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Nov 5, 2026

किताबेंः संघर्षमय जीवन का दस्तावेज

पुस्तकः सुरंग के उस पार (आत्मकथा):लेखकः डॉ. परदेशीराम वर्मा. मूल्य - 695.00, पृष्ठ- 298,  प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नयी दिल्ली-110002

छत्तीसगढ़ में अनेक कथाकार और साहित्यकार हुए हैं, जिन्होंने अपनी कलम से सब कुछ लिखा, जिसे पाठकों ने खूब पसंद किया और सराहा। इन्हीं में से दुर्ग के डॉ. परदेशीराम वर्मा में हैं, जिन्होंने कथा, कहानी, कविताएँ खूब लिखी हैं। सुरंग के उस पार को पढ़ते हुए मुझे उनके जीवन को जानने समझने का अवसर मिला। उनसे मैं कई बार मिला हूँ और उनके वक्तव्यों से प्रभावित भी हुआ हूँ। मैं क्या, कोई भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता ; क्योंकि वे बहुत ही सहज और सरल हैं। यही नहीं ; बल्कि उनकी कथा कहानी तो जैसे हमारे जीवन में घट रही घटनाओं का ही रेखांकन होता है। वे हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में समान अधिकार से लिखते हैं और राष्ट्रीय, प्रादेशिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित होते हैं।

वे दुर्ग जिले के छोटे से गाँव लिमतरा के निवासी हैं ; लेकिन उनका गाँव पूरी तरह से रायपुर के ऊपर निर्भर रहा है। गाँव के पास खरखरा नरवा पार करके कुम्हारी और फिर रायपुर जाया जाता है। उनका जन्म भी गाँव से बाहर रायपुर के अस्पताल में होने के कारण वे ‘परदेशी’ हो गए। पिता जी उनके नाम के साथ ‘राम’ जोड़ दिया और कुर्मी समाज में जन्म लेने के कारण ‘वर्मा’ सम्बोधन मिला और वे ‘परदेशी राम वर्मा’ हो गए। लिमतरा गाँव के आसपास उनकी प्राथमिक शिक्षा हुई -लिमतरा, गोढ़ी और भिलाई में। उनका अलमस्त बचपन था। वे लिखते हैं-‘‘बचपन में धान से भरे खेतों के मेड़ों पर चलकर हम स्कूल जाते थे। धान की निंदाई करने वाले कृषकों और मजदूरों के द्वारा काम करते हुए गाए जाने वाले गीतों के स्वर माधुर्य से हम ठिठक जाते और देर से स्कूल पहुँचने पर हमारी कान खिंचाई होती और कभी मुर्गा भी बनना पड़ता था।’’

आज जब उनकी पुस्तक ‘सुरंग के उस पार’  हमारे हाथ में हैं तो वे 78 वर्ष के युवा कथाकार हैं; क्योंकि अभी भी उनकी लेखनी में वही धार है जब वे शुरूआती दौर में लिखते थे। जब वे पीछे मुड़कर अपने जीवन को झाँकते हैं तब उन्हें अंधकार में डुबे हुए छत्तीसगढ़ और उसके छोटे छोटे गाँवों की बीमारी, गरीबी और बदहाली से घिरे रहने वाले बहुतेरे लोग मृत्यु को जीवन का पर्याय मानकर सहज भाव से अपनी रौ में जीते थे। वे स्वयं अपनी माँ के ग्यारह बच्चों में से बचे तीन बच्चों में से एक थे। उनका नाता भी मृत्यु से करीबी का था। पहले भाई से भी प्रिय अंतर्राष्ट्रीय पंथी नर्तक देवदास बंजारे का एक्सीडेंट में स्वर्गारोहण के साथ मृत्यु से करीबी साक्षात्कार हुआ ; क्योंकि उस एक्सीडेंट में वह भी उनके साथ थे। फिर उनसे अपार स्नेह रखने वाले छत्तीसगढ़ के महाकवि और संत पवन दीवान उन्हें अकेला छोड़ गए। फिर मात्र  वर्ष की उम्र में उनका इकलौता बेटा अशेश्वर बिलखता छोड़ गया। मात्र 18 वर्ष की उम्र में वे असम राइफल्स के सिपाही बनकर मिजो हिल्स में तीन वर्ष रहे और वहाँ भी सैनिकों को मृत्यु का वरण करते देखे। तब उनके मुख से मैथिलीशरण गुप्त की पंचवटी की ये पंक्तियाँ फूट पड़ती है -

नहीं विघ्न बाधाओं को हम स्वयं बुलाने जाते हैं।

किंतु अगर वे आ जाएँगे कभी नहीं घबराते हैं।।

परदेशी राम जी लोकमंचीय कलाकारों के घर पैदा हुए। उनके पिता लोकमंचीय कलाकार थे और छोटा भाई महेश भी लोकमंच का सफल कलाकार है। उनकी सारी आर्थिक और सामाजिक तरक्की में लोक मंच का हाथ है। जिस साहित्य लेखन से उनकी पहचान बनी उसी तरह लोक मंच की साधना कर महेश ने सब कुछ पा लिया।

‘सुरंग के उस पार’ वास्तव में डॉ. परदेशीराम वर्मा के जीवन संघर्ष का दस्तावेज है। 34 खंडों में उन्होंने अपने जीवन के उतार चढ़ाव को उकेरने का प्रयास किया है। उनकी लेखनी लिमतरा के आसपास सुरजीडीह, गोढ़ी, नन्दौरी के साथ भिलाई और रायपुर तक चलती है। कभी गाँव की खुशहाली, अकाल की मार, तरिया में डुबकी लगाने का सुख, बरगद पेड़ की छाँव और जीवन देती अलमस्त हवाएँ, त्योहारों का उल्लास और जात-पात से ऊपर आत्मीय संबोधन का लाड़ होता है। उन्हें हाई स्कूल के गुरुओं, लिमतरा के बुजुर्गो और सबसे बढ़कर मेरी दाई ने जीवन में जूझते हुए जीने का मंत्र दिया।

परदेशीराम जी अनेक संस्थाओं से जुड़े रहे जैसे प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जिला साक्षरता अभियान आदि। उन्हें कहानी लेखन से जितना लगाव है, उतना काव्य लेखन और पठन से भी रहा है। उनका एक मंचीय काव्य उनके जीवन को रेखांकित करता है-

हम शायद ही देख सकें पर तुम जरूर देखोगे,

बाहर भीतर से बदली दुनिया की यह तस्वीर।

कदम कदम पर अवरोधों के बीच अकेलापन है,

सहयात्री सब दूर खड़े इसलिए राह निर्जन है।

जीवन से जूझते हुए उन्होंने एम. ए. समाजशास्त्र और लोक प्रशासन में पास किया। उनका उपन्यास ‘आवा’  एम. ए. हिन्दी के पाठ्यक्रम में पंडित रविशंकर शुक्ल वि़ वि. रायपुर में सम्मिलित है। जीवन में उन्हें अनेक मान सम्मान मिले। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर द्वारा मानद डी. लिट. की उपाधि प्रदान की गई। यह उनकी साहित्यिक यात्रा का उत्कृष्ट परिणाम है।

वे अपने बारे में कुछ यूँ लिखते हैं-‘‘लिमतरा से लेकर भिलाई तक जो मेरे मित्र-शत्रु बने, उसकी सोहबत में रहकर सदैव कुछ न कुछ सीखने का प्रयास किया। मुझे यह देखकर आश्चर्य होता है कि हमेशा किसी विरोधी का एक पत्थर भी मेरी ओर उछलता है तो चार रक्षक भी जाने कहाँ से सामने आ जाते हैं। छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्य मंत्री अजीत जोगी फिर डॉ. रमन सिंह, उसके बाद भूपेश बघेल और अब वर्तमान मुख्य मंत्री विष्णुदेव साय जी से मेरा सहज परिचय लिखने पढ़ने के कारण ही बना है। इन चारों मुख्य मंत्रियों ने मुझे भरपूर सम्मान और महत्व दिया है।’’

वे हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में समान रूप से लिखे। उनका पहला उपन्यास प्रस्थान दैनिक देशबंधु रायपुर में धारावाहिक प्रकाशित हुआ। अभी तक उनकी आठ कथा संग्रह, तीन उपन्यास, छह नव साक्षर साहित्य की पुस्तकें, एक नाटक, एक बाल काव्य संग्रह, एक बाल कथा- संग्रह, तीन जीवनी, छत्तीसगढ़ पर केन्द्रित चार वैचारिक पुस्तकें, छत्तीसगढ़ी कहानियों के दो संकलन, छत्तीसगढ़ की लोक कथाएँ और पर्यटन पर केन्द्रित चंदन पेड़ पहाड़ में के साथ  ‘सुरंग के उस पार’ (आत्मकथा) प्रकाशित हैं। अगासदिया पत्रिका और नियमित प्रकाशन कर रहे हैं। उनकी कहानियाँ आकाशवाणी औ दूरदर्शन रायपुर से प्रसारित हो चुकी हैं। उन्हें अनेक साहित्यिक और सामाजिक संस्थाओं से सम्मानित और पुरस्कृत किया जा चुका है। उनकी लेखनी अनवरत चलती रहे और हम जैसे नवोदित साहित्यकारों, लेखकों को प्रेरणा देती रहे।

सम्पर्कः डागा कालोनी, बरपाली चौंक, चाम्पा-495671, छत्तीसगढ़

Oct 1, 2026

किताबेंः रचना के आंतरिक सौंदर्य और संवेदना का रेखांकन

  - डॉ. सुरंगमा यादव

पुस्तकः सृजन- दृष्टि (समीक्षा- संग्रह): डॉ. शिवजी श्रीवास्तव, पृष्ठ - 192, मूल्य - 550/- , प्रकाशन - अयन प्रकाशन, उत्तम नगर, नई दिल्ली -110059

साहित्य जगत से लेकर सिनेमा कला या कोई अन्य रचनात्मक क्षेत्र क्यों न हो समीक्षक की भूमिका निर्विवाद है । समीक्षक किसी रचना के गुण-दोषों का विश्लेषण मात्र नहीं करता है, बल्कि वह  समीक्ष्य  रचना  की उपयोगिता या  श्रेष्ठता को विभिन्न पहलुओं से जाँच - परखकर पाठक के समक्ष रखता है, ताकि पाठक दिन-  प्रतिदिन प्रकाशित हो रही अनगिनत पुस्तकों में से अपनी रुचि के अनुसार   गुणवत्तापूर्ण सामग्री का चयन कर सके।   एक तटस्थ और गंभीर  समीक्षक केवल पाठकों की ही सहायता नहीं करता, अपितु रचनाकार का मार्ग भी प्रशस्त करता है। वह  रचना के कमजोर पक्षों को उजागर  करके रचना  प्रक्रिया का परिष्कार  करता है तथा खूबियों का उल्लेख करके उसका मनोबल भी  बढ़ाता  है।

डॉ. शिवजी श्रीवास्तव जी  की पुस्तक  ‘सृजन दृष्टि’  समकालीन  साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन पर आधारित है ।  शिवजी श्रीवास्तव जी  बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं । अध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ आप  गद्य और पद्य  में समान रूप से  लेखन कार्य कर रहे  है। ‘अखिल भारतीय कृष्ण प्रताप  स्मृति कहानी प्रतियोगिता’ में लगातार तीन बार एवं रेडियो नाट्य लेखन प्रतियोगिता में भी आप विजेता रहे हैं ।  भारतीय एवं जापानी काव्य शैलियों में   आप समान रूप से भावपूर्ण सृजन कर रहे हैं यथा - हाइकु, ताँका, क्षणिका, कविता, ग़ज़ल, संस्मरण ,नाटक एवं नवगीत। जीवनी विधा में लिखी आपकी पुस्तक ‘क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर’ वर्ष 2025 में प्रकाशित एक महत्त्वपूर्ण कृति है।  पटकथा लेखन  एवं सम्पादन कार्य भी आपने किया है । एक संवेदनशील रचनाकार होने के साथ- साथ आप  सहृदय पाठक  और कुशल समीक्षक भी हैं। आपने अपनी इस पुस्तक में विभिन्न विधाओं की 33 पुस्तकों का तटस्थ मूल्यांकन किया है, समय- समय पर प्रकाशित इन पुस्तकों का अध्ययन और उनकी सारगर्भित समीक्षा करके उन्हें एक पुस्तक के रूप में संकलित करना श्रम साध्य कार्य  है।

शिवजी श्रीवास्तव  जी के समीक्षक रूप के विषय में डॉ. कुँवर दिनेश सिंह ने  फ्लैप पर लिखा है, “समीक्षक के रूप में  श्रीवास्तव जी की एक विशेषता यह  है कि वे  समकालीन  विमर्शों और काव्यशास्त्र के सिद्धांतों का उपयोग तो  करते हैं ;किंतु उनकी समीक्षा कदापि उन विमर्शों व सिद्धांतों से बोझल  नहीं होती। वे किसी ‘विचार’ या ‘वाद’ से प्रतिबद्ध होकर आग्रही दृष्टि  से किसी कृति का मूल्यांकन  नहीं करते।” वास्तव में एक सच्चे समीक्षक का महत्त्व उसकी निरपेक्ष दृष्टि  एवं  नीर-क्षीर विवेक में निहित होता है । शिवजी श्रीवास्तव जी की समीक्षाएँ   रचना के आंतरिक सौंदर्य और संवेदना को रेखांकित  करने पर  बल देती  हैं ।

आपने प्रत्येक समीक्ष्य कृति में व्यक्त भावों और विचारों के आधार पर अत्यंत सटीक शीर्षक के साथ कृति  को आलोचना के मापदंडों पर परखा है। ‘सृजन दृष्टि’ की समीक्षा करना वास्तव में समीक्षा की समीक्षा करना है। इस पुस्तक में शिवजी श्रीवास्तव जी ने जिन कृतियों को सम्मिलित  किया  है उनमें एक जीवनी, दो उपन्यास, तीन समालोचना, सात काव्य कृतियाँ, एक सेदोका कृति, पाँच हाइकु कृति, एक तांका, सेदोका एवं चोका संग्रह, छः कहानी संग्रह, एक नवगीत संग्रह,दो गज़ल संग्रह,एक छंद   संबंधी कृति, तीन संपादित कृतियाँ । इनमें सबसे अधिक संख्या क्रमशः काव्य कृतियों एवं कहानी  संग्रहों की है । इस पुस्तक में सम्मिलित कृतियाँ हैं- जीवनी-  मेरे भगत सिंह, लेखक- पंकज चतुर्वेदी, उपन्यास - क्रांतिवीर मदारी पासी- ब्रजमोहन, अंगूठे पर वसीयत- डॉ. शोभनाथ शुक्ल,  समालोचना- लघुकथा- लघुकथा का वर्तमान परिदृश्य-रामेश्वर कांबोज हिमांशु, निकष – डॉ. स्मृति शुक्ल, विभाजन की त्रासदी- मुनीश त्रिपाठी, काव्य संग्रह- लम्हों का सफर- डॉ. जेन्नी शबनम, तेरे इश्क में गिरफ्तार हुआ- डॉ. लालित्य ललित, घुंघरी- डॉ. कविता भट्ट, तुम सर्दी की धूप- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, आलोक के क्षणों में - डॉ.  कुंवर दिनेश सिंह, एक यात्रा ऐसी भी- कैलाश नाथ खंडेलवाल, नहीं रहना मुझे पिंजर बद्ध - शिप्रा मिश्रा, सेदोका संग्रह- मन मल्हार गाए - सुदर्शन रत्नाकर , हाइकु  संग्रह- बंद कर लो द्वार- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, वर्ण सितारे- ऋता  शेखर मधु, खिले हैं शब्द- डॉ.  आशा पांडेय, प्रवासी मन- डॉ. जेन्नी शबनम, झील दर्पण- पुष्पा मेहरा, ताँका, सेदोका एवं चोका संग्रह- तीसरा पहर- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ कहानी संग्रह- जब तक जिंदा हैं – डॉ.  कुँवर दिनेश सिंह, पिंजड़ा- डॉ. पूरन सिंह, सफेद गुलाब- हरपाल सिंह अरूष, दहलीज के उस पार -अरुण कमल, सपनों के ढ़ाई आखर -रश्मि शर्मा, दोष इसका था- सुदर्शन रत्नाकर, नवगीत- संग्रह-  रोटी का अनुलोम विलोम- श्री शिवानंद सिंह, गज़ल संग्रह- सोच का मौसम गर्म है- हरेराम समीप, भूल बैठा हूँ जिसे- विज्ञान व्रत,काव्यशास्त्र - छंद विधान एवं सृजन रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

संपादित संग्रह- भावनाओं के घरौंदे (काव्य संग्रह ) -सं. डॉ. कुँवर दिनेश सिंह, स्वर्ण शिखर (हाइकु  संग्रह) सं. रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ एवं  डॉ. हरदीप कौर संधु , स्त्री- पुरुष संबंधों की लघुकथाएँ- सं.  सुकेश साहनी

सृजन दृष्टि में संकलित  पुस्तकों की समीक्षाएँ पाठकों के मन में पुस्तक पढ़ने की रुचि जागृत करती हैं; क्योंकि इनका शीर्षक आकर्षक है । इन पुस्तकों की समीक्षा में समीक्षक ने किसी काव्यशास्त्रीय सिद्धांत अथवा ‘वाद’ को अनिवार्य रूप से आधार नहीं बनाया है, बल्कि आवश्यकतानुसार उनका उपयोग किया है।  समीक्षक एक तटस्थ द्रष्टा  होता है और साक्षी की भाँति कृति से प्राप्त अनुभव को विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से जोड़ कर पाठक के समक्ष रखता है। कभी-कभी समीक्षक की पैनी दृष्टि ऐसे -ऐसे तथ्यों एवं भावों को ढूँढ़ लाती है, जिन पर  शायद लिखते समय रचनाकार ने ध्यान भी न दिया हो । समीक्षक  यदि पूरी तरह  रचनाकार की सृजन दृष्टि एवं भावभूमि पर उतर कर समीक्षा करेगा, तो कई पक्ष अनछुए रह जाएँगे; इसीलिए शिवजी श्रीवास्तव जी ने एक सहृदय पाठक की  भाँति लेखक के भाव-जगत और संवेदना को गहराई से आत्मसात करते हुए पूर्वाग्रहों, से मुक्त होकर केवल कृति का  गुण-दोष के आधार पर मूल्यांकन किया है । कृति की मूल आत्मा, शिल्पविधान, भाषाई बारीकियों और अंतर्निहित संदेशों को आपने गहराई से परखा है। समीक्षा में उठाए गए बिंदुओं को आपने सोदाहरण प्रस्तुत किया है। शिव जी श्रीवास्तवजी ने समीक्ष्य कृति को समकालीन  सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के संदर्भ में रखकर भी उसकी प्रासंगिकता की परख की  है तथा दार्शनिक एवं आध्यात्मिक सत्यों को भी उद्घाटित किया है, ‘बंद कर लो द्वार’ की समीक्षा में हम बखूबी  देख सकते हैं । ‘सृजन दृष्टि’ में  विभिन्न पुस्तकों पर आपने अपनी बेबाक टिप्पणी दी  हैं, उदाहरणार्थ -

‘मेरे भगत सिंह’ निस्संदेह भगत सिंह के जीवन पर लिखी  एक ऐसी अमूल्य  कृति है, जो भगत सिंह के जीवन के लगभग समस्त अध्याय को खोलती है ....हर क्रांति चेता देश भक्त के लिए ये एक अनिवार्य और पठनीय कृति  है.। इसे पढ़ने के पश्चात महान क्रांतिकारी के जीवन से समग्र रूप से साक्षात्कार किया जा सकता है। ‘लम्हों का सफर’ सात शीर्षकों में विभक्त इस पुस्तक का हर शीर्षक जीवन का एक यादगार लम्हा है।  एक- एक लम्हे की अपनी कई कहानियाँ  हैं, कहीं दर्द है, कहीं प्रेम है, कहीं नारी नियति के चित्र हैं, कहीं उलहाने हैं, कहीं दायित्वबोध है, तो कहीं घनीभूत पीड़ा की चरमावस्था  है । ‘मन मल्हार गाए’  के समस्त सेदोंका भावपूर्ण मनःस्थितियों को प्रतिबिंबित करने वाले सरस सेदोका हैं ।  विषय कोई भी हो कवयित्री का संवेदनशील मन प्रत्येक सेदोका के पीछे से झाँकता है। ‘तेरे इश्क में गिरफ्तार हुआ’ डॉ. लालित्य ललित जी की कविताएँ  सर्वथा अलग ढंग की कविताएँ  होती हैं।  वे साधारण शब्दों में असाधारण रचते हैं। लालित्य जी किसी ‘वाद’ या ‘घेरे’ के कवि  नहीं हैं । उनकी प्रतिबद्धताएँ  जीवन के प्रति है, उनकी कविताएँ जीवन में आनंद खोजने की कविताएँ  हैं । ‘बंद कर लो द्वार’ अभिनव कल्पनाओं और बिंबों से संयुक्त 662 हाइकु का संग्रह है... कवि की चेतना लोक जीवन की ही चेतना होती है। कवि  का जो कुछ निजी होता है, वह लोक का ही सुख- दुःख होता है, इस दृष्टि से यह संग्रह लोक जीवन के सुख- दुःखों की अभिव्यक्ति के हाइकु का संग्रह है... इसमें भारतीय काव्यशास्त्र के समस्त गुण विद्यमान हैं। ‘जब तक जिंदा हैं’  बेजोड़ शिल्प एवं अनूठे कथ्य  वाली समस्त कहानियाँ  रोचक एवं कथा रस से परिपूर्ण हैं। ‘क्रांतिवीर मदारी पासी’ मदारी पासी के ‘ऐका आंदोलन’ को केंद्र में रखकर लिखे गए उपन्यास में रोचकता और पठनीयता के साथ ही इतिहास को भी सुरक्षित रखा गया है।

समीक्षा  की सीमा को देखते हुए  हर  पुस्तक के विषय में यहाँ उल्लेख करना संभव नहीं है, लेकिन इतना अवश्य है कि इस पुस्तक को पढ़ने के पश्चात पाठकों की अच्छे साहित्य की तलाश काफी हद तक पूरी हो जाएगी; क्योंकि 33 पुस्तकों की गहन समीक्षा करके शिव जी श्रीवास्तव जी ने यह कार्य सुगम कर दिया है।

Sep 4, 2026

किताबेंः पर्यावरण संकट का जीवंत दस्तावेज

  - रोहित कौशिक

पुस्तक - तपती धरती, बदलता मौसम और भारत: लेखक: पंकज चतुर्वेदी, ISBN: 978-81-686534-2-9, मूल्य- रु. 350.00 (हार्ड बाउन्ड ), पृष्ठः120, प्रकाशक – नयी किताब प्रकाशन, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली

प्रस्तावना: बदलते मौसम का यथार्थ और हमारी चिंताएँ

आधुनिक समय में संपूर्ण विश्व के समक्ष यदि कोई सबसे विकराल, जटिल और अस्तित्वगत संकट उपस्थित है, तो वह जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और ग्लोबल वार्मिंग का है। भारत जैसे विकासशील और विशाल देश में, जहाँ की अर्थव्यवस्था और जीवनशैली आज भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रकृति और मानसून पर निर्भर करती है, इस संकट के प्रभाव अत्यंत गंभीर रूप धारण कर चुके हैं। पर्यावरण पत्रकारिता के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित और मुखर हस्ताक्षर पंकज चतुर्वेदी द्वारा संपादित और रचित पुस्तक 'तपती धरती, बदलता मौसम और भारत' इसी सुलगते हुए यथार्थ और अनकहे सत्यों का एक अत्यंत सजीव, प्रामाणिक और वैचारिक दस्तावेज है। यह पुस्तक केवल अकादमिक आंकड़ों और कठिन वैज्ञानिक शब्दावली का कोई संकलन मात्र नहीं है, बल्कि यह धरातल पर कराहते और जूझते भारत की एक सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करती है।

पुस्तक की विषय-वस्तु और बहुआयामी आयाम

यह पुस्तक विभिन्न अनुभवी पर्यावरणविदों, विचारकों और लेखकों के चुनिंदा लेखों का एक ऐसा संग्रह है जो जलवायु परिवर्तन के बहुआयामी प्रभावों को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ रेखांकित करता है। पुस्तक में भारतीय समाज के हर उस पहलू को छुआ गया है जो बदलते मौसम की मार झेल रहा है। इसके प्रमुख अध्यायों और विषयों को चार मुख्य भागों में समझा जा सकता है — खेती की चुनौतियाँ, सुलगते जंगल, हाफते शहर और इंसान-जानवरों का संघर्ष। इन चारों खंडों के माध्यम से लेखक ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि पर्यावरण संकट केवल पेड़ों के कटने या तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी पूरी जीवन-प्रणाली को तहस-नहस कर रहा है।

1. अन्नदाता का संकट: खेती और मौसम की अनिश्चितता

भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है और यहाँ का किसान सदियों से मानसून के भरोसे अपनी फसलें उगाता आया है। परंतु पिछले कुछ दशकों में मौसम का चक्र पूरी तरह से असंतुलित हो गया है। पुस्तक के इस खंड में 'असामयिक बारिश, सूखा और सिकुड़ती फसलें' जैसे विषयों पर गहराई से प्रकाश डाला गया है। कभी बेमौसम मूसलाधार बारिश और ओलावृष्टि किसानों की पसीने से उगाई गई फसल को रातों-रात बर्बाद कर देती है, तो कभी भीषण सूखा और भूजल स्तर में भारी गिरावट खेतों को बंजर बना देती है। लेखक ने बड़े ही मर्मस्पर्शी ढंग से दिखाया है कि कैसे हमारे अन्नदाता (किसान) की आजीविका अनिश्चितता के भँवर में फँस चुकी है और वह कर्ज के जाल में उलझता जा रहा है।

2. सुलगते जंगल और नष्ट होती जैव विविधता

जंगल धरती के फेफड़े कहे जाते हैं, लेकिन आज वे स्वयं आग की लपटों से घिरे हुए हैं। पुस्तक में 'सुलगते जंगल' शीर्षक के अंतर्गत बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग के कारण जंगलों में लगने वाली दावानल (फॉरेस्ट फायर्स) की घटनाओं का दर्दनाक दस्तावेज प्रस्तुत किया गया है। ग्रीष्मकाल में जंगलों में लगने वाली आग न केवल अमूल्य वनस्पतियों और विशाल वृक्षों को स्वाहा कर रही है, बल्कि उस संपूर्ण जैव विविधता को भी छिन्न-भिन्न कर रही है जिस पर प्रकृति का संतुलन टिका हुआ है। मूक वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास उजड़ रहा है, जिसके कारण वे भोजन और पानी की तलाश में मानव बस्तियों की ओर रुख करने को मजबूर हैं।

3. हाफते और डूबते महानगर: कंक्रीट के तंदूर

आज के महानगरों का स्वरूप तेजी से बदला है। प्राकृतिक हरियाली, तालाब और खुले मैदानों की जगह कंक्रीट के ऊँचे-ऊँचे जंगलों और विशाल इमारतों ने ले ली है। पुस्तक में 'हाँफते शहर' खंड के तहत यह दर्शाया गया है कि कैसे हमारे महानगर कंक्रीट के तंदूर में तब्दील हो चुके हैं। शहरीकरण की अंधी दौड़ और अनियोजित विकास के कारण थोड़ी सी बारिश में भी शहर पानी-पानी हो जाते हैं, सड़कें नदियां बन जाती हैं और ड्रेनेज सिस्टम ध्वस्त हो जाता है। अर्बन हीट आइलैंड (Urban Heat Island) प्रभाव के कारण शहरों का तापमान ग्रामीण इलाकों की तुलना में काफी अधिक हो गया है, जिससे शहरी नागरिकों का जीवन दूभर हो गया है।

4. इंसान और जानवर: विस्थापन और अस्तित्व का संघर्ष

जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा मानवीय और प्राणिमात्र का संकट विस्थापन के रूप में सामने आ रहा है। नदियाँ सूख रही हैं या बाढ़ से उफन रही हैं, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, और उपजाऊ जमीनें बंजर हो रही हैं। इन कारणों से लाखों लोगों को अपने पुश्तैनी इलाकों को छोड़कर पलायन करना पड़ रहा है। इसके साथ ही, मूक और बेजुबान जानवरों के अस्तित्व पर भी तलवार लटकी हुई है। उनके पारंपरिक गलियारे (Corridors) नष्ट हो रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं।

लेखक की शैली, भाषा और प्रस्तुति

पंकज चतुर्वेदी की लेखन शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे गंभीर और जटिल पर्यावरणीय मुद्दों को भी बेहद सरल, प्रवाहमयी और बोधगम्य हिंदी में पाठकों के समक्ष रखते हैं। पुस्तक में प्रयुक्त भाषा सहज होने के साथ-साथ अत्यंत मार्मिक और विचारोत्तेजक है। यह किताब केवल बौद्धिक चर्चाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पाठक के भीतर एक आत्मिक मंथन पैदा करती है। हर लेख में प्रस्तुत तथ्य, आँकड़े और जमीनी रिपोर्टिंग इस बात का प्रमाण है कि लेखक ने केवल कमरों में बैठकर किताबें नहीं लिखी हैं, बल्कि देश के कोने-कोने में जाकर पर्यावरण की वास्तविक पीड़ा को अपनी आँखों से देखा है।

पुस्तक की प्रासंगिकता और एक आईना

जैसा कि पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर ही उल्लेख किया गया है — 'यह किताब महज आंकड़ों का पुलिंदा नहीं है, यह एक आईना है जिसमें हम अपना वर्तमान देख सकते हैं और एक मार्गदर्शिका है जिससे हम अपना भविष्य सुधार सकते हैं।' आज के दौर में जब विकास के नाम पर पर्यावरण का अंधाधुंध दोहन हो रहा है, यह पुस्तक नीति-निर्माताओं, राजनेताओं, वैज्ञानिकों, छात्रों और प्रत्येक सामान्य नागरिक के लिए एक अनिवार्य पठन सामग्री बन जाती है।

यह हमें चेताती है कि यदि हमने अभी भी सँभलकर प्रकृति के साथ संतुलन बनाने का प्रयास नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ियों को एक बंजर और तपती हुई धरती विरासत में मिलेगी। पुस्तक अंततः निराशा का संदेश नहीं देती, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण के प्रति जन-जागृति और सामूहिक उत्तरदायित्व का आह्वान करती है।

निष्कर्ष

संक्षेप में कहें तो, 'तपती धरती, बदलता मौसम और भारत' आधुनिक भारतीय पर्यावरण साहित्य की एक मील का पत्थर साबित होने वाली कृति है। यह हर उस नागरिक के लिए पठनीय है जो इस देश की मिट्टी, पानी, हवा और भविष्य से प्रेम करता है। पंकज चतुर्वेदी का यह संपादन कार्य न केवल वर्तमान संकटों का सटीक विश्लेषण करता है, बल्कि हमें एक स्थायी और हरित भविष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा भी देता है। यह पुस्तक हमें यह सिखाती है कि प्रकृति बचेगी , तभी मानव सभ्यता का अस्तित्व सुरक्षित रहेगा।■

Aug 1, 2026

किताबेंः डिटेक्टिव मिरांडा यात्रा पुरातन से नूतन

  - विजय जोशी, पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल

पुस्तकः डिटेक्टिव मिरांडा , लेखक - समरेंद्र नाथ रॉय, मूल्य- 299/ ₹,  प्रकाशक :  रा. प्रकाशन ओ मुद्रण  93, महात्मा गांधी मार्ग,  कोलकाता 700007

 इस दौर में उत्सुकता से सरोबार खोजी लेखन असंभव नहीं पर कठिन अवश्य है। अंग्रेजी में तो शरलॉक होम्स, मारियो पुज़ो, जेम्स हेडली चेज़ से लेकर जेफ्री आर्चर यानी आज तक फिक्शन कला जीवंत है। हिंदी में भी एक समय इब्ने सफ़ी के कर्नल विनोद की जासूसी की कहानियां आज तक सबके जेहन में हैं, गो अब उस लेखन की रफ्तार थम चुकी है।
 ऐसे में तकनीकी माहौल में रचे बसे लेखक समरेंद्र नाथ रॉय, पूर्व निदेशक, भेल द्वारा अनूठी शैली में रचित खोजी मानसिकतायुक्त संग्रह "डिटेक्टिव मिरांडा" पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ। पुस्तक में समाहित हैं प्राचीन, विगत, पौराणिक दर्शन से वर्तमान व आधुनिकता की कहानियां. ऐसी अनेक रुचिकर में से कुछ कहानियों की एक बानगी 
 आरंभ नायक डिटेक्टिव मिरांडा, सहायक सोफिया, सिपाही लोबो चरित्र के माध्यम से पुर्तगाली दौर (1510 - 1961) से आज तक का गोआ जिसमें भूत, प्रेत, भ्रम, ड्रग तस्करी टेकनीक व खोज की कहानियां समेटी गईं हैं।
 इनमें लेखक द्वारा तर्क बनाम अंधविश्वास से परे जाकर  भूतों या परा आत्मा या आत्मा के संदर्भ में तो गीता की बखूबी व्याख्या की गई है : न हन्यते हन्यमाने शरीरे एवं अव्यक्तादीनि भूतानि। जीवन एक प्रतीक्षालय है जहां अपने सारे झोले छोड़कर आत्मा एक दिन लौट जाती है, पर समाप्त नहीं होती : मृत्योर्मा अमृतं गमय
 और इस संदर्भ में अब्राहम लिंकन, विंस्टन चर्चिल, नेपोलियन बोनापार्ट, चार्ल्स डिकन द्वारा तक इसकी उपस्थिति के एहसास को अवचेतन मन में स्वीकारने की बात बताई गई है। 
 एक अन्य अध्याय में निहित है गुजरात में द्वारिका प्रवास के दौरान इतिहास, विश्वास, समुद्र तट वायुमंडल में कृष्ण के प्रभामंडल के आभास को समेटते हुए आज की दुग्ध क्रांति का विवरण। जर्सी गाय के सौजन्य से सर्वप्रथम उत्पादकता वृद्धि व गुणता जिसके तहत आज प्रदेश इस गौरव गाथा का नायक है।
 महानगरों की रात्रि का अनुभव कराता है चेप्टर मिडनाइट मसाला जहां एक रेडियो जॉकी की ज़ुबानी नर्स, ऑटो चालक, चोर व संवेदनशील इंसान की कथा व व्यथा दोनों को समेटा गया है रुचिकर हास्य व्यंग्य शैली में। 
हां एक और रुचिकर चेप्टर है मक्खन पर, जिसकी कथा द्वापर के बाल माखन चोर से वर्तमान तक आती है, जिसमें उसका उपयोग स्वाद व सेहत से इतर काम निकलने के लिए लोगों के अहं की संतुष्टि व स्वार्थ प्रयोजन समाहित है। 
  समापन खंड आदि से अनंत सनातन के उद्भव को समर्पित है। जहां अन्य धर्मों के आरंभ की काल गणना सहज उपलब्ध है, वहीं सनातन की काल से परे उत्पत्ति को समाहित किया गया है। राम "सभ्यता की सर्वोच्च आकांक्षा" तो कृष्ण "जटिलता के साथ जीने की कला" का दर्शन व्याप्त है। कल्पना बनाम तथ्य।
 कल्पनाशीलता सहित प्राचीन इतिहास एवं पौराणिक दर्शन को तथ्यपरक कल्पनाशीलता के साथ अंजुरी में भरकर समर्पित किया गया है। एक कल्पना युक्त रोचक शैली पुस्तक, जिसे रा. प्रकाशन, कोलकाता द्वारा प्रकाशित किया गया है। मुद्रण उत्तम एवं त्रुटिरहित। 

Jul 1, 2026

किताबेंः अनादि समर : छावा के बलिदान से जाग उठा हिन्दू

  - डॉ. लोकेन्द्र सिंह

पुस्तक : अनादि समर, लेखक : गिरीश अवधूत जोशी, प्रकाशक : अर्चना प्रकाशन, भोपाल, मूल्य : 80 रुपये

लेखक गिरीश जोशी की पुस्तक ‘अनादि समर’ छत्रपति शंभूराजे की जीवनी मात्र नहीं है बल्कि यह भारतीय इतिहास के उस महत्त्वपूर्ण कालखंड का विश्लेषण है, जिसे सही ढंग से सामने नहीं लाया गया है। इस पुस्तक की पृष्ठभूमि की जानकारी मुझे ज्ञात है, इसलिए बताना चाहूँगा कि जब सुपरहिट फिल्म ‘छावा’ आई थी, तब छत्रपति शंभूराजे अर्थात् संभाजी महाराज के बारे में जानने की इच्छा लोगों के मन में अत्यंत प्रबल थी। यह एक सहज जिज्ञासा थी कि छत्रपति शंभूराजे के बलिदान के बाद क्या हुआ होगा? क्योंकि फिल्म की पटकथा हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए छत्रपति शंभूराजे के बलिदान पर खत्म हो जाती है। उस समय लेखक गिरीश जोशी जी को यह दायित्वबोध हुआ कि फिल्म जहाँ खत्म होती है, उसके आगे की कहानी वे सुनाएँगे। लोगों को यह अवश्य ही जानना चाहिए कि छत्रपति शंभूराजे के बलिदान ने किस प्रकार हिन्दुत्व की ज्वाला को और तीव्र किया। ‘अनादि समर’ के माध्यम से लेखक गिरीश जोशी ने छत्रपति शंभूराजे के मुगलों के साथ संघर्ष, उनके बलिदान और उस बलिदान के परिणामस्वरूप उपजे ‘लोकयुद्ध’ के वास्तविक इतिहास को सामने लाने का साधु कार्य किया है।

पुस्तक ‘अनादि समर’ की शुरुआत यवन आक्रांताओं, विशेषकर औरंगजेब की क्रूरता और छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा ‘हिंदवी स्वराज्य’ की स्थापना की पृष्ठभूमि से होती है। छत्रपति शिवाजी महाराज के निधन के बाद हिन्दवी स्वराज्य पर पुर्तगालियों, जंजीरा के सिद्दी, अंग्रेजों और मुगलों ने एक साथ नजरें गड़ाईं। ऐसे में हिन्दवी स्वराज्य की बागडोर छत्रपति शंभूराजे ने सँभाली। बाहर की टेढ़ी नजरों के साथ-साथ उन्होंने दरबारी षड्यंत्रों का भी डटकर सामना किया। पुस्तक में जंजीरा किले को जीतने के लिए समुद्र में रास्ता बनाने की योजना और पुर्तगालियों को घुटने टेकने पर मजबूर करने जैसे प्रसंग छत्रपति शंभूराजे के सैन्य कौशल को दर्शाते हैं। लेखक ने स्पष्ट किया है कि संभाजी महाराज केवल एक वीर योद्धा ही नहीं थे, बल्कि 13 भाषाओं के ज्ञाता, उत्कृष्ट विचारक और ‘बुधभूषण’ जैसे संस्कृत ग्रंथ के रचयिता भी थे। अर्थात् लेखक ने छत्रपति शंभूराजे के बहुआयामी व्यक्तित्व को भी सामने लाने का सफल प्रयास किया है।

जिस पराक्रमी योद्धा को आमने-सामने की लड़ाई में परास्त करना संभव नहीं था, उसे पकड़ने के लिए मुगलों ने छल का जाल बिछाया। संगमेश्वर में अपने ही साले गणोजी शिर्के की गद्दारी के कारण छत्रपति शंभूराजे मुगलों की कैद में आ गए। उसके बाद हम सब जानते हैं कि क्रूर औरंगजेब ने इस्लाम कबूलने का दबाव डालने के लिए छत्रपति शंभूराजे को घोर शारीरिक यातनाएँ दीं। उनकी आँखें फोड़ दीं, जीभ खींच ली, जख्मों पर नमक छिड़का; औरंगजेब जितनी क्रूरता दिखा सकता था, उसने दिखाई। इसके बावजूद वह धर्मवीर शंभूराजे को झुका नहीं सका। छत्रपति शंभूराजे ने फाल्गुन अमावस्या (11 मार्च, 1690) को धर्म के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया।

‘अनादि समर’ इससे आगे की कहानी हमें सुनाती है। अत्याचारी औरंगजेब को लगा था कि इस हत्या से हिन्दू समाज दहल जाएगा: लेकिन इसका उल्टा असर हुआ। छत्रपति शंभूराजे के बलिदान ने प्रत्येक हिन्दू नागरिक को सैनिक बना दिया। राजाराम, महारानी ताराबाई, संताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव के नेतृत्व में मुगलों की जो दुर्दशा हुई, उसका वर्णन कम ही किया जाता है। दक्खन जीतने के लिए आया औरंगजेब यहाँ ऐसा उलझा कि वह जिंदा आगरा नहीं लौट सका। मराठा शूरवीरों ने दक्खन में ही उसकी कब्र खोद दी। लेखक गिरीश जोशी ने औरंगजेब की हताश मृत्यु का बहुत सटीक और विस्तृत वर्णन ‘अनादि समर’ में किया है।

लेखक ने ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ वास्तविक इतिहास लिखा है। ऐतिहासिक पत्रों को मूल रूप में शामिल करके पाठकों को उनका विश्लेषण करने का अवसर भी दिया गया है। संकट के समय समर्थ रामदास स्वामी द्वारा छत्रपति शंभूराजे को लिखा गया प्रेरक पत्र (मूल मराठी एवं हिंदी अर्थ सहित) और शंभूराजे द्वारा आमेर के राजा राम सिंह को लिखा गया संस्कृत पत्र, सबको पढ़ना चाहिए। यह पत्र उनके व्यापक दृष्टिकोण और स्वधर्म निष्ठा को उजागर करते हैं। इसके साथ ही, लेखक ने मराठों की युद्धनीति और साहस को वर्तमान संदर्भों से जोड़ते हुए, छत्रपति शिवाजी महाराज और शंभूराजे के पराक्रम की तुलना आधुनिक भारतीय सेना की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की परंपरा से की है।

वामपंथी एवं मुस्लिम इतिहासकारों ने एक बड़ा झूठ यह स्थापित किया कि अंग्रेजों के आने से पहले तक भारत पर मुस्लिम बादशाह का शासन था। यह बहुत बड़ा झूठ है। यह पुस्तक इस तथ्य को मजबूती से स्थापित करती है कि भारत का शासन अंग्रेजों ने मुगलों से नहीं, बल्कि मराठों से लिया था। स्मरण रहे कि अंग्रेजों ने मराठों के साथ 1818 में तीसरे युद्ध में जीत के साथ भारत पर अपना प्रभाव जमाया था। उस समय कथित मुगल बादशाह तो मराठों का पेंशनभोगी मात्र था। लेखक ने विदेशी यात्रियों (जैसे निकोलाओ मनुची) और मुगल इतिहासकारों (जैसे भीमसेन सक्सेना और साकी मुस्तैद खान) के उद्धरणों का उपयोग करके औरंगजेब की छावनी में फैली भुखमरी, बीमारी और गंदगी का यथार्थवादी चित्रण किया है।

कहना होगा कि लेखक गिरीश जोशी की लेखन शैली अत्यंत प्रवाहपूर्ण, देशभक्तिपूर्ण और ओजस्वी है। वे पाठकों के मन में छत्रपति शंभूराजे के प्रति श्रद्धा और उनके बलिदान के प्रति सम्मान जगाने में पूरी तरह सफल रहे हैं। भाषा का प्रवाह सरल-सहज है, जिससे यह इतिहास आम जनमानस तक आसानी से पहुँच सकता है। ‘अनादि समर’ जैसी पुस्तक यह स्पष्ट करती है कि किसी राष्ट्र की नींव को मजबूत करने के लिए कैसे एक ‘छावा’ (शेर के बच्चे) को अपना सब कुछ मिटाकर नींव का पत्थर बनना पड़ता है। इतिहास के विद्यार्थियों, युवाओं और राष्ट्रप्रेमियों के लिए यह एक अत्यंत पठनीय और प्रेरणादायक पुस्तक है।

समीक्षक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।

सम्पर्क: मध्यप्रदेश राज्य शूटिंग अकादमी के सामने, बिशनखेड़ी,भोपाल (मध्यप्रदेश) - 462044 मो. 09893072930, www.apnapanchoo.blogspot.in

Jun 1, 2026

किताबेंः साहित्य का सुहाना सफ़र

  - रमेश कुमार सोनी

पुस्तकः मैं सफ़र में हूँ (साहित्यिक विमर्श), लेखक - रामे
श्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, मूल्य- 400/-₹,   पृष्ठ-152, ISBN:978-93-6423-487-0,अयन प्रकाशन-दिल्ली 2026

भूमिका में रचनाकार की संवेदनात्मक अनुभूतियों की झलक होती है, जिसके द्वारा पाठक यह तय करता है कि वह उस साहित्य में प्रवेश करे या नहीं। यह किसी की साहित्यिक प्रतिभा का प्रोत्साहन है, इसके द्वारा लेखक अपनी रचनात्मकता को परखता भी है। इसी के द्वारा कोई पाठक, रचनाकार के दृष्टिकोण से परिचित होकर अपना तादात्म्य स्थापित करता है। 

 समीक्षा/ आलोचना किसी साहित्य विधा का मूलतः वह विस्तृत अवलोकन है, जो रचना का सूक्ष्मता से आकलन करते हुए उसकी अच्छाइयों से पाठकों को अवगत कराता है एवं कमियों की सलाह देता है। 

 यह विधा चुनौतीपूर्ण है। इसमें भिन्न समयावधि में कई साहित्यकारों के अंतःकरण को बाँचना होता है। सावधानी ये रखनी होती है कि हमारे शब्द रचना के साथ न्याय करें। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ एक ऐसे वरिष्ठ साहित्यिक व्यक्तित्व हैं, जो एक नियत समय में इतने सारे रचनाकारों के साथ चल पाने में सफल हुए हैं। 

 भूमिकाओं/समीक्षाओं के पृथक् संग्रह इन दिनों प्रकाशित हो रहे हैं जिनका स्वागत किया जाना चाहिए। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ को किसी विधा विशेष की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। जिसने जब भी मार्गदर्शन लिया, उसे प्रोत्साहन मिला है। आपका इससे पूर्व अलग-अलग विधाओं के अनेक संग्रह/संकलन प्रकाशित हो चुके हैं एवं अनेकों का संपादन भी किया है।

‘मैं सफ़र में हूँ’ में 22 भूमिकाएँ, 06 समीक्षाएँ एवं एक साक्षात्कार तथा एक अभिमत सम्मिलित हैं। आपने एक प्रख्यात साहित्यकार होने के नाते इसके माध्यम से रचनाकर्म में चक्रव्यूह की तरह प्रवेश, परिचय एवं परख को स्पष्टता के साथ रेखांकित किए हैं। विविध विधाओं में एक साथ जीना और उनके साथ न्याय कर पाना भी एक बड़ी बात है। 

 इसमें साहित्य की विविध विधाओं उसकी शैली और समकालीनता पर आपके विचार मूल्यवान् हैं। इन विधा में शामिल हैं- लघुकथा, कहानी, लोककथा, हाइकु, ललित निबंध, कविता संग्रह, बाल कहानी, व्यंग्य, हास्य-व्यंग्य, हाइकु, रामचरित मानस-धर्म/जीवन बोध ग्रन्थ, यात्रा-संस्मरण, पत्र लेखन, अभिमत एवं शौर्य-गाथा संस्मरण। 

इस विमर्श की लेखकीय पंक्ति के अनुसार-     

   ‘....रचना-कर्म स्वतः स्फूर्त होता है; अतः उसका अंतिम लक्ष्य कुछ नहीं होता, मेरा भी कुछ नहीं है।’ (7) 

 ‘....संवेदना शून्य हृदय से केवल बुद्धिबल के आधार पर साहित्य नहीं रचा जा सकता…।’ (11) 

‘....कथ्य को सपाटबयानी में प्रस्तुत न करके सांकेतिक रूप से प्रस्तुत करना कठिन है। यह काठिन्य ही उसका सौंदर्य है….। ’ (29)

‘...लेखक को जनमानस की पीड़ा परखनी होगी, उसे वाणी देनी होगी।  लेखक का 'व्यक्तिगत' अगर रचना में भी सिर्फ 'व्यक्तिगत' बना रहता है, तो वह कुण्ठा और आरोप से ऊपर नहीं उठ सकता। व्यक्ति का विस्तार समाजगत होना चाहिए, तभी उसकी सार्थकता है। 'व्यक्ति' तक सीमित रहकर कोई अनुभूति रचना का रूप धारण नहीं कर सकती।’(33) 

‘....भाव, विचार, कल्पना एवं चिन्तन को मूर्त रूप देने के लिए चित्रकार और कवि को पहले उसे मानस पटल पर जीवन्त करना होता है।…’(36)

‘....सक्षम भाषा होने पर ही दूसरे व्यक्तियों से संवेदना साझी की जा सकती है। यहाँ पर वह व्यक्ति भी विशिष्ट है, जो दूसरों के अनुभव को उसी स्तर पर अनुभव करता है। अच्छा रचनाकार वह है, जो अपने अनुभव-संसार को सामान्यीकृत करके एक बड़े वर्ग तक सम्प्रेषित करता है। सामान्यवर्ग तक अपनी अनुभूति सम्प्रेषित करना भी एक कौशल है।..’(41)

‘.....रचनाकार को समझने के लिए उसके अनुभव-जगत तक पहुँचना आवश्यक है। सीमित अनुभव और संकीर्ण चिंतन से इनकी रचनाओं के केंद्रीय भाव तक पहुँचना कठिन है। …’ (46)

 ‘.... यह अनुभूतिपरक सम्प्रेषण है। इतनी संयमित शब्दावली में अर्थ का संधान कठिन है। दरिद्र भाषा, सपाट और उथला चिन्तन, उलझी अनुभूतियाँ एवं मृतप्राय कल्पनाएँ किसी भी विधा के लिए संजीवनी नहीं बन सकती। …’ (82)

 इस तरह के विधात्मक महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रत्येक साहित्यकार को पढ़ना एवं अपनाना चाहिए जिसे आपने दिया है। आपकी साहित्यिक यात्रा  का यह संग्रह पाठकों को एक साथ बहुत सी विधाओं की जानकारी उपलब्ध कराने में सफल है। यह स्पष्ट है कि साहित्यकार होने की अनिवार्य शर्त है, उसमें संवेदनशीलता एवं मानवीयता होनी चाहिए। 

आपके इस साहित्यिक यात्रा का सफ़र सुहाना रहे, नवलेखकों को आपका आशीर्वाद/स्नेह प्राप्त होता रहे यही मेरी शुभकामनाएँ हैं। 

इस साहित्यिक विमर्श के लिए-हार्दिक बधाई।

May 1, 2026

किताबेंः युवा क्रांतिकारी के बहुआयामी व्यक्तित्व से परिचित कराती कृति

  - प्रो. सुरंगमा यादव 

पुस्तक : मेरे भगत सिंह : लेखक- पंकज चतुर्वेदी, संस्करण:प्रथम 2026, पृष्ठ:324, मूल्य: रु 350 , प्रकाशकः पेंगुएन स्वदेश, पेंगुएन रैंडम हाउस, इण्डिया,प्रा . लि . चौथी मंज़िल,कैपिटल टॉवर,-1एमजी रोड गुरुग्राम, हरियाणा-122002

भगत सिंह  एक क्रांतिकारी होने के साथ-साथ उच्चकोटि के दूरदर्शी विचारक भी हैं। यह बात और है  कि उनके जीवन काल में उनके विचार, उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों की भाँति  प्रचार न पा सके । यदि जिंदगी ने उन्हें मौका  दिया होता तो, आजादी की  लड़ाई की भाँति  स्वतंत्र भारत में भी उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती।  उन्हें महज़ 'असेंबली बम कांड' या 'सांडर्स वध' के अभियुक्त के रूप में देखना उनके विशाल व्यक्तित्व को  संकुचित करने जैसा है। वे एक ऐसे नायक थे, जिनसे अंग्रेज सरकार  इस कदर  भयभीत थी कि उनकी शहादत के बाद भी जन- आक्रोश के डर से उनके पार्थिव शरीर को रात के अँधेरे में जला दिया गया। जो क्रांतिकारी जीते जी साम्राज्यवाद के लिए चुनौती बना रहा, उसका शव भी फिरंगियों के मन में भय पैदा कर रहा था।

भगत सिंह केवल सशस्त्र क्रांति के पक्षधर नहीं थे, बल्कि एक प्रखर वैचारिक योद्धा भी थे। उनका लक्ष्य केवल  देश को आजाद कराना मात्र नहीं था,  बल्कि उससे भी कहीं  आगे, स्वतंत्र भारत की तस्वीर कैसी होनी चाहिए,   इसका  पूरा खाका उनके दिमाग में स्पष्ट था।  वे एक ऐसे समाजवादी गणराज्य का स्वप्न देखते थे,  जहाँ शोषण का कोई स्थान न हो और प्रत्येक नागरिक की हिस्सेदारी समान हो। यही कारण था कि उन्होंने अपने संगठन का नाम बदलकर 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) रखा।  उनके भीतर अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रबल चेतना  और शक्ति आरंभ से ही  थी, उनकी सबसे प्रिय पुस्तक कार्लाइल की लिखी 'क्राई फॉर जस्टिस' थी। वे  विवाह को क्रांति के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा तथा क्रांति को ही धर्म मानने वाले थे ।   

‘मेरे भगत सिंह’ पुस्तक के लेखक पंकज चतुर्वेदी, जो  मूल रूप से पत्रकार हैं, ‘जवाहर  लाल हाजिर हों’ के साथ- साथ आपने कई  चर्चित पुस्तकें  लिखी हैं  और कई प्रतिष्ठित सम्मानों से आपको सम्मानित किया गया है। 

 ‘मेरे भगत सिंह’ पुस्तक का शीर्षक जितनी आत्मीयता से भरा हुआ है, लेखक ने उतने ही मनोयोग से इस पुस्तक की रचना की है।  यह पुस्तक भगत सिंह के संपूर्ण व्यक्तित्व और विचारों को प्रामाणिक ढंग से हमारे सामने रखती है,  क्योंकि इसमें भगत सिंह से सीधे जुड़े लोगों के विचार और उनके संस्मरणों को आधार बनाया गया है। यह पुस्तक चार खंडों में विभाजित है तथा प्रत्येक खंड अपने आप में विशिष्ट है क्योंकि प्रत्येक खंड  भगत सिंह के विचारों व  व्यक्तित्व के   उन  पहलुओं को उजागर करता है, जो बहुत कम लोगों तक सीमित थे। यह कृति केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि भगत सिंह के मानवीय और वैचारिक पक्षों का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है।

पूत के पाँव पालने में, कॉमरेड्स या साथी क्रांतिकारी,राजनेता,मीडिया और विमर्श- इन चार खंडों में भगत सिंह के छोटे -से जीवनकाल  के वृहत् अध्यायों को समेटने का सफल प्रयास किया गया है। 

    प्रथम खंड में भगत सिंह के निकटस्थ जनों के संस्मरण है, जो पाठक को भगत सिंह से आत्मीय जुड़ाव की अनुभूति कराते हैं तथा भगत सिंह के व्यक्तित्व व  विचारों के उन पक्षों को अनावृत करते हैं, जो भगत सिंह को एक क्रांतिकारी की चर्चित भूमिका से अलग वैचारिक योद्धा तथा एक ऐसे नौजवान के रूप में हमारे सामने लाते हैं ,जो कि जीवन के उल्लास से पूर्ण है, दिल खोलकर हँसता है,  रोता है, दिल्लगी करता है, वाकपटु है, उदार है और प्रेम के भावों से परिपूर्ण है; परंतु कर्तव्य पथ का पथिक है। ये संस्मरण लाहौर नेशनल कॉलेज के प्रिंसिपल छबीलदास की पुत्री सुश्री मनोरमा दीवान के हैं, जहाँ भगत सिंह ने 1923 में प्रवेश लिया।  लाहौर स्थित द्वारिकादास पुस्तकालय में लाइब्रेरियन राजाराम शास्त्री, प्रो. जगमोहन सिंह द्वारा भगत सिंह की पूजनीय माँ श्रीमती विद्यावती जी का 1975 में लिये गए  साक्षात्कार के रूप में तथा उनके छोटे भाई कुलतार सिंह की बेटी सुश्री वीरेन्द्र सिंधु के माध्यम से प्रस्तुत हुए हैं। बेहद सहज- सरल भाषा में ये  पर्त दर पर्त खुलते हुए पाठक के सामने एक  ऐसे भगत सिंह को खड़ा करते हैं, जो जाँबाज तो है ही, संवेदनाओं व भावनाओं से भरा हुआ भी है। हमेशा हँसते रहने वाले भगत सिंह अपनी माँ से कहा करते थे, ‘बेबे तुम परेशान न हुआ करो।  तुम्हारे लिए एक  अनोखी दुल्हन ब्याहकर लाऊँगा’, भगत सिंह का आशय  हिंदुस्तानी की आजादी से था। राजाराम शास्त्री के अनुसार अदालत में भगत सिंह को हँसते  देखकर मजिस्ट्रेट के टोकने पर भगत सिंह, सिंह की तरह गरजते हुए कहते हैं, “मजिस्ट्रेट महोदय,इस समय  आपको मेरा हँसना अच्छा नहीं लगता; पर उस दिन आप क्या करेंगे, जिस  दिन मैं  फाँसी के तख्त पर भी हँसूँगा और इंकलाब  जिंदाबाद चिल्लाऊँगा?”

 खंड दो ‘कॉमरेड्स या साथी क्रांतिकारी’ के अंतर्गत क्रांतिकारी शिव वर्मा की भगत सिंह के साथ पहली मुलाकात से लेकर शहादत के कुछ समय पूर्व हुई मुलाकात का विवरण  तथा उनसे कहे गए शब्दों को पढ़कर मन भावुकता और गर्व से भर उठता है कि जानें किस मिट्टी के बने थे ये लोग, जिनके मन में शहादत की होड़ लगी हुई थी। ‘सांडर्स वध’ के बाद भगत सिंह की पत्नी का स्वांग रचकर उन्हें लाहौर से  सुरक्षित निकालने वाली दुर्गा भाभी का योगदान और चंद्रशेखर आजाद का संदेश  लेकर  गांधी जी से उनकी  वह ऐतिहासिक मुलाकात, जिसमें उन्होंने क्रांतिकारियों की फाँसी रुकवाने का प्रयास किया, इस खंड का मुख्य आकर्षण है।

  अजय कुमार घोष, बटुकेश्वर दत्त, भगवान दास माहौर, विजय कुमार सिन्हा और यशपाल जैसे  क्रांतिकारी साथियों की  दृष्टि से भगत सिंह का चित्रण इस पुस्तक को एक ऐतिहासिक दस्तावेज की श्रेणी में खड़ा करते हैं।

     तीसरा खंड ‘राजनेता’ शीर्षक से है जिसमें सुभाष चन्द्र बोस द्वारा  महात्मा गाँधी से आग्रह करना, शहादत के बाद महात्मा गाँधी, मोहम्मद अली जिन्ना, ई.एम.एस.  नंबूदरीपाद, महामना  आदि के  विचार यह सिद्ध करते हैं कि भगत सिंह आजादी की लड़ाई में कितना महत्त्वपूर्ण थे तथा उनकी शहादत से स्वाधीनता आंदोलन को गति मिली है। यह खंड भगत सिंह तथा साथियों की फाँसी के संबंध में महात्मा गाँधी पर उठने वाले प्रश्न चिह्नों  के काफी हद तक  उत्तर तलाशते हुए  महात्मा गाँधी की भूमिका को रेखांकित भी करती है। 

 अंतिम खंड ‘मीडिया और विमर्श’ में भगत सिंह की शहादत के पश्चात्  ब्रिटिश और भारतीय मीडिया की टिप्पणियाँ  हैं, जो ये बताती हैं कि किस तरह पूरी दुनिया में भगत सिंह की शहादत से क्रिया- प्रतिक्रिया हुई। भारत में  शोक की लहर दौड़ गई, जनाक्रोश की आँच  ब्रिटिश संसद तक पहुँची। 

यह पुस्तक इसलिए भी  महत्त्वपूर्ण है ; क्योंकि ये केवल  शहादत तक ही सीमित नहीं है ; बल्कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी की सजा सुनाए जाने के बाद तत्कालीन  नेताओं ने फाँसी की सजा  रुकवाने के लिए क्या प्रयास किए,  इसका ब्यौरा भी प्रस्तुत करती है। 

 वास्तव में उपर्युक्त  चारों खंडों में विभिन्न लोगों के जो विचार, संस्मरण अब तक  बिखरे हुए रूप में  हमें प्राप्त होते थे, इस पुस्तक में उन सभी को लेखक ने  एक शोधार्थी की भाँति  एकत्र करके  पुस्तक का रूप प्रदान किया है तथा मूल कथ्य  के प्रति पूर्ण सतर्कता एवं सावधानी बरती है। 

 इस पुस्तक में अनेक दुर्लभ चित्र हैं, जिन्हें देखकर रोमांच हो उठता है तथा पुस्तक और भी प्रामाणिक बन जाती  हैं। भगत सिंह के जीवन संघर्ष, उनके विचारों की गहराई, सोच की ऊँचाई और लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता का चित्रण अत्यंत प्रभावशाली ढंग से करने के कारण यह पुस्तक सार्वकालिक प्रासंगिक व पठनीय  है।

Apr 1, 2026

किताबेंः ‘बिजुरी’ के बहाने हमारे समय का सामाजिक रूपक

  - कुँवर सिंह

पुस्तकः बिजुरी,  लेखक: नवनीत नीरव और काजल कुमारी, 

चित्रकार: अन्नादा मेनन, प्रकाशक: रूम टू रीड इंडिया ,पृष्ठ: 32 

नवनीत नीरव और काजल कुमारी की चित्रकथा बिजुरी रूम टू रीड से प्रकाशित पहली दृष्टि में एक सरल ग्रामीण परिवेश की पशु-कथा प्रतीत होती है; किंतु गहराई से पढ़ने पर यह हमारे समय के सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक प्रश्नों से संवाद करती दिखाई देती है। 

चित्रकार अन्नादा मेनन के सशक्त दृश्यात्मक चित्रकारी से यह कहानी संवेदना, असुरक्षा, ईर्ष्या और सह-अस्तित्व की जटिल भाव-भूमि रचती है। इनके चित्र कहानी के भाव-संसार को विस्तार देते हैं। अँधेरी रात का भय, बच्चों की खुसर-फुसर, कीचड़ में धँसी बिजुरी, साथ सोते पाँचों बच्चे चित्रकथा को संवेदनात्मक गहराई प्रदान करते हैं। रंगों का चयन वातावरण के अनुरूप है।

कहानी की शुरुआत ठंडी, बरसाती और भयाक्रांत रात से होता है। वातावरण में असुरक्षा है आवारा कुत्तों का आतंक, मौसम की मार और जीवित रहने की चिंता। इसी पृष्ठभूमि में गेंदा मादा सूअर को नीलगाय का एक असहाय बच्चा मिलता है। और अपने बाड़े में ले आती है। यहाँ कहानी केवल दया का प्रसंग नहीं रचती, बल्कि मातृत्व की सीमाओं का विस्तार करती है।  

बाड़े में बिजुरी का आगमन गेंदा के बच्चों के लिए सहज नहीं है।

“ये हमारी अम्मी हैं, तुम्हारी नहीं!”

यह संवाद स्वामित्वबोध और असुरक्षा को उजागर करता है। यहाँ लेखक बालमन की जटिलता को ईमानदारी से प्रस्तुत करते हैं। नए सदस्य का स्वागत करने के बजाय बच्चे ईर्ष्या और दूरी दिखाते हैं। दूध मिलने जैसी घटना भी भेदभाव का प्रतीक बन जाती है। यह प्रसंग समाज में संसाधनों की असमानता और ‘विशेषाधिकार’ की भावना को दिखाती है।

कहानी की भाषा सरल और संवादप्रधान है। लेखक ने अनावश्यक वर्णन से बचते हुए दृश्यात्मकता को प्राथमिकता दी है, जिससे चित्रों की भूमिका और प्रभाव बढ़ जाता है।

आज हम जिस तरह से अछूते नहीं है। जिस तरह से भारतीय समाज में गाय और सुअर केवल पशु नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीक भी हैं। गाय को पवित्रता से जोड़ा जाता है, जबकि सुअर को कई समुदायों में अपवित्र समझा जाता है। पवित्रता के आधार पर पहचान और विभाजन का खेल रचे जाते हैं। 

ऐसे समय में एक सूअर द्वारा गाय-वंश के बच्चे की रक्षा और परवरिश का दृश्य अत्यंत अर्थपूर्ण रूपक बन जाता है। कथा बिना प्रत्यक्ष टिप्पणी किए यह संकेत देती है कि जीवन की रक्षा और करुणा का मूल्य धार्मिक प्रतीकों से बड़ा है। यहाँ पवित्र और अपवित्र की सामाजिक धारणाएँ अप्रासंगिक हो जाती हैं। शेष रह जाता है केवल जीवन।

यह कहानी किसी विचारधारा का नारा नहीं लगाती। बल्कि सहज कथा-प्रवाह में यह प्रश्न उठाती है कि क्या मनुष्य द्वारा निर्मित विभाजन प्रकृति के स्तर पर निरर्थक नहीं हैं?

कहानी भावनात्मक स्तर पर परतदार है। बाल पाठक इसे एक रोमांचक कथा की तरह पढ़ सकता है, जबकि वयस्क पाठक इसके भीतर सामाजिक अर्थों को देख सकता है।

बिजुरी बाल साहित्य की उस परंपरा में रखी जा सकती है, जहाँ पशु-पात्रों के माध्यम से मानवीय समाज का प्रतिबिंब प्रस्तुत किया जाता है। यह कहानी करुणा, स्वीकृति और सह-अस्तित्व का संदेश देती है, बिना किसी वैचारिक आग्रह के।

आज के विभाजित सामाजिक वातावरण में यह कहानी एक शांत, सौम्य और मानवीय हस्तक्षेप की तरह सामने आती है। यह बच्चों को केवल मनोरंजन नहीं देती, बल्कि उन्हें यह बताती है कि भिन्नता भय का कारण नहीं, बल्कि विस्तार का अवसर हो सकती है।

यह दृश्य तारों भरे आकाश के नीचे पाँचों बच्चों का साथ सोना मानो यही कहता है:

जीवन तब सुंदर है, जब हम साथ हों।

इस किताब को इस लिंक में पढ़ सकते है -

 https://literacycloud.org/stories/7655-bijuri

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समीक्षक के बारे में - 

कुँवर सिंह, किताबें पढ़ने के शौकीन हैं। किताबों के बारे में खूब बातचीत करना पसंद करते हैं। वर्तमान में एकलव्य के प्रकाशन कार्यक्रम में किताबों को पाठकों तक पहुँचाने के काम से जुड़े हैं। साथ ही एकलव्य के “लाइब्रेरी से दोस्ती” कोर्स टीम के साथ जुड़कर काम कर रहे हैं। पराग टाटा ट्रस्ट के लाइब्रेरी एजुकेटर कोर्स के 2021 बैच के साथी हैं। किताबों की समीक्षाएँ “द बुकरिव्यु पत्रिका”, “उदंती.कॉम मासिक पत्रिका के अगस्त 2022” और “एडुकेशन मिरर” में प्रकाशित हुई है। तीन कविताएँ “हमारी बात”, “समय”, और “सुना, फिर से” समकालीन जनमत पत्रिका में प्रकाशित हुई हैं।


Mar 1, 2026

किताबेंः ज़िन्दगी के लिए विटामिन- विटामिन ज़िन्दगी

 -  रश्मि विभा त्रिपाठी

विटामिन ज़िन्दगी: ललित कुमार, पृष्ठ: 264, मूल्य:249 रुपये, आईएसबीएन: 978-93-92820-47-2, द्वितीय संस्करण: 2022, प्रकाशक: हिन्द युग्म, C-31, सेक्टर-20, नोएडा, उत्तर प्रदेश – 201301

एक छोटी- सी ठोकर खाना, एक बार फिसलना, गिरना, फिर इस तरह- से टूट जाना कि गहरे अवसाद से घिरते चले जाना, उसी अवसाद से घिरी ज़िन्दगी के लिए विटामिन है- विटामिन ज़िन्दगी, जिसका अक्षर- अक्षर हमें अदम्य साहस से भरता है, जिसे पढ़कर मन करता है कि अपनी आशाओं का आसमान अब दूर नहीं, अभी उठेंगे और उचककर उसे छू लेंगे।

एक शिशु, जिसका स्वयं प्रकृति माँ ने एक दुर्गम पथ पर चलने के लिए चुनाव किया और प्रकृति माँ का दुलारा वह शिशु; जो अपने नन्हे कदमों से कष्ट में भी किलकते हुए न सिर्फ उस कंटक पथ पर बिना रुके, बगैर थके चला, बल्कि जिसने उस दुर्गम पथ में मील का पत्थर बनकर पथिकों का दिशा- निर्देशन किया- कविताकोश, गद्यकोश, WeCapable.com, दशमलव यू ट्यूब चैनल के संस्थापक राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता रोल मॉडल ललित कुमार जी की ‘विटामिन ज़िन्दगी’ पुस्तक में उनका संघर्ष और उत्कर्ष उन सभी के लिए प्रेरणा है, जो बहुत जल्दी परिस्थितियों के सामने घुटने टेक देते हैं।

पोलियो जैसी चुनौती के साथ जहाँ एक कदम भी चलना मुश्किल था, ललित जी का सफर और बच्चों की तरह आरम्भिक स्कूली ज्ञान से बढ़ता हुआ कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से विज्ञान विषय में स्नातक डिग्री, संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ सहभागिता, संयुक्त राष्ट्र संघ के आधिकारिक मिशन पर चीन के दौरे, मॉरीशस भ्रमण, स्कॉटलैंड सरकार से मिली स्कॉलरशिप पर स्कॉटलैंड की राजधानी एडिनबर्ग की हेरियट- वाट यूनिवर्सिटी से MSc in Bioinformatics with Distinctions, यूरोपीय संघ के साथ मिलकर काम, कनाडा की लवाल यूनिवर्सिटी से पूर्ण स्कॉलरशिप पर पीएचडी में दाखिले तक का सफर है जो दूसरों के लिए अनुकरणीय है। वे जीवन में कहीं भी ठहरे नहीं।

छोटी- सी बात पर घबराकर ईश्वर को उलाहना देने वालों के लिए ये पंक्तियाँ सीख हैं- “प्रकृति माँ का उपहार, वह काँटा, अब मेरे भीतर पूरा धँस चुका था। मैंने प्रकृति माँ से नहीं पूछा कि आपने मुझे ही क्यों चुना। पोलियो वायरस के जिन कणों ने मेरे शरीर को तहस- नहस कर दिया था, वे कण मुझ पर हमला न करते, तो हो सकता है कि किसी और को अपना निशाना बनाते। प्रकृति माँ ने उन कणों को मेरे शरीर में कैद करके शायद किसी और की रक्षा की हो! प्रकृति माँ से क्या पूछना... उनका आदेश सिर- आँखों पर!” (पृष्ठ 27)

परहित की भावना से ललित जी हमेशा आगे बढ़ते रहे और समाज के पूर्वाग्रह से लड़कर, सामाजिक असंवेदनशीलता के सामने डटकर उन्होंने स्वयं को सिद्ध किया कि वे किसी से कमतर कतई नहीं हैं।

पुस्तक तीन भागों में विभाजित है: 1- गिरना 2- सँभलना 3- उड़ान। पुस्तक को पढ़ते हुए विकलांगता के प्रति समाज की संकीर्ण सोच हमें विचलित करती है कि आख़िरकार हम कैसे समाज में जी रहे हैं, जहाँ समानता व बंधुत्व के नारे तो हर गली- चौराहे पर गूँजते हैं; परंतु उनकी व्यवहार रूप में परिणति कहीं नहीं! व्यक्ति समाज की इकाई है, उसी से मिलकर समाज का निर्माण हुआ है, तो क्यों समाज किसी को असामान्य का दर्जा देकर उसे अलग- थलग कर आगे निकलने की होड़ में रहता है जबकि दिखावा यह करता है कि हम सब एक हैं! यह कैसा तंत्र है, कैसी व्यवस्था है; जिसमें किसी के भीतर आगे बढ़ने की ललक होते हुए भी बढ़ावा देने के बजाय पग- पग पर उसे पीछे धकेलने की प्रवृत्ति है?

समाज का यह रवैया, जो जीने की भरपूर चाह रखने वाले को लाचारी का बोध कराकर उसे यह कहकर दरकिनार कर देता है कि तुम तो कुछ करने योग्य नहीं, हमें शर्मिन्दगी का अहसास कराता है। ललित जी का चीन की दीवार पर चढ़ना जीता- जागता दृष्टांत है कि उनके लिए सफलता का कोई शिखर उनसे बड़ा नहीं, और समाज का यह सोचकर उन्हें रोकना कि उन्हें पोलियो है तो वे अयोग्य हैं, समाज की अतिगम्भीर मानसिक विकलांगता का लक्षण है, जो उनकी प्रतिभा के आकलन में अक्षम रहा।

शिक्षक, एक शिल्पकार सरीखा बालक के व्यक्तित्व को सुंदर आकार दे, उसके भविष्य की नींव रखे, उसे नैतिक शिक्षा दे, मानव- मूल्य सिखाए, सुसंस्कार दे, जॉन एडम्स ने भी कहा- “शिक्षक मनुष्य का निर्माता है।”, पुस्तक में उल्लिखित प्रसंग शिक्षक के कार्य- व्यवहार पर प्रश्न चिह्न लगाते हैं कि शिक्षक ही बालक के बाल- मन में यदि हीन भावना भरें तो ऐसी स्थिति में अन्य छात्र क्या करें?

प्रत्येक व्यक्ति इस धरती पर एक विशिष्ट उद्देश्य को लेकर आया है, इस विश्वास से उन्होंने जीवन का उद्देश्य जाना, समझा ही नहीं, अपनी दृढ़ इच्छा- शक्ति से उसे पूर्ण करने वाले ललित जी हमारे समाज और देश के लिए एक आदर्श हैं। दुर्भाग्यवश अधिकतर लोग आजीवन अपने जीवन के उद्देश्य से ही अनभिज्ञ रहते हैं।

जीवन जटिलताओं का जाल है। जिस प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने के लिए हमें विटामिन की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार हमारे मन को भी पूर्णतया स्वस्थ रखने के लिए आस्था, आत्मबल, इच्छा- शक्ति, दृढ़ संकल्प, धैर्य, उत्साह, प्रोत्साहन आदि विटामिन अनिवार्य हैं और ये सब विटामिन प्रचुर मात्रा में हमें 'विटामिन ज़िन्दगी' में मिलते हैं, जिसकी पहली ही खुराक हमें अवरोध, अशांति, अन्याय, अलगाव, असमानता, अमानवीयता जैसे जानलेवा वायरस से लड़कर जीत दिलाने में पूरी तरह सक्षम है। शीर्षक 'विटामिन ज़िन्दगी' पराजय के लिए वरदान है, जिसका आवरण अपने आप में विजय का बखान है। अन्त में वे काव्य-पंक्तियाँ, जो हताश-निराश होने वाले व्यक्तियों के लिए सबसे बड़ा विटामिन हैं-

बैसाखियों से बड़ी ज़िन्दगी!

बैसाखियों से लड़ी ज़िन्दगी

बैसाखियों पे खड़ी ज़िन्दगी

बैसाखियों से बनी ज़िन्दगी

बैसाखियों पे चली ज़िन्दगी

बैसाखियों से बँधी ज़िन्दगी

बैसाखियों पे सधी ज़िन्दगी

-- ललित कुमार -

ललित कुमार जी को 'विटामिन ज़िन्दगी' के सकारात्मक सृजन हेतु हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभेच्छाएँ।


Feb 1, 2026

किताबेंः इतिहास के हाशिये से उठती एक चेतना

 -  डॉ. पूनम चौधरी

पुस्तकः चंद्रशेखर आज़ाद के विश्वस्त सहयोगी : क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर-लेखकः डॉ.शिवजी श्रीवास्तव, प्रकाशकः राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, 5 इंस्टीट्यूशनल एरिया, वसन्त कुंज, नई दिल्ली-110070, पृष्ठः 142, मूल्यः210 रुपये

स्वतंत्र भारत में लिखा गया क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास  और आलोचना का बड़ा भाग विख्यात,परिचित और उजले चेहरों के आसपास ही सीमित रहा। उन उजाले पृष्ठों के पीछे अनगिनत नाम ऐसे थे जिनकी वैचारिक शक्ति और दुर्दांत जिजीविषा संगठन की रीढ़ थी, जिन्होंने तन से,मन से और विचारों से इस आंदोलन को, इस संघर्ष को निरंतरता दी और स्वयं का उत्सर्ग कर दिया। अक्सर यह चेहरे स्मृति के अंधेरे में चले गए। शिवजी श्रीवास्तव का यह प्रयास इस अंधेरे में उतारने का बेजोड़ साहस है।

चंद्रशेखर आज़ाद के विश्वस्त सहयोगी: क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर केवल एक व्यक्ति की कथा नहीं, बल्कि भारतीय क्रांति के उस अनदेखे- अनुलिखित पक्ष को सामने लाने का सशक्त प्रयास है, जहाँ विचार, संगठन, त्याग और सृजन एक-दूसरे में घुलकर राष्ट्र- निर्माण की चेतना बनते हैं। यह पुस्तक किसी व्यक्ति विशेष का स्मारक भर नहीं है; बल्कि उस दीर्घ चेतना के इतिहास का नैतिक दस्तावेज है जिसने इस क्रांतिकारी आंदोलन को सशक्त बनाया।

डॉ. भगवान दास माहौर का जीवन इस पुस्तक में एक सतत विचारशील चेतन की तरह स्पंदित होता है। यह पुस्तक बड़े-बड़े दावे प्रस्तुत नहीं करती, न ही माहौर जी का जीवन किसी नाटकीय आरोह अवरोह के साथ प्रस्तुत किया गया। यह जीवन मुखर होकर कोई दावा नहीं करता, स्वयं को केंद्र में नहीं रखता- फिर भी हर मोड़ पर उपस्थित रहता है। लेखक ने इसी मौन उपस्थिति को रेखांकित किया है। क्रांति क्षणिक उन्माद नहीं, विस्फोट नहीं; बल्कि धीरे-धीरे संस्कार बनती हुई व्यक्ति के व्यक्तित्व में उतरती जाती है, उसके शब्दों में अभिव्यक्त होने लगती है और अंततः उसके आचरण में बस जाती है। यह दृष्टि पुस्तक को साधारण जीवनी से उठाकर एक साहित्यिक-वैचारिक पाठ बना देती है।

 यह पुस्तक कई दृष्टि से विशेष है। राजनीतिक दृष्टि से यह कृति क्रांतिकारी आंदोलन की एक जटिल: किंतु अधिक मानवीय और कारुणिक छवि प्रस्तुत करती है। चंद्रशेखर आजाद केवल पौरुष और पराक्रम का प्रतीक बनकर नहीं उभरते;  बल्कि विश्वास और सहयोग की धुरी के रूप में सामने आते हैं। इसी पृष्ठभूमि में आजाद के चारों ओर डॉक्टर माहौर जैसा विश्वस्त सहयोगी है, जिसकी भूमिका राजनीतिक स्तर पर यह कृति क्रांतिकारी आंदोलन की एक अधिक मानवीय और अधिक जटिल छवि प्रस्तुत करती है। चंद्रशेखर आज़ाद यहाँ केवल वीरता के प्रतीक नहीं; बल्कि विश्वास और सहयोग की धुरी हैं। उनके चारों ओर डॉ. माहौर जैसे सहयोगी हैं, जिनकी भूमिका संघर्ष के वैचारिक चरण से लेकर सशस्त्र अवस्था तक दोनों ही कालखंडों  में समान रूप से निर्णायक रही है।

 शिवजी श्रीवास्तव की यह पुस्तक क्रांति को फिर एक नई परिभाषा दे रही है। क्रांति का आशय केवल बंदूक उठाना नहीं; बल्कि अनुशासन संगठन और वैचारिक स्पष्टवादिता के साथ समाज में बदलाव लाना है। यह पुस्तक आग्रह करती है कि राजनीतिक इतिहास को फिर से मानवीयता और भावनात्मक बुद्धि के साथ पढ़ा जाए। यह लेखक की वैचारिक सामर्थ्य और दूरदर्शिता है कि डॉ भगवान दास माहौर जी पर केंद्रित पुस्तक उनके साथ-साथ समानांतर परिदृश्य को भी उपेक्षित नहीं करती और यही प्रासंगिकता लेखक की कलम को विश्वसनीय बना रही है। सांस्कृतिक दृष्टि से पुस्तक में भगवान दास जी का व्यक्तित्व और कृतित्व ऐसे स्वतंत्रता सेनानी का रूप लेता है, जो आजीवन सृजन में रत रहा। परिशिष्ट में जुड़ी उनकी रचनाएँ  केवल काव्य- प्रदर्शन का भार ही नहीं उठातीं; बल्कि एक संघर्षशील आत्मा की पुकार बनकर उभरती हैं। उनकी कविताएँ वीरता की घोषणा बेशक नहीं करती; किंतु मनुष्य बने रहने की कोशिश उनमें अवश्य झलकती है। कविता यहाँ क्रांति का विकल्प नहीं, उसकी सहचरी है- एक ऐसी जगह जहाँ थका हुआ मन थोड़ी देर ठहरकर अपने विश्वास को फिर से पहचानता है। श्रीवास्तव जी ने जिस संवेदनात्मक संस्पर्श से इन कविताओं को प्रस्तुत किया है, वह पुस्तक के साहित्यिक पक्ष को और प्रभावी बनाती है।

 भाषीय दृष्टि से पुस्तक संयमित काव्यात्मकता का बेजोड़ उदाहरण है। लेखक प्रदर्शन अथवा किसी काव्य चमत्कार का बोझ लेकर नहीं चलता। लेखक की अपनी स्वाभाविक लय है, जो पाठक को घटनाओं के पार उनके अर्थ तक ले जाता है। वर्णन कहीं भी बोझिल नहीं होता; बल्कि स्मृति का रूप लेता चलता है। आपकी शैली अपने नैतिक ठहराव के साथ अत्यंत आकर्षक है- जैसे लेखक जानता हो कि जिस जीवन सत्य के बारे में वह लिख रहा है, उनके सामने शब्दों को भी अनुशासित रहना चाहिए। यही अनुशासन इस पुस्तक को विश्वसनीय भी बनाता है और मार्मिक भी।

 इस पुस्तक का दूसरा कालखंड जो स्वतंत्रता के बाद का है, वह अत्यंत विचार उत्तेजक और संवेदनपरक है। यहाँ वह खंडित सत्य हैं, जो अक्सर परिवर्तन के पश्चात् उपेक्षित कर दिए जाते हैं। यहाँ क्रांतिकारी आंदोलन की चमक नहीं; बल्कि उसका अवशेष है—वह अवशेष जिसमें आदर्श जीवित तो हैं; पर समाज की प्राथमिकताओं से बाहर हो चुके हैं। डॉ. माहौर का जीवन एक शिक्षक, विचारक और सादा नागरिक के रूप में इस प्रश्न को बड़ी तल्खी के साथ उठाता है कि स्वतंत्रता के बाद हमने उन क्रांति पुत्रों के सपनों के साथ क्या किया। यह प्रश्न लेखक ने इस तरह रचे हैं, जिससे पाठक स्वयं टकराता है, उनके जीवन विवरण में पिरोए हुए ये प्रश्न पाठक को न केवल व्यथित करते हैं; बल्कि हमारे इतिहास और साहित्य को प्रश्नों के घेरे में ला खड़ा करते हैं।

समीक्षात्मक दृष्टि से इस पुस्तक का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है। वास्तव में यह पुस्तक साहित्य और इतिहास के अंतर सूत्र प्रस्तुत करती है। पुस्तक में इतिहास के तथ्यात्मक विवरण है, संदर्भ है, तारीखें है; किंतु वे शुष्क नहीं हैं; बल्कि वे मानवीयता और करुणा की कहानी में ढले हुए हैं। यह ढलाव ही इस पुस्तक को अकादमिक होते हुए भी संवेदनशील बनाता है। शोधार्थियों की दृष्टि से यह पुस्तक समृद्ध है, साथ ही सामान्य पाठक के लिए भी यह अनूठा अनुभव है और यही किसी स्तरीय कृति की पहचान है।

समग्र रूप से यह यह किताब एक स्मृति आख्यान है, जो बड़े ही सरल शब्दों में यह स्पष्ट कर देती है की इतिहास केवल विजयगाथा; नहीं बल्कि स्मृति का भी अनुशासन होता है। डॉ. भगवान दास माहौर का जीवन इस अनुशासन का उदाहरण है- जहाँ  क्रांति नारे में नहीं; बल्कि चरित्र और आचरण में प्रतिफलित होती है। लेखक की यह पुस्तक उसी चरित्र को शब्दबद्ध कर रही है। इस प्रयास में वह सफल भी हुए हैं। इस पूरी प्रक्रिया में न केवल हमारी साहित्यिक सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना अधिक सजग और अधिक मानवीय बनती है; बल्कि वह धीरे- धीरे अनाम और अदृश्य स्वतंत्रता सेनानी को केंद्र में स्थापित कर देते हैं। इस प्रक्रिया में वह न केवल एक गुमनाम क्रांतिकारी को दृश्य में लाती है, इसी अर्थ में यह पुस्तक अतीत का पुनर्पाठ नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए एक नैतिक आमंत्रण है। ■

सम्पर्क: 98, पुष्पांजलि नगर फेज 3अवधपुरी आगरा ( उ. प्र.) 282-010, poonam.singh12584@gmail.com

Jan 1, 2026

किताबेंः छंद विधान एवं सृजन

 
- डॉ . कविता भट्ट 

पुस्तकः छंद विधान एवं सृजन( रचनात्मक लेखन):रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, अयन प्रकाशन, जे-19/30,राजापुरी, उत्तम नगर नई दिल्ली-110059, प्रथम संस्करण :2022 , पृष्ठ 96, मूल्य 220/-

रचनात्मक लेखन के अंतर्गत रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ कृत ‘छंद विधान एवं सृजन’ पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ। पुस्तक के शीर्षक से ही इसकी विषयवस्तु की ओर ध्यान आकृष्ट हो जाता है। आधुनिक परिदृश्य में छंद पर केन्द्रित पुस्तकों की महती आवश्यकता है। ध्यातव्य है कि काव्य विधा में रत रचनाकार आधुनिक प्रतिस्पर्धा में इतने अधिक दौड़ना चाहते हैं कि छंद पर ध्यान देने या इसे जानने में समय नहीं दे पाते। इसका एक कारण यह भी है कि जो पुस्तकें छंदों को स्पष्ट करती हैं, उनका आकार वृहद् और अध्ययन- क्लिष्ट होने से यथोचित सामग्री और समय के अभाव में रचनाकार उतना अध्ययन नहीं कर पाते। अस्तु, छंदों पर केन्द्रित ऐसी पुस्तक की आवश्यकता थी, जो सहज व बोधगम्य हो। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की उपर्युक्त पुस्तक ऐसा ही एक सफल प्रयास है।

उपर्युक्त पुस्तक में दो अनुभाग हैं- छंद-विधान (प्रवेश) और छंद-विधान (विस्तार) । पहले अनुभाग में छंद की आवश्यकता, आधार, मात्रिक छंद, वर्णिक छंद का तात्पर्य स्पष्ट करते हुए छंद- अभ्यास की आवश्यकता को भी स्पष्ट किया गया है। द्वितीय अनुभाग में कविता को मूलत: छंद रूप बताते हुए शब्द और पद, बलाघात, यति, अंतर्यति, पद-विन्यास, अर्थ-विन्यास, विशिष्ट शब्द प्रयोग, तुकांतता में सावधानी, उच्चारण और मात्रा, मात्राओं की गणना पर विचार, छंद- संरचना और छंद- अभ्यास इत्यादि को विवेचित करते हुए लेखक ने क्षणिका, प्रमुख जापानी काव्य-विधाओं यथा- हाइकु, ताँका, सेदोका और चोका को उदाहरण सहित समझाकर सभी के लिए सुग्राह्य बना दिया। सबसे अच्छी बात यह है कि पुस्तक के अंत में इन जापानी काव्य-विधाओं का अभ्यास-कार्य तथा सन्दर्भ-संकेत इत्यादि को भी प्रस्तुत किया है।

उल्लेखनीय है कि मात्रिक छंद के अन्तर्गत चौपाई, जयकरी, वीर, लावनी, विधाता, ताटंक, दिग्पाल, गीतिका, हरिगीतिका, सरसी, ललित, आँसू, दोधक, तोटक, शृंगारिणी, माधव मालती, दुतविलम्बित, रोला, कुण्डलिया, उल्लाला, छप्पय तथा बरवै छन्दों को सोदाहरण विवेचित किया गया है। वर्णिक छन्द के अन्तर्गत दुर्मिल सवैया, मदिरा सवैया, मत्तगयन्द सवैया, कवित्त, मनहरण, रूप घनाक्षरी, मनोहरण तथा देव घनाक्षरी छन्दों के साथ माहिया, जनक छन्द और त्रिवेणी को भी विवेचित किया गया है।

पुस्तक सारगर्भित, सहज, सरल और बोधगम्य है। यह नए-पुराने साहित्यकारों के साथ ही साहित्यानुरागियों हेतु भी संग्रहणीय तथा पठनीय है। लेखक के मतानुसार- काव्य के लिए सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी है- तुकबन्दी। छन्द की संरचना का ज्ञान प्राप्त करने के बाद यह पहला पड़ाव है। इसे ही रचनाकारों ने छन्दोबद्ध काव्य समझ लिया है। बड़े-बड़े छन्दशास्त्री अन्तर्जाल पर सरसों को न पेरकर खली में से तेल निकालने में लगे हैं। यद्यपि संस्कृत के प्राचीन छन्दवेत्ता से लेकर आधुनिक काल में नारायण दास (जनन्नाथ दास रत्नाकर के पौत्र) तक इसे स्थापित करने के लिए कटिबद्ध रहे हैं।

पुस्तक की भाषा सरल है। सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी इस पुस्तक को पढ़कर छन्दों का अर्थ, परिभाषा, अभिप्राय और अनुप्रयोग इत्यादि समझ सकता है। नए-पुराने रचनाकार इस पुस्तक को पढ़कर छन्दों की रचना कर सकते हैं। साथ ही अन्य को भी सिखा सकते हैं। छन्दों के लिए अनेक वृहद् पुस्तकें ग्रन्थालयों में पड़ी रहती हैं; किन्तु वे सर्वसुलभ और सर्वग्राह्य नहीं हैं। उन पुस्तकों से सीखना कठिन है। इस दृष्टिकोण से यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी और समकालीन परिदृश्य में प्रासंगिक है। प्रत्येक के लिए संग्रहणीय और उपयोगी है। इस प्रकार यह पुस्तक पुस्तकालयों तक भी पहुँचनी अपेक्षित है। साथ ही इस पुस्तक का अन्तर्जालीय संस्करण भी कुछ समय बाद प्रकाशित किया जाना उपयोगी सिद्ध होगा। ऐसी उपयोगी पुस्तक के लिए लेखक बधाई तथा साधुवाद के पात्र हैं।

Nov 2, 2025

किताबेंः गद्य की विभिन्न विधाएँ: एक अनिवार्य पुस्तक

 - प्रो. स्मृति शुक्ला

पुस्तकः गद्य की विभिन्न विधाएँ- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, मूल्य :260, पृष्ठ :120 संस्करण : 2022, प्रकाशक : अयन प्रकाशन, 19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059

हिन्दी साहित्य में कवि, उपन्यासकार, लघुकथाकार, बाल साहित्यकार, व्यंग्यकार, आलोचक और हिन्दी चेतना जैसी अन्तरराष्ट्रीय साहित्यिक पत्रिका सहित कई पुस्तकों के संपादक के रूप में ख्यात रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ प्रतिष्ठित रचनाकार हैं।

अयन प्रकाशन, नई दिल्ली से उनकी सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘गद्य की विभिन्न विधाएँ’ को केन्द्र रखकर लिखी गई एक स्तरीय पुस्तक इस अर्थ में है कि यह रचनात्मक लेखन की विभिन्न विधाओं के स्वरूप को बखूबी प्रस्तुत करती है। पुस्तक में हर विधा के सभी आयामों पर सम्रगता से विचार किया गया है। किसी भी विधा के रचनात्मक लेखन की उत्कृष्टता उसकी भाषा के निर्धारण में अहं भूमिका होती है। एक साहित्यकार के रूप में रामेश्वर काम्बोज जी यह बात बहुत अच्छी तरह से जानते हैं; इसलिए इस पुस्तक का प्रारंभ ही उन्होंने रचनात्मक लेखन और भाषिक प्रयोग से किया है। वे लिखते हैं - ‘‘जब हम अच्छी रचना (सभी विधाओं) की बात करते हैं, तो अच्छी भाषा की बात अनायास सामने आ जाती है। .... भाषा जड़ नहीं होती, क्योंकि वह प्रवहमान समाज की जीवनी शक्ति है। एक बात और रेखांकित करने योग्य है कि शब्दकोशीय भाषा की एक सीमा है, वाक्-भाषा इससे कहीं इससे कहीं और आगे है, कहीं अधिक बहुवर्णी और नवीनतम भावबोध की अनुचरी है। यह वही गोमुख है, जिसका जल शब्दकोश में आकर मिलता है और उसको सागर बनाता है।’’ आगे उन्होंने प्रत्येक रचनाकार को अपनी भाषा और शैली निर्मित करने का मशविरा दिया है। सामाजिक परिवर्तनों का प्रभाव भाषा पर भी होता है। साहित्यकारों को सकारात्मक चीजों को ग्रहण करना पड़ेगा। लेकिन भाषा का भ्रष्ट प्रयोग नहीं करना चाहिए। उन्होंने लिखा है - ‘‘हड़बड़ी में लिखना, छपने के लिये तुरंत प्रेषित कर देना, किसी भी लेखक की बड़ी दुर्बलता है। जो लिखा जाए, उसे शांत मन से कई-कई बार पढ़ा जाए। वर्तनी की अशुद्धियाँ लेखक को पाठकों में सम्मान नहीं दिला सकतीं।’’ यह बात सच है हिन्दी के जितने महान साहित्यकार हुए हैं उन सभी ने अपनी भाषा पर बहुत काम किया है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी के बड़े-बड़े लेखकों की भाषा का परिष्कार किया है। मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद, पंत, निराला से लेकर अज्ञेय तक सभी ने अपनी काव्यभाषा निर्मित करने हेतु अथक परिश्रम किया है, तभी वे श्रेष्ठ साहित्यकारों में परिगणित हुए हैं।

गद्य की रचनात्मक विधाओं में आत्मकथा, जीवनी, संस्मरण, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, यात्रा-संस्मरण, पुस्तक समीक्षा, डायरी-लेखन, साक्षात्कार, परिचर्चा, फीचर तथा प्रतिवेदन, गद्यकाव्य, लघुकथा और व्यंग्य जैसी विधाओं के स्वरूप के साथ विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं को शामिल करते हुए रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ने इन विधाओं पर सम्यक् विचार करते हुए स्वयं के मत भी प्रस्तुत किए हैं। इन विधाओं की विकास यात्रा पर भी गंभीर चर्चा की है। यहाँ काम्बोज जी का प्रयास यह रहा है कि वे हर विधा में प्रकाशित नई से नई पुस्तकों को इसमें शामिल करें और इसमें वे पूर्णतः सफल भी हुए हैं।

इस पुस्तक में ‘आत्मकथा’ विधा पर बात करते हुए काम्बोज जी ने लिखा है - ‘‘आत्मकथा कोई स्वप्न सृष्टि न होकर जीवन के मधुर-तिक्त अनुभवों का स्मरण और उनकी प्रस्तुति है। आत्मकथा जीवन की वह फिल्म है, जिसमें कल्पना की गुंजाइश नहीं, यथार्थ का खुरदरापन हर कदम पर है। आत्मकथा लेखन अतीत की समस्याओं के लिए भावी समाधान के बारे में कल्पना ज़रूर कर सकता है।’’ हिन्दी की चर्चित आत्मकथाओं के विषय में भी लेखक ने महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ पुस्तक में दी है।

पुस्तक की सबसे खास बात यह है कि रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ का गहन अध्ययन उनके लेखन में झलकता है। सभी रचनात्मक विधाओं की सैकड़ों पुस्तकें उन्होंने पढ़ी हैं; इस कारण उन्होंने ‘गद्य की विभिन्न विधाएँ’ पुस्तक में नए से नए रचनाकार की पुस्तकों का जिक्र भी ख्यात साहित्याकारों की पुस्तकों के साथ किया है। विभिन्न विधाओं की ऐसी श्रेष्ठ पुस्तकें प्रायः हिन्दी साहित्य में अलक्षित रह जाती है, जिनके लेखक स्वयं उनका प्रचार-प्रसार नहीं करते या किसी लेखकीय गुट के सदस्य नहीं होते, पर रामेश्वर काम्बोज जी की गुण ग्राहकता तथा जौहरी की- सी पारखी दृष्टि इन पुस्तकों पर गई है और आपने विभिन्न रचनात्मक विधाओं की ऐसी पुस्तकों को उल्लेखित किया है।

पुस्तक चार अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में रचनात्मक लेखन के सोपान के अन्तर्गत ‘भाषा एक संस्कार है’, ‘साहित्य और काव्य-भाषा’ तथा ‘कहानी की कहानी’ के अन्तर्गत तीन लेख हैं। अध्याय दो गद्य की विभिन्न रचनात्मक विधाओं का संक्षिप्त परिचय है तथा अध्याय तीन में विभिन्न रचनात्मक विधाओं का विस्तार से परिचय दिया गया है। अध्याय चार में रामेश्वर काम्बोज जी ने हिन्दी के सुधि पाठकों, जिज्ञासुओं और विद्यार्थियों के लिए कुछ विधाओं की परिचायात्मक अध्ययन सामग्री शामिल की है, जो विभिन्न विधाओं की स्तरीय रचनाओं से पाठक का परिचय कराती है। इसमें डॉ. सुषमा गुप्ता की डायरी ‘दुनिया को प्यार से ही बचाया जा सकता है’, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की बहुपठित, बहुचर्चित और पठनीयता के रिकॉर्ड तोड़ने वाली पर्यावरण संरक्षण को केन्द्र में रखकर लिखी गई पुस्तक ‘हरियाली और पानी’ पर समीक्षा है। यह समीक्षा हिन्दी की चर्चित साहित्यकार विभिन्न विधाओं की विदुषी लेखिका डॉ.कविता भट्ट द्वारा की गई है। रश्मि शर्मा का यात्रा-वृत्तांत ‘गरुड़ पीढ़ी : अपनेपन की खुशबू’ भी पुस्तक में शामिल है।

प्रियंका गुप्ता का संस्मरण ‘उन आँखों का भूलना आसान है क्या’ और निर्देश निधि का संस्मरण ‘टहनी सचमुच माँ को बुला लाई’ ऐसे संस्मरण हैं, जिनमें अनुभूति का ताप और स्मृतियों का प्रत्यक्षीकरण पूरी जीवंतता से हुआ है। ‘अनुवाद भी सृजन होता है’ इस विषय पर डॉ. कुँवर दिनेश सिंह एवं रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की सार्थक बातचीत परिचर्चा के उदाहरण के रूप में रखी गयी है। कुँवर दिनेश ने हाइकु का हिन्दी से अंग्रेजी अनुवाद और इसमें आने वाली कठिनाइयों का जिक्र करते हुए कहा है - ‘‘प्रत्येक विधा में अनुवाद का मेरा अपना एक अलग अनुभव रहा है। हाइकु को हिन्दी से अंग्रेजी में इसके प्रतीप क्रम में अनुवाद करना बहुत ही जटिल और श्रमसाध्य कार्य है। इसका सबसे बड़ा कारण है- हिन्दी और अंग्रेजी भाषाओं में हाइकु के छंद, स्वरूप एवं संरचना में मूलभूत अंतर।’’ उन्होंने हाइकु अनुवाद के कुछ सुंदर उदाहरणों से अपनी बात स्पष्ट की है। गोपालबाबू शर्मा के हाइकु - ‘जीता या हारा/अकेला पड़ गया/ भोर का तारा’ का अनुवाद- victory or defeat/ solitary in the sky/ The bright morning star जैसे कई उदाहरण इस परिचर्चा में दिये हैं। डॉ. कुँवर दिनेश ने अनुवाद को पुनःसृजन माना है। निःसंदेह रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की यह पुस्तक हिन्दी गद्य की रचनात्मक विधाओं की समग्रता में पहचान कराने वाली अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। पाठक पुस्तक को पढ़कर विधा और शैली के अन्तर को बखूबी समझ सकता है।

लेखक का यह मानना उचित है कि ज्ञान-विज्ञान का, भाषा का और विचार का निरंतर विकास हो रहा है; इसलिए विधाओं का स्वरूप भी स्थिर नहीं है। यह भी एक तथ्य है कि एक ही विधा में दो-तीन विधाओं की आवाजाही हो सकती है या वे एक-दूसरे में घुलमिल सकती हैं। प्रायः संस्मरण और रेखाचित्र विधा में यह बात देखी जा सकती है।

गद्य की विभिन्न विधाएँ पुस्तक प्रत्येक विद्यालय और महाविद्यालय के पुस्तकालयों में होनी चाहिए, ताकि विद्यार्थी हिन्दी गद्य की विभिन्न विधाओं की रचनात्मकता से परिचित हो सकें और लेखन में भाषा के महत्त्व को जान सकें। भाषा के प्रयोग में प्रायः जो अशुद्धियाँ और असावधानियाँ हम करते हैं, उन पर भी रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी ने हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। ‘हिमांशु’ जी लम्बे समय तक केन्द्रीय विद्यालयों में प्रवक्ता और प्राचार्य पद पर कार्य करते हुए हिन्दी भाषा और साहित्य के अध्ययन को सदैव महत्त्व देते रहे हैं तथा इस दिशा में विद्यार्थियों की अभिरुचि में अभिवृद्धि करने के सार्थक प्रयास करते रहे हैं; इसलिए पुस्तक उनके व्यावहारिक जीवन के अनुभवों से संपृक्त होकर और मूल्यवान् हो गई है।

Oct 1, 2025

किताबेंः ‘कुछ रंग’ ग्राम्य जीवन की संवेदनाओं का रंगमंच

 -  डॉ. पूनम चौधरी

कुछ रंग (चोका -संग्रह ): भीकम सिंह, प्रथम संस्करण: 2025, पृष्ठ:136, मूल्य:380 रुपये, अयन प्रकाशन, जे-19/39, उत्तम नगर, नई दिल्ली 110059

हिंदी कविता के इतिहास में जब भी किसी रचनाकार ने प्रचलित विधाओं की सीमाओं को पार करने का साहस किया है, तब तब साहित्य के नए द्वार खुले है। भीकम सिंह जी का कुछ रंग चोका- संग्रह इसी साहसिक परंपरा का प्रतिफल है। यह संग्रह मात्र काव्य संकलन नहीं है, बल्कि हिंदी काव्य में एक नई विधा ‘चोका’ का प्रयोग और उसके माध्यम से जीवन-जगत के अनुभवों का संवेदनशील दस्तावेज़ है। ‘चोका’ वस्तुतः जापानी काव्य परंपरा की विधा से प्रेरित होकर विकसित हुआ, परंतु भीकम सिंहजी ने इसे हिंदी की कलेवर से जोड़कर कुछ रंग दे दिए और साथ ही लोक-संस्कृति और भारतीय जीवन-दर्शन से इसका रूपांतरण कर दिया। यह संग्रह इसलिए विशेष महत्त्वपूर्ण है कि यह न केवल विधा की दृष्टि से नवीन है, बल्कि भावनात्मक दृष्टि से अत्यंत परिपक्व और मार्मिक भी है।

‘कुछ रंग’ काव्य संग्रह में  - आनंद, पीड़ा,संघर्ष,स्मृति और आशा जैसे रंगों को शब्दबद्ध करने का कवि का यह भावुक और संवेदना-पूर्ण प्रयास है। ये रंग केवल बाहरी जीवन के दृश्य नहीं हैं, बल्कि आत्मा की गहराइयों में अनुभव किए गए सजीव बिंब हैं, जो इस संग्रह का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य है।

भीकम सिंह जी की काव्य -दृष्टि का केंद्र ग्रामीण जीवन है —वहाँ की प्रकृति, वहाँ के खेत-खलिहान, पशु-पक्षी, श्रम, संघर्ष और जीवन से जुड़ी छोटी-छोटी संवेदनाएँ । गाँव यहाँ केवल भौगोलिक इकाई नहीं है, बल्कि एक संपूर्ण सांस्कृतिक संरचना है, जिसमें श्रम की गरिमा, प्रकृति का आत्मीय सान्निध्य और सामूहिक जीवन की धड़कनें सुनाई देती हैं। कहते हैं-

अटका चाँद/गाँव  के सिवानों पे/

तारें छिटके/खेत क्यारियों पर/झिलमिल से।

यह प्राकृतिक छटा मात्र का चित्र नहीं है, बल्कि ग्रामीण जीवन की संतोष, आत्मीयता और उस आकाश से जुड़े रहने की अनुभूति है ।

भीकम सिंह का भाव-जगत् ग्राम्य जीवन के यथार्थ से गहराई से जुड़ा, इसलिए  वे गाँव का सौंदर्य चित्रित करना नहीं भूलते खेत, मेंड, गलियारे,पगडंडियाँ, फसले इन सब का जीवंत और मनोहरी चित्रण एक सरल और गाँव के प्रेम में डूबा मन ही कर सकता है इस कसौटी पर भीकम सिंह जी की कविता खरी उतरती है।

 इन कविताओं का दूसरा पक्ष भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। कवि की दृष्टि से गाँव का संघर्ष, उनकी समस्याएँ, उनकी जिजीविषा कहीं ओझल नहीं होती। दुख जीवन का हिस्सा है, परंतु उसके बीच भी सुख की सम्भावना नष्ट नहीं होती। यही कारण है कि वे कहते हैं—

बसंती हवा उम्मीद की तरह/और घास भी/

मस्त मौला बावली/ है सुखों की वजह।

यहाँ हवा महज़ मौसम का बोध नहीं कराती, बल्कि मानवीय मनोविज्ञान की जिजीविषा का प्रतीक बन जाती है।  उनकी कविता में आए वृक्ष और पौधे केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं है: बल्कि वे जीवंत प्रतीक है स्मृतियों के, संघर्षों के,जो धीरे-धीरे सामूहिक चेतना के प्रतीक बन जाते हैं-

पानी की गंध/ओढ़ के बरगढ़ /

खड़ा उदास/पास कही है प्यास।

इसी प्रकार खेत की जुताई, ठूँठों पर सुबह-सुबह का श्रम, और फसल की आशंका—ये सब मिलकर ग्राम्य जीवन की आत्मकथा बुनते हैं और इसकी छटा अद्भुत हो जाती है। भीकम सिंहजी के काव्य का भाव-पक्ष केवल सुख-दुख के वर्णन सीमित नहीं है, बल्कि उसमें एक गहरी संवेदनात्मक मार्मिकता है। उनकी कविता में दुख पाठक के मर्म को छूता है, करुणा की उत्पत्ति करता है; किंतु निराशा से उसका कोई संबंध नहीं है-

बीता बसंत/तो देह का मोह- / 

भी कम हो गया/मन तैरता रहा/ होकर रीता

तो यहाँ देह और मन दोनों की थकान का चित्र है।

इस संग्रह में कई स्थानों पर कवि का स्वर आत्ममंथन का भी है। खेतों की थकान, दुर्घटनाओं की आशंका, श्रम की कठिनाई—ये सब केवल बाहरी यथार्थ नहीं हैं, बल्कि कवि के भीतर भी एक बेचैनी उत्पन्न करते हैं। 

घास के जैसी/खेतों की पीठ पर/ 

उग रही है / मुद्रादायिनी जड़े/

हदें लाँघ के/नागफनी- सी बढ़ी/

इसी प्रश्नवाचकता से उनकी कविता का स्वर और अधिक मार्मिक हो उठता है। इस मार्मिकता में पाठक केवल दर्शक नहीं रहता, बल्कि स्वयं उस अनुभव का सहभागी बन जाता है। जैसे-जैसे संग्रह की कविताएँ आगे बढ़ती हैं पाठक का विश्वास कवि की संवेदना पर प्रबल होने लगता है। कवि जीवन की छोटी-छोटी बातों को बड़े प्रतीकों में बदल देते हैं। घास, ओस, अँखुआना, बीज बोना—ये सब न केवल कृषि-प्रक्रियाएँ हैं, बल्कि मानवीय जीवन की गहरी संवेदनाओं का रूपक हैं। 

भीकम सिंह जी का काव्य-संसार केवल ग्रामीण जीवन के सौंदर्य और आत्मीयता तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें गाँव की समस्याओं का मार्मिक और गहन उद्घाटन भी है। यदि एक ओर उनकी कविता खेतों की हरियाली, नदियों की कलकल ध्वनि और गाँव के सामूहिक श्रम को जीवन का उत्सव बनाकर प्रस्तुत करती है, तो दूसरी ओर उसी जीवन के भीतर पनपती विडंबनाओं, संघर्षों और विसंगतियों का यथार्थ चित्रण करती है। कवि का यह दूसरा पक्ष विशेष रूप से संवेदनात्मक, मार्मिक और तार्किक है, जो पाठक के अंतर्मन को गहराई से छू लेता है। गाँव की सबसे बड़ी समस्या है – शहरीकरण का बढ़ता हुआ प्रभाव-

गाँव  में थी/क्या कहीं कोई सड़क/ 

पगडंडी थी/सड़के जैसे आई/ 

 दूध घी गए/मैगी पिज्जा बर्गर/ जैसे जहर आए।

गाँव की सहजता और सरलता अब स्पर्धा की अंधी दौड़ में डगमगाने लगी है। कवि का आक्रोश और दुःख यहाँ केवल गाँव के लिए नहीं; बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है – 

खेतों के बाद/शुरू होगा बाजार/ 

कहाँ जाएँगे/विस्थापित सियार/ 

कोर्ट में होंगे/ तारीखों से बाहर।

कविता का दूसरा बड़ा प्रश्न है – खेती और मिट्टी का संकट। कवि ने खेतों की समाप्त होती उर्वरता की स्थिति को प्रतीकात्मक बिंबों में व्यक्त किया है – ‘मिट्टी में घुला रसायन’, ‘उड़ती हुई रेत’, ‘थके खेत’– ये केवल शब्द नहीं, बल्कि उस जीवन का सजीव दृश्य हैं, जो हज़ारों किसानों की हताशा और निराशा से भरा हुआ है।

 मिट्टी में घुला/रसायन देखके/सहमें खेत/ 

  थकने लगे/कुछ दिनों से खेत/ उड़ने लगी रेत।

कुछ रंग काव्य संग्रह का संवेदना पक्ष जितना प्रबल है, कलात्मक दृष्टि से भी यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भीकम सिंहजी का चोका विधा को स्थापित करने का यह प्रयास उल्लेखनीय है। ‘चोका’ मूलतः जापानी काव्य-परंपरा की लंबी कविताओं की एक विधा है, जिसमें गेयता और संक्षिप्तता का अद्भुत संतुलन होता है। कवि ने इस विधा को अपनी लोक-संस्कृति की भूमि पर उतारते हुए इसे भारतीय जीवन की संवेदनाओं के अनुकूल रूप दिया है।

उनके चोका में पंक्तियों की लय और प्रवाह विशेष महत्त्व रखते हैं। प्रत्येक पंक्ति में विचार और भाव का घनत्व है, परंतु भाषा सहज और लोक-जीवन से निकली हुई है। उदाहरण के लिए-

शाम झाड़के/खलिहान से उठा/ कंधे पे रखा/संतोष का अंगोछा।

शैल्पिक स्तर पर प्रयुक्त बिम्ब योजना अत्यंत प्रभावशाली है। कवि ने गाँव के दृश्यों का इतना संजीव और जीवंत चित्रण किया है की पाठक उन्हें पढता ही नहीं, बल्कि दृश्य की तरह घटित होते देखता है । खेत, ओस, खरपतवार, कांस, नीम, बसंती हवा—ये सभी बिंब ग्रामीण जीवन के सूक्ष्मतम अनुभवों को मूर्त कर देते हैं। यही कारण है कि उनका चोका दृश्यात्मकता के कारण एक अनोखा प्रभाव छोड़ता है। 

भाषा की दृष्टि से भी यह संग्रह विशेष महत्त्व रखता है, सहज़ सरल लोक जीवन की भाषा में जिस तरह कवि ने यह संसार रचा है वह सीधा पाठक के हृदय को छूता है । भाषा न तो अत्यधिक अलंकारिक है, न ही कृत्रिम। वह ग्राम्य जीवन की सहजता से निकली हुई है, किंतु साथ ही उसमें साहित्यिक परिष्कार भी है।  वे क्लिष्ट और गूढ शब्दावली प्रयुक्त नहीं करते बल्कि साधारण शब्दों में असाधारण अनुभव व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि उनकी भाषा में एक ओर लोक की सजीवता है, तो दूसरी ओर काव्य की परिष्कृति।

निष्कर्ष रूप से कह सकते हैं ‘कुछ रंग’ हिंदी साहित्य में एक नई विधा का आरंभ है और एक संवेदनशील कवि की परिपक्व अभिव्यक्ति का उदाहरण भी। भीकम सिंह ने चोका विधा को हिंदी के सांस्कृतिक संदर्भों में इस प्रकार ढाल दिया है कि वह आत्मसात् प्रतीत होती है। यह संग्रह भाव-पक्ष में जितना मार्मिक है, शिल्प-पक्ष में उतना ही सुदृढ़ और परिपक्व है।

इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह पाठक को केवल कविता पढ़ने का अवसर नहीं देता, बल्कि उसे जीवन की गहरी संवेदनाओं में सहभागी बना देता है। गाँव के सुख-दुख, खेतों की थकान, श्रम की ऊर्जा, और भविष्य की आशा—ये सब मिलकर पाठक को ऐसा अनुभव कराते हैं मानो वह स्वयं उस जीवन का हिस्सा हो।  किसी भी रचना की कसौटी है- पाठक को जीवन के अनुभव से जोड़ देना।

Sep 1, 2025

किताबेंः अधूरी मूर्तियों का क्रंदन: एक संवेदनात्मक पड़ताल

 -  पूनम चौधरी

अधूरी मूर्तियों का क्रंदन (कहानी -संग्रह ) : सुदर्शन रत्नाकर, प्रथम संस्करण: 2025, मूल्य:  ₹ 380 ,  पृष्ठ:-136,  अयन प्रकाशन,  जे 19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059

सुदर्शन रत्नाकरजी का कहानी -संग्रह ‘अधूरी मूर्तियों का क्रंदन’ साहित्य में अपनी संवेदनात्मक गहनता, प्रतीकात्मक शिल्प और दार्शनिक अंतर्दृष्टि के कारण विशेष महत्व रखता है। यह केवल कहानियों का संग्रह नहीं; बल्कि जीवन की विद्रूपता और विसंगतियों के साथ, जिजीविषा और मानवीय आकांक्षाओं की करुण परिणति का गहन साहित्यिक प्रतिरूप है। संग्रह का शीर्षक अपने आप में इतना सशक्त और प्रतीकात्मक है कि सम्पूर्ण रचना-समुच्चय की आत्मा को उद्घाटित करता है। अधूरी मूर्तियाँ मात्र पाषाण की टूटी काया नहीं, अपितु जीवन की अधूरी इच्छाओं, अपूर्ण आकांक्षाओं और म्लान स्वप्नों का दर्पण हैं। उनका क्रंदन मनुष्य की आत्मा का वह मौन स्वर है, जो कभी मुखर नहीं हो पाता, परंतु निरंतर अंतर्मन में गुंजायमान रहता है।

‘अधूरी मूर्तियों का क्रंदन’ शीर्षक केवल शाब्दिक अर्थ में टूटे हुए शिल्पों का विलाप नहीं है; बल्कि यह उन समस्त मनुष्यों के अनुभवों और मानसिक द्वंद्वों का रूपक है, जहाँ व्यक्ति चाह कर भी अपनी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पाता। समुद्र की अनंत लहरों के बीच अधूरी पड़ी मूर्तियों का क्रन्दन न केवल समय की विडंबना है; बल्कि मनुष्य के असंतोष, असफलताओं और अपूर्णता का भी मार्मिक प्रतीक है। इस प्रकार शीर्षक में संग्रह की आत्मा निहित है, जो न केवल भावनात्मक मार्मिकता; बल्कि गहन दार्शनिक दृष्टि को भी प्रकट करता है।

 संग्रह में कुल 15 कहानियाँ हैं, जो अपने-अपने स्तर पर मानवीय जीवन के विविध पक्षों का उद्घाटन करती हैं। कहानियाँ केवल घटनाओं का विवरण नहीं देतीं; बल्कि पाठक को पात्रों के मानसिक संसार में प्रवेश कराती हैं। प्रत्येक कहानी में पात्रों की पीड़ा, संघर्ष और जिजीविषा इस प्रकार चित्रित है कि पाठक स्वयं उनके जीवन का सहभागी प्रतीत होता है।

संग्रह की भूमिका स्वयं लेखिका की आंतरिक दृष्टि को उद्घाटित करती है। इसमें स्पष्ट है कि रचना केवल कला का साधन नहीं; बल्कि जीवन के अनुभवों और संवेदनाओं का सूक्ष्म चित्रण है। लेखिका ने यह स्पष्ट किया है कि वह जीवन की कठिनाइयों, पीड़ा और असफलताओं को मात्र उद्घाटित नहीं करती, बल्कि उनके भीतर से उत्पन्न आशा, साहस और जीवन के प्रति जिजीविषा को भी उन्होंने पाठक के समक्ष प्रस्तुत किया है। भाषा की सहजता, प्रवाह और भावनाओं की शुद्धता भूमिका को पठनीयता और अनुभवात्मकता का गहन स्तर प्रदान करती है। सुदर्शन रत्नाकर की लेखनी का यह प्रारंभिक वक्तव्य मात्र भूमिका न होकर, उनके रचना-संसार का आत्मस्वर है। यहाँ लेखिका ने अपने सृजन की प्रक्रिया को अत्यंत आत्मीयता और संवेदनशीलता के साथ उजागर किया है। वे स्पष्ट करती हैं कि लेखन केवल दृष्टिगोचर जगत की पुनर्रचना नहीं; बल्कि अंतःकरण से अनुभव किए गए दुःख–सुख, वेदना–संघर्ष और जीवन के विविध रंगों का साक्षात्कार है।

लेखिका की दृष्टि में सृजन वह यात्रा है, जिसमें आँखें, हृदय और बुद्धि एकाकार होकर नया संसार रचती हैं। वे मानती हैं कि लेखक अपने पात्रों के साथ जीता है, उनसे वार्तालाप करता है और उन्हें आत्मसात करके शब्दों में उतारता है। इसी कारण उनकी रचनाएँ जीवन की सच्चाइयों से गहराई से जुड़ जाती हैं और पाठक के हृदय तक पहुँचकर उसकी संवेदना को स्पंदित करती हैं।

इस भूमिका में एक अत्यंत मार्मिक उद्घोष है—“लेखन का अंत नहीं होगा; क्योंकि उसके बिना मेरा जीवन निःसार है।” यह कथन लेखिका की लेखनी और जीवन के बीच के गहरे संबंध को प्रकट करता है। उनके लिए लेखन केवल एक अभिव्यक्ति का साधन नहीं, बल्कि अस्तित्व का आधार है। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ जीवन की जटिलताओं से जूझते हुए भी सकारात्मकता और जिजीविषा का संचार करती हैं।

‘अधूरी मूर्तियों का क्रंदन’ शीर्षक से ही यह संकेत मिलता है कि ये कहानियाँ अधूरेपन, वेदना और संघर्ष से उपजी संवेदनाओं को मुखर करती हैं। किंतु यह अपूर्णता नकारात्मकता की नहीं बल्कि उस सतत अन्वेषण का प्रतीक है, जो जीवन को गतिमान और रचनाशील बनाए रखता है।

भूमिका की भाषा सरल होते हुए भी मार्मिक है और उसकी संवेदनाएँ इतनी प्रामाणिक हैं कि पाठक अनायास ही लेखिका के आत्मसंवाद का सहभागी बन जाता है। यह भूमिका वस्तुतः उस धड़कन के समान है, जो संपूर्ण संग्रह को जीवंत कर देती है और पाठक को आगामी कहानियों के प्रति गहन उत्सुकता से भर देती है।

इस संग्रह की पंद्रह कहानियाँ जीवन की विविध स्थितियों, मानवीय संबंधों की जटिलताओं और स्त्री–मन की गहन संवेदनाओं को मार्मिक रूप में अभिव्यक्त करती हैं। प्रत्येक कहानी अपनी विशिष्टता रखती है; किंतु कुछ रचनाएँ विशेष रूप से हृदय में गहरी छाप छोड़ती हैं। 

अधूरी मूर्तियों का क्रंदन’ कहानी-संग्रह की शीर्षक कहानी है। लेखिका ने स्त्री जीवन के अधूरेपन और उसकी मौन वेदना को जिस करुण स्वर में प्रस्तुत किया गया है, वह पाठक को भीतर तक विचलित कर देता है।

यह कहानी मानवीय संबंधों के अधूरेपन और स्त्री-जीवन की पीड़ा को उजागर करती है। अंशुला के जीवन के माध्यम से लेखिका ने दिखाया है कि एक स्त्री अपने कर्तव्यों, रिश्तों और सामाजिक बंधनों में उलझकर अपने सपनों और आकांक्षाओं को अधूरा छोड़ देती है। उसका व्यक्तित्व एक ऐसी मूर्ति की तरह है, जो आकार तो लेती है पर कभी पूर्णता तक नहीं पहुँच पाती। कथ्य का उद्देश्य नारी जीवन की विडंबना को सामने लाना और पाठक को यह सोचने पर विवश करना है कि क्यों स्त्री की इच्छाएँ बार-बार दबा दी जाती हैं। शिल्प की दृष्टि से कहानी प्रवाहमयी और आत्मीय है, जिसमें वर्णन और संवाद दोनों का संतुलित प्रयोग हुआ है। बिंब और प्रतीकों—विशेषकर ‘अधूरी मूर्ति’ और ‘क्रंदन’—ने कथा को गहन भावुकता और गहराई दी है। यह रचना अपने उद्देश्य, संवेदना और सहज शैली के कारण पाठक को भीतर तक छू जाती है।

‘अकेलेपन का दंश’  कहानी मानव-जीवन की उस शाश्वत समस्या को उद्घाटित करती है, जहाँ बाहरी स्वतंत्रता के होते हुए भी आंतरिक स्तर पर मनुष्य बंधनों में जकड़ा रहता है। समुद्र की मुक्त लहरों में तैरती मछलियाँ स्वतंत्रता और पूर्णता का प्रतीक हैं, किंतु जब वही मछलियाँ एक्वेरियम की सीमाओं में कैद हो जाती हैं, तो उनका अस्तित्व मात्र शारीरिक होता है, आत्मिक नहीं। यह रूपक मनुष्य की स्थिति का सटीक चित्रण करता है- सामाजिक नियम, पारिवारिक बंधन और मानसिक सीमाएँ हमें बाहरी स्वतंत्रता के बावजूद भीतर से कैद कर देती हैं। कहानी का संदेश स्पष्ट है कि वास्तविक स्वतंत्रता मानसिक और आत्मिक मुक्ति में निहित है।

‘बस एक बार’ कथा व्यक्तिगत संबंधों और सामाजिक कठोरताओं की गहरी पड़ताल करती है। विवाह से पूर्व हुए एसिड-अटैक और मंगेतर के पलायन का प्रसंग मानवीय संवेदनाओं की भीषण परीक्षा है। मुख्य पात्र की मन की चीखें केवल व्यक्तिगत शोक का द्योतक नहीं, बल्कि समाज की असंवेदनशीलता और स्त्री की असुरक्षा का भी उद्घाटन हैं। यहाँ लेखिका यह प्रतिपादित करती हैं कि जीवन केवल बाहरी सौंदर्य या सामाजिक मान्यताओं पर आधारित नहीं, बल्कि विश्वास, संवेदना और आत्मिक जुड़ाव ही संबंधों का वास्तविक आधार है। यह कथा पाठक को भीतर तक झकझोर देती है और समाज की क्रूर विडंबनाओं पर गहन प्रश्नचिह्न लगाती है।

‘वह हारा नहीं’ कहानी संघर्ष और साहस की अनूठी अभिव्यक्ति है। विपरीत परिस्थितियों, सामाजिक दबाव और अप्रत्याशित घटनाओं के बीच नायक का आत्मबल और धैर्य ही उसे जीवन में विजय की ओर अग्रसर करता है। यहाँ लेखिका यह स्पष्ट करती हैं कि बाहरी हार ही वास्तविक पराजय नहीं होती; पराजय तब होती है जब मनुष्य का आत्मबल टूट जाता है। यह कथा पाठक के भीतर छिपी जिजीविषा को जगाती है और संदेश देती है कि परिस्थितियाँ चाहे जितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, साहस और आत्मविश्वास ही मनुष्य को जीवन-पथ पर अग्रसर करते हैं।

 संग्रह की अन्य कहानियाँ दिद्दा, केंचुली,बेजी, मैं लड़ूँगी दारजी, नेगी अंकल, वह लौट आया आदि भी अपनी संवेदनात्मक शक्ति और कथ्य की विविधता के कारण महत्त्वपूर्ण हैं, समग्रतः यह कहानी–संग्रह जीवन की अनकही पीड़ाओं और आशाओं का संवेदनशील दस्तावेज़ है।

लेखिका की भाषा सहज, प्रवाही और मार्मिक है। इसमें न तो कृत्रिम अलंकरण का बोझ है और न ही दुरूहता का आग्रह। भावों की शुद्धता और शब्दों की सादगी मिलकर एक ऐसा वातावरण रचती है, जहाँ पाठक सहज ही पात्रों की संवेदनाओं से तादात्म्य स्थापित कर लेता है। संग्रह की कहानियों में संवाद, वर्णन और वातावरण—तीनों का संतुलित उपयोग हुआ है, जो कथानक को जीवंत और प्रभावशाली बनाता है।

 कहानियाँ केवल व्यक्तिगत पीड़ा और मानसिक संघर्ष तक सीमित नहीं है; इसमें समाज की असमानताओं, विडंबनाओं और मानवीय संवेदनाओं का चित्रण है। संबंधों की जटिलता, सामाजिक अपेक्षाएँ, आर्थिक विषमताएँ- ये सब संग्रह की कहानियों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपस्थित हैं।

कहानियाँ वास्तविकता के उद्घाटन के साथ साथ उनके भीतर छिपी आशा, सहानुभूति और जिजीविषा की अभिव्यक्ति भी करती हैं। यही कारण है कि इन कहानियों को पढ़ते हुए पाठक निराशा नहीं होता बल्कि जीवन की कठिनताओं से जूझने का साहस पाता है। यह द्वंद्वात्मक दृष्टि ही संग्रह को संवेदनशीलता के साथ-साथ दर्शनिकता भी प्रदान करती है।

भाषा की सहजता, शिल्पगत संतुलन, प्रतीकात्मकता और मार्मिकता के कारण यह संग्रह हिंदी कथा-साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण और अविस्मरणीय योगदान सिद्ध होगा। यह न केवल पठनीय है; बल्कि अनुभवजन्य और चिंतन-प्रेरक भी है।

अधूरी मूर्तियों का क्रंदन पाठक को जीवन की कठिनताओं और विसंगतियाँ से अवगत कराते हुए उसे संवेदनशील और जागरूक बनाता है। यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है कि यह पाठक के मन, मस्तिष्क और हृदय पर गहरा व स्थायी प्रभाव छोड़ता है। ■