पुस्तकः सुरंग के उस
पार (आत्मकथा):लेखकः डॉ. परदेशीराम वर्मा. मूल्य - 695.00, पृष्ठ- 298, प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नयी दिल्ली-110002
छत्तीसगढ़ में अनेक
कथाकार और साहित्यकार हुए हैं, जिन्होंने अपनी कलम से सब
कुछ लिखा, जिसे पाठकों ने खूब पसंद किया और सराहा। इन्हीं
में से दुर्ग के डॉ. परदेशीराम वर्मा में हैं, जिन्होंने कथा,
कहानी, कविताएँ खूब लिखी हैं। सुरंग के उस पार
को पढ़ते हुए मुझे उनके जीवन को जानने समझने का अवसर मिला। उनसे मैं कई बार मिला
हूँ और उनके वक्तव्यों से प्रभावित भी हुआ हूँ। मैं क्या, कोई
भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता ; क्योंकि वे बहुत
ही सहज और सरल हैं। यही नहीं ; बल्कि उनकी कथा कहानी तो जैसे
हमारे जीवन में घट रही घटनाओं का ही रेखांकन होता है। वे हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में
समान अधिकार से लिखते हैं और राष्ट्रीय, प्रादेशिक
पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित होते हैं।
वे दुर्ग जिले के छोटे
से गाँव लिमतरा के निवासी हैं ; लेकिन उनका गाँव पूरी तरह
से रायपुर के ऊपर निर्भर रहा है। गाँव के पास खरखरा नरवा पार करके कुम्हारी और फिर
रायपुर जाया जाता है। उनका जन्म भी गाँव से बाहर रायपुर के अस्पताल में होने के
कारण वे ‘परदेशी’ हो गए। पिता जी उनके नाम के साथ ‘राम’ जोड़ दिया और कुर्मी समाज
में जन्म लेने के कारण ‘वर्मा’ सम्बोधन मिला और वे ‘परदेशी राम वर्मा’ हो गए।
लिमतरा गाँव के आसपास उनकी प्राथमिक शिक्षा हुई -लिमतरा, गोढ़ी
और भिलाई में। उनका अलमस्त बचपन था। वे लिखते हैं-‘‘बचपन में धान से भरे खेतों के
मेड़ों पर चलकर हम स्कूल जाते थे। धान की निंदाई करने वाले कृषकों और मजदूरों के
द्वारा काम करते हुए गाए जाने वाले गीतों के स्वर माधुर्य से हम ठिठक जाते और देर
से स्कूल पहुँचने पर हमारी कान खिंचाई होती और कभी मुर्गा भी बनना पड़ता था।’’
आज जब उनकी पुस्तक
‘सुरंग के उस पार’ हमारे हाथ में हैं तो
वे 78 वर्ष के युवा कथाकार हैं; क्योंकि अभी भी उनकी लेखनी
में वही धार है जब वे शुरूआती दौर में लिखते थे। जब वे पीछे मुड़कर अपने जीवन को
झाँकते हैं तब उन्हें अंधकार में डुबे हुए छत्तीसगढ़ और उसके छोटे छोटे गाँवों की
बीमारी, गरीबी और बदहाली से घिरे रहने वाले बहुतेरे लोग
मृत्यु को जीवन का पर्याय मानकर सहज भाव से अपनी रौ में जीते थे। वे स्वयं अपनी
माँ के ग्यारह बच्चों में से बचे तीन बच्चों में से एक थे। उनका नाता भी मृत्यु से
करीबी का था। पहले भाई से भी प्रिय अंतर्राष्ट्रीय पंथी नर्तक देवदास बंजारे का
एक्सीडेंट में स्वर्गारोहण के साथ मृत्यु से करीबी साक्षात्कार हुआ ; क्योंकि उस एक्सीडेंट में वह भी उनके साथ थे। फिर उनसे अपार स्नेह रखने
वाले छत्तीसगढ़ के महाकवि और संत पवन दीवान उन्हें अकेला छोड़ गए। फिर मात्र वर्ष की उम्र में उनका इकलौता बेटा अशेश्वर
बिलखता छोड़ गया। मात्र 18 वर्ष की उम्र में वे असम राइफल्स के सिपाही बनकर मिजो
हिल्स में तीन वर्ष रहे और वहाँ भी सैनिकों को मृत्यु का वरण करते देखे। तब उनके
मुख से मैथिलीशरण गुप्त की पंचवटी की ये पंक्तियाँ फूट पड़ती है -
नहीं विघ्न बाधाओं को
हम स्वयं बुलाने जाते हैं।
किंतु अगर वे आ जाएँगे
कभी नहीं घबराते हैं।।
परदेशी राम जी लोकमंचीय
कलाकारों के घर पैदा हुए। उनके पिता लोकमंचीय कलाकार थे और छोटा भाई महेश भी
लोकमंच का सफल कलाकार है। उनकी सारी आर्थिक और सामाजिक तरक्की में लोक मंच का हाथ
है। जिस साहित्य लेखन से उनकी पहचान बनी उसी तरह लोक मंच की साधना कर महेश ने सब कुछ
पा लिया।
‘सुरंग के उस पार’
वास्तव में डॉ. परदेशीराम वर्मा के जीवन संघर्ष का दस्तावेज है। 34 खंडों में
उन्होंने अपने जीवन के उतार चढ़ाव को उकेरने का प्रयास किया है। उनकी लेखनी लिमतरा
के आसपास सुरजीडीह, गोढ़ी, नन्दौरी
के साथ भिलाई और रायपुर तक चलती है। कभी गाँव की खुशहाली, अकाल
की मार, तरिया में डुबकी लगाने का सुख, बरगद पेड़ की छाँव और जीवन देती अलमस्त हवाएँ, त्योहारों
का उल्लास और जात-पात से ऊपर आत्मीय संबोधन का लाड़ होता है। उन्हें हाई स्कूल के
गुरुओं, लिमतरा के बुजुर्गो और सबसे बढ़कर मेरी दाई ने जीवन
में जूझते हुए जीने का मंत्र दिया।
परदेशीराम जी अनेक
संस्थाओं से जुड़े रहे जैसे प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक
संघ और जिला साक्षरता अभियान आदि। उन्हें कहानी लेखन से जितना लगाव है, उतना काव्य लेखन और पठन से भी रहा है। उनका एक मंचीय काव्य उनके जीवन को
रेखांकित करता है-
हम शायद ही देख सकें पर
तुम जरूर देखोगे,
बाहर भीतर से बदली
दुनिया की यह तस्वीर।
कदम कदम पर अवरोधों के
बीच अकेलापन है,
सहयात्री सब दूर खड़े
इसलिए राह निर्जन है।
जीवन से जूझते हुए
उन्होंने एम. ए. समाजशास्त्र और लोक प्रशासन में पास किया। उनका उपन्यास
‘आवा’ एम. ए. हिन्दी के पाठ्यक्रम में
पंडित रविशंकर शुक्ल वि़ वि. रायपुर में सम्मिलित है। जीवन में उन्हें अनेक मान
सम्मान मिले। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर द्वारा मानद डी. लिट. की
उपाधि प्रदान की गई। यह उनकी साहित्यिक यात्रा का उत्कृष्ट परिणाम है।
वे अपने बारे में कुछ
यूँ लिखते हैं-‘‘लिमतरा से लेकर भिलाई तक जो मेरे मित्र-शत्रु बने, उसकी सोहबत में रहकर सदैव कुछ न कुछ सीखने का प्रयास किया। मुझे यह देखकर
आश्चर्य होता है कि हमेशा किसी विरोधी का एक पत्थर भी मेरी ओर उछलता है तो चार
रक्षक भी जाने कहाँ से सामने आ जाते हैं। छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्य मंत्री अजीत
जोगी फिर डॉ. रमन सिंह, उसके बाद भूपेश बघेल और अब वर्तमान
मुख्य मंत्री विष्णुदेव साय जी से मेरा सहज परिचय लिखने पढ़ने के कारण ही बना है।
इन चारों मुख्य मंत्रियों ने मुझे भरपूर सम्मान और महत्व दिया है।’’
वे हिन्दी और छत्तीसगढ़ी
में समान रूप से लिखे। उनका पहला उपन्यास प्रस्थान दैनिक देशबंधु रायपुर में
धारावाहिक प्रकाशित हुआ। अभी तक उनकी आठ कथा संग्रह, तीन
उपन्यास, छह नव साक्षर साहित्य की पुस्तकें, एक नाटक, एक बाल काव्य संग्रह, एक बाल कथा- संग्रह, तीन जीवनी, छत्तीसगढ़ पर केन्द्रित चार वैचारिक पुस्तकें, छत्तीसगढ़ी
कहानियों के दो संकलन, छत्तीसगढ़ की लोक कथाएँ और पर्यटन पर
केन्द्रित चंदन पेड़ पहाड़ में के साथ
‘सुरंग के उस पार’ (आत्मकथा) प्रकाशित हैं। अगासदिया पत्रिका और नियमित
प्रकाशन कर रहे हैं। उनकी कहानियाँ आकाशवाणी औ दूरदर्शन रायपुर से प्रसारित हो
चुकी हैं। उन्हें अनेक साहित्यिक और सामाजिक संस्थाओं से सम्मानित और पुरस्कृत
किया जा चुका है। उनकी लेखनी अनवरत चलती रहे और हम जैसे नवोदित साहित्यकारों,
लेखकों को प्रेरणा देती रहे।
सम्पर्कः डागा कालोनी, बरपाली चौंक, चाम्पा-495671, छत्तीसगढ़














