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Dec 10, 2014

टोबा टेकसिंह

टोबा टेकसिंह
- सआदत हसन मंटो
बंटवारे के दो- तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की सरकारों को ख्याल आया कि साधारण कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए। यानी जो मुसलमान पागल हिंदुस्तान के पागलखाने में हैं, उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाए और जो हिंदू पाकिस्तान के पागलखानों में हैं, उन्हें हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया जाए।
मालूम नहीं यह बात ठीक थी या नहीं। बहरहाल बुद्धिमानों के फैसले के अनुसार इधर- उधर ऊंचे स्तर की कांफ्रेंस हुई और आखिरकार एक दिन पागलों के तबादलों के लिए नियत हो गया। अच्छी तरह छानबीन की गई। वे मुसलमान पागल, जिनके अभिभावक हिंदुस्तान में थे, वहीं रहने दिए गए थे। और जो बाकी थे, उन्हें सीमा पर रवाना कर दिया गया था। यहां पाकिस्तान से, क्योंकि करीब- करीब सब हिंदू- सिख जा चुके थे, इसलिए किसी को रखने- रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिंदू- सिख पागल थे, सबके सब पुलिस के संरक्षण में सीमा पर पहुंचा दिए गए। उधर की मालूम नहीं, लेकिन इधर लाहौर के पागलखाने में जब इस तबादले की खबर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प और कौतूकपूर्ण बातें होने लगीं। एक मुसलमान पागल, जो बारह बरस से रोजाना बकायदगी के साथ नमाज पढ़ता था, उससे जब उसके दोस्त ने पूछा-मौलवी साहब, यह पाकिस्तान क्या होता है? तो उसने बड़ा सोच- विचारकर जवाब दिया -'हिंदुस्तान में एक जगह है, जहां उस्तरे बनते हैं।'
यह जवाब सुनकर उसका मित्र संतुष्ट हो गया।
इसी तरह एक सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा-'सरदार जी, हमें हिंदुस्तान क्यों भेजा जा रहा है? हमें तो वहां की बोली भी नहीं आती।'
दूसरा मुस्करा दिया- 'मुझे तो हिंदुस्तान की बोली आती है-हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़- आकड़ फिरते हैं-।'
एक मुसलमान पागल ने नहाते- नहाते पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा इस जोर से बुलंद किया कि फर्श पर फिसलकर गिरा और अचेत हो गया। कुछ पागल ऐसे भी थे जो पागल नहीं थे। इनमें अधिकतर ऐसे कातिल थे, जिनके रिश्तेदारों ने अफसरों को दे-दिलाकर पागलखाने भिजवा दिया था कि वे फांसी के फंदे से बच जाएं।
ये कुछ- कुछ समझते थे कि हिंदुस्तान का क्यों विभाजन हुआ है और यह पाकिस्तान क्या है, लेकिन सभी घटनाओं से ये भी बेखबर थे। अखबारों से कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ जाहिल थे। उनकी बातचीत से भी वे कोई नतीजा नहीं निकाल सकते थे। उनको सिर्फ इतना मालूम था कि एक आदमी मुहम्मद अली जिन्ना है, जिसको कायदे- आजम कहते हैं। उसने मुसलमानों के लिए एक अलग मुल्क बनाया है, जिसका नाम पाकिस्तान है। वह कहां है? इसकी स्थिति क्या है? इसके विषय में वे कुछ नहीं जानते थे। यही कारण है कि पागलखाने में वे सब पागल, जिनका दिमाग पूरी तरह से खराब नहीं था, इस ऊहापोह में थे कि वे पाकिस्तान में हैं या हिंदुस्तान में। अगर हिंदुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहां है और अगर वे पाकिस्तान में हैं तो यह कैसे हो सकता है कि कुछ अर्सा पहले यहां रहते हुए भी हिंदुस्तान में थे। एक पागल तो पाकिस्तान और हिंदुस्तान और हिंदुस्तान और पाकिस्तान के चक्कर में ऐसा पड़ा कि और ज्यादा पागल हो गया। झाडू देते- देते एक दिन दरख्त पर चढ़ गया और एक टहनी पर बैठकर दो घंटे लगातार भाषण देता रहा, जो पाकिस्तान और हिंदुस्तान के नाजुक मामले पर था। सिपाहियों ने उसे नीचे उतरने के लिए कहा तो वह और ऊपर चढ़ गया। डराया- धमकाया गया तो उसने कहा - 'मैं न हिंदुस्तान में रहना चाहता हूं न पाकिस्तान में, मैं इस पेड़ पर ही रहूंगा।'
बड़ी मुश्किल के बाद जब उसका दौरा ठंडा पड़ गया, तो वह नीचे उतरा और अपने हिंदू- सिख दोस्तों से गले मिल- मिलकर रोने लगा। इस ख्याल से उसका दिल भर आया कि वे उसे छोड़कर हिंदुस्तान चले जाएंगे।
एक एम. एस. सी. पास रेडियो इंजीनियर, जो मुसलमान था और दूसरे पागलों से बिलकुल अलग- थलग बाग की एक खास रौश पर सारा दिन खामोश टहलता रहता था, में यह तब्दीली प्रकट हुई कि उसने तमाम कपड़े उतारकर दफेदार के हवाले कर दिए और नंग-धड़ंग सारे बाग में चलना शुरू कर दिया।
चनयूट एक मोटे मुसलमान पागल ने, जो मुस्लिम लीग का एक सक्रिय कार्यकर्ता रह चुका था और दिन में पंद्रह- सोलह बार नहाया करता, एकदम नई आदत छेड़ दी। उसका नाम मुहम्मद अली जिन्ना है। उसकी देखा- देखी एक सिख पागल मास्टर तारासिंह बन गया। करीब था कि उस जंगल में खूनखराबा हो जाए, मगर दोनों को खतरनाक पागल करार देकर अलग बंद कर दिया गया।
लाहौर का एक नौजवान हिंदू वकील था, जो मुहब्बत में पड़कर पागल हो गया था। जब उसने सुना कि अमृतसर हिंदुस्तान में चला गया है तो उसे बहुत दुख हुआ। उसी शहर की एक हिंदू लड़की से उसे प्रेम हो गया था। यद्यपि उसने उस वकील को ठुकरा दिया था, मगर दीवानगी की हालत में भी वह उसको भूला नहीं था। चुनांचे वह उन तमाम मुस्लिम लीडरों को गालियां देता था, जिन्होंने मिल-मिलाकर हिंदुस्तान के दो टुकड़े कर दिए। उसकी प्रेमिका हिंदुस्तानी बन गई और वह पाकिस्तानी।
जब तबादले की बात शुरू हुई तो वकील को पागलों ने समझाया। वह दिल छोटा न करे, उसको हिंदुस्तान भेज दिया जाएगा-उस हिंदुस्तान में, जहां उसकी प्रेमिका रहती है, मगर वह लाहौर छोडऩा नहीं चाहता था, इस ख्याल से कि अमृतसर में उसकी प्रेक्टिस नहीं चलेगी। यूरोपियन वार्ड में दो ऐंग्लो-इंडियन पागल थे। उनको जब मालूम हुआ कि हिंदुस्तान को आजाद कर अंग्रेज चले गए हैं तो उनको बड़ा दुख हुआ। वे छिप-छिपकर घंटों इस समस्या पर बातचीत करते रहते कि पागलखाने में उनकी हैसियत किस तरह की होगी- यूरोपीय वार्ड रहेगा या जाएगा। ब्रेकफास्ट मिला करेगा या नहीं। क्या उन्हें डबल रोटी के बजाए ब्लडी इंडियन चपाती तो जहर मार नहीं करनी पड़ेगी?
एक सिख था, जिसको पागलखाने में दाखिल हुए पंद्रह वर्ष हो चुके थे। हर समय उसकी जबान से अजीब- गरीब शब्द सुनने में आते थे, 'ओपड़ दी गडग़ड़ दा एनेक्स दी बेध्याना दी मुंग दी दाल आफ दी लालटेन।'
अलबत्ता कभी-कभी दीवार के साथ लगा लेता था तो भी हर समय खड़े रहने से उसके पांव सूज गए थे। पिंडलियां भी फैल गईं थीं, मगर इस शारीरिक तकलीफ के बावजूद लेटकर आराम नहीं करता था। हिंदुस्तान-पाकिस्तान और पागलों के तबादले के विषय में जब कभी पागलों में चर्चा होती थी तो वह बड़े ध्यान से सुनता था। कोई उससे पूछता कि उसका क्या ख्याल है तो वह बड़ी गंभीरता से जवाब देता 'ओपड़ दी गडग़ड़ दी एनेक्स दी बेध्याना दी मूंग दी दाल आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट।'
लेकिन बाद में आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट की जगह आफ दी टोबा टेकसिंह ने ले ली और उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू कर किया कि टोबा टेकसिंह कहां है, कहां का रहनेवाला है? लेकिन किसी को भी मालूम नहीं था कि वह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में। जो बताने की कोशिश करते थे, खुद इस उलझन में फंस जाते थे कि स्यालकोट पहले हिंदुस्तान में होता था, पर अब सुना है पाकिस्तान में है। क्या पता कि लाहौर जो अब पाकिस्तान में है, कल हिंदुस्तान में चला जाएगा या सारा हिंदुस्तान ही पाकिस्तान बन जाए और यह भी कौन सीने पर हाथ रखकर कह सकता था कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों किसी दिन सिरे से गायब न हो जाएंगे।
एक सिख पागल के केश छिदरे होकर बहुत थोड़े ही रह गए थे। चूंकि वह बहुत कम नहाता था, दाढ़ी और बाल आपस में जम गए थे, जिसके कारण उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गई थी। लेकिन वह आदमी किसी का नुकसान नहीं करता था। पंद्रह वर्षों में उसने किसी से झगड़ा- फसाद नहीं किया था। पागलखाने के जो पुराने नौकर थे, वे उसके बारे में इतना जानते थे कि टोबा टेकसिंह में उसकी कई जमीनें थीं। अच्छा खाता-पीता जमींदार था कि अचानक ही दिमाग उलट गया। उसके रिश्तेदार लोहे की मोटी- मोटी जंजीरों में उसे बांध कर लाए और पागलखाने में दाखिल करा गए।
महीने में एक बार मुलाकात के लिए ये लोग आते थे और उसकी राजी- खुशी मालूम करते चले जाते थे। एक मुद्दत तक यह क्रम चलता रहा लेकिन जब पाकिस्तान- हिंदुस्तान की गड़बड़ शुरू हो गई तो उनका आना बंद हो गया।
उसका नाम बिशनसिंह था, मगर सब उसे टोबा टेकसिंह कहते थे। उसे बिल्कुल यह मालूम न था कि दिन कौन-सा है, महीना कौन-सा है या कितने साल बीत चुके हैं? लेकिन हर महीने जब उसके स्वजन और संबंधी उससे मिलने आते तो उसे अपने आप पता चल जाता था। चुनांचे वह एक दफेदार से कहता कि उसकी मुलाकात आ रही है। उस दिन वह अच्छी तरह से नहाता, बदन पर खूब साबुन घिसता और सिर में तेल लगाकर कंघी करता। अपने कपड़े, जो वह कभी इस्तेमाल नहीं करता था, निकलवाकर पहनता और यूं सज-बनकर मिलनेवालों के पास जाता। वे उससे कुछ पूछते तो वह चुप रहता था या कभी-कभी 'ओपड़ दी एनेक्स दी बेध्याना दी मुंग दी दाल आफ दी लालटेन कह देता।'
उसकी एक लड़की थी जो हर महीने में एक अंगुल बढ़ती-बढ़ती पंद्रह वर्ष में जवान हो गई थी। बिशनसिंह उसे पहचानता ही न था। जब वह बच्ची थी, तब भी अपने बाप को देख कर रोती थी। जवान हुई तब भी उसकी आंखों से आंसू बहते थे।
पाकिस्तान और हिंदुस्तान का किस्सा शुरू हुआ तो उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है? जब संतोषजनक उत्तर न मिला तो उसकी कुरेद दिन-ब-दिन बढ़ती गई। अब मुलाकात भी नहीं आती थी। पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलनेवाले आ रहे हैं, पर अब जैसे उसके दिल की आवाज भी बंद हो गई थी, जो उसे उनके आने की खबर दिया करती थी।
उसकी बड़ी इच्छा थी कि वे लोग आएं, जो उससे सहानुभूति प्रकट करते थे और उसके लिए फल, मिठाइयां और कपड़े लाते थे। वह यदि उनसे पूछता कि टोबा टेकसिंह कहां है तो वे निश्चित बता देते कि पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में है, क्योंकि उसका विचार था कि वे टोबा टेकसिंह ही से आते हैं, जहां उसकी जमीन है।
पागलखाने का एक और पागल ऐसा भी था जो अपने को खुदा कहता था। उससे जब एक दिन बिशनसिंह ने पूछा कि टोबा टेकसिंह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में, तो उसने अपनी आदत के मुताबिक कहकहा लगाया और कहा-' यह न पाकिस्तान में है और न हिंदुस्तान में, इसलिए कि हमने अभी तक हुकम नहीं दिया।'
बिशनसिंह ने खुदा से कई बार मिन्नत -खुशामद से कहा कि वह उसे हुक्म दे दे ताकि झंझट खत्म हो, मगर वह बहुत व्यस्त था, क्योंकि उसे और भी अनगिनत हुक्म देने थे। एक दिन तंग आकर वह उस पर बरस पड़ा, 'ओपड़ दी गडग़ड़ दी एनेक्स दी बेध्याना दी मुंग दी दाल आफ वाहे गुरूजी खालसा, एंड वाहे गुरूजी दी फतह- जो बोले सो निहाल-सत श्री अकाल।'
उसका शायद यह मतलब था कि तुम मुसलमानों के खुदा हो-सिखों के खुदा होते तो जरूर मेरी सुनते।
तबादले के कुछ दिन पहले तक टोबा टेकसिंह का एक मुसलमान, जो उसका दोस्त था, मुलाकात के लिए आया। पहले वह कभी नहीं आया था। जब बिशनसिंह ने उसे देखा तो एक तरफ हटा और वापस जाने लगा। मगर सिपाहियों ने उसे रोका, 'यह तुमसे मिलने आया है-तुम्हारा दोस्त फजलुद्दीन है।'
बिशनसिंह ने फजलुद्दीन को एक नजर देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा। फजलुद्दीन ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा- 'मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूं, लेकिन फुर्सत ही न मिली- तुम्हारे सब आदमी राजी-खुशी हिंदुस्तान चले गए थे। मुझसे जितनी मदद हो सकी, मैंने की तुम्हारी बेटी रूपकौर...।'
वह कुछ कहते- कहते रूक गया। बिशनसिंह कुछ याद करने लगा-' बेटी रूपकौर? '
फजलुद्दीन ने कुछ रूककर कहा -'हां..वह...भी ठीक-ठाक है।...उनके साथ ही चली गई थी।'
बिशनसिंह चुप रहा। फजलुद्दीन ने कहना शुरू किया -'उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम्हारी राजी- खुशी पूछता रहूं। अब मैंने सुना है कि तुम हिंदुस्तान जा रहे हो-भाई बलबीर सिंह और भाई बधवासिंह से मेरा सलाम कहना और बहन अमृतकौर से भी। भाई बलबीर सिंह से कहना फजलुद्दीन राजी-खुशी है। दो भूरी भैंसे, जो वे छोड़ गए थे, उनमें से एक ने कट्टा दिया है, दूसरे के कट्टी हुई थी, पर वह छह दिन की होकर मर गई...और... और मेरे लायक जो खिदमत हो कहना। हर वक्त तैयार हूं... और यह तुम्हारे लिए थोड़े से भरूंडे लाया हूं।'
बिशनसिंह ने भरूंडों की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फजलुद्दीन से पूछा- 'टोबा टेकसिंह कहां?'
'टोबा टेकसिंह!' उसने तनिक आश्चर्य से कहा-'कहां है? वहीं है जहां था।'
बिशनसिंह ने पूछा- 'पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में?'
'हिंदुस्तान में... नहीं नहीं, पाकिस्तान में।' फजलुद्दीन बौखला-सा गया।
बिशनसिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया- 'ओपड़ दी गडग़ड़ दी एनेक्स दी बेध्याना दी मुंग दी दाल ऑफ दी पाकिस्तान एंड हिंदुस्तान ऑफ दी दुर फिट्टे मुंह।' तबादले की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। इधर से उधर और उधर से इधर आनेवाले पागलों की सूचियां पहुंच गई थीं और तबादले की तारीख भी निश्चित हो चुकी थी। सख्त सर्दियां थीं। लाहौर के पागलखाने से हिंदू-सिख पागलों से भरी लारियां पुलिस के दस्ते के साथ रवाना हुईं। संबंधित अफसर भी उनके साथ थे। वाघा बार्डर पर दोनों ओर के सुपरिटेंडेंट एक- दूसरे से मिले और प्रारंभिक कार्यवाही खत्म होने के बाद तबादला शुरू हो गया, जो रात भर जारी रहा।
पागलों को लारियों से निकालना और उनको दूसरे अफसरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था। कुछ तो बाहर निकलते ही नहीं थे, जो निकलने को तैयार होते, उनको संभालना होता, क्योंकि इधर- उधर भाग उठते थे। जो नंगे थे, उनको कपड़े पहनाए जाते थे तो वे फाड़कर अपने शरीर से अलग कर देते। कोई गालियां बक रहा है। कान पड़ी आवाज सुनाई नहीं देती थी। पागल स्त्रियों का शोरगुल अलग था। और सर्दी इतने कड़ाके की थी कि दांत से दांत बज रहे थे।
अधिकतर पागल इस तबादले को नहीं चाहते थे। इसलिए कि उनकी समझ में नहीं आता था कि उन्हें अपनी जगह से उखाड़कर कहां फेंका जा रहा है? थोड़े से वे जो सोच-समझ सकते थे, 'पाकिस्तान जिंदाबाद' के नारे लगा रहे थे। दो-तीन बार झगड़ा होते-होते बचा क्योंकि कुछ हिंदुओं और सिखों को ये नारे सुनकर तैश आ गया था।
जब बिशनसिंह की बारी आई और जब उसको दूसरी ओर भेजने के संबंध में अधिकारी लिखत-पढ़त करने लगे तो उसने पूछा -'टोबा टेकसिंह कहां? पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में?'
संबंधित अधिकारी हंसा, बोला-'पाकिस्तान में। '
यह सुनकर बिशनसिंह उछलकर एक तरफ हटा और दौड़कर अपने शेष साथियों के पास पहुंच गया। पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ ले जाने लगे, किंतु उसने चलने से साफ इनकार कर दिया- 'टोबा टेकसिंह कहां है?' और जोर-जोर से चिल्लाने लगा, 'ओपड़ दी गडग़ड़ दी एनेक्सी दी बेध्याना दी मुंग दी दाल ऑफ टोबा टेकसिंह एंड पाकिस्तान।'
उसे बहुत समझाया गया, 'देखो, टोबा टेकसिंह अब हिंदुस्तान में चला गया है- यदि नहीं गया है तो उसे तुरंत ही भेज दिया जाएगा।' किंतु वह न माना। जब जबरदस्ती दूसरी ओर उसे ले जाने की कोशिशें की गईं तो वह बीच में एक स्थान पर इस प्रकार अपना सूजी हुई टांगों पर खड़ा हो गया, जैसे अब कोई ताकत उसे वहां से हटा नहीं सकेगी। क्योंकि आदमी बेजरर था, इसलिए उसके साथ जबरदस्ती नहीं की गई, उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया और शेष काम होता रहा।
सूरज निकलने से पहले स्तब्ध खड़े हुए बिशनसिंह के गले से एक गगनभेदी चीख निकली। इधर-उधर से कई अफसर दौड़े आए और देखा कि वह आदमी, जो पंद्रह वर्ष तक दिन-रात अपनी टांगों पर खड़ा रहा था, औंधे मुंह लेटा था। इधर कांटेदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था- उधर वैसे ही कांटेदार तारों के पीछे पाकिस्तान। बीच में जमीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था टोबा टेकसिंह पड़ा था।

लघुकथाएँ

-सआदत हसन मंटो


उर्दू अदब में मंटो सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले और बेहद विवादास्पद रचनाकार रहे जिन्होंने विभाजन से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखा और अदब को ठंडा गोश्त, खोल दो, टोबा टेक सिंह, काली सलवार और बू जैसी चर्चित कहानियों के रूप में कई नायाब तोहफे दिये। उन्होंने उर्दू कहानी को एक नयी शैली और बिल्कुल नया मिजाज दिया। उनकी कहानियां मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख देती हैं। सआदत हसन मंटो की कहानियों की जितनी चर्चा बीते दशक में हुई है उतनी उर्दू और हिंदी और दुनिया के दूसरी भाषाओं के कहानीकारों की कम ही हुई है। अपनी कहानियों में विभाजन, दंगों और सांप्रदायिकता पर जितने तीखे कटाक्ष मंटो ने किए उसे देखकर एक ओर तो आश्चर्य होता है कि कोई कहानीकार इतना साहसी और सच को सामने लाने के लिए इतना निर्मम भी हो सकता है लेकिन दूसरी ओर यह तथ्य भी चकित करता है कि अपनी इस कोशिश में मानवीय संवेदनाओं का सूत्र लेखक के हाथों से एक क्षण के लिए भी नहीं छूटता। प्रस्तुत है उनकी चार लघु कहानियाँ -

बेखबरी का फायदा

लबलबी दबी-पिस्तौल से झुँझलाकर गोली बाहर निकली।
खिड़की में से बाहर झाँकनेवाला आदमी उसी जगह दोहरा हो गया।
लबलबी थोड़ी देर बाद फिर दबी– दूसरी गोली भिनभिनाती हुई बाहर निकली।
सड़क पर माशकी की मश्क फटी, वह औंधे मुँह गिरा और उसका लहू मश्क के पानी में हल होकर बहने लगा।
लबलबी तीसरी बार दबी- निशाना चूक गया, गोली एक गीली दीवार में जज़्ब हो गई।
चौथी गोली एक बूढ़ी औरत की पीठ में लगी, वह चीख भी न सकी और वहीं ढेर हो गई।
पाँचवी और छठी गोली बेकार गई, न कोई हलाक हुआ और न  कोई जख्मी।
गोलियाँ चलाने वाला भिन्ना गया।
दफ्तन सड़क पर एक छोटा- सा बच्चा दौड़ता हुआ दिखाई दिया।
गोलियाँ चलाने वाले ने पिस्तौल का मुहँ उसकी तरफ मोड़ा।
उसके साथी ने कहा- यह क्या करते हो?
गोलियां चलाने वाले ने पूछा- क्यों?
गोलियां तो खत्म हो चुकी हैं!
तुम खामोश रहो... इतने- से बच्चे को क्या मालूम?

करामात

लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरु किए।
लोग डर के मारे लूटा हुआ माल रात के अंधेरे में बाहर फेंकने लगे, कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपना माल भी मौका पाकर अपने से अलहदा कर दिया, ताकि कानूनी गिरफ्त से बचे रहें।
एक आदमी को बहुत दिक्कत पेश आई। उसके पास शक्कर की दो बोरियाँ थी जो उसने पंसारी की दुकान से लूटी थीं। एक तो वह जूँ-तूँ रात के अंधेरे में पास वाले कुएँ में फेंक आया, लेकिन जब दूसरी उसमें डालने लगा खुद भी साथ चला गया।
शोर सुनकर लोग इकट्ठे हो गये। कुएँ में रस्सियाँ डाली गईं।
जवान नीचे उतरे और उस आदमी को बाहर निकाल लिया गया।
लेकिन वह चंद घंटों के बाद मर गया।
दूसरे दिन जब लोगों ने इस्तेमाल के लिए उस कुएँ में से पानी निकाला तो वह मीठा था।
उसी रात उस आदमी की कब्र पर दीए जल रहे थे।

खबरदार

बलवाई मालिक मकान को बड़ी मुश्किलों से घसीटकर बाहर लाए। कपड़े झाड़कर वह उठ खड़ा हुआ और बलवाइयों से कहने लगा- तुम मुझे मार डालो, लेकिन खबरदार, जो मेरे रुपए- पैसे को हाथ लगाया...!
हलाल और झटका
मैंने उसकी शहरग पर छुरी रखी, हौले- हौले फेरी और उसको हलाल कर दिया।
यह तुमने क्या किया?
क्यों?
इसको हलाल क्यों किया?
मजा आता है इस तरह।
मजा आता है के बच्चे...तुझे झटका करना चाहिए था... इस तरह।
और हलाल करने वाले की गर्दन का झटका हो गया।
(शहरग- शरीर का सबसे बड़ा शिरा जो हृदय में मिलता है)

Nov 24, 2012

जन्म शताब्दी वर्ष



मंटो- सुकून की तलाश और रचना
इधर मंटो की ये साहित्यिक गतिविधियाँ चल रही थीं और उधर उसके दिल में आगे पढऩे की ख्वाहिश पैदा हो गई। आखिर फरवरी 1934 को 22 साल की उम्र में उसने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। यह यूनिवर्सिटी उन दिनों प्रगतिशील मुस्लिम नौजवानों का गढ़ बनी हुई थी।
अली सरदार जा$फरी से मंटो की मुलाकात यहीं हुई और यहाँ के माहौल ने उसके मन में कुलबुलाती रचनात्मकता को उकसाया। उसने अफसाने लिखने शुरू कर दिए। तमाशा के बाद दूसरा अफसाना उसने इनकिलाब पसंद नाम से यहाँ आकर ही लिखा, जो अलीगढ़ मैगजीन में प्रकाशित हुआ।
यह मार्च 1935 की बात है। फिर तो सिलसिला शुरू हो गया और 1936 में मंटो का पहला मौलिक उर्दू कहानियों का संग्रह प्रकाशित हुआ, शीर्षक था आतिशपारे ।
अलीगढ़ में सारी दिलचस्पियों के बावजूद मंटो वहाँ अधिक नहीं ठहर सका और एक साल पूरा होने से पहले ही अमृतसर लौट गया।
वहाँ से वह लाहौर चला गया, जहाँ उसने कुछ दिन पारस नाम के एक अखबार में काम किया और कुछ दिन के लिए मुसव्विर  नामक साप्ताहिक का संपादन किया।
मगर उसे वहाँ सुकून नाम की कोई चीज मयस्सर नहीं हुई और थोड़े ही दिनों में लाहौर को अलविदा कहकर वह बंबई पहुँच गया। चार साल बंबई में बिताए और कुछ पत्रिकाओं का संपादन तथा फिल्मों के लिए लेखन करता रहा।
जनवरी 1941 में दिल्ली आकर ऑल इंडिया रेडियो में काम करना शुरु किया। यहाँ मंटो सिर्फ 17 महीने रहा, लेकिन यह अर्सा उसकी रचनात्मकता का स्वर्णकाल था।
इस दौरान उसके रेडियो-नाटकों के चार संग्रह प्रकाशित हुए आओ...,  मंटो के ड्रामे,  जनाजे  तथा तीन औरतें । उसके विवादास्पद अफसानों का मजमूआ धुआं और समसामयिक विषयों पर लिखे गए लेखों का संग्रह मंटो के मजामीन भी दिल्ली-प्रवास के दौरान ही प्रकाशित हुए। मगर उसकी बेचैन रूह फिर उसे मुंबई खींच ले गई।
जुलाई 1942 के आसपास मंटो मुंबई आया और जनवरी 1948 तक वहाँ रहा। फिर वह पाकिस्तान चला गया। मुंबई के इस दूसरे प्रवास में उसका एक बहुत महत्वपूर्ण संग्रह चुगद प्रकाशित हुआ, जिसमें चुगद के अलावा उसका एक बेहद चर्चित अफसाना बाबू गोपीनाथ भी शामिल था।
पाकिस्तान जाने के बाद उसके 14 कहानी संग्रह प्रकाशित हुए, जिनमें 161 अफसाने संग्रहीत थे। इन अफसाने में सियाह हाशिए, नंगी आवाजें, लाइसेंस, खोल दो, टेटवाल का कुत्ता, मम्मी, टोबा टेक सिंह, फुंदने, बिजली पहलवान, बू, ठंडा गोश्त, काली शलवार और हतक जैसे तमाम चर्चित अफसाने शामिल हैं।
मुंबई के अपने पहले और दूसरे प्रवास में मंटो ने साहित्यिक लेखन के अलावा फिल्मी पत्रकारिता की और फिल्मों के लिए कहानियाँ व पटकथाएँ लिखीं, जिनमें अपनी नगरिया, आठ दिन व मिर्जा गालिब ख़ासतौर पर चर्चित रहीं।
के आसिफ ने जब पहले-पहल अनारकली के थीम पर फिल्म बनाने का फैसला किया, तो मंटो ने आसिफ के साथ मिलकर उसकी कहानी पर काफी मेहनत की थी, लेकिन उस वक्त फिल्म पर किन्हीं कारणों से काम आगे नहीं बढ़ सका था। बाद में जब उसी थीम पर मुगले-आजम  के नाम से काम शुरू हुआ, तो मंटो लाहौर जा चुका था।
यह एक इत्तेफाक ही है कि 18 जनवरी 1955 को जब लाहौर में मंटो का इंतकाल हुआ, तो उसकी लिखी हुई फिल्म मिर्जा गालिब दिल्ली में हाउसफुल जा रही थी।
मुकदमे
मंटो का जन्म 11 मई 1912 को पुश्तैनी बैरिस्टरों के परिवार में हुआ था, अपनी बयालीस साल, आठ महीने और सात दिन की जिंदगी में मंटो को लिखने के लिए सिर्फ 19 साल मिले और इन 19 सालों में उसने 230 कहानियाँ, 67 रेडियो नाटक, 22 खाके (शब्द चित्र) और 70 लेख लिखे।
लेकिन रचनाओं की यह गिनती शायद उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, जितनी महत्वपूर्ण यह बात है कि उसने 50 बरस पहले जो कुछ लिखा, उसमें आज की हकीकत सिमटी हुई नजर आती है और यह हकीकत को उसने ऐसी तल्ख जुबान में पेश किया कि समाज के अलंबरदारों की नींद हराम हो गई।
नतीजतन उसकी पांच कहानियों पर मुकदमे चले, जिनके क्रमवार शीर्षक हैं, काली शलवार, धुआं, बू, ठंडा गोश्त और ऊपर, नीचे और दरमियाँ। इन मुकदमों के दौरान मंटो की जिल्लत उठानी पड़ी।
अदालतों के चक्कर लगाने में उसका भुरकस निकल गया।, लेकिन उसे अपने किए पर कोई पछतावा नहीं रहा।
सआदत हसन मंटो की कहानियों की जितनी चर्चा बीते दशक में हुई है उतनी शायद उर्दू और हिंदी और शायद दुनिया के दूसरी भाषाओं के कहानीकारों की कम ही हुई है।
चेख़व के बाद मंटो ही थे जिन्होंने अपनी कहानियों के दम पर अपनी जगह बना ली यानी उन्होंने कोई उपन्यास नहीं लिखा।
अपनी कहानियों में विभाजन, दंगों और सांप्रदायिकता पर जितने तीखे कटाक्ष मंटो ने किए उसे देखकर एक ओर तो आश्चर्य होता है कि कोई कहानीकार इतना साहसी और सच को सामने लाने के लिए इतना निर्मम भी हो सकता है, लेकिन दूसरी ओर यह तथ्य भी चकित करता है कि अपनी इस कोशिश में मानवीय संवेदनाओं का सूत्र लेखक के हाथों से एक क्षण के लिए भी नहीं छूटता।

Oct 27, 2012

मंटो का पहला अफसाना



मंटो का पहला अफसाना
मंटो की जिन्दगी-  बयालीस साल, आठ महीने और सात दिन की जिंदगी में सआदत हसन मंटो को लिखने के लिए सिर्फ 19 साल मिले और इन 19 सालों में उसने 230 कहानियाँ, 67 रेडियो नाटक, 22 खाके (शब्द चित्र) और 70 लेख लिखे।
बैरिस्टर के बेटे से लेखक होने तक-  मंटो का जन्म 11 मई 1912 को पुश्तैनी बैरिस्टरों के परिवार में हुआ था। उसके वालिद खुद एक नामी बैरिस्टर और सेशंस जज थे। और माँ? सुनिए बकलम मंटो 'उसके वालिद, खुदा उन्हें बख्शे, बड़े सख्तगीर थे और उसकी वालिदा बेहद नर्म दिल। इन दो पाटों के अंदर पिसकर यह दाना-ए-गुंदम किस शक्ल में बाहर आया होगा, इसका अंदाजा आप कर सकते हैं।‘
बचपन से ही मंटो बहुत जहीन था, मगर शरारती भी कम नहीं था, जिसके चलते एंट्रेंस इम्तहान उसने दो बार फेल होने के बाद पास किया। इसकी एक वजह उसका उर्दू में कमजोर होना भी था। उन्हीं दिनों के आसपास उसने तीन-चार दोस्तों के साथ मिलकर एक ड्रामेटिक क्लब खोला था और आगा हश्र का एक ड्रामा स्टेज करने का इरादा किया था। 'यह क्लब सिर्फ 15-20 रोज कायम रह सका था, इसलिए कि वालिद साहब ने एक रोज धावा बोलकर हारमोनियम और तबले सब तोड़-फोड़ दिए थे और वाजे अल्$फाज में बता दिया था कि ऐसे वाहियात शगल उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं।‘
एंट्रेंस तक की पढ़ाई उसने अमृतसर के मुस्लिम हाईस्कूल में की थी। 1931 में उसने हिंदू सभा कॉलेज में दाखिला लिया। उन दिनों पूरे देश में और खासतौर पर अमृतसर में आजादी का आंदोलन पूरे उभार पर था। जलियांवाला बाग का नरसंहार 1919 में हो चुका था जब मंटो की उम्र कुल सात साल की थी, लेकिन उस के बाल मन पर उसकी गहरी छाप थी।
पहला अफ़साना
क्रांतिकारी गतिविधियां बराबर जल रही थीं और गली-गली में 'इंकलाब जिंदाबाद’  के नारे सुनाई पड़ते थे। दूसरे नौजवानों की तरह मंटो भी चाहता था कि जुलूसों और जलसों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले और नारे लगाए, लेकिन वालिद की सख्तीगीरी के सामने वह मन मसोसकर रह जाता।
आखिरकार उसका यह रुझान अदब से मुखातिब हो गया। उसने पहला अ$फसाना लिखा 'तमाशा’, जिसमें जलियाँवाला नरसंहार को एक सात साल के बच्चे की नजर से देखा गया है। इसके बाद कुछ और अ$फसाने भी उसने क्रांतिकारी गतिविधियों के असर में लिखे।
1932 में मंटो के वालिद का देहांत हो गया। भगत सिंह को उससे पहले फाँसी दी जा चुकी थी। मंटो ने अपने कमरे में वालिद के फोटो के नीचे भगत सिंह की मूर्ति रखी और कमरे के बाहर एक तख्ती पर लिखा-'लाल कमरा।‘
जाहिर है कि रूसी साम्यवादी साहित्य में उसकी दिलचस्पी बढ़ रही थी। इन्हीं दिनों उसकी मुलाकात अब्दुल बारी नाम के एक पत्रकार से हुई, जिसने उसे रूसी साहित्य के साथ-साथ फ्रांसीसी साहित्य भी पढऩे के लिए प्रेरित किया और उसने विक्टर ह्यूगो, लॉर्ड लिटन, गोर्की, चेखव, पुश्किन, ऑस्कर वाइल्ड, मोपासां आदि का अध्ययन किया।
अब्दुल बारी की प्रेरणा पर ही उसने विक्टर ह्यूगो के एक ड्रामे 'द लास्ट डेज ऑफ ए कंडेम्ड’ का उर्दू में तर्जुमा किया, जो 'सरगुजश्त-ए-असीर’ शीर्षक से लाहौर से प्रकाशित हुआ।
यह ड्रामा ह्यूगो ने मृत्युदंड के विरोध में लिखा था, जिसका तर्जुमा करते हुए मंटो ने महसूस किया कि इसमें जो बात कही गई है वह उसके दिल के बहुत करीब है। अगर मंटो के अ$फसानों को ध्यान से पढ़ा जाए, तो यह समझना मुश्किल नहीं होगा कि इस ड्रामे ने उसके रचनाकर्म को कितना प्रभावित किया था। विक्टर ह्यूगो के इस तर्जुमे के बाद मंटो ने ऑस्कर वाइल्ड से ड्रामे 'वेरा’ का तर्जुमा शुरू किया।
इस ड्रामे की पृष्ठभूमि 1905 का रूस है और इसमें जार की क्रूरताओं के खिलाफ वहाँ के नौजवानों का विद्रोह ओजपूर्ण भाषा में अंकित किया गया है। इस ड्रामे का मंटो और उसके साथियों के दिलों-दिमाग पर ऐसा असर हुआ कि उन्हें अमृतसर की हर गली में मॉस्को दिखाई देने लगा।
दो ड्रामों का अनुवाद कर लेने के बाद मंटो ने अब्दुल बारी के ही कहने पर रूसी कहानियों का एक संकलन तैयार किया और उन्हें उर्दू में रूपांतरित करके 'रूसी अफ़साने’ शीर्षक से प्रकाशित करवाया। इन तमाम अनुवादों और फ्रांसीसी तथा रूसी साहित्य के अध्ययन से मंटो के मन में कुछ मौलिक लिखने की कुलबुलाहट होने लगी, तो उसने पहला अफ़साना लिखा 'तमाशा’, जिसका जिक्र ऊपर हो चुका है।

Sep 27, 2012

जन्म -शताब्दी वर्ष

मैं अफसाना क्यों कर लिखता हूँ?

- सआदत हसन मंटो
मुझसे कहा गया है कि मैं यह बताऊँ कि मैं अफसाना क्यों कर लिखता हूँ? यह 'क्यों कर' मेरी समझ में नहीं आया। 'क्यों कर' का अर्थ शब्दकोश में तो यह मिलता है- कैसे और किस तरह?
अब आपको क्या बताऊँ कि मैं अफसाना क्यों कर लिखता हूँ। यह बड़ी उलझन की बात है। अगर में 'किस तरह' को पेशनजर रखूं तो यह जवाब दे सकता हूँ कि अपने कमरे में सोफे पर बैठ जाता हूँ। कागज-कलम पकड़ता हूँ और बिस्मिल्लाह करके अफसाना लिखना शुरू कर देता हूँ। मेरी तीन बच्चियाँ शोर मचा रही होती हैं। मैं उनसे बातें भी करता हूँ। उनकी आपसी लड़ाइयों का फैसला भी करता हूँ, अपने लिए 'सलाद' भी तैयार करता हूँ। अगर कोई मिलने वाला आ जाए तो उसकी खातिरदारी भी करता हूँ, मगर अफसाना लिखे जाता हूँ।
अब 'कैसे' सवाल आए तो मैं कहूँगा कि मैं वैसे ही अफसाने लिखता हूँ जिस तरह खाना खाता हूँ, गुसल करता हूँ, सिगरेट पीता हूँ और झक मारता हूँ।
अगर यह पूछा जाए कि मैं अफसाना 'क्यों' लिखता हूँ तो इसका जवाब हाजिर है।
मैं अफसाना अव्वल तो इसलिए लिखता हूँ कि मुझे अफसाना लिखने की शराब की तरह लत पड़ी हुई है। मैं अफसाना न लिखूं तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि मैंने कपड़े नहीं पहने हैं या मैंने गुसल नहीं किया या मैंने शराब नहीं पी।
मैं अफसाना नहीं लिखता, हकीकत यह है कि अफसाना मुझे लिखता है। मैं बहुत कम पढ़ा लिखा आदमी हूँ। यूँ तो मैंने 20 से ऊपर किताबें लिखी हैं, लेकिन मुझे कभी-कभी हैरत होती है कि यह कौन है जिसने इस कदर अच्छे अफसाने लिखे हैं, जिन पर आए दिन मुकद्दमे चलते रहते हैं।
जब कलम मेरे हाथ में न हो तो मैं सिर्फ सआदत हसन होता हूँ जिसे उर्दू आती है न फारसी, न अंग्रेजी, न फ्रांसीसी।
अफसाना मेरे दिमाग में नहीं, जेब में होता है जिसकी मुझे कोई ख़बर नहीं होती। मैं अपने दिमाग पर जोर देता हूँ कि कोई अफसाना निकल आए। कहानीकार बनने की भी बहुत कोशिश करता हूँ, सिगरेट फूंकता रहता हूँ मगर अफसाना दिमाग से बाहर नहीं निकलता है। आखरी थक-हार कर बाँझ औरत की तरह लेट जाता हूँ।
अनलिखे अफसाने के दाम पेशगी वसूल कर चुका हूँ। इसलिए बड़ी कोफ्त होती है। करवटें बदलता हूँ। उठकर अपनी चिडिय़ों को दाने डालता हूँ। बच्चों को झूला झुलाता हूँ। घर का कूड़ा-करकट साफ करता हूँ। जूते, नन्हे मुन्हें जूते, जो घर में जहाँ-तहाँ बिखरे होते हैं, उठाकर एक जगह रखता हूँ। मगर कम्बखत अफसाना जो मेरी जेब में पड़ा होता है मेरे जहन में नहीं उतरता और मैं तिलमिलाता रहता हूँ।
जब बहुत ज़्यादा कोफ्त होती है तो बाथरूम में चला जाता हूँ, मगर वहाँ से भी कुछ हासिल नहीं होता।
सुना हुआ है कि हर बड़ा आदमी गुसलखाने में सोचता है। मगर मुझे तजुर्बे से यह मालूम हुआ है कि मैं बड़ा आदमी नहीं, इसलिए कि मैं गुसलखाने में नहीं सोच सकता। लेकिन हैरत है कि फिर भी मैं हिंदुस्तान और पाकिस्तान का बहुत बड़ा कहानीकार हूँ।
मैं यही कह सकता हूँ कि या तो यह मेरे आलोचकों की खुशफहमी है या मैं उनकी आँखों में धूल झोंक रहा हूँ। उन पर कोई जादू कर रहा हूँ।
माफ कीजिएगा, मैं गुसलखाने में चला गया। किस्सा यह है कि मैं खुदा को हाजिर-नाजिर रखकर कहता हूँ कि मुझे इस बारे में कोई इल्म नहीं कि मैं अफसाना क्यों कर लिखता हूँ और कैसे लिखता हूँ। अक्सर ऐसा हुआ है कि जब मैं लाचार हो गया हूँ तो मेरी बीवी, जो संभव है यहाँ मौजूद है, आई उसने मुझसे यह कहा है, 'आप सोचिए नहीं, कलम उठाइए और लिखना शुरू कर दीजिए।'
मैं इसके कहने पर कलम या पैंसिल उठाता हूँ और लिखना शुरू कर देता हूँ- दिमाग बिल्कुल खाली होता है लेकिन जेब भरी होती है, खुद-ब-खुद कोई अफसाना उछलकर बाहर आ जाता है।
मैं खुद को इस दृष्टि से कहानीकार, नहीं, जेबकतरा समझता हूँ जो अपनी जेब खुद ही काटता है और आपके हवाले कर देता हूँ- मुझ जैसा भी बेवकूफ दुनिया में कोई और होगा?

Aug 25, 2012

टोबा टेकसिंह

- सआदत हसन मंटो
बंटवारे के दो- तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की सरकारों को ख्याल आया कि साधारण कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए। यानी जो मुसलमान पागल हिंदुस्तान के पागलखाने में हैं, उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाए और जो हिंदू पाकिस्तान के पागलखानों में हैं, उन्हें हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया जाए।
मालूम नहीं यह बात ठीक थी या नहीं। बहरहाल बुद्धिमानों के फैसले के अनुसार इधर- उधर ऊंचे स्तर की कांफ्रेंस हुई और आखिरकार एक दिन पागलों के तबादलों के लिए नियत हो गया। अच्छी तरह छानबीन की गई। वे मुसलमान पागल, जिनके अभिभावक हिंदुस्तान में थे, वहीं रहने दिए गए थे। और जो बाकी थे, उन्हें सीमा पर रवाना कर दिया गया था। यहां पाकिस्तान से, क्योंकि करीब- करीब सब हिंदू- सिख जा चुके थे, इसलिए किसी को रखने- रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिंदू- सिख पागल थे, सबके सब पुलिस के संरक्षण में सीमा पर पहुंचा दिए गए। उधर की मालूम नहीं, लेकिन इधर लाहौर के पागलखाने में जब इस तबादले की खबर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प और कौतूकपूर्ण बातें होने लगीं। एक मुसलमान पागल, जो बारह बरस से रोजाना बकायदगी के साथ नमाज पढ़ता था, उससे जब उसके दोस्त ने पूछा-मौलवी साहब, यह पाकिस्तान क्या होता है? तो उसने बड़ा सोच- विचारकर जवाब दिया -'हिंदुस्तान में एक जगह है, जहां उस्तरे बनते हैं।'
यह जवाब सुनकर उसका मित्र संतुष्ट हो गया।
इसी तरह एक सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा-'सरदार जी, हमें हिंदुस्तान क्यों भेजा जा रहा है? हमें तो वहां की बोली भी नहीं आती।'
दूसरा मुस्करा दिया- 'मुझे तो हिंदुस्तान की बोली आती है-हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़- आकड़ फिरते हैं-।'
एक मुसलमान पागल ने नहाते- नहाते पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा इस जोर से बुलंद किया कि फर्श पर फिसलकर गिरा और अचेत हो गया। कुछ पागल ऐसे भी थे जो पागल नहीं थे। इनमें अधिकतर ऐसे कातिल थे, जिनके रिश्तेदारों ने अफसरों को दे-दिलाकर पागलखाने भिजवा दिया था कि वे फांसी के फंदे से बच जाएं।
ये कुछ- कुछ समझते थे कि हिंदुस्तान का क्यों विभाजन हुआ है और यह पाकिस्तान क्या है, लेकिन सभी घटनाओं से ये भी बेखबर थे। अखबारों से कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ जाहिल थे। उनकी बातचीत से भी वे कोई नतीजा नहीं निकाल सकते थे। उनको सिर्फ इतना मालूम था कि एक आदमी मुहम्मद अली जिन्ना है, जिसको कायदे- आजम कहते हैं। उसने मुसलमानों के लिए एक अलग मुल्क बनाया है, जिसका नाम पाकिस्तान है। वह कहां है? इसकी स्थिति क्या है? इसके विषय में वे कुछ नहीं जानते थे। यही कारण है कि पागलखाने में वे सब पागल, जिनका दिमाग पूरी तरह से खराब नहीं था, इस ऊहापोह में थे कि वे पाकिस्तान में हैं या हिंदुस्तान में। अगर हिंदुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहां है और अगर वे पाकिस्तान में हैं तो यह कैसे हो सकता है कि कुछ अर्सा पहले यहां रहते हुए भी हिंदुस्तान में थे। एक पागल तो पाकिस्तान और हिंदुस्तान और हिंदुस्तान और पाकिस्तान के चक्कर में ऐसा पड़ा कि और ज्यादा पागल हो गया। झाडू देते- देते एक दिन दरख्त पर चढ़ गया और एक टहनी पर बैठकर दो घंटे लगातार भाषण देता रहा, जो पाकिस्तान और हिंदुस्तान के नाजुक मामले पर था। सिपाहियों ने उसे नीचे उतरने के लिए कहा तो वह और ऊपर चढ़ गया। डराया- धमकाया गया तो उसने कहा - 'मैं न हिंदुस्तान में रहना चाहता हूं न पाकिस्तान में, मैं इस पेड़ पर ही रहूंगा।'
बड़ी मुश्किल के बाद जब उसका दौरा ठंडा पड़ गया, तो वह नीचे उतरा और अपने हिंदू- सिख दोस्तों से गले मिल- मिलकर रोने लगा। इस ख्याल से उसका दिल भर आया कि वे उसे छोड़कर हिंदुस्तान चले जाएंगे।
एक एम. एस. सी. पास रेडियो इंजीनियर, जो मुसलमान था और दूसरे पागलों से बिलकुल अलग- थलग बाग की एक खास रौश पर सारा दिन खामोश टहलता रहता था, में यह तब्दीली प्रकट हुई कि उसने तमाम कपड़े उतारकर दफेदार के हवाले कर दिए और नंग-धड़ंग सारे बाग में चलना शुरू कर दिया।
चनयूट एक मोटे मुसलमान पागल ने, जो मुस्लिम लीग का एक सक्रिय कार्यकर्ता रह चुका था और दिन में पंद्रह- सोलह बार नहाया करता, एकदम नई आदत छेड़ दी। उसका नाम मुहम्मद अली जिन्ना है। उसकी देखा- देखी एक सिख पागल मास्टर तारासिंह बन गया। करीब था कि उस जंगल में खूनखराबा हो जाए, मगर दोनों को खतरनाक पागल करार देकर अलग बंद कर दिया गया।
लाहौर का एक नौजवान हिंदू वकील था, जो मुहब्बत में पड़कर पागल हो गया था। जब उसने सुना कि अमृतसर हिंदुस्तान में चला गया है तो उसे बहुत दुख हुआ। उसी शहर की एक हिंदू लड़की से उसे प्रेम हो गया था। यद्यपि उसने उस वकील को ठुकरा दिया था, मगर दीवानगी की हालत में भी वह उसको भूला नहीं था। चुनांचे वह उन तमाम मुस्लिम लीडरों को गालियां देता था, जिन्होंने मिल-मिलाकर हिंदुस्तान के दो टुकड़े कर दिए। उसकी प्रेमिका हिंदुस्तानी बन गई और वह पाकिस्तानी।
जब तबादले की बात शुरू हुई तो वकील को पागलों ने समझाया। वह दिल छोटा न करे, उसको हिंदुस्तान भेज दिया जाएगा-उस हिंदुस्तान में, जहां उसकी प्रेमिका रहती है, मगर वह लाहौर छोडऩा नहीं चाहता था, इस ख्याल से कि अमृतसर में उसकी प्रेक्टिस नहीं चलेगी। यूरोपियन वार्ड में दो ऐंग्लो-इंडियन पागल थे। उनको जब मालूम हुआ कि हिंदुस्तान को आजाद कर अंग्रेज चले गए हैं तो उनको बड़ा दुख हुआ। वे छिप-छिपकर घंटों इस समस्या पर बातचीत करते रहते कि पागलखाने में उनकी हैसियत किस तरह की होगी- यूरोपीय वार्ड रहेगा या जाएगा। ब्रेकफास्ट मिला करेगा या नहीं। क्या उन्हें डबल रोटी के बजाए ब्लडी इंडियन चपाती तो जहर मार नहीं करनी पड़ेगी?
एक सिख था, जिसको पागलखाने में दाखिल हुए पंद्रह वर्ष हो चुके थे। हर समय उसकी जबान से अजीब- गरीब शब्द सुनने में आते थे, 'ओपड़ दी गडग़ड़ दा एनेक्स दी बेध्याना दी मुंग दी दाल आफ दी लालटेन।'
अलबत्ता कभी-कभी दीवार के साथ लगा लेता था तो भी हर समय खड़े रहने से उसके पांव सूज गए थे। पिंडलियां भी फैल गईं थीं, मगर इस शारीरिक तकलीफ के बावजूद लेटकर आराम नहीं करता था। हिंदुस्तान-पाकिस्तान और पागलों के तबादले के विषय में जब कभी पागलों में चर्चा होती थी तो वह बड़े ध्यान से सुनता था। कोई उससे पूछता कि उसका क्या ख्याल है तो वह बड़ी गंभीरता से जवाब देता 'ओपड़ दी गडग़ड़ दी एनेक्स दी बेध्याना दी मूंग दी दाल आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट।'
लेकिन बाद में आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट की जगह आफ दी टोबा टेकसिंह ने ले ली और उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू कर किया कि टोबा टेकसिंह कहां है, कहां का रहनेवाला है? लेकिन किसी को भी मालूम नहीं था कि वह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में। जो बताने की कोशिश करते थे, खुद इस उलझन में फंस जाते थे कि स्यालकोट पहले हिंदुस्तान में होता था, पर अब सुना है पाकिस्तान में है। क्या पता कि लाहौर जो अब पाकिस्तान में है, कल हिंदुस्तान में चला जाएगा या सारा हिंदुस्तान ही पाकिस्तान बन जाए और यह भी कौन सीने पर हाथ रखकर कह सकता था कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों किसी दिन सिरे से गायब न हो जाएंगे।
एक सिख पागल के केश छिदरे होकर बहुत थोड़े ही रह गए थे। चूंकि वह बहुत कम नहाता था, दाढ़ी और बाल आपस में जम गए थे, जिसके कारण उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गई थी। लेकिन वह आदमी किसी का नुकसान नहीं करता था। पंद्रह वर्षों में उसने किसी से झगड़ा- फसाद नहीं किया था। पागलखाने के जो पुराने नौकर थे, वे उसके बारे में इतना जानते थे कि टोबा टेकसिंह में उसकी कई जमीनें थीं। अच्छा खाता-पीता जमींदार था कि अचानक ही दिमाग उलट गया। उसके रिश्तेदार लोहे की मोटी- मोटी जंजीरों में उसे बांध कर लाए और पागलखाने में दाखिल करा गए।
महीने में एक बार मुलाकात के लिए ये लोग आते थे और उसकी राजी- खुशी मालूम करते चले जाते थे। एक मुद्दत तक यह क्रम चलता रहा लेकिन जब पाकिस्तान- हिंदुस्तान की गड़बड़ शुरू हो गई तो उनका आना बंद हो गया।
उसका नाम बिशनसिंह था, मगर सब उसे टोबा टेकसिंह कहते थे। उसे बिल्कुल यह मालूम न था कि दिन कौन-सा है, महीना कौन-सा है या कितने साल बीत चुके हैं? लेकिन हर महीने जब उसके स्वजन और संबंधी उससे मिलने आते तो उसे अपने आप पता चल जाता था। चुनांचे वह एक दफेदार से कहता कि उसकी मुलाकात आ रही है। उस दिन वह अच्छी तरह से नहाता, बदन पर खूब साबुन घिसता और सिर में तेल लगाकर कंघी करता। अपने कपड़े, जो वह कभी इस्तेमाल नहीं करता था, निकलवाकर पहनता और यूं सज-बनकर मिलनेवालों के पास जाता। वे उससे कुछ पूछते तो वह चुप रहता था या कभी-कभी 'ओपड़ दी एनेक्स दी बेध्याना दी मुंग दी दाल आफ दी लालटेन कह देता।'
उसकी एक लड़की थी जो हर महीने में एक अंगुल बढ़ती-बढ़ती पंद्रह वर्ष में जवान हो गई थी। बिशनसिंह उसे पहचानता ही न था। जब वह बच्ची थी, तब भी अपने बाप को देख कर रोती थी। जवान हुई तब भी उसकी आंखों से आंसू बहते थे।
पाकिस्तान और हिंदुस्तान का किस्सा शुरू हुआ तो उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है? जब संतोषजनक उत्तर न मिला तो उसकी कुरेद दिन-ब-दिन बढ़ती गई। अब मुलाकात भी नहीं आती थी। पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलनेवाले आ रहे हैं, पर अब जैसे उसके दिल की आवाज भी बंद हो गई थी, जो उसे उनके आने की खबर दिया करती थी।
उसकी बड़ी इच्छा थी कि वे लोग आएं, जो उससे सहानुभूति प्रकट करते थे और उसके लिए फल, मिठाइयां और कपड़े लाते थे। वह यदि उनसे पूछता कि टोबा टेकसिंह कहां है तो वे निश्चित बता देते कि पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में है, क्योंकि उसका विचार था कि वे टोबा टेकसिंह ही से आते हैं, जहां उसकी जमीन है।
पागलखाने का एक और पागल ऐसा भी था जो अपने को खुदा कहता था। उससे जब एक दिन बिशनसिंह ने पूछा कि टोबा टेकसिंह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में, तो उसने अपनी आदत के मुताबिक कहकहा लगाया और कहा-' यह न पाकिस्तान में है और न हिंदुस्तान में, इसलिए कि हमने अभी तक हुकम नहीं दिया।'
बिशनसिंह ने खुदा से कई बार मिन्नत -खुशामद से कहा कि वह उसे हुक्म दे दे ताकि झंझट खत्म हो, मगर वह बहुत व्यस्त था, क्योंकि उसे और भी अनगिनत हुक्म देने थे। एक दिन तंग आकर वह उस पर बरस पड़ा, 'ओपड़ दी गडग़ड़ दी एनेक्स दी बेध्याना दी मुंग दी दाल आफ वाहे गुरूजी खालसा, एंड वाहे गुरूजी दी फतह- जो बोले सो निहाल-सत श्री अकाल।'
उसका शायद यह मतलब था कि तुम मुसलमानों के खुदा हो-सिखों के खुदा होते तो जरूर मेरी सुनते।
तबादले के कुछ दिन पहले तक टोबा टेकसिंह का एक मुसलमान, जो उसका दोस्त था, मुलाकात के लिए आया। पहले वह कभी नहीं आया था। जब बिशनसिंह ने उसे देखा तो एक तरफ हटा और वापस जाने लगा। मगर सिपाहियों ने उसे रोका, 'यह तुमसे मिलने आया है-तुम्हारा दोस्त फजलुद्दीन है।'
बिशनसिंह ने फजलुद्दीन को एक नजर देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा। फजलुद्दीन ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा- 'मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूं, लेकिन फुर्सत ही न मिली- तुम्हारे सब आदमी राजी-खुशी हिंदुस्तान चले गए थे। मुझसे जितनी मदद हो सकी, मैंने की तुम्हारी बेटी रूपकौर...।'
वह कुछ कहते- कहते रूक गया। बिशनसिंह कुछ याद करने लगा-' बेटी रूपकौर? '
फजलुद्दीन ने कुछ रूककर कहा -'हां..वह...भी ठीक-ठाक है।...उनके साथ ही चली गई थी।'
बिशनसिंह चुप रहा। फजलुद्दीन ने कहना शुरू किया -'उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम्हारी राजी- खुशी पूछता रहूं। अब मैंने सुना है कि तुम हिंदुस्तान जा रहे हो-भाई बलबीर सिंह और भाई बधवासिंह से मेरा सलाम कहना और बहन अमृतकौर से भी। भाई बलबीर सिंह से कहना फजलुद्दीन राजी-खुशी है। दो भूरी भैंसे, जो वे छोड़ गए थे, उनमें से एक ने कट्टा दिया है, दूसरे के कट्टी हुई थी, पर वह छह दिन की होकर मर गई...और... और मेरे लायक जो खिदमत हो कहना। हर वक्त तैयार हूं... और यह तुम्हारे लिए थोड़े से भरूंडे लाया हूं।'
बिशनसिंह ने भरूंडों की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फजलुद्दीन से पूछा- 'टोबा टेकसिंह कहां?'
'टोबा टेकसिंह!' उसने तनिक आश्चर्य से कहा-'कहां है? वहीं है जहां था।'
बिशनसिंह ने पूछा- 'पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में?'
'हिंदुस्तान में... नहीं नहीं, पाकिस्तान में।' फजलुद्दीन बौखला-सा गया।
बिशनसिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया- 'ओपड़ दी गडग़ड़ दी एनेक्स दी बेध्याना दी मुंग दी दाल ऑफ दी पाकिस्तान एंड हिंदुस्तान ऑफ दी दुर फिट्टे मुंह।' तबादले की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। इधर से उधर और उधर से इधर आनेवाले पागलों की सूचियां पहुंच गई थीं और तबादले की तारीख भी निश्चित हो चुकी थी। सख्त सर्दियां थीं। लाहौर के पागलखाने से हिंदू-सिख पागलों से भरी लारियां पुलिस के दस्ते के साथ रवाना हुईं। संबंधित अफसर भी उनके साथ थे। वाघा बार्डर पर दोनों ओर के सुपरिटेंडेंट एक- दूसरे से मिले और प्रारंभिक कार्यवाही खत्म होने के बाद तबादला शुरू हो गया, जो रात भर जारी रहा।
पागलों को लारियों से निकालना और उनको दूसरे अफसरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था। कुछ तो बाहर निकलते ही नहीं थे, जो निकलने को तैयार होते, उनको संभालना होता, क्योंकि इधर- उधर भाग उठते थे। जो नंगे थे, उनको कपड़े पहनाए जाते थे तो वे फाड़कर अपने शरीर से अलग कर देते। कोई गालियां बक रहा है। कान पड़ी आवाज सुनाई नहीं देती थी। पागल स्त्रियों का शोरगुल अलग था। और सर्दी इतने कड़ाके की थी कि दांत से दांत बज रहे थे।
अधिकतर पागल इस तबादले को नहीं चाहते थे। इसलिए कि उनकी समझ में नहीं आता था कि उन्हें अपनी जगह से उखाड़कर कहां फेंका जा रहा है? थोड़े से वे जो सोच-समझ सकते थे, 'पाकिस्तान जिंदाबाद' के नारे लगा रहे थे। दो-तीन बार झगड़ा होते-होते बचा क्योंकि कुछ हिंदुओं और सिखों को ये नारे सुनकर तैश आ गया था।
जब बिशनसिंह की बारी आई और जब उसको दूसरी ओर भेजने के संबंध में अधिकारी लिखत-पढ़त करने लगे तो उसने पूछा -'टोबा टेकसिंह कहां? पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में?'
संबंधित अधिकारी हंसा, बोला-'पाकिस्तान में। '
यह सुनकर बिशनसिंह उछलकर एक तरफ हटा और दौड़कर अपने शेष साथियों के पास पहुंच गया। पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ ले जाने लगे, किंतु उसने चलने से साफ इनकार कर दिया- 'टोबा टेकसिंह कहां है?' और जोर-जोर से चिल्लाने लगा, 'ओपड़ दी गडग़ड़ दी एनेक्सी दी बेध्याना दी मुंग दी दाल ऑफ टोबा टेकसिंह एंड पाकिस्तान।'
उसे बहुत समझाया गया, 'देखो, टोबा टेकसिंह अब हिंदुस्तान में चला गया है- यदि नहीं गया है तो उसे तुरंत ही भेज दिया जाएगा।' किंतु वह न माना। जब जबरदस्ती दूसरी ओर उसे ले जाने की कोशिशें की गईं तो वह बीच में एक स्थान पर इस प्रकार अपना सूजी हुई टांगों पर खड़ा हो गया, जैसे अब कोई ताकत उसे वहां से हटा नहीं सकेगी। क्योंकि आदमी बेजरर था, इसलिए उसके साथ जबरदस्ती नहीं की गई, उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया और शेष काम होता रहा।
सूरज निकलने से पहले स्तब्ध खड़े हुए बिशनसिंह के गले से एक गगनभेदी चीख निकली। इधर-उधर से कई अफसर दौड़े आए और देखा कि वह आदमी, जो पंद्रह वर्ष तक दिन-रात अपनी टांगों पर खड़ा रहा था, औंधे मुंह लेटा था। इधर कांटेदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था- उधर वैसे ही कांटेदार तारों के पीछे पाकिस्तान। बीच में जमीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था टोबा टेकसिंह पड़ा था।