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May 1, 2026

आलेखः प्रेम शब्द का घटता अर्थ और भाषा की जिम्मेदारी

  - हिना श्रीवास्तव

कुछ शब्द ऐसे होते हैं, जिनका अर्थ केवल शब्दकोश तक सीमित नहीं होता; बल्कि वे हमारी संवेदनाओं और सामाजिक मर्यादाओं से गहराई से जुड़े होते हैं। ऐसे शब्दों का प्रयोग यदि बिना सोचे-समझे या गलत सामान्यीकरण के साथ किया जाने लगे, तो धीरे-धीरे उनका वास्तविक अर्थ धूमिल होने लगता है। जब किसी गहरे और गरिमामय शब्द को हर प्रकार की स्थिति के लिए प्रयोग किया जाने लगे, तब उसका मूल अर्थ कमजोर पड़ने लगता है।

‘प्रेम’ भी ऐसा ही एक शब्द है। यह केवल एक भावना नहीं; बल्कि मनुष्य की संवेदनशीलता और विश्वास का प्रतीक है। आजकल जब इस शब्द का प्रयोग असंतुलित या अनैतिक संबंधों के लिए होते हुए देखती हूँ, तो मेरे भीतर गहरी पीड़ा और कुंठा उत्पन्न होती है।

हाल के वर्षों में हमने अनेक ऐसी घटनाएँ देखी हैं, जिनमें अनैतिक या अवैध संबंधों के कारण रिश्ते तार-तार हुए हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो समाज में ऐसे असंतुलित संबंधों की एक बाढ़-सी आ गई हो।

समाज की नैतिक संरचना को झकझोर देने वाली घटनाएँ समय-समय पर सामने आती रहती हैं—जैसे किसी स्त्री का अपनी ही बेटी के होने वाले पति के साथ विवाह कर लेना, या किसी नवविवाहिता का अपने किसी परिचित के साथ मिलकर अपने ही पति की हत्या कर देना। इस प्रकार की घटनाएँ केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं होतीं; बल्कि समाज के मूल्यों और नैतिक आधारों पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।

स्पष्ट है कि ऐसे संबंध प्रायः प्रेम नहीं, बल्कि क्षणिक आकर्षण और वासना से प्रेरित होते हैं। परंतु विडंबना यह है कि समाचार पत्रों, पुलिस तथा जनप्रतिनिधियों द्वारा साधारण भाषा में ऐसे मामलों को अक्सर ‘प्रेम प्रसंग’ कह दिया जाता है। विवाह के इतर चल रहे संबंध, विश्वासघात से जुड़े विवाद, छलपूर्वक बनाए गए रिश्ते—इन सबको एक ही शब्द में समेट दिया जाता है—'प्रेम संबंध’। इस प्रकार की घटनाओं के संदर्भ में हमें गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है कि प्रेम जैसे गहरे और पवित्र शब्द का प्रयोग इस प्रकार नहीं किया जाना चाहिए।

वास्तविकता यह है कि ऐसे मामलों के लिए विवाहेतर संबंध, अवैध संबंध, धोखे से बना संबंध, आपराधिक संबंध या अनैतिक संबंध जैसे शब्द अधिक उपयुक्त हैं। चूँकि भाषा समाज की सोच को प्रभावित करती है; इसलिए जब पुलिस या मीडिया इस प्रकार के विवादित संबंधों को ‘प्रेम प्रसंग’ कहती है, तो समाज की युवा पीढ़ी के मन में प्रेम के बारे में एक विकृत समझ विकसित होने लगती है।

जब ऐसे शब्द समाचारों, ऑडियो-वीडियो और अन्य दृश्य माध्यमों के द्वारा बार-बार किशोर-किशोरियों के सामने आते हैं, तो उनका प्रभाव उनके मन पर गहरा पड़ता है। इससे उनके भीतर यह धारणा बनने लगती है कि किसी भी प्रकार का आकर्षण या केवल शारीरिक निकटता ही प्रेम है, जबकि वास्तविकता यह है कि प्रेम एक अत्यंत गहरी और जिम्मेदारी वाली भावना है।

भारतीय परंपरा में प्रेम को अत्यंत ऊँचा और पवित्र भाव माना गया है। यह केवल आकर्षण नहीं; बल्कि सम्मान, विश्वास और समर्पण की भावना है। सच्चे प्रेम में दूसरे व्यक्ति की गरिमा सुरक्षित रहती है और संबंध ईमानदारी से निभाए जाते हैं।

सच्चा प्रेम किसी भी परिस्थिति में दूसरे के अहित की कामना नहीं कर सकता—केवल अपने प्रिय के लिए ही नहीं, अपितु प्रत्येक व्यक्ति के प्रति उसके मन में संरक्षण और कल्याण की भावना ही निहित रहती है।

अतः पुलिस, प्रशासन और मीडिया—जिनकी भाषा सीधे समाज तक पहुँचती है—उन्हें ऐसे मामलों में शब्दों का अधिक सावधानी से प्रयोग करना चाहिए। घटनाओं को उनके वास्तविक स्वरूप में प्रस्तुत करना न केवल सच्चाई को स्पष्ट करता है; बल्कि समाज में सही समझ भी विकसित करता है।

इसलिए आवश्यक है कि हम प्रेम जैसे गहरे और पवित्र शब्द की गरिमा को समझें और उसे हर प्रकार के संबंध का सामान्य नाम बनने से बचाएँ।

प्रेम शब्द केवल किसी संबंध का नाम नहीं है, बल्कि मनुष्य की संवेदनशीलता, उसके मानवीय मूल्यों का प्रतीक एवं उसके जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है।

-जयपुर,राजस्थान

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