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Jan 1, 2026

यात्रा संस्मरणः अयोध्या से वाराणसी- उमंग और ऊर्जा भरते घाट

- सुदर्शन रत्नाकर 










आठ बज कर पाँच मिनट पर हवाई जहाज़ ने पट्टी पर दौड़ना शुरू किया और फिर जैसे ही उसने उड़ान भरी। पीछे का सब कुछ छूटता गया। मन अयोध्या की ओर उड़ता गया। चार दिन पहले ही भाई का फ़ोन आया, हम सब यानी हरबंस भाई-सविता भाभी, भाभी के भैया, मधु भाभी एवं बहन संतोष और मैं सुबह आठ बजे नई दिल्ली एयरपोर्ट से एयर इंडिया की फ्लाइट से अयोध्या जा रहे हैं। न करने और सोचने की तो कोई गुंजाइश ही नहीं थी।सच ही कहते हैं, जब ईश्वर ने दर्शन के लिए बुलाना हो तो, ऐसे ही कार्यक्रम बनते हैं।श्री राम के दर्शन करने की सोच मात्र से ही मन में भरी प्रफुल्लता से चार दिन व्यतीत हो गए और अब हवाई जहाज़ अपनी गति से गंतव्य की बढ़ रहा है। 

  दस बजे जब हवाई जहाज़ ने लैंड किया और अयोध्या की उस पावन धरा, भारत के जनमानस के नायक मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने जन्म लिया था, पर पाँव रखते ही आँखें खुशी से सजल हो गईं।

अयोध्या का एयरपोर्ट छोटा है ; लेकिन श्रीराम की अत्यंत सुंदर पेंटिंग्स ने मन मोह लिया।एयरपोर्ट से बाहर निकले तो भाई के मित्र के द्वारा भेजे गए कर्मचारियों ने फूलों के गुलदस्ते देकर हमारा स्वागत किया। दो गाड़ियों से हम सभी होटल रामायणा की ओर अग्रसर हुए। प्रखर- जिसने सारे ट्रिप की रूपरेखा बनाई थी, हमें रास्ते में बताता  गया। अयोध्या नाम तो सबके हृदय में बसा है; लेकिन अभी तक एक छोटा सा शहर ही था, विकास के नाम पर कुछ अधिक नहीं हुआ था पर अब वही शहर चमचमाती सड़कों, नए-नए बने होटलों और इमारतों से इठला रहा है। इठलाए भी क्यों न, रंग रूप तो बदला ही है, सदियों की प्रतीक्षा के बाद भगवान राम का भव्य मंदिर जो बना है, जिसे देखने देश से ही नहीं, विदेशों से भी श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। 

   होटल एयरपोर्ट से दस मील की दूरी पर है। औपचारिकताएँ पूरी करके हमने नाश्ता किया। एक बजे हमें मंदिर में जाना है, जो होटल से कुछ ही दूरी पर है। गाड़ी अंदर तक नहीं जातीं, लेकिन पूर्व आज्ञा-पत्र ले रखा है। संकरी गलियों से लोगों की भीड़ से बचते हुए हम आगे बड़े और मंदिर के द्वार से थोड़ी दूरी पर उतरे। हमारे और हमारे आराध्य के बीच बस थोड़ी ही दूरी थी। भैया और दीदी के लिए व्हीलचेयर ली। वहीं माथे पर राम-नाम का तिलक लगा कर हम  खुशी के अपार सागर में डूबे ऊबड़- खाबड़ रास्ते से आगे बढ़े।

 अगला रास्ता हमें सीढ़ियों से तय करना था। यह अंतिम पड़ाव था। लगभग साठ सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद हम उस भव्य मूर्ति के सामने खड़े थे। जिसका दर्शन करने हम आए थे। लग रहा था, जैसे वे आँखें हमें देख रही हैं, उनसे निकलती लौ और मूर्ति की आभा देखकर इतनी भाव विभोर हो उठी कि आँखें नम हो गईं और फिर आँसू बहने लगे। भाई की भी वही स्थिति थी। वह भी बहुत भावुक है। श्रद्धालुओं की बहुत लम्बी पंक्ति थी इसलिए अधिक समय तक रुक नहीं सकते थे। सबके लिए सुख-शांति माँगते हुए,  आगे बढ़े और उतनी ही सीढ़ियाँ उतर कर नीचे आ गए; लेकिन मन तो जैसे पावन -पवित्र होकर वहीं छूट गया था। राम मंदिर के तदोपरांत, राम दरबार देखने गए, दशरथ महल, कनक भवन राम और सीता के दर्शन करके आँखें तृप्त हों गईं।

वापस होटल पहुँचे तो चार बज गए थे। थोड़ी देर आराम करने के बाद हनुमान गढ़ी देखने के लिए निकले। हनुमानगढ़ी एक प्रसिद्ध एवं प्राचीन हनुमान मंदिर है। कहा जाता है भगवान राम ने हनुमान जी को अयोध्या की रक्षा का भार दिया था तथा उन्हें अयोध्या में निवास करने का आदेश दिया था। यहाँ की सीढ़ियाँ पुरानी और बहुत ऊँची है। हनुमान चालीसा पढ़ते हुए किसी तरह पहुँच ही गए। हनुमान जी की सजग आँखें सच में नगर की सुरक्षा में सचेत थीं।

   सरयू नदी हम  सायंकाल में रौशनी में देखना चाहते थे। देव दीवाली के कारण लाखों लोगों ने सरयू में स्नान किया था। इस समय भी अपार भीड़ थी। छह बजे हम लता मंगेशकर चौक पहुँचे। मधुर स्वर लहरियों से वातावरण गुंजायमान हो रहा था। लता मंगेशकर चौक से जैसे-तैसे करके सीढ़ियाँ उतरकर नीचे घाट पर पहुँचे। दीये वहीं मिल रहे थे। सभी ने जलते दीपक सरयू की लहरों पर छोड़ दिए। जगमग करते और भी सैंकड़ों दीपक लहरों के साथ लहराते हुए आगे बढ़ रहे थे मानों आसमान में सितारे टिमटिमा रहे हों। 

ऊपर आकर पुल से सरयू नदी की दूसरी ओर आ गए, जहाँ कई मंदिर हैं: लेकिन हम केवल, नागेश्वर नाथ मंदिर ही देख पाए। यह शिव जी का अत्यंत प्राचीन मंदिर है। दर्शन करने के बाद लता मंगेशकर चौक, जहाँ बहुत बड़े आकार की वीणा बनी हुई है। वहाँ कुछ देर ठहरें और  चित्र लिए।

दूसरे दिन हमने वाराणसी के लिए प्रस्थान करना था। सुबह नाश्ता लेकर दस बजे हमने सड़क मार्ग से यात्रा प्रारंभ की। रास्ते में रुकते हुए हमने यात्रा का पूरा आनंद लिया हमारे साथ ड्राइवर सोनू ,अंजनी और ब्लैक कामांडो शर्मा जी थे, जो हर स्थान के बारे में बताते हुए  जा रहे थे, राजनीति पर भी खूब चर्चा करते रहे। अंजनी बीस-बाइस वर्ष का बड़ा चुस्त और संस्कारी लड़का है। उसने बताया कि वह हनुमान जी का परम भक्त है, उसे हमेशा यह एहसास होता है कि वे उसके साथ हैं। वह सुबह एक घंटा नियम से पूजा करता है। किसी दिन किसी विशेष कारण से पूजा नहीं कर पाता, तो उस दिन कहीं भी जाते हुए रास्ते में उसे हनुमान जी का कोई न कोई मंदिर अवश्य दिख जाता है।

      जब वाराणसी पहुँचे अँधेरा, हो गया था।सँकरी सड़कें जगह-जगह रास्ते में लगा जाम और रेंगती हुई गाड़ियाँ। बैठे-बैठे थकान होने लगी थी। होटल द. एच.एच.आई (होटल हिन्दुस्तान इंटरनेशनल) तक पहुँचने में ही बहुत समय लग गया। रिसेप्शन पर अभी पहुँचे ही थे कि लिफ्ट से सात- आठ सुंदर -सी महिलाएँ एक जैसी साड़ियाँ पहने हुए निकलीं। हमें देखते ही उन्होंने हाथ जोड़कर नमस्ते की। उनके  हाथों में मेंहदी लगी हुई थी। हमारे जवाब देने पर उन्होंने ने बताया कि वे शिकागो से हैं। जब मधु भाभी ने बताया कि वे भी शिकागो सें आई हैं, तो ख़ुश हो गई। अच्छा लगा कि विदेशी हमारी संस्कृति, हमारी परम्पराओं को अपना रहे हैं। अयोध्या में भी विदेशियों को भारतीय वेशभूषा में माथे पर राम-नाम का तिलक लगाए मंदिर परिसर में घूमते हुए और श्री राम के दर्शन करते हुए देखा था।

  यह शाम हमने होटल में ही संगीत सुनते हुए, बातचीत करने में बिताई। अगली सुबह का कार्यक्रम अभी अनिश्चित था कि कब शुरू होगा।  सुबह हम तैयार हो ही रहे थे कि भाई के पास शर्मा जी का फ़ोन आ गया कि तैयार रहें, वे नौ बजे आ जाएँगे। नाश्ता लेकर हम जाने के लिए ई रिक्शा से निकले; क्योंकि श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर तक कार नहीं जा सकतीं। मंदिर के बाहर ही व्हील चेयर मिल गई और छोटे रास्ते से अंदर जाने की आज्ञा भी। मंदिर के बाहर ही एक दुकान से प्रसाद की टोकरी ली, वहीं जूते उतारे और अपने-अपने फ़ोन और बैग जमा करवाए, गेट नंबर चार से मंदिर परिसर में प्रवेश किया। पहले मंदिर तक जाने का रास्ता छोटी-छोटी गलियों से होकर जाता था; लेकिन अब खुले गलियारे बन गए हैं, जिससे लोगों के आवागमन में सुविधा हो गई है।

 गलियारे में जाते ही सबसे पहले ज्ञानवापी मस्जिद दिखाई दी, जो मंदिर के एकदम साथ है। इस समय चारों ओर से बंद किया हुआ है। सिक्योरिटी प्रक्रिया के पश्चात हम एक बड़े से दालान में पहुँचे, जहाँ शिव जी को समर्पित विश्वनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है, जो बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जिसके दर्शन मात्र से आत्मा को शुद्धि मिलती है। सम्राट विक्रमादित्य ने इसका निर्माण करवाया था, जबकि वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण 1780 में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था। 

   यहाँ भी हमें सुविधा से दर्शन गए। शिवलिंग से छू कर गेंदे के फूलों का हार जब पुजारी ने पहनाया तो मन गद्गद हो गया। लगा भोले नाथ की कृपा के फूल बरस रहे हैं। हर हर महादेव के नारों की आवाज़ से सारा वातावरण गूँज रहा था। पंक्तियों में लगे हज़ारों दर्शनार्थियों की श्रद्धा देखते ही बन रही थी। यह आस्था ही तो मनोबल बढ़ाती है।     

 वाराणसी के अन्य मंदिरों में भैरव मंदिर, श्री अन्नपूर्णा मंदिर, श्री दुर्गा माता मंदिर, सारनाथ मंदिर हैं। अन्नपूर्णा मंदिर, देवी अन्नपूर्णा को समर्पित मंदिर है। किंवदंती के अनुसार एक बार जब पृथ्वी पर अन्न की कमी हो गयी, तब माँ पार्वती ने माँ अन्नपूर्णा के रूप में अवतार लिया और पृथ्वी लोक पर अन्न उपलब्ध कराकर समस्त मानव जाति की रक्षा की थी। वहाँ से हमें चावल और रुद्राक्ष का प्रसाद मिला, जो हमने सम्भाल कर रख लिया।

   होटल में  थोड़ी देर विश्राम करने के पश्चात् हम प्रमुख बौद्ध स्थल सारनाथ मंदिर देखने के लिए निकले, जो वाराणसी से दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जिसमें कई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल हैं।

   जैसे ही हमने प्रांगण में प्रवेश किया, सबसे पहले हमें सुसज्जित वह स्थान दिखाई दिया, जहाँ महात्मा बुद्ध अपने पहले पाँच शिष्यों के सम्मुख बैठे ,उन्हें प्रवचन दे रहे हैं। उसके बाद धर्मचक्रों को घुमाते हुए परिक्रमा की। इसके सामने ही वह वृक्ष है, जिसकी एक शाखा  श्रीलंका से लाकर यहाँ लगाई गयी थी। मंदिर में प्रवेश करते ही भगवान बुद्ध की शांत भाव से बैठे अत्यंत सुंदर प्रतिमा के दर्शन मात्र से ही मन में अपार शांति छा गई। मंदिर की दीवारों पर महात्मा बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित मनोहारी पेंटिंग्स वातावरण को और भी आकर्षक बनाती हैं। स्वच्छ और शांत वातावरण को छोड़कर जाने की इच्छा नहीं हो रही थी। पर अभी हमें धूमेक स्तूप भी देखना था। विशाल प्रांगण में बने इस स्तूप का निर्माण सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व करवाया था।

    जिसे देखकर आश्चर्य हुआ और मन उनके आगे नत मस्तक हो गया, जिनके हाथों ने इसे बनाया था। गाइड ने बताया कि मुग़ल शासकों ने इसके एक हिस्से को तोड़कर देखा था कि कहीं इसमें सोना तो नहीं भरा हुआ। बाद में 1930 में इस हिस्से की मरम्मत की गई, जो अलग दिखता है।

     मंदिर से बाहर निकलकर थोड़ी ख़रीददारी की। लौटने का समय हो हो गया था। साढ़े छह बजे गंगा -आरती आरंभ हो जाती है इसलिए विश्राम न करके सीधे गंगा घाट की ओर बढ़े। रास्ते में शर्मा जी ने हमें ढाबे पर ले गए। जहाँ की चाय लाजवाब होती है, अदरक डालकर बनायी गई चाय  कुल्हड़ में पिलाते हैं। मैं तो चाय नहीं पीती; लेकिन सभी ने इस चाय का आनन्द उठाया। 

  एक पुल को पार करते हुए शर्मा जी ने बताया कि इस पुल का नाम अंधा पुल है। एक अँधे भिखारी की मृत्यु के बाद उसके पास से आठ करोड़ रुपये प्राप्त हुए थे, जिससे इस पुल का निर्माण करवाया गया था और इसका नाम अंधा पुल रखा गया।     

   छह बजे हम अस्सी घाट पहुँचे, जहाँ से पचास सीढ़ियाँ उतरकर हमें नीचे जाना था। सीढ़ियाँ पुरानी और बहुत ऊँची हैं। सोचकर ही घबराहट होने लगी कि इतनी सीढ़ियाँ चढ़कर वापिस भी आना है। अधिक परेशानी तो भैया और दीदी को थी। उन दोनों को हाथ पकड़कर नीचे उतरना पड़ा। अभी तो परेशानी शेष थी। कठिन प्रक्रिया  के बाद जैसे तैसे बोट पर पहुँचे और इसके साथ ही सारी थकान, सारी कठिनाइयाँ भूल गईं, जब गंगा की लहरों से अठखेलियाँ करती बोट आगे बढ़ी। लगभग सभी घाट जगमगाती रोशनी से सजे हुए थे। कुल अट्ठासी घाट हैं, जहाँ पूजा और स्नान किया जाता है; लेकिन मणिकर्णिका और हरिश्चन्द्र घाट श्मशान घाट हैं, जो विशेष रूप से दाह संस्कार के लिए उपयोग किए जाते हैं। यहाँ दिन-रात शवों को जलाया जाता है । मान्यता है कि जिसका शव यहाँ जलाया जाता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह आस्था और विश्वास है, जो सदियों से चला आ रहा है, शेष जाने वाली आत्मा तो बता नहीं पाती।

     दशाश्वमेध सबसे प्राचीन घाट है, जहाँ पर प्रसिद्ध गंगा आरती का आयोजन होता है। हमारी बोट जब वहाँ पहुँची, तो आरती चल रही थीं। अद्भुत, अलौकिक दृश्य। अभी तक सुनते आए थे, अब सामने खड़े सुन और देख रहे थे। अचम्भित तो होना ही था। एक अनूठी आभा का जैसे संचार होने लगा था।  नीचे गंगा की लहरें, ऊपर खुला आसमान, शीतल हवा के झोंकों का स्पर्श और चमकता पूरा चाँद, जो हमारे साथ-साथ चल रहा था। हृदय में उमंग और तन-मन तनाव रहित। सांसारिक बंधनों में रहकर, क्या यह मोक्ष नहीं था? यही तो था, चाहे क्षणिक था।               

   आठ नवम्बर आज वाराणसी में अंतिम दिन था। आराम से सोकर उठे। नाश्ता लेकर ग्यारह बजे चैक आऊट किया। हमारी दिल्ली की वापसी की फ्लाइट छह बजे की थी, जो चालीस मिनट विलंब दिखा रही थी। हमारे पास पर्याप्त समय था; लेकिन भीड़ आज भी बहुत थी। लाल बहादुर शास्त्री हवाई अड्डे पर पहुँचने में समय लगेगा। रास्ते में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय भी देखना था, जो एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रतिष्ठित केन्द्रीय विश्वविद्यालय है, जिसकी स्थापना पंडित मदन  मोहन मालवीयजी ने 1916  में की थी। इसका उद्देश्य पारंपरिक भारतीय ज्ञान और आधुनिक शिक्षा को जोड़ना था। विश्वविद्यालय का मुख्य परिसर साढ़े पाँच किलोमीटर में फैला हुआ है। सब कुछ देखने में हमें कार से भी आधा घंटा लग गया।

    ढाई बज गए थे। अभी हमें लंच भी लेना था। खाने के बाद एक बार फिर से सबने अदरक वाली कुल्हड़ की चाय का आनंद लिया। हवाई अड्डे पर सभी औपचारिकताएँ पूरी करने के बाद पता चला- फ्लाइट सवा आठ बजे उड़ान भरेगी। प्रतीक्षा के अतिरिक्त क्या कर सकते थे। घर तो लौटना था। ट्रिप की अच्छी-अच्छी बातों के बारे में बातचीत करते हुए हमने उस प्रतीक्षा का भी आनंद लिया।

सम्पर्कः ई-29, नेहरु ग्राउंड, फरीदाबाद 121001, मोबा. 9811251135

May 2, 2025

यात्रा संस्मरणः फ़िनलैंड: जादुई पल और अनकही बातें

 - जैस्मिन जोविअल

पिछले साल की बात है। एक दिन मेरे छोटे भाई ने मुझसे कहा, “दीदी, इस बार फ़िनलैंड की यात्रा मैं स्पॉन्सर करूँगा।”

उसकी ये बात सुनकर मेरी आँखों में आँसू आ गए। उस पल में सिर्फ़ एक ट्रिप का वादा नहीं था… उसमें एक अडिग विश्वास था, अपार प्यार था, और वह अपनापन था, जो भाई-बहन के रिश्ते को अनमोल बना देता है।

वह वादा, जो मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि पूरा होगा, अब मुझे साकार होते हुए नजर आ रहा था। एक पल में ही तो वह साधारण बात एक एहसास में बदल गई- उसने न केवल मेरी यात्रा का खर्च उठाया, बल्कि मेरे दिल को भी एक नई उम्मीद दी।

मैं कई साल पहले फ़िनलैंड में एक साल रह चुकी थी; लेकिन इस बार मेरे दिल में कुछ खास था- कुछ ऐसा, जो शब्दों से नहीं कहा जा सकता। यह ऐसा था, जैसे कोई अधूरी कहानी फिर से अपनी पूरी ज़िन्दगी जीने जा रही हो।

मैंने फ़िनलैंड के बारे में फिर से पढ़ना शुरू किया- वहाँ की संस्कृति, वहाँ के लोग, वहाँ की ज़िन्दगी। सब कुछ एक सपना सा लगता था, एक ऐसी दुनिया जो जैसे मैं कल्पना ही कर सकती थी।

भाई ने वीज़ा की तैयारी में भी मेरी मदद की- डॉक्यूमेंट्स, सब कुछ। मैं तो बस उत्साह और आश्चर्य के बीच घिरी हुई थी; लेकिन फिर भी एक सवाल था जो मेरे दिल में बार-बार उठता था- "क्या सच में, फ़िनलैंड दुनिया का सबसे खुशहाल देश है?"

जब मैंने वहाँ के बारे में और जाना, तो समझ में आया कि फ़िनलैंड की खूबी सिर्फ़ उसकी प्राकृतिक सुंदरता में नहीं, बल्कि उसकी सोच में भी है।

वहाँ के लोग एक-दूसरे की इज़्जत करते हैं। न कोई दिखावा, न कोई झूठ- बस सच्चाई और शांति है।

वहाँ के जंगलों को लोग ऐसे सँजोते हैं, जैसे वो परिवार का हिस्सा हों। और यही वजह है कि फ़िनलैंड में अभी भी बहुत से देशों से ज्यादा जंगल हैं।

मैंने पहली बार 'फॉरेस्ट बाथिंग' की।

जंगल में चुपचाप चलना, उसकी ताजगी को महसूस करना, पत्तियों की हल्की सी आवाज़ सुनना- यह लगता था- जैसे प्रकृति मुझे अपनी बाहों में समेट कर गले लगा रही हो।

वहाँ मैंने पहली बार लामा देखे- एक छोटे से कैफ़े के पास। मेरी आँखों में अजीब- सी खुशी थी।

मैं एक द्वीप पर भी गई, जहाँ लोग आज भी नहीं चाहते कि वहाँ पुल बने। उनका मानना था कि उनका रिश्ता प्रकृति से वैसे ही जुड़ा रहे- सीधा, सरल, और सच्चा।

शहर की हलचल से बहुत दूर थी मैं।

वहाँ कोई शोर नहीं था, कोई भीड़ नहीं थी।

हवा इतनी ताजगी से भरपूर थी कि साँस लेना भी एक खास एहसास बन गया।

आकाश नीला था, पक्षी चहचहा रहे थे। जब मैंने बर्फ़ जैसे ठंडे पानी में अपने पैर डाले, तो वो ताजगी मेरी आत्मा में घुस/ उतर गई, एक ऐसी ताजगी जिसे मैं आज भी महसूस कर सकती हूँ।

ग्रोसरी शॉपिंग करना और जब कभी रोबोट्स खाना डिलीवर करते थे, तो लगता था जैसे मैं किसी फिल्म में हूँ- सिर्फ़ यहाँ, अब।

हमने जंगल में जाकर बारबेक्यू किया, खाना खुद पकाया, नदी के पास बैठकर खाया- और मैं वहीं बैठकर ‘नेचर लाइव ड्रॉइंग’ भी बनाई। दिल की गहराई से एक आवाज़ आई- "बस, यही तो असली ज़िंदगी है!"

वहाँ मैंने पहली बार एक अजीब-सी मगर मज़ेदार चीज़ ट्राई की- गर्म कॉफी के साथ आइसक्रीम। बिलकुल उल्टा मेल; लेकिन स्वाद ऐसा था, जैसे कोई मीठी याद मेरे होंठों पर पिघल रही हो।

ठंडी हवा, गरम कॉफी की भाप और उसमें डूबी आइसक्रीम- वे पल अब भी मेरे दिल में उसी गर्मी और प्यार से मौजूद हैं।

मैंने भाई से पूछा, “कुछ पेड़ों पर ये सफ़ेद-सफ़ेद- सा क्या है?”

उसने हँसते हुए कहा, “ये लिचन है… ये तभी उगती है, जब हवा बहुत ही साफ़ होती है।”

उस पल मुझे लगा- प्रकृति भी मुस्कुराती है, बस हम अक्सर उसे देख नहीं पाते।

यूनिवर्सिटी और कॉलेज भी देखे- इतने खुले, सुंदर और आज़ाद। वहाँ बच्चे डरकर नहीं, खुशी से पढ़ते हैं। वहाँ की पढ़ाई बोझ नहीं, एक खोज है।

और एक बात, जो मैंने दिल से सीखी- खुशी बड़ी चीज़ों से नहीं आती।

वह मिलती है- उन छोटी-छोटी बातों में- एक कप गर्म कॉफी, एक अजनबी की मुस्कान, या जंगल से उठाई गई एक पत्ती, जिसे उठाते समय ‘धन्यवाद’ कहना याद रहता है।

शायद यही वजह है कि फ़िनलैंड को दुनिया का सबसे खुशहाल देश कहा जाता है।

फिर एक दिन, जब मैं जंगल में चल रही थी, तो मैंने सुनी थी, "Santa rides the sky so bright, with reindeer leading through the night."

अब मेरे सामने रेनडियर्स थे!

पहली बार मैंने उन्हें देखा और उसी वक्त मुझे ‘जिंगल बेल्स’ की कविता याद आई।

रेनडियर्स और सांता क्लॉज़ का रिश्ता वाकई में कुछ जादुई था।

फ़िनलैंड में जब मैं खरीदारी नहीं, बल्कि लोगों से दिल से बात करने और वहाँ की संस्कृति को समझने में ज्यादा रुचि लेने लगी, तो मुझे एहसास हुआ कि वहाँ के लोग बहुत शांत, सीधे और सच्चे होते हैं।

वहाँ की ज़िंदगी में बनावट नहीं है, सच्चाई है।

वहाँ की सादगी में शांति है, रिश्तों में अपनापन है, और प्रकृति में भगवान बसते हैं।

अब मेरी टू-डू लिस्ट में एक और सपना जुड़ चुका है- नॉर्दर्न लाइट्स देखने का।

मैंने इसके बारे में बहुत सुना है और कहीं पढ़ा था कि अगर आप दिल से किसी चीज़ की मन्नत करते हैं, तो वह सच होती है।

अब बस उस दिन का इंतजार है जब नॉर्दर्न लाइट्स के रंग मेरे सामने होंगे।

जो मैं देखना चाहती हूँ, वह सच हो! ■

रचनाकार के बारे में-  जैस्मिन, उपनाम: जोवियल जैस्मिन, जन्म: 10 जनवरी, शिक्षा: एम. ए. ललित कला, एम.ए. अंग्रेजी, कला में पीएच.डी.  मीराबाई पॉलिटेक्निक नई दिल्ली से व्यावसायिक कला में डिप्लोमा, शंकर्स एकेडमी ऑफ बुक इलस्ट्रेशन एंड पब्लिशिंग, आईटीओ, नई दिल्ली से पुस्तक चित्रण और ग्राफिक डिजाइन में डिप्लोमा, कला चिकित्सा में डिप्लोमा। सम्प्रति: अध्यापक, बच्चों के उत्थान के लिए कार्यरत गैर सरकारी संगठन सुभग फाउंडेशन से जुड़ी हैं। लेखन: कहानी, कविता, निबंध।  अभिरुचियाँः  बेकार पड़ी सामग्री को सुंदर कलाकृतियों में बदलना, पर्यावरण-अनुकूल प्रथाओं को बढ़ावा देना। इनकी रचनाओं में मधुबनी, गोंड और भील जैसी विविध भारतीय लोक कला शैलियों के तत्त्वों का मिश्रण है। - jasminemaggo@gmail.com

Apr 1, 2025

यात्रा-संस्मरणः भृगु लेक के द्वार तक

  - भीकम सिंह

  पाँच जून दो हजार चौबीस की सुबह आठ बजे मनाली से लगभग पंद्रह किलोमीटर पहले छोटे से बस स्टेशन फोरटीन माइल पर ना मालूम कितने ट्रैकर उतरे हैं। उनमें हम छह (संजीव वर्मा, डॉ॰ ईश्वर सिंह, अशोक भाटी भाटी, भूपेन्द्र सिंह, इरशाद और मैं) भी एच.आर.टी.सी. की बस से उतरे, उतरते ही देखा कुछेक ट्रैकर मस्ती में गीत गाते हुए आधार शिविर की ओर चले जा रहे हैं। सामने ही दिख पड़ा वैलकम टू फोरटीन माइल आधार शिविर का बैनर। व्यास नदी के किनारे पर यूथ हॉस्टल एसोसिएशन ऑफ इण्डिया ने स्थापित किया है। प्रवेश द्वार पर ही ग्रुप लीडर राकेश तिवारी ने आगे बढ़कर प्रसन्न हृदय से हाथ मिलाया। ‘आप लोगों का स्वागत है।’ उसने कहा। तुम्हारी सूचना मिल गई  थी। अभी टैंट नम्बर बीस में सामान रखकर फ्रेश-व्रैश हो लो। तिवारी जी हमें सुसंस्कृत लगे। टैंट नम्बर बीस गद्दों, कम्बलों और स्लिपिंग बैग से सजा है, जिसमें हम सोंएँगे। बड़े उत्साह से हमने अपने-अपने रुकसैक टैंट नम्बर बीस में जमा दिए हैं। टैंट में लाइट भी जल रही है, चार्जिंग मल्टी प्लग भी लगा है। संजीव वर्मा स्विच खोलने लगे, तो देखा टैंट की छत पर मक्खियाँ जमीं बैठी हैं, फिर हमने तहाई हुई स्लीपिंग सीट से उन्हें बाहर निकाला और टैंट का दरवाजा बन्द कर दिया। थोड़ी देर बाद हम हाथ-मुँह धोकर ब्रेकफास्ट के लिए डाइनिंग एरिया में चले गए । पूड़ी, सब्जी, अंडा, कॉर्नफ्लेक्स लेकर हम खाने बैठे। खा-पीकर हमने डौक्यूमैंटेशन कराया और दूसरे ट्रैकर्स से परिचय करने लगे। हमारा ग्रुप बी.एल.टी. जीरो फोर है, जिसमें छह महिला और बाईस पुरुष मिलाकर कुल अट्ठाईस ट्रैकर्स हैं। कल हमें भृगु लेक जाना है; इसलिए रतन सिंह भाटी का ओरिएंटेशन कार्यक्रम भी होना है, जिसकी व्यवस्था ग्रुप लीडर राकेश तिवारी ने की है। हम सभी वहीं बैठ गए हैं। रतन सिंह भाटी ने भृगु लेक ट्रैक के बारे में बताना शुरू किया, वे अपने चेहरे पर सुहानी मुस्कान लिये बौर होने की सीमा तक कार्यक्रम में समाँ बाँधते रहे। बीच-बीच में ट्रैकर्स कभी यहाँ तो कभी वहाँ आते जाते रहे ; परन्तु मग्न भाव से रतन सिंह भाटी अपनी आँखों को मिचमिचाते रहे, जैसे वह कोई बड़े महत्त्व की जानकारी हमें दे रहे हैं।

ओरिएंटेशन कार्यक्रम खत्म होते-होते लंच का समय हो गया और लंच करते-करते व्यास  में नहाने का कार्यक्रम बन गया। अपना-अपना नहाने का सामान लेकर हम छहों व्यास रीवर फ्रंट की ओर बढ़ रहे हैं। हमें देखा देखी दूसरे ट्रैकर भी नहाने आ गए। व्यास  के बड़े-बड़े शिला खंडों पर काई जमी है जो फिसलन भरी है। ऐसे में कहाँ नहाएँगे? मैं पूछ बैठा।

यहीं एक-एक डुबकी लगा लेते हैं भाई साहब! अशोक भाटी भाटी ने कहा।

मैंने इस आशंका के बारे में तो सोचा ही नहीं था। मैंने तो सिर्फ नहाने भर का सोचा था। बीच धार में नहाने की हिम्मत जवाब दे गई, तभी माइक पर घोषणा हुई कि स्नान के लिए नदी के अन्दर न जाएँ, दुर्घटना हो सकती है। इसी बीच एक व्यक्ति ने वहाँ पर नहाने के लिए हमें मना भी किया। फिर हम व्यास किनारे बनी एक दुकान पर पानी पूरी खाने बैठ गए। संजीव वर्मा ने कहा, ‘आए थे राम भजन को ओटन लगे कपास’।

सब ठट्ठाकर हँस पड़े।

अशोक भाटी ने कहा, ‘‘अच्छा होगा कि हम कैम्प में जाकर ताश खेलें- क्यों भाई साहब!’’ मैंने भी हामी भर दी। भूपेन्द्र सिंह ने कुछ ऐसा ही जवाब दिया, जैसा कि ऐसी परिस्थितियों में दिया जा सकता है, और हम जल्दी ही आधार शिविर में आ गए, जहाँ हमारी मुलाकात एक लड़की से हुई,  जिसका चेहरा बहुत ही भला था और कला में पगा भाव उस पर छाया हुआ था। भूपेन्द्र सिंह ने उसे भी ताश खेलने का न्योता दे दिया, जिसे उसने मुस्कराते हुए स्वीकार भी कर लिया। उसने पूछा, ‘‘कौन-सा खेल खेलते हो?’’

मैंने कहा, ‘‘जजमेंट।’’

और हम जजमेंट खेलने बैठ गए।

राकेश तिवारी की व्हिसल बजी, डिनर तैयार है, हमने कप प्लेटें निकालीं। निश्चय ही कुछ बढ़िया बना होगा वरना वाई.एच.ए.आई. का ट्रैक कोई क्यों  करेगा। ऊपर से पेट भी बज रहा था भूख के मारे। मैंने जल्दी-जल्दी कुछेक उबले अंडे, दाल-चावल, सब्जी, चार रोटी, अचार और काफी सारा कस्टर्ड प्लेट में भर लिया और साथ में एक मग गरम पानी भरकर सामने पड़ी प्लास्टिक की टेबुल पर रख लिया। निश्चय ही इतना डिनर स्वास्थ्यकर नहीं होगा; परन्तु मैंने कर लिया। रात भर भूपेन्द्र सिंह जोरों के साथ खर्राटे भरता रहा। संजीव वर्मा पूरी रात ऑनलाइन रहे। मुझे भी झपकी-सी आती रही। आँख तब खुली, जब चाय की टोह में इरशाद किचन के चक्कर लगा रहा था।

दो हजार चौबीस का छह जून है। आधार शिविर की चहारदीवारी में सेवों के वृक्ष अपने कच्चे सेव लिये पूरी गरिमा के साथ खड़े हैं। बन्ने और शकूरे की बेरहम कुल्हाड़ी से वे बच निकले हैं, अभी भी छोटे-छोटे पत्तों से युक्त उनकी डालियाँ आधार शिविर को छाया प्रदान कर रही हैं। वाई.एच.ए.आई. की ट्रैवलर बस आ चुकी है। आज हमें पहले कैम्प ‘गुलाबा मीडो’ के लिए निकलना है। फोरटीन माइल से लगभग साठ किलोमीटर ट्रैवलर बस से चलना है फिर दो किलोमीटर की चढ़ाई करके गुलाबा मीडो पहुँचना है जिसे जोंखर और चौदह मोड़ के नाम से भी जाना जाता है।

‘हाँ तो चलिए, गुलाबा मीडो में चलें’ राकेश तिवारी ने हार्दिकता से कहा और ट्रैवलर बस दो गाइड  सहित अट्ठाईस ट्रेकर्स को लेकर चल पड़ी। राह में पुरानी परम्परा की इमारतें, छोटे-छोटे बाजार व्यास  नदी को पार करने के लिए धातु का पुल, खेत, एप्पल के बाग, मेपल ट्री, ओक-पूरा परिदृश्य स्वाभाविक है, फिर धीरे-धीरे हमने रोहतांग दर्रा पार किया, तो हमारी ट्रैवलर बस कुल्लू में प्रवेश कर गई  और हमें ओक के जंगल और घास के मैदान नजर आने लगे। हमने ट्रैवलर बस से उतरकर ग्यारह बजे के आस-पास पैदल चलना शुरू कर दिया है। गुलाबा मीडो कैम्प समुद्रतल से लगभग आठ हजार पाँच सौ फुट की ऊँचाई पर है। हम कैम्प से एक किलोमीटर पहले एक कैंटीन पर रुक गए हैं। कैंटीन वाला सिर झुकाकर सभी का अभिवादन कर रहा है। यहाँ से गाँवों के चिह्न कम हुए हैं और घास के मैदान, ओक के जंगल, बर्फ की चोटियाँ, जंगली फूल और जल स्रोत दिखाई देने लगे हैं। भूपेन्द्र सिंह लड़कियों के बीच गाने की बानगी दिखा रहे हैं। कोई फिल्मी गीत छेड़ते हैं और मुखड़ा गाकर छोड़ देते हैं, फिर दूसरा गीत पकड़ लेते हैं। अंकिता उनका साथ दे रही है, अंकिता ने उन्हें डैडी कहना शुरू कर दिया है। इरशाद और 

अशोक भाटी भाटी के चेहरे के भाव को डॉक्टर ईश्वर सिंह ने ताड़ लिया है कि भूपेन्द्र सिंह के गाने में उन्हें कोई खास रस नहीं मिल रहा है। ट्रैकर अलग-अलग ग्रुप बनाकर कानाफूसी करने लगे हैं तभी गाइड  की आवाज सुनाई दी- “चलो!”, सभी खड़े हो गए, सभी की भावभंगिमा में आत्मानुशासन का भाव है। घास के मैदानों से ताजगी की सुगंध आ रही है। आधा घंटे में ही हम गुलाबा मीडो कैम्प आ गए। आज रात यहीं विश्राम करना है। कल रोला खोली कैम्प के लिए निकलेंगे। कैम्प लीडर आर.के. गुप्ता कैम्प की व्यवस्था के बारे में बात कर रहे हैं। हमें वरुण  खटाना की आवाज सुनाई दी, “चाय तैयार है।” हम मग लेने टैंट के अन्दर गए और वापस आकर टी कन्टेनर से मगों में चाय लेकर आर.के. गुप्ता के साथ बातचीत में रम गए। कुछ ट्रैकर इधर-उधर मँडराने-डोलने लगे हैं, अशोक भाटी भाटी भी उन्हीं में है। कुछ इस बात की चर्चा कर रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में लगातार तीसरी बार बहुमत हासिल करने के बाद राजग ने नरेन्द्र मोदी को अपना नेता चुन लिया है। फुन्दनों की कैप को सिर पर लगाए भूपेन्द्र सिंह सिकन्दर के अंदाज में खड़ा है। गले में बैंगनी रंग का मल्टी परपज पहने डॉ. ईश्वर सिंह वनस्पतियों की खैर-खबर ले रहा है। चारों ओर पर्वत शिखर नजर आ रहे हैं। किचन से भागचंद गर्म पानी का कंटेनर लिये आ पहुँचा है और सिर को घुमाते हुए आर.के. गुप्ता से कहता है, “डिनर तैयार है।” तभी, मैंने देखा कि आर.के. गुप्ता डिनर के लिए बोलते उससे पहले ही हम डिनर करने के लिए तैयार हो गए और इत्मीनान के साथ प्लेटों के बाद प्लेटें, मग के बाद मग खाली होते रहे। तत्पश्चात् स्लीपिंग बैगों में गुड़मुड़ी बनकर सो गए।

आज दिल्ली में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन एक बार फिर सरकार बनाने के लिए दावा पेश करेगा, स्लीपिंग बैग में पड़े-पड़े वरुण  खटाना ने कहा , तो आँख खुली। आज यानी सात जून को हमें अगले कैम्प के लिए प्रस्थान करना है। डॉ. ईश्वर सिंह आँखें मूँदे पड़े हैं। ‘‘डाक्टर साहब! उठो, लो चाय पी लो’’, इरशाद ने कहा, तो उनकी काया में कुछ हलचल हुई। हम सब उठ गए और स्लीपिंग बैगों में ही बैठे रहे। मुझे हिमालयन बुलबुल की आवाज़ आई, मैंने कहा वकील साहब! यह तो वही है जिसका आपने आधार शिविर में फोटो शूट किया था, काले मुँह और सफेद गालों वाली। इतने में भूपेन्द्र सिंह बोल पड़ा, नहीं भाई साहब! मखमल गालों वाली। ठहाका लगा, तो दूसरे टैंट से भी ट्रैकर बाहर निकले और पूछने लगे, ‘‘क्या हुआ! क्या हुआ! ’’ मैंने भूपेन्द्र सिंह से कहा, ‘‘अब राजू बन गया जैंटलमैन का गाना मत सुना देना’’ और इस खुशनुमा वातावरण से आज का दिन शुरू हुआ। घास के मैदानों ने अपना चेहरा दिखाया, इससे खूबसूरत दिन की कल्पना नहीं की जा सकती, आज हम रोला-खोली जाएँगे।

अब हम अट्ठाईस ट्रैकर रोला-खोली की ओर चले। सुबह के आठ बजे हैं। धूप खिली है। पर्वत शिखरों से बादल उठ रहे हैं। सूखे पत्ते और तिनके हमारे रास्ते में कालीन बनने को तैयार हैं। ओक का जंगल बिदाई को खड़ा हो गया है। किसी लड़की का पैर फिसलकर मुड़ गया है, वह वहीं बैठ गई  है। बाकी ट्रैकर आगे निकल गए हैं। एक गाइड उस लड़की के पास रुक गया है। वैसे भी वह रूखे स्वभाव की है, हालाँकि उसके कठोर होने की शिकायत किसी को नहीं है। बस अंकिता उसे उचक-उचककर देखती रहती है। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं, घास के मैदानों की हरियाली बढ़ने लगी है। पहाड़ों पर हल्के-हल्के जंगली फूल दिखने लगे हैं। सोलंग घाटी से होती हुई ठंडी हवा शरीर में झुरझुरी पैदा करने लगी है, ऊपर चढ़ती हुई घुमावदार पगडंडी पर एका-एक मोड़ आया और हम बड़े जल स्रोत पर पहुँच गए हैं। यही हमारा लंच प्वाइंट है। गाइड ने रुकने के निर्देश दे दिये हैं। मैंने देखा, पीछे बहुत दूर गाइड के साथ वह लड़की घिसट रही है। पगडंडी के किनारे-किनारे पड़े पत्थरों पर हम बैठ गए हैं। पीर पंजाल और धौलाधार रेंज के अद्भुत दृश्य दिखायी दे रहे हैं। फोन के सिग्नल आ-जा रहे हैं। एक भेड़ बकरियों का बड़ा- सा झुण्ड हमारे पास से गुजरा है, उनके ताजे-ताजे निशान वहीं पड़े दिख रहे हैं, और हम लंच कर रहे हैं। लंच करते ही शरीर में एनर्जी जगमगा उठी है। सभी के रुकसैक पीठ पर आ गए हैं। आसमान में बादलों की कतरनें उड़ने लगी हैं। पहाड़ गुनगुनाने लगे हैं। हम भी उन्हीं में रमते-रमाते रोला-खोली की ओर बढ़ने लगे हैं। संजीव वर्मा का मोबाइल कैमरा हर वक्त ऑन रहा है। वह अपने पसंदीदा दृश्य शूट कर रहे हैं। उनके मुँह से निकला, ‘‘अद्भुत!’’ दूर, काफी दूर रोला-खोली के टैंट नज़र आ रहे हैं। हम उत्साह से अधीर हुए जा रहे हैं, और हम पाँच बजे तक उतर ही आए। कैम्प लीडर आनन्द भावे ने गरमागरम आलू- बंडे और चाय से हमारा स्वागत किया। हम थककर चूर हैं हमारे चारों ओर ऊँचे-ऊँच पहाड़ हैं, मैदान में बड़े-बड़े शिलाखण्ड भी हमारे साथ जैसे टैंट लगाकर जमे हैं। पेड़-पौधों को गुलाबा मीडो में जंजीर से बँध दिया है। कुछ ट्रैकर बर्फ में भीगे हुए भृगु लेक से आ रहे हैं, जैसे बर्फ में तैर कर आए हों, उन्हें देखकर मुझे झुरझुरी-सी आ गई। कल (आठ जून) हमें भी भृगु लेक जाना है, तभी हमने देखा दूसरा गाइड पगडंडी छोड़कर हमारी ओर उतर रहा है, साथ में विजय तिवारी और वह लड़की है। ‘‘चले आओ! चले आओ!’’ हमारा समवेत स्वर गूँजा। फिर मैंने कहा, ‘‘अशोक भाटी जी! चलें? कुछ खेलें-खालें, घूमे-फिरें? कल भृगु लेक चढ़ना ही है, क्यों? ... वैसे तो थकान उतरी नहीं है।’’

इतने में ही इरशाद बोला, ‘‘छोड़ो भाई साहब मैं भी कल यहीं रहूँगा।’’ अशोक भाटी बड़बड़ाया ‘‘इतना परिश्रम करके आए हैं; केवल भृगु लेक के लिए या कैम्प में आराम करने?’’

‘‘अब टैंट में चलो’’, डॉ. ईश्वर सिंह ने जल्दी मचाई और हम छहों टैंट में आकर जैसे ढह गए। आठ जून को हम जल्दी जाग गए, भृगु लेक जाना हैं। पहले हम खुले में शौच के लिए गए उसके बाद हाथों में दस्ताने, रैन सीट, स्नोबूट और सनग्लास पहनकर पैक लंच लिया- कुछ कार्बोहाइड्रेट और विटामिनयुक्त खाद्य भी रखे। संजीव वर्मा घर से लड्डू लाए हैं, उन्होंने वे भी रख लिये। इरशाद ने रोला-खोली कैम्प में ही आराम करने का मन बना लिया है। उनके साथ पाँच लोग रुकने वाले हैं। हम बाईस ट्रैकर आत्मविश्वास से भरे हुए धीरे-धीरे पैर बढ़ाते हुए भृगु लेक की तरफ बढ़ने लगे हैं। रोला-खोली कैम्प की बगल में स्थित नदी को पार करते हैं। चढ़ाई के ठीक बीस मिनट बाद जमीन एक विशाल हिम चादर में खुलती है। यहाँ से हमें देव टिब्बा, हनुमान टिब्बा और सोलंग घाटी का मनोरम दृश्य दिखाई दे रहा है। पैर धीरे-धीरे बढ़ाना एक तरह से अनिवार्य सा हो रहा है; क्योंकि बर्फ तोड़-तोड़कर चढ़ना दुष्कर सा हो रहा है, साँस फूल रही है, झर-झर स्नोफॉल हो रहा है, धूप नहीं है, भृगु लेक हमें पुकार रही है। रास्ता फिसलन वाला है। बीच-बीच में किसी ना किसी के फिसलने का दृश्य दीख जाता है तो हँसी छूट जाती है। भूपेन्द्र सिंह ने जूतों पे क्रैम्पन (कील लगी चैन) पहनी है, उन्हें फिसलने का डर नहीं है। सीधी खड़ी पर्वत श्रेणियाँ हैं सफेद बर्फ जमा हुआ है। स्नोफॉल रुक गया है। अंततः उसी स्थान पर हम पहुँच गए, जहाँ हमें पहुँचना था अर्थात् भृगु लेक के द्वार पर। आह! कैसा अद्भुत, आध्यात्मिक वातावरण है। हम गुग्ध भाव से देखते रहे। यह झील भारत के हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में चौदह हजार एक सौ फुट की ऊँचाई पर है। यह एक पर्वतीय झील है जो रोहतांग दर्रे के पूर्व में है। इसका नाम महर्षि भृगु पर पड़ा है। बाईस के बाईस ट्रैकर पीली, काली, नीली रैन सीट में नाचते से घूम फिर रहे हैं। कभी-कभी पैर घुटने तक बर्फ में धँस जाते हैं, फिर पैर खींचकर बर्फ से बाहर निकालते हुए हम आनन्दित हो रहे हैं। डॉ. ईश्वर सिंह की नाक लाल हो गई  है। चारों तरफ सफेद बर्फ का साम्राज्य है। अंकिता के साथ छहों लड़कियाँ ठेलमठेल मचाए हुए हैं, वह बर्फ के गोले फेंकने से नज़र आ रहा है। उमर का ख्याल आते ही चेहरे पर विरक्ति के भाव आ गए हैं। तभी गाइड की आवाज़ आई- ‘‘चलो! जल्दी करो!’’ फिर हम ढलवा रास्ते पर चलने लगे, लगभग पाँच सौ मीटर ही चले थे कि गाइड  ने कहा-‘‘यहाँ लंच कर लें फिर स्लाईडिंग (फिसलकर) द्वारा रोला-खोली पहुँचेंगे।’’

आठ जून दो हजार चौबीस के दो बजे हैं, हम पैर फैलाकर टिफिन हाथों में लिए बैठे हैं। हमारी रैन सीट पर स्नोफॉल की कुछ बर्फ बिखरी हुई है। सामने अलोकिक भृगु लेक है। लंच करने के बाद हम बाईस के बाईस फिसलनकारी बर्फ पर पैर जमा-जमाकर रोला-खोली की ओर बढ़ने लगे। गाइड  ने एक ढलवाँ पगडंडी पर रोक दिया, यहाँ से स्लाइडिंग करते हुए जाना है। वाह!... बिना स्की, बिना स्केट, सर्र-सर्र हम ढलवाँ पगडंडी पर फिसलने लगे। फिसलकर लगभग एक किलोमीटर नीचे पहुँचे, तो जूतों में, पिछवाड़े में बर्फ घुस गई। एक लड़की को चोट लगी है शेष इक्कीस अगली स्लाइडिंग के लिए तैयार हैं। भीतर रोमांच होता रहा, बाहर स्नोफॉल। एक-एक करके हमने छह स्लाइडिंग की, थकान का पता ही नहीं चला और हम रोला-खोली आ गए। पाँच बज चुके हैं कैम्प में पहुँचते ही कपड़ों में घुसी बर्फ को निकालना शुरू किया। ठण्ड बहुत लग रही है, सामान रखकर, गर्म कपड़े बदलकर हम चाय पीने के लिए आ बैठे हैं। दूर-दूर तक बिछी बर्फ, उसके बीच से आती ठण्डी हवा, पास में ठंडे चिकने पत्थरों पर उछलती धारा शरीर में खुरखुरी पैदा कर रही है। ठंड की बेचैनी हमें स्लीपिंग बैग में ले गई। कल हमें आधार शिविर निकलना है, यही सोचकर हम देर तक सोते रहे। ठंड की मार के कारण हम स्लीपिंग बैग के भीतर हिल भी नहीं पाए।

नौ जून दो हजार चौबीस को सुबह नौ बजे आधार शिविर फोरटीन माइल के लिए प्रस्थान किया। अब हम पच्चीस हैं, तीन कल ही जा चुके। आज रविवार का दिन है और नरेन्द्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। लगभग घंटेभर चलने के बाद आराम करने की इच्छा हुई, मैंने गाइड  से कहा, तो उसने मना कर दिया और कहा, ‘‘गुलाबा मीडो के पास लंच होगा और वहीं ट्रैवलर बस का इंतजार करते हुए आराम भी होगा।’’ गाइड ने ये शब्द कुछ ऐसे ठेठ अंदाज में कहे कि मानों वह कह रहा हो कि जहाँ मन करे, आराम करो। मैं एक जल स्रोत के पास बैठ गया हूँ, धूप निकली है, दिन सूखता सा चल रहा है, मेरे सामने भेड़ बकरियों का झुण्ड है, जो लम्बी लाइन लगाकर पानी पी रहा है। सामने सोलन घाटी, सूखी हरी घास से ढकी ढलावदार पगडंडियाँ हमें बारह बजे तक गुलाबा मीडो के पास ले आई हैं। हम धूप में बैठे ताश खेल रहे हैं, गर्मी के मारे बेचैनी हो रही है, हवा के स्पर्श का अनुभव बीच-बीच में हो रहा है। हमारे ठीक सामने सड़क के दूसरी ओर कुछ ट्रैकर ट्रैवलर बस का इंतजार कर रहे हैं और कुछ ओक की छाँह में बैठे हैं। गाइड  शोर मचा रहा है। मैंने घूमकर देखा, तो वरुण  खटाना पर मेरी नज़र पड़ी, जो कंधों पर अपना रुकसैक चढ़ा रहा है। शेष ट्रैकर गर्मी से परेशान हुए निश्चल बैठे हैं। ‘‘चलो!’’ हमारी ओर ताकते हुए वरुण खटाना ने चिल्लाकर कहा। थोड़ी देर में ही हम ट्रैवलर बस में बैठ गए हैं, आधार शिविर के लिए। बस ड्राइवर ने गाना बजा दिया है, ओ, केटी को, केटी को।

Apr 1, 2024

यात्रा- संस्मरणः एलिफैंटा केव्स- अद्भुत संरचना

 - प्रिया आनंद

इस महीने के पहले सप्ताह के तीन दिन समंदर के सान्निध्य में ही बीते। वह चार जनवरी का दिन था, जब हम ऐलिफेंटा गुफाएँ देखने गए थे। बचपन से ही उनके बारे में सुना और सिखाया गया था इसलिए मन में उत्सुकता भी थी। गेटवे ऑफ इंडिया से हम फेरी पर गए। अचानक ही हमें बहुत सारा सीगल्स ने घेर लिया था। वे पंख फड़फड़ाती सिर के ऊपर उड़ती और शोर मचाती रहीं। लोग हाथों मे बिस्किट, चिप्स और कुरकुरे के लिए हाथ बढ़ाते हैं और वे बड़ी सफाई से हाथों से उठा लेतीं। यह एक खूबसूरत नजारा था।

सागर मुझे चंचल नहीं बेहद बेचैन सा लगता है।  जैसी इसकी गहराई है, उतनी ही बेचैनी ऊपर दिखाई देती है।  ठीक ऐसे मनुष्य के मन की तरह, जो ऊपर से बेहद शांत सा दिखाई देता है।  हालांकि हम फेरी से उतरकर टॉय ट्रेन में बैठे और फिर पत्थर की सीढ़ियों की बारी आई।  किसी तरह ऊपर भी पहुँच गए।  यह एकल शैलोत्खनित मंदिर समूह है, जिनमें बेहतरीन कलात्मकता के दर्शन होते हैं।  इतनी बड़ी और भव्य मूर्तियाँ। लगभग सभी खंडित देखकर दिल उदास हो गया। 

 इतनी सुंदर मूर्तियों को तोड़ते हुए किसी का दिल नहीं कांपा होगा? किसी भी देश पर आक्रमण करने वालों के लिए यह जरूरी हो जाता है कि उस देश की सांस्कृतिक धरोहरों को ही ध्वंस किया जाए? पूरे परिसर में गहन सन्नाटा था पर वे खंडित मूर्तियाँ और सुंदर प्रस्तर स्तंभ अपनी कहानी अलग ही कह रहे थे। लौटते वक्त फेरी पर बैठते ही फिर सीगल्स ने घेर लिया। इस बार उनकी तादाद कुछ ज्यादा ही थी। दूर कितने ही मालवाहक विशाल जलपोत सागर के बीच में खड़े थे। यह सुखद सुखद पर्यटन था , जो बहुत दिनों तक मेरी स्मृतियों में बना रहेगा। । 

कोंकण - समुद्र तट पर

 सागरतट अपने आप में एक चुंबकीय आकर्षण रखता है। किसी भी बीच में जाइए आप घंटों टहलते हुए वक्त गुजार सकते हैं। इसके अलावा कोंकण के तटीय क्षेत्र बहुत ही आकर्षक हैं। एलिफैंटा से लौटते हुए अगले दिन हमने देवगढ़ बीच जाने का फैसला किया हालांकि तय यही हुआ कि इसी के साथ और सभी बीच भी देखते चलते हैं। रास्ता काफी लंबा और उबाऊ था सुबह आठ बजे के चले हुए  वहाँ हम साढ़े तीन बजे पहुँचे। इस बार का रिजॉर्ट बीच के काफी करीब था इसलिए जल्दी ही सभी बीच की तरफ हो लिए। बच्चे बहुत खुश थे, पर इस बार भी वही काली रेत थी। सफेद लहरें और काली रेत। शाम होने की वजह से लहरें काफी तेज थीं । अंदर जाते ही हम लोग बुरी तरह भीग गए।

पुणे का मौसम भी ऐसा है कि दिल कभी-कभी बारिश की तमन्ना करने लगता है। तब इस कमी को सागर की लहरें एक हद तक पूरा कर देती हैं। अगले दिन सुबह साढ़े छह बजे तक तो उजाले का कहीं अता-पता नहीं था। साथ के सभी लोग वॉक करने चले गए और मैं वहीं आस-पास के क्षेत्र में टहलती रही। अंतिम कॉटेज का नाम एकांतिका था इस कॉटेज के सामने बहुत बड़ा तालाब था जिसमें सफेद और गुलाबी कमल की खुशबू थी। जगह अच्छी है आँखों को राहत देने वाली। अब सबसे मजेदार बात यह हुई कि यहाँ किसी का फोन ही काम नहीं कर रहा था। इसलिए हम सिर्फ तस्वीरें खींच रहे थे। उस पूरे दिन हम जाने कितने बीच ही घूमते रहे। श्रीधर बीच सबसे सुंदर था। रेत काली ही थी पर लहरें काफी बड़ी और साफ सफेद थीं। सूरज डूबने के बाद भी हम वहाँ टहलते रहे।  

 फिर आई बी रेजोर्ट में शानदार डिनर किया और अपने होटल वापस हो लिए।

 लौटने से पहले हम आरावी बीच पर चले गए । बच्चों ने कहा था कि यहाँ काफी बड़े शेल थे। बड़े तो क्या वहाँ छोटे घटिया शेल भी नहीं मिले, पर बीच का नजारा खूबसूरत था आँखों को ठंडक देने वाला। ये हमारी तफ़रीह के सुनहरे दिन थे। ■


Jul 1, 2023

यात्रा-संस्मरणः घने बादल और बारिश में भीगता समुद्र

 - नीरज मनजीत

सड़क के एक तरफ़ सह्याद्रि की हरी-भरी पहाड़ियाँ और दूसरी तरफ मूसलाधार बारिश में भीगता सलेटी समुद्र... वृक्षों, पौधों की हरीतिमा धुलकर साफ चटक हरी हो गई है और बारिश के कोहरे में समुद्र धुँधला... और अधिक धुँधला हो रहा है... मूसलाधार बारिश का भी अपना कोहरा होता है.... बादल-बारिश- कोहरा-समुद्र... लगता है कि दसों दिशाओं में सैकड़ों मील घना सलेटी कोहरा आकार ले रहा है... धूप का एक टुकड़ा भी हमें दिखा.... बस थोड़ी देर के लिए... फिर वह हमारी परछाइयों के साथ कहीं गुम हो गया....

यह बारिश के दिनों का दापोली है... महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में सह्याद्रि पर्वत शृंखला की गोद में बसा यह तटवर्ती नगर बारिश में नहाकर कुछ ज़्यादा ही खूबसूरत दिखाई पड़ता है.... नितांत उस कविता की तरह जो उस दिन लिखी गई....

             कोहरे  की  बारिश      


                    बारिश के कोहरे में

                     खो गया है समुन्दर।

                     कोहरे के बादलों तले

                     कोहरे की नीली-हरी मौजें

                     करवटें बदल रही हैं।


                    बादल बारिश समुन्दर

                    या कि सलेटी कोहरे से

                    कोहरे की बारिश

                    बरस रही है

                    नीले कोहरे पर।


                   सबकुछ मिलकर ज्यों

                   एक बहुत बड़े वितान पर

                   गतिमान कई दृश्याभास।


                   समन्दर के किनारे

                   कोहरे के साहिल पे 

                   धूप का एक टुकड़ा

                   दिखा था जो थोड़ी देर पहले,

                   वह गुम हो गया है

                   हमारी परछाइयों के साथ !

दापोली में हम पूरे सवा दो दिनों तक रहे। हम सब रचनाकार 25 जुलाई, 2017 की रात 10 बजे के आसपास एक पहाड़ी पर बसे सागर हिल रिसोर्ट पहुँच गए थे। बस से उतरते ही ताज़ा ठण्डी हवाओं, हल्की बूँदाबाँदी और सड़क के थोड़ा नीचे समुद्र की गरज ने हमारा इस्तक़बाल किया। रात के वक़्त हम कतई नहीं देख पाए कि हम कितनी सुंदर दृश्यावलियों से घिरे हैं। सुबह खिड़की खोली, तो सामने अपनी लहरों पर तैरते आकर्षक समुद्र का विस्तार था और आसमान पर घने काले बादल छाए हुए थे। चाय पीने रिजॉर्ट की ऊपरली छत पर बैठे ही थे कि ठण्डी हवाओं के साथ तेज बारिश शुरू हो गई। उसके बाद तो पूरे 52 घण्टों तक हम थे, सह्याद्रि की सुंदर शृंखला थी, बादल बारिश समुद्र थे और तन-मन के आरपार होकर गुज़रती ठण्डी हवाएँ थीं। ताज़ा ठण्डी हवाएँ, बादल, बारिश और समुद्र 28 जुलाई की सुबह 10 बजे तक हमारे साथ-साथ चलते रहे। जब हमने दापोली को अलविदा कहा, तो मानो खिली धूप का उपहार देकर उन्होंने हमें विदाई दी।

दापोली जाने के लिए मई महीने के आखिरी हफ़्ते मैंने ट्रेन की टिकटें बुक करा लीं, ताकि ऐन वक़्त पर किसी परेशानी का सामना न करना पड़े। मुम्बई की टिकिट एक दिन पहले यानी 23 जुलाई की ली। 24 जुलाई का दिन वहाँ मित्रों से मुलाक़ात का तय किया। टिकटें आदि हो जाने के बाद दापोली के बारे में नेट पर सर्च किया, तो कुछ खास जानकारी नहीं मिली। एक तरह से यह ठीक ही होता है। किसी यात्रा के पहले सबकुछ जान लिया गया, हो तो कुछ रोमांच शेष नहीं रहता। खैर, जुलाई के पहले हफ़्ते बारिशें आने लगीं। बड़ी खुशगवार-सी, तन-मन को भिगोती। ऐसी, जिन्होंने थमने का नाम नहीं लिया। दूसरे हफ़्ते बारिशें थोड़ा भयभीत करने लगीं। हर तरफ़ से बड़ी ही डरावनी खबरें आ रही थीं। खासतौर पर मुम्बई से। प्रवास खटाई में पड़ता नज़र आने लगा। फिर भी हिम्मत जुटाकर सामान बाँध लिया, तैयारी कर ली।

22 जुलाई को एक कांफ्रेंस में शामिल होने जबलपुर जाना था। सुबह 5 बजे हम कवर्धा से जबलपुर के लिए रवाना हुए, तो तेज बारिश हो रही थी। फिर रास्ते भर बारिश लगातार घटती-बढ़ती रही। जबलपुर से वापसी के लिए निकले,  तो भी मूसलाधार बारिश हो रही थी। पानी की तेज बौछारों से जूझते कवर्धा पहुँचे; लेकिन बड़ा ही अच्छा लगा। पिछले कुछेक वर्षों से तो ऐसी तेज बारिश देखने में ही नहीं आ रही थी। 23 की सुबह चार बजे उठा, तो फिर बाहर तेज बारिश थी। तैयार होकर रायपुर के लिए निकला, तो भी अच्छी खासी बारिश हो रही थी। रायपुर में बारिश तो नहीं थी, लेकिन घने काले बादल कब बरस पड़ें, कुछ कहा नहीं जा सकता था। अच्छी खबर यह थी कि मुम्बई में बारिश थम चुकी है।

दापोली पहुँचने के लिए हमें मत्स्यगंधा एक्सप्रेस पकड़कर खेड़ जाना था। मुंबई से मडगाँव गोआ तक चलने वाली यह ट्रेन मुंबई से दोपहर 2 बजे रवाना होती है और रात 8 बजे खेड़ पहुँचती है। बारिशों में मुंबई से मडगाँव का रास्ता काफी खुशगवार और सुंदर दृश्यावलियों से भरा होता है। इसी लाइन पर देश की सबसे लंबी सुरंग है। इस सुरंग की लंबाई 12 किमी है। खेड़ से हम एक विशेष बस से दापोली पहुँचे, जो वहाँ से 45 किमी दूर था।

रसिका माने, दापोली और  मछुआरों की बस्ती

दापोली और सह्याद्रि की पहाड़ियाँ प्राकृतिक सुंदरता की दृष्टि से काफी संपन्न हैं। इसके बावजूद पर्यटन के नज़रिए से इसकी ख्याति ज़्यादा नहीं है, हालाँकि यहाँ कुछ बड़े ही अच्छे रिज़ॉर्ट हैं। दरअसल, यहाँ गोआ जैसे सुनहली रेत वाले खूबसूरत, साफ-सुथरे बीच नहीं हैं। यहाँ के समुद्रतट कटे-फटे, सँकरे और काली रेत वाले हैं। समुद्र का पानी भी अपेक्षाकृत गँदला है। सुंदर बीच तलाश करने वाले पर्यटकों के लिए भले ही यहाँ ज़्यादा कुछ न हो, पर हम रचनाकारों के लिए यहाँ बहुत कुछ था।

दापोली में यह मछुआरों की बस्ती है। यहाँ पर समुद्र काफी गहरा और उग्र है। 27 जुलाई की दोपहर जब हम यहाँ आए, तो मौसम काफी सुहावना था। ऊपर घने काले बादल थे; लेकिन बारिश नहीं हो रही थी। तेज ठंडी दिलकश हवाएँ तन-मन को ताज़ादम कर रही थीं। यह मौसम मछुआरों के लिए ऑफ सीजन है, इसलिए उनकी छोटी-बड़ी नावें समुद्र के किनारे गाँव में ज़मीन पर उल्टी-सीधी पड़ी हैं। कुछ नावें काफी बड़ी, भारी-भरकम, कई टन वजनी थीं। उन पर तालपत्री तानकर मछुआरों ने घर बना लिये थे। मैंने एक मछुआरे से पूछा कि इतनी भारी और बड़ी नाव वे समुद्र में वापस कैसे उतारते हैं, तो उसने बताया कि नाव के नीचे बड़े गोल लट्ठे डालकर धीरे-धीरे सरकाकर उसे उतारा जाता है। कुछ मछुआरे अपने जाल की मरम्मत कर रहे थे। उन्होंने बताया कि गणपति की स्थापना के साथ ही उनका सीजन शुरू हो जाता है। इस जगह एक पुराने लाइट हाउस के अवशेष भी हैं और कुछ दूरी पर एक छोटे से द्वीप पर एक भग्न होता किला है। इस किले में नाव पर बैठकर ही जाया जा सकता है, लेकिन अभी उफनते समुद्र में आवाजाही बंद है।

रसिका माने एक दुबली-पतली लड़की है, दापोली के पास बसे साखरेवाड़ी गाँव की। 26 जुलाई को ग्राम पंचायत भवन में हम उससे मिले। वह यहाँ नौकरी करती है। चूँकि हम सभी रचनाकार इस इलाके के बारे में ज़्यादा-से-ज़्यादा जानने के लिए उत्सुक थे, इसलिए हम सभी ने एक तरह से उसे घेर लिया और सवाल-पे -सवाल दागने लगे। उसे हमारी हिन्दी समझने में थोड़ी दिक़्कत हो रही थी, लेकिन बड़ी ही सहजता से, समझदारी से, बड़े ही धैर्य से उसने हमें अपने गाँव के बारे में, अपने रहन-सहन के बारे में काफी कुछ बताया। बातचीत के बीच ही किसी ने प्रस्ताव रखा कि क्यों न आज शाम हम रसिका के घर चाय पीने चलें। रसिका ने भी सहर्ष हमें आमंत्रित कर लिया। शाम को हम सभी लोग रसिका के घर गए। साथ में बच्चों के लिए कुछ चॉकलेट स्नैक्स वगैरह भी ले गए। रसिका और उसकी भाभी ने बड़े ही प्यार से हमें घर के अंदर बिठाया। रसिका का घर छोटा; किंतु पक्का था। हमने बड़े ही चाव से उसके हाथों बानी चाय पी। यह हम सब रचनाकारों की मूल भावना के अनुरूप ही था। जैसा कि हमारे वरिष्ठ साथी साहित्यकार सतीश जायसवाल ने कहा-" हमने आज रसिका के घर बैठकर चाय पी, उसके घरवालों से बातें की, तो पूरा साखरेवाड़ी गाँव हमारे साथ चला आया। यह पूरा गाँव हमारी स्मृतियों में सदैव बना रहेगा और साथ ही हम सारे रचनाकार भी इस गाँव और गाँववालों को याद रहेंगे।"

दापोली और रसिका के अलावा भी इस प्रवास का बहुत कुछ हमें लंबे समय तक याद रहेगा। बालासाहेब सावंत कृषि विद्यापीठ- यह एशिया का सबसे बड़ा कृषि विश्वविद्यालय है। बालासाहेब का जन्म रत्नागिरि जिले के मिन्या गाँव में हुआ था। वे एक सक्रिय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और शिक्षाशास्त्री थे। आज़ादी के बाद वे कई वर्षों तक महाराष्ट्र सरकार में मंत्री भी रहे। उनकी स्मृति में यह विद्यापीठ 1985 में स्थापित की गई। यहाँ के लाइब्रेरियन देवानंद बी खुपटे ने हमें काफी कुछ बताया। निकटवर्ती गाँव कर्दे के सरपंच सचिन तांडे हमसे मिलने रिसोर्ट आए। वे एक बड़े आम सप्लायर भी हैं। इस इलाके के बारे में उन्होंने हमारे कई सवालात को लेकर विस्तार से जानकारी दी। कर्दे गाँव के मोहम्मद असलम, जो हमें मस्जिद का चित्र लेते देख हमारे पास चले आए और फिर उस गली में खड़े-खड़े ही उनसे हम काफी कुछ पूछते रहे, उसके साथ एक चित्र भी लिया। कर्दे गाँव का स्कूल और फिर एक गाँववाले के घर रात के खाने में स्थानीय व्यजनों का स्वाद। 

और फिर दोनों दिन रात के वक़्त ठण्डी हवाओं, बारिश और समुद्र के साथ कविता पाठ और बातचीत। रात के वक़्त हम सभी रचनाकार गोल घेरे में कुर्सियों पर जम जाते और रसीली वार्ता तथा कविता सुनने-सुनाने का दौर चल निकलता। बारिश और समुद्र ही हमारी कविताओं के केन्द्र में थे। लग रहा था कि वे भी हमारी कविताएँ सुन रहे हैं, हमें कुछ सुना रहे हैं, हमारी बातचीत में शामिल हैं। यह एक अद्भुत अनुभव था। ■■

सम्पर्कः हैप्पीनेस प्लाजा, नवीन मार्केट, कवर्धा, छ .ग . 491995, मो.  96694 10338, 70240 13555

ई मेल- neerajmanjeet@gmail.com


Sep 1, 2022

यात्रा संस्मरणः गढ़ मुक्तेश्वर- गंगा मैया की आरती का अद्भुत नजारा

 - अंजू खरबंदा

गंगा जयंती के पावन अवसर पर गढ़ मुक्तेश्वर, जिसे गढ़ गंगा भी कहा जाता है, जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। परमानन्द कालोनी के पास स्थित ढक्का गाँव से हर माह बस द्वारा किसी न किसी तीर्थ स्थान पर जाने का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। सखी मुकेश के घर जाना हुआ, तो बातों ही बातों में पता चला कि वे लोग कल गढ़ गंगा जा रहे हैं। मेरे ये पूछने पर कि क्या कोई सीट खाली है, तो मुकेश मुझे अपने उन परिचित के घर लेकर गई, जिनके पास सीट की जानकारी थी। उन्होंने बताया कि कुछ देर पहले ही किसी ने अपनी एक सीट कैंसिल की है। मुझे लगा मानो ये मेरे लिए गंगा मैया के बुलावे का ही संकेत था, मैंने झट उसी समय अपने लिए सीट बुक करा ली।

सारी संगत अगले दिन सुबह साढ़े नौ बजे ढक्का स्कूल के पास स्थित मदर डेयरी के पास एक घने वृक्ष के नीचे एकत्र हो गई ... काफ़ी इंतजार के बाद बस साढ़े दस बजे आई और लगभग पौने ग्यारह बजे हम लोग रवाना हुए। बस ‘कश्मीरी गेट’ बस अड्डे ,

अक्षरधाम से गाजियाबाद होती हुई सवा दो बजे जिला हापुड़ स्थित गढ़ मुक्ततेश्वर पहुँची । रास्ते भर संगत ने खूब भजन कीर्तन किया। कुछ महिलाओं को तो सैकड़ों भजन कंठस्थ थे। वे भजन गाने में इतनी रम जाती कि बस के छोटे से कॉरिडोर में ही मगन हो नाचने लगती। सभी भजनों के साथ ताली बजा आनंद में डूबे हुए थे। मेरे लिए इस तरह का ये पहला अवसर था... भजनों की लय ताल कानों में रस घोल रही थी।

जब हम गढ़ गंगा पहुँचें, मई की कड़कती धूप सिर पर थी, पर गंगा मैया के दर्शन की उमंग ने कड़ी धूप के अहसास को  हम पर बिलकुल भी भारी नहीं पड़ने दिया। बस वाले ने पार्किंग में बस रोकी, वहाँ से गढ़ गंगा की दूरी कम से कम पौन किलोमीटर होगी। संगत में लगभग हर उम्र की महिलाएँ थी - पच्चीस से लेकर सत्तर वर्ष तक की! सभी के चेहरे पर गंगा मैया के दर्शन का जोश साफ दिखलाई पड़ रहा था। पौना किलोमीटर रास्ता जैसे पल भर में कट गया... कइयों ने रिक्शा पर जाने की बात की;  परन्तु सभी को पैदल देख वे भी साथ हो लीं। बाजार से गुजरते हुए बैंड बाजे के साथ नाचते- गाते लोग दिखे, बाद में पता चला कि गंगा जयंती के अवसर पर गंगा तीरे रात आठ बजे होने वाले भव्य कार्यक्रम की तैयारी का ये एक हिस्सा है।

गंगा मैया के नजदीक पहुँचते ही सभी के चेहरे यूँ खिल गए,  मानो कोई खोया खजाना मिल गया हो। सभी ने वहाँ बिछे तख्तपोश पर सामान रखा... दो तीन महिलाओं को सामान की निगरानी का निर्देश दे बाकी महिलाएँ गंगा मैया की गोद में अठखेलियाँ करने को पूरे जोश- खरोश से दौड़ी।

सभी ने एक दूसरे का हाथ थाम खूब डुबकियाँ लगाईं। कुछ महिलाओं ने दस, कुछ ने बीस, कुछ ने पचास तो मुकेश तथा एक बुजुर्ग माँजी ने तो पूरी एक सौ आठ डुबकियाँ लगाई। एक बार स्नान कर मन नहीं भरा, तो डुबकियों का दूसरा दौर चला। काफ़ी देर तक गंगा मैया की गोदी में खेल एक- एक कर सभी घाट पर आए, कपड़े बदले। पहले कुछ महिलाएँ अपनी साड़ी या दुपट्टे से घेरा बना लेती और एक- एक कर बाकी महिलाएँ उस घेरे में कपड़े बदल लेतीं;  लेकिन इस बार एक बढ़िया बदलाव देखने को मिला... वहाँ पर महिलाओं की सुविधा के लिए थोड़ी- थोड़ी दूरी पर एलम्युनियम के छोटे- छोटे बॉक्स बना दिए गए हैं, ताकि उन्हें कपड़े बदलने में कोई परेशानी न हो।

कपड़े बदल शृंगार कर सभी महिलाओं ने पंडित जी के पास बैठ पूजा अर्चना की, उन्हें दान दक्षिणा दी फिर सभी ने गंगा मैया में दीपक प्रवाहित कर घर-संसार के लिए सुख समृद्धि की कामना की।

सुबह से घर से निकले थे, अब पेट में चूहे भी दौड़ने लगे... घाट पर उपयुक्त जगह ढूँढ सभी ने इत्मीनान से बैठ घर से लाया भोजन किया। अब चाय की तलब जगी, तो बाजार की ओर चल दिए, एक टपरी पर बैठ गर्म- गर्म चाय का आनंद लिया और फिर बाजार की रौनक देखने चल दिए। आमने- सामने खूब सारी दुकानें सजी हुई थीं... चूड़ियाँ, मंगलसूत्र, सिंदूर, मोतियों की माला, मूर्तियाँ, खिलौने, लकड़ी से बना सामान, चाबी के छल्ले और भी जाने क्या- क्या! पूरा बाजार मनमोहक सामानों से अटा पड़ा था। महिलाएँ शॉपिंग न करें,  तो बाजार बंद न हो जाएँ! सो सभी महिलाओं ने अपनी- अपनी पसंद के हिसाब से सामान खरीदा और वापिस घाट पर आ गईं।

समय देखा, अभी तो पाँच ही बजे थे। आरती शुरू होने में अभी डेढ़ घंटा बाकी था। कुछ महिलाएँ घाट की सीढ़ियों पर बैठ गपशप में मशगूल हो गईं, तो कुछ घाट पर रखे तख्तपोशों पर अधलेटी हो सुस्ताने लगीं। मैं और मुकेश घाट पर चहलकदमी करते हुए गंगा मैया को जीभर निहारती रहीं। छह बजने को थे... जहाँ हम सभी बैठे थे, वहाँ पीछे की ओर विशाल शामियाना लगा हुआ था, लाउडस्पीकर की तेज आवाज ने हमारा ध्यान उस ओर खींचा। हम लोग वहाँ गए, तो देखा खूब सारी कुर्सियाँ पड़ी थीं, बड़े बड़े कूलर चल रहे थे और पानी की फुहार फेंकने वाले विशाल पंखे ठंडी- ठंडी हवा दे रहे थे। सामने भव्य स्टेज सजाया जा रहा था और कुछ आर्टिस्ट एक विशाल मगरमच्छ को पेंट कर रहे थे, कुछ पल को समझ न पाई कि ऐसा क्यों किया जा रहा है, फिर मेरा ध्यान सामने लगे बड़े बोर्ड पर गया, जिस पर बड़े बड़े अक्षरों में ‘माँ गंगा जन्मोत्सव समारोह’ लिखा हुआ था, बाईं ओर गंगा मैया मगरमच्छ पर विराजमान थी और दायीं ओर भोले भंडारी का चित्र बना हुआ था, तब पहली बार मुझे पता चला कि गंगा मैया की सवारी मगरमच्छ है।

मैं अभी इसी ध्यान में खोई थी कि तेज आवाज सुन आसमान की ओर ध्यान गया, तो क्या देखा कि एक पैराशूट द्वारा फूलों की वर्षा की जा रही है। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे देवता स्वयं पुष्प वर्षा कर रहे हों।

ऐसा सुंदर नजारा था कि शब्दों में बयान करना कठिन है... तभी सामने बने घंटाघर की घड़ी ने साढ़े छह बजाए और सभी आरती के लिए गंगा मैया की ओर दौड़े।

अद्भुत नजारा था, पल भर को लगा साक्षात् स्वर्ग के द्वार पर खड़ी हूँ, फूलों से सजा पंडाल, सामने गंगा मैया की तेज धाराओं का मधुर संगीत, पीतल के घंटे की कर्णप्रिय ध्वनि के बीच विशाल दीपों द्वारा आरती का भव्य नजारा... पलकें जैसे झपकना ही भूल गईं थीं...!

सम्पर्कः 207 द्वितीय तल, भाई परमानन्द कालोनी, दिल्ली 110009, फोन 9582404164

Aug 1, 2022

यात्रा संस्मरणः सरहदें दिलों को नहीं बाँट सकतीं

-  नीरज मनजीत

2017 के अक्टूबर माह में कुछ रचनाकार मित्रों ने अगले साल फरवरी में बोनगाँव (कोलकाता) जाना तय कर लिया था। तब से ही मन में एक दोहरी उत्सुकता आकार लेने लगी थी। पहली उत्सुकता थी बोनगाँव में कुछ वक़्त बिताने की, जिसके बारे में बताया गया कि यह भारत-बांग्लादेश की सरहद पर स्थित एक गाँव है। यहाँ हर साल 21 फरवरी को बंग भाषा दिवस मनाया जाता है। यह एक उत्सव की तरह होता है, जिसमें दोनों देशों के लोग शामिल होते हैं।

 दूसरी उत्सुकता थी कोलकाता के प्रवास की। मैं पहली दफ़ा कोलकाता जा रहा था। कोलकाता के बारे में कुछ सुनी-सुनाई बातें मेरे जेहन में थी... कि कोलकाता एक भीड़-भड़क्के से भरा शहर है, जहाँ की तंग सड़कों में अभी भी सुस्त रफ़्तार ट्रामें चलती हैं और तपती सड़क पर पैदल रिक्शा खींचते हाँफते-झुलसते रिक्शा पुलर बलराज साहनी की फ़िल्म 'दो बीघा जमीन' की याद दिला जाते हैं।

कोलकाता की भीड़ का बड़ा ही रोचक चित्रण 1969 में भारत के दौरे पर आई ऑस्ट्रेलियाई टीम के उप कप्तान इयान चैपल ने किया था। ऑस्ट्रेलियाई टीम टेस्ट खेलने बस में स्टेडियम के लिए रवाना हुई। स्टेडियम पहुँचते-पहुँचते चैपल ने अपने कप्तान बिल लारी से कहा, ' हमने न्यूज़ीलैंड की आबादी के बराबर लोग तो देख ही लिए।'  पहले दिन का खेल समाप्त होने के बाद होटल लौटते वक़्त शाम की भीड़ देखकर टीम के वरिष्ठ खिलाड़ी डग वॉल्टर्स ने कहा, 'अब तो हमने ऑस्ट्रेलिया की आबादी के बराबर लोग देख लिए।'

कोलकाता के बारे में मेरे कुछ सैलानी दोस्तों के ख़्यालात भी अच्छे नहीं दिखे, लेकिन मैं उनकी बातों पर यकीन नहीं कर सकता था। क्योंकि वे खूबसूरत समुद्रतटों और भव्य शॉपिंग मॉल वाले शहरों को ही बड़ा पर्यटन स्थल मानते हैं, जबकि मेरे लिए तो एक अच्छे दोस्त का किसी नगर में होना ही उस नगर को चाहने का सबब बन सकता है। फिर कोलकाता को चाहने के तो दसियों सबब थे। सो, मैं इस प्रवास के हफ़्तों पहले से इन दोनों आकर्षणों की गिरफ़्त में था।

यात्राओं के बीच, यात्राओं के साथ-साथ कुछ नोट्स अपने-आप तैयार होने लगते हैं। ऐसे ही कुछ नोट्स, जो इस प्रवास के संदर्भ में हैं....

कवर्धा छत्तीसगढ़, 9 फरवरी, 2018

20 फरवरी को कोलकाता जाना है। बोनगाँव एक सरहदी गाँव है, भारत बांग्लादेश की सरहद पर कोलकाता से 80 किमी दूर। 21 फरवरी को सारे रचनाकार वहाँ जाएँगे। यह एक विशेष दिन है, कुछ-कुछ त्योहार जैसा, जिसे दोनों देश के लोग मिलकर मनाते हैं। यह गाँव इच्छामती नदी के किनारे बसा है और इसी नदी को दोनों देशों की सीमारेखा मान लिया गया है। 22 फरवरी को कोलकाता में मेल-मुलाकात और कुछ खास जगहों का प्रवास तय हुआ है। बोनगाँव के बारे में गूगल पर सर्च किया तो कुछ ख़ास जानकारी हासिल नहीं हुई। सो, कुल मिलाकर एक अनजान सी यात्रा पर निकलना है। और यही बात ही तो है जो रोमांचित करती है।

कोलकाता के लिए ट्रेन की कन्फर्म टिकट लेने में भी थोड़ी मुश्क़िल दरपेश आई। इरादा था 20 फरवरी को रायपुर से ज्ञानेश्वरी या मेल पकड़ने का, ताकि 21 की अलस्सुबह हावड़ा पहुँच जाएँ और तैयार होकर 10 बजे तक बोनगाँव के लिए निकल जाएँ। लेकिन दोनों गाड़ियों के एसी कोच में बर्थ नही मिली। खैर, उसी दिन सुबह राजकोट-संतरागाछी स्पेशल एसी का वक़्त भी है। उसमें आसानी से बर्थ मिल गई। यह गाड़ी दोपहर बाद 4 बजे तक हावड़ा पहुँच जाती है। इरादा था रात को हावड़ा ब्रिज से हुगली नदी के नज़ारे का। पर किसे पता था कि रेलवे की लेट-लतीफ़ी इस इरादे पर पानी फेर देगी।

20 फरवरी, 2018

आज सुबह 5 बजे दुर्ग से राजकोट-संतरागाछी एसी विशेष ट्रेन पकड़ी, कोलकाता जाने के लिए। यह गाड़ी पूरे 3 घंटे विलंब से आई। बताया गया कि राजनांदगाँव के पास मेगा ब्लॉक की वजह से इस मार्ग की सभी गाड़ियाँ देर से चल रही हैं। चूँकि नेट पर ट्रेन की सही स्थिति पता नहीं चल रही थी, इसलिए मैं ठीक दो बजे स्टेशन पहुँच गया। वहाँ भी सही वक़्त पता नहीं चला। इन्क्वायरी से इतना ही बताया जा रहा था कि ट्रेन विलंब से आएगी। कितने विलंब से, यह किसी को पता नहीं था। नतीजतन ढाई घंटे  रिटायरिंग रूम में ऊँघते बैठना पड़ा। डिब्बे में 3-4 घंटे की नींद लेने का इरादा काफूर हो चुका था। खैर, फिर भी दो-ढाई घंटे की नींद ले ही ली। अभी ट्रेन चक्रधरपुर पहुँचने वाली है, तीन-साढ़े तीन घण्टे विलम्ब से। हावड़ा 8 बजे तक पहुँचना हो पाएगा। समय पर पहुँचे तो हुगली नदी और हावड़ा ब्रिज की दृश्यावलियाँ देख सकते हैं।

ट्रेन साढ़े नौ बजे संतरागाछी स्टेशन पहुँची, साढ़े चार घण्टे देर से। जिस प्लेटफार्म पर ट्रेन लगी, उसकी मरम्मत चल रही है। गाड़ी से उतरा तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था। अमूमन प्लेटफार्म पर दिखने वाली चाय-नाश्ते की दुकानें वहाँ एक भी नहीं थी। धीरे-धीरे चलते प्लेटफॉर्म से बाहर निकला। वहाँ प्रीपेड टैक्सी का स्टाल खाली पड़ा था और सामने लंबी लाइन लगी थी। मैं तक़रीबन उन्नीस घंटों से सफ़र में था, सो मुझमें अब वहाँ कतार में खड़े होकर इंतज़ार करने का धैर्य नहीं बचा था। थोड़ा आगे बढ़ा तो एक टैक्सीवाला हावड़ा स्टेशन के पास स्थित होटल में छोड़ने के लिए तैयार हुआ, मुँहमाँगे किराए पर। होटल पहुँचते 11 बज चुके हैं। सुबह जल्दी तैयार होकर कोलकाता के न्यू टाउन स्थित आर्किड इन गेस्ट हाउस में पहुँचना है। वहीं से हम सभी को एक साथ बोनगाँव के लिए रवाना होना है।

कोलकाता, 21 अप्रैल, 2018

सुबह 6 बजे मित्रों का फ़ोन आ गया। वे उसी वक़्त हावड़ा पहुँचे थे। कहा कि जल्दी तैयार होकर ऑर्किड गेस्ट हाउस पहुँचो, नाश्ता हम सब एक साथ करेंगे।  सुबह 8 बजे तक मैं तैयार हो गया। रात 6 घंटे की गाढ़ी नींद ले ली थी, इसलिए सुबह ताज़ा और ख़ुशगवार लग रही थी। मित्र को फोन किया। वे भी तैयार होकर हावड़ा स्टेशन के पास पहुँच चुके थे। बड़ी मुश्क़िल से एक बैटरी रिक्शा ढूँढा और उससे भी ज़्यादा मुश्क़िल से मित्र मिले। खैर, देर से ही सही हम कार से वहाँ से तकरीबन 15 किमी दूर ऑर्किड के लिए रवाना हुए। यह गेस्ट हाउस दमदम एयरपोर्ट के नज़दीक न्यू टाउन में स्थित है। यह इलाका अभी-अभी विकसित हुआ है, इसलिए बिल्कुल ताज़े खिले फूल की तरह सुंदर और आकर्षक दिखाई दे रहा है।  बिल्कुल नई-नकोर बनी इमारतें-कालोनियाँ, साफ़-सुथरी सड़कें, किनारों पर व्यवस्थित तरीके से लगाए गए हरे-भरे वृक्ष और बाग-बगीचे।

हम गेस्ट हाउस पहुँचे तो अधिकतर साथी नाश्ता कर चुके थे। मैंने जल्दी नाश्ता किया और नीचे लॉबी में बैठे साथियों के साथ हो लिया। हम तीन गाड़ियों में बोनगाँव के लिए निकल पड़े। कोलकाता के ट्रैफिक से जूझते हमें शहर से बाहर निकलने में एक घंटा लग गया। उसके बाद इकहरी सड़क पर हम बोनगाँव की ओर बढ़ने लगे। एक साथी ने बताया कि बोनगाँव का बांग्ला में असली उच्चारण है-- "बोनगाँ"। बांग्ला में गाँव को गाँ कहा जाता है। मैंने उन्हें बताया कि यह ठीक वैसा ही है, जैसे पंजाबी में गाँव को ' ग्रां ' कहा जाता है। वे बता रहे थे कि बोनगाँव को बांग्ला के ख्यात साहित्यकार बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के गृहनगर के रूप में भी जाना जाता है, जिन्होंने मर्मस्पर्शी उपन्यास 'इचामती' लिखा है। दरअसल इच्छामती नदी का बांग्ला में उच्चारण इचामती ही है।

रास्ते में हमें दोनों ओर बड़े ही भारी तने के सैकड़ों वृक्ष दिखे। ऐसे मोटे तने मैंने पहले कभी नहीं देखे थे। पूछने पर कुछ पता भी नहीं चला। इनके अलावा एक बड़ी ही रोचक बात हमने देखी। रास्ते में कई गाँव मिले। इन गाँवों के तक़रीबन हर घर में एक तलैया थी और साथ लगी छोटी-सी बाड़ी में इमारती लकड़ी के वृक्ष लगे थे। उन्होंने बताया कि चूँकि मछली बंगाल का प्रमुख आहार है, इसलिए तलैया में मछलियाँ पाली जाती हैं। इमारती लकड़ियों के वृक्ष लगाना यहाँ की परंपरा है। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। इसके लिए सरकार की ओर से कोई रोकटोक नहीं है।

बातचीत के दौरान हम कब बोनगाँव पहुँच गए, मालूम ही नहीं पड़ा। गाँव के बीच से होते हुए हम सरहद के पास जा पहुँचे, लेकिन हमें थोड़ा आश्चर्य इस बात को लेकर हुआ कि जिसे हम गाँव समझे थे, वह एक अच्छा-खासा बड़ा नगर है। काफी बड़े बाज़ार हमें वहाँ दिखे। दूसरा आश्चर्य हमें इच्छामती नदी की हालत देखकर हुआ। वह बिल्कुल सूखी हुई थी, कुछ पतली गंदली धाराएँ बहती दिखीं। हमने नेट पर तो इसे एक दरिया के रूप में देखा था, जिस पर स्टीमर चल रहे थे। ख़ैर, मैंने वहाँ खड़े एक ट्रैफिक हवलदार से पूछना शुरू किया तो इस क्षेत्र के बारे में बहुत सी जानकारियाँ मिलती चली गईं--दरअसल बनगाँव लोकसभा का नाम है, जबकि बोनगाँव उत्तर 24 परगना ज़िले का एक ब्लॉक है, जो बनगाँव उत्तर विधानसभा में आता है। बोनगाँव की आबादी एक लाख दस हजार की है और यह ईस्टर्न रेलवे के सियालदह सेक्शन का आखिरी स्टेशन है। विभूतिभूषण के अलावा इस नगर को राजनेता जीबोन रतन धर, पुरातत्त्ववेत्ता राखालदास बंद्योपाध्याय और आधुनिक कविता के कवि विभाष रॉय चौधरी के लिए भी जाना जाता है।

बंग भाषा दिवस को लेकर हमने वहाँ काफी उत्सह देखा। इस त्यौहार में दोनों देशों के लोग शामिल थे। बांग्लादेश के बहुत से सरहदी गाँवों के लोगों के रिश्तेदार बोनगाँव में रहते हैं। इसी तरह सरहदी भारतीय गाँवों- गोपाल नगर, दुमा, पल्ला, चाँदपारा, फुलसारा- के लोगों के रिश्तेदार सीमांत बांग्लादेश में रहते हैं। इस दिन दोनों देशों की सरहदें खोल दी गई थीं और वीज़ा धारी लोग निर्बाध रूप से आ-जा रहे थे। उस दिन हमने देखा और शिद्दत से महसूस किया कि सरहदें देशों को तो विभाजित कर सकती हैं लेकिन लोगों के दिलों को नही बाँट सकतीं। दोनों देशों के पुरुषों, स्त्रियों, बच्चों का उत्साह देखने लायक था, उनके जज़्बात जैसे छलक रहे थे। जिनके पास वीज़ा नहीं था उनके लिए एक बड़े मैदान के बराबर एक ऐसा स्थान बनाया गया था, जहाँ वे पहचान पत्र दिखाकर जा सकते थे और एक-दूसरे से मिलजुल सकते थे। किसी भी तरह का कोई तनाव हमने वहाँ महसूस नहीं किया।

शाम के समय वहाँ दोनों देशों के सैनिकों की परेड हुई। यह परेड अनोखी थी, जो दोनों देश के लोगों के ऐन बीच में हो रही थी। जैसे ही परेड खत्म हुई लोग सैनिकों के साथ फ़ोटो लेने लगे, उनसे हाथ मिलाने लगे। ये सारे सैनिक एक-दूसरे देशों के लोगों से हाथ मिला रहे थे, उनसे मिलजुल रहे थे। बड़ा ही अविस्मरणीय था सब कुछ। दोनों देशों के सैनिक भी खुलकर एक दूसरे से मिलजुल रहे थे, कहीं कोई तनाव नहीं था, जैसा हमने वाघा बॉर्डर में महसूस किया था।

और मैं सोच रहा था कि काग़ज़ों पर खींची गई रेखाएँ और नक्शे अंततः क्यों इतने ताक़तवर हो जाते है कि वे महायुद्धों और विश्वयुद्ध के बायस बनकर इस धरती पर बदनुमा दाग़ छोड़ देते हैं ? इन बेजान रेखाओं के पीछे छिपे शातिर दिमागों ने लहूलुहान मानवता को और ज़्यादा... और ज़्यादा जख़्मी करने... और ज़्यादा... और ज़्यादा खून बहाने में कोई क़सर नहीं छोड़ी है। इन नक्शों ने वास्तविक दीवारें खड़ी की हैं और हजारों वर्षों के खूंरेज़ इतिहास से गुज़रती जो एक शांतिवादी वैश्विक व्यवस्था बनती दिखाई पड़ रही थी, वह फिर उसी खूनी दौर में वापस जा रही है।

यूरोप के एकीकरण के बाद जरूरत एशिया को एक सूत्र में बाँधने की थी, ताकि एक युद्ध रहित विश्व के सपने को साकार करने की दिशा में सामूहिक प्रयत्न किए जाते। लेकिन एशिया को ही रणभूमि बनाकर अमन-पसंदगी के सारे सपनों को तार-तार किया जा रहा है। यह एक कड़वी वास्तविकता है कि दक्षिण एशिया दुनिया का सर्वाधिक खतरनाक इलाका है, जहाँ एटमी ताकतें सर्वनाश के लिए उतारू हैं। क्या इस इलाके में कभी उस तरह दीवारें टूटेंगी, जिस तरह जर्मनी के लोग दीवार तोड़कर एक-दूसरे के गले जा मिले थे? सपनों और वास्तविकताओं में क्या फ़र्क़ हो सकता है, यह हम सब देख रहे हैं... कि कड़वी सियासी हक़ीक़तें सपनों को रौंद रही हैं !

रात्रि भोज हमें न्यू टाउन स्थित एक चार सितारा होटल 'स्विसोटल' में लेना था। यह एक बड़ा ही यादगार और आनंददायी अनुभव था। हम सभी साथी डाइनिंग हॉल में एक बड़ी टेबल से लगी कुर्सियों पर जम गए। उस बड़े हॉल में दसियों किस्म के सामिष-निरामिष स्वादिष्ट व्यंजन, फल, ड्राई फ्रूट्स, आइसक्रीम, पेस्ट्रीज, केक, मिठाइयाँ आदि रखे गए थे। मैं तो बस वहाँ के नए व्यंजनों का स्वाद चखने में लग गया। मुख्य भोजन के लिए सभी साथी जमे तो हमारे एक वरिष्ठ साथी के रोचक संचालन में एक कवि-गोष्ठी की शुरुआत हो गई। तरह-तरह के व्यंजन और बड़ी ही सुंदर, प्रभावी कविताएँ... बस सब कुछ अविस्मरणीय! बदक़िस्मती से मैं अपनी कोई कविता नहीं सुना पाया। दरअसल उस रात नेटवर्क की ख़राबी की वजह से मेरी फेसबुक वॉल नहीं चल रही थी, जबकि मेरी बहुत-सी कविताएँ उसमें मौजूद हैं। खैर, आख़िर में इन सारी कविताओं पर मुझे एक संक्षिप्त टिप्पणी कहने का सुअवसर देकर मित्रों ने इसकी भरपाई कर दी।

कुछ दोस्त ऐसे होते हैं, जो दिलो-दिमाग़ के खुले कपाट पर भी बड़ी ही शाइस्तगी से दस्तक देते हैं और अंदर आने की इजाज़त चाहते हैं, जबकि उन्हें किसी भी वक़्त आने का अधिकार पहले से ही हासिल होता है। कुछ शहर भी ऐसे ही होते हैं। कोलकाता ऐसा ही एक शहर है। पकी उम्र में कोलकाता पहली बार जाने पर कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ। एक दिन में आप किसी महानगर को कितना जान सकते हैं! लेकिन जितना भी जाना, देखा... बड़ा ही खूबसूरत लगा। और कोलकाता के लोग, वे तो खूबसूरत हैं ही। कार से आते-जाते कुछ तस्वीरें लीं। वो 64 मंजिला इमारत भी देखी, जो अभी बन रही है और पूरी होने के बाद उसे भारत की सबसे ऊंची इमारत का दर्जा हासिल हो जाएगा।

सुबह का नाश्ता लेकर हम सभी कोलकाता की कुछ ख़ास जगहों पर गए। हमारे एक साथी वरिष्ठ पत्रकार-संपादक पारिवारिक वजहों से एक विश्राम गृह में रुके थे। वहीं उनसे और उनकी पत्नी से भेंट हुई। उनके बैठक कक्ष में सभी साथी रचनाकारों के बीच विचार-विमर्श का दौर चला। उसके बाद शेक्सपियर सरणी स्थित भारतीय भाषा परिषद के कार्यालय में बैठक जमी। दोपहर के खाने के बाद सफ़र शुरू हुआ पुराने लेकिन भव्य कोलकाता का। तंग किंतु साफ़-सुथरी सड़कों पर आराम से चलती ट्रामों औऱ पैदल रिक्शा खींचनेवालों के बीच रास्ता बनाती हमारी गाड़ियाँ कॉफी हाउस के समीप रुकीं। कोलकाता का कॉफी हाउस एक बहुत ही पुरानी इमारत की पहली मंज़िल पर स्थित है। यहाँ सब कुछ वैसा का वैसा ही है, जैसा वर्षों से चला आ रहा है। स्मृतियों को बदलने की कोई कोशिश नहीं की गई है और संभवतः यही इसकी गरिमा और सुंदरता है। कॉफी पीकर हम सब निकले और एक-दूसरे के गले मिले, हाथ मिलाए और फिर मिलने के वादे के साथ विदा ली।

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