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Nov 8, 2023

उदंती.com, नवम्बर- दिसम्बर 2023

वर्ष- 16, अंक- 4, 5

शत-शत दीप इकट्ठे होंगे

अपनी-अपनी चमक लिये,

अपने-अपने त्याग, तपस्या,

श्रम, संयम की दमक लिये

         - हरिवंशराय बच्चन

संयुक्तांक

इस अंक में

अनकहीः अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए... - डॉ. रत्ना वर्मा

निबंधः मिट्टी के दीयों से आलोक का सर्जन - रामधारी सिंह 'दिनकर'

पर्व - संस्कृतिः दीपक संस्कृति की विविधता में एकता - प्रमोद भार्गव

कविताः यह दीप अकेला - अज्ञेय

जीव- जगतः ज्ञान और समृद्धि का प्रतीक उल्लू - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

पर्व संस्कृतिः लक्ष्मी की सवारी

परसाई जन्म शताब्दी वर्ष परः पूछिए परसाई से -विनोद साव

व्यंग्यः कबीरा, काहे खड़ा बाजार ! - प्रेम जनमेजय

कहानीः घर का रास्ता - सुदर्शन रत्नाकर

कविताः जले ज्योति - रमेश गौतम

मनोविज्ञानः क्या भलाई  का ज़माना नहीं रहा?

हाइबनः दिव्य सम्बन्ध - अनिता ललित

लघुकथाः समाजवाद - उर्मिल कुमार थपलियाल

आलेखः पटाखों का तिहासिक, सांस्कृतिक व न्यायिक पक्ष - राजेश पाठक

धरोहरः कलचुरी कालीन भगवान शिव का प्राचीन मंदिर देव बलोदा

प्रेरकः पत्थर और घी – निशांत

प्रकृतिः तितलियाँ क्यों हैं जरूरी - अपर्णा विश्वनाथ

खान- पानः भारी आहार तो बढ़े विकार – साधना मदान

जीवन दर्शनः 9/11 और ट्वीन टॉवर : एक युद्ध आतंकवाद के विरुद्ध  - विजय जोशी 

पर्यावरणः वनों की कटाई के दुष्प्रभाव  - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

अनकहीः अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए...

 - डॉ. रत्ना वर्मा

पर्व, त्योहार और उल्लास के इस सर्द मौसम में एक समय ऐसा भी था, जब हम सब भारतवासियों को अपने इस सबसे बड़े उजालों के त्योहार दीपावली की उत्सुकता से प्रतीक्षा रहती थी। घर की साफ- सफाई और लिपाई - पुताई का काम कई दिन पहले से ही शुरू हो जाता था। धनतेरस के दिन घर या परिवार के लिए कुछ नया खरीदने की योजना भी पहले ही से बन जाती थी, नए कपड़े, विभिन्न तरह के पकवान और सबसे ज्यादा उल्लास परिवार वालों से मिलने की खुशी, जो सिर्फ दीपावली के अवसर पर ही हो पाती थी। 
...और यदि वह दीवाली आपके गाँव के घर की हो तब तो बात ही कुछ और होती थी। गाँव में कृषकों का उत्साह देखते ही बनता था। पाँच दिन तक चलने वाले इस पर्व के अवसर पर पूरा गाँव उल्लास में डूबा होता था। धनतेरस, नरकचतुर्दशी, लक्ष्मी पूजा और फिर गोवर्धन पूजा से लेकर भाईदूज तक गाँव के प्रत्येक घर से पकवान बनने की सोंधी महक आया करती थी। मिट्टी के दियों से गाँव में उजियारा फैला रहता था।  उल्लास में डूबा गाँव नाच- गानों में इतना मस्त होता कि आम दिनों के दुख तकलीफ को भूलकर कुछ दिन के लिए उनका जीवन आनन्द से भरपूर हो जाता था।  लेकिन अब गाँव भी शहर बनते जा रहे हैं। सादगी, भाईचारा सब जैसे कहीं तिरोहित हो गए हैं। सुविधाएँ कम थीं, तो आवश्यकताएँ भी कम थीं। आधुनिक सुख- सुविधाओं ने सबकी आदतें बदल दीं हैं। गाँव की आबोहवा भी उल्टी दिशा में बहने लगी है। बिना नशा किए उनके लिए त्योहार का कोई मतलब ही नहीं होता। 
अब चलें आज के ज़माने में मनाए जाने वाले उजाले के पर्व की, तो अब चाहे गाँव हो या शहर लोग साफ- सफाई सुविधानुसार साल में कभी भी कर लेते हैं। कपड़े और घर के लिए कुछ बड़ा सामान तो आजकल जब जरूरत हो, तब खरीद लिए जाते हैं। उसके लिए भला कोई दीवाली का इंतजार क्यों करे? अब रही बात मिठाई और पकवान बनाने की, तो वह तो आजकल बाजार में जब चाहो तब उपलब्ध है। माँ और दादी - नानी के हाथ के वे स्वादिष्ट लड्डू या गुजिया की बात अब पुराने जमाने की बात हो गई है। फिर आजकल की कामकाजी माँ के पास उतना समय ही कहा बचता है कि वह इन पकवानों को बनाने के लिए समय निकाल पाए।  
इसी प्रकार दीपावली- मिलन के लिए हम आज भी मित्रों, परिवारजनों के पास जाते हैं पर परिवार और मित्रों के बीच बधाई का आदान- प्रदान करने के लिए अब घर में बनने वाले अनेक तरह के स्वादिष्ट पकवानों और मिठाइयों से भरे वे थाल, जो खूबसूरत क्रोशिए से बने  थालपोश से ढके हुए  होते थे। इसके बारे में आज की पीढ़ी को क्या बताएँ कि दीपावली- मिलन के साथ सबका मुँह मीठा करने की यह मोहक परम्परा कितनी मीठी हुआ करती थी।
अब तो बढ़िया पैकेजिंग के साथ बाजार में हैसियत के अनुसार तरह - तरह के तोहफे उपलब्ध हैं। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि आजकल दुकानदार द्वारा चमचमाते पन्नों के भीतर पैक मिठाई के डब्बे एक के घर से होते हुए कई घरों को पार करके कब आपके ही पास लौट कर आ जाएँगे, आपको भान भी नहीं हो पाएगा। कहने का तात्पर्य यही है कि आजकल तोहफे देना भी औपचारिकता मात्र बनकर रह गए हैं। और तो और, अब तो इसकी भी आवश्यकता नहीं । सोशल मीडिया ने बधाई और शुभकामनाएँ देने के इतने नायाब तरीके उपलब्ध करा दिए हैं कि घर बैठे ही सब संभव हो गया है। न मिठाई खिलाने का झंझट और न किसी के पास जाने का । एक वीडियो कॉल कीजिए , बड़ों का आशीर्वाद भी ले लीजिए और छोटों को प्यार भी दे दीजिए। 
यह सब तो हुआ समाज और परिवार के रहन -सहन और संस्कारों में आए बदलाव का दृश्य।  कहते हैं बदलाव प्रकृति का नियम है; पर जब बदलाव अच्छे के लिए हो, तब तक तो सब ठीक, पर जब बदलाव तबाही लाए तो, उसका विरोध तो करना ही पड़ेगा। आइए उन बदलावों का विरोध करने का बीड़ा उठाएँ, जिसने सबका जीना मुश्किल कर दिया है। हम सब आपने आपको शिक्षित, ज्ञानी और जमाने के साथ चलने वाला करते हैं पर क्या सचमें... 
आप सब जानते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से देशवासी इस पर्व  की तैयारी के साथ इस मौसम में लगातार बढ़ते प्रदूषण को लेकर ज्यादा परेशान दिखाई दे रहे हैं। देश की राजधानी दिल्ली के साथ कई मेट्रो शहरों में में प्रदूषण के कारण स्कूल कॉलेज बंद कर दिए गए हैं। इतना ही नहीं बहुत लोग दिल्ली छोड़ने की तैयारी में हैं; क्योंकि उनके अनुसार दिल्ली की आबोहवा रहने लायक नहीं रह गई है। पिछले कई वर्षों से दिल्ली सहित कई शहरों में पटाखे चलाए जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है , परंतु अन्य कारणों से वहाँ का प्रदूषण कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है। लेकिन एक प्रदूषित शहर छोड़कर दूसरे शहर चले जाना समस्या का समाधान तो नहीं है। 
दरअसल जो समाधान है उसे हम करते नहीं; बल्कि उसे बढ़ाने के ही उपाय करते रहते हैं। क्या हम पटाखे फोड़ना बंद कर पाते हैं? क्या हम अपने घरों को अपने नगर को बिजली के लट्टुओं से सजाना बंद कर पाते हैं? क्या हम मोटर गाड़ियों पर चलने की बजाय पैदल और साइकिल से चलने को प्राथमिकता दे पाते है? क्या हम प्लास्टिक का उपयोग बंद कर पाए हैं? क्या हम जल, जंगल और जमीन का संरक्षण कर पा रहे हैं ? सवाल बहुत हैं जिनके जवाब नहीं में ही है। तो फिर ऐसे में हमारी शिक्षा, हमारा ज्ञान, हमारे आविष्कार, हमारी उपलब्धियाँ किस काम की अगर हमारी धरती हमारे रहने लायक ही नहीं बचेगी। 

इधर एक और प्रदूषण है, जो बढ़ा है, वह है भाषा का प्रदूषण। राजनीति के क्षेत्र में भाषा का जो पतन हुआ है, वह पीड़ादायक है। कभी किसी के धर्म को लेकर, कभी किसी वर्ग विशेष के जीवन को लेकर, जो गर्हित टिप्पणियाँ की जाती हैं, वे नैतिक मूल्यों की गिरावट का साक्षात् प्रमाण हैं। चुनावी राजनीति और दलीय स्वार्थ ने इसे अश्लील की सीमा तक पहुँचा दिया है। वायु-प्रदूषण तो कुछ समय बाद घट जाएगा ; लेकिन शासन-प्रशासन में बैठे लोग  जिस तरह  नकारात्मक वाणी का सहारा लेने लगे हैं, वह किसी कलंक से कम नहीं। भाषा की यह दरिद्रता और पतन अशोभनीय ही नहीं, बल्कि निन्दनीय भी हैं।
दीपावली के दियों की चमक सबके दिलों में तभी उजियारा फैलाएगी, जब हम अपनी धरती के वातावरण को, मन के चिन्तन को, शुद्ध और साफ- सुथरा रखने का प्रयास करेंगे। 
 अंत में गोपालदास ‘नीरज’ के शब्दों में -
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना 
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए। 

Nov 7, 2023

निबंधः मिट्टी के दीयों से आलोक का सर्जन

 - रामधारी सिंह 'दिनकर'

कार्तिक–अमावस्या की सरणी हिन्दू–इतिहास में आलोक की लड़ी बनकर चमकती आई है। प्रत्येक वर्ष की एक अँधेरी रात को भारत की मिट्टी अपने अंग में असंख्य दीपों के गहने पहनकर तारों से भरे आकाश से होड़ लेती है और आदर्शनिष्ठ हिन्दू प्रकृति को यह सन्देश देता है कि काल–निर्मित कुरूप अन्धकार को वह सौन्दर्य और ज्योति दे सकता है। आलोक सर्वजयी पुरुष का प्राण–धन और उसके भीतर बसनेवाली आशा का प्रतीक है। वर्ष में एक बार अँधेरी रात को पुरुष प्रतिज्ञा करता है कि वह अन्धकार की सत्ता को स्वीकार नहीं करेगा। जब सूर्य और चन्द्र पराजित होकर धरती को अन्धकार में छोड़ देंगे, तब वह मिट्टी के दीयों से आलोक का सर्जन करेगा और ज्योति में चलेगा।

आज हिमालय की गुहा में भीषण अन्धकार का साम्राज्य है। सूर्य, चन्द्र और कितने ही उपग्रह पराजय स्वीकार करके क्षितिज के पार उतर गए हैं। सत्ता दीखती है तो धूमकेतु और उल्कापात की, जो इस अन्धकार को और भी डरावना बना रहे हैं। तिमिरकाय दैत्य ने अपनी जादू की छड़ी घुमाकर जीवन के प्रत्येक अंग को जड़ता के पाश में बाँध रखा है। न कोई आहट है और न कोई नाद। ऐसा लगता है कि हमारा समग्र राष्ट्रीय जीवन ही शिथिल और विजड़ित हो गया है। चट्टानों के बीच केवल एक बूढ़े सिंह का हुंकार गूँजता है, लेकिन चट्टानें टूटतीं नहीं, केवल हिलकर रह जाती हैं और हुंकार की व्यंग्यपूर्ण प्रतिध्वनि को सिंह के ही इर्द-गिर्द लौटा देती हैं।

बरसों से देश के शेर सीखचों में बन्द हैं और बाहर शृगाल और भेड़िये अपनी तुरही बजा रहे हैं। देश ने गर्जन किया, लेकिन बन्दीगृह के प्राचीर नहीं गिरे। देश ने तप्त आहें भेजीं, लेकिन सीखचे गले नहीं, कड़ियाँ पिघलीं नहीं। देश ने आक्रोश भेजा, लेकिन प्रलय के बादल घुमड़कर रह गए-शाप का एक वज्र भी आततायियों पर नहीं गिरा सके। क्रोध, आक्रोश, गर्जन, आँसू और आह-सब-के-सब बेकार हुए। अस्सी वर्षों की कठिन तपस्या जब सफल होने जा रही थी, ठीक तभी इन्द्र का आसन डोल गया। मार ने आकर अभियानियों का मार्ग घेर लिया। निर्भीक प्रवाहित होनेवाला निर्झर सहसा ठिठककर रुक गया। वर्षों से उद्दीप्त होकर जलनेवाली आग ने अपनी लपटें समेट लीं, मानो किसी दुष्ट देवता ने उसकी गति बाँध दी हो!

कविता की भाषा छोड़कर हम सीधा प्रश्न उठाना चाहते हैं कि इस जड़ता का अन्त कब और कैसे होगा? इतिहास-निर्माण की अलभ्य घड़ियाँ, एक के बाद दूसरी, व्यर्थ बीतती जा रही हैं। जो समय और शक्ति स्वतंत्रता-स्थापन की तैयारी में व्यय होती, वह विफलता-बोध और अनुपयोगी विलाप के कारण नष्ट होती जा रही है। हमारा देश अब चौराहे पर नहीं है! वह उसे पार करके उस पथ पर आ गया है, जो सीधे स्वाधीनता के मन्दिर में जाता है। एक नहीं, हजार चर्चिलों का यह दावा झूठ है कि साम्राज्यवाद की हिलती दीवारें अब किसी प्रकार भी स्थिर की जा सकती हैं। जनशक्ति का प्राबल्य इस युद्ध से अदृष्टपूर्व भीषणता के साथ निकलता आ रहा है। जो शक्ति अपार संसार का मूल हिला रही है, उसके धक्कों के सामने चर्चिल और एमरी तूफान में रूई के फाहों की तरह उड़ जानेवाले हैं। किसी भी जाति का बलिदान व्यर्थ नहीं जा सकता। मिट्टी पर गिरा हुआ पानी भी सब्जी पैदा करता है। फिर कौन कह सकता है कि भारतीय वीरों का लोहू देश के लिए आलोक का सृजन नहीं करेगा? हमारा बलिदान व्यर्थ नहीं जा सकता :

चिनगारी बन गई लहू की बूँद गिरी जो पग से,

चमक रहे, पीछे मुड़ देखो, चरण-चिह्न जगमग से।

आवश्यकता इस बात की है कि हम विफलता को स्वीकार नहीं करें। इस समय हमें अधिक-से-अधिक विश्वास, निष्ठा और आदर्श के लिए दुराग्रह की जरूरत है। कर्मनिष्ठ योगियों का मार्ग कोई भी नहीं रोक सकता। युद्ध के बाद ही हमें बहुत बड़े राष्ट्रीय प्रश्न का सामना करना होगा। अचानक हम एक ऐसी राष्ट्रीय परिस्थिति के सम्मुख आ जानेवाले हैं, जिसका कभी अन्दाज भी नहीं किया गया था। वैधानिक संकटों के रहते हुए भी हमारे सामने जन–सेवा के अनन्त मार्ग खुले हुए हैं, जिन पर चलने से हमें कोई नहीं रोक सकता। देश की पीड़ित जनता को हमारी सेवाओं की जैसी आवश्यकता आज है, वैसी पहले कभी नहीं हुई थी। अकर्मण्यता तथा निष्फलता के विषैले वातावरण को दूर करने का केवल एक ही उपाय है कि हम अपनी पूर्व–परिचित तपस्या के मार्ग पर आरूढ़ हो जाएँ। जिन्होंने अपना जीवन देश के लिए अर्पित कर दिया है, उनकी सेवाओं से देश किसी भी परिस्थिति में वंचित नहीं रखा जा सकता।

इतिहास की सरणी में आई हुई आज की दीवाली उस पुरुष को खोज रही है, जिसने युग-युग से यह प्रतिज्ञा कर रखी है कि हम अन्धकार को स्वीकार नहीं करेंगे।

ज्योतिर्मय मनुष्य! तू अपने को भूल रहा है। तुझमें बुद्ध का तेज है, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी, दोनों के लिए प्रकाश का निर्माण किया था। तुझमें राणा प्रताप का प्रताप है, जिसने वन-वन मारे-मारे फिरकर भी अपने आदर्श के प्रदीप को बुझने नहीं दिया। तुझमें मंसूर की जिद है, जिसके मर जाने पर भी उसके मांस की बोटी-बोटी ‘अनलहक’ पुकारती थी। आज का घनान्धकार तेरे पौरुष को चुनौती दे रहा है। नींद से जाग! आलस्य को झाड़कर उठ खड़ा हो! सूरज और चाँद के प्रकाश में चलनेवाले बहुत हो चुके हैं। इतिहास उनकी गिनती नहीं करता। आज तुझे अपने भीतर के तेज को प्रत्यक्ष करना है। तेरे लहू में तेल, शिरा में वर्त्तिका और हड्डी में चिराग है। मिट्टी के दीये शाम को जलते और सुबह से पहले ही बुझ जाते हैं। आज दीवाली की रात अपनी हड्डी के उस चिराग को जला, जिसकी लौ सदियों तक जलती रहती है।

(दीवाली, 1944) 'अर्धनारीश्वर' पुस्तक से


Nov 6, 2023

पर्व - संस्कृतिः दीपक संस्कृति की विविधता में एकता - प्रमोद भार्गव


  - प्रमोद भार्गव

ऊं सच्चिदानन्दरूपाय नमोस्तु परमात्मने।

ज्योतिर्मयस्वरूपाय विश्वमांगल्यमूर्तये।।


  मनुष्य ने प्रकाशमान स्वरूप वाले विश्व कल्याण मूर्तिमान के रूप में सच्चिदानन्द अर्थात सत्, चित्त और आनंदमयी परमात्मा की कल्पना की है। इस परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद की ॠचाओं में विश्वव्यापी ब्रह्मांड को एक महामानव अर्थात विराट पुरुष माना गया है। इस विराट पुरुष का नृत्य सूर्य है, मन चंद्रमा और उसके कान एवं प्राण वायु है। इसका मुख अग्नि, नाभि अंतरिक्ष, मस्तक द्युलोक और इसके पैर पृथ्वी हैं। इसी आलोकित ब्रह्मांडीय पुरुष से मानव समुदायों का निर्माण माना गया है। अब आधुनिक वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं कि ब्रह्मांड के स्वरूप में जो भी कुछ है, उसी का लघु रूप मनुष्य के शरीर और मस्तक में है। इसीलिए मनुष्य ने अनवरत प्रकाशित रहने वाली ऐसी मूर्ति की कल्पना की है, जो मानव कल्याण के लिए प्रकाशमान बनी रहे। हजारों साल से भारत में प्रकाश पर्व के रूप में दीपावली मनाई जा रही है। इस लंबे काल खंड में भारत पर अनेक आक्रमण हुए। तलवार के बूते धर्म और संस्कृति बदलने के उपक्रम किए गए, लेकिन दीपावली के पर्व को रोशन करने वाली दीप संस्कृति इन बदलावों से अछूती रहती हुई आज भी भारत के सांस्कृतिक वैभव को प्रकाशित कर रही है। जिन सांस्कृतिक धरोहरों को आक्रांताओं ने खंडित करके उनके वैभव को हर लिया था, उन धरोहरों अयोध्या के राम मंदिर, वाराणसी के काशी विश्वनाथ और उज्जैन के महाकाल का सांस्कृतिक वैभव लाखों दीपकों के प्रकाश से फिर उज्ज्वल हो उठा है। कालांतर में इस प्रकाश के विस्तार की किरण कृष्ण जन्मभूमि को भी आलोकित करने वाली है। अतएव इस दीप पर्व पर दीपकों की विपरीत समय में भी अक्षुण्ण बनी रही संस्कृति और उसके महत्त्व को जानते हैं।  

दीपावली प्रकाश पर्व है। यानी अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व है। आदिकाल से चली आ रही सांस्कृतिक यात्रा का यह त्यौहार सामाजिक जीवन में प्रसन्नता, समरसता और मंगल का प्रतीक है। इस कालखण्ड में मानव ने मिट्टी, पत्थर, काठ, मोम और धातुओं के स्वरूप में हजारों तरह के शिल्प में दीपक गढ़े हैं। शुरूआत में दीवाली की मुख्य भावना दीपदान से जुड़ी थी। प्रकाश के इस दान को पुण्य का सबसे बड़ा कर्म माना जाता था। दीपों के कलात्मक आकार में मनुष्य की कल्पना व संवेदनशील उँगलियों का इतिहास भी अंकित है। इस जगत में जीवन जीने के लिए प्रत्येक प्राणी को उजाले की जरूरत पड़ती है। बिना उजाले के वह कोई कार्य सुरुचिपूर्ण ढंग से संपन्न नहीं कर पाता है। वैसे तो सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण व उपयोगी प्रकाश सूर्य का है। इसके प्रकाश में ही अन्य सभी प्रकार के प्रकाश समाविष्ट रहते हैं। इसीलिए दीवाली को प्रकाश का पर्व कहा जाता है। कहा भी गया है,

शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं सुख संपदम्।

शत्रु बुद्धि विनाशं च दीपज्योतिः नमोस्तुते।।

    शुरुआती दौर में सीपियों का दीपक के रूप में उपयोग किया जाता था। इसमें रोशनी पैदा करने के लिए चर्बी डाली जाती थी और बाती के रूप में घास या कपास की ही बत्ती होती थी। इसके बाद पत्थर और काठ के दीपक अस्तित्व में आए। तत्पश्चात् मिट्टी के दिए बनाए जाने लगे। कुम्हार के चाक की खोज के बाद तो मिट्टी के दीए अनूठे व आकर्षक शिल्पों में अवतरित होने लगे और ये घर-घर आलोक-स्तंभ के रूप में स्थापित हो गए। धातुओं की खोज और उन्हें मनुष्य के लिए उपयोगी बनाए जाने के बाद बड़े लोगों के घरों व महलों की शोभा धातु के दिए बनने लगे। जो वैभव का प्रतीक भी थे। स्वर्ण, कांसा, ।ताँबा, पीतल और लोहे के दीयों का प्रचलन शुरू हुआ। इसमें पीतल के दीपकों को बेहद लोकप्रियता मिली। रामायण और महाभारत में भी ‘रत्नदीपों’ का उल्लेख देखने को मिलता है।

 कालांतर में एकमुखी से बहुमुखी दीपक बनाए जाने लगे। इनकी मूठ भी कलात्मक और पकड़ने में सुविधा जनक बनाई जाने लगी। सत्रहवीं-अठारहवीं सदी में दीपकों को अनेक प्रकार के पशु-पक्षियों व अप्सराओं के रूप में ढाला जाने लगा। इस समय ‘मयूरा धूप दीपक’ का चलन खूब था। इसकी आकृति नाचते हुए मोर की तरह होती है। इसके पंजों के ऊपर बत्ती रखने के लिए पाँच कटोरे बने होते हैं। मोर के ऊपर बन छेदों में अगरबत्तियाँ लगाई जाती हैं।

  राजे-रजवाड़े के कालखंड में छत से लटके दीपों का प्रचलन खूब था। ये परी, पशु, पक्षी और देवी-देवताओं की आकृतियों से सजे रहते थे। साँकल से लटके हंस और कबूतरों के पंजों पर तीन से पाँच दीपक बनाए जाते थे। कालांतर में दीपकों में नायाब परिवर्तन आए। इस समय गोल लटकने वाले कलात्मक दीपक ज्यादा संख्या में बने इसके अलावा आठ कोनों वाले, गुम्बदाकार व ऐसे ही अन्य प्रकार के दीपक बनाए जाने लगे। इन दीपकों में से रोशनी बाहर झाँकती थी।

   जब दीपक सैंकड़ो आकार-प्रकारों में सामने आ गए तो इनकी सुचारु रूप से उपयोगिता के लिए ‘दीप- शास्त्र’ भी लिख दिया गया। जिसमें दीपक जलाने के लिए गाय के घी को सबसे ज्यादा उपयोगी बताया गया। घी के विकल्प के रूप में सरसों के तेल का विकल्प दिया गया। कपास से कई प्रकार की बत्तियाँ बनाने के तरीके भी दीप- शास्त्र में सुझाए गए हैं। दीपावली पर देश में घी और सरसों के तेल से ही दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं।

    सोलहवीं सदी में तो संगीत के एक राग के रूप में ‘दीपक राग’ की भी महत्ता व उपलब्धि है। इस संदर्भ में जनश्रुति है कि संगीत सम्राट तानसेन द्वारा दीपक राग के गाए जाने पर मुगल सम्राट अकबर के दरबार में बिना जलाए दीप जल उठे थे। दीपक- राग के गाने के बाद ही तानसेन को ‘संगीत सम्राट’ की उपाधि से विभूषित किया गया। उज्जैन के हरसिद्धि मंदिर परिसर में दीपों के स्तंभ बने हुए हैं, जिन पर सैकड़ों दीप एक साथ रखकर जलाए जाते हैं।

प्राचीन भारतीय परंपरा में दीपक के दान से बड़ा महत्व जुड़ा है। महाभारत के ‘दान-धर्म-पर्व’ में दीप- दान के फल की महत्ता दैत्य ऋषि शुक्राचार्य ने दैत्यराज बलि को इस प्रकार समझाई है-

कुलोद्योतो विशुद्धात्मा प्रकाशत्वं च गच्छति।

ज्योतिषां चैव सालोक्यं दीपदाता नरः सदा।।

    अर्थात्, दीपकों का दान करने वाला व्यक्ति अपने वंश को तेजस्वी व समृद्धशाली बनाने वाला होता है और अंत में वह आलोकमयी लोकों को गमन करता है।

 रामायणकाल से पूर्व दीपावली का संबंध बलि कथा के संदर्भ में ही मान्य तथा प्रचलन में था। कार्तिक शुक्ल

प्रतिपदा को ‘बलि प्रतिपदा’ भी कहते हैं। इस दिन बलि महाराज की अर्चना भी की जाती है। राजा बलि अपने राज्य में चतुर्दशी से तीन दिन चलते हैं और तीनों दिन दीपदान भी करते हैं। बलि के इस दीपदान से ही इस उत्सव को दीपावली कहा गया है। हरिद्वार में हर की पौड़ी पर गंगा में अपने वंश की समृद्धि के लिए ही प्रतिदिन गंगा की संध्या आरती के समय बड़ी संख्या में दीप- दान किए जाते हैं। ऐसा ही वाराणसी के गंगा घाट पर होता है।

    प्राचीन भारत में मनुष्य के सभ्य व संस्कारजन्य होने के अनुक्रम में दीपक का महत्त्व हर एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य से जुड़ता चला गया। प्रयोजन के अनुसार ही इनका नामांकन हुआ। दीपावली पर जो दीप आकाश में सबसे ज्यादा ऊँचाई पर टाँगा जाने लगा उसे ‘आशा-दीप’, स्वयंवर के समय जलाए जाने वाले दीप को ‘साक्षी-दीप’ पूजा वाले दीप को ‘अर्चना-दीप’ साधना के समय रोशन किए जाने वाले दीप को ‘आरती-दीप’ मंदिरों के गर्भगृह में अनवरत जलने वाले दीप को ‘नंदा-दीप’ की संज्ञा दी गई। मंदिरों के प्रवेश द्वार और नगरों के प्रमुख मार्गों पर बनाए जाने वाले दीपकों को ‘दीप-स्तंभ’ का स्वरूप दिया गया, जिन पर सैकड़ों दीपक एक साथ प्रकाशमान करने की व्यवस्था की गई।

  बहरहाल वर्तमान में भले ही दीपकों का स्थान मोमबत्ती और विद्युत बल्वों ने ले लिया हो, लेकिन प्रकृति से आत्मा का तादात्म्य स्थापित करने वाली भावना के प्रतीक के रूप में जो दीपक जलाए जाते हैं, वे आज भी मिट्टी, पीतल अथवा तांबे के हैं। घी से जज्वलमान यही दीपक हमारे अंतर्मन की कलुषता को धोता है।

सम्पर्कः शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224, 09981061100


कविताः यह दीप अकेला - अज्ञेय

 - अज्ञेय

यह दीप अकेला स्नेह- भरा

है गर्व भरा मदमाता पर

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यह जन है : गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गाएगा

पनडुब्बा : ये मोती सच्चे फिर कौन कृति लाएगा?

यह समिधा : ऐसी आग हठीला बिरला सुलगाएगा

यह अद्वितीय : यह मेरा : यह मैं स्वयं विसर्जित :


यह दीप अकेला स्नेह- भरा

है गर्व भरा मदमाता पर

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यह मधु है : स्वयं काल की मौना का युगसंचय

यह गोरसः जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय

यह अंकुर : फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय

यह प्रकृत, स्वयम्भू, ब्रह्म, अयुतः

इस को भी शक्ति को दे दो


यह दीप अकेला स्नेह- भरा

है गर्व भरा मदमाता पर

इस को भी पंक्ति दे दो


यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा,

वह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा,

कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुँधुआते कड़वे तम में

यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र,

उल्लम्ब-बाहु, यह चिर-अखंड अपनापा

जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय

इस को भक्ति को दे दो


यह दीप अकेला स्नेह- भरा

है गर्व भरा मदमाता पर

इस को भी पंक्ति दे दो


जीव- जगतः ज्ञान और समृद्धि का प्रतीक उल्लू

 - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

भारतीय चील-उल्लू (Bubo bengalensis) को कुछ वर्षों पूर्व ही एक अलग प्रजाति के रूप में वर्गीकृत किया गया था और इसे युरेशियन चील- उल्लू (Bubo bubo) से अलग पहचान मिली थी। भारतीय प्रजाति सचमुच एक शानदार पक्षी है। मादा नर से थोड़ी बड़ी होती है और ढाई फीट तक लंबी हो सकती है, और उसके डैनों का फैलाव छह फीट तक हो सकता है। इनके विशिष्ट कान सिर पर सींग की तरह उभरे हुए दिखाई देते हैं। इस बनावट के पीछे एक तर्क यह दिया जाता है कि ये इन्हें डरावना रूप देने के लिए विकसित हुए हैं ताकि शिकारी दूर रहें। यदि यह सही है, तो ये सींग वास्तव में अपना काम करते हैं और डरावना आभास देते हैं।

निशाचर होने के कारण इस पक्षी के बारे में बहुत कम मालूमात हैं। इनके विस्तृत फैलाव (संपूर्ण भारतीय प्रायद्वीप) से लगता है कि इनकी आबादी काफी स्थिर है; लेकिन पक्के तौर पर कहा नहीं जा सकता क्योंकि ये बहुत आम पक्षी नहीं हैं। इनकी कुल संख्या की कभी गणना नहीं की गई है। हमारे देश में वन क्षेत्र में कमी होते जाने से आज कई पक्षी प्रजातियों की संख्या कम हो रही है। लेकिन भारतीय चील-उल्लू वनों पर निर्भर नहीं है। उनका सामान्य भोजन, जैसे चूहे, बैंडिकूट और यहाँ तक कि चमगादड़ और कबूतर तो झाड़-झंखाड़ और खेतों में आसानी से मिल जाते हैं। आसपास की चट्टानी जगहें इनके घोंसले बनाने के लिए आदर्श स्थान हैं।

मिथक, अंधविश्वास

मानव बस्तियों के पास ये आम के पेड़ पर रहना पसंद करते हैं। ग्रामीण भारत में, इस पक्षी और इसकी तेज़ आवाज़ को लेकर कई अंधविश्वास हैं। इनका आना या इनकी आवाज़ अपशकुन मानी जाती है। प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सालिम अली ने लोककथाओं का दस्तावेज़ीकरण किया है जो यह कहती हैं कि चील- उल्लू को पकड़कर उसे पिंजरे में कैद कर भूखा रखा जाए, तो यह मनुष्य की आवाज़ में बोलता है और लोगों का भविष्य बताता है।

उल्लू द्वारा भविष्यवाणी करने सम्बंधी ऐसे ही मिथक यूनानी से लेकर एज़्टेक तक कई संस्कृतियों में व्याप्त हैं। कहीं माना जाता है कि वे भविष्यवाणी कर सकते हैं कि युद्ध में कौन जीतेगा, तो कहीं माना जाता है कि आने वाले खतरों की चेतावनी दे सकते हैं। लेकिन हम उन्हें ज्ञान से भी जोड़ते हैं। देवी लक्ष्मी का वाहन उल्लू (उलूक) ज्ञान और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

भारतीय चील- उल्लू से जुड़े नकारात्मक अंधविश्वास हमें इनके घोंसले वाली जगहों पर इनकी उग्र सुरक्षात्मक रणनीति पर विचार करने को मजबूर करते हैं। इनके घोंसले चट्टान पर खरोंचकर बनाए गोल कटोरेनुमा संरचना से अधिक कुछ नहीं होते, जिसमें ये चार तक अंडे देते हैं। इनके खुले घोंसले किसी नेवले या इंसान की आसान पहुँच में होते हैं। यदि कोई इनके घोंसले की ओर कूच करता है, तो ये उल्लू खूब शोर मचाकर उपद्रवी व्यवहार करते हैं, और घुसपैठिये के सिर पर पीछे की ओर से अपने पंजे से झपट्टा मारकर वार करते हैं।

खेती में लाभकारी

इन उल्लुओं की मौजूदगी से किसानों को निश्चित ही लाभ होता है। एला फाउंडेशन और भारतीय प्राणि वैज्ञानिक सर्वेक्षण द्वारा किए गए शोध से पता चलता है कि झाड़- झंखाड़ के पास घोंसले बनाने वाले भारतीय चील-उल्लुओं की तुलना में खेतों के पास घोंसले बनाने वाले भारतीय चील-उल्लू संख्या में अधिक और स्वस्थ होते हैं। ज़ाहिर है, उन्हें चूहे वगैरह कृंतक जीव बड़ी संख्या में मिलते होंगे। और उल्लुओं के होने से किसानों को भी राहत मिलती होगी।

इन उल्लुओं का भविष्य क्या है? भारत में पक्षियों के प्रति रुचि बढ़ती दिख रही है। पक्षी निरीक्षण (बर्ड वॉचिंग),  जिसे एक शौक कहा जाता है, अधिकाधिक उत्साही लोगों को लुभा रहा है। ये लोग पक्षियों की गणना, सर्वेक्षण और प्रवासन क्षेत्रों का डैटा जुटाने में योगदान दे रहे हैं। लेकिन यह काम अधिकतर दिन के उजाले में किया जाता है जिसमें उल्लुओं के दर्शन प्राय: कम होते हैं। उम्मीद है कि भारतीय चील-उल्लू जैसे निशाचर पक्षियों के भी दिन (रात) फिरेंगे। 

पर्व- संस्कृतिः लक्ष्मी की सवारी

 धन, वैभव, सुख और शांति प्राप्त करने के लिए लोग माँ लक्ष्मी एवं गणेशजी की पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यता है
कि जिस किसी व्यक्ति के ऊपर माँ लक्ष्मी की कृपा होती है तो उसके जीवन में धन-समृद्धि संपदा और वैभव की कभी कमी नहीं होती। सनातन धर्म में जिस प्रकार सभी देवी-देवताओं का वाहन कोई न कोई पशु-पक्षी होता है। उसी प्रकार माँ लक्ष्मी ने अपने वाहन के रूप में उल्लू पक्षी को चुना। आइए जानते हैं माँ लक्ष्मी द्वारा अपना वाहन उल्लू को चुनने के पीछे की पौराणिक कथा।

कैसे उल्लू बना माँ लक्ष्मी की सवारी

उल्लू क्रियाशील प्रवृत्ति का पक्षी है। वह अपना पेट भरने के लिए भोजन की तलाश में निरंतर कार्य करता रहता है। इस कार्य को वह पूरी लगन के साथ करता है। लक्ष्मी के वाहन उल्लू से यही सीखने को मिलता है कि जो व्यक्ति दिन-रात मेहनत करता है। माँ लक्ष्मी की सदैव उन पर कृपा होती है जो स्थाई रूप से मेहनती लोगों के घर में निवास करती हैं।

कथा के अनुसार प्रकृति और पशु-पक्षियों के निर्माण के बाद जब सभी देवी- देवता अपने वाहनों का चुनाव कर रहे थे, तब  माता लक्ष्मी भी अपना वाहन चुनने के लिए धरती पर आई। तभी सभी पशु पक्षियों ने माँ लक्ष्मी के सामने प्रस्तुत होकर खुद को अपना वाहन चुनने का आग्रह किया। तब लक्ष्मी जी ने सभी पशु पक्षियों से कहा कि मैं कार्तिक मास की अमावस्या को धरती पर विचरण करती हूं, उस समय जो भी पशु-पक्षी उन तक सबसे पहले पहुंचेगा, मैं उसे अपना वाहन बना लूंगी। अमावस्या की रात अत्यंत काली होती है इसलिए इस रात को सभी पशु पक्षियों को दिखाई कम का पड़ता है। कार्तिक मास के अमावस्या की रात को जब माँ लक्ष्मी धरती पर आई तब उल्लू ने सबसे पहले माँ लक्ष्मी को देख लिया और वह सभी पशु पक्षियों से पहले माता लक्ष्मी के पास पहुंच गया क्योंकि उल्लू को रात में भी दिखाई देता है। उल्लू के इन गुणों से प्रसन्न हो कर माता लक्ष्मी ने उसे अपनी सवारी के रूप में चुन लिया। तब से माता लक्ष्मी को उलूक वाहिनी भी कहा जाता है।

उल्लू का पौराणिक महत्त्व

माता लक्ष्मी की सवारी उल्लू को भारतीय संस्कृति में शुभता और धन सम्पत्ति का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, उल्लू सबसे बुद्धिमान निशाचारी प्राणी होता है। उल्लू को भूत और भविष्य का ज्ञान पहले से ही हो जाता है। दीपावली की रात में उल्लू को देखना लक्ष्मी के आगमन की सूचना माना जाता है।

परसाई जन्म शताब्दी वर्ष परः पूछिए परसाई से ...

  - विनोद साव

लेखक बनने से पहले जिज्ञासाएँ तो कई होती थीं; पर समाधान करने वाले सुयोज्ञजन कहाँ मिलते। ऐसे में घर में आने वाले दैनिक अख़बार देशबन्धु ने मेरे जैसे अनेक जिज्ञासुओं की जिज्ञासा को शांत किया। इसके अख़बार के अवकाश अंक में हर रविवार को ‘पूछिए परसाई से’ स्तम्भ छपा करता था। यह स्तम्भ 1983 से 1994 के बीच ग्यारह वर्षों तक छपा। जिसमें दुनिया जहान से पूछे गए सामान्य प्रश्नों के रोचक उत्तर देते थे हरिशंकर परसाई। वे अपनी विदग्ध शैली में अपने वैश्विक ज्ञान का भंडार खोल देते थे। जिसमें परसाई प्रश्न कर्ताओं को विश्व गुरु लगा करते थे। विडम्बना यह है कि हम परसाई की के व्यंग्य-संग्रहों और विचारधाराओं पर तो बातें कर लेते हैं; पर यह स्तम्भ जो परसाई की लेखकीय प्रगल्भता का सबसे बड़ा प्रमाण था, जिसमें वे लोकशिक्षण और जनमत निर्माण कर रहे थे, इस पर साहित्यकारों के बीच कभी कोई वैचारिक चर्चा नहीं होती।।। एक बार मैंने कोशिश की थी एक वर्ष परसाई जयंती में ‘पूछिए परसाई से’ स्तम्भ पर ही अपने वक्तव्य को केन्द्रित किया था। देशबन्धु का यह स्तम्भ राजकमल प्रकाशन से छपकर आया तो ‘पूछो परसाई से’ हो गया। खैर... राजकमल प्रकाशन से छपी परसाई की यह दुर्लभ कृति जब मेरे हाथों आई तो पाया कि अपनी युवावस्था में पूछे गए मेरे चार प्रश्न भी इसमें समाहित हैं।। वही आज मैं आप लोगों के सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। सवाल मेरे और जवाब परसाई के।

प्रश्न-१ (13 नवम्बर 1983) क्या आप एलेक्सेंडर सोल्जेनेत्सिन के बारे में बता सकते हैं?

उत्तर : एलेक्सेंडर सोल्जेनित्सिन रुसी लेखक हैं? उनका सबसे प्रसिद्ध उपन्यास ‘कैंसर वार्ड’  है उनकी रूस में कई मुद्दों को लेकर आलोचना होती थी। उन पर मुख्य आरोप यह था कि वे साम्यवादी व्यवस्था के विरोधी हैं। वे रूस के विरुद्ध दुष्प्रचार करते हैं। वे चोरी से अपनी पाण्डुलिपियाँ पूंजीवादी देशों में भेजकर छपाते हैं। वे पूँजीवाद के समर्थक हैं और सी.आई.ए. के दलाल हो गए हैं। फिर भी रूस से उन्हें निकाला नहीं गया। उन्हें कोई सजा भी नहीं दी गई। पर वे खुद रूस छोड़ गए। पहले वे ब्रिटेन पहुँचे। वहाँ से अमेरिका चले गए और वहीं बस गए। अमेरिका ने कुछ समय तक उनका उपयोग रूस विरोधी प्रचार के लिए किया; पर रूस छोड़ने के बाद उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण लिखा नहीं। अब उनके बारे में कुछ सुनाई नहीं देता। बोरिस पास्तरनेक के बाद सोल्जेनित्सिन दूसरे महत्त्वपूर्ण लेखक हैं, जिन्हें लेकर दुनिया के साहित्य संसार में रूस में लेखक की स्वाधीनता पर विवाद खड़ा हुआ। पास्तरनेक के उपन्यास ‘डॉक्टर जिवागो’ पर नोबेल पुरस्कार दिया गया था।  

प्रश्न-२ : (13 मई 1984 का प्रश्न) दार्शनिक प्लेटो के लिए ‘अफलातून’ शब्द क्यों लगाया जाता है?

उत्तर : प्लेटो को ‘अफलातून’ अरबों ने कहा था। अब हमारी भाषा में प्लेटो का यह नाम, विशेषण बन गया है। कहते हैं ‘अमुक आदमी बड़ा अफलातून बनता है’

प्रश्न-३ : (8  जुलाई 1984) खुशवंत सिंह द्वारा पद्मभूषण लौटाना देशद्रोह है या उनका सठिया जाना?

उत्तर : खुशवंत सिंह द्वारा पद्मभूषण लौटाना देशद्रोह नहीं है। स्वर्णमंदिर में सैन्य कार्यवाही का विरोध करना भी देशद्रोह नहीं। खुशवंत सिंह काफी जिम्मेदार पत्रकार नहीं हैं। उनके कालमों में फूहड़ और गंदे लतीफे बहुत होते हैं। वे अवसरवादी हैं। वे लगातार अकाली आन्दोलन और उग्रवादियों के खिलाफ लिखते रहे हैं। उन्होंने यह भी लिखा था कि मेरा नाम आतंकवादियों की हिट लिस्ट में है। वे सरकार से सख्ती की बार - बार अपील करते थे; मगर जब सरकार ने सख्ती की तब वे उसके विरोधी हो गए।

खुशवंत सिंह की कोई स्पष्ट विचारधारा नहीं है। वे अंधे साम्यवाद विरोधी और रूस-विरोधी हैं। दूसरे वे अवसरवादी हैं। वे 1975 से इंदिराजी के चमचे कहलाते रहे हैं। वे खुद गर्व से लिखते थे - “मैं इन्दिरा गाँधी का चमचा हूँ।” इसी चमचागिरी का इनाम ‘पद्मभूषण’ और राज्यसभा की सदस्यता है। पर अब इंदिराजी के दरबार में उनका अवमूल्यन हो गया। सुना है वे मेनका  के साथ हैं। पद्मभूषण लौटाना कोई बड़ा त्याग नहीं है, विरोध का प्रतीक है। दूसरे वे आतंकवादियों से डर गए। भिण्डरावाला के मरने से आतंकवाद ख़त्म नहीं हुआ है, अभी है। खुशवंत सिंह ने जान बचाने का यह तरीका अपनाया पर वे राज्यसभा की सीट से चिपके हैं।

प्रश्न-४: (11फ़रवरी 1990) विवेकानंद के विचारों से स्कूल-कॉलेज के छात्रों को अधिक प्रभावित होते देखा, प्रौढ़ और वृद्ध व्यक्तियों को नहीं। विवेकानंद की मृत्यु मात्र ३८ वर्ष की उम्र में हुई। क्या उनके विचारों की तरुणाई से ही युवा वर्ग सम्मोहित होता रहा है?

उत्तर : महान प्रतिभाओं और महान कार्य करने वालों के लिए उम्र का सवाल नहीं है। ईसा ३२ साल में मरे और शंकराचार्य की मृत्यु भी ३२ साल में हुई। ब्रिटेन में विलियम पिट 24 साल की उम्र में प्रधानमंत्री हो गया था। विवेकानंद हिन्दू पुनरुत्थानवादी और पुरातनवादी नहीं थे, जैसा कि कुछ लोग उन्हें बताते हैं। वे भारतीय नवजागरण के नेता थे और क्रान्तिकारी चेतना संपन्न। समतावादी समाज की कल्पना करते थे। उन्होंने जो लिखा है और कहा है, इससे मालूम होता है वे शोषण की व्यवस्था के कट्टर विरोधी थे। उनके कई कथन तो किसी बड़े मार्क्सवादी क्रान्तिकारी के कथन की तरह हैं।

प्रश्न-5 (10 नवम्बर 1991) शरद जोशी ने अपने व्यंग्य लेखन को व्यंग्य की दौड़-धूप बताया है, कृपया स्पष्ट करें।

उत्तर:  मैं नहीं जानता कि शरद ने किस अभिप्राय से कहा। शायद इस कारण कि वह बहुत लिखते थे. वह रोज नवभारत टाइम्स में लिखते थे. एक से अधिक टीवी सीरियल के स्क्रिप्ट लिखने थे। यह एक तरह की दौड़- धूप ही थी। शरद बहुत ही प्रतिभावान लेखक थे।"

सम्पर्कः मुक्तनगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़- 491001, email- vinod.sao1955@gmail.com, मो. 9009884014


कविताः जले ज्योति

  - रमेश गौतम

जले ज्योति ऐसी यहाँ, दमक उठे आकाश ।

वैभवपतियों तक रहे, सीमित नहीं प्रकाश ।।

 

सच है केवल रोशनी, किस्से दर्ज हजार ।

एक किरण से हारता, तम का कारागार ।।

 

एक-एक दीपक जले, फैले जग उजियार।

बढ़े रात-दिन चौगुना, दीपक का परिवार।।

 

उतनी कठिन उपासना, जितनी काली रात।

दीपक के संघर्ष में, लाख टके की बात ।।

 

बरी हुआ तम खेलकर, दुराचार का खेल।

मिली रोशनी को यहाँ, जीवन भर की जेल ।।

 

अँधियारा चाकू लिये, करता बन्द जुबान ।

फिर चोरों की भीड़ में, दीपक लहूलुहान ।।


बोएँ मन के खेत में, उजियारे के बीज।

शरत् पूर्णिमा-सी लगे, हर तन की दहलीज । ।


 जले नए संदर्भ में, अब मावस के दीप।

हर द्वारे पर रोशनी, आकर धरें महीप।।


नई रोशनी की बने, फिर ऊँची मीनार ।

इठलाए दीपावली, पहन नौलखा हार ।।

 

अँधियारे के राज में, सपने होते राख।

दीपक तेरे हाथ में, उजियारे की साख ।।

 

वंचित रहे न तनिक भी, श्रमजीवी की प्यास।

बस थोड़ी सी रोशनी, कच्चे घर की आस ।।


व्यंग्यः कबीरा, काहे खड़ा बाजार !

  - प्रेम जनमेजय

बाहर से आवाजें आ रही थीं- भिंडी ले लो, कद्दू ले लो और मेरे फोन पर आवाजें आ रही थीं- क्रेडिट कार्ड बनवा लो, लोन ले लो। चुनावकाल में भी तो तरह -तरह के फेरीवाले आवाजें लगाते हैं। फेरीवालों का तो दंगल चलता है। (दंगा शब्द क्या दंगल से बना है?) । मैं झल्लाया हुआ था जैसे आजकल आमजन समाचार चैनलों की काँव- काँव से झल्लाता है। संपादक मित्र का फोन आ गया और मेरा चैनल बदल गया। मित्र के फोन ने ऐसा सकून दिया जैसे कौन बनेगा प्रधानमंत्री की कालरात्रि समाप्त हो गई हो। 

संपादक ने फोन पर कहा- कबीरा खड़ा बाजार में।

मैंने पूछा- क्यों खड़ा ?

-तुम बताओ, तुम तो लेखक हो। मैं तो संपादक हूँ और मुझे इस विषय पर अंक निकालना है ।

- इस विषय पर अंक क्यों निकालना है, कुछ तो सोचा होगा?

- बहुत कुछ सोचा है ।

- तो बताएँ कि क्या सोचा है?

- वो सब मैं अपने संपादकीय में लिखूँगा, तुम तो व्यंग्य लिख दो, जल्दी।

      हर संपादक जल्दी में ही होता है। पठानी संपादक की जल्दी के समक्ष लेखक विवश होता है। प्रकाशक भी पठानी हो सकता है। प्रकाशक पठानी ही होता है। प्रकाशक भी जल्दी नामक हथियार का प्रयोग करता है। पर संपादक की जल्दी और प्रकाशक की जल्दी में अंतर होता है। प्रकाशक से लेखक, डरते-डरते पूछता है कि किताब कब तक छापेंगे ? प्रकाशक का उत्तर होता है कि बस जल्दी। और ये जल्दी दो वर्ष तक नहीं आती है। लेखक में साहस नहीं होता कि वह प्रकाशक को उसकी जल्दी याद दिलाए। पर संपादक की जल्दी हफ्ते दो हफ़्ते वाली होती है। संपादक जल्दी की तलवार लटका सकता है और तलवार का सम्मान तो सबको करना पड़ता है। 

कबीर सुखी थे कि उनके समय में प्रकाशक और संपादक नहीं थे। शायद इसलिए कबीर ‘आँखन देखी कह लेते थे। शायद इसलिए कबीर को लताड़ने के लिए ये नहीं देखना पड़ता था कि जिसे वो लताड़ रहे है< वो किस धर्म-जाति का है। कबीर को कोई चुनाव थोड़े ही लड़ना होता था। कबीर को बल्क में अपनी पुस्तक भी नहीं बिकवानी होती थी। 

पर यदि संपादक आपका मित्र हो तो... मित्र संपादक, पठानी संपादक से भी अधिक खतरनाक होता है। वो मित्रता की दोधारी आत्मीय तलवार का सदुपयोग करता है। वो सांप  भी मर जाए और लाठी भी न टूटे वाले हथियार का प्रयोग करता है। 

अतः मैंने संपादक से कहा - जो आज्ञा मित्र संपादक!

पर मन में उठे प्रश्न आज्ञा नही दे रहे थे और शत्रुवत् मेरे हृदय को मथ रहे थे। 

        संपादक को इस विषय पर अंक निकालने की जल्दी क्या है?  कहीं ऐसा तो नहीं कि इसका संबंध आने वाले आम चुनाव से हो। चुनाव आते हैं तो हर धर्म के ईश्वर याद आते हैं।  पहले गांधी जैसे महापुरुष याद आते थे। आजकल धार्मिक महापुरुष याद आते हैं। हर धर्म के धर्मात्मा याद आते हैं। कबीर भी याद आते हैं। कबीर का ‘न काहू से दोस्ती न काहू से बैर’ याद आता है। याद आते ही चुनाव की मैराथन दौड़ने वाले, चुनावकाल के लिए, कबीर का चुनाव करते हैं। चुनावकाल में वे  ‘न काहू से दोस्ती और न काहू से बैर’ वाला भजन गाते हैं। और सरे आम, गले पड़ने जैसा गले मिलते हैं। होली पर पड़ोसी भी तो गले मिलता है और होली के अगले ही दिन गला भी पकड़ लेता है।  

     पर कबीर ऐसे नहीं थे। वो किसी भी युग में आएँ, चुनाव तो कम से कम नहीं लड़ेंगे। हाँ चुनाव लड़ने वाले का पर्दाफाश जरूर कर सकते हैं। कबीर के अनुयायी तो चुनाव के लिए बाजार में खड़े हो सकते हैं पर कबीर चुनाव के लिए बाजार में खड़े नहीं हो सकते हैं।

 संपादक का कहना है कि कबीरा बाजार में खड़ा है और मेरा सोचना है कि क्यों  खड़ा है?

     मैं फिर सोचने लगा; क्योंकि मैं केवल सोच ही सकता हूँ। लेखक जो हूँ। कबीर के समय में तो ये प्रश्न उचित था कि कबीर बाजार में खड़े क्या कर रहे हैं। कबीर  के समय में तो लोग, बाजार में बस सौदा लेने जाते थे। वो बाजार में खड़े नहीं होते थे। उन दिनों बाजार खरीदने के लिए होता था, खड़े होने के लिए नहीं। उन दिनों लोग खड़े-खड़े बतियाते भी नहीं थे। बतियाने के लिए उनके पास चौपाल  होती थी। उन दिनों बाजार सुंदर भी नहीं होता था कि खड़े होकर भकुवे -सा उसे देखने लग जाओ। बाजार लुभाने के लिए भी नहीं होता था। बाजार सजता नहीं था। अस्त-व्यस्त बालों और वेशभूषा वाला पुरुष दूकानदार अपनी आत्मीयता से आपके जेब का पैसा खींचता था। दुकान में ए सी, पंखा तक नहीं। जरूरतें कम होती थीं; इसलिए जरूरत की हर चीज मिल जाती थी। लाइन भी नहीं लगानी पड़ती थी। खरीदने और बेचने वाला एक दूसरे को जानता था। एक दूसरे के हाल-चाल पूछने का समय होता था। 

 आज तो  बड़े-बड़े सजे-धजे  मॉल हैं। जिस शोरूम के आगे चाहें, खड़े होकर नारी के अंग- अंग की शोभा निहार सकते हैं। सवस्त्र नारी, कम वस्त्र नारी और ...।  और बाजार में सजी- धजी नव यौवनाएँ बाजार की शोभा बढ़ाती हैं। ये शोभा खरीददार को लुभाने के लिए बढ़ाई जाती है। जो नहीं भी खरीदना चाहता  वो भी खरीदार बन जाता है। दुकानें शोरूम हो गई हैं। इस शोरूम में पुरुष दुकानदार कम मिलते हैं, सजी -धजी मनमोहक मुस्कान बिखेरती नवुयवतियाँ अधिक होती हैं। इन सबका लक्ष्य बाजार को लुभावना बनाना होता है। कुछ नौजवान अधिक लुभ जाते हैं, तो दुष्कर्म हो जाता है। इस बाजार में तो आप घंटों खड़े रह सकते हैं। पर क्या इस बाजार में कबीर एक पल भी खड़े रह सकते थे? 

संपादक ने तो कबीर को बाजार में खड़ा कर दिया है। संपादक चुनौती भी दे रहा है कि हे लेखक ! बता कबीर बाजार में क्यों खड़े हैं और क्या कर रहे है ? संपादक बैताल बन कह रहा है कि तू यदि मेरे प्रश्नों के उत्तर नहीं देगा, तो तेरा सर टुकड़े - टुकड़े हो जाएगा। इधर मेरा समय मुझे डरा रहा है कि यदि तूने कबीर के बारे में कुछ कहा, तो तेरा सर टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। मुझे कुछ भी कहने का साहस नहीं हो रहा है। कबीर सार्वजनिक रूप से सवाल दाग सकते थे; पर आज क्या कबीर पर सवाल दागे जा सकते हैं? कबीर पर सार्वजनिक रूप में कुछ भी कहना सुरक्षित है क्या ? मैं कायर लेखक हूँ इसलिए कबीर पर कुछ भी कहने से डरता हूँ। कबीर पर तो कोई निर्भीक ही कुछ कह सकता है।

कबीर बाजार में सार्वजनिक रूप से खड़े हैं पर मैं सार्वजनिक कुछ नहीं कह सकता। 

मैंने कबीर पर कभी कुछ लिखा भी नहीं है। हाँ कबीर को क्लास में पढ़ा और पढ़ाया जरूर है। क्लास में कबीर क्या तुलसी सूर आदि किसी को भी पढ़ना-पढ़ाना सुरक्षित होता है। हमारे समय में पढ़ना और पढ़ाना दोनो सुरक्षित होते थे। क्लास में सवाल पूछने के खतरे कम थे। मास्टर जी अधिक से अधिक मुर्गा बनाते थे या बेंत मारते थे। उन दिनों पिटना एक सांस्कृतिक  कर्म था। स्कूल में पिटना मास्टर के मूड पर निर्भर था। मास्टर जी का मूड पीटने का है, तो पिटना ही पड़ता था। गलत सवाल करो, तो पिटो, सही करो तो भी। घर में जाकर मास्टर की शिकायत करो, तो बाप से पिटो- तूने ही कुछ किया होगा।

 पीटने की संस्कृति आज भी फल- फूल रही है। आप कमजोर हैं तो किसी भी चौराहे  पर पिट सकते हैं। चौराहे पर  पिटने की शिकायत माई -बाप  थानेदार से करेंगें तो, वहाँ पिटेंगे। वैसे आजकल तो पुलिसवाले भी सरेराह ,सरेआम पिट रहे हैं, तो  बेचारे, मास्टर की औकात क्या! केवल पिट , तो जान बची और लाखों पाते हैं। पर जब श्रीमान स्टूडेंट जी कहते हैं कि ले गोली खा, तो घीघी बँध जाती है और ‘घीघा’ जी, राम- राम जपने लगते हैं।

 मैंने जिनको कॉलेज में पढ़ाया है, वो मेरी ओर ऐसे घूरके देखा करते थे कि मास्टर हिम्मत है, तो हमें पढ़ाके  दिखा। मैंने जिनको कबीर पढ़ाया, उनको मतलब नहीं होता था कि कबीर पर क्या कह रहा हूँ। उन्हें तो मतलब होता था कि इक्जाम में कौन- सा क्वेश्चन आएगा और उन्हें कितने नंबर मिलेंगे।


बाजार को जितना नई पीढ़ी जानती है उतना संपादक या मैं नहीं जानते। इसलिए कबीर के दोहे को पढ़ाने मैं अपनी क्लास में चला गया। बच्चों पर पढ़ाई का अधिक बोझ न पड़े, इसलिए मैंने दोहे की पहली पंक्ति पढ़ी-कबीरा खड़ा बाजार में, माँगे सबकी खैर । 

मैंने पूछा- कोई बता सकता है कि कबीर कहाँ खड़ा है और क्या माँग रहा है। बहुत ईजी है। इसी दोहे में मीनिंग छुपा हुआ है।’ क्लास में साँप नहीं था पर सबको सूँघ गया।

 मैंने छात्रा से पूछा- यू टेल मी कबीर बाजार में क्यों खड़ा है?

 -हाऊ कुड आई नो? आई एम नॉट कबीरा। आई एम सायना। और ये रेलेवेन्ट क्वेश्चन नहीं है। 500 ईयर बिफोर कबीरा मार्केट में क्यों खड़ा था ? रिडिकल्यूस... दिस इज आउट ऑफ कोर्स हैं। किसी हेल्प बुक में नहीं मिलता है। हा हा, व्हाई कबीरा स्टैंडिंग इन बाजार। वाज देयर बिग बाजार ....

इस बार क्लास ने हा हा किया।

मैंने क्लास के ब्रिलियंट लड़के से पूछा - यू... तुम बताओ।

- यस सर! यू नो ...कबीर इज थोड़ा कन्फयूजड । वो मार्केट में स्टैंड है। या तो गर्ल फ्रेंड  का वेट कर रहा है... या एनी टाइप ऑफ सेल का...। वो सेलर नहीं है, बॉयर है, माँग रहा है। मार्केट में सेल लगा है... एण्ड ... एण्ड उसके पास   कार्ड नहीं है... वो सबसे खैर... खैर... खैरात, खैरात  माँग रहा है। एण्ड सर उसको खैरात नहीं मिलता, तो वो कबीरा हो जाता है। आपने ‘हेरा फेरी’ मूवी देखा होगा। क्या धाँसू आवाज में बोलता है- हैलो, कबीरा स्पीकिंग।’’ एण्ड  उसका  डॉयलाग- तेरी पोती के छोटे-छोटे टुकड़े करके कुत्तों को डाल दूँगा।’ क्लास के लड़के -लड़कियाँ इस डॉयलाग डिलिवरी पर ताली बजाते हैं ।

अब आप समझ गए होंगे कि हिंदी पढ़ाने के लिए अंग्रेजी  आनी क्यों आवश्यक है। कबीर के बारे में नौजवान पीढ़ी के अद्भुत ज्ञान को समझने के लिए अंग्रेजी का ज्ञान कितना आवश्यक है। 

नौजवान पीढ़ी बाजार में खड़ी नहीं होती है। इसके पास इतना समय ही नहीं है। वो तो सीधा लक्ष्य साधती है। नेट पर सर्च किया, शोरूम में घुसे, बाप के क्रेडिट कार्ड से खरीदा, कैब पकड़ी और डेट पर निकल गए। 

              कबीर के समय बाजार खुले में लगता था; पर खुला बाजार नहीं था। आज खुला बाजार है पर वो चारदीवारी में बंद, एयरकंडिशंड  मॉल में लगता है। 

तो हे सम्पादक ! कबीर को बाजार में मत खड़ा करें। कबीरों को नाहक परेशान मत करें। ये बाजार कबीर जैसों के लिए नहीं बना है। बाजार जो चाहता है वो ले लेता है। वो मँगता नहीं है; इसलिए माँगता नहीं है। मँगते तो आप हैं। बाजार सबकी खैर भी नहीं माँगता है, केवल अपनी खैर चाहता है। इस बाजार में यदि कबीर अधिक देर रहे तो उनकी खैर नही, हे संपादक!

सम्पर्कः -73 साक्षर अपार्टमेंट्स , ए-3 पश्चिम विहार नई दिल्ली- 110063 मोबाइल-98111-54440

कहानीः घर का रास्ता

 - सुदर्शन रत्नाकर

  देर तक वह दोनों के साथ बैठा रहा। साथ देने के लिए उसने गिलास हाथ में रखा; लेकिन अधिक पी नहीं; अपितु दोनों को पीने के लिए उकसाता रहा; ताकि वे होश में न रहें। आज वह अकेला ही अपने मिशन पर जाना चाहता था। उनके साथ रहने से उन्हें हिस्सा तो देना ही पड़ता है, जबकि आज उसे कोई बँटवारा नहीं चाहिए । उसे स्मिता को उपहार देना है। यह बात वह उन्हें नहीं कह सकता था; क्योंकि हर बार वे तीनों एक साथ जाते हैं। इससे कोई ख़तरा नहीं रहता। पर आज वह यह ख़तरा उठाना चाहता था। यह उसकी ज़रूरत थी। जब वे दोनों पूरी तरह से निढाल हो गए, उन्हें उसी अवस्था में छोड़कर वह बाहर निकल आया। थोड़ी देर पहले जो गहमागहमी थी, वह कम हो गई थी। रात के बारह कब के बज चुके थे। इक्का-दुक्का पटाखा चलने की आवाज़ आ रही थी। कहीं-कहीं बिजली के बल्बों की लड़ियाँ जगमगा रही थीं। मोमबत्तियाँ बुझ गई थीं दीये बुझने की कगार पर थे। थके -माँदे लोग सो गए थे। पहली नींद गहरी होती है। किसी भी घर में सेंध लगाने का अवसर अच्छा था। वह देर तक एक गली से दूसरी गली में घूमता रहा। उन दोनों के साथ रहने से उसे परेशानी नहीं होती । वे लोग योजना बनाकर निकलते है; लेकिन आज वह मौक़ा देखकर किसी भी घर में चला जाएगा। कई लोग लक्ष्मी के आगमन के लिए घर का दरवाजा खुला रखते हैं। इस गली में सभी लोग पैसे वाले है, यह उसे मालूम है। उसे अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। गली के नुक्कड़ वाले मकान की बाहर की बत्तियाँ बुझी हुई थीं। अन्दर केवल एक ही कमरे में मध्यम-सा प्रकाश था। दीवार फाँदकर वह आँगन में आ गया। सामने का दरवाज़ा खुला हुआ था। वह दबे पाँव भीतर चला गया। दो कमरे साथ-साथ थे। वहाँ उसे कोई भी दिखाई नहीं दिया। टार्च की रोशनी में वह इधर-उधर देखने लगा। टेबल पर  कुछ सामान और पर्स रखा था। उसने टटोल कर देखा, उसमें कुछ ही रुपये थे और साथ में चाबियाँ भी। उसने अलमारी में लगाकर देखी। बिना आवाज़ के वह खुल गई। उसमें रखे आभूषण उसने जेब में रखे। अलमारी बंदकर वह बाहर निकल कर जाने ही वाला था कि उसे किसी के कराहने की आवाज़ सुनाई दी। वह कुछ क्षण रुका; लेकिन फिर जाने लगा। दरवाज़े तक पहुँचकर वह ठिठक गया। कराहने की आवाज़ तेज़ हो गई थी। उस आवाज़ में एक अजीब-सा दर्द था। वह बाहर नहीं जा सका; अपितु उस कमरे की ओर उसके कदम बढ़ गए, जहाँ से आवाज़ आ रही थी। दरवाजा थोड़ा खुला था। उसने झाँक कर देखा। चारपाई पर एक क्षीणकाय आकृति दिखाई दी। कराहने की आवाज़ वहीं से आ रही थी। धीरे से पूरा दरवाजा खोलकर दबे पाँव वह अंदर चला गया। कराहने की आवाज़ अब धीमी पड़ गई थी। जब तक वह चारपाई के पास पहुँचा, आवाज़ लगभग बंद हो गई थी। वृद्धा एकदम निढाल-सी पड़ी थी। उसे चिंता हुई । टटोलकर  उसने नाड़ी देखी, बहुत धीरे चल रही थी। माथे को छूकर देखा, तो लगा उसका अपना हाथ ही क्षण भर में गर्म हो गया है। उसे समझने में देर नहीं लगी कि वृद्धा ज्वर में बेहोश पड़ी है। घर में शायद कोई और नहीं है; लेकिन वह क्या करे! एक बार सोचा इतनी आसानी से उसे इतना माल मिल गया है, वह उसे खोना नहीं चाहता था। उसे निकल जाना चाहिए। अपने साथियों को भी वह साथ नहीं लाया था, ताकि वह अकेला चोरी का माल ले जा सके। यदि वह रुका और घर में कोई आ गया, तो वह पकड़ा जाएगा। उसके भीतर अन्तर्द्वन्द्व चल रहा था। एक बार वह जाने के लिए पलटा; लेकिन फिर न जाने क्या सोच कर वह चारपाई के पास आ गया। वृद्धा उसी तरह निश्चेष्ट पड़ी थी। उसके चेहरे पर अजीब से भाव थे। ऐसा लग रहा था जैसे वह बेहोशी में भी कुछ कहना चाह रही है। उससे अब अधिक देखा नहीं गया। अपने साथियों में सबसे अधिक कठोर, निष्ठुर माना जाता है वैसे भी उसका धंधा ही ऐसा है जिसमें संवेदना का कोई स्थान नहीं; लेकिन इस समय वह भावुक हो रहा था।

   चारपाई के पास ही एक तिपाई पर कुछ दवाइयाँ और थर्मामीटर रखे थे। उसने छटककर थर्मामीटर वृद्धा की बग़ल में लगा दिया। ज्वर एक सौ चार डिग्री से भी कुछ अधिक था। उसे ध्यान आया, इतना बुख़ार होने पर ठंडे पानी की पट्टियाँ माथे पर रखने से बुख़ार कम हो जाता है। उसने इधर-उधर झाँककर देखा। किचन दूसरे कमरे के साथ थी। वह जल्दी से पानी ले आया। उसे आस-पास कोई कपड़ा दिखाई नहीं दिया। तो उसने अपनी पैंट की जेब में रखा रुमाल निकाला और उसकी तह लगाकर पानी में भिगोकर निचोड़ा और वृद्धा के माथे पर रख दिया। थोड़ी-थोड़ी देर बाद वह इस क्रिया को दोहराता रहा। साथ-साथ नब्ज भी देखता रहा जो उसी गति से चल रही थी। बुख़ार में भी विशेष अंतर नहीं आ रहा था। इस समय वह जिस परिस्थिति में था वह डॉक्टर के पास भी नहीं जा सकता था।

   उसने माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ बंद कर दीं। वृद्धा की नब्ज़ हाथ में लिये वह बैठा रहा। रात के दो बज चुके थे। बाहर एकदम गहरा सन्नाटा था। सभी लोग शायद थककर गहरी नींद में सो चुके थे। उसने सोचा वह चोरी  किया सामान उठाए और चला जाए। अभी भी निकल भागने का समय है। यही सोचकर वृद्धा की बाजू छोड़कर वह जाने लगा। वह अभी दरवाज़े तक ही पहुँचा था कि उसे फिर कराहने की आवाज़ सुनाई दी, साथ ही लगा कि वृद्धा कुछ कह रही है। वह फिर लौट आया। झुककर उसने वृद्धा की आवाज़ सुनने की कोशिश की। अस्फुट शब्द उसके कानों में पड़े। बे...टा, साथ ही उसने आँखें खोलने की कोशिश की। शायद वह होश में आ रही थी। उसने तिपाई पर रखी दवाई की ओर इशारा किया। दवा की मात्रा लिखी हुई थी। उसने गोलियाँ निकालीं । पास ही गिलास में ढका हुआ पानी रखा था; लेकिन वह गोलियों खिलाए कैसे! वह तो अभी निढाल पड़ी थी। उसने पानी एक ओर रख दिया और स्वयं चारपाई पर ऐसे बैठ गया, जिससे वह वृद्धा के सिर को आसानी से उठाकर अपनी गोद में रख सके। उसकी बेहोशी कुछ टूट रही थी, उसने आराम से दवा ले ली। सिर अभी भी उसकी गोद में था। थोड़ी देर वह शांत भाव से पड़ी रही, दवाई ने शायद असर करना शुरु कर दिया था। वृद्धा के शरीर में थोड़ी-थोड़ी हरकत होनी शुरु हो गई थी। उसने धीमी आवाज़ में पूछा, “बेटा कब आए, आने में देर क्यों हो गई । बहू और बच्चे भी आए हैं न, कहाँ हैं सब?”

बोलते -बोलते उसकी साँस फूल गई।

 उसे समझने में देर नहीं लगी कि दीवाली के दिन उसे अपने बेटे-बहू और बच्चों के आने की प्रतीक्षा थी, जो नहीं आए और बेहोशी की स्थिति में भी उनकी प्रतीक्षा है। उसने कोई उत्तर नहीं दिया। वृद्धा फिर अस्फुट शब्दों में बोली,  “बोलते क्यों नहीं बेटे, बहू नहीं आई शायद। बच्चे भी नहीं आए। आज की रात तुम अकेला क्यों छोड़ आए उन्हें। बहू  नहीं आना चाहती होगी, आ जाती तो, मैं बच्चों को भी देख लेती।”  बात करते-करते वह लगभग हाँफने लगी थी। आँखें तरल हो गईं। उसने धीमी आवाज़ में इतना ही कहा, “सभी आए हैं माँ, दूसरे कमरे में सो रहे हैं। तुम भी सो जाओ, सुबह मिल लेना।”

 वृद्धा को जैसे विश्वास हो गया। उसने आँखें बंद कर लीं। चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे। दवा का असर भी हो चुका था। बुख़ार कम हो रहा था। थोड़ी देर में ही वह निश्चिंत होकर सो गई। चेहरा एकदम शांत था जैसे उसकी सारी चिंता मिट गई हो।

उसने धीरे से सिर गोद से उठाकर सिरहाने पर टिका दिया। उसका सारा शरीर अकड़ गया था। एक लम्बी अँगड़ाई लेकर उसने घड़ी की ओर देखा। सुबह के चार बज गए थे। लगभग सारी रात उसने यहीं बिता दी थी। उसने सोई हुई वृद्धा को देखा। उसे लगा उसकी अपनी माँ सो रही है। वह भी तो बेचारी अकेली उसकी प्रतीक्षा करती रहती होगी। वह कई -कई दिन घर नहीं जाता। माँ को तो यह भी पता नहीं होता कि वह है कहाँ! वह भी तो बीमार होती होगी ऐसी ही दशा में...। दीवाली की रात उसने भी तो प्रतीक्षा की होगी। सारी रात जगी होगी वह और फिर थककर सो गई होगी। यह सोचकर वह अंदर से पहली बार काँप उठा। कुछ था जो उसे झकझोर गया।

 उसने वृद्धा के चेहरे से दृष्टि हटा ली। दूसरे कमरे में  चीजों पर उचकती नज़र डाली अलमारी से निकाला सामान वापिस रखकर कमरे के खुले दरवाज़े को बंद कर  मेन गेट खोलकर वह बाहर निकल आया। बाहर अभी भी अँधेरा था। भोर होने में देर थी; लेकिन उससे होने वाला उजास उसके मन में पहले ही भर गया था। जिसकी लौ में उसे अपने घर का रास्ता साफ़ दिखाई दे रहा था।

सम्पर्कः  ई-29, नेहरू ग्राउंड फ़रीदाबाद- 121001, मोबाइल-9811251135


मनोविज्ञानः क्या भलाई का ज़माना नहीं रहा?

 यह काफी सुनने में आता है कि अब लोग पहले जैसे भले नहीं रहे, ज़माना खराब हो गया है, भलाई का ज़माना नहीं रहा, लोग विश्वास के काबिल नहीं रहे वगैरह-वगैरह। तो क्या वाकई ये बातें सच हैं? अपने अध्ययन में कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञानी एडम मेस्ट्रोइनी और उनके दल ने इसी सवाल के जवाब की तलाश की है।

उन्होंने दशकों के दौरान किए गए विभिन्न सर्वेक्षणों के नतीजों और विभिन्न अध्ययनों के डैटा का विश्लेषण किया और पाया कि पिछले सत्तर सालों में पूरी दुनिया के लोगों ने नैतिकता के पतन की बात कही है; लेकिन इन्हीं आँकड़ों में यह भी दिखता है कि नैतिकता के व्यक्तिगत मूल्यांकन के मुताबिक तब से अब तक उनके समकालीन लोगों की नैतिकता वैसी ही है। और नेचर पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन के आधार पर शोधकर्ताओं का कहना है कि लोगों का यह मानना कि लोगों में नैतिकता में गिरावट आई है, महज एक भ्रम है।

इन नतीजों पर पहुँचने के लिए शोधकर्ताओं ने 1949-2019 के बीच अमेरिका में नैतिक मूल्यों पर किए गए सर्वेक्षण खँगाले। और पाया कि 84 प्रतिशत सवालों के जवाब में अधिकतर लोगों ने कहा कि नैतिकता का पतन हुआ है। 59 अन्य देशों में किए गए अन्य सर्वेक्षणों में भी कुछ ऐसे ही नतीजे देखने को मिले। 

इसके बाद शोधकर्ताओं ने अमेरिका के प्रतिभागियों के साथ 2020 में स्वयं कई अध्ययन किए। अध्ययन में विभिन्न राजनीतिक विचारों, नस्ल, लिंग, उम्र और शैक्षणिक योग्यता के लोग शामिल थे। इसमें भी लोगों ने कहा कि उनके बचपन के समय की तुलना में लोग अब कम दयालु, ईमानदार और भले रह गए हैं। 

इसके बाद शोधकर्ताओं ने उन सवालों को भी देखा, जिनमें लोगों से अपने और अपने साथियों की वर्तमान नैतिकता का हाल बताने को कहा गया था। शोधकर्ताओं ने विश्लेषण के लिए उन अध्ययनों को चुना जो कम से कम दस साल के अंतराल में दोहराए गए हों ताकि एक अवधि में प्रतिभागियों के जवाबों की तुलना की जा सके। 

यदि वास्तव में समय के साथ लोगों की नैतिकता का पतन हुआ होता, तो प्रतिभागी पहले की तुलना में बाद वाले सर्वेक्षण में अपने साथियों के बारे में अधिक नकारात्मक कहते; लेकिन उनके जवाब बताते थे कि अपने साथियों के बारे में प्रतिभागियों के विचार समय के साथ नहीं बदले। इस आधार पर शोधकर्ताओं का कहना है कि नैतिक पतन के बारे में लोगों की धारणा मिथ्या है।

भला लोग ऐसा क्यों सोचते हैं कि ज़माना खराब हो रहा है? शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इसका ताल्लुक चुनिंदा स्मृति जैसे कारकों से है; अक्सर अच्छी यादों की तुलना में बुरी यादें जल्दी धुँधला जाती हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि नैतिक पतन की भ्रामक धारणा के व्यापक सामाजिक और राजनीतिक अंजाम हो सकते हैं। मसलन 2015 के एक सर्वेक्षण में अमेरिका के 76 प्रतिशत लोगों ने कहा कि सरकार की प्राथमिकता देश को नैतिक पतन की ओर जाने से बचाने की होनी चाहिए। 

बड़ी चुनौती लोगों को यह स्वीकार कराने की है कि यह भ्रम है जो सर्वव्याप्त है। (स्रोत फीचर्स)

हाइबनः दिव्य सम्बन्ध

  - अनिता ललित

हमारे कमरे के सामने बाल्कनी और उससे लगी हुई, खुली छत है, जिसकी शोभा सुंदर रंग-बिरंगे फूल और हरे-भरे पौधे बढ़ाते रहते हैं। वहाँ बैठना परिवार के हम सभी सदस्यों को बहुत भाता है, विशेषकर जब मौसम थोड़ा ठंडा हो या बारिश हो रही हो। बारिश की बूँदें जब फूलों की पँखुड़ियों और हरी-हरी पत्तियों पर नाचती हुई गिरतीं हैं तो यूँ लगता है, जैसे मोतियों की अनगिनत लड़ियाँ खनक रही हों। सर्दियों में धूप के पीछे जितना भागो, वो उतनी ही छिटककर दूर... और दूर भागती चली जाती है -धूप के साथ इस लुकाछिपी के खेल का अपना अलग ही मज़ा है।

   पता नहीं कब और कैसे, वहाँ हमने पंछियों को दाना डालना शुरू कर दिया। पहले गिलहरी आती थी, फिर कबूतर आए, फिर गौरैया ... और अब तो न जाने कितनी तरह की सुंदर-सुंदर नन्ही-मुन्नी और थोड़ी बड़ी चिड़ियाँ भी आने लगीं। किसी के गले में लाल धारी और पेट का कुछ हिस्सा सफ़ेद है, सिर पर कलगी जैसी बनी हुई है -इसकी बोली बहुत ही मीठी है; कोई पूरी धानी रंग की -ऐसी कि पत्तियों में छिप जाए; कोई ऐसी तराशी हुई कि लटकती बेल की टहनी पर टेढ़े बैठकर अपनी लंबी व तीखी चोंच सीधे फूलों के अंदर घुसा देती है -शायद फूलों का रस पीती होगी; कोई पीली चोंच वाली -जो बारी-बारी से पानी में डुबकी लगाकर गमलों के सिरे पर या छत की रेलिंग पर बैठ जाती हैं; कुछ फ़ाख़्ता हैं -वो भी ऊपर बिजली के तार पर बैठकर इंतज़ार करती रहती हैं, दाना डलने का। सब समूह में चार-पाँच इकट्ठे आतीं हैं। सुंदर रंगों से सजी हुई तितलियाँ और उनके बच्चे भी इधर से उधर पंख झुलाते हुए दौड़ते रहते हैं, जैसे छुआ-छुआई खेल रहे हों, काले भँवरे भी वहीं मँडराते रहते हैं। अब ये सारे हमारे ही परिवार का हिस्सा बन गए हैं।  

 पहले पानी का एक बर्तन रखा हुआ था, मगर वो जल्दी ही खाली होने लगा, तो दो रखे, फिर तीन और अब चार बर्तन रखे हैं हम लोगों ने -किसी में आकर वे छई-छप्पा-छई करती हैं, तो किसी में से पानी पीती हैं। कबूतर भी उसमें नहा जाते हैं। यही नहीं, कौवे महाराज भी कुछ महीनों से आकर अब काँव -काँव करने लगे, तो उनके लिए भी रोटी बनने लगी, वो भी समय-समय पर आने लगे। कभी-कभी तो कौवे महाराज किसी और के यहाँ से रूखी रोटी लाकर यहाँ पानी के बर्तन में भिगो देते, फिर मुलायम होने पर उठा ले जाते। गिलहरी तो सबसे अधिक शैतान और पेटू! कोई खाए या न खाए, वो आंटी तो सबका खाना खा जाती हैं। चाहे बाजरा हो या ब्रेड या रोटी या बिस्किट  ... ये सब चट कर जाती हैं, मुँह में दबाकर भाग जाती हैं। एक नहीं, इनका पूरा मोहल्ला यहाँ दावत खाने आ जाता है, सात-आठ गिलहरियाँ! किसी से नहीं डरतीं। भगाना पड़ता है उन्हें। उनका बस चले, तो बाजरे का डिब्बा भी खा जाएँ!

   ये सिलसिला अब रोज़ का हो गया है। सुबह से ही गिलहरी की कर्र-कर्र, कबूतर की गुटरगूँ, गौरैया की चीं-चीं और कौवे महाशय की काँव-काँव शुरू हो जाती है। सवेरे उठकर सबसे पहला काम छत पर दाना डालना होता है। फिर नाश्ते के समय चिड़ियों के लिए ब्रेड, फिर दोपहर खाने के पहले फिर दाना डाला जाता है, और शाम को एक बार और। अब तो छत पर किसी काम से निकलने पर ही एक-दो सफ़ेद कबूतर आकर सामने बैठ जाते हैं, डरते नहीं वो! एक तो आकर पास ही टहलता रहता है और हर थोड़ी देर बाद आकर हमारी कुर्सी पर बैठकर कमरे में झाँकता रहता है। कुछ बोलो, तो गर्दन टेढ़ी करके आँखें भी घुमाता है और दाने के डिब्बे की तरफ़ देखता है। दाना डालो, तो भागकर खाने लगता है। कभी-कभी डर लगता है कि ज़्यादा खाने से उसकी तबीयत न ख़राब हो जाए। मगर जिस तरह से वो सामने आकर बैठ जाता है, तो थोड़ा- सा देना पड़ता है कि इतनी आस लगाए हुए है। उसका नाम हमने ‘नॉटी’ रख दिया है।

    कौवे महाराज भी आकर कभी रेलिंग, फिर गमले पर और फिर ज़मीन पर फुदकते रहते हैं और ब्रेड या रोटी का टुकड़ा उठाकर खाते हैं। कभी-कभी जब उनका दूसरा साथी भी आ जाता है, तो उस टुकड़े को लेकर अपनी चोंच से उसकी चोंच में खिलाते हैं -कौवे को हमने ऐसा करते पहली बार देखा है।

    कुछ दिनों के लिए घर से बाहर जाएँ, तो छत का रास्ता खोलकर जाना पड़ता है, जिससे घर के कामों में मदद करने वाले अंदर आकर, पौधों को पानी व इन सबको समय पर दाना-रोटी दे सकें। फ़ोन से उन्हें याद भी दिलाते रहते हैं। एक ख़ूबसूरत दैवीय रिश्ता -सा बन गया है सबसे, जो दिल को बहुत सुकून देता है।

बिन बोले ही

समझे दिल की बात

मन विभोर।

 

दैवीय रिश्ता

पंछियों ने बनाया

सुकून देता। 


लघुकथाः समाजवाद

  - उर्मिल कुमार थपलियाल

दिन भर धरना, रैली, प्रदर्शन और नारेबाजी के बाद वह जब रात को घर लौटा, तो बेहद थक गया था। जैसे वो एक दर्द हो, जो निकास नहीं पा रहा हो। घर जाकर उसने बड़ी दिक्कत से अपनी दोनों टाँगें फेंक दीं। एक टाँग मेज के पास और दूसरी बाथरूम के दरवाजे के पास जाकर गिरी। अपने दर्दीले कंधे उचकाकर उसने दोनों हाथों से अपना भारी- सर अलग किया। वो तकिए और बिस्तर के नीचे लुढ़क गया। अपने दोनों हाथ उसने झटके से अलग किए। वे पलंग के इधर–उधर जा गिरे। उसका धड़ बिस्तर के बीचों–बीच जाकर अटक गया। अब वह कमरे में कहीं नहीं था। उसकी एक विभाजित सी उपस्थिति थी। आँखों की पलकें बंद थीं। जैसे किसी ने उन्हें सी दिया हो। वह लगभग अभंग था।

सवेरा होते ही उसके दरवाजे की साँकल खटकी। खटकने की आवाज सुनने से पहले एक तरफ पड़े चेहरे की पलकें खुलीं। दरवाजे पर कोई बड़ी हड़बड़ी में चिल्ला रहा था- ‘‘उठो, जल्दी उठो, समाजवाद आ गया है।’’ वो अस्व- व्यस्त था। दरवाजे की साँकल फिर बजी और चिल्लाने वाला अगले मकान की तरफ बढ़ गया। पाँव पहने। कंधे पर सर टिकाया और सड़क की तरफ दौड़ पड़ा। कहीं कुछ नहीं था। चिल्लाने वाला किसी दूसरे मकान की साँकल बजा रहा था। पागलों की तरह। मुड़–मुड़कर कुछ उसे देख रहे है, कुछ हैरत में है। कुछ चकित, कुछ देर के बाद लोगों के हँसने की आवाज उसे सुनाई देने लगी। उसे रोना आने लगा।

    उसे लगा कुछ गड़बड़ जरूर है, क्योंकि जब वो रोने लगा तो उसके आँसू उसकी पीठ पर बह रहे थे।

आलेखः पटाखों का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व न्यायिक पक्ष

 - राजेश पाठक

इतिहासकार परशुराम कृष्ण गोडे की एक पुस्तक - द हिस्ट्री ऑफ फायरवर्क्स इन इंडिया बिटवीन ए डी 1400 एंड 1900 - वर्ष 1950 में प्रकाशित हुई थी। यह भारत में पटाखों के इतिहास की एक प्रामाणिक पुस्तक है। उन्होंने पुस्तक में उल्लेख किया है कि पटाखों का प्रचलन भारत में विभिन्न उल्लास व उत्सवों पर बखूबी रहा है। सम्राट व लेखक गजपति रुद्रदेव (1497-1539) ने भी संस्कृत भाषा में लिखी पुस्तक -कौतुक चिंतामणि - में पटाखों के प्रचलन का विवरण प्रस्तुत किया है। वास्तव में देखा जाए, तो विश्व में पटाखों की शुरुआत चीन द्वारा की गई। आज से तकरीबन 2000 वर्ष पूर्व बिना गन पाउडर के पटाखे चीन में बनाए जाते थे। जब 9 वीं सदी में गन पाउडर का आविष्कार हुआ, तब जाकर पटाखों का यह प्रदूषणकारी स्वरूप सामने आया।

भारत में भी 15 वीं शताब्दी के लगभग मध्य में गन पाउडर विभिन्न युद्ध प्रणालियों में प्रयुक्त होने लगा। उसी दौरान लोगों ने विभिन्न उत्सवों, समारोहों एवं धार्मिक अवसरों पर इसके प्रयोग व उपयोग पर ध्यान देना शुरू किया। विभिन्न स्रोतों के अध्ययन से यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि भारत में पटाखों के प्रचलन की शुरुआत वर्ष 1443 में विजयनगर साम्राज्य के राजा देवराय द्वितीय के दरबार में नियुक्त राजदूत अब्दुर रज्जाक ने की। शबे बरात जैसे पर्व में उस वक्त से ही इसके प्रचलन का इतिहास आसानी से ढूँढा जा सकता है।

वास्तव में देखा जाय तो दिवाली के अवसर पर पटाखे फोड़ने व रोशनी करने के ढेर सारे प्रयोजन भी और ढ़ेर सारे माध्यम भी रहे हैं, जिसके स्वरूप कालांतर में परिवर्तित होते चले गए।

आज संपूर्ण विश्व पर्यावरण संरक्षण की समस्याओं से जूझ रहा है। सतत विकास के लिए टिकाऊ पर्यावरण आज हर की आवश्यकता है। आज वायु की गुणवत्ता क्षीण हुई है जिसके कारण पर्यावरण प्रदूषणकारी कारकों के नष्ट करने की बात ही नहीं; बल्कि उससे उबरने के लिए सख्त से सख्त कानूनों का निर्माण व क्रियान्वयन किया जाने लगा है।

यह सत्य है कि न केवल हिंदू धर्मावलंबियों बल्कि अन्य धर्मों के उपासक भी अपने धार्मिक व सांस्कृतिक अवसरों पर पटाखों के प्रयोग को बढ़ावा देते आए हैं; इसलिए यह अब किसी खास धर्म व संस्कृति का मुद्दा नहीं रह गया है। दिवाली, छठ,शबे बरात,न्यू ईयर, क्रिसमस जैसे विभिन्न धार्मिक अवसरों के साथ - साथ विभिन्न धर्मावलंबियों के वैवाहिक समारोहों, राजनीतिक-सामाजिक हितलाभ प्राप्ति के अवसरों पर भी पटाखे छोड़ना आकर्षण का मुख्य केंद्र हो गया है। 

पटाखों का न केवल समाजिक व सांस्कृतिक पक्ष बल्कि आर्थिक पक्ष भी। आज इस उद्योग से लाखों लोगों को स्थायी/अस्थायी रोजगार प्राप्त हुआ है। तमिलनाडु का शिवाकाशी क्षेत्र जिसे भारत में पटाखों की राजधानी कहा जाता है अकेले ही देश में कुल पटाखा उत्पादन का लगभग 60प्रतिशत हिस्सा तैयार करता है। यहाँ का सालाना कारोबार लगभग 400 करोड़ रुपये का है। समय - समय पर पटाखों का विदेशों में निर्यात भी किया जाता है, जिससे देश को विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। यह निर्यात मुख्यतया बुल्गारिया, बांग्लादेश, नेपाल जैसे देशों को किया जाता है, जहाँ पर भारतीय पटाखों की गुणवत्ता अच्छी मानी जाती है। यद्यपि भारत के विस्फोटक अधिनियम,2008 द्वारा पटाखों के व्यापार आदि पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं, तथापि सीमित उपयोग व सीमित व्यापार की अनुमति प्राप्त की जाती रही है। आयरलैंड व चिली जैसे देशों में तो इसके प्रयोग पर सख्त पाबंदी है। मलेशिया जैसे देश की बात करें, तो वहाँ माइनर आफेंस एक्ट, 1955 और विस्फोटक अधिनियम,1957 द्वारा प्राइवेट नागरिकों के लिए फायरवर्क्स पूर्ण प्रतिबंधित है। केवल सार्वजनिक प्रयोजनों में इसके सीमित प्रयोग की अनुमति है। एक और देश है- ताइवान। यहाँ पर्यावरण समस्याओं को देखते हुए वर्ष 2008 से पटाखों के प्रयोग को शहरी क्षेत्रों में पूर्णतया प्रतिबंधित कर दिया गया है। ग्रामीण क्षेत्र केवल प्रतिबंध से मुक्त है।

 इतने कुछ वास्तविकताओं के बावजूद पटाखों के कारण फैलने वाले प्रदूषण को ले इसके प्रयोग व निर्माण पर प्रतिबंध लगाने की माँग देश में कुछ वर्षों से उठते रही है। विभिन्न काल खंडों में न्यायालयों द्वारा भी पटाखे के प्रयोग व निर्माण पर सख्ती बरती जाती रही है। वर्ष 2017 में न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ पटाखों के निर्माण में प्रयुक्त नुकसान देह व प्रदूषणकारी धातुओं यथा लीथियम,पारा, आर्सेनिक, एंटीमनी,सीसा के प्रयोग पर पाबंदी लगाई थी। पीठ ने कहा था कि यह सुनिश्चित करना पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सामग्री सुरक्षा संगठन की जिम्मेदारी है कि विशेषकर तमिलनाडु के शिवाकाशी में आदेश का पालन हो।

इस संबंध में और भी न्यायिक निर्णय हैं। गत वर्ष कोलकाता उच्च न्यायालय के पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध के निर्णय को खारिज कर इको फ्रेंडली मध्यम गुणवत्ता वाले ग्रीन पटाखों की अनुमति उच्चतम न्यायालय ने दी थी। न्यायालय का यह मानना रहा है कि ग्रीन पटाखों में पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाने वाले केमिकल्स शामिल नहीं होते हैं, जिसके कारण लगभग 30-40 प्रतिशत तक कम प्रदूषण फैलता है।

सच कहा जाए, तो अब वक्त आ गया है कि हम स्वयमेव ही प्रदूषण से होने वाले खतरों के प्रति सचेष्ट रहें। हमें अब कानून की परिधि से बाहर निकल कर भी सोचना होगा कि भले ही पटाखे हमारी संस्कृति के हिस्सा रहे हों; परंतु आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित, सुदृढ़ व समेकित पर्यावरण देने के लिए इनके प्रयोग के सीमित पक्ष पर विशेष बल देना ही होगा तभी हमारी संस्कृति भी सुरक्षित रहेगी और भविष्य भी सुनहरा होगा। हमें समय - समय पर सरकार की एजेंसी पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड एवं नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के द्वारा जारी किए जाने वाले निर्देशों के प्रति भी अब गंभीर रहने की जरूरत है, जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देते आए हैं।

सम्पर्कः सहायक सांख्यिकी पदाधिकारी, जिला सांख्यिकी कार्यालय, गिरिडीह, झारखंड - 815301मो नं 9113150917