- डॉ. पूनम चौधरी
पुस्तकः चंद्रशेखर आज़ाद के विश्वस्त सहयोगी : क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर-लेखकः डॉ.शिवजी श्रीवास्तव, प्रकाशकः राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, 5 इंस्टीट्यूशनल एरिया, वसन्त कुंज, नई दिल्ली-110070, पृष्ठः 142, मूल्यः210 रुपये
स्वतंत्र भारत में लिखा गया क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास और आलोचना का बड़ा भाग विख्यात,परिचित और उजले चेहरों के आसपास ही सीमित रहा। उन उजाले पृष्ठों के पीछे अनगिनत नाम ऐसे थे जिनकी वैचारिक शक्ति और दुर्दांत जिजीविषा संगठन की रीढ़ थी, जिन्होंने तन से,मन से और विचारों से इस आंदोलन को, इस संघर्ष को निरंतरता दी और स्वयं का उत्सर्ग कर दिया। अक्सर यह चेहरे स्मृति के अंधेरे में चले गए। शिवजी श्रीवास्तव का यह प्रयास इस अंधेरे में उतारने का बेजोड़ साहस है।
चंद्रशेखर आज़ाद के विश्वस्त सहयोगी: क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर केवल एक व्यक्ति की कथा नहीं, बल्कि भारतीय क्रांति के उस अनदेखे- अनुलिखित पक्ष को सामने लाने का सशक्त प्रयास है, जहाँ विचार, संगठन, त्याग और सृजन एक-दूसरे में घुलकर राष्ट्र- निर्माण की चेतना बनते हैं। यह पुस्तक किसी व्यक्ति विशेष का स्मारक भर नहीं है; बल्कि उस दीर्घ चेतना के इतिहास का नैतिक दस्तावेज है जिसने इस क्रांतिकारी आंदोलन को सशक्त बनाया।
डॉ. भगवान दास माहौर का जीवन इस पुस्तक में एक सतत विचारशील चेतन की तरह स्पंदित होता है। यह पुस्तक बड़े-बड़े दावे प्रस्तुत नहीं करती, न ही माहौर जी का जीवन किसी नाटकीय आरोह अवरोह के साथ प्रस्तुत किया गया। यह जीवन मुखर होकर कोई दावा नहीं करता, स्वयं को केंद्र में नहीं रखता- फिर भी हर मोड़ पर उपस्थित रहता है। लेखक ने इसी मौन उपस्थिति को रेखांकित किया है। क्रांति क्षणिक उन्माद नहीं, विस्फोट नहीं; बल्कि धीरे-धीरे संस्कार बनती हुई व्यक्ति के व्यक्तित्व में उतरती जाती है, उसके शब्दों में अभिव्यक्त होने लगती है और अंततः उसके आचरण में बस जाती है। यह दृष्टि पुस्तक को साधारण जीवनी से उठाकर एक साहित्यिक-वैचारिक पाठ बना देती है।
यह पुस्तक कई दृष्टि से विशेष है। राजनीतिक दृष्टि से यह कृति क्रांतिकारी आंदोलन की एक जटिल: किंतु अधिक मानवीय और कारुणिक छवि प्रस्तुत करती है। चंद्रशेखर आजाद केवल पौरुष और पराक्रम का प्रतीक बनकर नहीं उभरते; बल्कि विश्वास और सहयोग की धुरी के रूप में सामने आते हैं। इसी पृष्ठभूमि में आजाद के चारों ओर डॉक्टर माहौर जैसा विश्वस्त सहयोगी है, जिसकी भूमिका राजनीतिक स्तर पर यह कृति क्रांतिकारी आंदोलन की एक अधिक मानवीय और अधिक जटिल छवि प्रस्तुत करती है। चंद्रशेखर आज़ाद यहाँ केवल वीरता के प्रतीक नहीं; बल्कि विश्वास और सहयोग की धुरी हैं। उनके चारों ओर डॉ. माहौर जैसे सहयोगी हैं, जिनकी भूमिका संघर्ष के वैचारिक चरण से लेकर सशस्त्र अवस्था तक दोनों ही कालखंडों में समान रूप से निर्णायक रही है।
शिवजी श्रीवास्तव की यह पुस्तक क्रांति को फिर एक नई परिभाषा दे रही है। क्रांति का आशय केवल बंदूक उठाना नहीं; बल्कि अनुशासन संगठन और वैचारिक स्पष्टवादिता के साथ समाज में बदलाव लाना है। यह पुस्तक आग्रह करती है कि राजनीतिक इतिहास को फिर से मानवीयता और भावनात्मक बुद्धि के साथ पढ़ा जाए। यह लेखक की वैचारिक सामर्थ्य और दूरदर्शिता है कि डॉ भगवान दास माहौर जी पर केंद्रित पुस्तक उनके साथ-साथ समानांतर परिदृश्य को भी उपेक्षित नहीं करती और यही प्रासंगिकता लेखक की कलम को विश्वसनीय बना रही है। सांस्कृतिक दृष्टि से पुस्तक में भगवान दास जी का व्यक्तित्व और कृतित्व ऐसे स्वतंत्रता सेनानी का रूप लेता है, जो आजीवन सृजन में रत रहा। परिशिष्ट में जुड़ी उनकी रचनाएँ केवल काव्य- प्रदर्शन का भार ही नहीं उठातीं; बल्कि एक संघर्षशील आत्मा की पुकार बनकर उभरती हैं। उनकी कविताएँ वीरता की घोषणा बेशक नहीं करती; किंतु मनुष्य बने रहने की कोशिश उनमें अवश्य झलकती है। कविता यहाँ क्रांति का विकल्प नहीं, उसकी सहचरी है- एक ऐसी जगह जहाँ थका हुआ मन थोड़ी देर ठहरकर अपने विश्वास को फिर से पहचानता है। श्रीवास्तव जी ने जिस संवेदनात्मक संस्पर्श से इन कविताओं को प्रस्तुत किया है, वह पुस्तक के साहित्यिक पक्ष को और प्रभावी बनाती है।
भाषीय दृष्टि से पुस्तक संयमित काव्यात्मकता का बेजोड़ उदाहरण है। लेखक प्रदर्शन अथवा किसी काव्य चमत्कार का बोझ लेकर नहीं चलता। लेखक की अपनी स्वाभाविक लय है, जो पाठक को घटनाओं के पार उनके अर्थ तक ले जाता है। वर्णन कहीं भी बोझिल नहीं होता; बल्कि स्मृति का रूप लेता चलता है। आपकी शैली अपने नैतिक ठहराव के साथ अत्यंत आकर्षक है- जैसे लेखक जानता हो कि जिस जीवन सत्य के बारे में वह लिख रहा है, उनके सामने शब्दों को भी अनुशासित रहना चाहिए। यही अनुशासन इस पुस्तक को विश्वसनीय भी बनाता है और मार्मिक भी।
इस पुस्तक का दूसरा कालखंड जो स्वतंत्रता के बाद का है, वह अत्यंत विचार उत्तेजक और संवेदनपरक है। यहाँ वह खंडित सत्य हैं, जो अक्सर परिवर्तन के पश्चात् उपेक्षित कर दिए जाते हैं। यहाँ क्रांतिकारी आंदोलन की चमक नहीं; बल्कि उसका अवशेष है—वह अवशेष जिसमें आदर्श जीवित तो हैं; पर समाज की प्राथमिकताओं से बाहर हो चुके हैं। डॉ. माहौर का जीवन एक शिक्षक, विचारक और सादा नागरिक के रूप में इस प्रश्न को बड़ी तल्खी के साथ उठाता है कि स्वतंत्रता के बाद हमने उन क्रांति पुत्रों के सपनों के साथ क्या किया। यह प्रश्न लेखक ने इस तरह रचे हैं, जिससे पाठक स्वयं टकराता है, उनके जीवन विवरण में पिरोए हुए ये प्रश्न पाठक को न केवल व्यथित करते हैं; बल्कि हमारे इतिहास और साहित्य को प्रश्नों के घेरे में ला खड़ा करते हैं।
समीक्षात्मक दृष्टि से इस पुस्तक का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है। वास्तव में यह पुस्तक साहित्य और इतिहास के अंतर सूत्र प्रस्तुत करती है। पुस्तक में इतिहास के तथ्यात्मक विवरण है, संदर्भ है, तारीखें है; किंतु वे शुष्क नहीं हैं; बल्कि वे मानवीयता और करुणा की कहानी में ढले हुए हैं। यह ढलाव ही इस पुस्तक को अकादमिक होते हुए भी संवेदनशील बनाता है। शोधार्थियों की दृष्टि से यह पुस्तक समृद्ध है, साथ ही सामान्य पाठक के लिए भी यह अनूठा अनुभव है और यही किसी स्तरीय कृति की पहचान है।
समग्र रूप से यह यह किताब एक स्मृति आख्यान है, जो बड़े ही सरल शब्दों में यह स्पष्ट कर देती है की इतिहास केवल विजयगाथा; नहीं बल्कि स्मृति का भी अनुशासन होता है। डॉ. भगवान दास माहौर का जीवन इस अनुशासन का उदाहरण है- जहाँ क्रांति नारे में नहीं; बल्कि चरित्र और आचरण में प्रतिफलित होती है। लेखक की यह पुस्तक उसी चरित्र को शब्दबद्ध कर रही है। इस प्रयास में वह सफल भी हुए हैं। इस पूरी प्रक्रिया में न केवल हमारी साहित्यिक सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना अधिक सजग और अधिक मानवीय बनती है; बल्कि वह धीरे- धीरे अनाम और अदृश्य स्वतंत्रता सेनानी को केंद्र में स्थापित कर देते हैं। इस प्रक्रिया में वह न केवल एक गुमनाम क्रांतिकारी को दृश्य में लाती है, इसी अर्थ में यह पुस्तक अतीत का पुनर्पाठ नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए एक नैतिक आमंत्रण है। ■
सम्पर्क: 98, पुष्पांजलि नगर फेज 3अवधपुरी आगरा ( उ. प्र.) 282-010, poonam.singh12584@gmail.com

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