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Aug 1, 2024

आलेखः आज़ादी की जंग में कूदी नारी-शक्ति

झलकारी बाई
  - रमेशराज

अंग्रेजी शासन से मुक्त होने के लिए, दासता की बेडि़यों को तोड़ने में केवल राष्ट्रभक्त क्रान्तिवीरों ने ही अपने प्राणों की आहुति नहीं दी, बल्कि गुलाम भारत में ऐसी अनेक वीरांगनाएँ भी जन्मीं, जिनके मन को क्रान्ति की ज्वाला ने तप्त किया। जरूरत पड़ने पर सौन्दर्य की देवी नारियों ने भी रणचण्डी का रूप धारण किया। अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने, उन्हें लोहे के चने चबवाने में विशेषकर दो वीरांगनाओं रानी लक्ष्मीबाई और बेगम हजरत महल के नाम से तो सब परिचित हैं। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि अंग्रेज अफसरों के यहाँ काम करने वाली लाजो के द्वारा ही मंगल पांडे तक चर्बी के कारतूसों की जानकारी पहुँची थी। मुगल सम्राट बहादुर शाह की बेगम जीनतमहल ने दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ने के लिये अनेक योद्धाओं को संगठित किया था। चिनहट की लड़ाई में शहीद हुए पति का प्रतिशोध लेने वाली वीरांगना ऊदा देवी ने पीपल के पेड़ की घनी शाखों में छुपकर अपने तीरों से 32 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया और बाद में वीरगति को प्राप्त हुई।

अवन्ती बाई

तुलसीपुर रियासत की रानी राजेश्वरी ने होम ग्राण्ट के सैनिक दस्ते को जमकर टक्कर दी। अवध की बेगम आलिया ने अपनी लड़ाकू महिला फौज के साथ एक नहीं कई बार ब्रिटिश सैनिकों को अवध से बाहर खदेड़ा। ठकुराइन सन्नाथ कोइर और मनियापुर की सोगरा बीबी ने विद्रोही नेता नाजिम और मेंहदी हसन को जांबाज सैनिक, तोपें और धन देकर क्रान्तिकारियों की सहायता और हौसला अफजाई की।

झाँसी की रानी के ‘दुर्गा-दल’ की कुशल नेतृत्व देने वाली  झलकारी बाई झाँसी के किले से अदम्य साहस के साथ लड़ी। मध्य प्रदेश के रामगढ़ की रानी अवन्तीबाई ने अंग्रेजों से जमकर युद्ध किया और घिरने पर स्वयं को खत्म कर लिया।

मध्य प्रदेश के जैतपुर और तेजपुर की रानियों ने दतिया के क्रान्तिकारियों के साथ अंग्रेजी फौज पर हमला किया।

जीनत महल
मुजफ्फरपुर की महावीरी देवी ने 22 महिलाओं के साथ अंग्रेजों को टक्कर दी। अनूपशहर की चौहान रानी ने घोड़े पर सवार हो, तलवार लेकर अनेक ब्रिटिश सैनिकों को मौत के घाट उतारते हुए यूनियन जैक को उतारकर थाने पर राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया।

स्वामी श्रद्धानंद की पुत्री वेदकुमारी, आज्ञावती और सत्यवती के स्वाधीनता संघर्ष को भी भुलाया नहीं जा सकता है। कोल आन्दोलन, टाना आन्दोलन में आदिवासी जनजातियों की महिलाओं ने फरसा-बलुआ से अंग्रेजों के सर कलम किए।

चटगाँव विद्रोह की क्रान्तिकारी महिला प्रीतिलता वाडेयर ने एक यूरोपीय क्लब पर हमला किया और गिरफ्तार होने के डर से आत्महत्या कर ली। 1931 में स्कूल की दो छात्रा शांति घोष और सुनीता चौधरी ने जिला कलेक्टर को गोली मार दी। बीना दास ने कलकत्ता विश्व विद्यालय के दीक्षांत समारोह में गवर्नर को गोली मारकर ‘हिन्दुस्तान आजाद होकर रहेगा’, यह संदेश पूरे देश को दिया। बंगाल की ही सुहासिनी अली और रेणुसेन की क्रान्तिकारी गतिविधियों को देखकर अंग्रेज मन ही मन भयभीत हुए।

अजीजन बाई
दुर्गाभाभी के नाम से प्रसिद्ध वीरांगना ने हर प्रकार क्रान्तिकारियों का सहयोग तो किया ही, बम्बई के गवर्नर हेली को मारने के लिये गोली भी चलाई, जिसमें हेली के स्थान पर टेलर नामक  एक अंग्रेज अफसर घायल हो गया। क्रान्तिकारी आन्दोलन में सुशीला देवी की भूमिका भी; इसलिए अविस्मरणीय है; क्योंकि इन्होंने काकोरी कांड के कैद क्रान्तिकारियों के मुकदमे की पैरवी के लिए 10 तोला सोना तो दिया ही, ‘मेवाड़पति’ नामक नाटक खेलकर क्रान्तिकारियों की सहायतार्थ धन इकट्ठा किया। तिलक के गरमदल में शामिल वीरांगना हसरत मोहनी की त्याग गाथा को भी कैसे भुलाया जा सकता है, जिन्होंने आजादी की खातिर जेल में चक्की पीसी।
मस्तानी बाई

सुभाष चन्द्रबोस की आजाद हिन्द फौज की रेजिमेंट की कमाण्डिग ऑफीसर कैप्टन लक्ष्मी सहगल की आजादी की लड़ाई जितनी गौरवशाली है, भारतीय मूल की फ्रांसीसी नागरिक मैडम भीकाजी कामा को भी कैसे भुलाया जा सकता है जिन्होंने ब्रिटिश शासन को मानवता पर कलंक बताते हुए अन्तरराष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस कान्फ्रेंस में भारतीय ध्वज फहराया। कलकत्ता विश्व विद्यालय के दीक्षांत समारोह में वायसराय लार्ड कर्जन के अपमानजनक शब्दों का खुले मुखर होकर प्रतिकार करने वाली भगिनी निवेदिता की निर्भीकता भी वन्दनयोग्य है।

 भीकाजी कामा
इन वीरांगनाओं के अतिरिक्त भी ऐसी अनेक वीरांगनाएँ इस माटी ने पैदा की हैं जिनमें अदम्य साहस, अनन्य राष्ट्रप्रेम हिलोरें मारता था। वीरांगनाओं के इस गौरवमय योगदान और बलिदान की गाथा में कई ऐसी वीरांगानाओं का नाम भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है जो पेशे से वेश्याएँ अवश्य थीं; लेकिन जब देश पर मर-मिटने का समय आया तो वे भी किसी से पीछे नहीं रहीं। लखनऊ की तवायफ हैदरीबाई ऐसी ही एक वीरांगना थी, जो रहीमी दल की सैनिक बनकर क्रान्तिकारियों के खिलाफ बनने वाली योजनाओं की जानकारी अंग्रेजों से घुलमिल कर जुटाती और क्रान्तिकारियों तक पहुँचाती थी। इसी पेशे से जुड़ी कानपुर की एक और क्रान्ति-नायिका अजीजन बाई ने तो क्रान्तिकारियों से प्रेरणा पाकर 400 वेश्याओं की एक ऐसी टोली बनाई थी, जो मर्दाने वेश में रहती थी और क्रांतिकारियों की मदद करती थी। 125 अंग्रेज महिलाओं और उनके बच्चों की रखवाली का कार्य अजीजनबाई की टोली के ही जिम्मे था। इसी कारण इस टोली को आसानी से अंग्रेजों की योजनाओं की गुप्त सूचनाएँ प्राप्त हो जातीं, जिन्हें वे क्रांतिकारियों तक पहुँचा देतीं। बिठूर के संग्राम में पराजित होने के बाद जब नाना साहब और तात्याटोपे पलायन कर गए, तो अजीजन बाई को गिरफ्तार कर जब अंग्रेज अफसर हैवलाक के समक्ष प्रस्तुत किया, तो उसने मृत्युदंड का आदेश दे दिया । इस प्रकार यह वीरांगना भी वीरगति को प्राप्त हुई। ठीक इसी तरह का कार्य नाना साहब की मुँहबोली बहिन तवायफ मैनावती और मस्तानी बाई करती थीं। इन दोनों को भी षड्यंत्र के आरोप में अंग्रेजों ने आग के हवाले कर दिया। u

सम्पर्कः 15/109 ईसा नगर थाना सासनी गेट अलीगढ़, मोबा- 817145588

Aug 1, 2023

आलेखः आजादी की जंग में यूँ कूदा पंजाब

- रमेशराज

गुलामी की जंजीरों में जकड़े हिन्दुस्तान को आजाद कराने में अपने प्राणों को संकट में डालकर लड़ने वाले रणबाँकुरों में एक तरफ जहां पं. चन्द्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खान, गणेश शंकर विद्यार्थी, गेंदालाल दीक्षित, पं. रामप्रसाद बिस्मिल, सूर्यसेन, सुभाष चन्द्र बोस, तिलक, विपिन चन्द्र पाल, खुदीराम बोस, रानी लक्ष्मीबाई, मंगल पाण्डेय, बेगम हसरत महल आदि का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अंकित है, वही पंजाब की माटी ने भी ऐसे एक नहीं अनेक सपूतों को जन्म दिया है जिन्होंने अंग्रेजों के साम्राज्य को ढाने में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।

देखा जाय तो अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठाने वालों में सिखों का नाम ही सबसे पहले आता है। भले ही सिखों के आंदोलन धार्मिक रंग लिये होते थे, किन्तु इन्हीं आयोजनों से अंग्रेजों की नींद हराम होती थी। 13 अप्रैल 1919 बैसाखी के दिन गुरु गोविंद सिंह के अमृतपान की स्मृति से जुड़ा पवित्र दिन आजादी के इतिहास में ऐसा ही धार्मिक उत्सव था। उस दिन जलियांवाला बाग में मनाये गये उत्सव के समय अंग्रेजों की गोलियों से 309 देशभक्तों को सदा-सदा के लिये विदा कर दिया। जलियाँवाला कांड के शहीदों में सर्वाधिक सिख ही थे।

उस समय ऐसा कोई राष्ट्रीय आंदोलन नहीं था जिसमें सिखों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा न लिया हो। स्वदेशी, खिलाफत, बंग-भंग, भारत छोड़ो आंदोलनों के दौरान सिखों ने अपने प्राण संकट में डाले, जेलों में सड़े, तरह-तरह की यातनाएँ झेलीं।

 आजादी की लड़ाई में सिखों का योगदान सन् 1863 से शुरू होता है। सिखों ने भाई रामसिंह के नेतृत्व में ‘कूका’ आंदोलन प्रारम्भ किया। ‘कूका’ सम्प्रदाय के लोग स्वदेशी के पक्षधर थे। यह एक अर्धसैनिक संगठन था जिसमें अस्त्र-शस्त्र चलाने की बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती थी।

ये लोग खादी पहनते और सादा जीवन व्यतीत करते थे। अंग्रेजी संस्कृति के कट्टरविरोधी इन ‘कूका’ सम्प्रदाय के लोगों ने जब अंग्रेजों की नीतियों का विरोध किया तो इनकी भिडंत गोरों की फौज से हो गयी। अंग्रेजों ने 66 कूकों को लुधियाना और 12 को मलेर कोटला में तोपों से बांधकर उड़ा दिया। इनके नेता रामसिंह को गिरफ्तार कर वर्मा भेज दिया | जहां वे अपनी मातृभूमि के लिए तड़पते हुए 1895 में स्वर्ग सिधार गये।

‘पंजाब  कॉलोनाइजेशन एक्ट- 1907’ के विरुद्ध सिखों ने जिस प्रकार प्रर्दशन किया, वह भी इतिहास में एक मिसाल है। इस आंदोलन के दौरान ही बांकेदयाल नामक क्रांतिकारी ने प्रसिद्ध पंजाबी गीत ‘पगड़ी संभाल जट्टा, पगड़ी संभाल ओये’ लिखा था। इस गीत को सरदार अजीत सिंह, लाला लाजपतराय, स्वामी श्रद्धानंद और बाद में सरदार भगत सिंह की टोली बड़े जोश भरे अंदाज में गाती थी। पंजाब कॉलोनाइजेशन एक्ट- 1907 के विरुद्ध आंदोलन छेड़ने वाले शीर्ष नेता थे सरदार अजीत सिंह और लाला लाजपतराय, जिन्हें सरकार ने गिरफ्रतार कर माडले जेल में लम्बे समय तक रखा।

‘जलियाँवाला बाग’ के क्रूर हत्यारों के अफसर और ‘साइमन कमीशन’ का विरोध करते समय लाठीचार्ज का आदेश  देकर लाला लाजपतराय की मौत का कारण बने सांडर्स से बदला लेने वाले ऊधम सिंह और भगत सिंह का नाम भी स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है।

लाला हरदयाल की प्रेरणा से सोहन सिंह भकना ने अंग्रेजों की सत्ता को नेस्तनाबूत करने के लिए ‘गदर पार्टी’ का गठन किया। गदर पार्टी के पंजाबी रणबांकुरे करतार सिंह, बलवंत सिंह, भाई भाग सिंह, भाई वतन सिंह, लाला हरदयाल, बाबा सोहन सिंह, बाबा केसर सिंह, बाबा पृथ्वी सिंह, बाबा करम सिंह, बाबा बसाखा सिंह, भाई संतोख सिंह, दलीप सिंह, मेवा सिंह जैसे अनेक सिख जाँबाजों ने अमेरिका में रहते हुये भारत माता को आजाद कराने के लिये अंग्रेजों के विरुद्ध अलख जगा कर अपनी जान की बाजी लगाई। उन दिनों गदर पार्टी अमेरिका के अलावा शंघाई, हांगकांग, फिलीपींस तक फैली हुई थी। गदर पार्टी सशस्त्र क्रांति में विश्वास रखती थी। शुरू में इसका नाम ‘हिन्दी एसोशिएसन’ रखा गया। बाद में यह गदर पार्टी में तब्दील हो गई। इस पार्टी ने अपने संघ का दफ्तर ‘युगांतर आश्रम’ के नाम से खोलकर ‘गदर’ नामक अखबार निकालने के लिए ‘गदर प्रेस’ की स्थापना की। ‘गदर’ अखबार ने पूरी दुनिया में अत्याचार, शोषण, साम्राज्यवाद के विरुद्ध गदर मचा दिया। इस पार्टी के अधिकांश जांबाज या तो गोलियों से भून दिये गये या फांसी पर लटका दिये गये।

गदर पार्टी से गोरी सरकार को कितना खतरा बन चुका था, इस बारे में तत्कालीन पंजाब के गवर्नर माइकल ओडायर लिखते हैं- ‘‘ हिन्दुस्तान में केवल तेरह हजार गोरी फौज थी जिसकी नुमाइश सारे हिन्दुस्तान में करके सरकार के रौब को कायम करने की चेष्टा की जा रही थी। ये भी बूढ़े थे। यदि ऐसी अवस्था में सैनफ्रैन्सिको से चलने वाले ‘गदर पार्टी के सिपाहियों की आवाज मुल्क तक पहुँच  जाती तो निश्चत है कि हिन्दुस्तान अंग्रेजों के हाथ से निकल जाता। ’’ ■■

सम्पर्कः  15/109, ईसानगर अलीगढ़ , मो. नं, -8171455889

Mar 1, 2023

होली पर विशेषः रंगों की बौछार का आनंद

 - रमेशराज

होली शरारत, नटखटपन, मनोविनोद, व्यंग्य-व्यंजना, हँसी-ठट्ठा, मजाक-ठिठोली, अबीर, रंग, रोली से भरा हुआ एक ऐसा त्योहार है जो रंगों की बौछार के मध्य अद्भुत आनंद प्रदान करता है। कुमकुम और गुलाल से रंगे हुए गाल गवाही देते हैं कि हर तरफ मस्ती ही मस्ती है। बूढ़े या जवान सबके अधरों पर बस एक ही तान-‘होली है भई होली है।’

 इस त्योहार से पन्द्रह दिन पूर्व और पन्द्रह दिन बाद तक हर कोई अद्भुत आनंद से भरा हुआ बस एक ही टेर लगाता है-‘होली खेल री गुजरिया, डालूँ में रंग या ही ठाँव री!’

 होली खेलने वाली हुरियारिन होली खेलते हुए मादक चितवन के वाणों के प्रहार सहते हुए कहती है-‘मति मारै दृगन के तीर, होरी में मेरे लगि जाएगी।’

 होली पर इतनी मस्ती क्यों छाती है? इसका सीधा-सीधा सम्बन्ध शीतलहर की ठिठुरन के बाद रोम-रोम को गुनगुनी सिहरन प्रदान करने वाले बदले हुए मौसम से होने के साथ-साथ किसान की पकी हुई फसल से भी है।

 इस पर्व का प्राचीन नाम ‘वांसती नव सस्येष्टि है अर्थात् वसंत ऋतु के नये अनाज से किया हुआ यज्ञ। तिनके की अग्नि में भुने हुए [अधपके ] शमोधान्य [ फली वाले अन्न ] को होलक कहते हैं। होली होलक का अपभ्रंश हैं।

 पौराणिक मतानुसार होलिका हिरण्यकशिपु

 नामक दैत्य की बहन थी। उसे वरदान था कि वह आग में नहीं जलेगी। हिरण्यकशिपु का एक पुत्र प्रह्लाद विष्णु का उपासक था। प्रह्लाद कहता था - ‘कथं पाखण्ड माश्रित्य पूजयामि च शंकरम।’ अर्थात् मैं पाखण्ड का सहारा लेकर शंकर की पूजा क्यों करूँ ? मैं तो विष्णु की पूजा करूँगा।’’

 हरिणकश्यपु ने प्रह्लाद की इस विष्णु-भक्ति से कुपित होकर एक दिन अपनी बहिन होलिका से प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठने को कहा। होलिका ने ऐसा ही किया। विष्णु की कृपा से होलिका तो अग्नि में जलकर भस्म हो गयी किन्तु प्रह्लाद बच गया।

 उक्त पौराणिक कथा से इतर यदि हम इस त्योहार के प्रचलन पर विचार करें तो किसी भी प्रकार के अन्न की ऊपरी परत को होलिका कहा जाता है और उसी अन्न की भीतरी परत (गिद्दी) को प्रह्लाद बोलते हैं | होलिका को माता इसलिए माना जाता है; क्योंकि वह इसी गिद्दी (गूदा) की रक्षा करती है। यदि यह परत न हो तो चना, मटर, जौ आदि का विकास नहीं हो सकता। जब हम गेहूँ-जौ आदि को भूनते हैं तो उसके ऊपर की परत अर्थात् होलिका जल जाती है और गिद्दी अर्थात् प्रह्लाद बचा रहता है। अधजले अन्न को होलिका कहा जाता है। सम्भवतः इसी कारण इस पर्व का नाम होलिकोत्सव है।

 होलिकोत्सव फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। होली वाले दिन घर-घर भैरोजी और हनुमान की पूजा होती है। पकवान, मिष्ठान, नमकीन सेब, गुजिया, टिकिया आदि स्वादिष्ट व्यंजन तैयार किए जाते हैं। छोटी होली वाले दिन शाम को घर में तथा सार्वजनिक स्थल पर रखी होली की पूजा सूत पिरोकर और फेरे लगाकर की जाती है। रात्रि बेला में होली में आग लगाकर लोग कच्ची गेहूँ और जौ की बालियाँ भूनते हैं और भुनी हुई बालियों को एक दूसरे को भेंट कर गले मिलते हैं। ज्यों-ज्यों रात्रि ढलती है और बाद में सूरज अपनी गर्मी बिखेरता है, यह सारा मिलने-मिलाने का कार्यक्रम एक-दूसरे को रंगों  से सराबोर करने में तब्दील हो जाता है। पुरुष, नारियों पर पिचकारियों और बाल्टियों से रंग उलीचते हैं, नारियाँ पुरुषों पर डंडों की बौछार करती हैं। होली का पर्व हर हृदय पर प्यार की बौछार करता है। यह त्योहार वर्ण-जाति, ऊँच-नीच के भेद मिटाने वाला ऐसा पर्व है जिसमें हर कोई भाईचारे एवं आपसी प्रेम से आर्द्र होता है।

सम्पर्कः15/109, ईसानगर, अलीगढ़ , मो. 8171455889

Dec 6, 2020

ग़ज़ल- अधूरा रह गया

- रमेशराज

 

पत्थरों ने मोम खुद को औ’ कहा पत्थर हमें 

प्रेम में जज़्बात के कैसे मिले उत्तर हमें।

 

आप कहते और क्या जब आपने डस ही लिया

अन्ततः कह ही दिया अब आपने विषधर हमें।

 

इस धुँए का, इस घुटन का कम सताता डर हमें 

तू पलक थी और रखती आँख में ढककर हमें।

 

साँस के एहसास से छूते कभी तुम गन्ध को 

आपने खारिज किया है आँख से प्रियवर हमें।

 

आब का हर ख्वाब जीवन में अधूरा रह गया

देखने अब भी घने नित प्यास के मंजर हमें।


 सम्पर्कः ईशानगर , अलीगढ़, 

 E-mail : rameshraj5452@gmail.com

Sep 10, 2020

मुक्तछंद कविता


परकटा परिन्दा

- रमेशराज

आज फिर
लटका हुआ था
पत्नी का चेहरा
फटी हुई धोती
और पेटीकोट की शिकायत के साथ।

आज फिर
बिन चूडिय़ों के
सूने-सूने दिख रहे थे
पत्नी के हाथ।

मैंने उसका आदमी
होने का सबूत देना चाहा
सारा इल्जाम
अपने सर लेना चाहा,
मैं बाजार गया और
अपनी अँगूठी बेचकर
धोती-चूड़ी
और पेटीकोट खरीद लाया।
इसके बाद
मैं हफ्तों मुसका नहीं पाया।

आज फिर लटका हुआ था
मेरे बेटे का चेहरा
कॉपी, पेंसिल, किताब
और स्कूल फीस की
शिकायत के साथ,
आज फिर वह
पहले की तरह
कर नहीं रहा था
हंस-हंस कर बात।

मैंने उसे बाप होने का
सबूत देने चाहा
मैं लाला रामदीन के
घर पर गया
और अपनी घड़ी
गिरवी रख आया।
फिर बाजार से
कॉपी, किताब खरीद लाया,
स्कूल फीस चुका आया।

बच्चे ने पूछा मुझ से
घड़ी के बारे में,
पत्नी ने पूछा मुझ से
अँगूठी के बारे में।
मैंने आदमी और बाप
दोनों का एक साथ
सबूत देना चाहा।
उत्तर में
मेरे होठों पर
एक अम्ल-घुली मुस्कराहट थी
गले में
परकटे परिन्दे जैसी
चहचहाचट थी।

Nov 13, 2019

पेड़ आदमी से बोले


पेड़ आ

-रमेशराज

हम फल-फूल दिया करते हैं 
खूशबू से उपवन भरते हैं
खाद मिले सबके खेतों को
इस कारण पत्ते झरते हैं,
तू पाता जब हमसे औषधि
लिये कुल्हाड़ी क्यों डोले
पेड़ आदमी से बोले।

कल तू बेहद पछताएगा
हमको काट न कुछ पाएगा
हम बिन जब वर्षा कम होगी
भू पर मरुथल बढ़ जाएगा
फिर न मिटेगा रे जल-संकट
तू चाहे जितना रोले
पेड़ आदमी से बोले।

कीमत कुछ तो आँक हमारी
हमें चीरती है यदि आरी
कौन प्रदूषण तब रोकेगा ?
प्राणवायु खत्म हो सारी
क्या कर डाला, कल सोचेगा
अब चाहे हमको खो ले
पेड़ आदमी से बोले।

सम्पर्कः ईसा नगर अ, अलीगढ़

Oct 24, 2017

भोर कहाँ है

 भोर कहाँ है  
– रमेशराज

1.कैसे मंज़र?

जुबाँ हमारी
तरल नहीं अब
कैसे मंज़र?

प्यारी बातें
सरल नहीं अब
कैसे मंज़र?

अहंकार के
बोल अधर पर
नये वार के,
हमथे भूले
पाठ सुलह के
सदाचार के ।

सच की बातें
सफल नहीं अब
कैसे मंज़र?

2. बुरा हाल है

ये मलाल है
अब पतझर में
डाल-डाल है।

कली-कली का
इस मुकाम पर
बुरा हाल है।

आज न भौंरा
मधुरस पीकर
विहँसे-झूमे,

अब नटखट-सी
भोली तितली
फूल न चूमे।

कब आएँगे
घन सुख लेकर
यह सवाल है।

3. भोर कहाँ है?

अँधियारे में
अब हर मंज़र
भोर कहाँ है?
मुँह फैलाए
चहुँदिश हैं डर
भोर कहाँ है?
मन अन्जाने
परिचय घायल
हम बेगाने,
प्यासे हैं सब
पनघट के तट
नदी मुहाने।
सम्बन्धों  पर
पसरा अजगर
भोर कहाँ है?

 4. विजन हुए सब

काँकर दूने
प्रेम-डगर पर
पत्थर दूने।

आज घृणा के
अधर -अधर  पै
अक्षर दूने।

कैसा हँसना
बिखर रहा हर
मीठा सपना,

बोल प्रेम के,
मगर हृदय में
अन्तर दूने।

वर्तमान में
गठन-संगठन
नहीं ध्यान में,

घर को पा के
विजन हुए सब
बेघर दूने।



5. किरन सुबह की

हम रातों के
सबल तिमिर के
सर काटेंगे।
हम हैं भइया
किरन सुबह की
सुख बाँटेंगे।।

फँसी नाव को
तट पर लाकर
मानेंगे हम,
झुकें न यारो
मन के नव स्वर
ठानेंगे हम।
काँटे जिस पै
पकड़ डाल वह
अब छाँटेंगे।।

बढें अकेले
अलग-थलग हो
अबकी बारी,
कर आए हैं
महासमर तक
हम तैयारी।
हर पापी को
यह जग सुन ले
अब डाँटेंगे।।
सम्पर्क:15/109, ईसानगर, निकट-थाना सासनीगेट, अलीगढ़ [उ.प्र.] मोबा. 09634551630

Jul 25, 2017

हुए विवश बादल

1. हुए विवश बादल के आगे

– रमेशराज

बड़ा तेज उमड़ा है बादल
गुस्से में निकला है बादल
अब छुपने को जगह टटोलो
खोलो झट से छाता खोलो।

दइया-दइया इतना पानी
बादल करे खूब मनमानी
साँय-साँय चलती पुरवाई
आई कैसी आफत आई।

ऐसे गिरता मोटा ओला
जैसे किसी तोप का गोला
अपनी-अपनी चाँद बचाओ
लोहे के अब टोप लगाओ।

घर से बाहर चलें जरा-सा
बूँदें जड़तीं कड़ा तमाचा
कड़के बिजली अति डर लागे
हुए विवश बादल के आगे।

2. सावन है
मनभावन हरियाली छायी
खेत लगे कितने सुखदायी
कोयल बोले मीठे बोल
सावन आया, सावन आया।

रिमझिम-रिमझिम बादल बरसें
पानी को अब लोग न तरसें
पक्षी करते फिरें किलोल
सावन आया, सावन आया।

कभी इधर से कभी उधर से
घुमड़-घुमड़ बादल के घर से
आए लो बूँदों के टोल
सावन आया, सावन आया।

कहीं फिसल ना जाना भाई
लुढ़कोगे यदि दौड़ लगाई
खोल अरे भई छाता खोल
सावन आया, सावन आया।।

3. रिमझिम रिमझिम
करते हैं आयोजित कोई
जिस दिन भी कवि सम्मेलन बादल।
तो धरती पर ले आते हैं
रिमझिम-रिमझिम सावन बादल।

राम-कथा सुनने वर्षा की
निकलें बच्चे घर से बाहर
जोर-जोर से करें गर्जना
बने हुए तब रावन बादल।

आसमान की छटा निराली
देख-देख मन हरषाता है
साँझ हुए फिर लगें दिखाने
इन्द्रधनुष के कंगन बादल।

एक कहानी वही पुरानी
नरसी-भात भरे ज्यों कान्हा
उसी तरह से खूब लुटाते
फिरते बूँदों का धन बादल।

बड़ी निराली तोपें इनकी
पड़ी किसी को कब दिखलाई
जब ओलों के गोले फेंकें
फेंकें खूब दनादन बादल।

 4. बादल
हौले-हौले, कभी घुमड़कर
काले-भूरे आयें बादल
बच्चों की खातिर लिख देते
बूँदों  की कविताएँ बादल।

बच्चे जब लू में तपते हैं,
सूरज आग उगल जाता है
बच्चों से शीतल छाया की
कहते मधुर कथाएँ बादल।

बच्चों को हैं अच्छे लगते
हरे खेत औ’ फूल खिले
जन्नत-सी सौगातें भू पर
हर सावन में लाएँ बादल।

कंचे-कौड़ी की शक्लों में
भूरे-भूरे प्यारे-प्यारे
कभी-कभी तो ओले अनगिन
बच्चों को दे जाएँ बादल।

सम्पर्क: 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001