शहरों में हरियाली बचाने की कोशिश की? सच यह है कि हम समस्या को समझते हैं, उस पर चर्चा भी करते हैं, लेकिन समाधान की दिशा में कदम उठाने से बचते हैं। आज आवश्यकता है कि हम अपनी सोच में बदलाव लाएँ।

विकास जरूरी है; लेकिन वह प्रकृति को नुकसान पहुँचाए बिना होना चाहिए। तरक्की तो हर किसी को चाहिए; पर हमें ऐसी तरक्की करनी होगी, जिसमें हम आगे भी बढ़ें और पर्यावरण भी सुरक्षित रहे। सरकारों को भी कड़े नियम बनाने होंगे- जंगलों की कटाई पर नियंत्रण, निर्माण कार्यों के लिए कठोर पर्यावरणीय स्वीकृति, सूरज, हवा और पानी से मिलने वाली ऊर्जा का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करना होगा;  लेकिन इसके साथ-साथ, आम नागरिक के रूप में हमें भी अपनी भूमिका निभानी होगी। जैसे- जब हम यात्रा पर निकलें, तो प्रकृति का सम्मान करें। कूड़ा न फैलाएँ, स्थानीय संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग न करें। ऐसे पर्यटन को अपनाएँ , जिससे घूमना भी हो और प्रकृति भी सुरक्षित रहे।

आज जब मैं इन पहाड़ों की ठंडी हवा में साँस ले रही हूँ, तो यह सोचकर संतोष होता है कि अभी भी प्रकृति ने हमें बहुत कुछ दिया है और देती ही जा रही है; लेकिन यह संतोष तभी तक है, जब तक हम इसे सहेज कर रख सकें। यदि हमने अभी भी चेतावनी को अनसुना किया, तो वह दिन दूर नहीं, जब ये पहाड़ भी तपने लगेंगे और हमें राहत पाने के लिए कोई ठिकाना नहीं मिलेगा।

इसलिए जरूरी है कि हम सिर्फ़ चिंतित न रहें, बल्कि सक्रिय भी हों; क्योंकि यह सिर्फ़ मौसम का बदलाव नहीं है, यह हमारे अस्तित्व का प्रश्न है।

आलेखः मनोरंजन के बहाने आतंक का पाठ पढ़ते बाल-गोपाल

 -  प्रमोद भार्गव

अमेरिकी दैनिक 'न्यूयॉर्क टाइम्स' में छपी खबर के अनुसार, माइनक्राफ्ट और रोब्लॉक्स जैसे लोकप्रिय वीडियो गेम किशोरों और बालकों को आतंकी बनाने का मानवता विरोधी काम कर रहे हैं। अतएव, आपके लाड़ले को यदि मोबाइल पर गेम खेलने की लत लग गई है, तो होशियार हो जाइए, क्योंकि अब बच्चों को इन खेलों के जरिए आतंकवाद का पाठ पढ़ाए जाने का खतरनाक सिलसिला शुरू हो गया है। इन प्रशिक्षित नाबालिगों को बाद में आतंकवादी संगठनों और नफरत फैलाने वाले समूहों में भर्ती करा दिया जाता है, जिससे ये आतंक और नफरत फैलाने के औजार बन जाएँ।

इस सच्चाई को उजागर करने का काम यूनाइटेड नेशंस की 'काउंटर-टेररिज्म कमेटी' ने किया है। इसके अनुसार, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में आतंकवाद से जुड़े मामलों में अब 42 प्रतिशत आरोपी नाबालिग हैं। 2021 की तुलना में यह आँकड़ा तीन गुना अधिक है। नीदरलैंड के हेग स्थित 'इन्टरनेशनल सेंटर फॉर काउंटर-टेररिज्म' के अनुसार, यूरोप में 20 से 30 प्रतिशत आतंकवाद विरोधी गतिविधियों की जांच में 12-13 साल के बच्चे शामिल पाए गए हैं। अनेक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिए कट्टरपंथी संगठन तेजी से किशोरों और बालकों को आतंकी बनाने का खेल खेल रहे हैं। ये प्रशिक्षित बच्चे कट्टरपंथ को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं।

हालाँकि, भारत में आतंक फैलाने की दृष्टि से बच्चों और किशोरों को आतंकी बनाने का काम पाकिस्तानी सेना अर्से से कर रही है। मुंबई के 26/11/2008 के आतंकी हमले में शामिल अजमल कसाब इसका जीता-जागता उदाहरण रहा है। इस सच्चाई का खुलासा संयुक्त राष्ट्र भी कर चुका है। पाकिस्तान के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एवं पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई के सेवानिवृत्त अधिकारी रहे शाहिद अजीज ने ‘द नेशनल डेली’ अखबार में पहले ही यह मुद्दा उठा दिया था— “कारगिल की तरह हमने कोई सबक नहीं लिया है। हकीकत यह है कि हमारे गलत और जिद्दी कामों की कीमत हमारे बच्चे अपने खून से चुका रहे हैं। हमने इस धंधे को व्यापार का जरिया बना लिया है, वह भी अपनी ही कौम के किशोर एवं युवाओं के जीवन को दाँव पर लगाने का खेल खेलते हुए!”

पूरी दुनिया में इस समय डिजिटल खेलों का कारोबार बढ़ रहा है। इस कारण दुनिया इनके निर्माण और निर्यात में दिलचस्पी ले रही है, नतीजतन इसका रूप दैत्याकार होता जा रहा है। फिलहाल विश्व में लोकप्रिय डिजिटल खेलों में मोबाइल प्रीमियर लीग (एमपीएल), फेंटेसी स्पोर्ट्स प्लेटफॉर्म, माइनक्राफ्ट, रोब्लॉक्स, ड्रीम-11, कोरियन लवर गेम और लूडो किंग हैं। ये सभी खेल भारत समेत लगभग सभी देशों में उपलब्ध हैं। भारत से संचालित होने वाली खेल कंपनियों में चीन सहित कई देशों की कंपनियों की पूँजी लगी हुई है। इन खेलों के अमेरिका, चीन, भारत, ब्राजील और स्पेन बड़े खिलाड़ी हैं।

हाल ही में गाजियाबाद में तीन सगी नाबालिग बहनों द्वारा नौवीं मंजिल से छलांग लगाकर आत्महत्या करने का मामला सामने आया है। इन बहनों को ऑनलाइन ‘टास्क बेस्ड कोरियन लवर गेम’ खेलने की लत लग गई थी। इसी आत्मघाती खेल को खेलते हुए इन बहनों ने सामूहिक आत्महत्या कर ली। इस घटना से साफ होता है कि ये खेल कितने खतरनाक हैं।

कोरोना काल में ऑनलाइन शिक्षा के बढ़ते चलन के चलते दुनिया के विद्यार्थियों की मुट्ठी में एंड्रॉयड मोबाइल जरूरी हो गया था। मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्री इसके बढ़ते चलन पर निरंतर चिंता प्रकट कर रहे हैं। अभिभावक बच्चों में गेम देखने की बढ़ती लत और उनके स्वभाव में आते परिवर्तन से चिंतित व परेशान हैं। वे बच्चों का मनोचिकित्सकों से उपचार कराने के बावजूद इस लत से मुक्ति दिलाने में कठिनाई का सामना कर रहे हैं। दरअसल, बच्चों का मोबाइल या टैबलेट की स्क्रीन पर बढ़ता समय आँखों की दृष्टि को खराब कर रहा है। साथ ही, बच्चे अनेक शारीरिक और मानसिक बीमारियों की गिरफ्त में भी आ रहे हैं। यहाँ तक कि बच्चे पोर्न फिल्में देखते भी पाए गए हैं।

अब ऐसे वीडियो खेल भी आभासी दुनिया (Virtual World) के लिए बनाए जाने लगे हैं, जहाँ खिलाड़ी आतंकी हमलों और गोलीबारी की घटनाओं को दोहरा सकते हैं। 2019 में न्यूजीलैंड के चर्च और मस्जिदों पर हुए हमलों को भी खेलों का हिस्सा बनाया जा रहा है। ये उपाय बच्चों को धार्मिक कट्टरपंथी बनाए जाने की दृष्टि से किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में किशोर और युवाओं को लुभाने के लिए ‘एक्टिव क्लब्स’ नाम के समूह बनाए जा रहे हैं। ये ऐसे समूह हैं जो खेलते हुए नस्लीय युद्ध की तैयारी में जुट जाते हैं और नस्लीय भावना से लड़ते दिखाई देते हैं। 27 देशों में फैले इन क्लबों द्वारा 15 से 17 साल के नादान किशोरों को लक्षित किया जा रहा है। इन्हें देखते हुए किशोर अपनी गोरी या काली पहचान से जुड़कर नस्लवादी मानसिकता की गिरफ्त में आकर आतंकी बनने की दिशा में अनायास मुड़ जाते हैं।

ऑनलाइन खेल आंतरिक श्रेणी में आते हैं, जो भौतिक रूप से मोबाइल पर एक ही किशोर खेलता है, लेकिन इनके समूह बनाकर इन्हें बहुगुणित कर लिया जाता है। वैसे तो ये खेल सकारात्मक हो सकते हैं, लेकिन ब्लू ह्वेल, पबजी, माइनक्राफ्ट और रोब्लॉक्स जैसे खेल उत्सुकता और जुनून का ऐसा मायाजाल रचते हैं कि मासूम बालक के दिमाग की परत पर नकारात्मकता की पृष्ठभूमि रच देते हैं।

मनोचिकित्सकों और स्नायु वैज्ञानिकों का कहना है कि ये खेल बच्चों के मस्तिष्क पर बहुआयामी प्रभाव डालते हैं। ये प्रभाव अत्यंत सूक्ष्म किंतु तीव्र व तीक्ष्ण होते हैं; इसलिए ज्यादातर मामलों में अस्पष्ट होते हैं। दरअसल, व्यक्ति की आंतरिक शक्ति से आत्मबल दृढ़ होता है और जीवन क्रियाशील रहता है; किंतु जब बच्चे निरंतर एक ही खेल खेलते हैं, तो दोहराव की इस प्रक्रिया से मस्तिष्क कोशिकाएँ परस्पर घर्षण के दौर से गुजरती हैं। नतीजतन दिमागी द्वंद्व बढ़ता है और बालक मनोरोगों से लेकर नस्लीय गिरफ्त में आता जाता है, जो उसे आतंक की राह में धकेलने का काम कर देते हैं।

ये खेल हिंसक और अश्लील होते हैं; इसलिए बच्चों के आचरण में आक्रामकता और गुस्सा देखने को मिलता है। दरअसल, इस तरह के खेल देखने से मस्तिष्क में तनाव उत्पन्न करने वाले डोपामाइन जैसे हार्मोनों का स्राव होने लगता है। इस द्वंद्व से भ्रम और संशय की मनःस्थिति निर्मित होने लगती है और बच्चों का आत्मविश्वास छीजने के साथ विवेक अस्थिर होने लगता है, जो उन्हें आत्मघाती कदम उठाने को विवश कर देता है। हालाँकि, डोपामाइन ऐसे हार्मोन भी सृजित करता है जो आनंद की अनुभूति के साथ सफलता की अभिप्रेरणा देते हैं; किंतु यह रचनात्मक साहित्य पढ़ने से संभव होता है, जो अब अधिकतर पत्र-पत्रिकाओं और घरों से बाहर होता जा रहा है। यह एक अत्यंत चिंतनीय पहलू है।

सम्पर्क: शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी (म.प्र.) 

मनोविज्ञानः बच्चों को सोशल मीडिया की ‘लत’


 इन
दिनों अमेरिका की अदालत में एक ऐसा वैज्ञानिक सवाल सामने आया है, जिसका जवाब अभी तक स्पष्ट नहीं
है। सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया बच्चों और किशोरों के लिए ‘लत’ बन सकता है, और अगर उससे उन्हें मानसिक नुकसान होता है तो उसकी ज़िम्मेदारी किसकी होगी। कैलिफोर्निया में शुरू हुए इस ऐतिहासिक मुकदमे में एक युवती का कहना है कि बचपन में सोशल मीडिया का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करने की वजह से उसे लंबे समय तक चिंता, अवसाद और अपने शरीर को लेकर हीन भावना जैसी समस्याएँ झेलनी पड़ रही हैं।

इंटरनेट कानून के विशेषज्ञ एरिक गोल्डमैन के अनुसार, जूरी को दो बेहद मुश्किल सवालों पर फैसला करना होगा। पहला, क्या सोशल मीडिया की ‘लत’ एक वास्तविकता है? और दूसरा, क्या टेक-कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म से होने वाले मानसिक नुकसान के लिए कानूनी रूप से ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है? उनके मुताबिक, इन सवालों के जवाब आसान नहीं होंगे, क्योंकि इन्हें लेकर वैज्ञानिकों के बीच ज़ोरदार बहस होने वाली है।

यह बात अभी वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। नशे या जुए की ‘लत’ की तरह सोशल मीडिया की ‘लत’ को मानसिक रोगों की मानक पुस्तकों में आधिकारिक रूप से बीमारी नहीं माना गया है। इसी वजह से शोधकर्ता इस विषय पर बहुत सावधानी से बात करते हैं। कुछ वैज्ञानिक सोशल मीडिया के लिए ‘लत’ शब्द इस्तेमाल करने में सहज हैं, लेकिन कई दूसरे वैज्ञानिक इससे असहमत हैं और कहते हैं कि इसके पक्ष में ठोस सबूत अभी पर्याप्त नहीं हैं।

आम तौर पर लत का मतलब होता है किसी चीज़ को निरंतर करते रहना, उसे छोड़ने पर बेचैनी महसूस होना और साफ नुकसान दिखने के बावजूद उसका इस्तेमाल जारी रखना। कई किशोरों में सोशल मीडिया का इस्तेमाल इसी तरह आदत बन चुका है; लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह तय करना अभी मुश्किल है कि इसे एक मानसिक रोग कहा जाए या सिर्फ एक संगीन खराब आदत। इसी कारण ज़्यादातर वैज्ञानिक इसे ‘समस्यामूलक सोशल मीडिया उपयोग’ कहना ज़्यादा उचित मानते हैं।

एक और बड़ी मुश्किल यह समझना है कि सोशल मीडिया और मानसिक समस्याओं के बीच सम्बंध कार्य-कारण का है या सिर्फ साथ-साथ होने वाली (correlation) बात का। जिस समय सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ा है, उसी दौरान युवाओं में चिंता और अवसाद के मामले भी बढ़े हैं। लेकिन ज़्यादातर शोध यह पक्के तौर पर साबित नहीं कर पाए हैं कि इन मानसिक समस्याओं की सीधी वजह सोशल मीडिया ही है। संभव है कि कुछ किशोर पहले से ही मानसिक रूप से संवेदनशील हों और इसी कारण वे सोशल मीडिया का ज़्यादा सहारा लेने लगते हों।

सोशल मीडिया के असर को मापने का तरीका भी बहुत अहम है। कई अध्ययनों में केवल स्क्रीन टाइम देखा जाता है; लेकिन इससे पूरी सच्चाई सामने नहीं आती। बिना सोचे-समझे लगातार स्क्रॉल करना, शारीरिक चीज़ों पर ज़ोर देने वाली सामग्री देखना या ऑनलाइन परेशान किया जाना नुकसानदेह हो सकता है, जबकि दोस्तों से जुड़ना और रचनात्मक काम करना कभी-कभी फायदेमंद भी साबित हो सकता है।

2024 में विज्ञान और चिकित्सा से जुड़ी यूएस की एक राष्ट्रीय समिति (National Academies of Sciences, Engineering, and Medicine) के अनुसार अब तक हुए शोध यह साबित नहीं करते कि सोशल मीडिया से सभी किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को बड़े स्तर पर नुकसान हो रहा है। फिर भी कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ बच्चों और किशोरों पर इसका असर साफ तौर पर दिखाई देता है, खासकर तब जब सोशल मीडिया का इस्तेमाल बहुत ज़्यादा किया जाता है।

अब जब अदालतें इस अधूरी और अनिश्चित वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर ज़िम्मेदारी तय करने की कोशिश कर रही हैं, तो इस मामले का फैसला यह तय कर सकता है कि समाज आगे चलकर किशोरों की डिजिटल ज़िंदगी को कैसे समझे और उस पर कैसे नियम बनाए। फिर भी इस मुद्दे पर विभिन्न वैज्ञानिकों के विचार और वाद-विवाद काफी महत्त्वपूर्ण होंगे। 

सोशल मीडिया के प्रभाव पर एक ऐतिहासिक फैसला

लॉस एंजिल्स की अदालत के एक अहम फैसले में सोशल मीडिया कंपनियों पर सख्त नियंत्रण की माँग करने वालों को बड़ी जीत मिली है। ज्यूरी ने माना कि बड़ी टेक कंपनियों ने जानबूझकर ऐसे प्लेटफॉर्म बनाए जो लोगों को ‘लत’ लगा देते हैं। अदालत ने स्वीकार किया कि इसी के चलते 20 वर्षीय युवती (कैली - के.जी.एम.) की मानसिक सेहत को नुकसान पहुँचा है। 20 साल की कैली द्वारा दायर यह मामला इस बात में बदलाव ला सकता है कि समाज बच्चों के प्रति सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी को कैसे देखता है।

कैली द्वारा अदालत को दिए बयान के अनुसार, उसने बहुत कम उम्र में ही यूट्यूब और इंस्टाग्राम का इस्तेमाल शुरू कर दिया था, जबकि नियम इसके खिलाफ थे। धीरे-धीरे उसका इन प्लेटफॉर्म्स पर व्यतीत समय इतना बढ़ गया कि उसकी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगी। वह परिवार से दूर रहने लगी और घंटों ऑनलाइन रहने लगी। लगभग 10 साल की उम्र में उसे दुश्चिंता (Anxiety) और अवसाद (Depression) जैसी समस्याएँ होने लगीं, जिसकी पुष्टि बाद में डॉक्टर ने भी की। साथ ही उसे अपने शरीर को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंता (Body Image Issues) रहने लगी।

ज्यूरी ने यह भी पाया कि मेटा (इंस्टाग्राम, फेसबुक, व्हाट्सएप) और गूगल (यूट्यूब) ने ऐसे फीचर्स बनाए जो लोगों को ज्यादा समय तक ऑनलाइन बांधे रखते हैं, जिससे कैली की मानसिक स्थिति पर बुरा असर पड़ा। अदालत ने उसे 60 लाख डॉलर का मुआवजा देने का आदेश दिया, जिसमें मेटा को ज्यादा हिस्सा देना होगा। यह फैसला सिर्फ कैली के लिए ही नहीं, बल्कि अमेरिका में चल रहे ऐसे सैकड़ों मामलों के लिए भी महत्त्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है।

इस मामले का मुख्य मुद्दा यह था कि सोशल मीडिया के कुछ फीचर्स—जैसे लगातार स्क्रॉल करना और एल्गोरिदम के अनुसार कंटेंट दिखाना—इरादतन इस तरह बनाए गए थे कि लोग ज्यादा समय तक जुड़े रहें। कैली के वकीलों ने इन्हें ‘लत लगाने वाली मशीन’ बताया और कहा कि कंपनियों को इसके असर का पता था, खासकर बच्चों पर। लेकिन उन्होंने नुकसान रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए। उन्होंने यह भी कहा कि कम उम्र के यूजर्स को जोड़कर रखना कंपनियों का बड़ा लक्ष्य था।

कंपनियों ने इस फैसले को मानने से इनकार किया है और अपील करने की बात कही है। मेटा का कहना है कि किशोरों की मानसिक समस्याएँ कई कारणों से होती हैं, सिर्फ एक प्लेटफॉर्म को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। गूगल ने कहा कि यूट्यूब तो एक वीडियो सेवा है, न कि पारंपरिक सोशल मीडिया। लेकिन ज्यूरी ने माना कि दोनों कंपनियों ने अपने प्लेटफॉर्म को बनाने और चलाने में गंभीर लापरवाही की है।

यह मामला ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में बच्चों पर सोशल मीडिया के असर को लेकर चिंता बढ़ रही है। हाल के महीनों में कई और फैसलों में भी कंपनियों को हानिकारक या अनुचित कंटेंट दिखाने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। इससे साफ संकेत मिलता है कि अब लोगों की सोच बदल रही है और टेक कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है कि वे मुनाफे और यूजर एंगेजमेंट से ज्यादा यूजर की सुरक्षा को प्राथमिकता दें।

अब सरकारें भी इस मुद्दे पर कदम उठाने लगी हैं। कुछ देशों ने नाबालिगों द्वारा सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने या सीमाएँ  तय करने की शुरुआत कर दी है। ब्रिटेन में यह भी विचार हो रहा है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह रोक लगाई जाए। इससे संकेत मिलता है कि सरकारें मान रही हैं कि मौजूदा सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं हैं और सख्त नियमों की जरूरत है।

अभियान चलाने वालों और प्रभावित परिवारों ने इस फैसले का स्वागत किया है। उनका मानना है कि अब सोशल मीडिया से जुड़े खतरों को गंभीरता से लिया जा रहा है। हालाँकि, विशेषज्ञों का कहना है कि असली बदलाव सिर्फ अदालत के फैसलों से नहीं आएगा, बल्कि इसके लिए कड़े नियम और कंपनियों में सुधार भी जरूरी होंगे।

बहरहाल, यह मामला एक बड़ी बहस को सामने लाता है—तकनीकी विकास, मुनाफा और लोगों की सेहत के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। (स्रोत फीचर्स)

कविताः वे दो प्रौढ़ स्त्रियाँ!

 - अंजू खरबंदा

ढक्का गाँव की एक गली से

गुज़रते हुए अचानक नज़र पड़ी

पार्क की एक बेंच पर बैठी

दो प्रौढ़ स्त्रियों पर…

मग्न थीं वे

अपने सुख-दुःख बाँटने में,

जैसे समय ठहर गया हो

उनकी बातों के आसपास!

उम्र के इस पड़ाव तक

आते-आते

कितने विषय होंगे उनके पास,

कितनी कहानियाँ, 

कितनी उपलब्धियाँ!

जो किसी किताब में दर्ज नहीं!

उनके चेहरे की झुर्रियों ने

सहे होंगे जीवन के

अनगिनत थपेड़े,

हर लकीर एक किस्सा 

कहती होगी,

इस मोड़ तक पहुँचते-पहुँचते

एक लंबा इतिहास

बस गया होगा उनकी स्मृतियों में,

उम्र बढ़ने के साथ-साथ

तजुर्बा भी गहराता गया,

कमी-बेशी को नज़रअंदाज़ कर

जीवन को गति देती रहीं 

वे दो प्रौढ़ स्त्रियाँ!

भाषाः पाँच सौ प्रतियाँ और करोड़ों के प्रतिनिधि

 - जयप्रकाश मानस

कभी-कभी सोच कर देखिए - यह हिंदी साहित्य की ताक़त है या कमजोरी कि किसी लेखक की किताब 500 या ज़्यादा से ज़्यादा 1000 प्रतियों में छपती है (अब तो इसमें भी कलाकारी दिखाने की तकनीक मौजूद है), और उसी के बाद उसे समूची हिंदी का प्रतिनिधि लेखक घोषित कर दिया जाता है। रातों रात !

500 प्रतियों का यह संसार, किसी छोटे कमरे की तरह है - जहाँ दरवाज़ा खुलता है, पर हवा बाहर नहीं जाती।

किताबें छपती हैं, पर पाठकों तक नहीं पहुँचतीं।

कई बार तो यह किताबें अपने शहर से भी बाहर नहीं निकल पातीं।

प्रकाशक कुछ प्रतियाँ आलोचकों को भेजता है, कुछ लेखकों को, कुछ अपने परिचितों को - और शेष कुछ दिनों में गोदाम की धूल में सो जाती हैं। फिर भी उन्हीं किताबों पर संगोष्ठियाँ होती हैं, पुरस्कारों के लिए अनुशंसाएँ जाती हैं, और वही नाम रातों रात 'समकालीन हिंदी का महत्त्वपूर्ण स्वर' बन जाता है।

अजीब है कि यह सब एक ऐसे देश में होता है, जहाँ करोड़ों लोग हिंदी बोलते हैं, सुनते हैं, गाते हैं - पर शायद पढ़ते नहीं।

शायद उन्हें कोई नहीं बताता कि वे भी इस साहित्य के हिस्सेदार हैं या शायद साहित्य ने ही उन्हें अपने घेरे से बाहर रख दिया है।

फिर भी, यह तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है; क्योंकि यही हिंदी की ज़िद भी है कि इतने छोटे दायरे में भी वह जीवित रहती है।

कभी किसी स्कूल के बच्चे के निबंध में, किसी मज़दूर की बोली में, किसी माँ के लोकगीत में। वहाँ कोई आलोचक नहीं होता, कोई समीक्षक नहीं; पर भाषा जीवित रहती है।

शायद यही हिंदी की सबसे बड़ी ताक़त है  कि वह अपने औपचारिक साहित्य से ज़्यादा, अपने असंगठित जीवन में साँस लेती है।

500 प्रतियों की किताबें मर जाती हैं, पर वह एक माँ के मुँह से निकला शब्द, किसी अनाम कवि की पंक्ति बनकर सदियों तक चलता रहता है।

चिंतनः टूटना, बिखरना, समेटना और सँवरना

  - डॉ. महेश परिमल

जिस तरह से जीवन के साथ मृत्यु का संबंध है। ठीक उसी तरह जीवन में टूटना, बिखरना, समेटना और सँवरने का भी संबंध है। इंसान सदैव जीवन से मृत्यु की ओर खिसकता रहता है, वैसे ही उसके जीवन में बार-बार टूटने की स्थिति आती है, जब इंसान टूटेगा तो निश्चित तौर पर बिखरेगा भी, बिखरने के बाद उसे समेटना भी जरूरी है। जब यह तीनों क्रियाएँ  हो जाती है, उसके बाद जो कुछ भी होता है, वह संवरता है।

आप अपने जीवन में पीछे मुड़कर देखें, हालात बद से बदतर होते रहे। आप कई बार टूटे, फिर बिखरे, फिर स्वयं को समेटा और आखिर स्तर पर पहुँचते-पहुँचते आप एक बार फिर सँवरने लगे।

हर किसी के जीवन में ये चार चक्र आते ही हैं। टूटने से शुरू होकर यह क्रिया सँवरने तक चलती है। ऐसा भी नहीं है कि एक बार टूट गए, तो फिर यह क्रम समाप्त हो जाएगा। वास्तव में हम जीवन में जब भी टूटे हैं, तभी एक नया जीवन ही शुरू होता है। टूटने का आशय अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है। इंसान जब भी टूटा है, समझो फिर से संवरने के लिए ही टूटा है। इसलिए टूटने की इस क्रिया को कभी गलत मत समझना। सँवरने की पहली सीढ़ी ही है टूटना। टूटना यानी जुड़ने के लिए होने वाला पहला उपक्रम। जो टूटा है, वह जुड़ेगा ही, यह तय है। जुड़ता वही है, जो टूटता है।

इंसान जिंदगीभर जीने का ही उपक्रम करता रहता है। जीना यानी पल-पल साँस लेने की प्रक्रिया से गुजरते हुए जीवन संगीत में रम जाना। यही रमने में क्रिया ही जब सघन हो जाती है, तो इसे डूबना कहते हैं। जीवन के हर क्षेत्र में डूबने को सही माना गया है। डूबने से आशय अपने मनचाहे काम को पूरी तल्लीनता से करना। हर किसी के लिए डूबना अलग-अलग हो सकता है। संगीत वाले जब डूबकर गाते या बजाते हैं, तो हर किसी के मुँह से वाह-वाह निकल ही आता है।

संगीत हो या कोई अन्य क्षेत्र, डूबना तभी सार्थक होता है, जब वह टूटता है। सभी कहते हैं कि टूटे हुए साज की आवाज को हर कोई नहीं समझ सकता। इसी तरह टूटे हुए दिल की बात भी हर कोई समझ नहीं पाता है। इसे वही समझ सकता है, जो कभी टूटा हो। टूटने को कभी नकारात्मक भाव से न लें, यह आगे बढ़ने की पहली प्रक्रिया है। जीवन का ककहरा इसी टूटने से ही शुरू होता है। बाइबल में जीसस ने कहा है-माँगोगे, तभी पाओगे। पाने के लिए माँगना ही पड़ता है। आप यदि स्वाभिमान की बात करते हुए यह कहेंगे कि हम हाथ नहीं फैलाएँगे, चाहे कुछ भी हो जाए। यहाँ  हाथ फैलाने की बात नहीं हो रही है, यहाँ  बात हो रही है, दिल में कुछ पाने की चाहत हो, तो वह चीज मिल ही जाती है।

हमें यदि अनायास कोई चीज मिल जाए, तो हम उसकी कद्र नहीं करते। जिसे प्राप्त करने के लिए हम बार-बार टूटते हैं या कह लें मरते हैं, वही जब मिल जाती है, तो हमें सुकून की वह दौलत मिल जाती है, जिसके लिए अच्छे-अच्छे तरस जाते हैं। पर यह मंजिल नहीं होती। जीवन में टूटने का यह क्रम बार-बार आता है। पर इसी में छिपा है, बिखरना। बिखरने में होता यह है कि हमारे आसपास पूरी तरह से अंधेरा छा जाता है। हाथ को हाथ नहीं सूझता, अंधेरा इतना गहन होता है कि जिसे हम अपना कहते नहीं थकते, वह भी हमारा हाथ छोड़कर चल देता है। इस अंधेरे का लाभ हर कोई उठाता है। एक-एक करके सभी निकल जाते हैं। जब थोड़ी-सी उजास को हम अपने करीब पाते हैं, तब समझ में आता है कि जिसे हमने अपना सबसे बड़ा संबल माना था, वही हमसे दूर चला गया है। तब कोई नहीं होता। यही होता है बिखरना। आपके अपने आपके गहन विश्वास का एक-एक टुकड़ा लेकर आप से दूर हो जाते हैं। आप उस वक्त अकेले होते हैं। इतने अकेले की आपकी छाया भी नहीं होती। अंधेरे में भला छाया किसके साथ होती है। यही होता है बिखरना। आपको समझ में आ जाता है कि किस-किस ने आपका साथ दिया। ऐसे लोग गिनती के ही होंगे। बहुत की कम लोग। यही लोग अपने होते हैं। इन्हें हम अपना कह सकते हैं।

अब यही चंद लोग आपको समेटने के काम में आएँगे। कुछ इधर से कुछ उधर से लोग आएँगे, आपको सांत्वना देंगे, आपको समझने की कोशिश करेंगे। बिखरे हुए सच को सामने लाएँगे। आप मान सकते हैं कि यह क्रिया समेटने की है। यह प्रक्रिया बहुत ही धीमे होती है। बरसों लग जाते हैं सब कुछ समेटने में। जब सब कुछ समेट लिया जाता है, तब लगता है, हम बहुत ही कठिन रास्तों से गुजरकर खुली हवा में सांस ले रहे हैं। यह पल बहुत ही आल्हादित करने वाला होता है। हमने खुद को समेट लिया। परीक्षा की एक घड़ी को पार कर लिया। अपनों को पहचान लिया।

अब शुरू होती है संवरने की प्रक्रिया। संवरना यानी सब कुछ धीरे-धीरे व्यवस्थित होना। जिंदगी को यह लगे कि अब आराम के पल हमारे साथ हैं, तो यहीं से शुरू होता संवरना। इन पलों में हमारे साथ सब कुछ अच्छा ही होने लगता है। हमारा परिवार हमारे साथ होता है, हम अपनों के साथ होते हैं। हम खुशी से भर उठते हैं। खुशियाँ  हमारा इंतजार करती होती हैं। चारों ओर से शुभ समाचार मिलने लगते हैं। सच मानो, जिंदगी ठहर जाती है। इस ठहरी हुई जिंदगी को गहरी सांस लेकर जी लो। क्योंकि अगले ही पल फिर शुरू होगी टूटने की प्रक्रिया....। क्या आप इसके लिए तैयार है?

यात्रा वृतांतः कारों धाम की यात्रा कथा

 -  मांडवी सिंह

भारत की संस्कृति अपने दामन में  अनेक किस्से - कहानियों को समेटे, इतिहास और भूगोल के महीन रेशों की बुनावट पर कई युगों के दर्शन का बेलबूटा टाँके,सँजोती रहती है समय को, सँभालती रहती है नई पौध के एक - एक पल को।

इस बार की यात्रा में मुझे एक ऐसे स्थान पर जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जो संस्कृति के उपर्युक्त सभी अलंकारों से सुशोभित है। भोपाल से कामायनी एक्सप्रेस से यात्रा शुरू हुई जो बनारस होते हुए बलिया तक जाती है। पहले यह ट्रेन सिर्फ बनारस तक जाती थी। प्रसंग था सहेली के पुत्र का विवाहोत्सव । इतिहास में बलिया का नाम बहुत मशहूर है। सबसे पहले तो मेरे मन में आया कि आखिर इस नाम का अर्थ क्या होता है? कुछ गूगल गुरु और कुछ स्थानीय लोगों से विचार- विमर्श के बाद जो निष्कर्ष निकला उसके आधार पर कहानी यह है कि पौराणिक काल में महर्षि भृगु ऋषि के आश्रम में ( आज भी इसे भृगु क्षेत्र कहा जाता है) उनके पुत्र शुक्राचार्य द्वारा दानवराज दानवीर राजा बलि का यज्ञ संपन्न कराया गया था। संस्कृत में यज्ञ को याग कहा जाता है। जिसके आधार पर इसका नाम 'बलियाग' पड़ा ,जो कालांतर में बलिया हो गया।

यह राजा बलि की राजधानी थी। यहाँ से लगभग 20 किलोमीटर दूर 'चितबड़ागाँव' है वहीं जाना था। सहेली के परिवार का बेटा अतुल मुझे लेने स्टेशन आया था। उसी के साथ बातचीत शुरू हुई। मैंने मजाक के लहजे में कहा कि इस गाँव का नाम चितबड़ा क्यों है, क्या यहाँ के लोग बड़े दिलवाले होते हैं? मुझे उम्मीद नहीं थी कि मजाक में कही गई बात का जवाब इतना दिलचस्प हो सकता है। अतुल ने बताया कि पुराने समय की बात है यहाँ के स्टेशन से खिलौनों से भरी ट्रेन गुजर रही थी। एक गरीब परिवार का बच्चा उस खिलौने के लिए मचल गया। गाँव वाले एकत्रित हो गए और ट्रेन रुकवा दी और एक खिलौना लेकर उस बच्चे को दे दिया। तभी से इस गाँव का नाम चितबड़ा गाँव पड़ गया, अर्थात् बड़े दिलवाले लोगों का गाँव। इस किवदंती  को सुनाना मेरा मूल उद्देश्य नहीं है बल्कि इस गाँव के पास जो अद्भुत स्थल है, जिसका प्रचार - प्रसार नहीं होने के कारण वह पर्यटकों से आज भी वंचित है उसका वृतांत सुनाना है।

इसी गाँव से एक रास्ता जाता है कामेश्वर धाम के लिए जिसे आज कारों धाम कहा जाता है। पूर्व में इसका नाम कामकारू, कामशीला था, जो अपभ्रंश होकर कारों हो गया।

इसकी मान्यता है कि यह वही स्थान है जहाँ भगवान शिव ने देवताओं के सेनापति कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया था। अतीत के झरोखे से झाँकते , सुलझे अनसुलझे अनेक किस्से ,कहानियों को समेटे इस स्थली को देखने की उत्कंठा बलवती होती जा रही थी, लेकिन विवाहोत्सव के पश्चात ही दर्शन संभव था।

सौभाग्य से वह समय भी आ गया। चितबडा गाँव से हमलोग कार से मंदिर के लिए प्रस्थान करते हैं। हरे - भरे खेतों, बाग - बगीचों के नयनाभिराम दृश्यों ने मन के सारे दरवाजे खोल दिए। जहाँ तक निगाह जाए बस हरियाली ही हरियाली। बीच बीच में ईंट - भट्ठे का कारोबार था जो स्थानीय निवासी अतुल के परिवार का ही था। चितबड़ा गाँव मुख्य मार्ग से मंदिर तक पहुँचने के लिए ऑटो, टैक्सी चलते हैं। अब हमलोग मंदिर के करीब थे। मंदिर के पीछे वाले हिस्से में कुछ खर - पतवार और दलदल दिखा। अतुल ने बताया कि किसी समय मंदिर के चारों ओर 84 एकड़ में फैला तालाब था, जो अब अतिक्रमण का शिकार हो गया है। अब हम मंदिर के अंदर थे। बाहर ताजे फूलों की माला, बेलपत्र और प्रसाद की कुछ दुकानें थीं , जहाँ से हमलेगों ने फूल प्रसाद खरीदा। शिव एवं शक्ति की आराधना की। अन्य मंदिरों की अपेक्षा भीड़ कम होने के कारण पूजा - अर्चना निर्विघ्न सम्पन्न हुई।

 मंदिर के बहुत स्वच्छ और सुंदर प्रांगण में शिव मंदिर स्थापित है। सामने एक आधा जला हुआ आम का हरा भरा वृक्ष। रामजी के चरणपादुका के साथ राम, लक्ष्मण जी का मंदिर। कल- कल स्वच्छ जल से भरा हुआ सुंदर रानी पोखरा। हरितिमा की चादर ओढ़े पूरा परिवेश। यह स्थान साधकों की तपोभूमि भी रही है। यहाँ के प्रसिद्ध पुजारी बालक बाबा  के साथ एक और साधक पुजारी बाबा की मूर्ति भी स्थापित है। बालक बाबा ने काशी, मथुरा, हरिद्वार जैसे तीर्थस्थानों पर यात्रियों के ठहरने के लिए कई धर्मशालाओं का  निर्माण कराया था। दर्शन पूजन के बाद अतुल ने वर्तमान पुजारी जी, जिन्हें स्थानीय लोग साधु जी कहते हैं उनके पास ले गये। साधु जी उस समय विश्राम में थे अतः मेरे जिज्ञासु प्रश्नों के उत्तर के साथ अन्य कई रोचक जानकारी देने के लिए वे उपस्थित नहीं हो पाए। 

शिवलिंग के ठीक सामने आधा जला आम्र वृक्ष किसी को भी कौतुक में डाल देता है; क्योंकि उसका लगभग 70% तना जला हुआ है और बाकी पेड़ हरा भरा। आम का मौसम होने से उस पेड़ पर आम  लटक रहे थे। कहा जाता है कि इसी पेड़ की ओट से कामदेव ने समाधि में लीन भगवान शिव पर पुष्प बाण चलाया था, और शिवाग्नि में जलकर भस्म हो गया था।

दूसरा प्रसंग है ऋषि विश्वामित्र के साथ दोनों अवधेश कुमारों के ठहरने का । तारकासुर के उत्पात से उद्धार हेतु दोनों राजकुमारों को लेकर जब ऋषि विश्वामित्र बक्सर जा रहे थे तब मार्ग में यह स्थल आया। जहाँ गंगा और सरयू का संगम है। स्नान, पूजा - अर्चन के बाद दोनों राजकुमारों ने अनेक उग्रतपा ऋषियों के आश्रम देखे जहाँ वे कठोर तपस्या में लीन थे। राजकुमारों ने कौतूहलवश उस स्थान के बारे में ऋषि विश्वामित्र जी से पूछा। विश्वामित्र जी ने बताया कि यह वही तपोभूमि है जहाँ कंदर्प ने भगवान शिव पर पुष्प बाण चलाया था।

पौराणिक ग्रंथों और वाल्मीकि रामायण में भी इस कथा का उल्लेख मिलता है। यह ऋषि दुर्वासा की तपोभूमि रही है।

अघोर पंथ के प्रतिष्ठापक श्री कीनाराम बाबा की प्रथम दीक्षा यहीं हुई थी।

यहाँ दो और प्राचीन शिवलिंग स्थापित है-

1. श्री कामेश्वर नाथ शिवालय जो रानी पोखरा के पूर्व तट पर विशाल आम्र वृक्ष के नीचे स्थित है। यह शिवलिंग खुदाई के समय प्राप्त हुआ था।

2. बालेश्वर नाथ शिवालय। बालेश्वरनाथ शिवलिंग चमत्कारी शिवलिंग हैं। कहा जाता है कि सन् 1728 में अवध के नवाब मुहम्मद शाह ने कामेश्वर धाम पर हमला किया था, तब बालेश्वरनाथ शिवलिंग से निकले हजारों काले भौरों ने जवाबी हमला कर उन्हें भागने पर मजबूर कर दिया था। 

आठवीं सदी में  मंदिर का निर्माण अयोध्या के राजा कवलेश्वरनाथ द्वारा करवाया गया था। पहले यह क्षेत्र अवध प्रांत का हिस्सा था। किंवदंती है कि अवध के राजा कवलेश्वरनाथ को कुष्ठ रोग हो गया था। वह अपनी रानी और कुछ सेवकों के साथ अवध छोड़कर तपस्या हेतु जंगल की ओर निकल गए। रास्ते में यहाँ विश्राम किया। यहाँ के वातावरण में कुछ ऐसा सम्मोहन था कि राजा विश्राम के लिए कुछ समय तक यहीं ठहर गए। उनका कुष्ठ रोग ठीक हो गया। राजा ने भव्य मंदिर, तालाब (रानी पोखरा और मंदिर के चारों ओर फैले पोखरा) का निर्माण करवाया। इसी रानी पोखरे में अवध की महारानी स्नान करती थीं।


वर्तमान में स्थानीय निवासियों के द्वारा समय - समय पर यज्ञ,अखंड पाठ इत्यादि धार्मिक एवम् सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करवाया जाता है। मंदिर का जीर्णोद्धार भी स्थानीय लोगों के सहयोग से किया गया है। लम्बे समय से प्रत्येक श्रावण मास में बक्सर उजियार घाट से काँवरिया जल लेकर पैदल, वाहन द्वारा अपनी श्रद्धा के अनुसार कारों धाम आकार शिव का जलाभिषेक करते हैं।

साधु जी द्वारा अन्य रोचक किस्से अभी सुनने बाकी थे लेकिन मेरी वापसी के लिए ट्रेन का समय करीब आ रहा था अतः न चाहते हुए भी वहाँ से निकलना पड़ा। साधु जी ने ढेर सारा ड्राइ फ्रूट का प्रसाद दिया । पुनः आने का आमंत्रण एवं आशीर्वाद देकर हम लोगों को विदा किया।

ऐसी पौराणिक और प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण कारों धाम को पर्यटन विभाग की निगरानी की आवश्यकता है ताकि 84 कोस के पोखरे का जीर्णोद्धार  हो सके। साथ ही साथ स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त हो सके। तो आप भी आइए कारों धाम।

लघुकथाः साँझा दर्द

  - सुदर्शन रत्नाकर

आसमान में बादल छाये थे । ठंडी हवा के झोंके अंदर तक कँपा रहे थे । ऐसे मौसम में वह पिछले दो दिन से पूरी कालोनी के कई चक्कर लगा चुका था । लेकिन किसी भी घर से उसे चारपाई ठीक करवाने का बुलावा नहीं आया । एक दो घरों में तो उसने साहस कर के दरवाज़ा खटखटा कर भी पूछ लिया था। लेकिन हर बार उत्तर मिलता," नहीं भैया कोई काम नहीं है चारपाई ही नहीं है तो ठीक क्या करवाएँगे । "

समय के साथ - साथ चारपाइयाँ रखने का चलन ही समाप्त हो गया है । मध्यम वर्ग के लोग एकाध चारपाई रख लेते हैं । कभी - कभार उसे काम मिल जाता था और काम न मिलने का अभिप्राय हुआ भूखे पेट सोना। पहले जवान था,  ख़ूब काम  मिल जाता था  फिर सूत की चारपाइयों का रिवाज ख़त्म हो गया । बाद में उसने नाइलॉन की निवार का काम सीख लिया। बरसों बीत गए हैं । अब बूढ़ी हड्डियों में उतना दम भी नहीं है । टूटी साइकिल पर वह बार - बार उन्हीं गलियों में चक्कर लगाता रहता है । कभी काम मिल जाता है, कभी नहीं ।

वह गंदे नाले के पार की बस्ती में आ गया । आवाज़ लगा ही रहा था कि उसे एक झोंपड़ी के बाहर ही जंग लगी स्टील की चारपाई दिख गई । उसकी बाँछे खिल गईं । जिसकी चारपाई है शायद वह ठीक करवा ही ले। यही सोच कर वह वहाँ पहुँच गया । झोंपड़ी में झाँक कर देखा । कोई सो रहा था । उसने आवाज़ लगाई,"क्यों भाई चारपाई ठीक करवाओगे। "

आवाज़ सुन कर वह व्यक्ति फटा कम्बल हटाकर हड़बड़ा कर उठ बैठा । बोला,"ठीक तो करवानी है, कितने पैसे लोगे । "

उसने निरीक्षण करके बताया,"चालीस रुपया । "

व्यक्ति का चेहरा उतर गया । "नहीं  भाई, इतने पैसे नहीं है रहने  दो । "

"कुछ कम कर दूँगा, ठीक तो करवा लो'," वह बोला

पैसे होते तो नई चारपाई ही ले लेता । सर्दी में ज़मीन पर सोने से ठंड लगती है । मज़दूरी करने गया था, वहीं यह चारपाई देख कर मालिक से माँग ली थी । कई दिन हो गए हैं । इतने पैसे ही नहीं हैं कि ठीक करवा लूँ । सीलन भरी ज़मीन पर सोने से सर्दी हड्डियों तक घुस जाती है । अभी रहने दो भैया फिर ठीक करवा लूँगा ।" कहकर वह कम्बल मुँह पर डाल कर सो गया।  वह वहीं बैठा रहा।  थोड़ी देर में उस व्यक्ति को ज़ोर की खाँसी उठी । वह उठ कर बैठ गया । देखा वह वहीं  बैठा है ।

" भाई क्यों बैठे हो । मैं तो चारपाई ठीक करवा न पाऊँगा । अब तो सर्दी ऐसे ही बीत जाएगी। कौन-सी नई बात है । ज़िंदगी  ऐसे ही निकल गई है, बाक़ी  भी बीत जाएगी ।’’ वह खाँसता हुआ फिर वैसे ही लेट गया । 

उसने चारपाई खोली । कपड़े से साफ़ की । जहाँ - जहाँ से निवार टूटी थी, ठीक की । जहाँ नई की ज़रूरत थी, वह भी लगा दी ।

चारपाई ठीक करके उसने अंदर रख दी थी । भूख के मारे उसे पेट में कुलबुलाहट हो रही थी। पर चेहरे पर गहरा संतोष था ।  वह ‘चारपाई ठीक करवा लो’ की आवाज़ लगाता हुआ आगे बढ़ गया। 

सम्पर्कः ई-29, नेहरू ग्राउंड, फ़रीदाबाद 121001

दो लघुकथाएँ

 -सुकेश साहनी 

1. कूप मण्ड़ूक

"विजय कहाँ है?" उन्होंने पत्नी से पूछा।

"दोस्तों के साथ फ़िल्म देखने गया है।"

"मुझसे पूछकर क्यों नहीं गया?" वे चिल्लाए, "मैं अभी मरा तो नहीं हूँ ।"

"आखिर बात क्या है?" वह हैरान थी।

"बात पूछती हो।" उन्होंने आँखें निकालीं, "ये आजकल की फ़िल्में! तुम बच्चों को बर्बाद करके छोड़ोगी।"

"पड़ोसी बता रहे थे- अच्छी पारिवारिक फ़िल्म है, तभी मैंने जाने दिया। आपको हुआ क्या है?" फिर थोड़ा रुककर बोली, "सुबह से घर में बैठे- बैठे बोर हो गए होंगे। न हो तो थोड़ा घूम आइए, मन ठीक हो जाएगा।"

"साफ- साफ क्यों नहीं कह देतीं कि घर से चला जाऊँ! अब तुम्हें मेरा घर पर रहना भी नहीं भाता!" उन्होंने चटपट चप्पल पहनी और घर से बाहर सड़क पर आ गए।

पत्नी से हुई तकरार से उनका दिमाग़ अभी तक भन्ना रहा था। "कलयुग! घोर कलयुग! !" वे बुदबुदाए।

उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि किधर जाएँ! हर महीने उन्हें अपने पुश्तैनी मकानों के किरायेदारों से किराया लेना होता था और यह काम वह कर चुके थे। अब उनके पास करने को कोई काम नहीं था। तभी सामने से जोशी आता दिखाई दिया। उन्हें लगा, जोशी उनसे कन्नी काटकर निकलना चाहता है। वे उसके बिल्कुल सामने खड़े हो गए।

"कहो क्या हाल है?" जोशी ने पूछ लिया।

"जोशी, तुम्हें नहीं लगता, हालात दिन-प्रतिदिन बहुत खराब होते जा रहे हैं?"

"कैसे हालात?"

"यही कि दुनिया हम जैसे लोगों के रहने के काबिल नहीं रही। आज की पीढ़ी किस क़दर पथ-भ्रष्ट हो गई है।" उन्होंने निराशा से सिर हिलाया, "ये लोग देश को रसातल में पहुँचाकर छोड़ेंगे हम लोग अपने ज़माने में ऐसे तो नहीं थे!"

"आखिर बात क्या है?" जोशी के चेहरे पर ऊब के लक्षण दिखाई देने लगे थे।

"तुमने कभी सोचा, इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेवार है?"

"मैंने इस पर कभी नहीं सोचा,’’ जोशी ने घड़ी देखते हुए जल्दी से कहा, ‘‘मुझे बच्चों को योगा सिखाने जाना है, देर हो रही है। फिर कभी फुर्सत में बातें होंगी।’’

उन्हें जोशी की बुद्धि पर तरस आया। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर लोगों को क्या होता जा रहा है!

वे काफ़ी देर तक सड़कों पर फालतू घूमते रहे। फिर थककर बैठ गए। सत्तर वर्षीय गुरबख्श बढ़ई पूरी तन्मयता से दरवाज़े के पल्लों पर रंदा चला रहा था।

‘‘गुरबख्श, बहुत खराब वक़्त आ गया है!’’ वे थकी आवाज़ में बोले।

"की होया?" उसने बिना सिर उठाए पूछा।

"दो-दो जवान बेटों के होते हुए भी अपनी हड्डियाँ गला रहे हो। मैं तुम्हारी जगह होता तो दोनों को लात मारकर घर से निकाल देता।"

"नहीं बाबूजी, इस उम्र में पैसों के लिए थोड़े न काम करता हूँ। वाहे गुरु ने इन हाथों को हुनर दिया है, वह किसी काम आ सकें, यही इच्छा है। रही बात बच्चों की उन्हें यह काम पसंद नहीं था, इसलिए अपनी मर्जी के कामों में लग गए हैं।"

"फिर भी ये आजकल के लड़के अपनी जिम्मेवारी तो समझते नहीं हैं। एक हमारा ज़माना था।" उन्होंने ठंडी सांस ली। वे बोलते रहे और गुरबख्श जवाब में हूँ- हाँ करते हुए अपने काम में लगा रहा।

"बाबूजी चाय पियोगे?" थोड़ी देर बाद गुरबख्श से पूछा। 

"नहीं जी, बहुत-बहुत मेहरबानी!" वे चिढ़कर बोले-" आप अपना काम करो! " वे उदास कदमों से घर की ओर लौट पड़े।

रास्ते में पान की दुकान पर टी.वी. में कार्टून शो चल रहा था और कुछ बच्चे टी.वी. देखकर तालियाँ पीट रहे थे। उन्होंने जलती निगाहों से पान वाले को देखा।

"भाई साहब," वे दुकान पर सिगरेट सुलगा रहे एक व्यक्ति से बोले, "आपको नहीं लगता टी.वी. हमारे समाज में बढ़ती हुई हिंसा के लिए ज़िम्मेदार है?"

उस व्यक्ति ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया और सिगरेट सुलगाकर दुकान से आगे बढ़ गया।

"सब के सब जाहिल! बेवकूफ!" वे चिल्ला पड़े।

2. बैल 

"इसके दिमाग़ में गोबर भरा है गोबर!" विमला ने मिक्की की किताब को मेज पर पटका और पति को सुनाते हुए पिनपनाई, "मुझसे और अधिक सिर नहीं खपाया जाता इसके साथ। मिसेज आनंद का बंटी भी पाँच साल का ही है, उस दिन किटी पार्टी में उन्होंने सबके सामने उससे कुछ क्वश्चन पूछे...वह ऐसे फटाफट अंग्रेज़ी बोला कि हम सब देखती रह गईं। एक अपने बच्चे हैं..."

"मिक्की इधर आओ।"

वह किसी अपराधी की भाँति अपने पिता के पास आ खड़ा हुआ।

"हाउ इज फूड गुड फॉर अस? जवाब दो, बोलो!"

"इट मेक्स अस स्ट्रांग, एक्टिव एंड हैल्प्स अस टू...टू...टूऊ ऊ..."

"क्या टू-टू लगा रखी है! एक बार में क्यों नहीं बोलता?" उसने आँखें निकालीं, "एंड हैल्प्स अस टू ग्रो।"

"इट मेक्स अस अस्ट्रांग ...!" वह रुआँसा हो गया।

"असट्रांग! यह क्या होता है, बोलो... 'स्ट्रांग' ...स्ट्रांग' ...तुम्हारा ध्यान किधर रहता है...हंय?" उसने मिक्की के कान उमेठ दिए।

"इट मेक्स स्ट्रांग..." उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े।

"यू-एस... 'अस' कहाँ गया। खा गए!" तड़ाक् से एक थप्पड़ उसके गाल पर जड़ता हुआ वह दहाड़ा, "मैं आज तुम्हें छोडूँगा नहीं..."

"फूड स्ट्रांग अस..."

"क्या?" वह मिक्की को बालों से झिंझोड़ते हुए चीखा।

"पापा! प्लीज, मारो नहीं...अभी बताता हूँ...स्ट्रांग ...फूड...अस...इट...हाउ...इज..." वह फूट-फूटकर रोने लगा।

कथाः अंतिम याचना

 - बसंत राघव

ठुक-ठुक, ठुक-ठुक... फिर वही आवाज़, बिल्कुल वही आवाज़, जानी-पहचानी सी। लाठी टेक-टेक कर चलने वाली मंगतिन बुढ़िया। कुछ पल बाद फिर दरवाज़े पर खड़ी हो जाएगी सतजुगिया डोकरी... मैं चौकन्ना हो गया हूँ। आँखें बिछ गई हैं दरवाज़े की ओर। फिर ठुक-ठुक, ठुक-ठुक... लेकिन कोई नहीं है वहाँ। अब तक तो आ जाना था उसे। ताज्जुब है, शायद लौट रही हो मुझे ग़ैरहाज़िर जानकर, यही सोच रहा था।

समय की बड़ी पाबंद है बुढ़िया। बिल्कुल इसी समय, चाहे मूसलाधार पानी गिर रहा हो, चाहे सूरज आग बरसा रहा हो या भयावह ठंड हड्डियों में बर्फ़ भर रही हो—वह अपने भीख माँगने के काम में एक दिन भी नागा नहीं करती। फिर आज क्या हुआ उसे? मेरे मानस-पटल में अनेक सवाल उग रहे हैं।

अनायास मैं उठ बैठा हूँ। कुछ कौंधा है मेरे ज़हन में। "रामधनिया! ओ रामधनिया! मत डरा मुझे, ख़बरदार—फिर कभी..."

ओह! सरासर भ्रम है मेरा। रामधनिया कभी नहीं आएगी, अब आ ही नहीं सकती वह। हत्तेरे की, मैं भी कैसा पागल हूँ! कल शाम तो फूँका था उसे गाँव वालों ने। सच में मेरा दिमाग खराब हो गया है। मैं फिर से बिस्तर पर सो जाता हूँ। चित्त को स्थिर करने की नाकाम कोशिश करता हूँ।

हवा बड़ी तेज़ चल रही है। बरामदे में आज एक भी बच्चा नहीं है। लगता है सब अपने-अपने घर लौट गए हैं। गहरा सन्नाटा पसरा है। ध्यान को एकाग्र नहीं कर पा रहा हूँ। कितना मार्मिक प्रसंग छेड़ दिया मन ने। नाहक भ्रम—केवल भ्रम-जाल के चलते ठुक-ठुक की आवाज़ जो मैंने सुनी, वस्तुतः वह मेरे अवचेतन की प्रतिध्वनि थी। मैंने चादर सिर तक खींच ली है। मेरे दोनों हाथ फिर से सीने पर आ गए हैं। यह क्रिया बिल्कुल अनजाने तौर पर हुई है। मैं तो शांत चित्त बिस्तर में पड़े रहना चाहता था, लेकिन—बलात् अचेतन मस्तिष्क की कारस्तानी! ओह! सेरेब्रल हैमरेज—विस्फोट!

मुझे लगा मैं भयावह दुष्कल्पनाओं से घिरता जा रहा हूँ। तभी भीतर से आवाज़ आई—मत सोचो अनाप-शनाप। मैं अपने आप से बुदबुदा उठता हूँ—यह क्या हो रहा है आज मुझे? एकदम तुच्छ-सी बातों को इतना तूल क्यों दे रहा हूँ मैं?

ठुक-ठुक, ठुक-ठुक... फिर वही आवाज़—लयबद्ध, अनवरत, चिरश्रुत। मैं हड़बड़ा कर उठ बैठता हूँ। चादर स्वयमेव मेरे शरीर से नीचे गिर गई है। डर के मारे मेरा रोआँ-रोआँ खड़ा हो गया है।

"रामधनिया!" मैं प्रायः चीख उठा हूँ। आँगन से अभी-अभी एक गौरैया फुर्र से उड़ गई है। आवाज़ बाहर से नहीं, मेरे भीतर की घाटियों में गूँज गई है दूर-दूर। वही आवाज़, बिल्कुल वही, मैंने सुनी है इन्हीं कानों से। पिछले कई सालों से सुनता आ रहा हूँ—ठुक-ठुक, ठुक-ठुक... "हे राम, दे-दे राम, देवा दे राम, देने वाला दाता राम!"

रामधनिया की बूढ़ी चरमराती आवाज़ नित्य खनकती दरवाज़े पर, और चादर फेंक कर मैं झुँझलाता हुआ उठता हूँ। खटिया चरमरा जाती है, गोया गाली देती हो रामधनिया को असमय आने पर। डरावनी मूर्ति—अशुभ सी, कंकाल सी खड़ी हो गई हो जैसे।

"उफ़! चांडालिन, चांडालिन! मौत भी नहीं आवे राँड को, सिहर उट्ठे परान देखके। सराप लग्गे है करमजल्ली को!" (गाँव की औरतें अक्सर उसे देखकर फुसफुसातीं)।

मैं महसूस करता हूँ, दिल में कहीं पीड़ा है—घनीभूत, संचित। मैं भीख देता—एक मुट्ठी चावल मात्र। एल्युमीनियम का बड़ा सा तसला अक्सर खाली ही होता था, ठीक अपनी धारिका के उदर जैसा। पर वह तो कल शाम ही जा चुकी है, हमेशा के लिए निकल चुकी है अनंत यात्रा पर। रात जब मैं निकला था मैदान की तरफ़, तो निहारी थी उसकी धू-धू जलती हुई चिता। उसकी चटखती हुई हड्डियों की आवाज़ सुनी थी मैंने। इतना बड़ा भ्रम आज तक कभी हुआ नहीं मुझे। अब तो मुझे यह आशंका भी होने लगी है कि मैं कहीं सरक तो नहीं गया हूँ?

रामधनिया भला अब क्यों आने लगी? पार हो गई वह, छूट गई सारे जंजाल से बेचारी। अच्छा हुआ, रोज़-रोज़ की भीखमँगाई से फ़ुरसत पा गई वह। ठुक-ठुक की आवाज़ जो आती थी उसकी चार-फ़ुटिया लाठी से, उसे भी तो लोगों ने फेंक दिया था रामधनिया की चिता में। लोगों ने सोचा, अगर लाठी रह जाएगी तो भटकेगी बेचारी डोकरी।

"हे राम" और "ठुक-ठुक" की ध्वनि अब सदा-सदा के लिए मौन हो चुकी है; लेकिन मैं अपने इस महाभ्रम को ढूँढने लगा हूँ—कारण-अकारण। और कारण मिल गया है। कल इसी समय तो वह आई थी भीख माँगने, रोज़ की तरह। पर भीख मिलने के बाद भी वह खड़ी रही थी ठंड में। मेरे पूछने पर कहा था उसने—"बड़ी चाह है बाबू, चाहा पिए बर जी करत हे—चायपत्ती थोरिक दे देते का? अउ होही त कुछु जुन्ना गरम ओन्हा दे देते। घात जाड़ लागत हे बाबू।"

न जाने क्यों मैंने उसे झिड़क दिया था। वह वैसे ही उल्टे पाँव लौट गई थी; लेकिन उसके जाने के बाद सच में मुझे बहुत-बहुत पछतावा हुआ था। और जब शाम को सुना कि वह नहीं रही, तो सहसा मुझे विश्वास नहीं हुआ। लेकिन नियति की क्रूर सच्चाई यही थी।

ओह! स्मृति का कोई आयाम छू गया है मानस को। मैंने फिर उठा ली है चादर। मन भारी हो गया है; लेकिन ठंडी हवा असमय चल रही है—साँय-साँय, साँय-साँय... भुतहा एकांत के ख़ौफ़ को और भी घना करती हुई। तेज़ झोंका बाहर अधमरे पपीते के पेड़ को बुरी तरह से हिला रहा है। कम्बख़्त फिर वही चिर-परिचित आवाज़—ठुक-ठुक, ठुक-ठुक...

मैं फिर से विचलित हो गया हूँ। खुद को बहुत मुश्किल से सहेजा था, फिर बिखर गया हूँ। लेकिन इस बार नहीं उठा हूँ। खटिया से उठने की ज़रूरत भी नहीं है। घबराने की भी ज़रूरत नहीं है।

"ठुक-ठुक, ठुक-ठुक... दे-दे राम, देवा दे राम, देने वाला दाता राम... घात जाड़ हे बाबू—चाहा पिए बर थोरिक चायपत्ती दे देते का? अउ होही त जुन्ना गरम ओन्हा..."

ठुक-ठुक, ठुक-ठुक... वह लौट रही है—लाचार, अशक्त, पीड़ित, बेआबरू होकर। ओह! काश कि मुझे पता होता वह उसकी अंतिम याचना थी, अंतिम इच्छा थी उसकी—चाय पीने की... वह भी मुझसे आखिरी बार... धिक्कार, धिक्कार! एक कप चाय इतनी बड़ी चीज़ हो गई? नियामत? धत्त!

मैं चाहकर भी उठ नहीं पा रहा हूँ। हाथ-पैर बिल्कुल भारी हो गए हैं। साँसों की रफ़्तार तेज़ हो गई है। मैं जड़वत हो गया हूँ। अनजाने भय से निजात पाने की छटपटाहट, प्यास और प्यास, पैशाचिक जकड़न तीव्र से तीव्रतर। मैं निढाल सा हो गया हूँ। सारी देह पसीने से तरबतर। बिल्कुल भीतरी गहराई से एक शक्ति उठी है—आतंक से बाहर हो गया मैं अचानक।

चेतना में महज़ गूँज बाकी है। ठुक-ठुक की नामुराद आवाज़ और मैं फिर एक बार उठ खड़ा हुआ हूँ झटके से—चरमरा उठी है खटिया। दीवार पर टँगे दर्पण पर ठहर गई है नज़र। मैं अकबका गया हूँ एकबारगी।

एक शरारती गौरैया न जाने कब से ठुकठुका रही है दर्पण को—अपनी ही छाया को अपना प्रतिद्वंद्वी समझकर! या और कुछ? मुझे दया आई उस नासमझ पर (और अपने आप पर)। उसकी चोंच से रिस रही हैं... खून की बूँदें।

सम्पर्कः पंचवटी नगर, मकान नं. 30, कृषि फार्म रोड, बोईरदादर, रायगढ़- 96001, छत्तीसगढ़, ईमेल- basantsao52@gmail.com, मो. 8319939396

लघुकथाः अगोचर

 - भीकम सिंह 

अचानक उसने पहाड़ी से उतरते हुए भेड़-बकरियों का रेवड़ देखा, जो किसी डर से ओक-बुरांश के पेड़ों से बचता-बचाता दौड़े चला जा रहा था - बाऽऽ.... बाऽऽ.... बाऽऽ....

एक पल उसने मनीषा की ओर देखा जो एक बकरी के बच्चे को अपनी छाती से चिपकाए जी-जान से रेवड़ को रोकने की कोशिश कर रही थी। वह अभी कुकीना स्वाल पर रेवड़ के साथ कुछ देर और रहना चाहती थी, किंतु एक गुलदार (तेंदुए) को जाने मनीषा के रेवड़ से क्या ले जाना था कि ओक की ओट में घात लगाने लगा।  बहादुर मनीषा ने चिल्लाकर गुलदार को दुत्कारा, फिर भी वह न टला तो ओक यह देखकर अपनी जान से खेल गया और जड़ों से उखड़कर उसी पर गिर पड़ा... उसके साथ उसकी टहनियाँ  और पत्ते भी। गुलदार अपनी चोटों से कराहता मोनाल टॉप की ओर भागा... और रेवड़ कुकीना खाल की ओर... दोनों एक-दूसरे के विपरीत दिशा में।

मनीषा ने अपनी सांसें बटोरकर ओक से कहा, "ऐसा क्यों किया?" ओक ने पत्तियाँ  झपकाई और दो कदम नीचे खिसक गया... उसकी जड़ें जमीन के बाहर निकल आईं।

मनीषा को समझ नहीं आया।

मनीषा कुकीना खाल पर रेवड़ के साथ अकेली ही आती थी, किंतु इस कदर जंगल उसके साथ जुड़ा था... यह उसे आज अहसास हुआ...


कविताः बचा रहे जो आवश्यक है

  - डॉ. पूनम चौधरी 

बचा रहे

जो सच में आवश्यक है।


सवेरा

जब खिड़की पर आए-

सिर्फ़ उजाला नहीं,

भरोसे की 

एक किरण भी लाए,

जो चुपचाप जोड़ सके

टूटे हुए तार।


बचा रहे स्पर्श-

वह,

जो देह से परे

मन तक पहुँचता है,

मुक्त करता है

पीड़ा से,

बेचैनी से,

क्लांति से-

जैसे

माँ का हाथ,

निर्वाक,

सिर पर ठहरा हुआ।


बची रहे

हाथों की कोमलता-

उनमें ऊष्मा हो,

वे जानें

तोड़ना नहीं,

सहेजना;

छिटकना नहीं,

थामे रखना।


बचा रहे स्वाद-

न अधिक मिठास,

न अनावश्यक कड़वाहट,

बस

रोटी की भाप-सा सादा,

जो जीवन को

धीरे-धीरे पकाता रहे।


सीखा जाए

केवल उपयोग नहीं-

मान रखना भी।

बचा रहे मनुष्य,

और उसकी मनुष्यता।


सड़कों का शोर

सिर्फ़ प्रतिध्वनि न हो-

उसमें

अर्थ की एक लौ बचे,

जो

हवा के साथ भी जले,

और

विरुद्ध भी।


निराशा का भी

एक कोना हो-

जहाँ

अँधेरे के भीतर

प्रभात

संभावना बनकर ठहरा रहे।


बचा रहे प्रेम-

उसमें

सरलता हो,

थोड़ी-सी मासूमियत,

थोड़ी-सी नादानी-

जैसे

बच्चे की अकारण हँसी,

जो भीगी आँखों में भी

जगा दे

मुस्कान के जुगनू।


रिश्ते

बोझ न बनें-

ठिकाने हों,

जहाँ लौटकर

भटकनों के बाद

मन

उतार सके 

अपने थकान भरे जूते,

और पा सके विश्रांति।


कवि

जब भी लिखें-

सच लिखें।

चाहे वह चुभे,

चाहे उठाए प्रश्न-

पर

संवेदना कम न हो;

दूसरों के दुःख को

महसूस करने की

क्षमता बची रहे।


और-

जब तक यह जीवन है,

यह आकांक्षा भी बनी रहे।


क्योंकि

जब तक

बचाए रखने की

 इच्छा है,

तब तक

दुनिया में कहीं न कहीं

उम्मीद की एक लौ

जलती रहती है।

कहानीः राही

   - भावना सक्सैना

अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ़्रेंस का अंतिम दिन था। होटल की लाबी एक व्यस्त नदी की तरह बह रही थी,  आवाज़ों का शोर, गले में लटके नाम पट्टों के साथ गुजरते प्रतिनिधि, कहीं हँसते हुए सेल्फ़ी लेते, कहीं औपचारिक मुस्कान के साथ तस्वीरें खिंचवाते लोग, और थकान से भरी शाम।

हर कोई यहाँ एक राही था, किसी अपने शहर से दूर, कुछ पाने या कहने की राह पर। इस बहाव के बीच वह, शांत चेहरे, सधी चाल और थोड़ी थकी आँखों वाली भारतीय प्रतिभागी, जैसे अपनी ही लय में चल रही थी। भीड़ में चलते हुए भी वह किसी से टकराती नहीं थी, जैसे उसकी अपनी एक अदृश्य परिधि हो, जिसमें कोई प्रवेश नहीं कर सकता। लोग पास से गुज़रते, कंधे लगभग छूते, पर वह हर बार एक हल्का- सा मोड़ लेकर खुद को बचा लेती, जैसे उसे अपने चारों ओर की इस नपी- तुली दूरी की आदत हो। उसकी चाल में हड़बड़ी नहीं थी, पर ठहराव भी नहीं, बस एक सधी हुई लय, जिसमें वह भीड़ का हिस्सा होते हुए भी उससे अलग बनी रहती थी।

कभी- कभी कोई हँसी उसके पास आकर ठिठकती, कोई बातचीत उसके कानों से छूकर निकल जाती, पर वह उनमें शामिल नहीं होती, सिर्फ एक शांत दर्शक की तरह उन्हें गुजरते देखती रहती। ऐसा लगता था, मानो उसने अपने भीतर एक छोटा- सा एकांत रच लिया हो, जिसे वह हर जगह अपने साथ लिये चलती है, भीड़ के बीच भी, बिल्कुल सुरक्षित, बिल्कुल अकेला।

उसने अपना हर कार्य मुस्तैदी से पूरा किया था। भाषण, नोट्स, चर्चाएँ, सब होते हुए भी उसे भीतर एक बारीक- सी खलिश खाए जाती थी - घर की। शब्द वह बोलती थी, सुनती थी, लिखती भी थी, पर हर वाक्य के बीच जैसे कोई अधूरा विराम आ जाता, जहाँ मन अनायास ही कहीं और भटक जाता। सामने स्क्रीन पर चल रही प्रस्तुति के ग्राफ़ और आँकड़े धुँधले पड़ जाते, और उनकी जगह घर के छोटे छोटे दृश्य उभर आते - रसोई में रखी आधी भरी चाय की केतली, बच्चों के बिखरे जूते, सुबह की वह जानी पहचानी आवाज़ें।

कभी वह नोट्स बनाते-बनाते रुक जाती, जैसे किसी शब्द के अर्थ नहीं, अपने ही भीतर की कमी को समझने की कोशिश कर रही हो। आसपास लोग उत्साह से बहस कर रहे होते, नए विचारों पर सिर हिला रहे होते, पर उसे लगता वह इस पूरे दृश्य में उपस्थित होकर भी पूरी तरह शामिल नहीं है।

वह एक सप्ताह से इस अनजान शहर में है। उसे याद आया, सुबह की वह जानी पहचानी हलचल, बच्चों का स्कूल के लिए धीरे-धीरे तैयार होना, किसी का जूता ढूँढना, किसी का आख़िरी समय पर कुछ पूछ लेना… और रसोई में चुपचाप उठती चाय की भाप, जो हर दिन की शुरुआत को एक सधे हुए क्रम में बाँध देती थी।

वहाँ कोई विशेष घटना नहीं होती थी, सब कुछ सामान्य, लगभग रोज़ जैसा ही पर शायद वही साधारण सी निरंतरता उसे भीतर से थामे रखती थी। यहाँ, इस सजे सँवरे, व्यवस्थित माहौल में भी, उसे उस अनगढ़- सी दिनचर्या की कमी हल्के से महसूस होती रही।

यहाँ सब कुछ था - सुविधा, साज सज्जा, व्यवस्थित समय, बस वही सहज- सा अपनापन नहीं, जो बिना कहे हर कोने में बसा रहता है।

यह कोई ऐसा दुख भी नहीं था, जिसे वह किसी से कह सके, बस एक महीन- सी कसक, जो हर थोड़ी देर में भीतर कहीं हल्के से चुभ जाती। जैसे कोई धागा हो, जो उसे लगातार खींचकर उस जगह ले जाना चाहता हो, जहाँ उसका असली केंद्र है - उसका घर।

सम्मेलन समाप्त होने के बाद का आख़िरी दिन ख़ाली रखा गया था; ताकि सभी प्रतिनिधि शहर का भ्रमण कर सकें। सभी प्रतिनिधियों ने समूह बनाकर शहर घूमने की योजना बनाई, उसने बस एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “आप लोग जाइए… मैं आज थोड़ा आराम करूँगी।”

किसी ने ज़ोर नहीं दिया, सबको लगा, वह बस थकी है। पर थकान उसके तन की नहीं, मन की थी। वह अपने कमरे में लौटी, बैग एक ओर रखा और खिड़की के सामने जाकर बैठ गई। नीचे दूर- दूर तक उजली सड़कों की हलचल थी और भीतर उसकी स्मृतियों के कोने में घर का शांत प्रकाश। मोबाइल उठाकर उसने बच्चों की तस्वीरें देखीं, बड़ा बेटा हँसता हुआ, छोटा किसी मस्ती में… उन दोनों के बीच उसकी अपनी दुनिया के केंद्र छिपे थे। तभी इंटरकॉम बजा - ट्रिंग… ट्रिंग… 

उसने रिसीवर उठाया। एक शांत, परिचित सी आवाज़ थी। वही भारतीय प्रोफेसर, जो सम्मेलन में अक्सर उसके पास बैठता था। औपचारिक बातचीत ही होती थी, पर उसकी आँखों में एक धीमी थकान और गहराई वह कई बार नोट कर चुकी थी।

“आप नीचे नहीं आईं? सब लोग घूमने गए हैं,” उसने पूछा।

“मन नहीं था,” उसने सच में कहा।

“तो… कॉफ़ी?” उसके स्वर में एक सरल- सा आग्रह था।

“क्षमा चाहती हूँ, मुझे चाय पसंद है।”

“यहाँ चाय तो बस रंग मिली गर्म पानी जैसी है।”

वह हल्का- सा हँस पड़ी।

“आप सही कह रहे हैं; लेकिन मैं अपनी व्यवस्था से चलती हूँ।”

वह अचानक बोला, “अच्छा तो आप कोई स्पेशल चाय लेकर आई हैं… इंस्टेंट वाली, घर जैसी?”

“हाँ, है मेरे पास।”

वह थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला, “अजीब लगे तो माफ़ कीजिए… क्या एक पैकेट मिल सकता है?

तलब ऐसी हो रही है कि पूछे बिना रहा नहीं गया।”

वह खुलकर हँस दिया।

“चाय के लिए संकोच कैसा? आइए।”

कुछ ही मिनट में दरवाज़े पर दस्तक हुई।

वह अंदर आया, थका हुआ, पर सहज। कमरे का माहौल शांत और गर्म था, जैसे दो यात्राओं के बीच किसी स्टेशन पर थोड़ी देर का ठहराव।

वह बैठा, उसने केतली में पानी गरम किया और पहले दो कपों में सिर्फ़ गर्म पानी डालकर कपों को गर्म कर दिया। फिर दो चाय के कप बनाकर सामने रख दिए।

कप हाथ में लेते ही जैसे उँगलियों तक एक परिचित गर्मी उतर आई - धीरे धीरे हथेलियों से होती हुई भीतर कहीं ठहरने लगी। उसने कप को ज़रा कसकर थाम लिया, जैसे उस ताप में कुछ अपना- सा पा लिया हो।

दोनों कुछ पल चुप रहे। भाप हल्के हल्के ऊपर उठती रही, और उस छोटे से विराम में कमरे की निस्तब्धता और साफ़ सुनाई देने लगी, जैसे शब्दों की कोई जल्दी नहीं हो। उसने पूछा-“आपका इधर का अनुभव कैसा रहा?”

वह हल्का- सा मुस्कुराई, “अजीब है… हर सम्मेलन की ही तरह। इतने लोगों के बीच होते हैं, फिर भी असली बातें कहने का मौका कहीं नहीं मिलता।”

वह भी मुस्कुरा दिया, “शायद इसलिए… किसी बिल्कुल अनजान से कह देना आसान हो जाता है।”

दोनों हल्के से हँस पड़े, बिना किसी औपचारिकता के, बस उस सहज सहमति पर, जो कब बन गई, पता ही नहीं चला।

वह मेज़ पर रखे कप के किनारे को उँगली से हल्के से घुमाते हुए बोली - “दिन भर इतने लोगों से मिलते हैं… पर शाम होते होते लगता है, जैसे किसी से बात ही नहीं हुई।”

वह हौले से मुस्कुराकर बोला, “हाँ… बातें बहुत होती हैं, पर ज्यादातर बस काम की होती हैं। अपने बारे में कहने का मौका कम ही मिलता है।”

एक पल को दोनों फिर चुप हो गए, पर यह चुप्पी अब अलग थी, उसमें हल्की सी पहचान घुल आई थी।

वह बोला, “और काम का दबाव… वह तो हर जगह एक- सा है, है न?”

वह हल्का- सा हँसी, “हाँ, बस नाम और जगह बदल जाती है।”

फिर थोड़ी देर बाद, जैसे बात अपने आप गहरी हो गई , “आप घर को… बहुत मिस करती हैं?

उसने सिर झुका लिया, “बहुत। शायद जितना कह नहीं सकती। मेरे माता- पिता… जब मैं छोटी थी, तभी गुज़र गए। रिश्तेदारों ने पाला… अच्छा पाला, पर घर जैसा अपनापन? वह कभी नहीं मिला। इसलिए जब अपना घर बना… अपनी दुनिया… तो हर बार उससे दूर होना मुझे किसी खालीपन की याद दिलाता है।”

उसने अनजाने में उसके दर्द के नीचे छिपे साहस को महसूस किया। वह धीरे से बोला, “मैंने भी घर जल्दी छोड़ दिया था। पर परिस्थितियाँ अलग थीं… मेरे पिता बहुत कठोर थे। हर बात पर डाँट, हर सपने पर प्रश्नचिह्न,असंतोष और अविश्वास। मैंने एक दिन बस… भाग जाने जैसा निर्णय लिया।”

उसकी आँखें थोड़ा चौड़ी हुईं ।

“भाग गए थे?”

वह सिर हिलाकर बोला,  “अठारह का था, ख़ुद को बड़ा समझने लगा था। जेब में बस तीन सौ रुपये; लेकिन मन में विश्वास बहुत था। जब पैसे ख़त्म हुए, तो पहले अख़बार बेचा, गलियों में घूम घूमकर। एक दिन बारिश में भीगते हुए भी बेचे थे, पन्ने नमी से भारी हो गए थे, किनारे मुड़ने लगे थे… पर लगा, अगर ये निकल जाएँ, तो रात की रोटी की चिंता नहीं रहेगी।”

वह हल्का- सा मुस्कुराया, जैसे कोई दूर की बात याद आ गई हो, “पहली बार जब कुछ पैसे हाथ में आए थे न… तो खर्च करने की जल्दी नहीं हुई। देर तक बस देखता रहा उन्हें। अजीब- सा लगता था कि ये सच में मेरे हैं।”

थोड़ा रुककर उसने आगे कहा, “फिर एक पंक्चर वाले की दुकान में काम मिला, हाथों में ग्रीस, कपड़े मिट्टी और कालिख से सने। कभी-कभी चाय की टपरियों पर भी… बस खाने भर को। कई रातें ऐसी भी रहीं जब ठीक से सोना नहीं हुआ, कहीं भी जगह मिल गई, तो वहीं लेट गया; पर नींद से ज़्यादा यह सुकून होता था कि दिन निकल गया।”

उसने एक हल्की साँस ली, “और हाँ… कभी-कभी काम माँगने जाता था, तो लोग देखे बिना ही मना कर देते।

बात छोटी थी, पर उस वक़्त… थोड़ा अजीब लगता था। जैसे आप सामने होकर भी कहीं दर्ज नहीं हो रहे।”

वह उसकी ओर देखती रही, घृणा या दया से नहीं, बल्कि उस शांत दृढ़ता के प्रति, जो इन साधारण- सी बातों में छिपी थी।

वह आगे बोला, “रात में ट्यूशन पढ़ाकर कुछ पैसे मिलते। किसी ने कहा- टाइपिंग सीख लो, काम आएगी। शुरू में उँगलियाँ बार बार अटकती थीं… बाकी लोग आगे निकल जाते थे। पर मैंने सोचा, रुकना तो वैसे भी नहीं है, तो वहीं बैठकर धीरे धीरे सीखता रहा।” वह हल्का- सा मुस्कुराया, “और पहली बार जब स्टेनो की परीक्षा पास की, तो लगा… जैसे अपनी ज़िंदगी में पहली ईंट खुद रखी है।”

“और अब?” उसने पूछा।

वह मुस्कुराया - ताज्जुब और विनम्र गर्व का मिला- जुला भाव था वह।

“अब… सरकारी कॉलेज में प्रोफेसर हूँ। पर बेरी के पेड़ के नीचे बैठकर फटी उँगलियों से टायर पीटने वाला लड़का अब भी मेरे भीतर ज़िंदा है। शायद अच्छा है… वही मुझे नम्र रखता है।”

कमरे में जैसे शाम और गहरी हो गई।

चाय की भाप ऊपर उठती रही और उसके साथ दोनों की ज़िंदगी की परतें खुलती चली गईं।

वह बोली, “मेरे जीवन में प्रेम, ज़िम्मेदारी, संघर्ष, सब रहा। पर मैंने सीखा कि सबसे ऊँची दीवारें हमारे भीतर ही बनती हैं… और उन्हें गिराने का साहस भी भीतर ही होता है।”

“सही कह रही हैं,” वह बोला, “और शायद यही बात… मुझे हमेशा मेहनतकश बनाए रखती है। जो खोया, वह मेरा भाग्य था। जो पाया, वह मेरा परिश्रम।”

धीरे धीरे दोनों खुलते गए। न कोई बनावट, न कोई दिखावा। अजनबी होते हुए भी वे दो घंटे के लिए एक दूसरे के दर्पण बन गए थे।

जब बातें थम गईं, तो दोनों कुर्सियों पर सीधा बैठ गए, जैसे याद आया हो कि यह ठिकाना नहीं, बस ठहराव है।

दोनों अलग-अलग रास्तों के राही थे, अपनी-अपनी दिशाओं, अपने-अपने अनुभवों और थकानों के साथ चलते हुए। फिर भी उस शाम, अनायास ही, उनकी मंज़िल कुछ देर के लिए एक हो गई थी, जैसे दो रास्ते कहीं आकर हल्के से छू लेते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं।

उस थोड़े से ठहराव में न कोई दावा था, न कोई अपेक्षा, बस साथ होने का एक शांत- सा बोध, जो बिना नाम के भी पूरा लगता था।

रात को टीम के साथ नीचे लॉबी में उतरे, तो दोनों ऐसे चले जैसे कभी मिले भी न हों। वही औपचारिक मुस्कान, वही दूरी। अगले दिन एयरपोर्ट पर चेक इन के दौरान वह उसके पास आया। “कल… आपसे बात करके अच्छा लगा। चाय और समय दोनों के लिए शुक्रिया। ऐसे कोई सुन ले… यह भी कम है जीवन में।”

वह बोली, “हाँ। कल का दिन थोड़ा आसान हो गया।”

फ्लाइट में दोनों दूर बैठे थे।

लैंड करने के बाद सामान बेल्ट के पास उन्होंने एक हल्की मुस्कान के साथ एक दूसरे की ओर सिर झुकाया, “अपना ख़याल रखिएगा।”

“आप भी।”

बस इतना। न कोई वादा था, न भविष्य की राह, न फ़ोन नंबरों का आदान-प्रदान। वे उतने ही अजनबी रहे जितने पहले थे: पर उन दो घंटों ने उनकी ज़िंदगी में एक शांत, अनाम सी जगह भर दी थी, जिसका कोई नाम नहीं था, पर जिसका असर धीमे- धीमे भीतर तक उतर गया। वे फिर अपने अपने रास्तों के राही बन गए। 

व्यंग्यः प्लास्टर वाली टांग

  - डॉ. मुकेश 'असीमित '

आप चाहते हैं कि आप हमेशा दुनिया की नजरों में बने रहें, सबकी निगाहें आप पर टिकी रहें। जिस गली से गुजरें, लोग आपको देखकर रुक जाएँ, हाल-चाल पूछें, आपको याद करें। बस, आप आ जाइए हमारे पास, लगवा लीजिए एक प्लास्टर... सच में, हर जगह आपकी पूछ होगी। जो आपको जानते हैं, जो नहीं जानते, सब आपको रास्ते में रोक सकते हैं। अगर आपके हाथ में प्लास्टर लगा हुआ है, तो आप इस शहर के लिए एक चलता-फिरता अजूबा बन सकते हैं। लोग आपको ऐसे देखने लगेंगे जैसे चिड़ियाघर से कोई प्राणी सड़क पर आ गया हो।

और अगर आपकी टाँग  में प्लास्टर लगा हुआ है और आप घर में कैद हैं, तो लोग आपके घर तक भी आ सकते हैं। पुराने दोस्त, रिश्तेदार, मोहल्ले वाले, जो कभी आपका हाल तक नहीं पूछते, वे भी बिना रोक-टोक आपके दरवाजे पर आ जाएँगे। कसम से, रातों-रात आपको लगेगा कि पूरी दुनिया आपकी टाँग  की चिंता में कितनी बेचैन हो गई है। आपने भले ही कभी किसी के काम में टाँग न फँसाई हो, पर जब आपकी टाँग टूटेगी, तो लोग आपकी टाँग का हाल जानने दौड़े चले आएँगे। इतनी हसरत से आपकी टाँग को देखेंगे जैसे उन्हें लग रहा हो कि यह अवसर उनको क्यों नहीं मिला, काश उनके भी प्लास्टर लगा होता... आज उनके घर पर भी पूछने वालों का जमावड़ा लगा होता।

शर्मा जी के कान दरवाजे पर लगी कॉल बेल पर हैं। जैसे ही कॉल बेल बजती है, शर्मा जी अपनी टाँग को तकिये पर रख देते हैं। सामने वाले को, जिस पर शोक प्रकट करना है, वह सामने रहेगी तो आने वाले को धक्का- सा नहीं लगेगा 'की यार प्लास्टर वाली टाँग कहाँ है ,’कहीं हम ठगा तो नहीं गए ,खबर तो पक्की है न ? कहीं हमारे समाचार लेने से पहले ही प्लास्टर कट गया हो..दस वहम जी..। मुख पर दुःख और वेदना के भाव ले आते हैं, चेहरा थोड़ा लटका लेते हैं। इधर, श्रीमती जी किचन में चाय का पानी चढ़ा देती हैं, बेटा बाहर दूध की थैली और चाय की पत्ती लेने को भागता है।

प्लास्टर वाली टाँग तकिये पर रखी है। लोग आ रहे हैं... मातमपुरसी का पूरा माहौल है। आहें भरी जा रही हैं, टाँग को पकड़-पकड़ कर हिलाकर देखा जा रहा है, "जिंदा है न?" शर्मा जी को थोड़ी उँगली चलाने को कहा जाता है। शर्मा जी उँगली चलाते हैं, हाँ... ठीक है, मन को तसल्ली। टाँग जिंदा है।

डॉक्टर ने भी कहा है, हर एक घंटे में उँगली चलाते रहें, तसल्ली रहेगी कि टाँग जिंदा है।

क्या शर्मा जी, क्या मिश्रा जी, क्या गुप्ता जी—जिनकी टाँग टूटी है और प्लास्टर लगा है, सबकी एक ही राम कहानी है। अब आप तैयार हो जाइए, इस पूरी कहानी के भूत, भविष्य और वर्तमान को सुनाने के लिए। कोई भी बात छूटनी नहीं चाहिए। सबसे पहले तो यह बताएँ  कि चोट कैसे लगी, कितना दर्द हुआ, आवाज आई थी क्या टाँग टूटने की? जब टाँग टूटी, कैसा महसूस हुआ—अच्छा या बुरा? अब कैसा महसूस हो रहा है?

फिर समाचार लेने वाला कोशिश करेगा आपको सांत्वना देने की, " अरे भाई साहब ,आपकी क्या टाँग टूटी है पिद्दी- सी .... ! ये भी कोई टाँग   टूटना होता है? टाँग   तो हमारे साले साहब की टूटी थी... भाई साहब, कैसी टाँग   टूटी थी उनकी, सच में!"

शर्मा जी सोचेंगे कि कितनों को सुना चुके हैं, अब क्या सुनाएँ बार-बार वही कहानी। यह भी कोई बात हुई... जो साहब समाचार लेने आए हैं, उन्हें तो सुनाना ही पड़ेगा, वरना वे ही आपको सुना देंगे, "बताइए, हम समाचार लेने आए और इन्हें इतनी भी तमीज़ नहीं कि हमें बता दें कि हुआ कैसे?" घटनास्थल का आँखों-देखा हाल तो आपको ही बताना पड़ेगा। या तो एक कैसेट रिकॉर्ड कर लीजिए और प्ले कर दीजिए या अपनी कहानी किसी नौकर को रटा दीजिए और उसे इस काम पर लगा दीजिए।

समाचार लेने वाला व्यक्ति अपनी सांत्वना देने से पहले पूरी घटना की गंभीरता के अनुसार अपनी सांत्वना की पोटली खोलेगा। फिर आपको कुछ सबूत भी पेश करने पड़ेंगे कि वास्तव में टाँग  टूटी है या यूँ ही मजाक कर रहे हैं, क्या पता आपका ..नकली प्लास्टर लगाकर बैठे हों । अब सबूत में आप डॉक्टर की पर्ची, एक्स-रे फिल्म, प्लास्टर का बिल, या फिर टूटने के समय की कोई वीडियो रिकॉर्डिंग, या टूटने की आवाज की ऑडियो रिकॉर्डिंग, या कोई चश्मदीद गवाह प्रस्तुत कर सकते हैं। अब यह साबित तो आपको ही करना पड़ेगा न, आखिर टाँग   भी तो आपकी ही टूटी है।

कई समाचार  लेने वाले निराश भी होंगे...” अरे क्या शर्मा  साहब, हम समाचार  लेने आये हैं यह सोचकर की कोई ढंग की टाँग  टूटी होगी...ये क्या मामूली सा फ्रैक्चर ..बताओ काम धाम छोड़कर एक तो इनके समाचार  लेने आओ और एक ये हैं महाशय हैं की , ढंग से टाँग  भी नहीं तुड्वाते “ 

शर्मा जी ग्लानी से मरे जा रहे हैं..’अगली बार शिकायत का मौका नहीं देंगे ऐसा प्रण लिए हैं’ 

"शर्मा साहब, आप तो इतने संभलकर चलते हैं, गाड़ी भी धीरे चलाते हैं, कई बार देखा हमने।" ऐसे लोग तो शर्मा जी से जलन रखते हैं कि "शर्मा साहब इतना धीरे क्यों चलते हैं, कभी टाँग  -वांग क्यों नहीं तुड्वाते ताकि हमें भी समाचार लेने का मौका मिले।" बहुत दिनों से सोच रहे थे कि शर्मा जी से मिलने का मौका कब मिलेगा, असल में उन्हें अपने बेटे की नई जॉइनिंग के बारे में सलाह लेनी थी। और देखो, आज मौका मिल गया। एक पंथ दो काज ।

शर्मा जी शुरू करते हैं, लेकिन समाचार लेने वालों का ध्यान नाश्ते में परोसे गए समोसों पर चला जाता है। सोचते हैं, "सुनाएँ या नहीं?" लेकिन मन को तसल्ली देते हैं, "अरे समोसे तो मुँह से खा रहे हैं न, कान थोड़े ही व्यस्त हैं, सुन तो रहे हैं न।"

लो, उन्होंने समोसा आधा खत्म करके प्लेट में रख दिया, अब पूछ भी रहे हैं, "तो शर्मा जी, कैसे हुआ एक्सीडेंट?"

शर्मा जी कहने वाले होते हैं, "बहुत दिनों से टाँग में खुजली चल रही थी, एक्सीडेंट से मिलने की खुजली ।रोजाना रास्ते में एक्सीडेंट मिलता ..पूछता ‘शर्मा जी अब तो हो जाने दो न..देखो आपकी टाँग  भी मिलना चाह रहे है मुझ से .. ‘फिर एक दिन, तरस खाकर मैंने कह दिया - हो जाओ भाई । बस हो गया।"

 जब वे आएँगे और प्लास्टर को देखेंगे तो कहेंगे, "अरे शर्मा जी, कितने दिन का कहा है डॉक्टर ने?"  

आप कहेंगे, "जी, 20 दिन का।"  

तुरंत कोई बोलेगा, "नहीं-नहीं, कम से कम 6 हफ्ते रखवाइए शर्मा जी। डॉक्टर को कहिए 20 दिन के बाद और 20 दिन बढ़ा दे। अब टाँग   बार-बार तो टूटती नहीं, आराम दीजिए टाँग   को।"

कुछ लोग सलाह देंगे, "यार, आपको डॉ. रस्तोगी को दिखाना चाहिए था, वो सही में टाँग  जोड़ते हैं। हमारे साले  साहब की टाँग   जोड़ दी थी और जुड़ने के बाद लगा ही नहीं कि पहले टूटी थी।" स्साला एक्सीडेंट  भी कन्फुज ..यार ये टाँग   अभी तक टूटी क्यों नहीं..नया माल लग रहा है बिलकुल..फ्रेश।

 शर्मा जी सोचेंगे, "अगली बार जब टूटेगी तो डॉ. रस्तोगी को भी अजमा लेंगे।" 

फिर कोई पूछेगा, "वैसे हुआ क्या था?"  

आप कहेंगे, "जी, टाँग   टूट गई है।"  

"किसने बताया?"  

"डॉक्टर ने।"  

"अरे किस डॉक्टर को दिखाया?"  

"डॉ. गर्ग साहब को।"

ये वो लोग है जो बाल की खाल निकलने को आतुर..इन्हें लगता है ये सब सहानुभूति बटोरने के बहाने हैं, हम समाचार लेने वालों को नाहक परेशान  किया जा रहा है..अब कुछ लोग अप्र्त्यक्ष्य रूप से आपके मोटिवे को जानने के लिए अपनी कहानियाँ सुनाने लगेंगे, "वो अपने वर्मा जी हैं न, चुनाव में ड्यूटी लगी थी, छुट्टी नहीं मिल रही थी, तो डॉ. गर्ग ने एक पर्ची बना दी,एक नकली प्लास्टर लगवा दिया  और छुट्टी मिल गई।"

शर्मा जी क्या करें, कहेंगे, "अरे, मेरी तो सच में टूटी है। आप प्रमाण चाहते हैं? ये लीजिए एक्स-रे।" और एक्स-रे उल्टा पकड़कर देखने वाले कहेंगे, "अरे डॉक्टर ने फ्रैक्चर कहाँ से निकाल दिया? हमें तो कहीं कोई फ्रैक्चर नजर नहीं आ रहा। "

तब शर्मा जी अपनी आखिरी गवाही के लिए अपनी पत्नी को बुलाएँगे, "जरा बताओ न, कैसे हुआ?" पत्नी कहेंगी, "भाई साहब! स्कूटी पर जा रहे थे, गड्ढे तो आपको पता ही हैं सड़कों पर। दोनों गिरे और टाँग  नीचे आ गई स्कूटी के।"

फिर प्लास्टर के रंग-रूप और शेप का मुआयना करेंगे। सलाह देंगे, "फाइबर लगवाते, महंगा है पर अच्छा दिखता है।" कुछ लोग अपने पेन-पेंसिल से आपके प्लास्टर पर शुभकामनाएँ लिखकर या अपने ऑटोग्राफ देकर भी जाएँगे, जैसे यह अतिथि बुक हो और वो अजायबघर में आये हैं,आपकी प्लास्टर वाली टाँग   को देखने । 

कुछ सलाहकार देसी इलाज़ भी सुझाएँगे। कोई गाय का मूत्र, कोई बकरी का दूध, तो कोई सूअर का घी, और कहेंगे कि लगाओ, फायदा होगा। शर्मा जी को ऐसा लगने लगेगा कि टाँग   पर जितना प्लास्टर का चूना  नहीं लगा, उससे ज्यादा सलाह का चूना  चढ़ रहा है।

रिश्तेदार सब्जी-फल भी लेकर आएँगे, "भाई साहब, क्या हो गया महंगाई को ..सेब देखो तो 200 रुपए किलो हैं और वो भी सड़े हुए, मजबूरी में केले लेकर आ गए।" 

शर्मा जी उनके केले की थैली के बोझ टेतले दबे जा रहे हैं..अरे इसकी क्या जरूरत थी भाईसाहब... इस भार को थोडा हल्का करने के लिए शर्मा जी कहेंगे , "सुनो, चाय बना दो न। 

रिश्तेदार...”हें हें ..अरे भावी जी को क्यों परेशान करते हैं..चलो बना ही रहे हैं तो फीकी ही बनाना, तुम्हें पता है डायबिटीज हो गई है,अरे हाँ आपको सुगर तो नहीं है ?" 

शर्मा जी कहेंगे, "चेक नहीं कराई।" 

इस पर एक और सुझाव मिलेगा, "अब तो शुगर चेक करवानी पड़ेगी। कई के पैर सड़ गए हैं प्लास्टर के बाद।"फिर उनके पास किस्सों की भरमार है ,प्लास्टर की बीभत्स रस से भरी हुई स्टोरी के..किसी का प्लास्टर टाइट होने से,किसी के सुगर होने से न जाने कितनी टाँगे सडकर कट चुकी हैं ।

शर्मा जी प्लास्टर प्रकरण  की इन डरावनी कहानियों को सुनकर थरथर काँप रहे हैं 

कुछ लोग तो यही चाहेंगे कि जल्दी ठीक न हों। "भाई साहब, प्लास्टर खुलने के बाद भी हल्के काम करना, और दूसरी टाँग  का भी ख्याल रखना। ये एक बार टूटे तो दूसरी को जलन होने लगती है।" कुछ लोग बार-बार आएँगे, क्योंकि आप मजबूर हैं, टूटी टाँग  के साथ पड़े हैं। अब आप बहाना भी नहीं कर सकते कि घर पर नहीं हैं, आखिर टाँग  टूटी है, कोई मजाक थोड़े ही।


रचनाकार के बारे मेंः निवासः  गंगापुर सिटी, राजस्थान , पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ, लेखन रुचि: कविताएँ, संस्मरण, लेख, व्यंग्य, देश विदेश के दैनिकी,साप्ताहिक पत्र- पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएँ प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तक "नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक" (किताबगंज प्रकाशन से ), प्रकाशनाधीन -गिरने में क्या हर्ज है  -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) Mail ID –drmukeshaseemit@gmail.com

कविताः खामोशी

  - अनिता मण्डा

न डोर टूटती है

न पतंग उड़ती है

 

शौक था फूलों का ख़ुशबुओं का

हाथ जख़्मी हैं 

दिल के घावों से चू रहा है ख़ून

 

सन्नाटों से भरे अँधेरे जंगलों में 

बिनाई ढूँढती रही जुगनू

 

ख़ामोशी की चादर 

रात के काले आसमान सी तनी 

आँखें देर तक खोजती रही 

तारों के फूल

 

बहुत कुछ कहना था

मन में छटपटाता रहा

अँधेरे कुँओं के भीतर टकराते 

चमगादड़ों-सा

एक लफ्ज़ भी 

होठों की सीमा न लाँघ पाया

 

दरिया से बाहर जाने की बेचैनी में

लहरें सिर पटकती रहीं किनारों पर

साँसें उथली होतीं

फिर चल पड़तीं

 

वक़्त के कबूतर का गला

बिल्ली के नुकीले दाँतों में फँसा है

 

कितने ही उम्मीदों के पेड़ बोएँ

हवा का ज़हर कम ही नहीं हो रहा

कितने ही दुआओं के फूल खिलें

बारूद है कि सुलगता ही जाता है

 

कोई जादू का पानी नहीं 

कि आग बुझा दूँ

कोई जादू का मंत्र भी तो नहीं  

कि बाँच दो 

सो जाएँ सारी बेचैनियाँ

 

आँधियों के बीच 

यूँ ही जलाए रखना है मुझे

अपना दीप

ख़ामोशी से।