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Aug 12, 2016

स्वतंत्रता आन्दोलन

रानी लक्ष्मी बाई
वीरांगनाओं की भी याद करो कुर्बानी 

बेगम हज़रत महल
 भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन का एक लम्बा इतिहास रहा है। अपनी राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक पराधीनता से मुक्ति के लिए इस आन्दोलन में अनेक राष्ट्रभक्तों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। स्त्रियों की दुनिया घर के भीतर है, शासन-सूत्र का सहज स्वामी तो पुरूष ही हैअथवा शासन व समर से स्त्रियों का सरोकार नहींजैसी तमाम पुरूषवादी स्थापनाओं को ध्वस्त करती तमाम नारियांँ भी स्वाधीनता आन्दोलन की आलमबरदार बनीं। 1857 की क्रान्ति में जहाँ बेगम हजरत महल, बेगम जीनत महल, रानी लक्ष्मीबाई, रानी अवन्तीबाई, रानी राजेश्वरी देवी, झलकारी बाई, ऊदा देवी, अजीजनबाई जैसी वीरांगनाओं ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिये, वहीं 1857 के बाद अनवरत चले स्वाधीनता आन्दोलन में भी नारियों ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया। महात्मा गाँधी ने कहा था कि-भारत में ब्रिटिश राज मिनटों में समाप्त हो सकता है, बशर्ते भारत की महिलाएं ऐसा चाहें और इसकी आवश्यकता को समझें।
  इतिहास गवाह है कि 1905 के बंग-भंग आन्दोलन में पहली बार महिलाओं ने खुलकर सार्वजनिक रूप से भाग लिया था। स्वामी श्रद्धानन्द की पुत्री वेद कुमारी और आज्ञावती ने इस आन्दोलन के दौरान महिलाओं को संगठित किया और विदेशी कपड़ों की होली जलाई। कालान्तर में 1930 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान वेद कुमारी की पुत्री सत्यवती ने भी सक्रिय भूमिका निभायी। सत्यवती ने 1928 में साइमन कमीशन के दिल्ली आगमन पर काले झण्डों से उसका विरोध किया था। 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान ही अरूणा आसफ अली तेजी से उभरीं और इस दौरान अकेले दिल्ली से 1600 महिलाओं ने गिरफ्तारी दी। गाँधी इरविन समझौता के बाद जहाँ अन्य
अरूणा आसफ अली
आन्दोलनकारी नेता जेल से रिहा कर दिये गये थे वहीं अरूणा आसफ अली को बहुत दबाव पर बाद में छोड़ा गया। सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान जब सभी बड़े नेता गिरफ्तार कर लिये गये
, तो कलकत्ता के कांग्र्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता एक महिला नेली सेनगुप्त ने की। क्रान्तिकारी आन्दोलन में भी महिलाओं ने भागीदारी की। 1912-14 में बिहार में जतरा भगत ने जनजातियों को लेकर टाना आन्दोलन चलाया। उनकी गिरफ्तारी के बाद उसी गाँव की महिला देवमनियां उरांइन ने इस आन्दोलन की बागडोर सँभाली। 1931-32 के कोल आन्दोलन में भी आदिवासी महिलाओं ने सक्रिय भूमिका निभायी थी। स्वाधीनता की लड़ाई में बिरसा मुण्डा के सेनापति गया मुण्डा की पत्नी माकीबच्चे को गोद में लेकर फरसा-बलुआ से अंग्रेजों से अन्त तक लड़ती रहीं। 1930-32 में मणिपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व नागा रानी गुइंदाल्यू ने किया। इनसे भयभीत अंग्रेजों ने इनकी गिरफ्तारी पर
सरोजिनी नायडू
पुरस्कार की घोषणा की और कर माफ करने के आश्वासन भी दिये। 1930 में बंगाल में सूर्यसेन के नेतृत्व में हुये चटगाँव विद्रोह में युवा महिलाओं ने पहली बार क्रान्तिकारी आन्दोलनों में स्वयं भाग लिया। ये क्रान्तिकारी महिलायें क्रान्तिकारियों को शरण देने
, संदेश पहुँचाने और हथियारों की रक्षा करने से लेकर बन्दूक चलाने तक में माहिर थीं। इन्हीं में से एक प्रीतीलता वाडेयर ने एक यूरोपीय क्लब पर हमला किया और कैद से बचने हेतु आत्महत्या कर ली। कल्पनादत्त को सूर्यसेन के साथ ही गिरफ्तार कर 1933 में आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी और 5 साल के लिये अण्डमान की काल कोठरी में कैद कर दिया गया। दिसम्बर 1931 में कोमिल्ला की दो स्कूली छात्राओं-शान्ति घोष और सुनीति चौधरी ने जिला कलेक्टर को दिनदहाड़े गोली मार दिया और काला पानी की सजी हुई तो 6 फरवरी 1932 को बीना दास ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में उपाधि ग्रहण करने के समय गवर्नर पर बहुत नजदीक से गोली चलाकर अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी। सुहासिनी अली तथा रेणुसेन ने भी अपनी क्रान्तिकारी गतिविधियों से 1930-34 के मध्य बंगाल में धूम मचा दी थी।
लक्ष्मी सहगल
चन्द्रशेखर आजाद के अनुरोध पर दि फिलॉसाफी ऑफ बमदस्तावेज तैयार करने वाले क्रान्तिकारी भगवतीचरण वोहरा की पत्नी दुर्गा भाभीनाम से मशहूर  दुर्गा देवी बोहरा ने भगत सिंह को लाहौर जिले से छुड़ाने का प्रयास किया। 1928 में जब अंग्रेज अफसर साण्डर्स को मारने के बाद भगत सिंह व राजगुरु लाहौर से कलकत्ता के लिए निकले, तो कोई उन्हें पहचान न सके इसलिए दुर्गा भाभी की सलाह पर एक सुनियोजित रणनीति के तहत भगत सिंह उनके पति, दुर्गा भाभी उनकी पत्नी और राजगुरु नौकर बनकर वहाँ से निकल लिये। 1927 में लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेने के लिये लाहौर में बुलायी गई बैठक की अध्यक्षता दुर्गा भाभी ने की। बैठक में अंग्रेज पुलिस अधीक्षक जे0 ए0 स्कॉट को मारने का जिम्मा वे खुद लेना चाहती थीं, पर संगठन ने उन्हें यह जिम्मेदारी नहीं दी। बम्बई के गर्वनर हेली को मारने की योजना में टेलर नामक एक अंग्रेज अफसर घायल हो गया, जिसपर गोली दुर्गा भाभी ने ही चलायी थी। इस केस
नागा रानी गुइंदाल्यू
में उनके विरुद्ध वारण्ट भी जारी हुआ और दो वर्ष से ज्यादा समय तक फरार रहने के बाद 12 सितम्बर 1931 को दुर्गा भाभी लाहौर में गिरफ्तार कर ली गयीं। यह संयोग ही कहा जायेगा कि भगत सिंह और दुर्गा भाभी
, दोनों की जन्म शताब्दी वर्ष 2007 में एक साथ मनाई गई। क्रान्तिकारी आन्दोलन के दौरान सुशीला दीदी ने भी प्रमुख भूमिका निभायी और काकोरी काण्ड के कैदियों के मुकदमे की पैरवी के लिए अपनी स्वर्गीय मॉंँ द्वारा शादी की खातिर रखा 10 तोला सोना उठाकर दान में दिया। यही नहीं उन्होंने क्रान्तिकारियों का केस लड़ने हेतु मेवाड़पतिनामक नाटक खेलकर चन्दा भी इकट्ठा किया। 1930 के सविनय अविज्ञा आन्दोलन में इन्दुमतिके छद्म नाम से सुशीला दीदी ने भाग लिया और गिरफ्तार हुयीं।  इसी प्रकार हसरत मोहानी को जब जेल की सजा मिली तो उनके कुछ दोस्तों ने जेल की चक्की पीसने के बजाय उनसे माफी मांगकर छूटने की सलाह दी। इसकी जानकारी जब बेगम हसरत मोहानी को हुई तो उन्होंने पति की जमकर हौसला आफजाई की और दोस्तों को नसीहत भी दी। मर्दाना वेष धारण कर उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में खुलकर भाग लिया और बाल गंगाधर तिलक के गरम दल में शामिल होने पर गिरफ्तार कर जेल भेज दी गयी, जहाँ उन्होंने चक्की भी पीसा। यही नहीं महिला मताधिकार को लेकर 1917 में सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में वायसराय से मिलने गये प्रतिनिधिमण्डल में वह भी शामिल थीं। 
मीरा बेन
कस्तूरबा गाँधी
1925 में कानपुर में हुये कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता कर भारत कोकिलाके नाम से मशहूर सरोजिनी नायडू को कांग्रेस की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष बनने का गौरव प्राप्त हुआ। सरोजिनी नायडू ने भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास में कई पृष्ठ जोड़े। कमला देवी चट्टोपाध्याय ने 1921 में असहयोग आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। इन्होंने बर्लिंन में अन्तर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व कर तिरंगा झंडा फहराया। 1921 के दौर में अली बन्धुओं की माँ बाई अमन ने भी लाहौर से निकल तमाम महत्वपूर्ण नगरों का दौरा किया और जगह-जगह हिन्दू-मुस्लिम एकता का संदेश फैलाया। सितम्बर 1922 में बाई अमन ने शिमला दौरे के समय वहाँ की फैशनपरस्त महिलाओं को खादी पहनने की प्रेरणा दी। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में भी महिलाओं ने प्रमुख भूमिका निभायी। अरुणा आसफ अली व सुचेता कृपलानी ने अन्य आन्दोलनकारियों के साथ भूमिगत होकर आन्दोलन को आगे बढ़ाया तो ऊषा मेहता ने भूमिगत रहकर कांग्रेस-रेडियो से प्रसारण किया। अरुणा आसफ अली को तो 1942 में उनकी सक्रिय भूमिका के कारण दैनिक ट्रिब्यूनने 1942 की रानी झाँसीनाम दिया। अरुणा आसफ अली नमक कानून तोड़ो आन्दोलनके दौरान भी जेल गयीं। 1942 के अन्दोलन के दौरान ही दिल्ली में गर्ल गाइडकी 24 लड़कियां अपनी पोशाक पर विदेशी चिन्ह धारण करने तथा यूनियन जैक फहराने से इनकार करने के कारण अंग्रेजी हुकूमत द्वारा गिरफ्तार हुईं और उनकी बेदर्दी से पिटाई की गयी। इसी आन्दोलन के दौरान तमलुक की 73 वर्षीया किसान विधवा मातंगिनी हाजरा गोली लग जाने के बावजूद राष्ट्रीय ध्वज को अन्त तक ऊँचा रखा।
विजयलक्ष्मी पंडित
  महिलाओं ने परोक्ष रूप से भी स्वतंत्रता संघर्ष में प्रभावी भूमिका निभा रहे लोगों को सराहा। सरदार वल्लभ भाई पटेल को सरदारकी उपाधि बारदोली सत्याग्रह के दौरान वहाँ की महिलाओं ने ही दी। महात्मा गाँधी को स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान उनकी पत्नी कस्तूरबा गाँधी ने पूरा समर्थन दिया। उनकी नियमित सेवा व अनुशासन के कारण ही महात्मा गाँधी आजीवन अपने लम्बे उपवासों और विदेशी चिकित्सा के पूर्ण निषेध के बावजूद स्वस्थ रहे। अपने व्यक्तिगत हितों को उन्होंने राष्ट्र की खातिर तिलांजलि दे दी। भारत छोड़ो आन्दोलन प्रस्ताव पारित होने के बाद महात्मा गाँधी को आगा खाँ पैलेस (पूना) में कैद कर लिया गया। कस्तूरबा
गाँधी भी उनके साथ जेल गयीं। डॉ0 सुशील नैयर, जो कि गाँधी जी की निजी डाक्टर भी थीं, भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान 1942-44 तक महात्मा गाँधी के साथ जेल में रहीं।
  इन्दिरा गाँधी ने 6 अप्रैल 1930 को बच्चों को लेकर वानर सेनाका गठन किया, जिसने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपना अद्भुत योगदान दिया। यह सेना स्वतंत्रता सेनानियों को सूचना देने और सूचना लेने का कार्य करती व हर प्रकार से उनकी मदद करती। विजयलक्ष्मी पण्डित भी गाँधी जी से प्रभावित होकर जंग-ए-आजादी में कूद पड़ीं। वह हर आन्दोलन में आगे रहतीं, जेल जातीं, रिहा होतीं, और फिर आन्दोलन में जुट जातीं। 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ के सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में विजयलक्ष्मी पण्डित ने भारत का प्रतिनिधित्व भी किया। सुभाषचन्द्र बोस की ‘‘आरजी हुकूमते आजाद हिन्द सरकार’’ में महिला विभाग की मंत्री तथा आजाद हिन्द फौज की रानी झांसी रेजीमेण्ट की कमाण्ंिडग ऑफिसर रहीं कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने आजादी में प्रमुख भूमिका निभायी। सुभाष चन्द्र बोस के
आहवान पर उन्होंने सरकारी डॉक्टर की नौकरी छोड़ दी। कैप्टन सहगल के साथ आजाद हिन्द फौज की रानी झांसी रेजीमेण्ट में लेफ्टिनेण्ट रहीं ले0 मानवती आर्य्या ने भी सक्रिय भूमिका निभायी। अभी भी ये दोनों सेनानी कानपुर में तमाम रचनात्मक गतिविधियों में सक्रिय हैं।
इंदिरा गाँधी
  भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की गूँज भारत के बाहर भी सुनायी दी। विदेशों में रह रही तमाम महिलाओं ने भारतीय संस्कृति से प्रभावित होकर भारत व अन्य देशों में स्वतंत्रता आन्दोलन की अलख जगायी। लन्दन में जन्मीं एनीबेसेन्ट ने न्यू इण्डियाऔर कामन वीलपत्रों का सम्पादन करते हुये आयरलैण्ड के स्वराज्य लीगकी तर्ज पर सितम्बर 1916 में भारतीय स्वराज्य लीग’ (होमरूल लीग) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य स्वशासन स्थापित करना था। एनीबेसेन्ट को कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष होने का गौरव भी प्राप्त है। एनीबेसेन्ट ने ही 1898 में बनारस में सेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज की नींव रखी, जिसे 1916 में महामना मदनमोहन मालवीय ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के रूप में विकसित किया। भारतीय मूल की फ्रांसीसी नागरिक मैडम भीकाजी कामा ने लन्दन, जर्मनी तथा अमेरिका का भ्रमण कर भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाया। उनके द्वारा पेरिस से प्रकाशित वन्देमातरम्पत्र प्रवासी भारतीयों में काफी लोकप्रिय हुआ। 1909 में जर्मनी के स्टटगार्ट में हुयी अन्तर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में मैडम भीकाजी कामा ने प्रस्ताव रखा कि- ‘‘भारत में ब्रिटिश शासन जारी रहना मानवता के नाम पर कलंक है। एक महान देश भारत के हितों को इससे भारी क्षति पहुँच रही है।’’ उन्होंने लोगों से भारत को दासता से मुक्ति दिलाने में सहयोग की अपील की और भारतवासियों का आह्वान किया कि - ‘‘आगे बढ़ो, हम हिन्दुस्तानी हैं और हिन्दुस्तान हिन्दुस्तानियों का है।’’ यही नहीं मैडम भीकाजी कामा ने इस कांफ्रेंस में वन्देमातरम्अंकित भारतीय ध्वज फहरा कर अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी। मैडम भीकाजी कामा लन्दन में दादाभाई नौरोजी की प्राइवेट सेक्रेटरी भी रहीं।  आयरलैंड की मूल निवासी और स्वामी विवेकानन्द की शिष्या मारग्रेट नोबुल (भगिनी निवेदिता) ने भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में तमाम मौकों पर अपनी सक्रियता दिखायी। कलकत्ता विश्वविद्यालय में 11 फरवरी 1905 को आयोजित दीक्षान्त समारोह में वायसराय लॉर्ड कर्जन द्वारा भारतीय युवकों के प्रति अपमानजनक शब्दों का उपयोग करने पर भगिनी निवेदिता ने खड़े होकर निर्भीकता के साथ प्रतिकार किया। इंग्लैण्ड के ब्रिटिश नौसेना के एडमिरल की पुत्री मैडेलिन ने भी गाँधी जी से प्रभावित होकर भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया। मीरा बहनके नाम से मशहूर मैडेलिन भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान महात्मा गाँधी के साथ आगा खाँ महल में कैद रहीं। मीरा बहन ने अमेरिका व ब्रिटेन में भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाया। मीरा बहन के साथ-साथ ब्रिटिश महिला म्यूरियल लिस्टर भी गाँधी जी से प्रभावित होकर भारत आयीं और अपने देश इंग्लैण्ड में भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास किया। द्वितीय गोलमेज कांफ्रेन्स के दौरान गाँधी जी इंग्लैण्ड में म्यूरियल लिस्टर द्वारा स्थापित ‘किग्सवे हॉलमें ही ठहरे थे। इस दौरान म्यूरियल लिस्टर ने गाँधी जी के सम्मान में एक भव्य समारोह भी आयोजित किया था।
  इन वीरांगनाओं के अनन्य राष्ट्रप्रेम, अदम्य साहस, अटूट प्रतिबद्धता और उनमें से कईयों का गौरवमयी बलिदान भारतीय इतिहास की एक जीवन्त दास्तां है। हो सकता है उनमें से कईयों को इतिहास ने विस्मृत कर दिया हो, पर लोक चेतना में वे अभी भी मौजूद हैं। ये वीरांगनायें प्रेरणा स्रोत के रूप में राष्ट्रीय चेतना की संवाहक हैं और स्वतंत्रता संग्राम में इनका योगदान अमूल्य एवं अतुलनीय है।
                              
सम्पर्कः टाइप 5 निदेशक बंगलाजी.पी.ओ. कैम्पस, सिविल लाइन्स, इलाहाबाद (उ.प्र.) 211001, मो. 08004928599, kk_akanksha@yahoo.com,  http://shabdshikhar.blogspot.in/  

Aug 12, 2015

एवरेस्ट फतह

13 साल की मालावाथ पूर्णा
और 17 साल के
आनंद कुमार ने रचा इतिहास

 - आकांक्षा यादव


कहते हैं हौसले बुलंद हों तो फिर आँधी, तूफान और पहाड़ भी रास्ता दे देते हैं। इसे बखूबी सच कर दिखाया है आँध्र प्रदेश में निजामाबाद जिले के एक आदिवासी खेत मजदूर की 13 साल की बेटी मालावाथ पूर्णा और एक साइकिल मैकेनिक के बेटे 17 वर्षीय साधनापल्ली आनन्द कुमार ने। कक्षा 9 में पढऩे वाले इन दोनों बच्चों ने दुनिया की सबसे ऊँची चोटी माउण्ट एवरेस्ट फतह कर इतिहास रच दिया हैं। मालावाथ पूर्णा ने माउण्ट एवरेस्ट को फतह करने वाली सबसे कम उम्र की महिला का रिकार्ड बनाया है,  वहीं उसका सहपाठी आनन्द कुमार आन्ध्र प्रदेश के खम्मन जिले का रहने वाला है। कक्षा 9 में पढऩे वाले पूर्णा और आनन्द दोनों ही आन्ध्र प्रदेश सोशल वेलफेयर एजुकेशन सोसायटी के विद्यार्थी हैं। इन दोनों ने इस चढ़ाई को चीन के सबसे खतरनाक रास्ते से तय किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट के जरिये इन्हें बधाई देते हुए कहा, यह जानकर बहुत खुशी हुई। एवरेस्ट पर चढऩे वाली किशोरी पूर्णा को बधाई। उसने हमें गौरवान्वित किया है।
52 दिनों की चढ़ाई के बाद वे 25 मई, 2014 की सुबह छह बजे एवरेस्ट की चोटी पर हुँचे। यह भी एक अजीब संयोग है कि न्यूजीलैंड के एडमंड हिलेरी और उनके मार्गदर्शक शेरपा तेजिंग नोर्मे ने 29 मई 1953 के दिन माउण्ट एवरेस्ट पहली बार फतह किया था। तब से चार हजार से भी ज्यादा लोग 29 हजार 35 फीट ऊँचे इस पर्वत शिखर पर चढ़ चुके हैं और अभी भी यह सिलसिला बना रहेगा।
मालावाथ पूर्णा और आनन्द कुमार का चयन सोसायटी के 150 बच्चों में से किया गया था, जिन्होंने साहसिक खेलों को चुना था। इनमें से 20 बच्चों को प्रशिक्षण के लिए दार्जिलिंग के एक प्रतिष्ठित पर्वतारोहण संस्थान में भेजा गया था और नौ बच्चों को पहले भारत-चीन सीमा पर भेजा गया।  इसमें से दो विद्यार्थी ताकत और धीरज की बदौलत सबसे उच्च श्रेणी तक पहुँचने में सफल रहे, जिन्हें अप्रैल में एवरेस्ट फतह करने के लिए भेजा गया। आन्ध्र प्रदेश सरकार ने इनके अभियान के लिए 70 लाख रुपये मंजूर किए थे। यह दोनों, और इनके दल का एक अन्य सदस्य शेखर बाबू, पर्वत के उत्तर की तरफ, चीन की तरफ से माऊँट एवरेस्ट चढ़ रहे थे, इसलिए दक्षिण में नेपाल की तरफ के रास्ते में, इस साल अप्रैल में आए बर्फीले तूफान का शिकार होने से बच गए। इस तूफान में 16 लोगों की जानें जाने के बाद इस रास्ते से एवरेस्ट की चढ़ाई बीच में रोक दी गई थी। गौरतलब है कि एवरेस्ट फतह करने का समय 25 मई के बाद पूरा हो जाता है क्योंकि इसके बाद गर्मी बढऩे पर पहाड़ खतरनाक हो सकते हैं। अप्रैल में आए एक भूस्खलन में 16 जानें जाने के बाद इस साल एवरेस्ट चढऩे का मौसम समय से पहले ही खत्म हो गया, ज्यादातर पर्वतारोहियों ने नेपाल की तरफ से माउण्ट एवरेस्ट पर चढऩे की योजना अधबीच में ही छोड़ दी। ऐसे में दो वक्त के गुजारे के लिए संघर्ष करते परिवारों के यह बच्चे अपनी साहसिक उपलब्धि से देश के लाखों लोगों के लिए एक मिसाल बन गए हैं।
गौरतलब है कि नवंबर 2013 में कुछ बच्चों को बहुत छोटा कहकर पर्वतारोहण से मना करने के बाद,  इजाजत मिलने पर माउण्ट एवरेस्ट फतेह करने वाले किशोरों में आर पूर्णा और आनन्द कुमार भी थे। यह सभी बच्चे उनकी ही जैसी सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के थे। तभी से वह दल माउण्ट एवरेस्ट पर निगाहें लगाए हुए था। आत्मविश्वास से लबालब पूर्णा ने तब कहा था – मैं माउण्ट एवरेस्ट चढ़ूँगी और लौटने के बाद मैं एक आईपीएस अफसर बनूँगी।’  वह तब की बात थी ठीक जब उसका लक्ष्य उससे कोसों दूर था। पूर्णा की प्रेरणा समाज कल्याण आवासीय शिक्षण संस्थान सोसाइटी के सचिव, आन्ध्र प्रदेश सरकार के आईपीएस अफसर आरएस प्रवीण कुमार हैं, जिन्होंने आन्ध्र प्रदेश के समाज कल्याण छात्रावासों के प्रभारी रहते यह दिखाया है कि मौका मिलने पर किसी भी  वर्ग के लोग दुनिया में सबसे ऊपर पहुँच सकते हैं।
पूर्णा और आनन्द अपने साथ प्रतीक के तौर पर बाबा साहब अम्बेडकर और पूर्व आईएएस अधिकारी एमआर शंकरन की तस्वीरें लेकर एवरेस्ट पर गए थे। आन्ध्र प्रदेश के दिवंगत अफसर शंकरन देश के सबसे काबिल और ईमानदार अफसरों में से थे और आँध्र के आदिवासियों की हालत सुधारने के लिए और बँधुवा मजदूरी खत्म करवाने के लिए उन्होंने बहुत काम किया था। आँध्र के गरीबों और आदिवासियों के बीच उन्हें बेहद सम्मान की निगाह से देखा जाता था। उन्होंने मैला साफ करने का काम करने वाले अछूत समझे जाने वाले दलितों की भलाई के लिए बहुत काम किया था।

सम्पर्क: टाइप 5, निदेशक बंगला, जी.पी.ओ. कैम्पस
सिविल लाइन्स, इलाहाबाद (उ.प्र.)- 211001

Email- kk_akanksha@yahoo.com,  ,http:// shabdshikhar.blogspot.in

Oct 20, 2014

शान्ति की साझा विरासत

 बचपन और बालिका शिक्षा के लिए नोबेल
कैलाश सत्यार्थी और मलाला को नोबेल के बहाने भारत-पाकिस्तान की शान्ति की साझा विरासत
                        - आकांक्षा यादव
बचपन एक ऐसी अवस्था है, जो हर किसी का भविष्य निर्धारित करती है।  आज जरूरत इस बचपन को बचाने की है। बचपन का न तो कोई जाति होती है, न धर्म और न ही इसे देशों की परिधि से बाँधा जा सकता है।  तभी तो नोबेल समिति ने जब इस साल के लिए नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा की तो बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले भारत के कैलाश सत्यार्थी और बालिकाओं की शिक्षा के लिए कार्य करने वाली पाकिस्तान की सामाजिक कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई को संयुक्त रूप से चुना। बचपन बचाओ आन्दोलन से जुड़े सत्यार्थी ने कयों का बचपन बचाने के लिए कार्य किया वहीं मलाला ने बचपन के कटु अनुभवों और हादसे का शिकार होने के बावजूद लकियों की शिक्षा के लिए अलख जगाई रखी। सत्यार्थी नोबेल शान्ति पुरस्कार पाने वाले दूसरे और नोबेल पाने वाले सातवें भारतीय हैं। इससे पहले मदर टेरेसा को यह अवॉर्ड मिला था। वहीं 17 साल की मलाला सबसे कम उम्र में यह अवॉर्ड पाने वाली शख्सियत बनी हैं। यह अजब संयोग है कि भारतीय और पाकिस्तानी को संयुक्त रूप से शान्ति के नोबेल की घोषणा ऐसे वक्त में हुई है ,जब दोनों देशों की सीमा पर भारी तनाव है। पुरस्कार समिति के जूरी ने कहा, 'नार्वे की नोबेल समिति ने निर्णय किया है कि 2014 के लिए शान्ति का नोबेल पुरस्कार कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफजई को बच्चों और युवाओं के दमन के खिलाफ उनके संघर्ष तथा सभी बच्चों की शिक्षा के अधिकार के लिए उनके प्रयासों के लिए दिया जाए। नोबेल समिति ने कहा कि एनजीओ 'बचपन बचाओ आंदोलनचलाने वाले सत्यार्थी ने महात्मा गांधी की परंपरा को बरकरार रखा और 'वित्तीय लाभ के लिए होने वाले बच्चों के गंभीर शोषण के खिलाफ विभिन्न प्रकार के शान्तिपूर्ण प्रदर्शनों का नेतृत्व किया है।समिति ने कहा कि वह 'एक हिंदू और एक मुस्लिम, एक भारतीय और एक पाकिस्तानी के शिक्षा और आतंकवाद के खिलाफ साझा संघर्ष में शामिल होने को महत्त्वपूर्ण बिंदु  मानते हैं।
      कैलाश सत्यार्थी का नोबेल के लिए नाम भारत में भले ही कयों को चौंका गया हो पर विदेशों में उनके कार्यों की अक्सर चर्चा और सराहना होती रहती है। वस्तुत: यह पुरस्कार बच्चों के अधिकारों के लिए उनके संघर्ष की जीत है। सत्यार्थी ने  नोबेल कमेटी  का आभार व्यक्त करते हुए कहा भीहैकि उसने आज के आधुनिक युग में भी दुर्दशा के शिकार लाखों बच्चों की दर्द को पहचाना है। मूलत: मध्य प्रदेश के विदिशा जनपद के  निवासी कैलाश सत्यार्थी ने वर्ष 1983 में बालश्रम के खिलाफ बचपन बचाओआंदोलन की स्थापना की थी। उनका यह संगठन अब तक 80,000 से ज्यादा बच्चों को बंधुआ मजदूरी, मानव तस्करी और बालश्रम के चंगुल से छुड़ा चुका है। गैर-सरकारी संगठनों तथा कार्यकर्ताओं की सहायता से कैलाश सत्यार्थी ने हजारों ऐसी फैक्टरियों तथा गोदामों पर छापे पड़वाए, जिनमें बच्चों से काम करवाया जा रहा था। मूलत: कैलाश सत्यार्थी एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर थे, जो 26 वर्ष की आयु में बाल अधिकारों के लिए काम करने लगे। कैलाश सत्यार्थी ने श्रगमार्कश् (त्नहउंता) की भी शुरुआत की, जो इस बात को प्रमाणित करता है कि तैयार कारपेट (कालीनों) तथा अन्य कपड़ों के निर्माण में बच्चों से काम नहीं करवाया गया है। उनकी इस पहल से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाल अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा करने में काफी सफलता मिली। कैलाश सत्यार्थी ने विभिन्न रूपों में प्रदर्शनों तथा विरोध-प्रदर्शनों की परिकल्पना और नेतृत्व को अंजाम दिया, जो सभी शान्तिपूर्ण ढंग से पूरे किए गए। इन सभी का मुख्य उद्देश्य आर्थिक लाभ के लिए बच्चों के शोषण के खिलाफ काम करना था।
       पूरी दुनिया में सबसे कम उम्र  में नोबेल पुरस्कार हेतु चयनित होने वाली मलाला यूसुफजई भी पाकिस्तान में बच्चों की शिक्षा से जुड़ी हैं। मलाला का जीवन संघर्ष और साहस की दास्तां है। 17 वर्षीय मलाला तब सुर्खियों में आईं जब  बालिकाओं की शिक्षा की हिमायत करने को लेकर अक्टूबर, 2012 में पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर इलाके में स्कूल से घर जाते समय तालिबान के बंदूकधारियों ने मलाला को गोली मार दी थी। हमले के बाद उन्हें  विशेष इलाज के लिए ब्रिटेन भेजा गया था। मलाला  इस पुरस्कार को पाने वाली प्रथम पाकिस्तानी और सबसे कम उम्र की होंगी। उन्होंने यह पुरस्कार उन बच्चों को समर्पित किया जिनकी आवाज सुने जाने की जरूरत है।  मलाला की मासूमियत और शिक्षा के प्रति अनुराग को इसी से समझा जा सकता है कि उन्हें भले ही दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए चुना गया हो, लेकिन उनकी मुख्य चिंता आने वाले समय में उनकी स्कूली परीक्षाओं को लेकर बनी हुई है।  उन्हें इस बात की चिंता है कि पुरस्कार ग्रहण करने के वक्त की उनकी पढ़ाई छूट जाएगी। सबसे कम उम्र की नोबेल पुरस्कार विजेता के रूप में मलाला ने बर्मिंघम के मकान में अपनी पहली शाम अपने पिता के साथ पाकिस्तानी टीवी देखते हुए बिताया। उन्होंने कहा, ‘मुझे जुकाम हो गया है और अच्छा महसूस नहीं हो रहा है।इस पाकिस्तानी किशोरी के लिए दुनिया भर से संदेशों का अम्बार लग गया, जिन्हें तालिबान हमले के बाद मस्तिष्क की सर्जरी के लिए विमान से बर्मिंघम लाया गया था, ताकि उनकी जान बच सके। मलाला ने कहा, ‘मैं बहुत सम्मानित महसूस कर रही हूँऔर खुश हूँ। लोगों के प्रेम ने सचमुच में मुझे गोलीबारी से उबरने में और मजबूत होने में मदद की। इसलिए मैं वह सब कुछ करना चाहती हूँ जिससे समाज को योगदान मिल सके।
       मलाला इस बात से अवगत थीं कि उन्हें नोबेल पुरस्कार मिल सकता है। पुरस्कार की घोषणा होने के बाद उनके रसायन विज्ञान के क्लास में शुक्रवार को सुबह 10 बजे के बाद शिक्षक के आने की व्यवस्था की गई थी। उन्होंने बताया, ‘हम ताँबे की इलेक्ट्रोलाइसिस के बारे में पढ़ रहे हैं। मेरे पास मोबाइल फोन नहीं है, इसलिए मेरी शिक्षक ने कहा था कि अगर ऐसी कोई खबर होगी तो वह आएगी। लेकिन सवा दस बज गए और वह नहीं आई। इसलिए मैंने सोचा कि मुझे पुरस्कार नहीं मिला। मैं बहुत छोटी हूँ और मैं अपने काम के शुरुआती दौर में हूँ।पर कुछ ही मिनट बाद शिक्षक आ गईं और यह खबर दी। मलाला ने बताया, ‘मुझे लगता है कि मेरे शिक्षक मुझसे ज्यादा उत्साहित थे। उनके चेहरों की मुस्कान मुझसे ज्यादा थी। मैं फिर अपने भौतिक विज्ञान की क्लास के लिए गई।
       एक तरफ बचपन और बालिका शिक्षा को लेकर दुनिया  का सबसे बड़ा पुरस्कार, वहीं दोनों देशों के सम्बन्धों की बिसात पर कुछ लोग इसे कूटनीतिक नजरिये से भी देखते हैं। पर इसके बावजूद  सीमा पर बढ़ते तनाव के बीच नोबेल शान्ति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई दोनों देशों के बीच मजबूत सम्बन्ध बनाने के लिए संयुक्त रूप से काम करने को राजी हैं। मलाला ने कहा, ‘हम साथ काम करेंगे और भारत एवं पाकिस्तान के बीच मजबूत सम्बन्ध बनाने की कोशिश करेंगे। लड़ाई के बजाय प्रगति और विकास के लिए काम करना जरूरी हैफिलहाल लोगों की निगाहें एक बार फिर से बचपन पर हैं और साथ ही भारत-पाकिस्तान सम्बन्धों पर।  सत्यार्थी और मलाला की संयुक्त मुहिम इसमें कितना रंग लाएगी, यह तो वक्त ही बताएगा पर इन दोनों को सम्मान मिलने से एक बार फिर लोगों का ध्यान बाल श्रम, बाल दासता, बच्चों के यौन शोषण, बालिका शिक्षा जैसे अहम मुद्दों पर गया है। वाकई आज जरूरत बचपन को सहेजने की है और यही इस पुरस्कार की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

सम्पर्क: टाइप 5  निदेशक बंगला, जी.पी.ओ कैम्पस, सिविल लाइन्स, इलाहाबाद (उ.प्र.) 211001,kk_akanksha@yahoo.com, http:// shabdshikhar.blogspot.in

Apr 16, 2014

भाषाओं पर बढ़ता खतरा

भूमण्डलीकरण के दौर में

भाषाओं पर बढ़ता खतरा

 - आकांक्षा यादव 

 भूमण्डलीकरण, उदारीकरण, उन्नत प्रौद्योगिकी एवं सूचना-तकनीक के बढ़ते इस युग में सबसे बड़ा खतरा भाषा, साहित्य और संस्कृति के लिए पैदा हुआ है। भारत सदैव से विभिन्नताओं का देश रहा है। यहाँ के बारे में कहा जाता है कि यहाँ हर कोस पर पानी और हर चार कोस पर वाणी यानी भाषा बदल जाती है। पर लगता है यह मुहावरा कुछ दिनों में पुराना पड़ जायेगा। वस्तुत: भारत में बोली जाने वाली सैकड़ों भाषाओं में से 196 खत्म होने के कगार पर हैं; लेकिन इससे भी ज्यादा चिंताजनक पहलू यह है कि बोलियों का पूरा संसार ही सिमटता जा रहा है। दुनिया में बोली जाने वाली 6900 भाषाओं में से 2500 का अस्तित्व खतरे में है। भाषाएँ आधुनिकीकरण के दौर में प्रजातियों की तरह विलुप्त होती जा रही हैं। अगर संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2001 में किए गए अध्ययन से इसकी तुलना की जाए तो पिछले एक दशक में बदलाव काफी तेजी से हुआ है। उस समय विलुप्त प्राय: भाषाओं की संख्या मात्र 900 थी, लेकिन यह गंभीर चिन्ता का विषय है कि तमाम देशों में इस ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है। 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में 1652 भाषाएँ थी, जबकि 2001 में यह संख्या घटकर मात्र 224 रह गई। स्पष्ट है कि इन पाँच दशकों में भारत की 1418 भाषाएँ विलुप्त हो चुकी है। इन्टरनेट पर हर कुछ खँगालने वाली युवा पीढ़ी भी उन्हीं भाषाओं को तरजीह देती है जिनका उनके कैरियर से कोई वास्ता होता है। नतीजन प्रगति और विकास के तमाम दावों के बीच कई भाषाएँ व बोलियाँ अपनी उपेक्षा के चलते दम तोड़ती नजर आ रही हैं। अंग्रेजी के वर्चस्व और संरक्षण के अभाव में सैकड़ों भाषाएँ समाप्ति के कगार पर हैं। दुनियाभर में भाषाओं की इसी स्थिति के कारण संयुक्त राष्ट्र ने 1990 के दशक में 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाए जाने की घोषणा की थी। बांग्लादेश में 1952 में भाषा को लेकर एक आंदोलन के बारे में कहा जाता है कि इसी से बांग्लादेश की आजादी के आंदोलन की नींव पड़ी थी और भारत के सहयोग से नौ महीने तक चले मुक्ति संग्राम की परिणति पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बनने के रूप में हुई थी। इस आंदोलन की शुरुआत तत्कालीन पाकिस्तान सरकार द्वारा देश के पूर्वी हिस्से पर भी राष्ट्र भाषा के रूप में उर्दू को थोपे जाने के विरोध से हुई थी।

संयुक्त राष्ट्र की पहली स्टेट ऑफ द वल्र्ड्स इन्डीजीनस पीपुल्स रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया गया है कि दुनिया भर में छह से सात हजार तक भाषाएँ बोली जाती हैं, इनमें से बहुत सी भाषाओं पर लुप्त होने का खतरा मँडरा रहा है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें से अधिकतर भाषाएँ बहुत कम लोग बोलते हैं, जबकि बहुत थोड़ी सी भाषाएँ बहुत सारे लोगों द्वारा बोली जाती हैं। सभी मौजूदा भाषाओं में से लगभग 90 फीसदी अगले 100 सालों में लुप्त हो सकती हैं, क्योंकि दुनिया की लगभग 97 फीसदी आबादी इनमें से सिर्फ चार फीसदी भाषाएँ बोलती हैं। यूनेस्को द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक ठेठ आदिवासी भाषाओं पर विलुप्ति का खतरा बढ़ता ही जा रहा है और इन्हें बचाने की आपात स्तर पर कोशिशें करनी होंगी। यूनेस्को द्वारा कराये गये इस अध्ययन पर गौर करें तो इस रिपोर्ट में सबसे ज्यादा खतरा भारत की भाषाओं पर बताया गया है। जहाँ भारत में यह 196 भाषाओं पर है, वहीं अमेरिका व इण्डोनेशिया क्रमश: 192147 भाषाओं पर खतरे के साथ दूसरे व तीसरे नंबर पर हैं। भाषाओं के मामले में सर्वाधिक समृद्ध पापुआ न्यू गिनी में 800 से ज्यादा भाषाएँ बोली जाती हैं, जबकि वहाँ केवल 88 भाषाओं पर ही खतरा है। पीपुल्स लिंग्युस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया (पीएलएसआई) के अध्ययन के अनुसार पिछले 50 वर्षो के दौरान 780 विभिन्न बोलियों वाले देश की 250 भाषाएँ लुप्त हो चुकी हैं। इनमें से 22 अधिसूचित भाषाएँ हैं। जनसंख्या के आँकड़ों के अनुसार 10 हजार से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली 122 भाषाएँ हैं। बाकी 10 हजार से कम लोगों द्वारा बोली जाती है। आयरिश भाषाई विद्वान जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन के बाद पहली बार यह भाषायी सर्वे किया गया है। ग्रियर्सन ने 1898-1928 के बीच भाषायी सर्वे किया था। पीएलएसआई सार्वजनिक विमर्श और अप्रेजल फोरम वाला एक गैर सरकारी संगठन है, जिसमें 85 संस्थाओं और विश्वविद्यालयों के तीन हजार विशेषज्ञ शामिल हैं। आजाद भारत में पहली बार किए गए इस पहले सर्वें में चार वर्ष लगे। सितम्बर 2013 में इसकी 72 पुस्तकों में 50 खंड की रिपोर्ट प्रकाशित हुई। इस रिपोर्ट के अनुसार भाषायी विविधता की दृष्टि से भारत में अरुणाचल प्रदेश सबसे समृद्ध राज्य है, वहाँ 90 से अधिक भाषाएँ बोली जाती है। इसके बाद महाराष्ट्र और गुजरात का स्थान है, जहाँ 50 से अधिक भाषाएँ बोली जाती है। 47 भाषाओं के साथ ओडिशा चौथे स्थान पर है। लिपियों के आधार पर देखें तो देश में 86 विभिन्न लिपियाँ चलन में हैं। सबसे ज्यादा नौ लिपियों के साथ पश्चिम बंगाल पहले स्थान पर है और कई अन्य लिपियों को भी विकसित करने का यहाँ प्रयास किया जा रहा है। इस राज्य में 38 विभिन्न भाषाएँ बोली जाती हैं। देश की पाँच प्रतिशत भाषाएँ और 10 प्रतिशत लिपियाँ बंगाल में पाई जाती हैं। इस सर्वें के अनुसार उत्तर-पूर्व में किसी एक व्यक्ति द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं की संख्या दुनिया में सर्वाधिक है। इसके बावजूद पूर्वोत्तर के पाँच राज्यों में बोली जाने वाली करीब 130 भाषाओं का अस्तित्व खतरे में हैं। असम की 55, मेघालय की 31, मणिपुर की 28, नागालैंड की 17 और त्रिपुरा की 10 भाषाएँ खतरे में हैं। हाल ही में भारत के अंडमान निकोबार द्वीप समूह की तकरीबन 65000 साल से बोली जाने वाली एक आदिवासी भाषा 'बोहमेशा के लिए विलुप्त हो गई। वस्तु: कुछ समय पहले अंडमान में रहने वाले बो कबीले की आखिरी सदस्य 85 वर्षीय बोआ सीनियर के निधन के साथ ही इस आदिवासी समुदाय द्वारा बोली जाने वाली 'बोभाषा भी लुप्त हो गई। अंडमान-निकोबार में चिडिय़ों पर शोध कर रही जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली की प्रोफेसर डॉ.अनविता अब्बी को तो यह देखकर हैरत हुई की बोआ सीनियर चिड़िया से बात कर रही थीं और वे दोनों एक-दूसरे की भाषा समझ रहे थे। गौरतलब है कि ग्रेट अंडमानीज में कुल 10 मूल आदिवासी समुदायों में से एक बो समुदाय की इस अंतिम सदस्य ने 2004 की विनाशकारी सुनामी में अपने घर-बार को खो दिया था और सरकार द्वारा बनाए गए कंक्रीट के शेल्टर में स्ट्रैट द्वीप पर गुजर-बसर कर रही थी। 'बो'भाषा के बारे में भाषायी विशेषज्ञों का मानना है कि यह भाषा अंडमान में प्री-नियोलोथिक समय से इस समुदाय द्वारा उपयोग में लाई जा रही थी। दरअसल, ये भाषाएँ शहरीकरण के चलते दूर-दराज के इलाकों में अंग्रेजी और हिन्दी के बढ़ते प्रभाव के कारण हाशिए पर जा रही हैं। भाषाओं के कमजोर पड़कर दम तोडऩे की स्थिति का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया भर में 199 भाषाएँ ऐसी हैं जिन्हें बोलने वालों की संख्या एक दर्जन लोगों से भी कम है। गौरतलब है कि 1974 में आइसले ऑफ मैन में नेड मैडरेल की मौत के साथ ही 'मैक्सभाषा खत्म हो गई, जबकि वर्ष 2008 में अलास्का में मैरी स्मिथ जीन्स के निधन से 'इयाक’भाषा का अस्तित्व समाप्त हो गया। दुनिया की एक तिहाई भाषाएँ अफ्रीकी देशों में बोली जाती हैं, आकलन है कि अगली सदी के दौरान इनमें से दस फीसदी खत्म हो जाएँगी। यूक्रेन में कराइम भाषा बोलने वाले केवल छह लोग हैं, जबकि अमेरिका के ओकलाहामा में विशिता भाषा केवल दस लोगों द्वारा बोली जाती है। इसी तरह इंडोनेशिया में लेंगिलू बोलने वाले केवल चार लोग बचे हैं। 178 भाषाएँ ऐसी हैं जिन्हें बोलने वाले लोगों की संख्या 150 से कम हैं। वाकई बोलियाँ-भाषा क्यों विलुप्त हो रही हैं। यह आपने आप में एक जटिल सवाल है। बकौल हिन्दी कवयित्री और लेखिका अनामिका, हम इस बात की अवलेहना नहीं कर सकते कि भाषा और बोलियों को बचाने की शुरुआत घर से ही की जा सकती है। हर परिवार में अलग-अलग पीढिय़ाँ होती है। यह जरूरी है कि अलग-अलग घरेलू बोलियों में घर के अन्दर संवाद हो। बच्चों में लोक कथाओं के मिथक, लोकोक्तियाँ, माँ-दादी व नानी की कहानियों के जरिए रूप लेती हैं। भाषाई संस्कृति का यह पूर्वराग ही अच्छी भाषा के विकास का आधार है। इस पच्चीकारी से भाषा सहज, पैनी और संवादगम्य होती है। भाषा-बोलियों को बचाने के लिए यह भी जरुरी है कि अनुवाद के जरिए दो भाषिक संस्कृतियों के बीच पुल बनाया जाय। यदि हम आज की स्थितियों में भारतीय परिप्रेक्ष्य को ही लें तो एक ओर अंग्रेजी का हौव्वा है तो दूसरी ओर हिन्दी आम आदमी से कट रही है, वहीं उर्दू को मजहब से जोड़ दिया गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो उपमहाद्वीप के राजनीतिक परिदृश्य ने दो भाषायी परम्पराओं को विकलांग बना दिया। यही नहीं आज की जबान में बोलियों के लफ्जों और कहावतों के समंदर का उपयोग भी नहीं हैं, इससे भी भाषा कमजोर हुई है।भारत में भी तेजी से खत्म हो रही भाषाओं और बोलियों को बचाने व संरक्षित करने के प्रयास तेज हो गये हैं। केंद्र सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से हाल में बोलियों को लेकर एक अध्ययन कराया गया, जिसमें पाया गया कि उत्तर भारत की नौ बोलियाँ लगभग खत्म होने के कगार पर हैं। इनमें दर्मिया, जाद, राजी, चिनाली, गहरी, जंघूघ, स्पीति, कांशी या मलानी और रोंगपो शामिल हैं। इन बोलियों को पाँच हजार से कम लोग ही बोलते हैं। इनमें दर्मिया, जाद और राजी बोलियाँ तिब्बती-बर्मी परिवार की हैं, जो उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में बोली जाती हैं। राजी को 668, दर्मिया को लगभग ढाई हजार और जद को इससे कुछ अधिक ही लोग बोलते हैं। ये बोलियाँ उत्तरांखड में पिथौरागढ़, धारचूला, जौलजीवी और अस्कोट में बोली जाती हैं। इसी प्रकार उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में ही बोली जाने वाली चिनाली और गहरी बोलियों को बोलने वालों की संख्या भी मात्र दो-तीन हजार ही है। वाकई समय रहते यदि इनको संरक्षित नहीं किया गया तो इन्हें खत्म होने में देरी नहीं लगेगी। इन बोलियों के खत्म होने से वहाँ की संस्कृति भी खत्म हो रही है, इसलिए इनका संरक्षण बेहद जरूरी है। ऐसे में इन बोलियों को बचाने के लिए केंद्र सरकार ने स्कीम फॉर प्रोटेक्शन एंड प्रिजर्वेशन ऑफ इनडैंजर्ड लैंग्वेज योजना शुरू की है। इसके तहत तेजी से लुप्त हो रही भाषाओं और बोलियों से जुड़े दस्तावेजों को डिजिटल स्वरूप में संरक्षित किया जायेगा। इसके तहत तमाम प्रतिष्ठित शैक्षणिक व शोध संस्थानों को इन बोलियों के संरक्षण की जिम्मेदारी दी गयी हैं। इन नौ विलुप्त प्राय: बोलियों में से तीन बोलियों दर्मिया, जाद और राजी (जंगली) के संरक्षण का दायित्व लखनऊ विश्वविद्यालय और दो बोलियों चिनाली व गहरी के संरक्षण का काम अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को सौंपा गया है। इसके अलावा दो बोलियों को बचाने का जिम्मा सीआईआईएल मैसूर और एक-एक का कोलकाता और जेएनयू, नई दिल्ली को दिया गया है। इनमें लखनऊ विश्वविद्यालय में भाषा विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो.कविता रस्तोगी और अलीगढ़ विश्वविद्यालय में प्रो. इम्तियाज हसनैन के नेतृत्व में काम होगा। डिजिटल स्वरूप में संरक्षित करने हेतु सर्वप्रथम लुप्त होती भाषाओं व बोलियों की टेक्स्ट, ऑडियो और वीडियो रिकार्डिंग की जाएगी।
टेक्स्ट रिकार्डिंग के बाद बोलियों को इंटरनेशनल फोनेटिक्स अल्फाबेट्स (आईएफए) में लिखा जाएगा ताकि विश्व के भाषा वैज्ञानिक इन्हें पढ़ सकें और बोली को समझ सकें। आडियो रिकार्डिंग लाइब्रेरी में रखी जाएगी ताकि कोई भी इसको सुनकर समझ सके। वीडियो रिकार्डिंग में इन लोगों की दिनचर्या, बोलियों की संस्कृति और विशेष कार्यक्रमों को भी रिकार्ड किया जाएगा, ताकि बोलियों के साथ-साथ उनकी संस्कृति को भी संरक्षित किया जा सके। इसी क्रम में केरल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के एक समूह ने भी तेजी से लुप्त हो रही भाषाओं से जुड़े दस्तावेजों को डिजिटल स्वरूप में संरक्षित करने के लिए परियोजना शुरू की है। वहाँ के भाषा विज्ञान विभाग का भाषा विज्ञान अनुसंधान मंच बयारी, मलिजलाशांबा और मइगुरदुने सहित 25 भाषाओं एवं बोलियों को संग्रहित कर चुका है। इन भाषाओं को बोलने वाले अब केवल कुछ ही लोग बचे हैं। केरल की लुप्त होती बोलियों के अलावा इस समूह ने हिमाचल प्रदेश की मंतलिया और पहाड़ी भाषाओं, झारखंड की कुरमली और लद्दाख की पाली भाषा को भी रिकार्ड किया है। यहाँ  के भाषा विज्ञान विभाग के तकनीकी अधिकारी एवं परियोजना प्रमुख शिजित एस के निर्देशन में शिक्षकों के दल ने लुप्तप्राय भाषाओं के बचे हुए वक्ताओं की तलाश में देश भर की यात्रा की और उसे रिकार्ड किया। इसके लिए उन्होंने अंग्रेजी में एक प्रश्नमाला तैयार किया और उन लोगों से अपनी मूल भाषा में इसका जवाब देने को कहा। इन 25 में से 15 भाषाओं के वक्ताओं को स्टूडियो में लाकर भी उनकी बातें रिकार्ड की गई, ताकि इनका डिजिटलीकरण आसानी से हो सके। वस्तुत: आज सवाल सिर्फ किसी भाषा के खत्म होने का ही नहीं है, बल्कि इसी के साथ उस समुदाय और उससे जुड़ी कई तरह की सांस्कृतिक विरासत के नष्ट होने का अहसास भी होता है। इन भाषाओं का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। इनमें से कुछ एक तो कभी समृद्ध और शिष्ट साहित्य का विपुल भण्डार मानी जाती थी कुछेक देशों ने इस खतरे को भाँपते हुए कदम भी उठाये हैं, नतीजन-ब्रिटेन की भाषा कॉर्निश और न्यू कैलेडोनिया की भाषा को पहले खत्म हुआ मान लिया गया था लेकिन अब इन्हें फिर से बोला जाने लगा है। भाषा विशेषज्ञों का कहना है कि भाषाएँ किसी भी संस्कृति का आईना होती हैं और एक भाषा की समाप्ति का अर्थ है कि एक पूरी सभ्यता और संस्कृति का नष्ट होना। इस तरफ सभी देशों को ध्यान देने की जरूरत है, अन्यथा दुनिया अपनी सभ्यता, संस्कृति व समृद्ध विरासत को यूँ ही खोती रहेंगी।


सम्पर्क: निदेशक, डाक सेवाएँ, इलाहाबाद परिक्षेत्र, टाइप 5, निदेशक बंगला, जीपीओ कैम्पस, सिविल लाइन्स, इलाहाबाद (उ.प्र.)-211001, मो.08004928599, Email- kkyadav.y@rediffmail.com 

Sep 27, 2012

गुरु-शिष्य की बदलती परंपरा

गुरु-शिष्य की बदलती परंपरा

- आकांक्षा यादव  
भारतीय संस्कृति का एक सूत्र वाक्य है- 'तमसो मा ज्योतिर्गमय।' अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने की इस प्रक्रिया में शिक्षा का बहुत बड़ा योगदान है। भारतीय परम्परा में शिक्षा को शरीर, मन और आत्मा के विकास द्वारा मुक्ति का साधन माना गया है। शिक्षा मानव को उस सोपान पर ले जाती है जहाँ वह अपने समग्र व्यक्तित्व का विकास कर सकता है। भारत में गुरू-शिष्य की लम्बी परंपरा रही है।
गुरुब्रह्म गुरूर्विष्णु: गुरूर्देवो महेश्वर:।
गुरू: साक्षात परब्रह्म, तस्मैं श्री गुरूवे नम:।।
प्राचीनकाल में राजकुमार भी गुरूकुल में ही जाकर शिक्षा ग्रहण करते थे और विद्यार्जन के साथ-साथ गुरू की सेवा भी करते थे। राम-विश्वामित्र, कृष्ण-संदीपनी, अर्जुन-द्रोणाचार्य से लेकर चंद्रगुप्त मौर्य-चाणक्य एवं विवेकानंद रामकृष्ण परमहंस तक शिष्य-गुरू की एक आदर्श एवं दीर्घ परम्परा रही है। उस एकलव्य को भला कौन भूल सकता है, जिसने द्रोणाचार्य की मूर्ति स्थापित कर धनुर्विद्या सीखी और गुरूदक्षिणा के रूप में द्रोणाचार्य ने उससे उसके हाथ का अंगूठा ही माँग लिया था। श्री राम और लक्ष्मण ने महर्षि विश्वामित्र, तो श्री कृष्ण ने गुरू संदीपनी के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण की और उसी की बदौलत समाज को आतातायियों से मुक्त भी किया। गुरूवर द्रोणाचार्य ने पांडव-पुत्रों विशेषकर अर्जुन को जो शिक्षा दी, उसी की बदौलत महाभारत में पांडव विजयी हुए। गुरूवर द्रोणाचार्य स्वयं कौरवों की तरफ से लड़े पर कौरवों को विजय नहीं दिला सके क्योंकि उन्होंने जो शिक्षा पांडवों को दी थी, वह उन पर भारी साबित हुई। गुरू के आश्रम से आरम्भ हुई कृष्ण-सुदामा की मित्रता उन मूल्यों की ही देन थी, जिसने उन्हें अमीरी-गरीबी की खाई मिटाकर एक ऐसे धरातल पर खड़ा किया जिसकी नजीर आज भी दी जाती है। विश्व-विजेता सिकंदर के गुरू अरस्तू को भला कौन भूला सकता है। अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने तो अपने पुत्र की शिक्षिका को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि उसकी शिक्षा में उनका पद आड़े नहीं आना चाहिए। उन्होंने शिक्षिका से अपने पुत्र को सभी शिक्षाएं देने का अनुरोध किया जो उसे एक अच्छा व्यक्ति बनाने में सहायता करती हो।
वस्तुत: शिक्षक उस प्रकाश-स्तम्भ की भांति है, जो न सिर्फ लोगों को शिक्षा देता है बल्कि समाज में चरित्र और मूल्यों की भी स्थापना करता है। शिक्षा का रूप चाहे जो भी हो पर उसके सम्यक अनुपालन के लिए शिक्षक का होना निहायत जरूरी है। शिक्षा सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं बल्कि चरित्र विकास, अनुशासन, संयम और तमाम सद्गुणों के साथ अपने को अप-टू-डेट रखने का माध्यम भी है। कहते हैं बच्चे की प्रथम शिक्षक माँ होती है, पर औपचारिक शिक्षा उसे शिक्षक के माध्यम से ही मिलती है। प्रदत्त शिक्षा का स्तर ही व्यक्ति को समाज में तद्नुरूप स्थान और सम्मान दिलाता है। शिक्षा सिर्फ अक्षर-ज्ञान या डिग्रियों का पर्याय नहीं हो सकती बल्कि एक अच्छा शिक्षक अपने विद्यार्थियों का दिलो-दिमाग भी चुस्त-दुरुस्त बनाकर उसे वृहद आयाम देता है। शिक्षक का उद्देश्य पूरे समाज को शिक्षित करना है। शिक्षा एकांगी नहीं होती बल्कि व्यापक आयामों को समेटे होती है।
डॉ. राधाकृष्णन ने शिक्षा को एक मिशन माना था और उनके मत में शिक्षक होने का हकदार वही है, जो लोगों से अधिक बुद्धिमान व विनम्र हों। अच्छे अध्यापन के साथ- साथ शिक्षक का अपने छात्रों से व्यवहार व स्नेह उसे योग्य शिक्षक बनाता है। मात्र शिक्षक होने से कोई योग्य नहीं हो जाता बल्कि यह गुण उसे अर्जित करना होता है।
आजादी के बाद इस गुरू-शिष्य की दीर्घ परम्परा में तमाम परिवर्तन आये। 1962 में जब डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन देश के राष्ट्रपति के रूप में पदासीन हुए तो उनके चाहने वालों ने उनके जन्मदिन को 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाने की इच्छा जाहिर की। डॉ. राधाकृष्णन ने कहा कि-  'मेरे जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने के निश्चय से मैं अपने को काफी गौरवान्वित महसूस करूँगा।' तब से लेकर 5 सितम्बर को 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाया जाता है। डॉ. राधाकृष्णन ने शिक्षा को एक मिशन माना था और उनके मत में शिक्षक होने का हकदार वही है, जो लोगों से अधिक बुद्धिमान व विनम्र हों। अच्छे अध्यापन के साथ- साथ शिक्षक का अपने छात्रों से व्यवहार व स्नेह उसे योग्य शिक्षक बनाता हैै। मात्र शिक्षक होने से कोई योग्य नहीं हो जाता बल्कि यह गुण उसे अर्जित करना होता है। डॉ. राधाकृष्णन शिक्षा को जानकारी मात्र नहीं मानते बल्कि इसका उद्देश्य एक जिम्मेदार नागरिक बनाना है। शिक्षा के व्यवसायीकरण के विरोधी डॉ. राधाकृष्णन विद्यालयों को ज्ञान के शोध केंद्र, संस्कृति के तीर्थ एवं स्वतंत्रता के संवाहक मानते थे। यह डॉ. राधाकृष्णन का बड़प्पन ही था कि राष्ट्रपति बनने के बाद भी वे वेतन के मात्र चौथाई हिस्से से जीवनयापन कर समाज को राह दिखाते रहे।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो गुरू-शिष्य की परंपरा कहीं न कहीं कलंकित हो रही है। आए दिन शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों के साथ एवं विद्यार्थियों द्वारा शिक्षकों के साथ दुव्र्यवहार की खबरें सुनने को मिलती हैं। जातिगत भेदभाव प्राइमरी स्तर के स्कूलों में आम बात है। आज न तो गुरू- शिष्य की परंपरा रही और न ही वे गुरू और शिष्य रहे। व्यवसायीकरण ने शिक्षा को धंधा बना दिया है। संस्कारों की बजाय धन महत्वपूर्ण हो गया है। ऐसे में जरूरत है कि गुरू और शिष्य दोनों ही इस पवित्र संबंध की मर्यादा की रक्षा के लिए आगे आएं ताकि इस सुदीर्घ परंपरा को सांस्कारिक रूप में आगे बढ़ाया जा सके। आज शिक्षा को हर घर तक पहुँचाने के लिए तमाम सरकारी प्रयास किए जा रहे हंै, पर इसी के साथ शिक्षकों की मन:स्थिति के बारे में भी सोचने की जरूरत है। शिक्षकों को भी वह सम्मान मिलना चाहिए, जिसके वे हकदार हैं। शिक्षक, शिक्षा (ज्ञान) और विद्याार्थी के बीच एक सेतु का कार्य करता है और यदि यह सेतु ही कमजोर रहा तो समाज को खोखला होने में देरी नही लगेगी। देश का शायद ही ऐसा कोई प्रांत हो, जहाँ विद्यार्थियों के अनुपात में अध्यापकों की नियुक्ति हो, फिर शिक्षा व्यवस्था कैसे सुधरे? अभी भी देश में छात्र शिक्षक अनुपात 32:1 है, जबकी 324 ऐसे जिले हैं जिनमें छात्र शिक्षक अनुपात 3:1 से कम है। देश में नौ फीसदी स्कूल ऐसे हैं जिनमें केवल एक शिक्षक हैं तो 21 फीसदी ऐसे शिक्षक हैं जिनके पास पेशेवर डिग्री तक नहीं है। मतगणना-जनगणना से लेकर अन्य तमाम कार्यों में शिक्षकों की ड्यूटी भी उन्हें मूल शिक्षण कार्य से विरत रखती है। ऐसे में जब शिक्षा की नींव ही कमजोर होगी, तो विद्यार्थियों का उन्नयन कैसे होगा, यह एक गंभीर समस्या है।
'शिक्षक दिवस' एक अवसर प्रदान करता है जब हम समग्र रूप में शिक्षकों की भूमिका व कर्तव्यों पर पुनर्विचार कर सकें और बदलते प्रतिमानों के साथ उनकी भूमिका को और भी सशक्त रूप दे सकें।

संपर्क: टाइप 5, निदेशक बंगला, जीपीओ कैम्पस, सिविल लाइन्स, इलाहाबाद (उ.प्र.)-  211001
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