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Feb 3, 2024

उदंती.com, फरवरी- 2024

चित्रः डॉ. सुनीता वर्मा, भिलाई (छ.ग.)
  वर्ष - 16, अंक - 7 

यदि आप स्वयं प्रसन्न हैं,

तो जिंदगी उत्तम है।

यदि आपकी वजह से लोग प्रसन्न हैं,

तो जिंदगी सर्वोत्तम है।

इस अंक में 

अनकहीः जा पर कृपा राम की होई... - डॉ. रत्ना वर्मा

धर्म- संस्कृतिः दशावतारों के साथ अवतरित हुए भगवान राम - प्रमोद भार्गव

 दोहेः लौट आये श्री राम  - शशि पाधा

प्रकृतिः चारधाम हाईवे और हिमालय का पर्यावरण - भारत डोगरा 

 कविताः बसंत आ गया - अज्ञेय

 कविताः बसन्त की अगवानी - नागार्जुन

खान- पानः सब्जियाँ अब उतनी पौष्टिक नहीं रहीं - स्रोत फीचर्स

 विकासः फैशन को टीकाऊ बनाना होगा - अपर्णा विश्वनाथ

 संस्मरणः क खूबसूरत तस्वीर - देवी नागरानी

 कालजयी कहानीः बट बाबा - फणवीश्वरनाथ रेणु

 कविताः दे जाना उजास वसंत - निर्देश निधि

 कविताः मुझमें हो तुम - सांत्वना श्रीकांत

 व्यंग्यः गुरु और शिष्य की कहानी - अख़्तर अली

 ग़ज़लः 1. नादाँ हूँ... 2. सूरज बन कर  - विज्ञान व्रत

चर्चाः यात्रा वृत्तांत पर पहला विमर्श - विनोद साव

 लघुकथाः गौरैया का घर - मीनू खरे

 दो लघुकथाः 1. हनीट्रैप, 2. अन्तर्दृष्टि - डॉ. उपमा शर्मा

 कथाः अपना-पराया - प्रिया देवांगन ‘प्रियू’

 स्वास्थ्यः दिल के लिए... बैठने से बेहतर है - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

 जीवन दर्शनः सुकरात से सीख उर्फ मैं से निजात - विजय जोशी 

अनकहीः जा पर कृपा राम की होई..

 . - डॉ. रत्ना वर्मा

जब आपके चारो ओर खुशहाली का माहौल हो तो कैसा लगता है, खिली धूप, स्वच्छ हवा, हरी- भरी वादियाँ, नीला आसमान, मन को सुकून देने वाली चाँदनी रातें... और लता एक खूबसूरत गाना- ये रात ये चाँदनी फिर कहाँ ...अरे नहीं मैं कविता नहीं कह रही, मैं तो अपने दिल में उठने वाली उन भावनाओं को व्यक्त कर रही हूँ , जो पिछले कुछ दिनों में महसूस हो रहा है। क्या आपको भी इनमें से कुछ भी ऐसा आभास हुआ कि बरबस यह कहने का जी चाहा हो- आहा मन कितना प्रफुल्लित है... न कहीं राग- द्वेष, न कलेश, न निराशा, सब कुछ खिले उस कमल की फूल की तरह, जिसमें ओस की बूँदे ठहरी हुई मोती- सी चमक रही हों... सोचकर कितना अच्छा लगता है न यह सब। ... आप कह सकते हैं कि सपने में सबकुछ बहुत सुंदर दिखता है; पर सपने देखने और सोचने से ही तो साकार होता है । आप सपने ही नहीं देखेंगे, तो उसे फलीभूत कैसे करेंगे। सच है मन जब खुश होता है, तब इसी तरह कुछ कवि हो जाने का दिल करता है... 

इस बार मन के ये अलग तरह के उद्गार व्यक्त करने का कारण, आप सब समझ ही गए होंगे। अयोध्या में रामलला की प्राण- प्रतिष्ठा का भव्य आयोजन। समस्त भारतवासियों के लिए रामलला का आगमन किसी दीपावली से कम अवसर नहीं था, बल्कि इससे भी कुछ ज्यादा ही था; क्योंकि इस अवसर पर पूरा देश भक्ति में सराबोर था।  और हो भी क्यों न,  क्योंकि जब  बात भारत की संस्कृति, सभ्यता, आस्था, भक्ति और शक्ति की होती है, तो पूरा देश एक ही रौ में बहने लगता है। तब छोटे- बड़े, ऊँच- नीच, अमीर- गरीब के बीच कोई भेदभाव नहीं रह जाता। यही तो हमारी भारतीय सभ्पता की पहचान भी है। तभी तो जब सदियों बाद रामलला के रामजन्म भूमि में पधारने की बात हुई, तो रामभक्तों ने उनके स्वागत में पलक पाँवड़े बिछा दिए। पूरा देश फूलों से सुरभित होने लगा, हर घर दीप से जगमगा उठा। भारतीय संस्कृति के इतिहास में ‘वसुधैव कुटुम्बमं’ की ऐसी मिसाल अरसे बाद देखने को मिली। भक्ति की जो भावना इस समय सबके दिलों में बही, वह सबके हृदय को आह्लादित करने वाली थी। 

आज भी उस पीढ़ी के लोगों को याद होगा जब1987- 88 में दूरदर्शन पर रामानंद सागर की रामायण को दूरदर्शन पर रविवार के दिन सुबह 9:30 बजे किया प्रसारित किया जाता था । तब की मिसालें आज तक दी जाती हैं कि इस धारावाहिक ने  देश में रामनाम की अलख जगा दी थी। आलम यह था कि जिस समय यह टीवी पर दिखाया जाता था, तो सड़कें सूनी हो जाती थीं, मानों कर्फ्यू लगा हो। पर इस बार का नजारा बिल्कुल इसके उलट रहा, क्योंकि राम भगवान टीवी पर; नहीं बल्कि साक्षात् सबके दिलों में आ बसे ।  

राम के बारे में  जब मोदी जी कहते हैं - ‘राम आग नहीं है, राम ऊर्जा हैं, राम विवाद नहीं, राम समाधान हैं। राम तो सबके हैं। राम सिर्फ वर्तमान नहीं, राम अनंतकाल हैं। यह भारत का समय है और भारत अब आगे बढ़ने वाला है। शताब्दियों के इंतजार के बाद ये पल आया है। अब हम रुकेंगे नहीं।’ तब यह जाहिर- सी बात है कि उनका यह वक्तव्य सिर्फ धर्म से जुड़ा हुआ नहीं है, यह राजनीति से भी प्रेरित है और वे इसमें सफल भी हुए हैं।

 जाहिर- सी बात है कि यह आगामी लोकसभा चुनाव में तुरुप का पत्ता साबित होगा। इसमें कोई दो मत नहीं कि आस्था भक्ति और धर्म जनमानस के लिए ऐसी शक्ति है , जिसके बल पर आजादी की जंग भी जीती गई है । इसका उदाहरण हमारे सामने हैं- जब लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने लोगों में एकता और राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत करने के मकसद से घर- घर में किए जाने वाले गणेश पूजन को सार्वजनिक उत्सव के रूप में बदल दिया था। जनहित और देशहित में किए जाने वाले इस प्रकार के काम की हमेशा ही सराहना की जाती है और की जानी चाहिए, जिसका व्यापक असर जनमानस और जनहित में होता है। अतः आस्था और भक्ति की ताकत को कोई भी नकार नहीं सकता; परंतु इसका उपयोग तरक्की, भलाई और अच्छाई की ताकत के रूप में किया जाना चाहिए, न राजनैतिक फायदे के लिए। 

 क्या हम अयोध्या में हुई इस प्राण -प्रतिष्ठा को बदलते दौर की शुरुआत मानें? पर इसके लिए अपना दृष्टिकोण कुछ अलग ही  रखना होगा। इसे हम केवल  राजनीतिक चश्मे से न देखें, बल्कि इसे एक सामाजिक- सांस्कृतिक बदलाव की नींव मानते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण रखना होगा। नई पीढ़ी के लिए अपने देश के लिए सोचने का नजरिया बदलने का समय है। अभी हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जहाँ आज की पीढ़ी आगे तो बढ़ना चाहती हैं; परंतु अपने देश, अपने शहर, अपने गाँव और अपने घर को लेकर नहीं; बल्कि सिर्फ अपने को लेकर आगे बढ़ जाती है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति में इसे तो आगे बढ़ना नहीं कहते। हमारी संस्कृति में आगे बढ़ने का मतलब होता है, सबको साथ लेकर आगे बढ़ना। हमारे देश का यह दुर्भाग्य है कि शिक्षा का बहुत कम प्रतिशत होने के कारण अधिकांश जनता अपनी दीर्घकालीन तरक्की को लेकर सचेत नहीं है। वह एक रौ में बहकर अपना फैसला दे देती है और ऐसा तब तक होता रहेगा, जब तक हमारे देश की जनता शिक्षित होकर अपने फैसले खुद न लेने लगे। 

अतः उम्मीद की जानी चाहिए कि नए दौर के इस बदलाव में देशवासियों के जनमानस में ऊर्जा का नया संचार होगा, आग नहीं, शांति स्थापित होगी। आज की पीढ़ी तरक्की के रास्ते पर तो बढ़ेगी ही;  साथ ही देश प्रेम उनके लिए सर्वोपरि रहेगा,  तब यह पीढ़ी बिना छल- कपट के माता- पिता की सेवा करते हुए पारिवारिक जिम्मेदारी को निभाते हुए भ्रष्टाचार मुक्त एक शांतिप्रिय समाज और देश के निर्माण में महती भूमिका निभाएगी। अगर ऐसा देश होगा, ऐसे लोग होंगे, तो कभी उनके ऊपर कोई संकट नहीं आएगा राम जी सदैव उन पर कृपालु रहेंगे। जिस दिन वे यह समझ लेंगे कि असली ताकत उनके हाथों में है, उस दिन असली रामराज्य की कल्पना साकार होगी।  

जा पर कृपा राम की होई । ता पर कृपा करहिं सब कोई ॥

जिनके कपट, दम्भ नहिं माया । तिनके हृदय बसहु रघुराया ॥


धर्म- संस्कृतिः दशावतारों के साथ अवतरित हुए भगवान राम

  - प्रमोद भार्गव

अयोध्या में भगवान राम बाल रूप ने दशावतारों के साथ प्रगट हो गए है। यदि इसे सृष्टि एवं जैविक विकास के क्रम में देखें तो दशावतार की अवधारणा अत्यंत प्रामाणिक है। इस परिप्रेक्ष्य में चार्ल्स डार्विन का 1859 में आया आरिजन आफ स्पीशीज अर्थात ‘जीवोत्पत्ति का सिद्धांत’ कहीं नहीं ठहरता। यह अवधारणा भारतीय ऋषियों ने भगवान विष्णु के दशावतारों के रूप में दी है। इसका वर्णन प्राचीन संस्कृत के प्रमुख ग्रंथों में समाविष्ट है। जैव विकास एवं आनुवंशिकता के इस विज्ञान को दक्षिण भारत और खजुराहो के प्राचीन मंदिरों की दीवारों पर भी उकेरा गया है। विदिशा की उदयगिरि की गुफाओं में भी दशावतार उत्कीर्ण हैं।  

विज्ञान सम्मत दशावतार की परंपरा में पहला मत्स्यावतार हुआ, यानी जल में जीवन की उत्पत्ति हुई। विज्ञान भी इस तथ्य से सहमत है कि जीव-जगत में पहला जीवन रूप पानी में विकसित हुआ। दूसरा अवतार कच्छप हुआ, जो जल और भूमि दोनों स्थलों पर रहने में समर्थ था। तीसरा वराह हुआ, जो पानी के भीतर से जीव के धरती की ओर बढ़ने का संकेत है, अर्थात् पृथ्वी को जल से मुक्त करने का प्रतीक है। चौथा नरसिंह अवतार है, जो इस तथ्य का प्रतीक है कि जानवर से मनुष्य विकसित हो रहा है। आधा मनुष्य आधा सिंह शरीर संक्रमण का प्रतिबिंब है। इसके बाद पांचवाँ अवतार वामन हुआ, जो मानव का लघु रूप है। सृष्टि के आरंभ में मनुष्य बौने रूप में ही अस्तित्व में आया था। 45 लाख साल पुराने स्त्री और पुरुष के जो जीवाश्म मिले हैं, उनकी ऊँचाई दो से ढाई फीट की है। वामन के बाद परशुराम हैं, जो मनुष्य का संपूर्ण विकसित रूप हैं। यह अवतार मानव जीवन को व्यवस्थित रूप में बसाने के लिए वनों को काटकर घर-निर्माण की तकनीक को अभिव्यक्त करता है। परशुराम के हाथ में फरसा इसी परिवर्तन का प्रतीक है। सातवें अवतार में राम का धनुष बाण लिए प्रकटीकरण इस बात का संकेत है कि मनुष्य मानव बस्तियों की दूर रहकर सुरक्षा करने में सक्षम व दक्ष हो चुका था। आठवें अवतार बलराम हैं, जो कंधे पर हल लिये हुए है। यह स्थिति मानव सभ्यता के बीच कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के विकास को इंगित करता है। हालाँकि राम की जिस मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा राम मंदिर में की गई हैं, उसमें बलराम के स्थान पर भगवान बुद्ध प्रकट हैं। जो लालच मुक्त दार्शनिक ईश्वर हैं। इनके बाद भगवान कृष्ण हैं, जो मानव सभ्यता के ऐसे प्रतिनिधि हैं, जो नूतन सोच के साथ कर्म का दर्शन देते हैं। दसवाँ, कल्कि ऐसा काल्पनिक अवतार है, जो भविष्य में होना है। इसे हम कलियुग अर्थात् कलपुर्जों के युग से जोड़कर देख सकते हैं। 

 ब्रिटेन के जेबीएस हल्डेन नामक शरीर, अनुवांशिकी और विकासवादी जीव विज्ञानी हुए हैं। गणित और सांख्यिकी के भी ये विद्वान् थे। हल्डेन नास्तिक थे; किंतु मानवतावादी थे। इन्होंने प्रकृति विज्ञान पर भी काम किया है। हल्डेन को राजनीतिक असहमतियों के चलते ब्रिटेन छोड़कर भारत आना पड़ा था। भारत में वे पहले सांख्यिकीय आयोग के सदस्य बने और प्राध्यापक भी रहे। हल्डेन ने जब भारत के मंदिरों में जैव व मानव विकास से जुड़ी मूर्तियों का अध्ययन किया, तब उन्होंने पहली बार व्यवस्थित क्रम में अवतारों की बीती सदी के चौथे दशक में व्याख्या की। उन्होंने पहले चार अवतार मत्स्य, कूर्म, वराह और नरसिंह को सतयुग से, इसके बाद के तीन वामन, परशुराम और राम  को त्रेता से और आगामी दो बलराम और कृष्ण को द्वापर युग से जोड़कर कालक्रम निर्धारित किया। हल्डेन ने इस क्रम में जैविक विकास के तथ्य पाए और अपनी पुस्तक ‘द कॉजेज ऑफ इव्यूलेशन‘ में इन्हें रेखांकित किया। 

उन्होंने स्पष्ट किया कि विज्ञान जीव की उत्पत्ति समुद्र में मानता है। इस नाते इस तथ्य की अभिव्यक्ति मत्स्यावतार में है। कूर्म यानी कछुआ जल व जमीन दोनों पर रहने में समर्थ है, इसलिए यह उभयचर कूर्मावतार के रूप में सटीक मिथक हैं। अंडे देने वाले सरीसृपों से ही स्तनधारी प्राणियों की उत्पत्ति मानी जाती है। इस नाते इस कड़ी में वराह अवतार की सार्थकता है। नरसिंह ऐसा विचित्र अवतार है, जो आधा वन्य प्राणी और आधा मनुष्य है। इस विलक्षण अवतार की परिकल्पना से यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य का विकास पशुओं से हुआ है। यह लगभग वही अवधारणा है, जो चार्ल्स डार्विन ने प्रतिपादित की है। हल्डेन ने मानवीय अवतारों में वामन को सृष्टि विकास के रूप में लघु मानव (हॉबिट) माना है। परशुधारी परशुराम को वे पूर्ण पुरुष (होमोसेपियंस) मानते हैं। राम सामंती मूल्यों को सैद्धांतिकता देने और सामंतों के लिए भी एक आचार संहिता की मर्यादा से जोड़ते हैं। हल्डेन बलराम को महत्त्व नहीं देते, किंतु कृष्ण को एक बौद्धिक पुरुष की परिणति के रूप में देखते हैं। सृष्टिवाद से जुड़ी इतनी सटीक व्यख्या करने के बाबजूद हल्डेन की इस अवधारणा को भारतीय विकासवादियों व जीव विज्ञानियों ने कोई महत्त्व नहीं दिया; क्योंकि उनकी आँखों पर पाश्चात्य-वामपंथी वैचारिकता का चश्मा चढ़ा था, दूसरे वे मैकाले की इस धारणा के अंध अनुयायी हो गए थे कि संस्कृत ग्रंथ तो केवल पूजा-पाठ की वस्तु और कपोल-कल्पित हैं। 

 डार्विन के विकास मत का विरोध आरंभ से ही हो रहा है। अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने तो यह मत व्यक्त किया है कि जीव या मनुष्य पृथ्वी पर किसी दूसरे लोक या दूसरे ग्रह से आकर बसे। जैसे कि आजकल एलियन को सृष्टि का जनक बताया जा रहा है। 1982 में प्रसिद्ध अंतिरक्ष वैज्ञानिक फ्रायड हायल ने यह सिद्धांत प्रतिपादित करके दुनिया को आश्चर्य और संशय में डाल दिया कि किन्हीं अंतरिक्षवासियों ने सुदूर प्राचीन काल में पृथ्वी को जीवन पर स्थापित किया। डार्विन के बंदर से मनुष्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धांत को हायल ने बड़ी चुनौती दी हुई है। हायल ने रॉयल इंस्टीट्यूट लंदन में आयोजित हुई वैज्ञानिकों की गोष्ठी में इस सिद्धांत का रहस्योद्घाटन करते हुए कहा था - ‘जीवन की रासायनिक संरचना इतनी जटिल है कि वह क्रमिक या आकस्मिक घटनाओं से उत्सर्जित नहीं हो सकती है। जैसा कि विकासवादी विश्वास करते हैं। जीव की उत्पत्ति ब्रह्मांड के ध्रुव सिद्धांतों के अनुसार हुई है। यह सिद्धांत भारतीय दर्शन के जीवोत्पत्ति के पाँच तत्त्वों- धरती, आकाश, अग्नि, वायु और जल के दर्शन के निकट है। इस विषय पर हायल की ‘एव्यूलेशन फ्रॉम स्पेस’ पुस्तक भी है।  

अवतारों के इस जैव-विकास के क्रम में जहाँ क्रमशः सृजनात्मकता है, वहीं जीव-विज्ञान संबंधी तार्किक सुसंगति भी है। हालाँकि सिंह से मनुष्य के विकसित रूप को अवतारवादी अवधारणा के विरोधी यह तर्क देते हैं कि मनुष्य व चिंपैंजी के डीएनए में आनुवांशिक स्तर पर छियानवें प्रतिशत समानता मानी जाती है: लेकिन इसी प्रजाति के गोरिल्ला और वनमानुश (ओरांगऊंटान) से इस रिश्ते में बहुत बड़ा अंतर है। जीव विज्ञानी यह मानते हैं कि दस लाख साल पहले ही मनुष्य में चिंपैंजी से कुछ गुण विकसित हुए थे। इन गुणों में उम्र अधिक होना और बचपन की अवधि बड़ी हो जाना माने जाते हैं। पहले दोनों प्राणियों में इन गुणों में ज्यादा अंतर नहीं था। चिंपैंजी से मनुष्य जीवन की उत्पत्ति संबंधी अनुसंधान में सबसे बड़ी खलने वाली कमी यह है कि पूर्वज जीवों या आदिम अणुओं के जीवाश्म नहीं मिल पा रहे हैं। जब महारसायन अर्थात डीएनए के आदिम जीवाश्म आधिकारिक रूप से मिले ही नहीं हैं, तो डार्विन कैसे कह सकते हैं कि कथित बंदर से मनुष्य की उत्पत्ति हुई ? हालाँकि डार्विन के विकासवाद को प्रमाणित करने वाले जैविक विश्व में प्रकृति चयन, अनुकूलन और प्रजाति सृजन के अनेक प्रमाण मिलते हैं, लेकिन बंदर से मनुष्य की उत्पत्ति सिद्ध करने के लिए इन प्रमाणों को पर्याप्त नहीं कहा जा सकता, शायद इसीलिए जैव रसायन शास्त्र मानव या जीव कोशिका की कई सजीव आणविक संरचना का ब्यौरा तो देता है, लेकिन यह रहस्योद्घाटन नहीं करता कि अंततः ये सरंचनाएँ किस प्राकृतिक-प्रक्रिया से अस्तित्व में आईं। गोया, मनुष्य के जैविक विकास-क्रम में धरती पर मनुष्य की उत्पत्ति कैसे हुई, यह अंतिम निर्णय होना अभी शेष है, इस स्थिति में दशावतारों की क्रमिक भौतिकवादी अवधारणा ज्यादा पुष्ट और तर्कसंगत है। इसीलिए अयोध्या के राम मंदिर में रामलला को दशावतारों के साथ प्रकट किया गया है। 

सम्पर्कः शब्दार्थ 49 श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 0942548822, 9981061100

दोहेः लौट आये श्री राम

  - शशि पाधा

जन्म स्थली निज भवन में, आए हैं श्री  राम।

मुदित मन जग देखता, मूरत शुभ अभिराम।।


दिव्य ज्योत झिलमिल जली, राम लला के धाम। 

निशितारों ने लिख दिया, कण कण पर श्री राम।।


स्वागत में मुखरित हुई, सरयू की जलधार। 

पावन नगरी राम की , सतरंगी शृंगार।।


शंखनाद की गूँज में, गूंजित है इक नाम।

पहने अब हर भक्त ने, राम नाम परिधान।।


उत्सव मिथिला नगर में, सीता का घर द्वार।

रीझ-रीझ भिजवा दिया, मिष्टान्नों का भार।।।


प्रभु मूरत है आँख में, अधरों पे है नाम।

अक्षर अक्षर लिख दिया, मन पृष्ठों पे राम।।


आँखों में करुणा भरी, धनुष धरा है हाथ।

शौर्य औ संकल्प का, देखा अद्भुत साथ।।


वचनबद्ध दशरथ हुए, राम गए  वनवास।

धरती काँपी रुदन से, बरस गया आकाश।।


राम लखन सीता धरा, वनवासी का वेश।

प्राणशून्य दशरथ हुए, अँखियाँ थिर अनिमेष।।


माताओं  की आँख से अविरल झरता नीर।

 कैसी थी दारुण  घड़ी, कौन बँधाए धीर


पवन पुत्र के हिय बसे, विष्णु के अवतार।

पापी रावण का किया, लंका में संहार।।


जन- रक्षा ही धर्म है, दयावान श्री राम।

 हितकारी हर कर्म है,जन सेवा निष्काम।।


 अभिनन्दन की शुभ घड़ी, जन जन गाए गीत।

  दिशा दिशा में गूँजता,  मंगलमय संगीत।।


घर-घर मंदिर सा सजा, द्वारे  वन्दनवार।

 धरती से आकाश तक,लड़ियाँ, पुष्पित हार।।


वर्जिनिया, यूएसए


प्रकृतिः चारधाम हाईवे और हिमालय का पर्यावरण

  - भारत डोगरा 

हिमालय के बारे में एक बड़ी वैज्ञानिक सच्चाई यह है कि ये पर्वत बाहरी तौर पर कितने ही भव्य व विशाल हों, पर भू-विज्ञान के स्तर पर इनकी आयु अपेक्षाकृत कम है, इनकी प्राकृतिक निर्माण प्रक्रियाएँ अभी चल रही हैं, इस कारण इनमें अस्थिरता व हलचल है। इस वजह से इनसे अधिक छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए, जहाँ ऐसा करना निहायत ज़रूरी है, वहाँ बहुत सावधानी के साथ करना चाहिए।

अत: यहाँ के विभिन्न निर्माणों के सम्बंध में भू-वैज्ञानिक प्राय: हमें याद दिलाते रहते हैं कि विभिन्न ज़रूरी सावधानियों को अपनाओ - आगे बढ़ने से पहले भूमि की ठीक से जाँच करो, उतना ही निर्माण करो, जितना ज़रूरी है, उसे अनावश्यक रूप से बड़ा न करो व अनावश्यक विस्तार से बचो। विशेष तौर पर भू-वैज्ञानिक व पर्यावरणविद् कहते रहे हैं कि निर्माण में विस्फोटकों के उपयोग से बचें या इसे न्यूनतम रखें, वृक्ष-कटाई को न्यूनतम रखा जाए, प्राकृतिक वनों की भरपूर रक्षा की जाए। प्राकृतिक वनों की भरपाई नए वृक्षारोपण से नहीं हो सकती है। किसी बड़े निर्माण से पहले मलबे की सही व्यवस्था का नियोजन पहले करना होगा, उचित निपटान करना होगा। सबसे महत्त्वपूर्ण सावधानी यह रखनी होगी कि मलबा नदियों में न फेंके व हर तरह से सुनिश्चित करें कि नदियाँ सुरक्षित बनी रहें।

दुर्भाग्यवश हिमालय में निर्माण कार्यों सम्बंधी इन सावधानियों को वैज्ञानिक पत्रों में चाहे जितना महत्त्व मिला हो, लेकिन ज़मीनी स्तर पर हाल में इनकी बड़े स्तर पर और बार-बार अवहेलना हुई है। इस स्थिति में अनेक वैज्ञानिकों व पर्यावरणविदों ने यह माँग की है कि विभिन्न निर्माण परियोजनाओं के पर्यावरणीय आकलन को मज़बूत किया जाए, ताकि सावधानियों व चेतावनियों का पालन हो सके।

उत्तराखंड हिमालय में करोड़ों लोगों की श्रद्धा का केन्द्र बने अनेक तीर्थ स्थान हैं, जिनमें चार तीर्थस्थान या चार धाम (गंगोत्री, यमनोत्री, बद्रीनाथ, केदारनाथ) विशेषकर विख्यात हैं। इन चार धामों तक पहुँचने वाले, इन्हें जोड़ने वाले हाईवे को चौड़ा करने और हर मौसम में इनकी यात्रा सुनिश्चित करवाने वाली परियोजना बनाई गई। इसमें हाईवे को अत्यधिक चौड़ा करने व इसमें अनेक सुरंगें बनाने का प्रावधान था। इससे बहुत वृक्षों को काटना होता व हिमालय में अत्यधिक छेड़छाड़ होने पर पर्यावरण रक्षा के आधार पर विरोध हो सकता था; अत: इन निर्माणों को तेज़ी से आगे बढ़ाने वालों ने प्राय: यह प्रयास किया कि इस चारधाम हाईवे विस्तार को कई छोटे-छोटे भागों में बाँटकर इसे पर्यावरणीय आकलन के दायरे से काफी हद तक बाहर कर लिया। ऊंचे हिमालय पहाड़ों में जो क्षेत्र पर्यावरण की दृष्टि से बहुत संवेदनशील हैं, अब उनकी रक्षा के लिए चल रहे प्रयास, वहाँ के वृक्षों की रक्षा के प्रयास भी अधिक कठिन हो गए। तिस पर अदालती स्तर पर हरी झंडी मिलने के बाद चारधाम हाईवे व सुरंगों के निर्माण कार्य और भी तेज़ी से आगे बढ़ने लगे।

यदि भू-वैज्ञानिकों की बात मानी जाती, तो हाईवे को उतना ही चौड़ा किया जाता जितना कि बहुत ज़रूरी था, और इस तरह बहुत से पेड़ों को कटने से बचा लिया जाता और बहुत सी आजीविकाओं व खेतों की भी रक्षा हो जाती। यदि भू-वैज्ञानिकों की बात मानी जाती, तो विस्फोटकों का उपयोग न्यूनतम होता, मलबे की मात्रा को न्यूनतम किया जाता व उसको सुरक्षित तौर पर ठिकाने लगाने की पूरी तैयारी की जाती। तब मलबा डालने से या अन्य कारणों से नदियों की कोई क्षति न होती, सुरंगों का निर्माण वहीं होता जहाँ बहुत ज़रूरी था तथा वह भी सारी सावधानियों के साथ। पर इन सब सावधानियों का उल्लंघन होता रहा व परिणाम यह हुआ कि यहाँ बड़ी संख्या में वृक्ष कटने लगे व भू-स्खलन व बाढ़ का खतरा बढ़ने लगा, नदियाँ अधिक संकटग्रस्त होने लगीं व अनेक प्राकृतिक जल-स्रोत नष्ट होने लगे व हाईवे के आसपास के गाँवों में बहुत- सी ऐसी क्षति होने लगी जिनसे बचा जा सकता था। सड़क पर होने वाले भूस्खलन तो बाहरी लोगों को नज़र भी आते थे, पर गाँवों में होने वाली क्षति तो प्राय: सामने भी नहीं आ पाई।

इसी सिलसिले में सिल्कयारा की दुर्घटना हुई व एक बड़े व सराहनीय बचाव प्रयास के बाद ही इस सुरंग में फंसे 41 मज़दूरों को बचाया जा सका। इस बचाव प्रयास में तथाकथित ‘रैट माईनर्स’ यानी बहुत निर्धनता की स्थिति में रहने वाले खनिकों का विशेष योगदान रहा। इस हादसे के दौरान ही यह तथ्य सामने आया कि इस सुरंग निर्माण के दौर में पहले भी अनेक दुर्घटनाएँ हो चुकी हैं; लेकिन इसके बावजूद समुचित सावधानियाँ नहीं अपनाई गई थीं। दुर्घटना के बाद अन्य सुरंग-निर्माणों में सुरक्षा आकलन के निर्देश भी जारी किए गए। उम्मीद है कि इसका असर पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में भी होगा जहाँ हाल ही में उच्च स्तर पर अधिक सुरंग निर्माण पर जोर दिया गया था।

हिमालय क्षेत्र में अधिक तीर्थ यात्रियों व पर्यटकों का स्वागत करना अच्छा लगता है, पर इसके लिए ऐसे तौर-तरीके नहीं अपनाने चाहिए जिनसे तीर्थ स्थान व उनके प्रवेश मार्ग ही संकटग्रस्त हो जाएँ तथा पर्यावरण की बहुत क्षति हो जाए।

पर्यटक हिमालय के किसी सुंदर स्थान पर जाना चाहते हैं; पर यदि विकास के नाम पर अत्यधिक निर्माण से उस स्थान का प्राकृतिक सौन्दर्य ही नष्ट कर दिया जाए तो फिर यह विकास है या विनाश?

तीर्थ यात्रा तो वैसे भी आध्यात्मिकता से जुड़ी है, तो फिर तीर्थ स्थानों पर वाहनों का प्रदूषण, हेलीकॉप्टरों का शोर व वृक्षों का विनाश कैसे उचित ठहराया जा सकता है?

तीर्थ स्थानों व पर्यटन के संतुलित विकास से, विनाशमुक्त विकास से, स्थानीय लोगों की टिकाऊ आजीविकाएँ जुड़ सकती हैं; वे पर्यटकों व तीर्थ यात्रियों के लिए हिमालय के तरह-तरह के स्वास्थ्य लाभ देने वाले खाद्य व औषधियाँ जुटा सकते हैं।

सामरिक दृष्टि से भी हिमालय क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण है और सड़कें व मार्ग सुरक्षित रहें, भूस्खलन व बाढ़ का खतरा न्यूनतम रहे यह सैनिकों के सुरक्षित आवागमन के लिए भी आवश्यक है।

और मुद्दा केवल चारधाम हाईवे का नहीं है; बल्कि हिमालय का अधिक व्यापक मुद्दा है। यहाँ एक ओर सैकड़ों गाँव ऐसे हैं जहाँ सड़क या मार्ग के अभाव में गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति या प्रसव-पीड़ा से गुज़र रही महिला को चारपाई पर या पीठ पर लादकर मीलों चलना पड़ता है, जबकि अनावश्यक तौर पर चौड़ी सड़कों, अनगिनत सुरंगों के निर्माण व वृक्षों की कटाई से पर्यावरण की अत्यधिक क्षति होती है व जनजीवन संकटग्रस्त होता है, आपदाएँ बढ़ती हैं।

अत: ज़रूरी है कि सड़क व हाईवे निर्माण में विशेषकर संतुलित, सुलझी हुई नीति अपनाई जाए जिससे लोगों की सुरक्षा बढ़े व पर्यावरण की रक्षा हो। 

कविताः बसंत आ गया

 - अज्ञेय

मलयज का झोंका बुला गया

खेलते से स्पर्श से

रोम रोम को कँपा गया

जागो जागो

जागो सखि़ वसन्त आ गया जागो

पीपल की सूखी खाल स्निग्ध हो चली

 

सिरिस ने रेशम से वेणी बाँध ली

नीम के भी बौर में मिठास देख

हँस उठी है कचनार की कली

टेसुओं की आरती सजा के

बन गयी वधू वनस्थली

 

स्नेह- भरे बादलों से

व्योम छा गया

जागो जागो

जागो सखि़ वसन्त आ गया जागो

 

चेत उठी ढीली देह में लहू की धार

बेंध गई मानस को दूर की पुकार

गूँज उठा दिग दिगन्त

चीन्ह के दुरन्त वह स्वर बार

“सुनो सखि! सुनो बन्धु!

प्यार ही में यौवन है यौवन में प्यार!”

 

आज मधुदूत निज

गीत गा गया

जागो जागो

जागो सखि वसन्त आ गया, जागो!


कविताः बसन्त की अगवानी

 – नागार्जुन

दूर कहीं पर अमराई में कोयल बोली

परत लगी चढ़ने झींगुर की शहनाई पर

वृद्ध वनस्पतियों की ठूँठी शाखाओं में

पोर-पोर टहनी-टहनी का लगा दहकने

टूसे निकले, मुकुलों के गुच्छे गदराए

अलसी के नीले पुष्पों पर नभ मु्स्काया

मुखर हुई बाँसुरी, उँगलियाँ लगीं थिरकने

पिचके गालों तक पर है कुंकुम न्यौछावर

टूट पड़े भौंरे रसाल की मंजरियों पर

मुरक न जाएँ सहजन की ये तुनुक टहनियाँ

मधुमक्खी के झुंड भिड़े हैं डाल-डाल में

जौ-गेहूँ की हरी-हरी वालों पर छाई

स्मित-भास्वर कुसुमाकर की आशीष रंगीली

 

शीत समीर, गुलाबी जाड़ा, धूप सुनहली

जग वसंत की अगवानी में बाहर निकला

माँ सरस्वती ठौर-ठौर पर पड़ी दिखाई

प्रज्ञा की उस देवी का अभिवादन करने

आस्तिक-नास्तिक सभी झुक गए, माँ मुस्काई

बोली--बेटे, लक्ष्मी का अपमान न करना

जैसी मैं हूँ, वह भी वैसी माँ है तेरी

धूर्तों ने झगड़े की बातें फैलाई हैं

हम दोनों ही मिल-जुलकर संसार चलातीं

बुद्धि और वैभव दोनों यदि साथ रहेंगे

जन-जीवन का यान तभी आगे निकलेगा

इतना कहकर मौन शारदा हुई तिरोहित

दूर कहीं पर कोयल फिर-फिर रही कूकती

झींगुर की शहनाई बिल्कुल बंद हो गई


खान- पानः सब्ज़ियाँ अब उतनी पौष्टिक नहीं रहीं

तंदुरुस्त बने रहने के लिए जंक फूड, तला-भुना खाने की बजाय अक्सर फल, सलाद, सब्ज़ियों को भोजन में
शामिल करने की सलाह दी जाती है। लेकिन हम शायद इस बात से अनभिज्ञ हैं कि पिछले सत्तर सालों में इन ‘सेहतमंद’ चीज़ों में भी पोषक तत्वों की मात्रा घट गई है।

वर्ष 2004 में जर्नल ऑफ दी अमेरिकन कॉलेज ऑफ न्यूट्रिशन में एक अध्ययन में 1950 से 1999 के बीच प्रकाशित यूएस कृषि विभाग के डैटा के आधार पर बताया गया था कि 43 फसलों में प्रोटीन, कैल्शियम, फॉस्फोरस, आयरन, राइबोफ्लेविन, विटामिन सी जैसे 13 पोषक तत्वों में परिवर्तन दिखे थे। कमी कितनी हुई यह हर पोषक तत्व और फल-सब्ज़ी के प्रकार पर निर्भर है। लेकिन सामान्यत: प्रोटीन में 6 प्रतिशत से लेकर राइबोफ्लेविन में 38 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई है। खासकर ब्रोकली, केल (एक तरह की गोभी) और सरसों के साग में कैल्शियम में सबसे अधिक कमी आई है। वहीं चार्ड, खीरे और शलजम में आयरन की मात्रा में काफी कमी हुई है। शतावरी, कोलार्ड (एक अन्य तरह की गोभी), सरसों का साग और शलजम के पत्तों में विटामिन सी काफी कम हो गया है। इसके बाद हुए अन्य अध्ययनों में भी इसी तरह के परिणाम देखने को मिले हैं।

अनाजों में भी इसी तरह की कमी देखने को मिली है। 2020 में साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित अध्ययन में पाया गया था कि 1955 से 2016 के बीच गेहूंँ में प्रोटीन की मात्रा 23 प्रतिशत कम हो गई है, साथ ही आयरन, मैंग्नीज़, जस्ता और मैग्नीशियम भी घटे हैं।

मांसाहारी भी कम पोषक तत्व वाले भोजन की समस्या से अछूते नहीं हैं। पशु अब कम पौष्टिक घास और अनाज खा रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप मांस और अन्य पशु उत्पाद अब पहले की तुलना में कम पौष्टिक हो गए हैं।

वाशिंगटन विश्वविद्यालय के भू-आकृति विज्ञानी डेविड आर. मॉन्टगोमेरी और जलवायु परिवर्तन एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञ क्रिस्टी एबी बताते हैं कि इस समस्या के लिए कई कारक ज़िम्मेदार हैं। इनमें एक है फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए अपनाई गईं आधुनिक कृषि पद्धतियां।

पौधों को शीघ्र और बड़ा उगाने के लिए अपनाए गए तरीके में पौधे मिट्टी से पर्याप्त पोषक तत्व नहीं सोख पाते या उन्हें संश्लेषित नहीं कर पाते हैं।

फिर अधिक उपज से यह भी होता है कि मिट्टी से अवशोषित पोषक तत्व अधिक फलों में बंट जाते हैं, नतीजतन फल-सब्ज़ियों में पोषक तत्व कम होते हैं।

उच्च पैदावर के कारण होने वाली मृदा की क्षति भी इस समस्या का एक कारण है। गेहूँ, मक्का, चावल, सोयाबीन, आलू, केला, रतालू और सन सभी फसलों की जड़ें कवक के साथ साझेदारी करती हैं जिससे पौधों द्वारा मिट्टी से पोषक तत्व और पानी लेने की क्षमता बढ़ती है। उच्च पैदावार वाली खेती से मिट्टी खराब हो जाती है जिससे कुछ हद तक कवक और पौधों की साझेदारी प्रभावित होती है।

कार्बन डाईऑक्साइड का बढ़ता स्तर भी हमारे खाद्य पदार्थों की पौष्टिकता कम कर रहा है। पौधे वायुमंडल से कार्बन डाईऑक्साइड लेते हैं, और वृद्धि के लिए इसके कार्बन का उपयोग करते हैं। लेकिन जब गेहूँ, चावल, जौं और आलू समेत बाकी फसलों को उच्च कार्बन डाईऑक्साइड मिलती है तो उनमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा बढ़ जाती है। इसके अलावा, जब पौधों में कार्बन डाईऑक्साइड अधिक मात्रा में होती है तो ये मिट्टी से कम पानी खींचते हैं, जिसका अर्थ है कि वे मिट्टी से सूक्ष्म पोषक तत्व भी कम ले रहे हैं।

2018 में साइंस एडवांसेज़ में प्रकाशित नतीजे बताते हैं कि उच्च कार्बन डाईऑक्साइड के कारण 18 किस्म की धान में प्रोटीन, आयरन, ज़िंक और कई बी विटामिन कम पाए गए थे।

यदि इन पोषक तत्वों में और कमी आई तो पोषक तत्वों की कमी से होने वाले रोगों का खतरा बढ़ सकता है या जीर्ण रोगों के प्रति जोखिमग्रस्त हो सकते हैं। और इसका असर उन लोगों पर, खासकर निम्न और मध्यम आय वाले लोगों पर, अधिक होगा जो ऊर्जा और पोषण के लिए मुख्यत: चावल- गेहूँ जैसे अनाजों पर निर्भर हैं और पोषण के अन्य स्रोतों का खर्च वहन नहीं कर सकते।

यह तो सुनने में आता रहता है कि अब सब्ज़ियों या फलों में वो स्वाद नहीं रहा। देखा गया है कि कई सारे पोषक तत्व फल-सब्ज़ियों और अनाज के स्वाद में इजाफा करते हैं। इनकी कमी फल-सब्ज़ियों के स्वाद को भी प्रभावित करेंगे।

बुरी खबर यह है कि कई अनुमान मॉडलों का कहना है कि आगे भी आलू, चावल, गेहूंँ और जौं के प्रोटीन में 6 से 14 प्रतिशत की कमी आ सकती है। नतीजतन भारत समेत 18 देशों के आहार से 5 प्रतिशत प्रोटीन घट जाएगा।

तो इस समस्या से कैसे निपटा जाए? मिट्टी में सुधार के लिए एक तरीका है संपोषी खेती। पीअरजे: लाइफ एंड एनवायरनमेंट पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि संपोषी खेती से फसलों में कुछ विटामिन, खनिज और पादप-रसायनों का स्तर बढ़ता है, मिट्टी का जैविक स्वास्थ्य बेहतर होता है। इसके लिए पहला कदम यह है कि जितना संभव हो सके मिट्टी को खाली छोड़ दिया जाए और जुताई कम कर दी जाए। मिट्टी को ढंकने वाली तिपतिया घास, राई घास, या वेच लगाकर मिट्टी का कटाव और खरपतवार की वृद्धि रोकी जा सकती है। और खेत में बदल-बदल कर फसलें लगाने से पोषक तत्व में फायदा हो सकता है।

लेकिन जब तक पैदावार में पोषण बहाल नहीं होता तब तक क्या करें? 

पहले तो इस खबर से घबराकर लोग फल-सब्जियाँ खाना छोड़ या कम कर पोषण पूरकों का रुख न करें। बल्कि इससे वाकिफ रहें कि उनका भोजन कैसे उगाया जा रहा है। हम क्या खा रहे हैं यह पता होना जितना महत्त्वपूर्ण है उतना ही महत्त्वपूर्ण यह जानना भी है कि हम जो खा रहे हैं वह कैसे उगाया जा रहा है। और पोषक तत्वों की कमी की पूर्ति के लिए अलग-अलग तरह और रंग की फल-सब्जियाँ आहार में शामिल करें। पृथ्वी पर मौजूदा सबसे स्वास्थ्यवर्धक खाद्य फल, सब्जियाँ और अनाज ही हैं। (स्रोत फीचर्स)

विकासः फैशन को टीकाऊ बनाना होगा

 - अपर्णा विश्वनाथ

मनुष्यों ने अपनी बेहिसाब जरूरतों की आपूर्ति और बाकी सुख-सुविधाएँ भी पृथ्वी से प्राप्त की, न कि अन्य ग्रहों से। ऐसा इसलिए भी कि नौ ग्रहों में पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है, जिसमें जीवन जीने के लिए सभी कारक मौजूद हैं।  

माता भूमि पुत्रोहं पृथिव्या: अर्थात् ‘पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।’

‘Earth is my mother I am her son’

अथर्ववेद में वर्णित भूमि सूक्तों में यह एक है। जहाँ कहा गया कि पृथ्वी हमारी माँ और हम उनके बच्चे हैं। पृथ्वी को माता के रूप में कहा गया है। हम पृथ्वी की वंदना करते हैं; लेकिन यह सूक्ति आज के समय में सिर्फ सूक्ति बनकर रह गई है। क्यों और कैसे का जवाब हम सभी के जानते हैं।

अति उपभोक्तावाद की प्रवृत्ति से आज हम धरती की रक्षक की जगह भक्षक बन गए हैं। ज़रूरत से ज़्यादा खाना, पानी, जमीन-जायदाद और अब तो कपड़ा भी; पर हक़ जताने की होड़ में हमने दूसरे के हिस्से के हक़ को छीनना प्रारंभ कर दिया है। मनुष्य ही नहीं बल्कि पृथ्वी पर लाखों ऐसी प्रजातियाँ हैं जो किसी ना किसी रूप में हम मनुष्यों के अति उपभोग का शिकार हो रहे हैं।

मनुष्य हजारों वर्षों से इसी धरती पर रह कर रोटी कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की नींव रखते हुए अपनी सभ्यता और संस्कृति के विकास की निरंतर यात्रा में चल रहा है। विकास की यात्रा ने मनुष्य की अति महत्वाकांक्षी, समाज में व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, नवपरिवर्तन की चाह और खोजी प्रवृत्तियों ने विलासिता को भी जन्म दिया।

समयान्तर में विकास की संस्कृति उपभोगवादी और बाजारवादी की संस्कृति में तब्दील होती चली गई। 

दिखावे और विलासिता की होड़ इस कदर हावी हुई कि मनुष्यों ने प्रकृति से छीनना प्रारंभ कर दिया। अंततोगत्वा प्रकृति और पर्यावरण का दोहन करना आदत में शुमार होता चला गया। 

विस्फोटक, विकराल रूप ले चुकी जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनेक क्रान्ति जैसे हरित क्रांति, औद्योगिक क्रांति, श्वेत क्रांति के अलावा समय समय पर अनेकों क्रान्ति हुए। बेशक जिसकी वजह से हम आर्थिक रूप से सुदृढ़ भी हुए हैं। इन्हीं में से एक कपड़ा उद्योग का क्रान्ति भी है।

कपड़ा उद्योग का औद्योगिक क्रान्ति में अहम योगदान था।

हथकरघा की जगह मशीनों ने और हस्तकरघा गृह उद्योग की जगह कारखानों ने ले ली। लेकिन यहाँ भी सिक्के के दो पहलू है। आज हम फैशन की दुनिया के बेताज बादशाह बनने की होड़ में दौड़ तो रहे हैं; लेकिन यह प्रकृति और पर्यावरण पर किस कदर नुकसान पहुँचा रहा है शायद इस बात से अनभिज्ञ हैं।

तीन-चार दशक पहले अगर थोड़ा सा फ़्लैश बैक में हम देखेंगे हैं तो पाएँगे कि एक साधारण आयवर्ग वाले के यहाँ पूरे परिवार के लिए कपड़े रखने के लिए मात्र एक अलमारी हुआ करती थी। कहने का मतलब यह कि कपड़े सीमित मात्रा में हुआ करते थे। कुछ बाहर के लिए और कुछ शादी-ब्याह के लिए। कपड़ों की खरीदारी शादी-ब्याह या प्रमुख त्योहार पर ही होती थी। 

आज पर आते हैं। आज कपड़ों की खरीदारी किसी मौके की मोहताज नहीं है। आज चाहे कोई वर्ग के हो, आए दिन कुछ नया के नाम पर कपड़े खरीदते रहते हैं। आज परिवार के हर सदस्यों की अपनी अलमारी है। बड़ों की, बच्चों की अलग-अलग। तो आप कहेंगे कि यह आम बात है, इसमें कौन सी बड़ी बात है। बच्चे, महिलाएँ, पुरुष कोई भी पीछे नहीं इस दिखावे की होड़ में। 

कभी सीजन के कपड़े, कभी न्यू कलेक्शन तो कभी क्लियरेंस सेल, लुभावनी छूठ, तो कभी गिफ्ट के चक्कर में हम अनचाही सस्ते कपड़ों की खरीदारी करते हैं। कुछ समय पहनते हैं या कभी कभी तो बिना पहने ही छोड़ देते हैं।

लेकिन इस बार कपड़ों की खरीदारी करते वक्त थोड़ा ठहरिए और विचारिए कि -

★क्या हमारे कपड़ों की अलमारी पर्यावरण को प्रभावित कर रही है?

★क्या हम फास्ट फैशन के शिकार नहीं हो रहे हैं?

★फैशन की अंधाधुन्ध भागम-भाग में क्या हम प्रकृति का विनाश तो नहीं कर रहें हैं?

★क्या हम मनुष्य प्रकृति के सबसे बड़े दुश्मन तो नहीं बन रहें हैं?

आप कहेंगे क्यों भाई पैसा मेरा, क्रेडिट कार्ड मेरा। तो फैशन करना मेरी मर्जी और मेरा हक़ बनता है ना।

सही कहा, हम अपने अधिकारों में इस तरह उलझे हुए हैं कि कर्तव्यों के पीछे कभी सोचना क्या ध्यान भी नहीं जाता है। आज पूरी दुनिया ही गैरजरूरी फ़ैशन के पीछे पागलों की तरह सरपट दौड़ रही है। फैशन और शॉपिंग के नाम भारी संख्या में लोग रोज नई पोशाक खरीदते हैं और पुरानी फेंक देते हैं। धन का अनावश्यक अपचय तो है ही इसके अलावा इससे पर्यावरण को भी भारी नुकसान हो रहा है।

अब आप कहेंगे कपड़ा फ़ैशन और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक है। बीच में यह प्रकृति पर्यावरण और कर्तव्य से क्या लेना-देना। तो इकोवॉच की सुनिए - जो यूएस की एक न्यूज साइट है (यह पर्यावरण संबंधी मुद्दों के बारे में लोगों को जागरुक कर करती है ) ने तेल इंडस्ट्री के बाद गारमेंट इंडस्ट्री को प्रकृति के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक बताया है। क्योंकि फास्ट फैशन में बहुत ही फास्ट तरीके से हमारे प्राकृतिक जल स्त्रोतों, हवा और जमीं को खराब करना शुरू कर दिया है।

वैज्ञानिकों का भी कहना है कि हमारे फैशन और कपड़ों के चक्कर में दुनिया सबसे ज्यादा गंदी हो रही है। कुल मिलाकर जो कपड़े हमें खूबसूरत दिखाते हैं, वेअसल में दुनिया को गंदा बना रहे हैं।

कैसे...? 

‌फास्ट फैशन के नाम पर पूरी दुनिया में लगभग 100 अरब से ज़्यादा कपड़े तैयार होने लगे हैं। आज गारमेंट उद्योग, तेल उद्योग के बाद दूसरा बड़ा करोबार होता जा रहा है। हर देश में लगभग गारमेंट मिलें हैं। जिनमें हजारों तरह के रसायनों का इस्तेमाल होता है।

यह हमारे पर्यावरण को कैसे नुकसान पहुँचा रहा है, यह आप नीचे लिखे बातों से अनुमान लगा सकते हैं -

★दुनियाभर में लोग सबसे ज्यादा सूती (कॉटन) के कपड़े पसंद किए और पहने जाते हैं। इसके लिए कच्चा माल कपास प्राकृतिक तो है, लेकिन इसकी खेती पर्यावरण के लिए नुकसानदेय है। क्योंकि कपास की खेती के लिए तुलनात्मक रूप से ज्यादा पानी, ज्यादा खेती के लिए खाद, ज्यादा कीटनाशक और दूसरे हानिकारक रसायनों की भी बहुत ज़्यादा ज़रूरत होती है। इसके अलावा दूसरे कपास किसी भी फसल के मुक़ाबले धरती की उर्वरक क्षमता को कम करती हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक सूती की सिर्फ़ एक टी-शर्ट बनाने के लिए लगभग 2,700 लीटर पानी की खपत होती है। तो आप अनुमान लगा सकते हैं कि हम पर्यावरण को कैसे क्षति पहुँचा रहे हैं।

★कपड़ों को रंग-बिरंगे रासायनिक रंगों से डाइ किया जाता है। बचे हुए डाय नालों से होते नदी और समुद्र में मिलते हैं और साफ पानी को प्रदूषित करते हैं। इसके अलावा कपड़े बनने के प्रोसेस में जहरीले रसायन के अलावा कपड़ों के महीन रेशे कण भी पानी में जाकर विलय होते हैं। यह सभी जल में रहने वाले प्रजातियों के लिए जहर के समान है।

इसके अलावा भी अनगिनत नुकसान सीधे प्रकृति और पर्यावरण को झेलना पड़ता है। कपड़ा बनने, इस्तेमाल करने से लेकर फेंकने तक के सफ़र में हर बार और बार-बार हम प्रकृति को प्रदूषित करते हैं। 

★ Indiatimes.com के एक आलेख में के अनुसार 1 किग्रा. कपड़ा बनने में 23 किग्रा. ग्रीनहाउस गैस का उत्पादन होता है। ये समझना होगा कि जितनी जरूरत है उतनी ही खरीदे ताकि प्रकृति पर अनावश्यक बोझ न पड़े और प्रकृति बची रहे।

★सस्टेनेबल / इको-फैशन

धरती पर कपड़ों के अनावश्यक बोझ तथा इससे होने वाले अन्य नुकसानों को कम करने के लिए सबसे पहले कपड़ा उद्योग को ही सामने आकर कठोर कदम उठाने होंगे और सस्ते फैशनेबल कपड़ों की जगह *सस्टेनेबल (टिकाऊ/ स्थायी) जिसे *इको-फैशन* भी कहा जाता है,कपड़ों के उत्पादन को बढ़ावा देना होगा।

हम हर वर्ष  *विश्व पृथ्वी दिवस (World Earth Day) और विश्व पर्यावरण (World Environment Day) मनाते है। पृथ्वी दिवस को मनाने के अनेक उद्देश्यों में एक उद्देश्य मानव निर्मित कपड़ों से प्रकृति को होने वाले नुकसानों से बचाने के लिए उपायों पर विचार को भी अमल में लाया जाना चाहिए। नहीं तो हमारे फैशन की कीमत पृथ्वी को चुकानी पड़ेगी।

इसलिए हमारे पृथ्वी ग्रह तथा पर्यावरण के प्रति दृष्टिकोण में हमें सस्टेनेबिलिटी (टिकाउपन) के मुद्दे पर चर्चाएँ करनी होंगी।

संस्मरणः एक खूबसूरत तस्वीर

 - देवी नागरानी

बचपन की यादों में शामिल है उस कॉन्वेंट स्कूल के दिन, जहाँ क्रिश्चियन माहौल में चारों ओर शिक्षिकाओं के स्थान पर वहाँ स्थापित मठवासिनी महिलाएँ हमें दो तीन बार गिरिजाघर ले जातीं, जहाँ हम स्कूल के कार्यक्रम के बीच प्रतिदिन दो बार घुटने टेककर, सभी दिशाओं में हाथों को माथे और छाती से लगाते हुए प्रार्थना करते। यह आदत दिल में इस कदर समा गई कि बाद में यह दिल की धड़कन के साथ घुलमिल गई। 

आज 6 अप्रैल 2018 को, ‘होली नेम’ अस्पताल के cardiac थेरेपी सेंटर की ओर से मुझे ले जाने वाली गाड़ी की मेडिकल एस्कॉर्ट ड्राइवर ने वही किया, जब हम एक चर्च को पार कर रहे थे। उसकी आँखों की चमकीली नज़र और गाड़ी चलाते समय शांतिपूर्ण हावभाव ने मेरा ध्यान खींचा और मैं उसके साथ बातचीत करने के लिए लालायित हो उठी।  मैं उसकी ड्राइविंग सीट के बगल में बैठी थी। 

‘क्या मैं आपका नाम जान सकती हूँ?’ मैंने गुफ्तगू का आगाज़ किया। 

इडेलका ... मुस्कुराते हुए उसने मेरी तरफ देखा।

यह एक भारतीय नाम ‘अलका’ की तरह लगता है’ ... मैंने बातचीत को लंबा करने के इरादे से कहा।

ओह, आप भारत से हैं। आप अच्छी अंग्रेजी बोल लेती हैं’। उसने मेरी ओर देखते हुए कहा। 

ओह धन्यवाद। इतना कहकर मैं कुछ देर चुप रही।

  cardic थेरेपी सेंटर का रास्ता करीब 18 मिनट का था। इसलिए मेरे पास उस महिला से बात करने और उसके बारे में और जानने का समय था। मौन के छोटे से अंतराल को तोड़ते हुए मैंने एक प्रश्न के साथ शुरुआत की….

‘आपको गाड़ी चलाना, लोगों को अलग- अलग जगहों से लेना, फिर उन्हें वापस छोड़ना, कभी-कभी उनकी मदद करने का यह काम कैसा लगता है? इस ठंड के मौसम में यह आसान नहीं है?’

‘हाँ मुझे पता है। मेरे पास एक पूर्णकालिक नौकरी है और यह मेरी अंशकालिक नौकरी है, सप्ताह में तीन बार, मंगलवार, गुरुवार और शनिवार। इसका मुझे अच्छा भुगतान मिल जाता है, इसलिए…’

‘फिर तो आप यकीनन घर देर से पहुँचती होंगी?’ मैंने अचानक यह अनुमान लगाना बंद कर दिया कि वह घुसपैठ करना पसंद नहीं कर सकती। 

‘जी सच कहा’,  पर हम परिवार के सब लोग मिलजुलकर सँभाल लेते हैं।  

मैंने महसूस किया कि इस देश में सबको व्यस्त रहना अच्छा है,  क्योंकि यह एक मजबूत वित्तीय स्थिति, अनुभव और नई चीजें सीखने के अवसर भी देता है।

‘क्या एक नौकरी से काम नहीं चल पाता?’ मैंने सवालिया नज़रों से उसकी ओर देखा। 

‘जी नहीं, मुझे अपने परिवार और बच्चों का पालन-पोषण करने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, इसलिए यह पार्ट टाइम कार्य कर रही हूँ।’

‘आपके कितने बच्चे हैं?’ मैंने एक तरह से माँ के दिल को छुआ।

‘छह बेटियाँ' और वह रहस्यमय ढंग से मुस्कुराई।

‘छह बेटियाँ...1’ मेरी प्रतिक्रिया पर उसने गर्दन मोड़कर मेरी ओर देखा।

‘हाँ... तीन अपनी और तीन गोद ली हुई ...’

‘दिलचस्प है... गोद ली हुई बेटियाँ?’  मैंने आँखों में तैरते कई सवालों के साथ उसकी ओर देखा। मेरी हैरान करने वाली प्रतिक्रिया को एक स्पष्ट पारदर्शी जवाब मिला, जब उसने कहा- “बस उन लड़कियों को अपनाना चाहती थी, जो अनाथ थीं या फिर जिनके सौतेले पिता थे।’

मेरा दिमाग पूरी तरह से असमंजस में था, उसके स्पष्ट जवाबों के बावजूद भी सीधे सोच नहीं पाई।

‘यह निर्णय आपका रहा या अपके पति का?’

‘मेरा…।’

‘उनका रिएक्शन क्या रहा उस समय?’ 

‘वे बिल्कुल भी तैयार नहीं थे, इस तथ्य के साथ कि हमारी अपनी बेटियाँ हैं, गोद क्यों लें? इसके अलावा वह इस कारण से बहुत अनिच्छुक थे कि इससे उनके खर्च और बच्चों की ज़रूरत से जुड़ी हर चीज़ की माँग बढ़ जाएगी।’

‘फिर...’

‘मैं अडिग थी और कुछ समय में हमने मिलकर तीन लड़कियों को अपनाया। पहले कुछ मुश्किल हुआ; लेकिन बाद में उन्होंने मुझे उन सभी कामों में मदद करनी शुरू कर दी, जो एक पिता को करनी चाहिए । 

‘वाह…. मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि आज की दुनिया में, जब अपने चार या अधिकतम पाँच लोगों के परिवार का पालन-पोषण करते हुए हम थक से जाते हैं, इस जोड़े ने स्वेच्छा से यह जिम्मेदारी अपने कँधों पर ले ली।’ 

‘आपकी उम्र क्या है?’

‘मैं चालीस साल की हूँ और मेरे पति बयालीस साल के हैं।‘

‘और अब आप छह बेटियों की माँ हैं... अविश्वसनीय... फिर भी विश्वास करना पड़ता है।’ 

‘थैंक्यू…. वह शान से बड़बड़ाई।’

‘इसलिए आप उनकी देखभाल, उन्हें स्कूल भेजने और घर के काम के अलावा ये दो नौकरियाँ कर लेतीं हैं। आफरीन है आपको।’

‘हाँ बिलकुल सही। मैं कड़ी मेहनत करती हूँ, दो काम करती हूँ।’ वह मेरी तरफ मुड़ी और मेरी आँखों में झाँका, शायद मेरी प्रतिक्रिया देखना चाहती थी। अपनी बात जारी रखते हुए उसने कहा- ‘मैं सुबह पाँच बजे उठती हूँ और वह सभी काम करती हूँ ,जो मुझे करने की जरूरत है और फिर आठ बजे अपनी पूर्णकालिक नौकरी के लिए जाती हूँ।’

‘माई गॉड, आप यह सब कैसे मैनेज कर लेती हैं?’ मैं हैरान होते हुए अपने भाव प्रकट किए। 

‘मेरे पति के सहयोग से, जो स्थिति के अनुरूप बन पाया है। वह रात में काम करता है और दिन में लड़कियों को स्कूल से लाता है, कभी-कभी खाना बनाता है… और कुछ अन्य काम जैसे खरीदारी, कपड़े धोने का काम भी करता है।’

‘आपकी बेटियाँ कितने साल की हैं?’

‘मेरी सबसे बड़ी दत्तक पुत्री अब 19 वर्ष की है, कॉलेज जा रही है। शाम को जब मैं घर लौटती हूँ, तो सभी मेरी मदद करने की कोशिश करतीं हैं। 

‘मुझे उनके सभी कार्य करते हुए देखकर वे सभी भी मेरा हाथ बँटाते हैं, मुझे प्यार करते हैं, मेरी देखभाल करते हैं, जैसे कोई अन्य बच्चा करता है।

‘ वाह अति उत्तम ...कार्य ...-कहकर मैं मुस्कराई।

‘हाँ….’ और वो बिना मेरी ओर देखे ही मुस्कुरा दी।

‘अविश्वसनीय... क्या मैं आपका फोन नंबर ले सकती हूँ और अगर मैं आपकी बेटियों और आपके परिवार के संबंधों के तथ्यों के बारे में अधिक जानना चाहूँ तो क्या मैं आपको कॉल कर सकती हूँ?

ओह ज़रूर... इतना कहकर उसने अपना नंबर मुझे बताया।

मैंने एक कागज के टुकड़े पर लिखा

Idelka, फोन: 201 354 8501 (6 अप्रैल 2018)

मैं तब चुप थी, आधुनिक दिनों में इस तरह के महान कार्य के सभी आयामों और संभावनाओं के बारे में सोचकर अपने विचारों में खो गई ...

‘मेरे तीन बच्चे हैं और तीन गोद लिए हैं।”

 एक झटके में कई सवाल उठ खड़े हुए कि उसने एक लड़के को गोद क्यों नहीं लिया, जैसा कि आम भारतीय मानसिकता वाले जोड़े करते हैं। लेकिन छह कन्याओं का विचार ही अब कृपा के सार का प्रसार कर रहा था, विचार की पवित्रता से दुनिया को और सुंदर बना रहा था, अनाथों को और सौतेले पिता के कुव्यवहार से एक महफूज़ छत के तले आश्रय देना... मैं बस चुपचाप इडेलका को देखने लगी। 

‘क्या मैं आपसे एक और सवाल पूछ सकती हूँ इडेलका?’ मैं और अधिक अनौपचारिक हो गई । यह एक माँ की दूसरी माँ के बीच की की बात थी। 

ज़रूर..

‘बेटा गोद लेने के बारे में क्यों नहीं सोचा...’

‘अरे नहीं, बिलकुल नहीं… आप जानती हैं, इसका मतलब यही है, कि लड़कियों के साथ लड़कियाँ सुरक्षित रह पाती हैं।’ 

मैं मन ही मन उसके विचारों की पारदर्शिता व बातों की शालीनता की प्रशंसा करती रही।  तुरंत ही उसकी शिष्टता ने मुझे मदर टेरेसा से जोड़ दिया, जिन्होंने ऐसे कई बच्चों, अनाथों, बीमार बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी अपनी कन्धों पर ले ली थी और कुछ शहरों के विभिन्न हिस्सों में ऐसी कैथोलिक संस्थाएँ स्थापित करते हुए सेवाएँ देने के केंद्र खोले थे। मैं एक दो बार मुंबई के ‘विले पार्ले’ में स्थित एक केंद्र में एक दोस्त के साथ जा चुकी हूँ, जो एक बच्चा गोद लेना चाहती थी।

  बच्चों को पालने में देखना वास्तव में दिल में सवालों के समंदर में गोते खाने वाला परिदृश्य है, जो मन को झकझोरने लगता है कि वे बच्चे वहाँ क्यों है जब उन्हें अपने माता-पिता की नर्म गोद में सुरक्षित और अपने घर के प्यार भरे वातावरण में उनसे लोरी सुनना चाहिए । 

ऐसा क्यों है कि उन्हें अस्वीकार कर दिया जाता है और कभी-कभी अनाथालय केंद्रों के दरवाजे पर, कचरे के डिब्बे के पास, या किसी बगीचे के एकांत कोने में बेंच पर छोड़ दिया जाता है। ये अज्ञात बच्चे रोते हैं, चीखते हैं, पर जन्म देनी वाली माएँ उन आवाजों को अनसुना कर देती हैं। मानवता का निर्मम चेहरा! एक माता-पिता बच्चे को खुले क्षेत्र में छोड़ने के लिए इतने पत्थर-दिल कैसे हो सकते हैं, कि वह उन्हें  मातृत्व के प्यार से, देखभाल से एवं गोद की आनंदमय पनाह से वंचित कर दे।

‘आपका नाम क्या है ?’  इडेलका की आवाज ने अचानक मुझे मेरे विचारों के जाल से बाहर निकाल दिया...

‘देवी’…..मैंने कहा

अच्छा नाम है, याद रखने में आसान।

‘थैंक्सस इडेलका। मुझे खुशी है कि मैं तुमसे मिली और खुश हूँ सब जानकर। अगर मैं आपको किसी दिन फोन करूं तो चौंकना मत।

आपका स्वागत है देवीजी। 

और एक कोमल झटके के साथ उसने वैन को चिकित्सा केंद्र के मुख्य द्वार के सामने रोक दिया। उसने मेरे लिए दरवाजा खोला और मुझे सुरक्षित उतारने में मदद की और प्रवेश द्वार तक ला छोड़ा। 

थैंक्सस इडेलका ..मैंने हाथ मिलाया और एक बार फिर उससे किसी दिन उससे बात करने की अनुमति माँगी।

ओह ज़रूर लेकिन 7-30 के बाद। आपसे बात करके खुशी होगी।

मैं फिर भौतिक चिकित्सा के लिए नियत कमरे की ओर चल पड़ी।                                                

                                    21 दिसंबर 2021

आज 6 अप्रैल 2018 के साढ़े तीन साल के लंबे अंतराल के बाद, मैंने उसके फोन नंबर के साथ इडेल्का के बारे में कुछ पुराने कागजात देखे। एक फ्लैश में यादें ताज़ा हो गयीं। और छह बढ़ती लड़कियों के बारे में और जानने की मेरी उत्सुकता हर दिन की कार्य सूची में सर्वोच्च प्राथमिकता पा गई। 

शाम को मैंने उसे फोन करने की कोशिश की। उसने फोन तो उठाया लेकिन नामालूम नंबर समझ कर डिस्कनेक्ट कर दिया। मेरे अगले प्रयास में उसने 'हैलो' कहा और मैंने उससे जुड़ने के लिए तुरंत ही कहा- क्या मैं इडेल्का से बात कर सकती हूँ?

‘बोल रही हूँ...’

‘हाय इडेलका, मैं देवी बोल रही हूँ। याद है आपने मुझे ‘होली नेम’ अस्पताल के कार्डियक थेरेपी सेंटर में जाते हुए नंबर दिया था। बहुत समय पहले की बात है। हमने आपके परिवार और आपकी छह लड़कियों के बारे में बात की, जिनमें से तीन आपने में गोद ली थी। भगवान का शुक्र है कि इसने मुझे आपसे जोड़ा। क्या तुम्हें याद है?

ओह, एक मिनट रुको, मैं याद करने की कोशिश कर रही हूँ। हाँ मुझे याद है। क्या हाल है? बहुत दिनों बाद आपकी आवाज़ सुनकर बहुत अच्छा लगा देवीजी। 

मैं ठीक हूँ, इलाज के बाद मेरा दिल अच्छी तरह से काम कर रहा है और अब मैं न्यू जर्सी से न्यूयॉर्क आकर बसी हूँ। 

ओह....

‘कैसी हैं आपकी बेटियाँ? लड़कियों के बारे में और जानना चाहता थी। मुझे लगता है कि वे अब तक 19 से 22-23 की उम्र के बीच की हुई होंगी। कृपया मुझे उनके बारे में और बताएँ।’

 ‘हाँ, वे ठीक हैं और सब खुश हैं। दो की पिछले साल शादी हुई, एक की अरेंज मैरिज और दूसरी की लव मैरिज। दो लड़कियाँ कार्यरत हैं और अन्य दो हाईस्कूल में हैं। मेरे पति को भी काम पर पदोन्नति मिली है; इसलिए सभी ने मुझे अपनी अंशकालिक अस्पताल की नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किया है। अब मैं हास्पिटल का काम नहीं करती।’

‘इडेलका मेरा एक अनुरोध है, क्या आप मुझे लड़कियों के साथ अपनी फैमिली फोटो भेज सकती हैं। यदि आप बुरा न मानें, तो इस लेखन में संलग्न करना चाहती हूँ।’

‘अरे! कोई दिक्कत नही। मैं तुम्हें कल भेजूँगी; बल्कि मैं अपनी बड़ी बेटी को भेजने के लिए कहूँगी, क्योंकि वह तकनीकी रूप से अधिक कुशल है।’

‘धन्यवाद इडेलका। मेरे साथ सब साझा करने और मेरे कॉल का जवाब देने के लिए धन्यवाद। भगवान आपको परिवार सहित खुश रखे। शुभ रात्रि !’ 

‘सुश्री देवी जी आपको भी शुभ रात्रि !’

एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हुए संवाद सम्पूर्ण करना एक सुखद अहसास था।

उसने मुझे ग्रुप फोटो भेजा, लेकिन इसे प्रकाशन न करने का अनुरोध भी किया। और मैं उसके प्रति ईमानदार होने के लिए बाध्य हूँ। 

दिल के आईने में एक खूबसूरत तस्वीर अब भी निखर आती है। 

6, अप्रैल 2022

email- dnangrani@gmail.com  


कालजयी कहानीः बट बाबा


 - फणवीश्वरनाथ रेणु

गाँव से सटे, सड़क के किनारे का वह पुराना वट-वृक्ष।

इस बार पतझ्ड़ में उसके पत्ते जो झड़े, तो लाल-लाल कोमल पत्तियों को कौन कहे, कोंपल भी नहीं लगे। धीरे-धीरे वह सूखता गया और एकदम सूख गया-खड़ा ही खड़ा।

शाम को निरधन साहु की दुकान पर इसी पेड़ की चर्चा छिड़ी हुई थी।

जब से इस गाँव के खुशहाल किसान ‘मुखिया अनन्त मंडर' की दुनिया बिगड़ गई, उनका बैठकखाना उजड़ गया, तभी से निरधन साहु की दुकान पर ही गाँव के लोगों की मंडली शाम को बैठती। दिन-भर के थके-माँदे किसान, खेतिहर मजदूर नोन-तेल, चावल-दाल लेने अथवा यों ही थोड़ी देर बैठकर चिलम पीने, सुख-दुख की कहानी कहने-सुनने चले आते। शाम को थोड़ी देर बैठकर बातें करने का यही एकमात्र सहारा था। हाँ  तो, उस शाम को वहाँ पर इसी पेड़ की चर्चा छिड़ी हुई थी। आठ-दस व्यक्ति बैठे हुए थे। फरजन मियाँ ने कहा-“अरे! क्या पूछते हैं, हमारे दादा कहते थे कि उनके बाप के बचपन में भी यह ऐसा ही बूढ़ा था।...ओह !”

बैठे हुए लोगों में से प्रत्येक ने इसी प्रकार की कुछ-न-कुछ बातें कहीं। बूढ़ा निरधन साहु का शरीर काला ज्वर से कंकाल मात्र रह गया था, तिस पर खाँसी, कुछ बोलते ही ‘खाँय-खाँय’ करने लगता था। उसकी अठारह वर्ष की बेटी लछमनिया दुकान चलाती थी, बुढ़िया वसूल-तगादा करती और शहर से सिर पर ‘सौदा-पत्तर’ ले आती थी। बूढ़ा बैठा-बैठा दिन गिन रहा था। अभी जो उसने पेड़ के सूखने की बात सुनी, तो खाँसता और कराहता हुआ घर से बाहर निकल आया। बोला-“बड़कवा बाबा सूख गइले का?”

बैठी हुई मंडली ने एक स्वर में कहा-“हाँ!”

“अब दुनिया ना रही”-कहकर वह जो खाँसने लगा, तो बीस मिनट तक खाँसता ही रहा। खाँसी शान्त होने पर, भर्राए स्वर में, लम्बी निःश्वास लेता हुआ बोला-““अब ना बचब हो राम!”

हिमालय और भारतवर्ष का जो सम्बन्ध है, वही सम्बन्ध उस वृद्ध पेड़ और गाँव का था। वह उन्नत-मस्तक विशाल पेड़ प्रतिदिन सबेरे मटमैले अन्धकार में, गाँव के आँगन-आँगन में दृष्टि दौड़ाकर क्षितिज पर न जाने क्या देखकर एक बार सिहरता. -सिसकता, फिर टप-टप आँसू बहाकर शान्त हो जाता, सोता हुआ गाँव जब अँगड़ाई लेकर उठता, तो उसकी जटाएँ हिलती-डुलती रहतीं। पेड़ पर पक्षियों का कलरव होता रहता।

जाड़े का दिन हो या गर्मी का मौसम, चाहे वर्षा की ही झड़ी क्‍यों न लगी हो, सुबह से शाम तक उसके नीचे औरत, बूढ़े, बच्चे, जवान, गाय-मैंस-बैलों की छोटी-सी टोली बैठी ही रहती थी।

चैत्र-वैशाख की दोपहरी में तो सारा गाँव ही उसकी शीतल छाया का सहारा लेता। गाँव का लुहार यहीं बैठकर हल वगैरह की मरम्मत करता, घर बनानेवाले मजदूर बाँस यहीं बैठकर फाड़ते-छीलते। औरतों का ओखल-मूसल चलता रहता, बच्चों का घरौंदा खेल, जटाओं को बाँधकर झूला-झूलना, बूढ़ों की अनुभव अभिमान-मिश्रित बातें तथा नौजवानों की नजर बचाकर-नववधुओं और भाभियों की छेड़छाड़ भी चलती रहती। पेड़ की एक तरफ की जमीन में अनेक खुदे हुए काले चूल्हे, उसके पास जली-अधजली लकड़ियाँ सदा बिखरी रहतीं। रात में व्यापारी गाड़ीवानों का यही रैन बसेरा था। इसके अतिरिक्त कभी बारात तो कभी डोली, कभी गाजे-बाजे, हाथी-घोड़ा थोड़ी देर तक यहीं बैठकर सुस्ताते, गाँववालों का मनोरंजन कर चले जाते। डोलियाँ रुकतीं, किशोरी बालिकाएँ, बाल-वृद्ध ‘लाल डोली, लाल डोली, लाल कन्ने है?’ रटते दौड़ते, डोली की खिड़की खुलती, सब आश्चर्य से देखते।

किशोरी लड़कियाँ मन-ही-मन अरमान सजाने लगतीं, हौंसले-भरे छोटे-छोटे लड़के दौड़कर माँ से कहते-'मैं भी ऐछी ही दुलहन लूँगा।

एक जमाना था, जब प्रत्येक शाम को उसके नीचे 'दिवाली' की बहार रहती थी। प्रत्येक घर से घी से भरा-पूरा एक-एक दीप जाता था। सारी रात जगमग-जगमग... !! किन्तु इधर कई वर्षों से तो बस सहुआइन का दीपक ही थोड़ी देर तक टिमटिमाकर बुझ जाता, जुगनू की चकमक सारी रात होती रहती।

एकादशी, पूर्णिमा आदि एवं त्योहारों पर उसकी पूजा भी होती-सिन्दूर-चन्दन, अक्षत, बेलपत्र, धूप-दीप, पान-सुपारी से। वह देवता” था हिन्दुओं का भी, मुस्लिमों का भी। इधर कई वर्षों से मुसलमानों ने पूजा-पत्तर छोड़ दिया है। मौलवी साहब एक आए थे, उन्हीं के कहने से। पर ‘बट बाबा’ को छोड़कर किसी दूसरे नाम से सम्बोधित करने की हिम्मत अब भी उन लोगों की नहीं हुई । बट बाबा कितने मानतों के आरजू-मिननत को सुनते आए थे। जो उससे निराश होते, सदा के लिए निराश हो जाते। जिनकी मनोकामना पूरी होती, वे निहाल हो जाते।

कल की बच्चियाँ जवान होतीं, बट-सावित्री पूजने आतीं, कुछ दिनों के बाद उसके बेटे की भी छठी पूजी जाती, मुंडन-उत्सव होता, फिर शादी में जब वह वर का आभूषण पहनकर प्रणाम करने आती, तो उसकी जटाएँ सदा की तरह हिलती रहतीं। गुड़िया-सी दुलहिन आती, सोने-चाँदी के जेवरों से झमझमाती-गाती-बजाती औरतों की टोली उसे ले आती, प्रणाम कराकर ले जाती, वह खड़ा-खड़ा न जाने कितने वर्षों से यह सब देखता आया था, वर-यात्रा, शवयात्रा, भरी लाल माँग, धुली माँग, फूल-सा कोमल बच्चे का माँ की गोद में किलकारी भरना और चिरननिद्रा- में मगन, एक ही दिन, गाँव में दस-दस नवागत शिशुओं का “सोहर' गाती तथा एक ही साथ पन्द्रह- पन्द्रह अर्थियाँ इत्यादि देखते-देखते वह स्थितप्रज्ञ हो गया था।

इस बार वह खड़ा-खड़ा ही सूख गया। प्रतिवर्ष की भाँति वैशाख की दोपहरी आई। कड़कड़ाती धूप से आग की वर्षा होने लगी और इस बार गाँव के पशु-पक्षियों में भी कुहराम मच गया। आने-जानेवाले राही-बटोही, गाड़ीवान एक निराशापूर्ण दृष्टि से पेड़ की ओर देखकर आपस में कुछ बोलते-चालते चले जाते।

गाँव के बाहर, सड़क के किनारे अज्ञात काल से वह खड़ा था। ऐसा मालूम होता था, मानो भय से हार्ट-फेल करके मरे हुए विकराल राक्षस के कंकाल को खड़ा कर दिया गया है। मुँह और आँखें भय से विस्फारित, दोनों हाथ उठाए हुए कंकाल की तरह!

वह सूख गया, किन्तु गाँववालों की उस पर श्रद्धा और भक्ति की धारा और भी तीव्र हो गई। यों तो ‘आपत-विपद’ में उसकी मिन्‍नतें और पूजा पहले भी होती थी, पर जब से पेड़ धीरे-धीरे सूखने लगा ‘पूजा और भिन्न्तों’ का ताँता-सा लग गया।

लोगों की यह धारणा थी कि बाबा जाने के समय सबों की मनोकामना पूरी करेंगे। जिस पर ढल जाएँ, वह मालामाल हो जाए। अभी उस दिन अनन्त मंडल की पतोहू चार आने का बताशा मान आई थी कि उसका पति जो भारत-रक्षा कानून के अन्तर्गत ढाई वर्षों से जेल में नजरबन्द है और टी.बी. का शिकार हो चुका है-छूट जाए। रोग भी छूट जाए और वह भी। जिस दिन पहली बार ससुराल आई थी, बनारसी साड़ी, गहनों तथा शिक्षित पति के घमंड में वह बोली थी-मैं पेड़-पत्थर की पूजा नहीं करती । लोग कहते हैं और वह भी मानने लगी है कि यह दुर्दिन उसी घमंड का कुफल है।

उस दिन वह जो गई तो शरीर पर सिर्फ एक फटी साड़ी थी, जिसमें पाँच-सात पैबन्द लगे थे, चार-पाँच साड़ी के टुकड़ों की पट्टियाँ लगी थीं, दो-ढाई हाथ कंट्रोल की साड़ी, सुहाग की साड़ी का एक टुकड़ा तथा अन्य साड़ियों के टुकड़ों की पट्टियों से - बनी एक पंचरंगी' साड़ी से अपनी लाज ढँकते, आँसू पोंछते वह बोली थी, “बाबा! अब इससे बढ़कर और कौन-सी सजा दोगे?” और वह फूट-फूटकर रो पड़ी थी।

निरधन साहु की बेटी ‘लछमनिया’ रो आई थी-“बाबा! गाँव-मुहल्ला, टोला-पड़ोस तथा जाति-बिरादरी के लोग हैंस रहे हैं। मैं इतनी बड़ी हो गई, कोई दूल्हे का बाप एक हजार से नीचे तिलक की बात ही नहीं करता है। बाबू और घर की दशा तुमसे छिपी नहीं है। दुनिया के लिए तुम सूख गए हो, पर तुम्हारा प्रताप तो नहीं सूखा है।

बाबा! यदि किसी दूल्हे के बाप का मन फेर दो तो मैं आठ आने की मिठाई, सवा हाथ लँगोट और प्रत्येक रविवार को नया दीया और नई बत्ती जला दूँ। कलरू महता पर जमींदार की कुर्की आनेवाली थी। टहलू पासवान का बेटा फौज में था, भजू धानुक की स्त्री बीमार थी। सब अपने-अपने धन-माल-जान के लिए 'मनौती' मना रहे थे।

आज प्रातःकाल ही जमींदार के अमले-सिपाही चालीस-पचास मजदूर लेकर आए, गाँव के मजदूर भी बेगार में पकड़े गए। लड़ाई का जमाना है, जलावन की भारी कमी। जमींदार साहब का हुक्म है कि पेड़ काटा जाएगा।

लोग आपस में कानाफूसी कर बातें करने लगे। एक ही साथ पेड़ के सूखे तने पर साठ-साठ कुल्हाड़ों का वार हुआ- 'घड़-धड़ खड़-खड़-खड़ाक...” गाय-बैल, घोड़े-बकरे चौंककर गाँव से भागे, कुत्ते भौंकने लगे, भयभीत पक्षियों ने कलरव आरम्भ कर दिया। छोटे-छोटे बच्चे डरकर माँ की छाती से चिपट गए। गाँव के अर्धनग्न नर-नारियों तथा शिशुओं के कंकालों की कतार...एकटक से देख रही थी। कोई-कोई मर्द भी फूट-फूटकर रो रहा था, मानो सबों के कलेजे पर ही कुल्हाड़े चलाए जा रहे हैं।

धड़-धड़-धड़-धड़ाम...आर्तनाद कर पेड़ गिरा, फिर गाँव में भारी कोलाहल...!!

निरधन साहु कल से बेहोश था। बोलने और सुनने की शक्ति शायद जाती रही थी। अन्तिम घड़ियाँ गिन रह्म था। पेड़ गिरने के धमाके से वह भी चिहुँका, अस्फुट स्वरों में बोला-“असमान से...का गिरल रें लछमनि...! अरे बाप!!”

लछमनिया खिड़की से देख रही थी, और खड़ी-खड़ी सिसक रही थी।

कविताः दे जाना उजास वसंत


 - निर्देश निधि

वसंत तुम्हें देखा है कई बार 

फूलों वाली बगिया में टहलते हुए  

सूनी टहनियों पर चुपचाप 

मासूम पत्तियाँ सिलते हुए 


अनमने हो गए जी को आशा की ऊर्जा पिलाते हुए 

बड़े प्यारे लगे मुझे तुम 

जोहड़ की ढाँग पर तैरती गुनगुनी धूप में 

घास के पोरुए सहलाते हुए 


मेहमान परिन्दों के कंठ से फूटते हो सुर सम्राट से 

पर सुनो वसंत 

इस बरस तुम सँवर जाना 

हमारे खेतों में बालियों का गहना बनकर 


वरना खाली रह जाएँगे कुठले अनाज के 

और माँ को लगभग हर साँझ ही भूख नहीं होगी 

और नहीं दे पाएगी एक चिंदिया (छोटी रोटी) भी 

मेरी धौली बछिया को 


तुम झूल जाना इस बरस 

आम के पेड़ों की फुनगियों पर ज़रूर 

जीजी के तय पड़े ब्याह की तारीख

पक्की कर जाना अगेती सी 

उसकी आँखों के इंतज़ार को हराकर 

तुम उनमें खिल उठना वसंत 

मत भूलना उसकी सुर्ख़ घघरिया पर टंक जाना, 

हजारों सितारे बन 


मेरे भैया के खाली बस्ते में ज़रूर कुलबुलाना वसंत 

नई - नई पोथियाँ बन 

सुनो वसंत 

सूखी धूप पी रही है कई बरसों से 

मेरे बाबू जी की पगड़ी का रंग 

बदरंग कर गई है उसे ग्रहण लगे चंद्रमा सी 

तुम खिले - खिले रंगों की एक पिचकारी 

उस पर ज़रूर मार जाना वसंत 


जब पिछले बरस तुम नहीं फिरे थे हमारे खेतों में 

तब मेरी दादी की खुली एड़ियों में चुभ गए थे 

कितने ही निर्मम गोखरू  

कितनी ही बार कसमसा दी थी चाची 

पड़ोसन की लटकती झुमकियों में उलझकर 

हो गया था चकनाचूर सपना चाचा का 

मशीन वाली साइकिल पर फर्राटा भरने का 


इस बरस मेरे दादू की बुझी - बुझी आँखों में 

दे जाना पली भर उजास 

वरना बेमाने होगा तुम्हारा धरती पर आना 

निर्मम होगा हमारे आँगन से बतियाए बगैर ही 

हमारे गलियारे से गुज़र जाना 


सुनो वसंत 

मैं थकने लगती हूँ साँझ पड़े 

महसूस कर चुपचाप अपने घर की थकन 

 

पर तुम किसी से कहना मत वसंत 

वरना माँ जल उठेगी चिंता में

जीजी की तरह मेरे भी सयानी हो जाने की । 

email-  nirdesh.nidhi@gmail.com

कविताः मुझमें हो तुम






 - सांत्वना श्रीकांत

जब लौट जाते हो

तो आखिर में थोड़ा

बच जाते हो तुम मुझमें।


मेरी आँखों की चमक

और नरम हथेलियों के

गुलाबीपन में

या निहारती हुई

अपनी आँखें में

छोड़ जाते हो मुझमें

बहुत कुछ-

जो एकटक तकती रहती हैं

मेरे होठों के नीचे के तिल को।


कभी श्यामल, कभी श्वेत,

तो कभी लाल रंग तुम्हारा,

रह-रह कर रंग देता है

मेरी रूह को।

आँखें मूँदकर भी

तुम्हारी छुअन ही टटोलती है

मेरे अंतस को,

जाते-जाते आखिर में तुम

थोड़ा बच जाते हो मुझमें।


ये सिर्फ तुम हो

मैं तुम्हें शब्दों में

नहीं समेट सकती,

एक आकार ले चुके हो तुम

उस ब्रह्म का-

जिसे मैं हमेशा से पाना चाहती हूँ,

समझा नहीं पाती तुम्हें

कि-

अपने स्वप्न को छोड़कर

यथार्थ जीने का द्वंद्व

सच में कितना भयावह है।


नकार भी देती हूँ

सामाजिकता और सांसारिकता,

आस्तिक से नास्तिक की ओर

करवट लेती हूँ,

फिर भी-

तुम्हारा आकार नहीं ले पाती।

वृहद या सूक्ष्म होकर तुम

सागर बनते हो तो कभी सूर्य,

कभी बुद्ध तो कभी शिव।


और हाँ,

कभी-कभी तो

हवा बन चलते हो साथ और

सहला देते हो मेरे गाल,

ये सिर्फ तुम हो।


तब अनायास ही मैं

अंकुरित हो जाती हूँ

तुम में वृक्ष बन जाती हूँ,

मेरी जड़ें छितरी हैं

तुम्हारी धमनियों तक।


तुम्हारा होना ही प्रेम की

निष्कलंक परिभाषा है,

जिसे गढ़ा है तुमने

और जिसे जीती हूँ

मैं खुद में हर पल।


व्यंग्यः गुरु और शिष्य की कहानी

  - अख़्तर अली

जब भी कोई खस्ता हाल आदमी दिखे,  जो उजड़ा हुआ चमन- सा महसूस हो तो समझ जाना ये बहुत से कामयाब चेलों का गुरु है और जब भी किसी आलीशान बंगले में और खूबसूरत कार में महँगे लिबास वाला कोई शख्स दिखे, तो समझ जाना यह उसी गुरु का चेला है । गुरु और चेले की यही दास्ताँ है कि गुरु, गुरु रहे और चेले जुमा हो गए ।

जो सफ़ल चेला है, हकीकत में वह पैदाइशी गुरु होता है। 

वह तो बस शिष्य होने का अभिनय करता है । किसी को अपने रास्ते से हटाने के जो बहुत से उपाय है उसमें एक यह भी है कि उसे अपना गुरु घोषित कर दो । यह समय चेलों का समय है । चेलों का भविष्य उज्ज्वल है और गुरुओं के लिए कोई संभावना नहीं है ।

सफ़ल व्यक्ति जब अपनी सफ़लता का श्रेय अपने गुरु को देता है, तब गुरु सोच में पड़ जाता है कि मैंने तो उसे यह ज्ञान नहीं दिया था । आज हर क्षेत्र में चेलों का ही बोलबाला है, गुरुओं की कहीं कोई पूछ नही है । बहुत से गुरु होने की काबलियत रखने वाले लोग, अब घर से निकलने में डरने लगे है कि कही कोई पीछे से आकर अपना गुरु न बना ले ।

गुरुओं के लिये कोई ठोस आर्थिक नीति नहीं है । कृषक के लोन माफ़ हो रहे हैं और गुरुओं को कोई कर्ज़ देने को तैयार नहीं । सभी किस्म की व्यवस्था जिनके हाथ में है, उन्होंने गुरुओं के लिए कोई व्यवस्था नहीं की । आज के चेले गुरु को गुरु मानते है लेकिन गुरु की एक नहीं मानते है। चेलों के चैनल है, लेकिन गुरु ख़बर में नहीं है । गुरु लेने वालों की लाइन में खड़े हैं और शिष्य देने के लिये मंच पर विराजमान है मगर अनजान बने । चेलों की भव्य  बर्थडे पार्टी होती है और गुरुओं की शोक सभा । जिसे कभी कोई बधाई और शुभकामनाएँ देने नहीं जाता; लेकिन श्रद्धांजली देने के लिए लोग उमड़ पड़े उसे गुरु कहते हैं ।

आज के शागिर्द अपने बच्चो को अपने ही उस्ताद के पास ज्ञान लेने भेजते है और अपने बच्चो को समझाते है कि गुरु जी की बाते ध्यान से सुनो और अपने दिमाग में फिट कर लो; क्योकि ये वो बाते है, जिन्हें कभी अपनाना नहीं, वरना कहीं के नहीं रहोगे । यह समय किसी के बताए रास्ते पर चलने का समय नहीं है; बल्कि मनमानी करने का समय है । जो मनमानी करते हैं उन्हीं के मन की मानी जाती है ।

ऐसा बिलकुल भी नही माना जाए कि शिष्य अपने गुरु की चिंता नही करते हैं। बहुत चिंता करते है । गुरु को ऊँचा पद देकर उनके उपर ज़िम्मेदारी का बोझ नहीं लादते है , उन्हें सुविधाएँ प्रदान कर उनका संघर्ष खत्म नहीं करते , गुरु दक्षिणा में बड़ी राशि देकर वे गुरु की चैन की नींद नहीं छीनते । गुरु जी की जर्जर ढाँचा परियोजना ही गुरु के प्रति उनकी श्रद्धा है। अब चेलों ने अपने मकान बदल लिये है और गुरुओं का पता आज भी वही है; इसलिए कहा जाता है गुरु वहीं के वहीं रहे और चेले कहाँ  से कहाँ पहुँच गए । आज गुरु के सीने से भाप निकल रही है, जिसे देखने वाला कोई चेला उनके पास नहीं है । हर गुरु अकेलापन भोगने के लिए अभिशप्त है ।

कामयाब  चेलों के गुरु अपने ही घर में घिर गए है । अब बच्चे बड़े हो गए हैं और पूछ रहे हैं – पापा आप गुरु क्यों हुए, काश आप भी चेले होते, तो हमें ये बुरे दिन तो न देखने पड़ते। आप झोंपड़ी की रात और वो जंगल की सुबह है।

जब शिष्य पूर्णतया प्रशिक्षित हो जाता है, तब सब से पहले वह गुरु की नाव में सुराख़ करता है । ये नये ज़माने के शिष्य है, जो उस्ताद की तरफ़ आँख उठाकर नहीं देखते सीधे, कंधे पर उठाने वाले दिन आते है । चेला काटने वाला कीड़ा और गुरु सहने वाली पीड़ा है । शिष्य की बेवफ़ाई पर गुरु आँसू नहीं बहाते है: क्योंकि वह गुरु है उसे मालूम है कि उसके आँसुओं से यह सूखा जंगल हरा नहीं हो जाएगा, उसे आँसू की हकीकत मालूम है कि वह आँख से होकर गाल भिगोकर मिट्टी में मिल जाएगा।

सम्पर्कः निकट मेडी हेल्थ हास्पिटल , आमानाका , रायपुर ( छत्तीसगढ़ ), मो.न. 9826126781


ग़ज़लः1. नादाँ हूँ... 2. सूरज बन कर

  - विज्ञान व्रत







1. नादाँ हूँ...


क्या   तस्वीर   बनाई  थी

क्या  तस्वीर   दिखाई  दी


क्या    पूछो    बीनाई   की

तू   ही   तू   दिखलाई  दी


मैंने    लाख     दुहाई    दी

उसने  कब   सुनवाई   की


उसने आकर  महफ़िल  में

मंज़र    को    रानाई     दी


नादाँ   हूँ   क्या    समझूँगा 

ये      बातें    दानाई     की                                 


2. सूरज बन कर...


मुझको  अपने  पास  बुलाकर

तू  भी  अपने   साथ   रहाकर


अपनी   ही   तस्वीर   बनाकर 

देख  न  पाया  आँख  उठाकर


बे - उन्वान       रहेंगी        वर्ना 

तहरीरों  पर   नाम   लिखाकर 


सिर्फ़    ढलूँगा    औज़ारों      में

देखो   तो  मुझको  पिघलाकर


सूरज  बन  कर   देख  लिया ना 

अब  सूरज-सा   रोज़  जलाकर


चर्चाः यात्रावृत्तांत पर पहला विमर्श

विनोद साव, डॉ. साधना अग्रवाल,जीवन यदु,
छगनलाल सोनी, विनय शरण सिंह व माझी अनंत


 - विनोद साव

खैरागढ़ गोलबाजार के बाफना भवन में हम पहुँच गए थे। हमने सभागार का दरवाजा जैसे ही खोला, तो सामने मंच सजा हुआ था जिस पर प्रसिद्ध गीतकार जीवन यदु विराजमान थे। वे देखते ही खड़े होकर भाव-विह्वल हो बोल उठे कि “हमारे अगले सत्र के मुख्य अतिथि आ गए हैं व्यंग्यकार भाई विनोद साव।” खैरागढ़ जैसे कस्बे में भी एक चमक -धमक वाला एक निजी सुन्दर सभागार बन गया है। यहाँ छत्तीसगढ़ प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन ने चार दिवसीय युवा रचना शिविर लगाया था। इस शिविर में छत्तीसगढ़ से आए महाविद्यालयीन विद्यार्थियों, शोधार्थियों से लेकर चालीस वर्ष की उम्र तक के रचनाकार शामिल हुए थे, जो भिन्न विधाओं के कलमकार थे। इसके पहले अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन, धमतरी द्वारा संचालित ऐसा ही एक शिविर था जहाँ व्यंग्य पाठ के लिए आमंत्रित हुआ था। तब सम्मलेन के अध्यक्ष ललित सुरजन जी थे। अब उनकी आत्मीय यादें शेष हैं। अब ये जिम्मेदारियाँ वर्तमान अध्यक्ष रवि श्रीवास्तव और प्रबंध मंत्री राजेंद्र चांडक जी पूरी गंभीरता से निभा रहे हैं। राजेंद्र जी भारतीय सांस्कृतिक निधि रायपुर अध्याय के संयोजक भी हैं।

मुझे यहाँ दो सत्रों के लिए आमंत्रित किया गया था जिसमें एक व्यंग्य का सत्र था और दूसरा यात्रा- वृत्तान्त का। व्यंग्य से कम समय में मुझे यात्रा-वृत्तान्त के लेखक के रूप में मान्यता मिल गई है। ऐसा लगा कि इन दोनों सत्रों का आयोजन कहीं मेरी स्थापना के कारण तो संभव नहीं हो गया। मेरी जानकारी में यह पहला अवसर था, जब हिंदी साहित्य में कथेतर गद्य की एक महत्त्वपूर्ण विधा ‘यात्रा-वृत्तान्त’ पर किसी संस्था द्वारा कोई विमर्श रखा गया हो... और इस संस्था द्वारा व्यंग्य पर एक सत्र का भी पहली बार कोई आयोजन रखा गया था। यह किसी भी साहित्यिक संस्था द्वारा परम्परागत आयोजनों से आगे बढ़कर साहित्य के नवोन्मेष को स्वीकारने की एक अच्छी पहल है। 

दोनों सत्रों के युवा रचनाकार बड़े उत्साहित थे, क्योंकि उन्हें भी इन सत्रों में भाग लेने के अवसर कभी मिले नहीं थे, इसलिए इस नवोन्मेष के प्रति उनकी जिज्ञासा भी बढ़ी थी। मेरा परिचय देकर मुझे प्रस्तुत करते समय जीवन यदु ने मुझे अपने यात्रा- वृत्तान्त के कुछ अंश पढने की हिदायत भी दे दी थी। सत्र की आरंभिक भूमिका इसकी संचालिका डॉ. साधना अग्रवाल ने बाँध दी थी। अंत में आभार प्रदर्शन प्रो. देवमाईत मिंज ने करते हुए बताया कि वे देव लकरा के नाम से मेरी फेसबुक फ्रेंड हैं और मेरे यात्रा- वृत्तान्तों को खूब पढ़ती हैं।

जिस तरह हमारे साहित्य संसार में कहानी की चर्चा प्रेमचंद के बिना और व्यंग्य की चर्चा परसाई के बिना पूरी नहीं होती, वैसे ही यात्रा वृत्तांत की चर्चा हो और बुद्धिष्ट यायावर राहुल सांकृत्यायन की चर्चा न हो यह संभव नहीं है। वे अक्सर यात्रा के महत्त्व को बताने के लिए 18 वीं सदी के दिल्ली के एक सूफ़ी शायर ख्वाजा मीर दर्द का ये शेर फ़रमाया करते थे जो आज भी लोगों की जुबान पर है:

“सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी फिर कहाँ

जिन्दगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ...

राहुल जी की यात्राएँ कोई भौगोलिक दूरियों को तय करने वाली यात्राएँ नहीं थीं। उन्होंने उस भूखंड के इतिहास को देखने के अलावा उसकी स्थानीयता से संवाद करना सिखाया था, जो इन यात्राओं की आत्मा होती है। ये बातें मैं खैरागढ़ में कह रहा था। तब बरबस ही मुझे यहाँ के रहवासी इंदिरा विश्वविद्यालय के प्रो.गोरेलाल चंदेल याद आ गए, जिन्होंने मेरे यात्रावृत्त ‘मेनलैंड का आदमी’ की समीक्षा करते हुए लिखा है कि “यात्रा -वृत्तांत लेखन की दृष्टि स्थान विशेष की भौगोलिकता के साथ सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं को पकड़ने में कामयाब होती है और उस स्थान की धड़कन की एक एक गति को अपने संस्मरण का हिस्सा बनाने में यह दृष्टि सफल होती है। यात्रा- संस्मरण की भाषा नीरसता, उबाऊपन, एक पैनी दृष्टि, गहन निरीक्षण आत्मीयता का भाव और भारत को धर्म, जाति, भाषा परे से समग्रता में देखने की कोशिश होती है।”

ललित सुरजन, सतीश जायसवाल, उर्मिला शुक्ल यात्रा- वृत्तान्तों के अच्छे लेखक हैं। ललित जी का एक संग्रह है ‘शरणार्थी शिविर में विवाह गीत।’ वे लिखते हैं कि “एक दिन ग्रीस में कार्यरत फिलिस्तीनी श्रमिकों के संघ के प्रतिनिधि मुझसे मिलने आए। उन्होंने मुझे फिलिस्तीनी विवाह गीतों की एक सीडी भेंट की और आग्रह किया कि इसकी प्रतियाँ मैं भारत लौटकर अपने मित्रों को भेंट दूं और बताऊँ कि साठ साल से अधिक समय तक लगातार शरणार्थी जीवन जीते हुए, हर पल इजराइली हमलों की आशंका के बीच साँस लेते हुए, हजारों बेकसूरों की मौत के बाद भी किस तरह फिलिस्तीन की जनता ने अपनी जिजीविषा को बचा रखा है, कि मौत के साये में दिन गुजारते हुए वे अपने संगीत से, गीतों से ताकत पाते हैं।” मेरे संग्रह का ‘ब्लर्ब’ लिखते हुए ललित जी ने ‘Tourist और ‘traveler पर्यटक और सैलानी’ को अलग अलग नज़रिए से देखा है और मुझे सही अर्थों में ‘सैलानी’ माना है। यात्रा-संस्मरणों में इन दोनों शब्दों की बड़ी भूमिका है। टूरिस्ट जहाँ दूर खड़े होकर स्थान विशेष को देखता है वहीं सैलानी स्थानीय ज़िंदगी के साथ जुडकर सब कुछ देखता है। टूरिस्ट की नज़र स्थान विशेष पर, टूरिस्ट प्लेस की ओर होती है। ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व के स्थानों पर प्रभावी दृष्टि टिकी होती है, जबकि सैलानी स्थानीय ज़िंदगी को, स्थानीय संस्कृति और खान-पान, पहनावे और वेशभूषा को, बाज़ार और हाट को, रिक्शा और ऑटो को, सबको देखता है ओर उसके भीतर ज़िंदगी की तलाश करता है। ज़िंदगी की धड़कन को सुनने का प्रयास करता है।”

डेढ़ घंटे के इस सत्र में उपस्थित युवाओं ने कई प्रश्न किए, जिनसे उनकी उत्साहजनक भागीदारी प्रमाणित हुई।

सम्पर्कः मुक्तनगर, दुर्ग छत्तीसगढ़ 491001,  ई-मेल: vinod.sao1955@gmail.com, मो. 9009884014