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Dec 2, 2009

प्रेम की निर्मल गंगा बहाती मीरा


- डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
ब दलते परम्परा के प्रतिमानों में मध्यकाल की कवयित्री मीरा अपनी लोकप्रियता में बेमिसाल हैं। इनका महत्व उस विद्रोही चेतना की अभिव्यक्ति में है जो उस समय सामन्तवाद के विरुद्ध पनप रहा था। मीरा अपनी जीवनचर्या और कविता दोनों से परम्परावादी, सनातनी व्यवस्था की जड़ता, थोथी कुल मर्यादा और जाति-पांति की जकड़बन्दी को तोड़ती हैं। सामन्ती आभिजात्य को ठोकर मारकर विद्वतजनों का सत्संग करती है और जनसाधारण के बीच बेधड़क विचरण करती हैं। मीरा की असाधारण लोकप्रियता का रहस्य जनसाधारण से तादात्म्य में है। जनसामान्य मीरा के गीतों में अपनी भावनाओं की सीधी-सच्ची अभिव्यक्ति पाता है। मीरा की लोकप्रियता का आलम यह है कि उनके नाम पर हजारों पद भक्तों ने रच डाले हैं। निर्गुण पंथ के अनुयायियों ने क्षेपक डालकर अपने सम्प्रदाय के अनुकूल अर्थापन करने की कोशिश की है, जबकि मीरा साम्प्रदायिक आग्रहों से एकदम मुक्त हैं। उनकी विद्रोही चेतना को अपने साम्प्रदायिक घेरे में बांधने की कोशिश निर्गुणमार्गी रैदास और नाथपंथी योगी ही नहीं करते, चैतन्य महाप्रभु के भक्त उनको 'गौरांग कृष्ण की दासी' बनाने की कोशिश करते हैं तो बल्लभ सम्प्रदाय के अनुयायी पुष्टिमार्ग पर लाने और महाप्रभु की सेविका बनाने का प्रयत्न करते हैं और असफल होकर 'वात्र्ता साहित्य' में ऊलजलूल बातें उनके खिलाफ लिखते हैं। मीरा सफलतापूर्वक इन साम्प्रदायिक सीमाओं का अतिक्रमण करती हैं। उनकी विद्रोही चेतना किसी ढ़ांचे में नहीं बंधती। भक्ति के मार्ग में मीरा कुल मर्यादा और अभिमान को काई की तरह चीरकर प्रेम की निर्मल गंगा बहाती है जिसमें पूरी जातीय अस्मिता सराबोर हो जाती है। सन्त-सम्प्रदाय विश्व-सम्प्रदाय है और उसका धर्म विश्व धर्म है। इस विश्व धर्म का मूलाधार है, हृदय की पवित्रता। पवित्रता-सम्मत स्वाभाविक और सात्त्विक आचरण ने ही यहां धर्म का बृहत रूप गृहण किया। समस्त वासनाओं, इच्छाओं एवं द्वेषों से रहित हृदय की नि:सीमाओं में विशाल धर्म का प्रवेश और समावेश सम्भव है।'
सामाजिक परिप्रेक्ष्य में मीरा की भूमिका का जब हम मूल्यांकन करते हैं तो मीरा की पहली टकराहट सामाजिक रूढिय़ों से होती है। वे सती प्रथा का वैयक्तिक स्तर पर विरोध करती हैं। इससे पूरा परिवार उनके खिलाफ हो जाता है। पारिवारिक प्रताडऩाओं से तंग आकर मीरा वृन्दावन चली जाती हैं। वहां विपत्तियां और बढ़ जाती हैं। वहां राणा के आदमी पीछे पड़े रहे और उनको सही रास्ते पर लाने की कोशिश करते रहे। चैतन्य महाप्रभु और बल्लभाचार्य के शिष्य अपने-अपने सम्प्रदायों में खींचने की जबर्दस्त कोशिश
करते हैं। मध्यकाल में स्त्री की दयनीय स्थिति और निरीहता मीरा में साकार है। राणा सामंती दंभ और अहंकार का प्रतीक है, महाप्रभुओं के सेवक साम्प्रदायिक पाखंड और संकीर्णता के प्रतीक हैं। मीरा के पदों में विह्वल भाव से गिरधर नागर की पुकार सांसारिक विपत्तियों से उन्मोचन के लिए है। मीरा की जीवनगाथा भारतीय स्त्री पर होने वाले अत्याचारों की जीवन्त करुण कथा है। जीव गोस्वामी का स्त्रीमात्र को न देखने का प्रण छुड़वाना, कई अर्थों का संकेत करता है। 'नारी महाविकार' वाली दृष्टि अधूरी, एकांगी और नारी जाति का अपमान करने वाली है। किसी कृष्ण भक्त का ऐसा कहना तो और ज्यादा अनुचित है। मीरा के जीवन का यह प्रकरण जीवन को उसकी सम्पूर्णता में देखने का आग्रह करता है तथा साधु-सन्यासियों और विरक्तों के मानसिक स्तर का भी बोध कराता है।
मीरा को वापस राजमहल लौटा लाने की कोशिशों में किसी प्रकार लगाव-जुड़ाव नहीं, झूठी मान मर्यादा की सामंती रूढि़वादी जकडऩ है। अंतिम समय में रणछोड़ जी में समा जाने का संकेत आत्महत्या का है जिस पर आध्यात्मिकता का रंग चढ़ाया गया है। मीरा के विद्रोह की करुण परिणति भारतीय जीवन में स्त्री की दुखद, हीन और दयनीय स्थिति को भरपूर प्रमाणित एवं प्रकाशित करता है।
निर्णुण भक्ति के संतों का सबसे महत्वपूर्ण आयाम एकत्व की भावना थी जिसमें 'मानव को एक ऐसे विश्वव्यापी धर्म के सूत्रों में निबद्ध करना जहां जाति, वर्ग और वर्ण सम्बन्धी भेद न हो। साधना का यह द्वार सब के लिए उन्मुक्त था, इस क्षेत्र में हिन्दू-मुसलमान का भेद भी विलुप्त हो गया और भक्ति के क्षेत्र में सब समान प्रभावित हुए। निर्गुण भक्ति का पंच तत्व है-सहज साधना। सन्तों की भक्ति-प्रणाली आनन्द और शान्ति में संयुक्त शुद्ध अन्त: करण की वह स्वाभाविक शक्ति है जहां कृत्रिमता स्वत: विलीन हो जाती है सहज साधना का यह मार्ग सर्वथा अभिनव और क्रान्तिकारी था-इसने धार्मिक-जीवन की दुरुहताओं को सदैव के लिए हटा दिया।
मीरा ने भक्ति को एक नया अर्थ दिया। समूचे भक्तिकाल में उनका व्यक्तित्व सबसे विलक्षण है। केवल चैतन्य महाप्रभु से उनकी तुलना हो सकती है। भाव विभोर होकर कीत्र्तन करना, नाचते हुए होशो-हवास खो देना। भक्तिकाल मीरा से एक नया अर्थ पाता है। उनके काव्य में जहां कृष्ण का रसमय प्रेम है परम्परा से हटकर देखें तो मीरा के काव्य में वही सांसारिक विपत्तियों और विडम्बनाओं से मुक्ति के लिए व्याकुल, भयातुर पुकार भी है। जैसे मीरा की भक्ति वैयक्तिक है, पीड़ाएं और कष्ट भी वैयक्तिक हैं। उनकी अपार लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि जनसाधारण उनकी वैयक्तिक पीड़ाओं और कष्टों से आसानी से जुड़ जाता है और उसे अपने कष्टों से मुक्ति का रास्ता भी उनके पदों में दिखता है।
मीरा ने अपने काव्य और आचरण के द्वारा पारम्परिक सामाजिक ढांचे और सामन्ती मूल्यों को जबर्दस्त चुनौती दी। परम्परावादी पुरुषतंत्रात्मक समाज और खोखला सामंती अहंकार कितना क्रूर और अमानवीय हो सकता है, यह मीरा की दारुण शारीरिक-मानसिक पीड़ा के चीत्कार में समाहित है। आध्यात्मिक तड़प के समानान्तरण सांसारिक ताप उनको दग्ध करता रहा और मीरा गिरधर नागर की पुकार लगाती रहीं। पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर मीरा द्वारा रूढिय़ों को दी गयी चुनौती सामाजिक एवं ऐेतिहासिक महत्त्व रखती है। मेवाड़ के राणाओं के प्रशस्तिगीत गाने के प्रति हिन्दी कवियों की उपेक्षा और उदासीनता का एक यह भी कारण हो सकता है। साम्प्रदायिक कट्टरता और सामंती क्रूरता का सफल प्रतिरोध करते हुए मीरा ने जीवन की अर्थवेत्ता मानवीय प्रेम और कृष्ण भक्ति में तलाशा। दुनियावी चकाचैंध की निस्सारता का संकेत उनकी कविताएं करती हैं। उसमें आध्यात्मिक संकेत के साथ सामाजिक संदर्भ भी गुंथे हैं। यह दुनिया झूठी मान-मर्यादा और आदर्शों को लेकर चल रही है जिससे अपना तथा दूसरों का जीवन नरक हो गया है। सांसारिक चकाचौंध में खोये हुए व्यक्ति की समझ में केवल संसार की बात आती है। मनुष्य धरती पर विचरण करता है जिसे मूलाधार चक्र कहा गया है। सहस्त्रदल कमल वाला चक्र सातवां है जो गगन मंडल है। ये साधना की गूढ़ और रहस्यात्मक बातें हैं। चेतना के चतुर्थ आयाम में प्रविष्ट होने पर इनकी प्रतीत होती है। वैसे मीरा की साधना सगुण परम्परा ही है पर संत मन की पारिभाषिक शब्दावली का उन्होंने बेहिचक प्रयोग किया है। इस संसार के सारे नाते-रिश्ते झूठे हैं, मिट जाने वाले हैं। केवल कृष्ण जीवन-मरण का साथ निभाने वाला सच्चा साथी है।
संसार दुनियादारी और दुनियावी रिश्तों में नहीं, इस आशा में है कि कल सुख मिलेगा। यह संसार का विज्ञान है। मनुष्य निरंतर इसी के कारण द्वन्द्व की स्थिति में है। यह दुविधा ही माया है। यही भीतर तनाव और शोर पैदा करती है, जिसमें परमात्मा खो जाता है। साधना निद्र्वन्द्व होने का नाम है तभी भीतर परमात्मा प्रकट होता है, मीरा के गीतों में भक्ति का पूरा शास्त्र छिपा है। हृदय के माध्यम से प्रवेश करने पर इन पदों के अर्थ खुलते हैं। एक अन्य पद में मीरा कहती हैं-मूझे नींद नहीं आती। यह सामान्य नींद नहीं है। न तो यह काम- वासना की विकलता है। यह जागरण है। 'तडफ़ै बिन बालम मोर जिया' जब कबीर कहते हैं तो वह इसी तरफ संकेत करते हैं। जो जाग गया है उसकी समझ में संसार का विज्ञान आ गया। यह संसार आकांक्षाओं से भरा है। मनुष्य सपनों और आकांक्षाओं की मृगमरीचिका के पीछे निरंतर दौड़ रहा है। यही वास्तविक नींद है। इस नींद से जाग जाना असाधारण है। गीता में श्रीकृष्ण का कथन 'या निशा सर्व भूतायां तस्य जागर्ति संयमी' का संकेत इसी तरफ है। मीरा कहती हैं- 'मैंने इस संसार के मर्म को उसकी वास्तविकता में पहचान लिया है। अब सोना मेरे लिए संभव नहीं है। प्रियतम का रास्ता देखते- देखते रात का अंधेरा छंट गया- सवेरा हो गया। जैसे मछली जल के बिना तड़पती है वैसे ही उस कृष्ण के लिए मैं तड़प रही हूं।'
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Aug 20, 2009

सूचना का अधिकार

- डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति को यह जानने का हक है कि सरकार अपने अधिकार का किस तरह इस्तेमाल कर रही है जहां अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार नहीं होगा वहां लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं रह जायेगा। लोकतंत्र में सूचना के अधिकार का अपना विशिष्ट महत्व है, क्योंकि इससे सरकार और जनता के बीच सीधा रिश्ता तय होगा इस अधिकार के पास हो जाने से यह भी सुनिश्चित होगा कि जबावदेही किसके प्रति कैसी होनी चाहिये। वास्तव में देखा जाये तो इस कानून से लोकतंत्र की असली पहचान की भूमिका भी तय होगी। हमारे यहां सूचना के अधिकार की लड़ाई जमीनी है। यानी सूचना पाने की जद्दोजहद गरीब लोगों के बीच से निकला हुआ मसला है। वास्तव में देखा जाये तो यह कानून जीने के हक से भी जुड़ा है क्योंकि भ्रष्टाचार ने आम लोगों का हक मार दिया है।
वर्तमान की बात करें तो भारत में नौकरशाही संस्कृति की वजह से गोपनीयता की चादर फैली हुई है। ये कुलीन लोग जनता से दूरी बनाये हुए हैं और एक कृत्रिम आवरण ने सच्चाई पर पर्दा डाल रखा है। सरकारी गोपनीयता कानून 1923 का हवाला देकर अब भी औपनिवेशिक काल के कानून को वैधानिक बनाए रखा गया है और देखा जाए तो यही गोपनीयता कानून सूचना के अधिकार के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा था। (आज के करीब 84 वर्ष पहले 1923 में बना सरकारी गोपनीयता कानून यानी ऑफिसियल सीक्रटस एक्ट की धाराएं पांच और छह) वास्तव में देखा जाए तो इस कानून के बनाने की कहानी अंग्रेजी सरकार ने 1857 ई. के स्वाधीनता संग्राम के बाद से ही शुरू कर दी थी। 1885 में कांग्रेस की स्थापना के बाद पहली बार 1889 में यह कानून बना था। बाद में 1904 में इसे और सख्त बना दिया गया। इस कानून की धारा 1.5 और 6 के प्रावधानों का फायदा उठाकर ही अभी तक सरकारी अधिकारी सूचनाओं को गोपनीय बनाये रखते थे परन्तु संसद के दोनों सदनों ने सूचना के अधिकार सम्बन्धी विधेयक (11.12 मई 2005) को धारा 15.और 6 गोपनीयता कानून 1923) संशोधित कर दिया गया है।
 यहां प्रश्न उठते हैं कि इस सूचना के अधिकार से क्या भ्रष्टाचार में अंकुश लग जाएगा? क्या अब निर्वाचित जन प्रतिनिधि की जनता के प्रति जबावदेही बढ़ेगी? क्या सरकारी अधिकारियों की मनमानी
रूकेगी? क्या नीतियां बनाने और उनके क्रियान्वयन में जनता की भागीदारी सुनिश्चित हो पाएगी और अंतत क्या हमारा लोकतंत्र पहले के मुकाबले ज्यादा पारदर्शी हो सकेगा? निश्चित रूप से यह सभी प्रश्न महत्वपूर्ण हैं और सूचना के अधिकार के साथ कुछ खतरे हो सकते हैं? और सरकार के लिए यह दुधारी तलवार भी है किन्तु सरकार ने इसके दुरूपयोग रोकने के लिए, पुख्ता इंतजाम भी किए हैं। सुरक्षा मामलों की जानकारी और खुफिया एजेंसियों को इसके दायरे से बाहर रखकर एक संतुलन कायम करने की कोशिश की गई है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सूचना में ताकत होती है और आज लगभग हर स्तर का अधिकारी सूचनाएं छिपाकर मननमानी करता है। गलत तरह से पैसा कमाता है। साथ ही अधिकारों पर कब्जा जमाता है और शक्तियों का दुरूपयोग करता है। अत: सूचना के अधिकार का मुख्य उद्देश्य सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार पर नकेल डालकर कार्य कुशलता को बेहतर करना है। इसके पीछे प्रमुख कारण यह है कि 'इससे देश में लोकतंत्र की नींव मजबूत होगी और गवर्नेंस में सुधार आएगा। (संसद में सूचना के अधिकार विधेयक पर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के वक्तव्य का मुख्य अंश 11ए 12 मई 2005)12 अक्टूबर सन् 2005 ई. से लागू
 सूचना का अधिकार लगभग बारह वर्षों से आन्दोलन का रूप अख्तियार कर रहा था। यहां इस बात पर गौर करने की जरूरत है कि सूचना के अधिकार के लिए भारत में जिस तरह से आन्दोलन चलाए गए, वैसा दुनिया के किसी दूसरे मुल्क में दिखाई नहीं पड़ता। इस आन्दोलन को अरूणा राय और उनके साथियों ने अपने संघर्ष को 'जीने और जानने की जंग' कहा था। (सहारा समय- जानने की जंग का पहला पड़ाव 4 जून 2005 पृ. 22.23)। सूचना के अधिकार के तहत हालांकि दंड का प्रावधान रखा गया है परन्तु इस पर अमल होगा यह सभी कुछ तब तक मात्र एक स्वप्न की तरह है जब तक यह कानून केवल कुछ नियमों उपनियमों के रूप में कुछ पृष्ठों की शक्ल के रूप में ही सीमित रहेगा। यह अधिकार जहां एक ओर नागरिकों और सरकार के बीच एक सेतु का कार्य करेगा वहीं इस विधेयक में कुछ ऐसे चोर दरवाजे नौकरशाहों और सरकारी अफसरों के बीच पनप सकते हैं जिन्हें स्पष्ट करना कठिन हो सकता है। 'मसलन, विधेयक में ऐसे करीब दर्जनों क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है जिन क्षेत्रों की सूचनाएं कोई नागरिक नहीं मांग सकता। जैसे वे सूचनाएं जिनके सार्वजनिक होने से भारत की प्रभुता, अखण्डता, सुरक्षा, रणनीति, वैज्ञानिक या आर्थिक हितों और विदेशों से सम्बन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। अब सवाल उठता है कि इसका निर्धारण कैसे होगा कि अमुख सूचना देश की एकता-अखण्डता..... के लिए गोपनीय रखी जाएगी? स्पष्ट है सरकारी अधिकारी ही इसे निर्धारित करेंगे और एक बार फिर हमारा लोकतंत्र ठगा जायेगा क्योंकि प्रतिबंध क्षेत्र में आने वाली सूची, दूसरे क्षेत्रों न्यायालयीय मामले, संसद और विधान मंडलों के विदेशी अधिकार से जुड़ी चीजें, मंत्रिमंडल की बैठकों के दस्तावेज-जैसे अनेक मुद्दे हैं जिनसे सम्बन्धित सूचनाएं हर हाल मे गोपनीय रखी जाएगी। बात यहीं समाप्त नहीं होती बल्कि सूचनाओं से वंचित रखने वाले अधिकारी के विरूद्ध अपील की प्रक्रिया भी थोड़ी जटिल है निचली से ऊपरी अदालत ने न्याय मांगने के लिए मुकदमों का सिलसिला कहीं ऐसा न कर दे कि व्यक्ति मुकदमों के बोझ से दब जाये और इन मामलों में ही हमारी अदालतें उलझ जाएं।
सबसे महत्वपूर्ण बात आज यह है कि हम 21वीं सदी में प्रवेश कर गये हैं और भूमण्डलीकरण में बाजार एवं पैसा महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन कर रहा है और ऐसे में निजी क्षेत्र का योगदान कम करके नहीं आंका जा सकता है। निजी कम्पनियों फर्मों और उद्यमों की भूमिका लगातार बढ़ रही है तब हर क्षेत्र का जबाव देह बनाना और उसमें पारदर्शिता लाने की अहमियत और ज्यादा हो जाती है। शायद यह काम सेबी के नियमों और तमाम कम्पनी कानूनों के जरिये संभव नहीं है। अगर संभव होता है तो आये दिन घोटाले और हवालाकांड न होते। इस बात से कौन इन्कार कर सकता है कि 'हमारे देश में एक छोटी सी जानकारी न देने की लापरवाही के चलते भोपाल गैस त्रासदी हुई थी। अगर एंडरसन की कम्पनी में भोपाल की बस्तियों में रहने वाले लोगों को उस जहरीली गैस से बचने के उपायों की समुचित जानकारी मुहैया करा दी होती तो हजारों लोग मौत के मुंह में जाने से बच गये होते। निजी क्षेत्र को इस विधेयक के दायरे से बाहर रखना भी सरकार की नीति एवं नियति को स्पष्ट नहीं करता है।
ऐतिहासिक दृष्टि से सूचना के अधिकार का दावा-
वर्तमान में करीब तीस से अधिक देशों को सूचना का अधिकार प्राप्त है लेकिन सूचना का अधिकार देने वाला पहला देश स्वीडन है। स्वीडन के नागरिकों को यह अधिकार 1766 में मिल गया था। भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसकी शुरूआत पहले प्रेस आयोग 1952 से हुई। सरकार ने इस आयोग से कहा कि वह प्रेस की आजादी सम्बन्धी जरूरी प्रावधानों पर सुझाव दे। आयोग ने कहा कि पारदर्शिता जरूरी है न कि सूचना का अधिकार। इसी दौरान सरकारी गोपनीयता कानून 1967 में संशोधत सम्बन्धी प्रस्ताव आये। प्रस्ताव खारिज कर दिया गया और कानून को सख्त बना दिया गया। सत्ता परिवर्तन के बाद जनता पार्टी ने सन् 1977 में अपने घोषणापत्र में सूचना का अधिकार प्रदान करने का वायदा किया वायदे पर अमल करते हुये कैबिनेट सचिव की अगुवाई में एक टास्क फोर्स गठित किया गया। परन्तु इसमें भी कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकला। इसी समय दूसरा प्रेस आयोग 1978 में बना। इसकी कुछ सिफारिशें ही बन सकीं जो सरकार को मान्य नहीं हो सकी। सर्वोच्च न्यायालय ने सन् 1981- 82 और सन् 1986 ई. में कुछ फैसले सुनाए। इसके तहत आम आदमी को सूचना
का अधिकार दिए जाने की बात कही गई। सन् 1989 ई. में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सूचना का अधिकार कानून बनाने के लिए पहली बार सार्थक प्रयास करने की शुरूआत की। सक्षम अधिकारियों की एक टीम स्कैंडिनेवीयाई देशों में भेजी गयी ताकि वहां मौजूद सूचना के अधिकार सम्बन्धी कानूनों का गहन अध्ययन दिया जा सके। परन्तु इस यात्रा का भी कोई सन्तोषजनक हल नहीं निकला। सन् 1990 में न्यायाधीश सरकारिया की अध्यक्षता में 1990 में प्रेस परिषद ने कुछ सिफारिशें की परन्तु सरकार की उदासीनता से इसमें सफलता नहीं मिली। सन् 1996 ई. के लोकसभा के चुनाव में लगभग सभी पार्टियों ने अपने-अपने घोषणा पत्रों में कानून बनाने का वायदा किया और सन् 1997 ई. में दो विधेयक भी लाये गये। एक विधेयक एच.डी. शौरी का था और दूसरा न्यायाधीश सावंत के नेतृत्व में गठित टास्क फोर्स का, लेकिन दोनों विधेयकों पर गौर नहीं फरमाया गया। इसके बाद देवगौड़ा और गुजराल की सरकारें आईं। अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार भी बनी। कानून भी पास हुआ लेकिन यूपीए सरकार को उसमें खामियां दिखीं और उसने दोबारा विधेयक का मसौदा तैयार कराया। इस मसौदे का प्रतिफल संसद के दोनों सदनों में करीब 60 वर्ष बाद ही सही हमारी सरकार ने 11-12 मई 2005 को विधेयक पास कराया और 12 अक्टूबर 2005 से यह तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान सहित कई राज्यों में कानून के रूप में कार्य कर रहा है।
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं और हमारी कोशिश होनी चाहिये कि हम सकारात्मक पहलू की ओर अधिक ध्यान दें। वर्तमान में हर तरफ तकनीक का जोर है। जिस समाज के पास जितनी ज्यादा सूचनायें होंगी, सरकार भी सामुदायिक जरूरतों को लेकर उतनी ही ज्यादा सकारात्मक और स्पष्ट नजरिया रखेगी। निसंदेह सरकारी सूचना राष्ट्रीय स्रोत होती है। कोई सरकार या सरकारी अधिकारी अपने लाभ के लिये सूचनाएं तैयार नहीं करते। सूचनाएं या जानकारियां अधिकारियों के अपने कर्तव्यों के निर्वहन के काम आती हैं। इसी के जरिये संस्थाएं जनता के हित में अपनी सेवाएं देती हैं। इस तरह सरकार और अधिकारीगण जनता की सूचना देने वाले न्यासी होते हैं। संसदीय लोकतंत्र में सूचनाएं सरकार के जरिए संसद और सांसदों के पास पहुंचती हैं। इसके बाद उन्हें जनता तक पहुंचाया जाता है। जनता अपने प्रतिनिधियों के जरिये सूचनाएं हासिल कर सकती है।  

सूचना के अधिकार की लड़ाई
जन्म मध्य राजस्थान- व्यावर शहर (चांग गेट)
राजनीतिक सभा, आंदोलन, हड़ताल, जलापूर्ति- 13 अक्टूबर 2005 सूचना का अधिकार अधिनियम- सर्वप्रथम मांग व्यावर वासियों ने की। जनप्रतिक्रिया- 'न्यूनतम मजदूरी की मांग' - अप्रैल 1996 में आंदोलन प्रारंभ
स्वशासन की दिशा में पहला कदम -
1996 में स्थानीय स्वशासी निकायों के दस्तावेजों की प्रमाणित प्रति उपलब्ध कराने के लिए पंचायती राज अधिनियम में संशोधन किया जाए। खर्चे सम्बन्धी बिल और शासन के समस्त क्षेत्रों को सूचना का अधिकार देने हेतु अधिनियम की मांग।
क्रियान्वयन
* राजस्थान का कानून पहला कानून दंड का प्रावधान नहीं है।
* दोषी अधिकारियों के खिलाफ लोक सेवा आचरण विनियम के तहत कार्यवाही।
* सूचना के प्रयोक्ता को पारदर्शिता तथा जबावदेही का समान मानक अपनाने के लिए बाध्य करता है। आंदोलन तथा सूचना का अधिकार -महाराष्ट्र में अन्ना हजारे द्वारा राज्य स्तरीय सर्वोत्तम अधिनियम पारित हुआ। 'परिवर्तन' नामक संस्था 'मधु भादुड़ी' ने दिल्ली जलबोर्ड द्वारा संशोधन से जुड़ी जानकारी हासिल करने के लिए आवेदन किया है।
सूचना का अधिकार अधिनियम- 2005 न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती -
1991 के बाद चलाए गए आंदोलन 'नेशनल कैम्पेन फॉर पीपुल्स राइट टू इन्फोर्मेशन' का श्रेय - श्रीमती अरूणाराय।
भ्रष्टाचार निवारण हेतु गठित संस्था 'परिवर्तन' के अध्यक्ष 'अरविंद केजरीवाल' को रेमन मैगसेसे पुरस्कार, 2006 ।