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Jun 1, 2022

जलकुंभीः कचरे से कंचन तक की यात्रा


 - डॉ. खुशालसिंह पुरोहित

जलकुंभी गर्म देशों में पाई जाने वाली एक जलीय खरपतवार है। ब्राज़ील मूल का यह पौधा युरोप को छोड़कर सारी दुनिया में पाया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम आइकॉर्निया क्रेसिपस है। खूबसूरत फूलों और पत्तियों के कारण जलकुंभी को सन 1890 में एक ब्रिटिश महिला ने ब्राज़ील से लाकर कलकत्ता के वनस्पति उद्यान में लगाया था। इसका उल्लेख उद्यान की डायरी में है।  भारत की जलवायु इस पौधे के विकास में सहायक सिद्ध हुई।

जलकुंभी पानी में तैरने वाला एवं तेज़ी से बढ़ने वाला पौधा है। यह पौधा भारत में लगभग 4 लाख हैक्टर जल स्रोतों में फैला हुआ है और जलीय खरपतवारों की सूची में इसका स्थान सबसे ऊपर है। इसके उपयोग से जैविक खाद बनाई जा सकती है। जलकुंभी में नाइट्रोजन 2.5 फीसदी, फास्फोरस 0.5 फीसदी, पोटेशियम 5.5 फीसदी और कैल्शियम ऑक्साइड 3 फीसदी होते हैं। इसमें लगभग 42 फीसदी कार्बन होता है, जिसकी वजह से जलकुंभी का इस्तेमाल करने पर मिट्टी के भौतिक गुणों पर अच्छा असर पड़ता है। नाइट्रोजन और पोटेशियम की अच्छी उपस्थिति के कारण जलकुंभी का महत्व और भी ज़्यादा हो जाता है।

भारत में जलकुंभी के कारण जल स्रोतों को होने वाले संकट के कारण इसे ‘बंगाल का आतंक’ भी कहा जाता है। यह एकबीजपत्री, जलीय पौधा है, जो ठहरे हुए पानी में काफी तेज़ी से फैलता है और पानी से ऑक्सीजन को खींच लेता है। इससे जलीय जीवों के लिए संकट पैदा हो जाता है। जल की सतह पर तैरने वाले इस पौधे की पत्तियों के डंठल फूले हुए एवं स्पंजी होते हैं। इसकी गठानों से झुंड में रेशेदार जड़ें निकलती हैं। इसका तना खोखला और छिद्रमय होता है। यह दुनिया के सबसे तेज़ बढ़ने वाले पौधों में से एक है - यह अपनी संख्या को दो सप्ताह में ही दुगना करने की क्षमता रखता है।

जलकुंभी बड़े बांधों में बिजली उत्पादन को प्रभावित करती है। जलकुंभी की उपस्थिति के कारण पानी के वाष्पोत्सर्जन की गति 3 से 8 प्रतिशत तक अधिक हो जाती है, जिससे जल स्तर तेज़ी से कम होने लगता है।

जलकुंभी मुख्यत: बाढ़ के पानी, नदियों और नहरों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर फैलती है। मुख्य पौधे से कई तने निकल आते हैं जो छोटे-छोटे पौधों को जन्म देते हैं तथा बड़े होने पर मुख्य पौधे से टूटकर अलग हो जाते हैं। इसमें प्रजनन की इतनी अधिक क्षमता होती है कि एक पौधा 9-10 महीनों में एक एकड़ पानी के क्षेत्र में फैल जाता है। बीजों द्वारा भी इसका फैलाव होता है। एक-एक पौधे में 5000 तक बीज होते हैं और इसके बीजों में अंकुरण की क्षमता 30 वर्षो तक बनी रहती है।

तालाबों और नहरों की जलकुंभी को श्रमिकों द्वारा निकलवाया जाता है परंतु यह विधि बहुत महंगी है। झीलों और बड़ी नदियों की जलकुंभी को मशीनों द्वारा निकलवाना सस्ता पड़ता है पर थोड़े समय बाद यह फिर से जमने लगती है। कुछ रसायनो द्वारा जलकुंभी का नियंत्रण होता है। महंगी होने के कारण भारत जैसे देश में रासायनिक विधियां कारगर नहीं हो पा रही है। जैविक नियंत्रण विधि में कीट, सूतकृमि, फफूंद, मछली, घोंघे, मकड़ी आदि का उपयोग किया जाता है। यह बहुत सस्ती और कारगर विधि है। इस विधि में पर्यावरण एवं अन्य जीवों एवं वनस्पतियों पर कोई विपरीत प्रभाव भी नहीं पड़ता।

जैविक विधि में जलकुंभी के नियंत्रण में एक बार कीटों द्वारा जलकुंभी नष्ट कर दिए जाने के बाद कीटों की संख्या भी कम हो जाती है। जलकुंभी का घनत्व फिर से बढ़ने लगता है और साथ ही कीटों की संख्या भी। सामान्य तौर पर जलकुंभी को पहली बार नष्ट करने में कीटों द्वारा 2 से 4 साल तक लग जाते हैं, जो कीटों की संख्या पर निर्भर करता है। ऐसे 7-8 चक्रों के बाद जलकुंभी पूरी तरह से नष्ट हो जाती है। पिछले वर्षों में जबलपुर, मणिपुर, बैंगलुरु तथा हैदराबाद समेत कुछ शहरों में जलकुंभी के जैविक नियंत्रण में सफलता मिली है।

जलकुंभी के मूल उत्पत्ति क्षेत्र ब्राज़ील आदि देशों में 70 से भी अधिक प्रजातियों के जीव जलकुंभी का भक्षण करते देखे गए हैं, परंतु मात्र 5-6 प्रजातियों को ही जैविक नियंत्रण के लिए उपयुक्त माना गया है। ऐसी कुछ प्रजातियों ने ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, सूडान आदि देशों में जलकुंभी को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाई है। दूसरे देशों में इन कीटों की सफलता से प्रभावित होकर भारत में भी 3-4 कीटों और एक चिचड़ी की प्रजाति को सन 1982 में फ्लोरिडा और ऑस्ट्रेलिया से बैंगलुरु में आयात किया गया था। भारत सरकार ने नियोकोटीना आइकोर्नीए एवं नियोकोटीना ब्रुकी को वर्ष 1983 एवं ऑर्थोगेलुम्ना टेरेब्रांटिस को वर्ष 1985 में पर्यावरण में छोड़ने की अनुमति दे दी। आज ये कीट भारत में हर प्रदेश में फैल चुके हैं, जहां ये जलकुंभी के जैविक नियंत्रण में मदद कर रहे हैं।

औषधीय गुणों से भरपूर होने और रोग प्रतिरोधी क्षमता पर प्रभाव के चलते कई देशों में जलकुंभी का उपयोग औषधियों में किया जाता है। असाध्य रोगों से बचने के लिए लोग इसका सूप बनाकर सेवन करते हैं। दवाइयों में अपने देश में इसका उपयोग बहुत कम हो रहा है, क्योंकि इस पौधे की विशेषता से अधिकतर लोग अनभिज्ञ हैं। कहा जाता है कि श्वांस, ज्वर, रक्त विकार, मूत्र तथा उदर रोगों में यह बेहद लाभकारी है।

हमारे देश में लोग इसे बेकार समझकर उखाड़ कर फेंक देते हैं। इसमें विटामिन ए, विटामिन बी, प्रोटीन, मैग्नीशियम जैसे कई पोषक तत्व होते हैं और यह रक्तचाप, हृदय रोग और मधुमेह से लेकर कैंसर तक के उपचार में उपयोगी हो सकती है।

इसका फूल काफी सुंदर होता है, जिसे सजावट के लिए उपयोग में लिया जाता है। जलकुंभी से डस्टबिन, बॉक्स, टोकरी, पेन होल्डर और बैग जैसे कई इको फ्रेंडली सामान बनाए जाते हैं और यह स्थानीय स्तर पर लोगों के लिए आमदनी का अच्छा साधन हो सकता है।

पिछले कुछ वर्षों से जलकुंभी से खाद बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई है; जब जलकुंभी से बड़ी मात्रा में जैविक खाद तैयार होने लगेगी तो इसका लाभ नदियों, नहरों और तालाबों के आसपास रहने वाले किसानों को मिलेगा। 0

Jun 11, 2018

कृषि को समेटता जलवायु परिवर्तन

कृषि को समेटता जलवायु परिवर्तन
- डॉ. खुशालसिंह पुरोहित
औद्योगीकरण एवं वर्तमान में जीवाश्म ईंधनों का अधिकाधिक उपयोग से जलवायु परिवर्तन हो रहा है। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। पृथ्वी का औसत वार्षिक तापमान लगभग 15 डिग्री सेंटीग्रेड है। पृथ्वी को गर्म रखने की वायुमण्डल की यह क्षमता ग्रीनहाऊस गैसों की उपस्थिति पर निर्भर करती है। इनकी मात्रा में वृद्धि के परिणामस्वरूप ग्रीनहाऊस प्रभाव बढ़ जाएगा, जिससे वैश्विक तापमान में अत्यधिक वृद्धि हो जाएगी। बढ़ते वैश्विक तापमान यानी ग्लोबल वार्मिंग के लिए  कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं है।
इक्कीसवीं शताब्दी के पहले 16 बरसों में 15 बरस पिछली एक शताब्दी की तुलना में सर्वाधिक गर्म रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण हरियाली में आ रही निरन्तर कमी है। पेड़, नदियों और पहाड़ों के अलावा जीव जन्तुओं तक की पूजा करने वाले भारतीय समाज में आज इनके विनाश को लेकर गम्भीर चिन्ता नहीं है।
तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन हमारी कृषि व्यवस्था, आर्थिक और औद्योगिक नीति तथा जीवनशैली से जुड़ा हुआ है। जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रभाव खेती पर पड़ेगा। क्योंकि तापमान वर्षा आदि में बदलाव आने से मिट्टी की क्षमता में कमी होगी और कीट-पतंगों से फैलने वाली बीमारियाँ बड़े पैमाने पर होगी। गर्म मौसम होने से वर्षा चक्र प्रभावित होता है इससे बाढ़ या सूखे का
खतरा बढ़ता है।
एक समय था डग-डग रोटी पग-पग नीर के मुहावरे के लिए मालवांचल प्रसिद्ध था। इन दिनों गायब होती हरियाली और तेजी से नीचे जा रहे भूजल स्तर के कारण मालवा की वर्तमान पर्यावरणीय स्थिति दयनीय हो गई है। कृषि वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं यदि तापमान 3-5 डिग्री बढ़ता है तो गेहूँ के उत्पादन में 10-15 प्रतिशत की कमी आ जाएगी।
औद्योगीकरण एवं वर्तमान में जीवाश्म ईंधनों का अधिकाधिक उपयोग से जलवायु परिवर्तन हो रहा है। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। पृथ्वी का औसत वार्षिक तापमान लगभग 15 डिग्री सेंटीग्रेड है। पृथ्वी को गर्म रखने की वायुमण्डल की यह क्षमता ग्रीनहाऊस गैसों की उपस्थिति पर निर्भर करती है। इनकी मात्रा में वृद्धि के परिणामस्वरूप ग्रीनहाऊस प्रभाव बढ़ जाएगा, जिससे वैश्विक तापमान में अत्यधिक वृद्धि हो जाएगी। बढ़ते वैश्विक तापमान यानि ग्लोबल वार्मिंग के लिए कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं है। परन्तु इसमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है, मानव की उपभोगवादी गतिविधियाँ।
बढ़ता शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, वाहनों की भीड़, क्लोरोफ्लोरो कार्बन का वातावरण में रिसाव, बढ़ती विमान यात्राएँ, प्रकृति के साथ किया जा रहा खिलवाड़ एवं सबसे बढ़कर हमारी विलासितापूर्ण जीवनशैली का असर पूरे विश्व पर पड़ रहा है। इससे सबसे ज्यादा प्रभावित वे देश हो रहे हैं जिनकी आबादी ज्यादा है और विकास की दृष्टि से पीछे हैं।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। दक्षिणी एशिया के चीन व भारत दो ऐसे विकासशील देश हैं, जहाँ प्राकृतिक संसाधनों के दोषपूर्ण विदोहन से अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। यहाँ वन क्षेत्र कम हुआ है, बीसवीं सदी में भारत भूमि लगभग 30 प्रतिशत वनाच्छादित थी जो घटकर मात्र 19.4 प्रतिशत ही रह गई है।
भारतीय अर्थव्यस्था मुख्यतः कृषि आधारित है, कृषि के लिए  जल का महत्त्व है। मानसून की अनिश्चितता के कारण भारतीय कृषि पहले से ही अनिश्चितता का शिकार रही है। इस कारण विभिन्न फसलों के उत्पादन एवं उसकी उत्पादकता पर प्रभाव पड़ा है। फसलों पर कीटों का प्रकोप बढ़ा है। कृषि उत्पादन में कमी के कारण कृषि पदार्थों की कीमतों में भारी वृद्धि देखी जा रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण मानव का स्वास्थ्य भी अछूता नहीं है।
विज्ञान लेखक प्रो. दिनेश मणि का कहना है भारत में वैज्ञानिक कृषि का शुभारम्भ16वीं शताब्दी में हुआ। जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि होने के कारण कृषि उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता पड़ी। नई नीतियों का जन्म हुआ जिनका सीधा प्रभाव कृषि पर पड़ा। नकदी खेती के लिए  गन्ना, कपास, तम्बाकू, चारा, पशु उत्पादन, ऊन और चमड़ा पैदा करने पर ध्यान दिया गया।
भारतीय कृषि में किसान और पर्यावरण का सीधा सम्बन्ध है तथा किसान कृषि और पर्यावरण के बीच की महत्त्वपूर्ण कड़ी है। इसलिए  किसानों को ऐसी खेती करनी चाहिए जिससे खेती में उन्नति के साथ-साथ पर्यावरण को भी शुद्ध बनाए रखा जा सके। जलवायु परिवर्तन के कारण फसलों की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में कमी आएगी तथा अनेक फसलों के उत्पादन क्षेत्रों में परिवर्तन होगा।
जलवायु परिवर्तन के सम्भावित दुष्प्रभावों से कृषि को बचाने के लिए  अनुकूलन हेतु अनेक कार्यनीतियाँ को मूर्तरूप देना होगा। फसलों एवं जीव-जन्तुओं में स्वाभाविक रूप से काफी हद तक अपने ढालने की क्षमता होती है जिसे प्राकृतिक अनुकूलन कहते हैं। हमें फसलों की ऐसी प्रजातियों विकसित करनी होंगी जो उच्च तापमान को सह सकें। वहीं दूसरी और कृषि प्रबन्ध तकनीकों में सुधार करके हम जलवायु परिवर्तन के सम्भावित प्रभावों को काफी हद तक कम कर सकते हैं। 
हमें टिकाऊ खेती के सिद्धान्तों को समझने व उनके अनुसरण पर जोर देना होगा। पारम्परिक खेती के साथ-साथ कृषि वानिकी, जैविक खेती, न्यूनतम जोत, समन्वित पोषक तत्व प्रबन्धन तथा समन्वित नाशी जीव प्रबन्धन को अपनाने की आवश्यकता है तभी हम कृषि को सुरक्षित रख पाएँगे तथा पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचा सकेंगे।
सम्पूर्ण कृषि विकास के लिए  समेकित जल प्रबन्धन द्वारा जल की प्रत्येक बूँद का इस्तेमाल कृषि में करने की आवश्यकता है। उन्नत कृषि तकनीकी के प्रचार-प्रसार के लिए  कृषि शिक्षा के पाठ्यक्रम को नया रूप देना होगा ताकि कृषि शिक्षा, अनुसन्धान विस्तार और भारतीय कृषि में आवश्यकताओं के अनुरूप जनशक्ति तैयार की जा सके। इससे हमारी कृषि और कृषकों को मजबूती मिलेगी। मानव जीवन में तीन बुनियादी आधार शुद्ध हवा, ताजा पानी और उपजाऊ मिट्टी मुख्य रूप से वनों पर ही आधारित हैं।
इसके साथ ही पेड़ से कई अप्रत्यक्ष लाभ भी हैं। जिनमें खाद्य पदार्थ, औषधियों, फल-फूल, ईंधन, पशु आहार, इमारती लकड़ी, वर्षा सन्तुलन, भूजल संरक्षण और मिट्टी की उर्वरता आदि प्रमुख हैं। पेड़ और पर्यावरण की रक्षा आवश्यक है और यह महान विरासत हमारी राष्ट्रीय धरोहर हैं।
पेड़ लगाने और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए  हमारे देश में प्राचीनकाल से ही प्रयास होते रहे हैं जिसमें सरकार और समाज दोनों ही समान रूप से भागीदार होते थे। राजा व साहूकार सड़क किनारे छायादार पेड़ लगवाते थे तो जनसामान्य इनके संरक्षण की जिम्मेदारी निभाता था। इस प्रकार राज और समाज के परस्पर सहकार से देश में एक हरित संस्कृति का विकास हुआ जिसने वर्षों तक देश को हरा-भरा रखा। वर्तमान विषम परिस्थिति में इसी विचार से हरियाली का विकास होगा जिसकी आज सर्वाधिक आवश्यकता है। (सर्वोदय प्रेस सर्विस)

Apr 8, 2015

हमारे लोक देवता: वृक्ष

हमारे लोक देवता
 वृक्ष
-डॉ. खुशालसिंह पुरोहित

दुनिया में सभी प्राचीन सभ्यताओं का आधार मनुष्य का प्रकृति के प्रति प्रेम और आदर का रिश्ता है। इसी में पेड़, पहाड़ और नदी का अवतार के रुप में मनुष्यों, प्राणियों की पूजा की परम्परा का प्रचलन हुआ। मोहनजोदड़ों और हड़प्पा की खुदाई से मिले अवशेषों से पता चलता है कि उस समय समाज में मूर्ति पूजा के साथ ही पेड़-पौधों एवं जीव-जन्तुओं की पूजा की परम्परा भी विद्यमान थी।

वृक्षों का मनुष्य से अलग अपना कोई इतिहास नहीं है। वृक्षों की पूजा दरअसल एक मायने में अपने पूर्वजों को आदर प्रकट करने का माध्यम हैं, जिसकी वजह से आज तक प्रकृति का संतुलन बना रहा है। आज समाज सिर्फ भविष्य की ओर देख रहा है, परन्तु वह यह भूल रहा है कि अंतत: यह प्रकृति ही है जो उसे जिंदा रखेगी।
मानव जीवन के तीन बुनियादी आधार शुद्ध हवा, ताजा पानी और उपजाऊ मिट्टी मुख्य रुप से वनों पर ही आधारित है। इसके साथ ही वनों से कई अप्रत्यक्ष लाभ भी हैं जिनमें खाद्य पदार्थ, औषधियां, फल-फूल, ईधन, पशु आहार, इमारती लकड़ी, वर्षा संतुलन, भूजल संरक्षण और मिट्टी की उर्वरता आदि प्रमुख है।
जिस पर्यावरण चेतना की बात विकसित देश अब कर रहे है, वह आदिकाल से भारतीय मनीषा का मूल आधार रही है। भारतीय संस्कृति वृक्ष पूजक संस्कृति है। हमारे देश में वृक्षों में देवत्व की अवधारणा और उसकी पूजा की परम्परा प्राचीनकाल से रही है। जहां तक वनस्पतियों के महत्व का प्रश्न है, भारतीय प्राचीन ग्रंथ इनकी महिमा से भरे पड़े है। वृक्षों के प्रति ऐसा प्रेम शायद ही किसी देश की संस्कृति में हो, जहां वृक्ष को मनुष्य से भी ऊंचा स्थान दिया जाता है एवं उनकी पूजा कर सुख और समृद्धि की कामना की जाती है। हमारी वैदिक संस्कृति में पौधारोपण व वृक्ष पूजन की सुदीर्घ परम्परा रही है। प्रयाग का अक्षयवट, अवंतिका का सिद्धवट, नासिक का पंचवट (पंचवटी) गया का बोधिवृक्ष, वृंदावन का वंशीवट जैसे वृक्ष केन्द्रित श्रद्धा के केन्द्रों की परम्परा अनेक शताब्दियों पुरानी है।
वैदिक काल में प्रकृति के आराधक भारतीय मनीषी अपने अनुष्ठानों में वनस्पतियों को विशेष महत्व देते थे। वेदों और आरण्यक ग्रंथों में प्रकृति की महिमा का सर्वाधिक गुणगान है, उस काल में वृक्षों को लोकदेवता की मान्यता दी गयी। वृक्षों में देवत्व की अवधारणा का उल्लेख वेदों के अतिरिक्त प्रमुख रुप से मत्स्यपुराण, अग्निपुराण, भविष्यपुराण, पद्मपुराण, नारदपुराण,रामायण, भगवद्गीता
और शतपथब्राह्मण आदि ग्रंथों में मिलता है। मोटे रुप में देखे तो वेद, पुराण, संस्कृत और सूफी साहित्य, आगम, पंचतंत्र, जातक कथाएं, कुरान, बाईबिल, गुरुग्रंथ साहब हो या अन्य कोई ग्रंथ हों सभी में प्रकृति के लोकमंगलकारी स्वरुप का वर्णन है।
पर्यावरण के प्रति सामाजिक सजगता और पौधारोपण के प्रति सतर्कता हमारे ऋ षियों ने निर्मित की थी, पौधारोपण कब, कहां और कैसे किया जाये उसका लाभ और वृक्ष काटे जाने से होने वाली हानि का विस्तारपूर्वक वर्णन हमारे सभी धर्मो के ग्रंथों
में है।
दुनिया में सभी प्राचीन सभ्यताओं का आधार मनुष्य का प्रकृति के प्रति प्रेम और आदर का रिश्ता है। इसी में पेड़, पहाड़ और नदी का अवतार के रुप में मनुष्यों, प्राणियों की पूजा की परम्परा का प्रचलन हुआ। मोहनजोदड़ों और हड़प्पा की खुदाई से मिले अवशेषों से पता चलता है कि उस समय समाज में मूर्ति पूजा के साथ ही पेड़-पौधों एवं जीव-जन्तुओं की पूजा की परम्परा भी विद्यमान थी। भारतीय साहित्य, चित्रकला और वास्तुकला में वृक्ष पूजा के अनेक प्रसंग मिलते है। अजंता के गुफाचित्रों और सांची के तोरण स्तंभों की आकृतियों में वृक्ष पूजा के दृश्य है। जैन और बौद्ध साहित्य में वृक्ष पूजा का विशेष स्थान रहा है। पालि साहित्य में विवरण है कि बोधिसत्व ने रुक्ख देवता बनकर जन्म लिया था।
हमारे सबसे प्राचीन ग्रंथ वेदों में प्रकृति की परमात्मा स्वरुप में स्तुति है। इसके साथ ही वाल्मिकी रामायण, महाभारत और मनुस्मृति में वृक्ष पूजा की विविध विधियों का विस्तार से वर्णन है। नारद संहिता में 27 नक्षत्रों की नक्षत्र वनस्पति की जानकारी दी गयी है। हर व्यक्ति के जन्म नक्षत्र का वृक्ष उसका कु ल वृक्ष है, यही उसके लिये कल्पवृक्ष है, जिसकी आराधना कर मनोवांछित फल प्राप्त किया जा सकता है। सभी धार्मिक आयोजनों एवं पूजापाठ में पीपल, गुलर, पलाश, आम और वट वृक्ष के पत्ते (पंच पल्लव) की उपस्थिति अनिवार्य होती है। नवग्रह पूजा अर्चना के लिये नवग्रह वनस्पतियों की सूची है जिसके अनुसार उन वृक्षों की पूजा-प्रार्थना से ग्रह शांति का लाभ मिल सकता है।
यह धीरे-धीरे बढ़ता है और सैकड़ों वर्षो तक जिंदा रहता है। भारत में समुद्रतटीय प्रदेशों गुजरात, महाराष्ट्र और केरल में कल्पवृक्ष बहुतायत से मिलते है। देश के कुछ चर्चित कल्पवृक्षों में हिमालय में जोशीमठ, राजस्थान में मांगलियावास, बालुन्दा और बांसवाड़ा के कल्पवृक्ष प्रमुख है।
पौराणिक ग्रंथ स्कंदपुराण के हेमाद्रि खंड के अनुसार पांच पवित्र छायादार वृक्षों के समूह को पंचवटी कहा गया है, जिसमें पीपल, बेल, बरगद, आवंला व अशोक शामिल है। पुराणों में दो प्रकार की पंचवटी का वर्णन किया गया हैं। प्रत्येक में इन पांच प्रजातियों की स्थापना विधि, एक नियत दिशा, क्रम व अंतर के स्पष्ट निर्देश है।
भगवान बुद्ध के जीवन की सभी घटनाएं वृक्षों की छाया में घटी। आपका जन्म सालवन में एक वृक्ष की छाया में हुआ। इसके बाद प्रथम समाधि जामुन वृक्ष की छाया में, बोधि प्राप्ति पीपल वृक्ष की छाया में और महानिर्वाण साल वृक्ष की छाया में हुआ। भगवान बुद्ध ने भ्रमणकाल में अनेकों वनों एवं बागों में प्रवास किया था। इनमें वैशाली की आम्रपाली का आम्रवन, पिपिला का सखादेव आम्रवन, नांलदा का पुरवारीक आम्रवन व अनुप्रिय का आम्रवन के नाम उल्लेखनीय है। उसके अतिरिक्त राजाग्रह निम्बिला और कंजगल के वेणु वनों का संबंध भी भगवान बुद्ध से आया है। जैन धर्म में जैन शब्द जिन से बना है, इसका अर्थ है समस्त मानवीय वासनाओं पर विजय करने वाला। तीर्थ का शाब्दिक अर्थ है नदी पार कराने का स्थान अर्थात घाट। धर्मरुपी तीर्थ का जो प्रवर्तन करते है वे तीर्थंकर कहलाते हैं। तपस्या के रुप में सभी तीर्थकरों को विशुद्ध ज्ञान (कैवल्य ज्ञान) की प्राप्ति किसी न किसी वृक्ष की छाया में हुई थी, इन वृक्षों को कैवली वृक्ष कहा जाता है।
सिख धर्म में वृक्षों का अत्यधिक महत्व है। वृक्ष को देवता रुप में देखा गया हैं गुरुकार्य में उपयोग आने वाले धर्मस्थल के पास स्थित वृक्ष समूह को गुरु के बाग कहा जाता है। इनमें गुरु से जुड़े कुछ वृक्ष निम्न है - नानकमता का पीपल वृक्ष, रीठा साहब का रीठा वृक्ष, टाली साहब का शीशम, और बेर साहब प्रमुख है। इसके साथ ही कुछ बेर वृक्ष भी पूजनीय और प्रसिद्ध है। इनमें दुखभंजनी बेरी, बाबा की बेरी और मेहताबसिंह की बेरी के वृक्ष शामिल है।
पृथ्वी पर पाये जाने वाले जिन पेड़-पौधों का नाम कुरान-मस्जिद में आया है, उन पेड़ों को पूजनीय माना गया है। इन पवित्र पेड़ों में खजूर, बेरी, पीलू, मेहंदी, जैतून, अनार, अंजीर, बबूल, अंगुर और तुलसी मुख्य है। इनमें कुछ पेड़-पौधों का वर्णन मोहम्मद साहब (रहमतुल्लाह अलैहे) ने कुरान मस्जिद में किया हैं इस कारण इन पेड़ पौधों का महत्व और भी बढ़ जाता है। हम सभी धर्मग्रंथ पेड़-पौधों के प्रति प्रेम और आदर का पाठ पढ़ाते है। इसी प्रेम और आदरभाव से वृक्षों की सुरक्षा कर हम अपने जीवन में सुख, समृद्धि प्राप्त कर सकते है।
आज की सबसे बड़ी समस्या वनों के अस्तित्व की है। भोगवादी सभ्यता के पक्षधर सारी दुनिया में पेड़ को पैसे के पर्याय के रुप में देखते है, यही कारण है कि दुनिया का कोई हिस्सा ऐसा नहीं बचा है जहां वृक्ष हत्या का दौर नहीं चल रहा हो। हमारे यहां सुखद बात यह है कि भारतीय संस्कृति की परंपरा वृक्षों के साथ सहजीवन की रही है। पेड़ संस्कृति के वाहक है।
यहां प्रकृति की सुरक्षा से ही संस्कृति की सुरक्षा हो सकती है। इस कारण यहां जंभोजी महाराज की सीख है जिसमें कहा गया है कि सिर साटे रुख रहे तो सस्तो जाण, इसी क्रम में धराड़ी और ओरण जैसी परम्पराओं ने जातीय चेतना को प्रकृति चेतना से आत्मसात कर वृक्ष पूजा और वृक्ष रक्षा से जीवन में सुख-समृद्धि की कामना की है। आज इसी भावना को विस्तारित कर हम अपने भविष्य को सुरक्षित रख सकते हैं।
हमारे प्राचीन साहित्य में जिन पवित्र और अलौकिक वृक्षों का उल्लेख है उनमें कल्पवृक्ष प्रमुख है। कल्पवृक्ष को देवताओं का वृक्ष कहा गया है, इसे मनोवांछित फल देने वाला नंदन वृक्ष भी माना जाता है। भारत में बंबोकेसी कल के अडऩसोनिया डिजिटेटा को कल्पवृक्ष कहा जाता है। इसको फ्रांसीसी वैज्ञानिक माइकल अडनसन ने 1754 में अफ्रीका में सेनेगल में सर्वप्रथम देखा था, इसी आधार पर इसका नाम अडऩसोनियाडिजिटेटा रखा गया। नश्वर जगत का कोई भी वृक्ष इसकी विशालता, दीर्घजीविता और आराध्यता में बराबरी नहीं कर सकता है।
सम्पर्कः 19 पत्रकार कॉलोनी, रतलाम, म.प्र. 457001, फ़ोन (07412) 231546, मो. 9425078098

Dec 13, 2008

हमारे लोक देवता वृक्ष

हमारे लोक देवता वृक्ष
-डॉ. खुशालसिंह पुरोहित

दुनिया में सभी प्राचीन सभ्यताओं का आधार मनुष्य का प्रकृति के प्रति प्रेम और आदर का रिश्ता है। इसी में पेड़, पहाड़ और नदी का अवतार के रुप में मनुष्यों, प्राणियों की पूजा की परम्परा का प्रचलन हुआ। मोहनजोदड़ों और हड़प्पा की खुदाई से मिले अवशेषों से पता चलता है कि उस समय समाज में मूर्ति पूजा के साथ ही पेड़-पौधों एवं जीव-जन्तुओं की पूजा की परम्परा भी विद्यमान थी।

वृक्षों का मनुष्य से अलग अपना कोई इतिहास नहीं है। वृक्षों की पूजा दरअसल एक मायने में अपने पूर्वजों को आदर प्रकट करने का माध्यम हैं, जिसकी वजह से आज तक प्रकृति का संतुलन बना रहा है। आज समाज सिर्फ भविष्य की ओर देख रहा है, परन्तु वह यह भूल रहा है कि अंतत: यह प्रकृति ही है जो उसे जिंदा रखेगी।

मानव जीवन के तीन बुनियादी आधार शुद्ध हवा, ताजा पानी और उपजाऊ मिट्टी मुख्य रुप से वनों पर ही आधारित है। इसके साथ ही वनों से कई अप्रत्यक्ष लाभ भी हैं जिनमें खाद्य पदार्थ, औषधियां, फल-फूल, ईधन, पशु आहार, इमारती लकड़ी, वर्षा संतुलन, भूजल संरक्षण और मिट्टी की उर्वरता आदि प्रमुख है।

जिस पर्यावरण चेतना की बात विकसित देश अब कर रहे है, वह आदिकाल से भारतीय मनीषा का मूल आधार रही है। भारतीय संस्कृति वृक्ष पूजक संस्कृति है। हमारे देश में वृक्षों में देवत्व की अवधारणा और उसकी पूजा की परम्परा प्राचीनकाल से रही है। जहां तक वनस्पतियों के महत्व का प्रश्न है, भारतीय प्राचीन ग्रंथ इनकी महिमा से भरे पड़े है। वृक्षों के प्रति ऐसा प्रेम शायद ही किसी देश की संस्कृति में हो, जहां वृक्ष को मनुष्य से भी ऊंचा स्थान दिया जाता है एवं उनकी पूजा कर सुख और समृद्धि की कामना की जाती है। हमारी वैदिक संस्कृति में पौधारोपण व वृक्ष पूजन की सुदीर्घ परम्परा रही है। प्रयाग का अक्षयवट, अवंतिका का सिद्धवट, नासिक का पंचवट (पंचवटी) गया का बोधिवृक्ष, वृंदावन का वंशीवट जैसे वृक्ष केन्द्रित श्रद्धा के केन्द्रों की परम्परा अनेक शताब्दियों पुरानी है।
वैदिक काल में प्रकृति के आराधक भारतीय मनीषी अपने अनुष्ठानों में वनस्पतियों को विशेष महत्व देते थे। वेदों और आरण्यक ग्रंथों में प्रकृति की महिमा का सर्वाधिक गुणगान है, उस काल में वृक्षों को लोकदेवता की मान्यता दी गयी। वृक्षों में देवत्व की अवधारणा का उल्लेख वेदों के अतिरिक्त प्रमुख रुप से मत्स्यपुराण, अग्निपुराण, भविष्यपुराण, पद्मपुराण, नारदपुराण,रामायण, भगवद्गीता

और शतपथब्राह्मण आदि ग्रंथों में मिलता है। मोटे रुप में देखे तो वेद, पुराण, संस्कृत और सूफी साहित्य, आगम, पंचतंत्र, जातक कथाएं, कुरान, बाईबिल, गुरुग्रंथ साहब हो या अन्य कोई ग्रंथ हों सभी में प्रकृति के लोकमंगलकारी स्वरुप का वर्णन है।
पर्यावरण के प्रति सामाजिक सजगता और पौधारोपण के प्रति सतर्कता हमारे ऋ षियों ने निर्मित की थी, पौधारोपण कब, कहां और कैसे किया जाये उसका लाभ और वृक्ष काटे जाने से होने वाली हानि का विस्तारपूर्वक वर्णन हमारे सभी धर्मो के ग्रंथों
में है।

दुनिया में सभी प्राचीन सभ्यताओं का आधार मनुष्य का प्रकृति के प्रति प्रेम और आदर का रिश्ता है। इसी में पेड़, पहाड़ और नदी का अवतार के रुप में मनुष्यों, प्राणियों की पूजा की परम्परा का प्रचलन हुआ। मोहनजोदड़ों और हड़प्पा की खुदाई से मिले अवशेषों से पता चलता है कि उस समय समाज में मूर्ति पूजा के साथ ही पेड़-पौधों एवं जीव-जन्तुओं की पूजा की परम्परा भी विद्यमान थी। भारतीय साहित्य, चित्रकला और वास्तुकला में वृक्ष पूजा के अनेक प्रसंग मिलते है। अजंता के गुफाचित्रों और सांची के तोरण स्तंभों की आकृतियों में वृक्ष पूजा के दृश्य है। जैन और बौद्ध साहित्य में वृक्ष पूजा का विशेष स्थान रहा है। पालि साहित्य में विवरण है कि बोधिसत्व ने रुक्ख देवता बनकर जन्म लिया था।

हमारे सबसे प्राचीन ग्रंथ वेदों में प्रकृति की परमात्मा स्वरुप में स्तुति है। इसके साथ ही वाल्मिकी रामायण, महाभारत और मनुस्मृति में वृक्ष पूजा की विविध विधियों का विस्तार से वर्णन है। नारद संहिता में 27 नक्षत्रों की नक्षत्र वनस्पति की जानकारी दी गयी है। हर व्यक्ति के जन्म नक्षत्र का वृक्ष उसका कु ल वृक्ष है, यही उसके लिये कल्पवृक्ष है, जिसकी आराधना कर मनोवांछित फल प्राप्त किया जा सकता है। सभी धार्मिक आयोजनों एवं पूजापाठ में पीपल, गुलर, पलाश, आम और वट वृक्ष के पत्ते (पंच पल्लव) की उपस्थिति अनिवार्य होती है। नवग्रह पूजा अर्चना के लिये नवग्रह वनस्पतियों की सूची है जिसके अनुसार उन वृक्षों की पूजा-प्रार्थना से ग्रह शांति का लाभ मिल सकता है।
यह धीरे-धीरे बढ़ता है और सैकड़ों वर्षो तक जिंदा रहता है। भारत में समुद्रतटीय प्रदेशों गुजरात, महाराष्ट्र और केरल में कल्पवृक्ष बहुतायत से मिलते है। देश के कुछ चर्चित कल्पवृक्षों में हिमालय में जोशीमठ, राजस्थान में मांगलियावास, बालुन्दा और बांसवाड़ा के कल्पवृक्ष प्रमुख है।

पौराणिक ग्रंथ स्कंदपुराण के हेमाद्रि खंड के अनुसार पांच पवित्र छायादार वृक्षों के समूह को पंचवटी कहा गया है, जिसमें पीपल, बेल, बरगद, आवंला व अशोक शामिल है। पुराणों में दो प्रकार की पंचवटी का वर्णन किया गया हैं। प्रत्येक में इन पांच प्रजातियों की स्थापना विधि, एक नियत दिशा, क्रम व अंतर के स्पष्ट निर्देश है।
भगवान बुद्ध के जीवन की सभी घटनाएं वृक्षों की छाया में घटी। आपका जन्म सालवन में एक वृक्ष की छाया में हुआ। इसके बाद प्रथम समाधि जामुन वृक्ष की छाया में, बोधि प्राप्ति पीपल वृक्ष की छाया में और महानिर्वाण साल वृक्ष की छाया में हुआ। भगवान बुद्ध ने भ्रमणकाल में अनेकों वनों एवं बागों में प्रवास किया था। इनमें वैशाली की आम्रपाली का आम्रवन, पिपिला का सखादेव आम्रवन, नांलदा का पुरवारीक आम्रवन व अनुप्रिय का आम्रवन के नाम उल्लेखनीय है। उसके अतिरिक्त राजाग्रह निम्बिला और कंजगल के वेणु वनों का संबंध भी भगवान बुद्ध से आया है। जैन धर्म में जैन शब्द जिन से बना है, इसका अर्थ है समस्त मानवीय वासनाओं पर विजय करने वाला। तीर्थ का शाब्दिक अर्थ है नदी पार कराने का स्थान अर्थात घाट। धर्मरुपी तीर्थ का जो प्रवर्तन करते है वे तीर्थंकर कहलाते हैं। तपस्या के रुप में सभी तीर्थकरों को विशुद्ध ज्ञान (कैवल्य ज्ञान) की प्राप्ति किसी न किसी वृक्ष की छाया में हुई थी, इन वृक्षों को कैवली वृक्ष कहा जाता है।

सिख धर्म में वृक्षों का अत्यधिक महत्व है। वृक्ष को देवता रुप में देखा गया हैं गुरुकार्य में उपयोग आने वाले धर्मस्थल के पास स्थित वृक्ष समूह को गुरु के बाग कहा जाता है। इनमें गुरु से जुड़े कुछ वृक्ष निम्न है - नानकमता का पीपल वृक्ष, रीठा साहब का रीठा वृक्ष, टाली साहब का शीशम, और बेर साहब प्रमुख है। इसके साथ ही कुछ बेर वृक्ष भी पूजनीय और प्रसिद्ध है। इनमें दुखभंजनी बेरी, बाबा की बेरी और मेहताबसिंह की बेरी के वृक्ष शामिल है।
पृथ्वी पर पाये जाने वाले जिन पेड़-पौधों का नाम कुरान-मस्जिद में आया है, उन पेड़ों को पूजनीय माना गया है। इन पवित्र पेड़ों में खजूर, बेरी, पीलू, मेहंदी, जैतून, अनार, अंजीर, बबूल, अंगुर और तुलसी मुख्य है। इनमें कुछ पेड़-पौधों का वर्णन मोहम्मद साहब (रहमतुल्लाह अलैहे) ने कुरान मस्जिद में किया हैं इस कारण इन पेड़ पौधों का महत्व और भी बढ़ जाता है। हम सभी धर्मग्रंथ पेड़-पौधों के प्रति प्रेम और आदर का पाठ पढ़ाते है। इसी प्रेम और आदरभाव से वृक्षों की सुरक्षा कर हम अपने जीवन में सुख, समृद्धि प्राप्त कर सकते है।

आज की सबसे बड़ी समस्या वनों के अस्तित्व की है। भोगवादी सभ्यता के पक्षधर सारी दुनिया में पेड़ को पैसे के पर्याय के रुप में देखते है, यही कारण है कि दुनिया का कोई हिस्सा ऐसा नहीं बचा है जहां वृक्ष हत्या का दौर नहीं चल रहा हो। हमारे यहां सुखद बात यह है कि भारतीय संस्कृति की परंपरा वृक्षों के साथ सहजीवन की रही है। पेड़ संस्कृति के वाहक है।
यहां प्रकृति की सुरक्षा से ही संस्कृति की सुरक्षा हो सकती है। इस कारण यहां जंभोजी महाराज की सीख है जिसमें कहा गया है कि सिर साटे रुख रहे तो सस्तो जाण, इसी क्रम में धराड़ी और ओरण जैसी परम्पराओं ने जातीय चेतना को प्रकृति चेतना से आत्मसात कर वृक्ष पूजा और वृक्ष रक्षा से जीवन में सुख-समृद्धि की कामना की है। आज इसी भावना को विस्तारित कर हम अपने भविष्य को सुरक्षित रख सकते हैं।
हमारे प्राचीन साहित्य में जिन पवित्र और अलौकिक वृक्षों का उल्लेख है उनमें कल्पवृक्ष प्रमुख है। कल्पवृक्ष को देवताओं का वृक्ष कहा गया है, इसे मनोवांछित फल देने वाला नंदन वृक्ष भी माना जाता है। भारत में बंबोकेसी कल के अडऩसोनिया डिजिटेटा को कल्पवृक्ष कहा जाता है। इसको फ्रांसीसी वैज्ञानिक माइकल अडनसन ने 1754 में अफ्रीका में सेनेगल में सर्वप्रथम देखा था, इसी आधार पर इसका नाम अडऩसोनियाडिजिटेटा रखा गया। नश्वर जगत का कोई भी वृक्ष इसकी विशालता, दीर्घजीविता और आराध्यता में बराबरी नहीं कर सकता है।