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Nov 6, 2023

हाइबनः दिव्य सम्बन्ध

  - अनिता ललित

हमारे कमरे के सामने बाल्कनी और उससे लगी हुई, खुली छत है, जिसकी शोभा सुंदर रंग-बिरंगे फूल और हरे-भरे पौधे बढ़ाते रहते हैं। वहाँ बैठना परिवार के हम सभी सदस्यों को बहुत भाता है, विशेषकर जब मौसम थोड़ा ठंडा हो या बारिश हो रही हो। बारिश की बूँदें जब फूलों की पँखुड़ियों और हरी-हरी पत्तियों पर नाचती हुई गिरतीं हैं तो यूँ लगता है, जैसे मोतियों की अनगिनत लड़ियाँ खनक रही हों। सर्दियों में धूप के पीछे जितना भागो, वो उतनी ही छिटककर दूर... और दूर भागती चली जाती है -धूप के साथ इस लुकाछिपी के खेल का अपना अलग ही मज़ा है।

   पता नहीं कब और कैसे, वहाँ हमने पंछियों को दाना डालना शुरू कर दिया। पहले गिलहरी आती थी, फिर कबूतर आए, फिर गौरैया ... और अब तो न जाने कितनी तरह की सुंदर-सुंदर नन्ही-मुन्नी और थोड़ी बड़ी चिड़ियाँ भी आने लगीं। किसी के गले में लाल धारी और पेट का कुछ हिस्सा सफ़ेद है, सिर पर कलगी जैसी बनी हुई है -इसकी बोली बहुत ही मीठी है; कोई पूरी धानी रंग की -ऐसी कि पत्तियों में छिप जाए; कोई ऐसी तराशी हुई कि लटकती बेल की टहनी पर टेढ़े बैठकर अपनी लंबी व तीखी चोंच सीधे फूलों के अंदर घुसा देती है -शायद फूलों का रस पीती होगी; कोई पीली चोंच वाली -जो बारी-बारी से पानी में डुबकी लगाकर गमलों के सिरे पर या छत की रेलिंग पर बैठ जाती हैं; कुछ फ़ाख़्ता हैं -वो भी ऊपर बिजली के तार पर बैठकर इंतज़ार करती रहती हैं, दाना डलने का। सब समूह में चार-पाँच इकट्ठे आतीं हैं। सुंदर रंगों से सजी हुई तितलियाँ और उनके बच्चे भी इधर से उधर पंख झुलाते हुए दौड़ते रहते हैं, जैसे छुआ-छुआई खेल रहे हों, काले भँवरे भी वहीं मँडराते रहते हैं। अब ये सारे हमारे ही परिवार का हिस्सा बन गए हैं।  

 पहले पानी का एक बर्तन रखा हुआ था, मगर वो जल्दी ही खाली होने लगा, तो दो रखे, फिर तीन और अब चार बर्तन रखे हैं हम लोगों ने -किसी में आकर वे छई-छप्पा-छई करती हैं, तो किसी में से पानी पीती हैं। कबूतर भी उसमें नहा जाते हैं। यही नहीं, कौवे महाराज भी कुछ महीनों से आकर अब काँव -काँव करने लगे, तो उनके लिए भी रोटी बनने लगी, वो भी समय-समय पर आने लगे। कभी-कभी तो कौवे महाराज किसी और के यहाँ से रूखी रोटी लाकर यहाँ पानी के बर्तन में भिगो देते, फिर मुलायम होने पर उठा ले जाते। गिलहरी तो सबसे अधिक शैतान और पेटू! कोई खाए या न खाए, वो आंटी तो सबका खाना खा जाती हैं। चाहे बाजरा हो या ब्रेड या रोटी या बिस्किट  ... ये सब चट कर जाती हैं, मुँह में दबाकर भाग जाती हैं। एक नहीं, इनका पूरा मोहल्ला यहाँ दावत खाने आ जाता है, सात-आठ गिलहरियाँ! किसी से नहीं डरतीं। भगाना पड़ता है उन्हें। उनका बस चले, तो बाजरे का डिब्बा भी खा जाएँ!

   ये सिलसिला अब रोज़ का हो गया है। सुबह से ही गिलहरी की कर्र-कर्र, कबूतर की गुटरगूँ, गौरैया की चीं-चीं और कौवे महाशय की काँव-काँव शुरू हो जाती है। सवेरे उठकर सबसे पहला काम छत पर दाना डालना होता है। फिर नाश्ते के समय चिड़ियों के लिए ब्रेड, फिर दोपहर खाने के पहले फिर दाना डाला जाता है, और शाम को एक बार और। अब तो छत पर किसी काम से निकलने पर ही एक-दो सफ़ेद कबूतर आकर सामने बैठ जाते हैं, डरते नहीं वो! एक तो आकर पास ही टहलता रहता है और हर थोड़ी देर बाद आकर हमारी कुर्सी पर बैठकर कमरे में झाँकता रहता है। कुछ बोलो, तो गर्दन टेढ़ी करके आँखें भी घुमाता है और दाने के डिब्बे की तरफ़ देखता है। दाना डालो, तो भागकर खाने लगता है। कभी-कभी डर लगता है कि ज़्यादा खाने से उसकी तबीयत न ख़राब हो जाए। मगर जिस तरह से वो सामने आकर बैठ जाता है, तो थोड़ा- सा देना पड़ता है कि इतनी आस लगाए हुए है। उसका नाम हमने ‘नॉटी’ रख दिया है।

    कौवे महाराज भी आकर कभी रेलिंग, फिर गमले पर और फिर ज़मीन पर फुदकते रहते हैं और ब्रेड या रोटी का टुकड़ा उठाकर खाते हैं। कभी-कभी जब उनका दूसरा साथी भी आ जाता है, तो उस टुकड़े को लेकर अपनी चोंच से उसकी चोंच में खिलाते हैं -कौवे को हमने ऐसा करते पहली बार देखा है।

    कुछ दिनों के लिए घर से बाहर जाएँ, तो छत का रास्ता खोलकर जाना पड़ता है, जिससे घर के कामों में मदद करने वाले अंदर आकर, पौधों को पानी व इन सबको समय पर दाना-रोटी दे सकें। फ़ोन से उन्हें याद भी दिलाते रहते हैं। एक ख़ूबसूरत दैवीय रिश्ता -सा बन गया है सबसे, जो दिल को बहुत सुकून देता है।

बिन बोले ही

समझे दिल की बात

मन विभोर।

 

दैवीय रिश्ता

पंछियों ने बनाया

सुकून देता। 


Mar 5, 2021

हिन्दी प्रचारिणी सभा कैनेडा की ओर से आयोजित लघुकथा-प्रतियोगिता परिणाम

अतीत में खोई हुई वर्तमान की चिट्ठियाँ 

( प्रथम पुरस्कार-1)

- डॉ. सुषमा गुप्ता

चार साल की बच्ची का मन मासूम था। अपने घर की खिड़की से अक्सर वह सामने वाले घर की बालकनी में कुछ खेल होते देखती थी। एक रोज़ उसने सामने वाली दीदी से पूछा
आपने सामने क्या फेंका?’
दीदी के चेहरे की हवाइयाँ उड़ गईं। कुछ सोचकर उन्होंने कहा-‘वह सामने वाले घर में मेरा दोस्त रहता है। कभी मैं उसे कुछ कहना भूल जाती हूँ, तो इस तरह लिख कर संदेश दे देती हूँ। दोस्तों में ऐसे संदेश देना चलता रहता है।

उस नन्ही बच्ची को यह बात बहुत सुंदर लगी। उसने नया-नया अक्षर- ज्ञान लेना शुरू किया था। उसका एक ही दोस्त था, साथ वाले घर में रहने वाला दो साल का नन्हा बंटी। वह सोचने लगी उसको संदेश भेजती हूँ, पर यह सोचकर उदास हो गई कि उसको अभी पढ़ना नहीं आएगा। अगले ही पल यह सोचकर मुस्कुरा दी कि तो क्या हुआ ,मैं ही पढ़कर सुना दूंगी।
उसने एक कागज़ पर जितने अक्षर सीखे थे, सब लिख दिए और अपने आँगन से उसके आँगन में फेंक दिया, फिर अपने गेट से निकलकर तेज़ी से उसके घर की तरफ गई। उसके आँगन में पड़ी अपनी चिट्ठी को देख ,खुशी से चहकती हुई, उसके घर के अंदर गई।
वह टीवी के सामने बैठा कार्टून देख रहा था। लड़की ने उसका हाथ थामकर कहा-‘तेरे लिए कुछ है।

नन्हे बंटी ने बाल-सुलभ जिज्ञासा से तुतलाहट भरी आवाज़ में पूछा ‘त्या ?’
लड़की हाथ पकड़क उसको बाहर की तरफ़ खींचने लगी, ‘आ दिखाती हूँ।

छोटे-छोटे दो कंगारू फुदकते हुए बाहर आँगन की तरफ बढ़ गए। आँगन में शहतूत का पेड़ भी था, काले शहतूत का पेड़। चिट्ठी उड़कर उस पेड़ के नीचे जा गिरी थी।
हवा तेज़ थी। अनगिनत पके शहतूत, पेड़ के नीचे पड़े थे। काले धब्बों से ज़मीन पटी हुई थी । चिठ्ठी  उड़कर उन काले शहतूतों से लिपट गई थी। लड़की ने आहिस्ता से उसको उठाकर देखा। शहतूत के धब्बों से कागज़ जामुनी हो गया था और बहुत से अक्षर उस रंग में घुलकर काले हो, लुप्त हो चुके थे। बच्ची का मन बुझ गया। इतने मन से उसने वह चिट्ठी लिखी थी हालाँकि उसको याद था कि उसने उसमें क्या लिखा है पर...

इतनी छोटी उम्र में भी उसको यह तो पता था कि नन्हा बंटी उस चिट्ठी को पढ़ नहीं पाएगा, चिट्ठी उसी को पढ़कर सुनानी थी। उसके बावजूद खो गए शब्द उसके लिए किसी खोई हुई अपनी सबसे सुंदर गुड़िया से कम नहीं थे, जिसका दु:ख बहुत बड़ा था।
लड़की की नन्ही-नन्ही हिरनी -जैसी आँखों में बड़े-बड़े आँसू तैर गए। छोटा लड़का तो कुछ भी नहीं समझ पा रहा था। वह टुकुर-टुकुर बस देख रहा था।  जब छोटी लड़की रोने लगी, तो उस छोटे लड़के के दिल में भी कुछ हलचल हुई। उसने धीरे से उसको हिलाकर अपनी मीठी तोतली ज़ुबान में पूछा
त्या हुआ!

काले जामुनी धब्बों से भरी हुई चिट्ठी जो उस लड़की की नन्ही हथेली में रखी थी, उसने लड़के के आगे कर दी। लड़के को तब भी समझ ना आया कि हुआ क्या है। उसने फिर पूछा- ‘त्या हुआ?’

लड़की ने मुट्ठी बंद की और अपने घर की तरफ दौड़ गई। सीधे अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर फूट-फूट कर रोने लगी।

शब्दों के गुम जाने के बाद दिल टूटने की यह उसकी ज़िंदगी की पहली घटना थी।

काँटा  (प्रथम पुरस्कार-2)

-राम करन

 बारहों महीने वे व्यस्त रहते। मैं सुबह उन्हें खेत में जाते देखता और शाम को खेत से आते। कभी वे खुरपा-खुरपी, कभी हँसिया, कभी कुदाल, कभी फावड़ा आदि लेकर जाते। एक दिन मैंने पूछ लिया –कितना जोतते हैं?’

पाँच... पाँच बीघे,’ वे बोले।

तब तो खाने की कमी नही होती होगी,’ मैने पूछा।

हाँ, नही होती,’  वे बोले।

बेचना पड़ता होगा?’ मैंने पूछा।

नही। बेचने भर का नही होता,’ वह सहजता से बोले।

लेकिन मैं चकित था। मैने पूछा –पाँच बीघे का अनाज खा जाते हैं?’

वे बोले –अरे गल्ले पर है। खेत मेरा नहीं है।’

आपका कितना बीघा है?’

उन्होंने ने हाथ से कुछ नहीं’ का इशारा किया। मैने पूछा-भाई-पाटीदार के पास भी नही होगा?’

वे बोले –नही, किसी के पास नही है।’

लेकिन खेती सब करते हैं.... सब किसान हैं,’ मैंने कहा।

वे मुस्कराए और बोले –हाँ।’

तब तो अनुदान-सहायता कुछ नही मिलता होगा?’

कहाँ से मिलेगा? जब किसी के नाम पर एक धुर भी नहीं है।

दादा-परदादा से ही ऐसे...

हाँ। दादा-परदादा का भी खेत नहीं था।

लेकिन गाँव के दूसरे लोगों के पास तो पाँच-पाँच दस-दस बीघा है।

उन्हें भगवान ने दिया है।

मतलब आपको भगवान ने नहीं दिया?’

हाँ, ऐसा ही है।

मैं उनको और खँगालने लगा। मैंने पूछा –भगवान ने आपको क्यों नहीं दिया?’

अब नहीं दिया तो नहीं दिया। क्योंहीं दिया ये वही जाने,’ वे मुस्कुरा कर बोले।

अच्छा आपको लगता है कि भगवान ही सबको देता है? देता है तो भेदभाव क्यों?’ मैंने उन्हें टटोला।

इस बार वे झल्लाए, ‘भगवान के नाम पर संतोष तो करने दीजिए...कहाँ सिर फोड़ लूँ...। मैं समझ गया कि काँटा बहुत गहराई में है।

विद्या  (द्वितीय पुरस्कार)

-महेश शर्मा

कोचिंग के लिए निकलने ही वाला था कि मम्मी ने टोक दिया – पहले दादी को किसी डॉक्टर को दिखा लाओ! सुबह से तकलीफ में हैं!

मैं मन ही मन बुरी तरह से झल्ला उठा –

मेडिकल के प्रि-एक्जाम की कोचिंग है यह - कोई मज़ाक नहीं है! पापा इतनी महँगी फीस कैसे भर रहे हैं, यह सोचकर कभी-कभी बहुत ग्लानि होती है - इसलिए अब एक मिनट भी फालतू खर्च करना मुझे बर्दाश्त नहीं है! हर हाल में यह एक्जाम क्रेक करना है मुझे!

मैंने स्कूटर का रूख एक प्राइवेट हॉस्पिटल की तरफ मोड़ दिया। सरकारी अस्पताल की कतार में खड़े रह कर सारा दिन बर्बाद नहीं करना है मुझे!

और यह मम्मी ने सिर्फ हज़ार रुपये क्या सोचकर पकड़ा दिये मुझे? किस माने में जी रहे हैं ये लोग! अरे तीन सौ रुपये तो डॉक्टर की फीस ही होगी – फिर आजकल बिना ब्लड-यूरिन टेस्ट करवाए कोई डॉक्टर इलाज कहाँ शुरू करता है – तो पाँच-छह सौ उसमे लग जाएँगे – फिर दवाइयाँ!! अगर पैसे कम पड़ गए तो क्या करूँगा?

तभी पीछे सीट पर बैठी दादी ने एक अलग ही रट लगानी शुरू कर दी – डॉक्टर के नहीं जाना मुझे – नाभि खिसकने का दर्द है यह – उस चूड़ी वाली बुढ़िया के पास ले चल!

दादी की इस दक़ियानूसी सोच से मेरा पारा चढ़ने लगा – मैंने उन्हें लाख समझाने की कोशिश की; लेकिन सब बेकार! उनकी ज़िद के आगे झुकना ही पड़ा!

बाज़ार की उस तंग सी गली में वह चूड़ियों की एक छोटी सी दुकान थी।

उस बुढ़िया ने वहीं भीतर फर्श पर बिछी एक दरी पर दादी को लिटा कर उपचार शुरू कर दिया – मैं अपना मुँह फेर कर खड़ा हो गया – नहीं देखना था मुझे यह सब!!

दस मिनट बाद मुस्कुराती हुई दादी ने मेरे कंधे को थपथपाकर चलने का इशारा किया! मैंने थोड़ी बेरुखी से पूछा – कितने पैसे देने हैं इस चूड़ीवाली को!

दादी अभी कुछ कहती कि उस बुढ़िया ने अपने झुर्रीदार चेहरे पर उभर आई हँसी को काबू में करते हुए कहा – अरे बेटा, यह तो विद्या है – इसके पैसे नहीं लेने चाहिए – पाप लगता है!

जाओ तुम पढ़-लिखकर  खूब बड़े आदमी बनो!

वाजिब कीमत  (तृतीय पुरस्कार)

-सन्दीप तोमर

  दिन गटर के भर जाने से मास्साहब की घर में पानी की निकासी बन्द हो जाती, मास्साहब ही क्या पूरी गली के घरों का आलम यही होता। मास्साहब बालेश्वर को बुला खरपच्ची से गटर खुलवाते। बालेश्वर इस काम की मुँहमाँगी कीमत वसूलता। उसका पेशा ही वही था। मासाहब्ब आए दिन गटर बन्द होने से दुःखी थे। आखिर उन्होंने मोटे पाइप को मुख्य सड़क की गटर लाइन से जोड़ समस्या का निदान कर लिया। अब वे  निश्चिन्त थे। कुछ दिन पहले ही छत का पाइप अवरूद्ध होने पर उन्हें बालेश्वर का ध्यान आया। मास्साहब बालेश्वर के बैठने के ठिये से उसे बुला लाए थे। बालेश्वर ने पाइप लाइन खोलने के तीन हजार रुपये माँगे। मास्साहब ने कहा-भाई, ये काम इतने का नहीं है। फिर इसमें गटर जैसी कुछ गंद भी नहीं, छत का पानी ही आता है।

मास्साहब, इतना ही जानते हो तो खुद कर लो। मेरी क्या जरूरत है।

मास्साहब ने पुरानी पहचान, अपने व्यवहारउसकी पूर्व में की सहायता की दुहाई भी दी; लेकिन उस पर उनका कोई असर न पड़ा। आखिर मास्साहब को मुँह माँगी कीमत पर काम करवाना पड़ा। बालेश्वर आधे-पौने घण्टे में काम निपटा पैसे लेकर जा चुका तो मास्साहब बहुत देर तक दिहाड़ी का हिसाब-किताब लगाते रहे। 

इस घटना को बामुश्किल महीना भी नहीं हुआ कि माहमारी के चलते, शहर में आपातकाल जैसी स्थिति हो ग। मास्साहब को ख्याल आया कि कैसे मजदूर, गरीब इस दौर में गुजर-बसर कर रहे होंगे। वे इस सोच में डूबे थे, अचानक डोरबेल बजने पर उनका ध्यान भंग हुआ। दरवाजा खोला तो देखा, बालेश्वर सामने था। मास्साहब को देखते ही हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। 

कहो, कैसे आये बालेश्वर?’

साहब, सब काम-धाम बन्द है, खाने तक को पैसे नहीं हैं, कुछ मदद कर देते तो...।

उसकी बात भी पूरी नहीं हुई थी, मास्साहब की आँखों के सामने छत का पाइप खुलवाने की  पूरी घटना चलचित्र की तरह घूम ग। वे बोले-बताओ, क्या करूँ?’

कुछ पैसे मिल जाते, तो बच्चो के लिए राशन ...।

अरे पास ही मेरा विद्यालय हैं, वहाँ बना-बनाया खाना आता है, मैं साथ चलकर दिलवा देता हूँ।

उसने सकुचाते हुए बना-बनाया खाना ले जाने में लाचारी जाहिर की, मास्साहब के चेहरे पर एक बार फिर मुस्कान आ ग। जेब से चार पाँच-पाँच सौ के नोट उसके हाथ पर थमाते हुए बोले-लो, पास की दुकान से घी-तेल, आटा, दाल ले लेना; लेकिन एक बात है, उस दिन के काम के तीन हजार रुपये वाकई ज्यादा थे।

बालेश्वर ने गर्दन झुकाते हुए पैसे लेने को हाथ आगे बढ़ा दिया।

विशमास्टर : ए कोरोना वॉरियर

( सांत्वना पुरस्कार-1)

- मार्टिन जॉन

वह अपने घर के बरामदे में रखी कुर्सी पर बैठकर मोबाइल में कोविड-19 के ताज़ा स्टेट्स देखने में मशगूल था कि मेन गेट पर एक बाइक आकर रुकी । ई-कार्ट के विशमास्टर को बाइक से उतरते देख उसने फटाफट अपने हाथों को बरामदे में ही रखे सेनिटाइर से सेनिटाइ किया, मास्क लगाया और गेट के पास ज़रूरत से ज़्यादा दूरी बनाकर खड़ा हो गया ।

    कोरोना काल में ऑनलाइन शॉपिंग कंपनियाँ कुछ दिनों तक बंद रहने के बाद  पिछले पखवाड़े से खुल गई थीं । अब वह ज़रूरत के बहुत सारे उपयोगी सामान ऑर्डर प्लेस कर मँगवा लेता है । इन सामानों की ख़रीदारी के लिए घर से बाहर निकलने की ज़रूरत नहीं रही। बिग बास्केट, जमोटा, अमेज़न, फ्लिपकर्ट के खुल जाने से वह बेहद प्रसन्न था; क्योंकि इस सुविधा से  ‘स्टे होम, स्टे से’ का एक हद तक पालन हो जा रहा था ।

     विशमास्टर एक हाथ में पैकेट लिये दूसरे हाथ से गेट खोलने जा ही रहा था कि वह जोर से चिल्लया , अरे , फिर तुमने गेट को छू लिया ...हाथ मत लगाओ ! उसकी आवाज़ की कर्कशता ने  विशमास्टर पर डंडे जैसा प्रहार किया। वह सहम गया ।

  सॉरी सर ..एक्सट्रीमली सॉरी !

हर बार यही कहते हो और हाथ लगा देते हो ! उसके स्वर के रूखेपन के एहसास से विशमास्टर एक पल के लिए थम गया ।

आगे ख्याल रखूँगा ।...पैकेट ले लीजि सर !

अरे भाई , बाउंड्री पर रख दो न !अपनी जगह से हिले बगैर उसने उसी लहज़े में कहा ।

जी सर ! ...फीडबैक दे दीजिगा प्लीज !

‘हाँ , हाँ दे दूँगा !

विशमास्टर पैकेट से भरे बड़े और वजनी बैग कंधे से लटका कर जैसे ही बाइक स्टार्ट करने को उद्यत हुआ, उसने यूँ  ही पूछ डाला , तुम लोगों को डर नहीं लगता ?

डर ?विशमास्टर ने हेलमेट के पारदर्शी काँच से अपनी आँखों को फैलाकर उसके चेहरे पर टिकाया , लगता है सर।...लेकिन... 

लेकिन क्या ?’

उसके आगे झुकते नहीं !....झुक जाएँगे तो आप सब की सेवा कैसे कर पाएँगे !

ज़वाब सुनकर वह झेंप-सा गया। मन ही मन बुदबुदाया ‘नाहक ही ऐसा बेतुका सवाल पूछ डाला’।

इफ यू डोंट माइंड .......एक बात कहूँ सर ? विशमास्टर ने हेलमेट उतारकर अपने हाथों  में ले लिया। अपने बुझे और मायूस चेहरे पर ‘सर्विस विद स्माइल’ के तहत  मुस्कान लाने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा , सेफ्टी और सोशल डिस्टेंसिंग  मेन्टेन करना तो ज़रूरी है सर।.......लेकिन इतना भी नहीं कि उससे  इंसानियत का खात्मा हो जाए!                                                                                वह  झटके से बाइक स्टार्ट कर पलक झपकते आँखों से ओझल हो गया  और दे गया शालीन पलटवार से  शर्मिंदगी का वायरस जिसके चपेट में आकर वह यथावत् खड़ा रह गया ।

राजा-बेटा ( सांत्वना-2)

-अनिता ललित

 क्या माँ! तुम सुबह से रात तक अकेली काम में लगी रहती हो। विकी को बोलो तुम्हारी मदद किया करे। सिमरन माँ से कहने लगी।

अरे! क्यों तू उसके पीछे पड़ी है...मदद करे! मदद करे! क्या हो गया है तुझे? पढ़ाई कर रहा है वो बेचारा। मैं कर रही हूँ न। सदा की तरह, माँ का अपना रटा-रटाया जवाब था। अच्छा ये बता! तू इस बार इतनी खीझी हुई क्यों है? जब से ससुराल से आई है, बात-बात पर विकी से गुस्सा हो रही है। लगता है, लॉकडाउन का कुछ ज़्यादा ही असर हुआ है तुझपर। पहले तो कभी नहीं टोकती थी इतना। किसी बात पर झगड़ा हुआ है क्या उससे? मुस्कुराते हुए माँ ने पूछा।

नहीं माँ! ऐसा कुछ नहीं है ... अनमनी -सी होकर सिमरन बोली, उसे भी काम करने की आदत होनी चाहिए न, तुम्हारा हाथ बँटाना चाहिए। अब इतना छोटा भी नहीं रहा। कहते हुए सिमरन कपड़े उठाने चली गई।

थोड़ी ही देर बाद विकी के कमरे से कुछ शोर की आवाज़ सुनाई दी। सिमरन विकी को डाँट रही थी कि वो जाकर चाय बनाए , और विकी था कि चादर ताने पड़ा था। माँ ने बीच-बचाव करते हुए कहा, अरे क्या सिमु! सोने दे उसे! क्यों तू उसके साथ ज़बरदस्ती कर रही है? कुछ सालों में अपने आप समझ आ जाएगी। तेरी भाभी आएगी तो देखना, सब करेगा... माँ हँसते हुए बोली।

नहीं करेगा! तब भी कुछ नहीं करेगा! राजा-बेटा है न तुम्हारा! बल्कि तब तो और भी नहीं करेगा! वो इसलिए, क्योंकि तुमने तो उससे कभी कुछ कराया नहीं! और अगर करेगा  ... तो भी तुम्हें ही बुरा लगेगा कि देखो! पत्नी के लिए कैसे चाय बनाने पहुँच गया, कभी मुझे तो एक गिलास पानी तक नहीं पिलाया! तब तुम... हाँ माँ! तुम! तुम इसके और इसकी पत्नी के बीच में दीवार बनकर खड़ी हो जाओगी, उनके गले में एक काँटे की तरह फँस जाओगी और फिर... दोनों का जीना दूभर हो जाएगा; इसलिए बहुत ज़रूरी है, कि इन लाटसाहब से अभी से काम कराओ। ...चलो! उठो विकी!  ... विकी की चादर खींचते हुए सिमरन चीखती जा रही थी, मानों उसे कोई दौरा पड़ गया हो। उसकी साँस फूलने लगी थी।

और अवाक् खड़ी माँ, सिमरन के इस रूप में छिपे उसके गुस्से और दर्द को शिद्दत से महसूस कर पा रही थी। उसने हौले से सिमरन का हाथ थामा और गंभीर आवाज़ में बेटे से बोली, विकी! बहुत देर हो चुकी है! सूरज सिर पर चढ़ आया है। दस मिनट में उठकर बाहर आ जाना।

Jul 18, 2016

जीवन शैली

                ऐसी होती है माँ 
                                 - अनिता ललित
माँ- नारी का सबसे ख़ूबसूरत व वंदनीय रूप! माँ शब्द में ही ऊँचाई और गहराई दोनों का आभास एक साथ होता है। उसका हर बोल मंत्रोच्चारण होता है और उसकी हर बात में जीवन-सार छिपा होता है! उसकी बोली से शहद टपकता है व आँखों से ममता का सागर छलकता रहता है। माँ केवल देना जानती है। वह किसी काम के लिए नानहीं कहतीवह कभी थकती नहीं। सवेरे सबसे पहले उठती है और रात में सबके बाद सोती है। उसके चेहरे पर कभी थकान नहीं दिखती। सबको अपनी चीज़ सही ठिकाने पर मिलती मगर माँ कभी एक जगह पर बैठी नहीं दिखती। कोमलतम भावनाओं से लिपटी माँ के सामने कड़ी से कड़ी, बड़ी से बड़ी, कठिन से कठिन समस्या भी अपना अस्तित्व खो देती है-माँ के पास हर मुश्किल की चाभी होती है। कपड़ों की सीवन में वह चुपचाप अपने ज़ख्मों को भी सी देती है, अपने आँसुओं के लेप से दिलों में पड़ी दरारों को भर देती है।
 बच्चे के कोख़ में आने के साथ ही माँ उसकी सुरक्षा में जुट जाती है। बच्चों की देखभाल करना माँ का काम नहीं वरन् उसका स्वभाव होता है। बच्चों को क्या चाहिए यह बच्चों से पहले उसको पता चल जाता है। बच्चे अगर कष्ट में हों या बीमार हों, तो माँ को चैन नहीं आता, रातों को जाग-जागकर वह उनकी देखभाल करती है। भयंकर तूफ़ान हो या कड़ी धूप, माँ का आँचल बच्चों को अपने साये में सुरक्षित रखता है, उन्हें सुक़ून देता है। सबके ताने सुनती है, मगर बच्चों के लालन-पालन में कोई कोताही नहीं बरतती, कोई समझौता नहीं करती।
सालों-साल गुजऱ जाते हैं, माँ सोती नहीं! बच्चों को पालने-पोसने में वह ख़ुद को भूल जाती है। फिर अचानक एक दिन उसे महसूस होता है कि उसकी चाल धीमी हो गयी है, घुटने दुखने लगे हैं, वह अक्सर चीज़ें रखकर भूलने लगी है, जल्दी थकने भी लगी है, और उसे महसूस होता है कि नींद उसकी आँखों का पता ही भूल चुकी है। बुनाई-कढ़ाई करते समय अब वह सुई में धागे से और गिरे हुए फंदे से काफी देर तक जूझती रहती है। वह आवाा से कम और हाव-भाव से बातें समझने की कोशिश करने लगी है और उसकी प्रतिक्रिया भी धीमी पड़ने लगी है। तब वह देखती है कि उसके चेहरे पर उभरी लकीरों के नीचे दबे हुए पिछले कई वर्ष अपनी कहानी कहने लगे हैं, और पाती है, कि उसके बच्चों का कद अब उसके आँचल से बड़ा होने लगा है। उसके बच्चे अब उसके पास ज़्यादा देर तक नहीं रुकना चाहते, ज़िन्दगी की रेस में दौड़ते हुए उनके क़दमों के पास इतना वक़्त नहीं है कि वे उसके पास कुछ देर को ठहर सकें, उसकी बातों को सुन सकें, समझ सकें, उसकी छोटी-छोटी, सिमटी हुई ख्वाहिशों को पूरा कर सकें। अपने कोमल कन्धों और एक पैर से फिरकी की तरह नाचते हुए, पूरे परिवार की इच्छाओं को पूरा करने वाली माँ अब आत्मग्लानि से भर उठती है ! बच्चों के आँसू पोछने वाली, उनका मनोबल बढ़ाने वाली माँ अब बात-बात पर बच्चों के सामने अपनी बेबसी पर रो पड़ती है। फिर भी वह ढलती उम्र से उपजी अपनी अस्वथता को अपनी कमी समझकर उसी को कोसती है अपने बच्चों की स्वार्थपरता को नहीं! माँ ऐसी ही होती है !

          माँ तो हल्दी चंदन
             
बातें उसकी फूलों जैसीदिल ममता का आँगन है।
हर दर्द की दवा वो मीठीमाँ तो हल्दी-चंदन है।
स्वर्ग ज़मीं पर उतराऐसा माँ का रूप सलोना है
सजदे में झुक जाए ख़ुदा भीमाँ की बोली वंदन है।
माँ की बातें सीधी-सादीचाहत उसकी भोली है
घर-बच्चों की हर ख़्वाहिश परकरती कुर्बां जीवन है।
अपने आँचल को फैलाकरजीवन को महकाती है
शोलों पर वो चलती रहतीआँखों में भर सावन है।
उसके सपनों की लाली सेखिला सुबह का सूरज है
साँझ ढले क्यों भूली हँसनाक्यों खोया-खोया मन है ?
ढलती उम्र सुनाती क़िस्सेमाँ की पेशानी पर है
पपड़ी से झरते रिश्तेबचती यादों की सीलन है।
कि़स्मत वाला वो दर होगा, जिस घर माँ खुश रहती है
नूर ख़ुदा का उस पर बरसेवो पावन वृन्दावन है।


नारी एक नदी सी 
शांतनिर्मल
कभी चंचल-शोख मचलती,
अपनी दुनिया में मगन
किनारों संग वो बहती जाती!
जो भी उसके अंदर झाँके
झलक उसी की अपना लेती!
इसी तरह सेसब को अपने
दिल में वो बसाए रहती!
कोई कंकर फेंके उसमें,
कोई फेंके अपना मैल,
देवीदेवता सबको ही वो
अपने अंतर में समाती!
सूरज की भीषण गर्मी सहती
उसमें खुद को वो जलाती!
डर कर जब ये सूरज छिपता-
बादल का तांडव भी सहती!
दुनिया वाले जब जी चाहे
उसका रस्ता काटा करते।
तब भी वो खामोश रह कर
उनकी मनमर्ज़ी निभाती!
अपने खूँ से सींचे जाती
जीवन को जीवन’ वो देती,
लेकिन बदले में वो इसके
क़तरा-क़तरा तरसा करती!
दिल के अंदर लहरें उठतीं,
बहलाए वो भी ना बहलतीं !
चाँद गगन में जब मुस्काता
वो भीतर ही भीतर रोती!
आख़िर कब तक गुमसुम हो कर,
अपनी चुप्पी में वो खोती
दे-देकर इम्तेहाँ सब्र का
भरती जातीभरती जाती !
इक पल फिरऐसा भी आता,
अपना रौद्र रूप दिखाती!
बूँद- बूँद जो सहा था उसने,
दर्द का लावा छलका जाती!
नहीं देखती तब वो कुछ भी,
अपना या पराया कौन,
जो भी उसके आड़े आता,
तहस-नहस वो करती जाती!
दिल में उठती लहरों में वो,
अपना शक्ति-रूप धारती ,
तोड़के सारे बाँध वो बहती,
अपनी मंज़िल खुद तय करती!
नियति नदी कीसागर से मिलना,
उसको कोई रोक ना पाए
अपनी सारी कड़वाहट ले
उसमें खुद को जा मिटाती!
सागर का तो दंभ अनोखा,
खुद को समझे भाग्य-विधाता,
बिन नदी जीवन अधूरा,
उसका तो अस्तित्व ही झूठा!
रौद्र-रूप में छिपे दर्द से
सागर भी ना बच पाता,
मिटती नदीपर शाप से अपने
सागर को खारा जाती।

सम्पर्क: 1/16 विवे· खंड, गोमतीनगर, लखनऊ- 226010, anita.atgrace@gmail.com

Aug 14, 2013

चिंतन

 क्या हम  सचमुच आज़ाद है?
- अनिता ललित
देश आज़ाद, शहर आज़ाद, गाँव आज़ाद, गली आज़ाद, घर-परिवार आज़ाद! मगर फिर भी हम गुलाम हैं... अपनी सोच, अपनी इच्छाओं, अपने व्यवहार, अपनी मानसिकता... सबके गुलाम हैं!
 कहने को तो हम धर्म-निरपेक्ष देश में रहते हैं... मगर धर्म की आड़ में क्या कुछ अधर्म नहीं होता...! उदाहरण के लिए अयोध्या नगरी  के विवाद को ही देख लें! राम-जन्मभूमि से श्री रामचन्द्र जी के संस्कार तो खो गये... सिर्फ़ भूमि ही रह ग! कौन -सा धर्म सिखाता है कि इंसानियत को ताक पर रखकर, धर्म के नाम पर अपने ही भाई-बहनों, मासूम बच्चों की बलि चढ़ा दें! कोई य क्यों नहीं सोचता कि उस स्थान का विकास हो, वहाँ के रहने वालों का विकास हो, अच्छे अस्पताल बनें, विद्यालय खुलें.. जिससे आम जनता को कुछ लाभ हो... और इस प्रकार हम उन्नति की ओर अग्रसर हों...! मगर नहीं! सब अपने स्वार्थ में जकड़े हुए हैं...! ऐसे मुद्दों  पर ध्यान जाता है... तो सिर्फ़ वोटों की खातिर! जनता की भावनात्मक दुर्बलता की आड़ में सिर्फ़ अपना उल्लू सीधा किया जाता है!
देश को एक इकाई की तरह देखने की जगह...उसके टुकड़े कर दिए हैं! ठीक है! देख-भाल सही ढंग से हो ;इसलिए तो ये समझ आता है...कि हर कोई अपने हिस्से को साफ़-सुथरा बनाए , अपराध-रहित, उन्नति की राह पर ले चले! मगर जब किसी एक हिस्से पर कोई भारी विपदा आती है... तब तो हर एक का यही कर्त्तव्य होना चाहिए... कि एकजुट होकर हर संभव प्रयास करके  उस हिस्से को, उस विपदा से उबारने में सहायता करें! मगर ऐसा नहीं होता! ये मेरा! वो उसका! कोई हस्तक्षेप चाहता नहीं... या कोई खुद को उससे अलग कर अपने हिस्से में ही खुश है...! यही नहीं! उस विपदा से उसको क्या लाभ मिल सकता है.. उसकी तिकड़म भी लगाने में चूकता नहीं! अपने ही घर में सेंध लगाना... ये कैसी  ओछी सोच है? क्या इसीलिए हमारे देश के वीरों ने देश की स्वतंत्रता में अपनी प्राण न्योछावर किए थे और आज भी देश की सीमा पर कर रहे हैं
देशवासी ही एकजुट होकर नहीं रह पा रहे हैं। एक दूसरे पर गम्भीर आरोप लगाकर जनता को गुमराह कर रहे हैं और देश के कानून तक की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। क्षेत्रवाद और जातिवाद की विषबेल को सींच रहे हैं तो ऐसे में आतंकवाद का फैलना कितना आसान हो जाता है! और तब.... किसी दूसरे देश पर आरोप मढ़ने से पहले कभी कोई अपने दामन में झाँककर देखता है। कि ऐसा क्यों हुआ? अपनी अमूल्य विरासत जब खुद नहीं सँभाल पाएँगे , तो बाहर वाले तो फूट का अनुचित लाभ उठाएँगे ही! और इसके दु:खद ,म्भीर परिणाम झेलती है मासूम जनता! जो हर समय एक अनजान, दिल दहला देने वाले आतंक के डर के साए में साँस ले रही है! ये कैसी आज़ादी का सुकून है?
 बोलने की आज़ादी मिली तो जिसको देखो, वही भाषण देता है, बहाना कोई भी हो, मगर असली  कारण सिर्फ़ दूसरों की बुराई की आड़ में अपनी अच्छाई का ढोल पीटना होता है! या फिर वो बोला जाता है ; जो बिकता है! उससे क्या नुकसान हो रहा है, कोई नहीं देखता! कोई भी दुर्घटना हो , लोग उसकी तह तक जाने की जगह... उसकी आकर्षक व स्वादिष्ट दिखने वाली मलाई का स्वाद लेते हैं। उसकी नीचे की जली हुई परत पर कोई मल्हम लगाने की नहीं सोचता, उसकी वजह को जड़ से मिटाने की बजाय उसके चटखारे लेते हैं, उस पर अपने हाथ सेंकते हैं! ऐसे लोग लालच में इस क़दर डूबे होते हैं । कि उन्हें अपने ज़मीर की आवाज़ तक सुनाई नहीं देती!
 सरकार चुनने की आज़ादी मिली....तो कहीं उसके हिसाब से अक्ल नहीं मिली... या फिर इस पदवी के लायक कोई नेता नहीं मिला! समझ ही नहीं आता...किसको उस बहुमूल्य गद्दी पर बिठाएँ! आजकल जनता देखती है...कौन कम खराब है...जिसे वोट दिया जाए! अच्छे लोग राजनीति में जाना नहीं जाते, वे दायित्व निभाना नहीं चाहते फिर गुंडा-राज नहीं होगा , तो क्या होगा? बुराई नेता की पदवी में नहीं , हमारे अंदर है ; क्योंकि जो नेता बना , हमारी मर्ज़ी  से बना और हममें ही से कोई बना!
 इसी मजबूरी की आड़ में जनता भी लापरवाह हो अपना कर्त्तव्य भूल जाती है! कितने लोग तो मतदान के लिए जाते ही नहीं और कुछ बिक जाते हैं और ग़लत लोगों का चुनाव कर बैठते हैं, जो थोड़े-बहुत समझदार बच जाते हैं उनके मत बेकार चले जाते हैं! नतीजा घूम-फिर कर जनता को ही भुगतना पड़ता है! ये कौन सी आज़ादी है? जहाँ धनबल और बाहुबल पर सही ग़लत सारे कार्य हो जाते हैं ; मगर जो निर्बल है, निर्धन है। उसकी आवाज़ बंद कर दी जाती है। चाहे डरा-धमकाकर या फिर लोभ देकर! और यही सबसे बड़ा कारण है कि आज किसी अत्याचारी या मुजरिम को सज़ा नहीं मिल पाती ; क्योंकि क़ानून  गवाह माँगता है। और गवाही देने वाले न्यायालय तक पहुँचते-पहुँचते अपने बयान बदल देते हैं! इससे अधिक दु:खद बात और क्या हो सकती है! इसी  कारण देश में अपराधों का सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है! ये कैसी उन्नति है? कैसी प्रगति है? कैसी आज़ादी  है?
 जिधर देखिए, उधर शोषण हो रहा है! आजकल का सबसे ज्वलंत शोषण मुद्दा है... नारी-शोषण, बाल-शोषण! भ्रूण हत्या भी उसी का एक हिस्सा मान लीजिए ; क्योंकि उसमें भी एक भावी नारी का ही शोषण होता है! कौन है इसका जि़म्मेदार? आए दिन खबरें पढ़ने-सुनने में आतीं हैं। फलाँ नारी के साथ दुर्व्यहार हुआ! दुर्व्यहार भी अब अपनी सीमा लाँघ चुका है! कभी-कभी किसी बड़े शहर की सड़क पर, कभी शहर के जेल में, कभी गाँव की पंचायत में, तो कभी खुद अपने ही घर में किसी अपने के ही हाथों सोचकर ही मन में वितृष्णा होने लगती है! कोई मशहूर, धनवान्  हुआ... तो स्केंडल बनकर टी वी और समाचार पत्रों में हफ्तों तक सुर्खियाँ बनकर सज़तीं हैं। और अगर कोई ग़रीब हुआ- तो कहीं घुट-मर कर जि़ंदा लाश बनकर गुमनामी के अंधेरों में गुम हो जाता है!
अक्सर भीड़ भरी सड़क पर, कोई पीछे से हमें पकड़ लेता है। मुड़कर देखो, तो भीख माँगते नन्हें बच्चे-बच्चियाँ होते हैं..! कभी सोचा है- उन लावारिस जैसे बच्चों का शोषण किस हद को पार कर जाता होगा! जो इंसानी भेड़िए अपने घर, मोहल्लों, शहरों में किसी को भी अपना निशाना बनाने में नहीं चूकते वो इन फटे-चीथड़ों में लिपटे मासूम, बेसहारा बच्चों का क्या हश्र करते होंगे- सोचकर ही दिल काँप उठता है! मगर हम नज़र चुराकर आगे बढ़ जाते हैं- हम उनसे नहीं... खुद से नज़रें नहीं मिला पाते! हम सब घर बैठकर किसी के चरित्र पर उँगली उठाते रहते हैं। मगर जो चार उँगलियाँ जो हमारी ओर इशारा करतीं हैं...उन्हें अनदेखा कर जाते हैं! क्यों? क्योंकि हम अपनी मानसिकता के गुलाम हैं!
घर-परिवार में देखें कहीं बहू अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ रही है, तो कहीं सास अपने आधिपत्य के लिए! या फिर कहीं सास-बहू को अपने इशारों पर नचाना चाहती है, तो कहीं बहू-सास को! इसी चक्कर में कहीं बहू घुटकर जीती है। तो कहीं सास-ससुर! इन दोनों के बीच में बेटा बेपेन्दी के लोटे- जैसा घनचक्कर बना फिरता है!
   बड़े  आख़िर बड़े हैं, जितना उनको सम्मान मिलना चाहिए, उतना ही उनको अपना बड़प्पन बनाए रखना चाहिए! छोटे-छोटे ही हैं। उनको अपनी स्वतंत्रता का उपयोग एक सीमा में रहकर ही करना चाहिए! एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए। हर कोई सम्मान का अधिकारी है। मगर सम्मान छीना नहीं जाता, दिल से कमाया जाता है!
 यही कम नहीं है! कहीं-कहीं पति पत्नी को बाँधकर रखना चाहता है। तो कहीं पत्नी पति को अपने इशारों पर नचाना चाहती है! हर किसी को अपने हिस्से की जि़ंदगी जीने का हक़ है। तो फिर इतनी खींचतान क्यों?
इसका जि़म्मेदार कौन? खुद हम!  क्योंकि हम अपनी ओछी सोच और व्यवहार के ग़ुलाम हैं!
इतना सब सोचने के बाद...अक्सर यही प्रश्न दिमाग़ में उठता है। कि 'क्या हम सचमुच आज़ाद हैं...?’  जब अपने ही घर में हम आज़ादी की साँस नहीं ले पाते... तो देश की आज़ादी क्या सँभालेंगे?

संपर्क: 1/16 विवेक खंड,गोमतीनगर, लखनऊ 226010