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Mar 1, 2026

कहानीः अकालग्रस्त इलाका

 - प्रेम गुप्ता ‘मानी’/ प्रियंका गुप्ता

चंद लम्हों पहले ही तो आसमान एकदम साफ़ था। उसकी आसमानी नीली चादर पर काले बादलों के कुछ नन्हे टुकड़े तैर रहे थे, पर पल भर बाद हवा के झोंके उन्हें कहीं दूर धकेल देते, तो लगता, सब कुछ ठीक है...। मौसम विभाग कहीं-न-कहीं गड़बड़ा गया लगता है...उसके अनुसार तो तेज़ बारिश की संभावना है। 

यद्यपि, हफ्ते भर पहले ही तेज़ आँधी के बाद इतनी ज़ोर की बारिश हुई थी कि बहुत कुछ अस्त-व्यस्त हो गया था। धूल-भरी आँधी ने घर के नक्शे को इस कदर बेरंग कर दिया था कि सफ़ाई करने का सोचकर ही मैना घबरा गई थी। आँधी के कारण पूरे इलाके की बत्ती जो गुल हुई, सो अलग... उस पर बला की गर्मी...?

उस समय उलझन के एक अजीब माहौल ने सबको जकड़ रखा था कि तभी बादलों की तेज़ गड़गड़ाहट के साथ धरती पर झमाझम गिरती बारिश की बूँदों ने जैसे सबको एकदम निहाल कर दिया था। घर की साफ़-सफ़ाई के बाद मैना भी उस सकून से भर गई थी। 

उस दिन जमकर पानी बरसा। लगा, जैसे आकाश उसी दिन अपना पूरा भरा घड़ा खाली कर देगा...। सड़कें घुटने-घुटने पानी से भर गई थीं, तिस पर जहाँ-तहाँ कीचड़...गंदगी...। शुक्र था कि उस दिन इतवार था। सब घर पर ही थे। मौसम का मज़ा लेने के लिए मैना ने ढेर सारी बेसन की पकौड़ियाँ बनाई थीं और साथ में गर्मागर्म चाय भी...। बड़े इत्मीनान से सबने खाया। 

पकौड़ियों का मज़ा बरसात के मौसम में ही तो है, पर उसके बाद हफ्ते भर तक कुछ भी नहीं...। अपना घड़ा एक ही दिन में खाली करके आकाश तो शांत हो गया था; पर नीचे धरती पर सारे जीव कुलबुला उठे थे। कितनी अजीब बात थी...बारिश की ठंडी-ठंडी बूँदें धरती का ताप कम कर देती हैं, पर उसके थमते ही धरती फिर झुलसने लगती है...। मैना को वैसे भी गर्मी बहुत लगती है, तिस पर गोकुल की ज़िद, “एसी नहीं चलेगा...बिजली का बिल बहुत ज़्यादा आता है...।”

इधर मैना की उलझन...पंखे की गर्म हवा किसी तरह दिन में तो झेल लेती है, पर रात में...?

पंखे की गर्म हवा राहत देने की बजाय उसे बेचैन कर देती। पूरा बदन अजीब तरह से चिपचिपा उठता। ऐसे में नींद कैसे आती? इस चिपचिपी उमस भरी रात में गोकुल पता नहीं कैसे सो जाता और वह पूरी रात बालकनी में काट देती। एसी लगे होने के बावजूद वह कुछ नहीं कर पाती। एक-दो बार जबरिया उसने एसी चलाया भी, लेकिन गोकुल ने झुँझलाते हुए उसे बंद कर दिया। गर्मी का मौसम वैसे भी उसके लिए काल बन जाता है, तिसपर गोकुल से रोज-रोज रात को उलझना...। ज़िद में आकर वह दूसरे कमरे में सोने को भी तैयार नहीं होता था। हारकर उसे ही चुप रहना पड़ता था। 

आज भी खाना-पीना निबटाकर वह बालकनी में बैठी ही थी कि अचानक आसमान पर काले बादलों के विशाल टुकड़ों ने हमला बोल दिया। पहले तो वे पूरे ज़ोर से गरजे और फिर बरस पड़े...पर उनका यह गरजना-बरसना भी बस चंद घंटों के लिए ही था, लेकिन यह वक़्त भी उसके लिए बेहद सकून भरा था। 

सकून से भरी वह आराम करने की सोच ही रही थी कि तभी उसका मोबाइल कुनमुना उठा...कोई अनजान नंबर था। आमतौर पर वह कोई अनजान नंबर रिसीव नहीं करती, पर इस समय...?

पता नहीं क्या सोचकर उसने मोबाइल उठा ही लिया। उधर की आवाज़ सुनते ही वह चौंक गई। पूरे साल भर बाद यह क्या...? रीमा को उसकी याद कैसे आ गई? इतने समय से तो जैसे रीमा ने उससे सारे रिश्ते-नाते ही तोड़ लिये थे। उसने यह भी नहीं सोचा कि माँ के जाने के बाद मैना ने बड़ी बहन का ही नहीं, बल्कि एक माँ का भी फ़र्ज़ अदा किया था। उसे जब भी कोई ज़रूरत पड़ती, मैना तुरंत हाज़िर हो जाती...। हारी-बीमारी में उसके पास पहुँच ही जाती थी। अपने खर्चे से कटौती करके, गोकुल से छिपाकर पैसे-रुपये से भी उसकी मदद करती, लेकिन यह रीमा...? 

रीमा को इन सबसे जैसे कभी कोई सरोकार रहा ही नहीं। वह कहाँ से और कैसे उसकी मदद कर पाती है, यह जानने की उत्सुकता उसमें कभी थी ही नहीं। कभी भूले-भटके बातों के दौरान अगर मैना अपनी तकलीफ़ों का ज़िक्र करना भी चाहती, तो अगले ही पल रीमा किसी-न-किसी बहाने फोन काट देती। ऐसे में मैना को हल्की कोफ़्त भी होती थी। कितनी अजीब और मतलबपरस्त लड़की है...अपनी जरूरतों और कष्टों की रामकहानी सुना डाली; लेकिन उसकी बारी आई तो बस्स...अच्छा दीदी, थोड़ा काम है, बाद में बात करती हूँ...कहकर कॉल रख दिया? कई बार मैना का दिल भी करता, अगली बार जब यह अपना दुखड़ा रोएगी तो वह भी ऐसे ही काम का बहाना करके फोन रख देगी...न तो उसका दुखड़ा सुनेगी, न उसकी मदद करने के लिए खुद को परेशानी में डालेगी। लेकिन मैना तो बस मैना थी...। माँ-बाप के दिए संस्कारों का सबसे ज़्यादा असर शायद उसी पर हुआ था, तभी तो किसी की परेशानी सुनी नहीं कि सबसे पहले सहायता करने को तैयार...। जब बाहरी लोगों के साथ मैना ऐसी थी तो रीमा तो फिर भी अपनी सगी छोटी बहन ही थी न...। उसकी मदद से भला वो कैसे पीछे हट सकती थी। 

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आज भी फोन उठाते ही रीमा का चिर-परिचित लहजा...हम हैं...मानो उसके इस ‘हम’ में समस्त ब्रह्मांड समाया हो। मैना अक्सर उसके इस तरीके पर चुटकी ले चुकी थी, पर उसकी तमाम दूसरी बातों की तरह रीमा इस बात को भी हमेशा अनसुना करके निकल जाती थी। 

‘यह किसका नंबर है?”

“अरे, यह मेरे मोहल्ले की पार्लर वाली का नंबर है। एक शादी में जाना है, तो बाल-आइब्रो सब करवाने आए हैं। दीदी, मेरे मोबाइल का रिचार्ज खतम हो गया है, ज़रा पाँच सौ वाला करवा दो...। वहाँ जाएँगे तो ज़रूरत पड़ेगी न...। अच्छा, सुनो, हम फटाफट सब करवा लें, नहीं तो पहुँचने में बहुत लेट हो जाएगा। बाद में बात करते हैं।”

इससे पहले कि मैना कुछ कह-सुन पाती, रीमा ने फोन काट दिया। कुछ पल के लिए मैना फोन वैसे ही हाथ में पकड़े सन्नाटे-सी अवस्था में बैठी रह गई। साल भर बाद फोन किया भी तो अपने मतलब से...? न हाल, न चाल, बस रिचार्ज करा दो। मन हुआ, अभी पलटकर उसे इसी नंबर पर कॉल करे और खरी-खरी सुना दे। तुम्हारा ठेका ले रखा है क्या? अपने आदमी से जो पैसा पार्लर के लिए लेकर आई हो, उससे खुद रिचार्ज कराओ...। कौन सा पहले की तरह मेरे रिचार्ज करने के बाद मुझसे बात करने वाली हो?

पर मन की बात मन में ही रखते हुए मैना ने एक लंबी साँस भरते हुए खुद को संयत किया और दस मिनट बाद ही रिचार्ज के लिए रीमा का नंबर सेलेक्ट कर लिया। क्या पता, कहाँ जा रही हो। कम-से-कम पास में हाड़े-गाढ़े काम आने के लिए मोबाइल चालू तो रहना चाहिए न। हाँ, इतना ज़रूर पक्का था कि इस बार वो सबसे कम कीमत का ही रिचार्ज कराएगी। बस इतना भर कि कहीं भी बात कर सके। 

रिचार्ज होने के बाद भी रीमा की तरफ से कोई कॉल, तो कौन कहे, एक मैसेज तक नहीं आया। हमेशा की तरह बस एक चुप्पी...जो जाने कितने दिनों तक चलेगी। 

मैना अभी भी बालकनी में बैठी थी। बारिश थम चुकी थी, लेकिन रेलिंग से बूँदें थोड़ा-थोड़ा करके रिस रही थी...। मैना को लगा, ये बारिश की बूँदें नहीं, बल्कि उसका रिश्ता हो जो धीरे-धीरे रिसता जा रहा था। 

मैना ने मोबाइल मेज पर रखा और चाय का प्याला उठा लिया। इतनी देर में चाय पूरी तरह ठंडी हो चुकी थी, पर फिर भी उसकी इच्छा नहीं हुई उसे गरम करने की..। एक साँस में ही वह ठंडी चाय गटक गई। 

कुछ देर यूँ ही बैठी वह आसमान ताकती रही, फिर पता नहीं क्या सोचकर मोबाइल उठाकर रीमा का नंबर डायल कर दिया। लगातार बजती घंटी सुनकर वह फोन रखने ही वाली थी कि तभी रीमा ने कॉल उठा लिया, “रिचार्ज हो गया दीदी...बताया था न कि अभी इनके एक फ्रेंड के यहाँ शादी में जा रहे हैं, तो पार्लर आए हैं तैयार होने...बाद में बात करते हैं...और हाँ, अगली बार ज़्यादा नेट वाला रिचार्ज कराना...यह एक जीबी बहुत जल्दी खत्म हो जाता है...ठीक है? चलो रखते हैं...।”

इससे पहले कि मैना कुछ कह-सुन पाती, रीमा ने फोन रख दिया। मैना को लगा, वह अंदर तक आसमान में घिरे काले बादलों की तरह भारी हो गई है...अगर जल्दी ही ना बरसी तो फट जाएगी। 

पर बरसे भी तो कहाँ जाकर...? माँ-बाप हैं नहीं, मायके के नाम पर एक भाई-भाभी, पर वे भी बस अपनी दुनिया में मस्त...और रीमा...? उसके जैसी मतलबपरस्त इंसान से तो कोई उम्मीद रखना ही बेमानी था। कहने को पति के रूप में गोकुल उसके साथ थे, पर वे भी अति-व्यावहारिक और आत्मकेंद्रित...संवेदना शायद अंश-मात्र भी नहीं थी उनमें...। दुनिया के लिए वे बेहद व्यवहारकुशल व्यक्ति थे; लेकिन उनके साथ भावात्मक संवाद कर पाने की गुंजाइश कहीं से भी नहीं थी। ऑफिस, पैसे की चिंता और घर एक निश्चित बजट में चलाने तक ही उनकी दुनिया सीमित थी; इसलिए गर्मी में एसी ना चलाने देने की ज़िद हो या सर्दियों में हीटर और गीज़र के लिए होने वाली बहसें हों, मैना हर परिस्थिति में सामंजस्य बैठाने का प्रयत्न करती। वह जानती थी, फालतू की लड़ाइयों में कुछ नहीं रखा। हरेक बात पर लड़ना जितना आसान होता है, चुप रहकर निभा ले जाना उतना ही कठिन...। वैसे भी वह रिश्तों को निभाने में यकीन रखती थी, सो अधिकतर चुप ही रह जाती। 

अचानक ही मैना की आँखों के सामने जैसे रीमा की पूरी ज़िंदगी घूम गई। उसके स्कूल में रहते ही पहले पापा, और फिर माँ का जाना...। भाई-भाभी को तो तब भी कोई खास फ़र्क नहीं पड़ा था, पर रीमा के लिए अगर वो दुखद घटनाएँ थीं, तो मैना के लिए तो जीवन-भर का खालीपन और अकेलापन था। रीमा का बोझ उठाने के लिए भाभी तैयार नहीं हुई तो बेहद चिरौरी करके मैना ने किसी तरह गोकुल को मनाया था, रीमा को अपने साथ रखने के लिए...। संवेदनाओं से कोसों दूर रहने वाले गोकुल जाने कैसे उस घड़ी थोड़े द्रवित होकर उसकी बात मान गए थे, यह मैना आज भी नहीं समझ पाई; पर जो भी हो, गोकुल की सहमति से मैना के दिल से जैसे बहुत बड़ा बोझ उतर गया था। 

गोकुल पैसे को दाँत से पकड़ने वाले लोगों में से थे; इसलिए रीमा के पालन-पोषण के लिए मैना ने खुद पार्ट-टाइम नौकरी कर ली। उसके कालेज के फॉर्म भरने से लेकर उसकी नौकरी लगने और शादी तक की सारी ज़िम्मेदारी मैना ने बड़ी बहन बनकर नहीं, बल्कि माँ की तरह पूरी शिद्दत से निभाई। 

डेढ़ साल पहले उसकी एक बड़ी बदतमीजी पर जब मैना ने उसे यही सब याद दिलाकर समझाना चाहा था, तब रीमा ने बड़ी तल्खी से और उल्टा जवाब दे दिया था, “दीदी, तुमने जो भी किया, अपनी मर्ज़ी से किया था। मैंने नहीं कहा था तुमसे कि मेरी ज़िम्मेदारी उठाओ...। खुद की यह महानता अपने पास रखो। अपनी औलाद नहीं थी, तो मुफ़्त में मेरी माँ बनने की कोशिश न करो। अपने मन से किए गए कामों के लिए मुझ पर अहसान न जताओ...” कहते हुए रीमा ने फोन पटक दिया था। 

मैना अवाक्-सी चुप रह गई थी। रीमा की बातों के हंटर से उसका दिल छलनी हो गया था। कुछ देर के लिए मानो उसके दिल-दिमाग पर लकवा मार गया। जब ऑफिस से आए गोकुल ने कई बार आवाज़ देने के बाद उसे झिंझोड़ा, तो जैसे उसे होश आया। गोकुल चाहे जैसे रहे हों, पर शादी के इतने सालों बाद भी औलाद न हो पाने का कोई तंज या दोषारोपण उन्होंने उस पर नहीं किया। पर रीमा...? 

मैना अक्सर अपने जीवन में संतोष अपने आसपास ही ढूँढती थी...पड़ोस की बिल्लियों को दूध डाल देना, मंदिर की सफाई में हाथ बँटाना, या कॉलोनी की बस्ती की लड़कियों को खाली समय में पढ़ा देना। ये सब काम उसे सुकून देते थे, जैसे वह अपने भीतर की रिक्तता को भर रही हो। पर उस दिन रीमा की बातों की वजह से उसका मन इन सबसे भी उचाट-सा हो गया। क्या फायदा किसी के लिए कुछ करके अपने अंदर सुकून और शांति महसूस करने का...?

इस घटना के लगभग चार-पाँच महीने बाद रीमा का फोन आया भी तो अपनी बदतमीजी के लिए माफी माँगने नहीं, बल्कि अपने पति की आर्थिक सहायता के लिए...। मैना ने जैसे ही अपनी असमर्थता जताई, रीमा ने फिर फोन काट दिया और आज लगभग एक साल बाद फिर अपने मतलब के लिए ही फोन किया। 

मैना का दिल तो चाहा था, वो भी कटी-कटी सुना दे और रिचार्ज करने से साफ इंकार कर दे, पर उसके अंदर की ममता ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। वैसे भी रीमा पहले ही एक-दो बार बता चुकी थी कि उसका पति जाने क्यों उसका फोन रिचार्ज करने में बड़ी आनाकानी करता है। आज भी मैना को हमेशा की तरह लगा, रात में निकलेगी, कम-से-कम सुरक्षा के लिए मोबाइल में बैलेंस तो होना ही चाहिए। 

अचानक मैना की आँखें भर आईं। वह गोकुल के सामने ऐसे रोने से बचती है। पिछली बार रीमा के इतने दिनों से संपर्क न करने की बात कहकर रो दी, तो गोकुल ने इस बात पर तो कटाक्ष कर ही दिया था, “तुम उसकी बड़ी बहन थोड़े न हो...तुम तो उसकी एटीएम हो, जब चाहेगी, तुमसे पैसे निकाल लेगी। अपनी तनख्वाह से करती हो; इसलिए नहीं बोलता, वरना मैं तो कब का ऐसे मतलबी लोगों को लात मारकर अपनी ज़िंदगी से बाहर कर चुका होता...।” 

गोकुल ने कुछ गलत तो नहीं कहा था; लेकिन मैना को तब भी हल्का अपमानित-सा महसूस हुआ। कुछ भी हो, रीमा थी तो उसका ही खून...उसके मायके का एक हिस्सा...। यही कारण था कि मैना कभी भी अपने भाई-भाभी या रीमा से जुड़ी कोई भी बात गोकुल से शेयर नहीं करती थी। 

अचानक से बारिश फिर शुरू हो गई। आसपास का वातावरण भीगा हुआ था...। सामने के पार्क का हरेक पेड़-पौधा हरा-भरा था। मैना की नज़र अपनी बालकनी में रखे गमलों पर गई। उन पर हवा के साथ उड़कर आई बारिश की कुछ बूँदें ही पड़ी थी, जिन्हें गमलों की भुरभुरी-सूखी मिट्टी ने पल भर में सोख लिया था और अब भी वे वैसे ही सूखे और प्यासे थे। उनमें लगे पौधे मुरझा रहे थे। 

मैना को लगा, उसका मन भी तो उसी मिट्टी की तरह है...जिसके आसपास अगर कहीं से रिश्तों, भावनाओं और अपनेपन की बारिश की बौछारें पड़ती भी हैं तो भी उसे पूरी तरह भिगो नहीं पाती। बाद में बस वही सूखापन...वही सूनापन...। वह भी तो इन्हीं पौधों की तरह मुरझाती जा रही है। बाहर की बारिश के साथ-साथ उसकी आँखों से भी बरसात शुरू हो गई थी। 

उसके मन में उठा तूफ़ान धीरे-धीरे थम रहा था, लेकिन भीतर की सूखी धरती अब भी हरियाली से महरूम थी। सहसा, पता नहीं क्या सोचकर मैना एक झटके से उठ खड़ी हुई। एक-एक करके सूखे गमलों को उठाकर उसने रेलिंग के पास रख दिया। अभी बारिश की बूँदों से उनको जितना जीवन मिल सकता है, मिलने देगी...वरना कल सुबह वह खुद उनको पानी से नहलाकर फिर से ज़िंदगी जीने का एक मौका ज़रूर देगी। 

मैना ने अपने अंदर एक नई ऊर्जा महसूस की। जरूरी तो नहीं कि इन फूलों को खिलने-खिलाने के लिए बारिश का ही मुँह ताका जाए। अपने चारों तरफ पनप गए उस अकालग्रस्त इलाके में हरियाली लाने जितना पानी तो उसके पास भी मौजूद है ही न...।

 000 (स्व. प्रेम गुप्ता मानी जी की अधूरी कहानी को उसी संवेदनशीलता के साथ पूरा किया है उनकी बेटी प्रियंका गुप्ता ने )

 सम्पर्कः ‘प्रेमांगन’, एम.आई.जी- 292, कैलाश विहार, आवास विकास- एक, कल्याणपुर, कानपुर- 208017 (उ.प्र)

ईमेल- priyanka.gupta.knpr@gmail.com, ब्लॉग- www.priyankakedastavez.blogspot.in


Aug 1, 2024

हास्य व्यंग्यः बत्तीसी पुराण

 -  प्रेम गुप्ता ‘मानी’   

बरसों पहले किसी ने उन्हें बताया था कि हँसते रहने से आदमी की सेहत अच्छी रहती है। बस, उसी दिन से उन्होंने अपनी सेहत की खातिर इस बात को गाँठ बाँध लिया। जीवन में दुःख होता या सुख, वे बस हँसते रहते थे और हर वक़्त हँसते रहने के कारण उनकी सेहत तो अच्छी हो गई, पर वे एक मुसीबत में पड़ गए। उन्हें हर वक़्त हँसते रहने का इतना अभ्यास हो गया था कि चाहकर भी उनकी बत्तीसी भीतर जाती ही नहीं थी।            

हर समय मुँह खोलकर बत्तीसी झलकाने के कारण टाइम-बेटाइम उन्हें लोगों की लताड़ पड़ चुकी थी; पर वे थे कि आदत से मजबूर...मुँह खोलकर हँसते रहते...। लताड़ देने वाला भी हारकर हँस देता, “यार...तुम्हारे जैसे बेहया आदमी नहीं देखा...।”          

‘बेहया’ शब्द अपने लिए सुनकर उन्हें ठेस लगती। वे जबरिया अपना मुँह बन्द कर लेते, पर दूसरे ही क्षण बत्तीसी अपने आप ही झलक जाती...होंठ फैल जाते...। देखकर लगता, जैसे हँस रहे हों। सामने वाला गुस्से में आगे बढ़ जाता, “अरे, कुछ तो शर्म करो...।"

अपनी इस आदत से वे भी कम परेशान नहीं थे। सो समय-बेसमय हँसते वक़्त वे उस आदमी को लाख-लाख बद्दुआ देते, जिसने उन्हें हँसना सिखाया था। उनकी इस आदत से उनकी पत्नी और बच्चे भी कम परेशान नहीं थे।        एक दिन ऑफ़िस से लौटे , तो देखा, पत्नी पेट-दर्द से बुरी तरह तड़प रही है। उन्होंने उसे इस हालत में देखा, तो हँसने लगे, "क्यों, क्या हुआ तुम्हें? तुम इस तरह लोट-पोट क्यों हो रही हो?”

"तुम्हें क्या दिखाई नहीं दे रहा? पेट-दर्द से मेरा बुरा हाल है और तुम हो कि खुश हो रहे हो? अरे, जल्दी से डॉक्टर को बुलाओ, नहीं तो मैं मर जाऊँगी।"

 पत्नी ने रोते हुए कहा, तो उनकी हँसी तो बन्द हो गई; पर बत्तीसी खुली रही, "हाँ...हाँ...मैं अभी डॉक्टर को लेकर आता हूँ...।"

 बत्तीसी खोले हुए वे बाहर निकले, तो पड़ोसी शर्मा ने कहा, ‘‘क्या बात है मिश्रा जी...बड़े खुश नज़र आ रहे हो...?”

 “अरे नहीं शर्मा जी, ऐसी कोई बात नहीं...। दर‍असल डॉक्टर को बुलाने जा रहा हूँ। पेट-दर्द से पत्नी की हालत बहुत खराब है।”

आश्चर्यचकित शर्मा उनसे कुछ और पूछता कि वे हँसते हुए चले गए।

 डॉक्टर का क्लिनिक घर के पास ही थी। दस मिनट में ही पहुँच गए। डॉक्टर किसी दूसरे मरीज को देख रहा था। समय लगते देख वे हँसते हुए बेंच पर बैठ गए और आने वाले मरीजों को पूरी बत्तीसी खोलकर देखने लगे। मरीज उन्हें गुस्से से देखते और फिर आगे बढ़ जाते।

 थोड़ी देर बाद जब डॉक्टर खाली हुए, तो उनकी ओर मुड़े, “कहिए मिश्रा जी...कैसे आना हुआ?”         

“जी, पत्नी के पेट में भयंकर दर्द है...ज़रा चलकर देख लेते।” कहकर वे हँसने लगे, तो डॉक्टर को भी हँसी आ गई, “ऐसी भी क्या नफ़रत मिश्रा जी अपनी पत्नी से कि उसके दुःख में भी आप इतना खुश हो रहे...।”           

“नहीं…नहीं... “कुछ सफ़ाई- सी देते हुए उन्होंने डॉक्टर का बैग उठाया और फिर अपनी पूरी बत्तीसी झलकाते हुए घर की ओर चल दिए।

    पत्नी का चेक‍अप कर दवा वगैरह लिखकर डॉक्टर तो चले गए; पर उसके बाद पत्नी ने घर में जो महाभारत मचाया कि असली कौरव भी होते, तो यह देखकर महाभारत से तौबा कर लेते।           

उन्होंने पत्नी को समझाने की बहुत कोशिश की, हर तरह से अपने अमर प्रेम का यक़ीन दिलाया, पर सब व्यर्थ...। उसकी एक ही रट- “मेरे दुःख में तुम्हें बहुत हँसी आती है न...। अब देखना, जब तुम बीमार पड़ोगे, तो मैं डॉक्टर को भी नहीं बुलाऊँगी...।”

 पत्नी फिर दहाड़ मारकर रोने लगी, तो दीर्घशंका का बहाना बनाकर वे जल्दी से खिसक लिये। काफ़ी देर बाद हँसते हुए निकले, तो फिर वही नज़ारा...। घबराकर लघुशंका घर में घुस गए। ऐसी विकट परिस्थिति में उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें...। काफ़ी देर बाद बाहर निकले, तो एकदम निचुड़े हुए।

अपनी इस आदत से उत्पन्न स्थिति से उन्हें कितनी परेशानी झेलनी पड़ती है, यह किसी को कैसे समझाएँ? एक बार तो इस आदत के कारण इतना परेशान हुए कि उन्हें उस जगह से मुँह ही छिपाकर भागना पड़ा। हुआ यूँ कि उनके एक रिश्तेदार की मृत्यु हो गई। न चाहते हुए भी पिता की आज्ञा के कारण उन्हें वहाँ जाना ही पड़ा। जाते वक़्त पिता ने उन्हें खास हिदायत दी थी, “धीरज बँधाते समय ज़रा अपनी बत्तीसी पर नज़र रखना...। इसके कारण अगर हमारे व्यवहार पर असर पड़ा तो समझे रहना...तुम्हारी ख़ैर नहीं...।”

और उन्होंने पिता के निर्देशानुसार ऐसा ही किया भी...। वहाँ सबके सामने उदास आँखों के साथ उन्होंने अपनी बत्तीसी पर काफ़ी देर नियन्त्रण रखा, पर जैसे ही मृत रिश्तेदार की पत्नी-बच्चों ने दहाड़ मारकर रोना शुरू किया, उनकी बत्तीसी खुल गई...। उन्हें देख गुस्से में लोगों ने जो-जो बात कही कि दुम दबाकर उन्हें वहाँ से भागना पड़ा।

 इस भीषण काण्ड के बाद से तो उन्होंने किसी के घर मातम में जाना ही छोड़ दिया। दूसरे तक तो फिर भी चल गया पर अपने घर क्या करते...? पिता की सहसा मृत्यु हो गई; पर तब भी उनका वही हाल रहा। कन्धे पर पिता की अर्थी थी और नीचे उनके चेहरे पर पूरी बत्तीसी खिली हुई थी। रिश्तेदारों ने देखा तो थू-थू किया, “कैसा कपूत जन्मा है चिरौंजीलाल के यहाँ...। देखो तो ज़रा, बाप के मरने पर कैसा हँस रहा...इतना खुश तो कोई दुश्मन के मरने पर भी नहीं होता...।”

पत्नी ने भी रात को आड़े हाथों लिया, “शर्म नहीं आती इस तरह खींसे निपोरते हुए...? अरे, अगर दिल में दुःख नहीं था, तो कम-से-कम झूठमूठ ही दुःख दर्शाकर इज्ज़त बचा लेते। रिश्तेदारों का तो ख़्याल करते। छिः...क्या सोचते होंगे सब...। तुम खुद सोचो कि तुम्हारे मरने पर; अगर तुम्हारा बेटा भी इसी तरह हँसे, तो कैसा लगेगा तुम्हें...?”

और फिर दूसरे ही क्षण पत्नी दहाड़ मारकर रोने लगी, “जब तुम जन्म देने वाले पिता के मरने पर नहीं रोए, तो मेरे मरने पर क्या रो‍ओगे...?”

ऐसी बात नहीं है कि वह अपनी इस आदत से मुक्ति का कोई उपाय सोचने की कोशिश न करते हों। इसी सन्दर्भ में एक बार उन्होंने बुर्का पहनने पर भी विचार किया था; पर फिर जगहँसाई के भय से इस विचार को भी त्याग दिया।

इधर वे एक और संकट में फँस गए थे। पत्नी ने खुद तो उनसे बोलना छोड़ा ही, साथ ही बच्चों को भी सख़्त हिदायत दी थी, “जब तक तुम्हारे बाबू सुधरें नहीं, तब तक उनसे कोई नहीं बोलेगा...।” अब बच्चे ठहरे माँ के परम भक्त...सबने उनसे बोलना छोड़ दिया।

वे रोज़ सुबह हँसते हुए उठते...दीर्घशंका-लघुशंका से निपट मेज पर पहले से रख दिए गए खाने को हँसते-हँसते खाते और ऑफ़िस चले जाते। माँ से उनका अकेलापन देखा नहीं जा रहा था। एक दिन उन्होंने बहुत समझाया, “बेटा, खुश रहना अच्छी बात है; पर दुःख के समय भी तू खींसे निपोरे रहता है, यह भी कोई बात हुई...? यह अच्छी बात नहीं है बेटा...।”

 माँ की यह बात तीर की तरह उनकी अन्तरात्मा को भेद गई। उन्होंने उसी वक़्त प्रण किया...न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी...। आज इसी वक़्त बत्तीसी को उखाड़ फेंकूँगा...मारे गुस्से और क्षोभ के मन-ही-मन उन्होंने यह प्रण लिया पर उस कठिन घड़ी में भी उनकी खुली बत्तीसी से हँसी बरकरार थी। अपनी प्रतिक्रिया उन्हें सामने लगे शीशे में दिखाई दी, तो शीशे को तोड़कर जा पहुँचे दाँतों के डॉक्टर के पास, “डॉक्टर साहब, पूरी बत्तीसी उखाड़ने का आप क्या लेंगे...?”

 डॉक्टर ने उनकी ओर देखा। बत्तीसी खुली देखकर क्रोधित हो गया, “शरम नहीं आती डॉक्टर से मसखरी करते हुए...?”           

वे परेशान हो गए। किसी तरह डॉक्टर को उन्होंने अपनी समस्या समझाई। डॉक्टर को दया आ गई। वह कलयुगी होने के बावजूद पैसे व दया के मामले में सतयुगी निकला। कम पैसे व उससे भी कम समय  में ही उसने उनकी पूरी बत्तीसी उखाड़कर उनके हाथों में थमा दी।

वे बेहद प्रसन्न हुए और प्रसन्नता के आवेग में अपना सारा कष्ट भूल गए। खूब खुश होकर वे घर पहुँचे और पत्नी से बोले, “लो भाग्यवान, जिस कारण से तुम मुझसे नाराज़ रहा करती थी, वह कारण ही मैने जड़ से उखाड़ फेंका।”

कहते-कहते उनका मुँह फिर खुल गया। उनके मुँह का अँधेरा देख पत्नी तो गश खाकर गिर पड़ी। माँ ने देखा तो दहाड़ मारकर रो पड़ी, “अरे, अभी तो मैं ही बैठी हूँ, तो फिर तू कैसे इतना बुढ़ा गया रे...?”

पत्नी भी आते-जाते गुस्से में मुँह फेरकर आगे बढ़ जाती है, “खूसट बुड्ढा कहीं का...।”

अब वे पहले से कहीं अधिक परेशान हैं। पहले जहाँ सिर्फ़ पत्नी और बच्चे उनसे रूठे थे, वहीं अब माँ भी रूठ गई है। उनका घर से बाहर निकलना भी दूभर हो गया है। आदतन उनका मुँह अब भी खुल जाता है, जिसे देखकर लड़कियाँ-औरतें गुस्से से फूट पड़ती हैं, “इस बुढ़ौने को देखो तो सही...मुँह में एक भी दाँत नहीं...क़ब्र में पाँव लटकाए है, फिर भी लड़कियों को देखकर हँसता है...कुत्ता कहीं का...।”

  इन सब दुर्घटनाओं से वे इतने अधिक परेशान हो गए हैं कि अब फिर से बत्तीसी लगवाने के चक्कर में हैं। बस्स, उन्हें तलाश है तो एक दूसरे डॉक्टर की...।                                               

Apr 1, 2022

कहानीः फ़ैसला

 - प्रेम गुप्ता ‘मानी’

सुबह नींद जल्दी खुल गई नैना की...यही कोई सवा छह बजे। पर वह उठ नहीं पा रही थी, सिर में बहुत तेज़ दर्द था । लगता था जैसे सिर की सारी नसें चटक जाएँगी और उसके चटकने से पूरा चेहरा ही नहीं, बल्कि उसकी आत्मा भी लाल रंग से सराबोर हो जाएगी...और फिर ?

कितनी बार तो रेखा ने कहा है, “एक बार जाकर डॉक्टर से कम्पलीट चेकअप करवा लो, ये रोज़-रोज़ दर्द की गोली लेने से कोई फ़ायदा नहीं ।”

रेखा की बात को वह हँस कर टाल देती है । उसे कैसे बताए कि यह कोई बीमारी नहीं है । डॉक्टर को भी जाकर वह दिखा तो चुकी है, एक बार नहीं, बल्कि कई बार...। हर बार उनका एक ही जवाब होता है, “थोड़ा खुश रहा कीजिए। खाना-नाश्ता समय से खाइए और हलकी एक्सरसाइज किया कीजिए । परिवार के बीच ज़्यादा से ज़्यादा समय बिताने की कोशिश कीजिए । अरे भई, ये सब सिरदर्द वगैरह अक्सर टेंशन से उपजता है । ज़्यादा सोचा न कीजिए, रिलैक्स रहिए...।”

अब वह डॉक्टर के यहाँ नहीं जाती । सिर दर्द हो या बदन दर्द, एस्प्रिन की एक गोली दर्द कम कर ही देती है, पर मन का यह दर्द जो समय-समय पर उसके आत्मा तक उतर जाता है, उसका वह क्या करे ?

अपने हाथ से ही अपना सिर दबाते हुए उसने आसपास देखा, सुयश वहाँ नहीं था । बाथरूम से पानी गिरने की आवाज़ आ रही थी । अभी नहा कर निकलते ही चाय-नाश्ते की फ़रमाइश...। उसे वैसे भी उसके किसी दर्द से कोई लेना-देना नहीं था । उसे सिर्फ अपने आप से वास्ता था । समय से नाश्ता-खाना चाहिए और उसके बाद उसकी अपनी ज़िन्दगी...। नैना को कभी-कभी शक़ होता कि उसका पति इंसान है भी या नहीं...? आज इतवार है लेकिन सुयश की रूटीन में कोई फ़र्क नहीं...।

उसका ऑफिस दस बजे का है लेकिन चाय-नाश्ता करके वह आठ बजे ही घर से निकल जाता है। मैनेजर होने के नाते बढ़िया सा लंच ऑफिस में ही होता है । अक्सर ही वह ऑफिस के लंच और उसके बनाए खाने की तुलना करता रहता है, “शुक्र है भगवान का कि रोज़ तुम्हारे हाथों का सड़ा खाना मुझे नहीं खाना पड़ता ।”

वह तिलमिला कर रह जाती है । जानती है कि सुयश जानबूझकर उसका अपमान करता है...। दोस्तों के आने पर सुयश का लहजा कितना बदल जाता है । उसके दोस्त जब नैना की तारीफ़ करते हैं तब वह इस तरह मुस्कराता है, जैसे वह पत्नी के हाथ का खाकर एकदम तृप्त हो । सुयश की कुटिल मुस्कराहट को उसके सिवा कौन महसूस कर सकता है । सुयश अच्छी तरह जानता है कि नैना खाना बनाने में ही नहीं बल्कि घर सँवारने में भी बहुत माहिर है, पर...।

सिर दर्द के कारण उसकी हिम्मत पस्त हो रही थी, पर फिर भी उठना तो था ही । उठ कर उसने ब्रश करके दो बिस्किट के साथ एस्प्रिन की गोली ली और फिर चाय-नाश्ता बनाने के लिए रसोई में घुस गई । अभी उसने गैस पर चढ़ाई ही थी कि स्कूटर स्टार्ट होने की आवाज़ आई । वह ज़रा भी नहीं चौंकी । जानती थी कि सुयश कहाँ जा रहा है । रोकने का कोई फ़ायदा नहीं । एक बार कोशिश की थी । कीमती सामान की तोड़फोड़ के साथ चीख-चिल्लाहट से कलह भी काँप गया था...। मिसेज खरे ने उसके दो दिन बाद ही तो हँसकर कहा था, “क्या बात हो गई थी सुबह-सुबह...। सुयश भाई साहब इतना नाराज़ क्यों हो गए थे ? उनकी आवाज़ मेरे घर तक आ रही थी...मैं तो घबरा ही गई थी ।”

उसने भीतर तक अपने को अपमानित महसूस किया था और कोई अपराध न करने के बावजूद अपना मुँह मोहल्ले में छुपाती फिरी थी । दोबारा अपमानित न होना पड़े इसलिए उसने फिर कभी सुयश को रोकने की बात ही नहीं सोची । छुट्टी के दिन सुयश सात बजे सुबह ही घर से निकल जाता और फिर रात गए ही वापस आता ।

दो कप चाय वह बना ही चुकी थी कि तभी कॉल-बेल बजी । गैस धीमी करके उसने दरवाज़ा खोला तो देखा, सुमन थी । अन्दर आकर सुमन ने झाड़ू उठाया ही था कि उसने रोक दिया, “सुमन...पहले चाय पी लो, फिर सफ़ाई करना ।”

हाथ धोकर सुमन उसके पास ही आकर ज़मीन पर बैठ गई । उसने सुमन को चाय के साथ दो टोस्ट दे दिए और खुद भी लेकर बैठ गई । अभी उसने चाय का पहला घूँट ही भरा था कि सहसा सुमन के चेहरे पर निगाह पड़ते ही चौंक गई, “अरे सुमन...ये तुम्हारे चेहरे को क्या हुआ ? कितनी चोट लगी है, खून सब जमा हुआ है । आखिर यह चोट लगी कैसे? तुम्हारे आदमी ने कुछ किया क्या फिर से ?” उसे लगा जैसे वह सुमन से नहीं, खुद से सवाल कर रही है । न चाहते हुए भी उसकी आँखें भर आई ।

सुमन अपना दर्द भूलकर उसका हाथ सहलाने लगी, “आप दुखी क्यों होती हैं दीदी, यह तो मेरा रोज़ का किस्सा है । जब मरद को दूसरी औरत भाती है, तो अपनी औरत ज़हर लगती है...और ज़हर पीना किसको बर्दाश्त है ? आपको बताएँ दीदी, कल रात को मैंने भी उसे जमकर कूट दिया...। इसी मारपीट में चोट ज़रा ज़्यादा लग गई...।” कहते हुए सुमन हँसने लगी; पर वह नहीं हँस पाई, “अरे तुम हट जाती वहाँ से...मारपीट में खुद को भी घायल करने से क्या फायदा मिला?”

“अरे छोड़ो दीदी, क्यों परेशान होती हैं ? वैसे भी आपकी तबियत ठीक नहीं रहती ।”

तबियत के नाम पर उसे याद आया, सुमन का दर्द बाँटने में वह अपना दर्द तो भूल ही गई । सच में, किसी और से बात कर के मन कितना हल्का हो जाता है । सुमन करीब दस साल से उसके यहाँ काम कर रही है । उसका स्वभाव इतना अच्छा है कि दुःख-दर्द बाँटते समय वह कहीं से भी नौकरानी नहीं लगती, बल्कि उसे तो लगता है जैसे वह उसकी सहेली ही हो । कुछ न बताने पर भी वह उसका दर्द समझ लेती है । आज भी उसने कुछ नहीं कहा, पर सुमन फिर ताड़ गई, ज़बरदस्ती उसका सिर दबाने लगी, “दीदी, आप इतना परेशान रहती हैं न, इसलिए तो सिर में दर्द होता है । आखिर आपको कमी किस बात की है?”

अब वह सुमन को क्या बताए कि भौतिक रूप से उसके पास भले ही सब कुछ है, पर अन्दर से कुछ भी नहीं है । सुयश से शादी होने के बाद से ही उसकी ज़िन्दगी नरक से बदतर हो गई थी । पल भर का चैन भी खो गया । सुयश का चीखना-चिल्लाना तो तब भी बर्दाश्त हो जाता है, पर गिरा हुआ चरित्र...? सुयश की हरकतों के कारण कितनी बार दूसरों के सामने उसे शर्मिंदगी उठानी पड़ी है ।

सुमन के सिर दबाने के कारण उसे आराम मिला तो उसने अपनी आँखें बंद कर लीं । उसे सोया जानकर सुमन भी काम करने उठ गई । बर्तनों की खनक और झाड़ू-पोंछे की आवाज़ से वह अजीब-सा सकून महसूस कर रही थी । वह जानती थी कि साफ़-सफाई के बाद सुमन रसोई में घुसकर उसके लिए कुछ-न-कुछ बना लाएगी...और फिर उसे ज़बरदस्ती खिलाकर ही जाएगी । उसने अनायास मुस्कराने की कोशिश की पर मुस्करा नहीं पाई...बंद आँखों की कोटरों में पानी जो भर गया था ।

सुमन ने जिस सहजता से आज अपने आदमी को कूट दिया था, उस तरह उसकी भी इच्छा हुई कि वह भी सुयश को एक बार कूट ही दे । सुयश ने तो एक बार उसे पीटने की कोशिश भी की थी; लेकिन उस दिन जाने कैसे उसमें साहस आ गया था । उसने सुयश का हाथ ही मरोड़ दिया था, “ख़बरदार जो मुझे असहाय समझ कर मारने की कोशिश भी की... । तुम्हारी तोड़फोड़ और चीखना-चिल्लाना तो बर्दाश्त कर लेती हूँ, पर इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारी मार भी बर्दाश्त कर लूँगी... ।”

उस दिन पता नहीं क्या सोच कर सुयश रुक गया था, पर उसके बाद उसका घर से बाहर रहना और बढ़ गया था ।

सहसा उसकी तन्द्रा टूट गई । सामने सुमन खड़ी थी, “उठो दीदी, मुँह हाथ धोकर कुछ खा लो । मैं जानती हूँ, मेरे जाने के बाद बिना कुछ खाए-पिए तुम ऐसे ही पड़ी रहोगी... ।”

न चाहते हुए भी उसकी आँखें डबडबा गईं । एक बच्चे की तरह वह चुपचाप उठी और फिर मुँह-हाथ धोकर वापस आकर सोफ़े पर बैठ गई । सामने मेज पर अचार के साथ नमकीन पराठा और कॉफ़ी का मग रखा हुआ था । पराठे की ओर हाथ बढ़ाते वह रुक गई, “सुमन, तुम्हारा नाश्ता कहाँ है ? अपना ले आओ, तभी खाऊँगी, समझी...।”

सहसा सुमन खिलखिला कर हँस पड़ी, “अरे दीदी, अपना भी बनाया है...ला रही हूँ । अपने आदमी को कूटने के चक्कर में घर पर कुछ नहीं बनाया न ।” सुमन के साथ वह भी खिलखिला पड़ी। माहौल अचानक ही हल्का हो गया था और उसका सिर-दर्द न जाने कहाँ दुबक गया ।

सारा काम निपटा कर सुमन को गए बहुत देर हो गई थी । घर में उसके करने के लिए कुछ काम बचा ही नहीं था । सुमन सुबह ही आकर सब निपटा देती थी । कई बार उसकी तबियत ख़राब देखकर वह शाम की सब्ज़ी भी बना कर फ्रिज में रख जाती । वैसे भी सुमन बिना कहे इतना कुछ कर देती थी कि अक्सर उसके पास कुछ करने के लिए बचता ही नहीं था ।

बेटा तन्मय मुंबई में पत्नी और बच्चों के साथ खुश था । साल में जब कभी उसकी याद आती, तो मेहमान की तरह दो-चार दिन के लिए आ जाता । चाहती तो वह ही जाकर तन्मय के पास कई दिन रह सकती थी, पर वे सभी अपने-अपनी ज़िंदगी और व्यस्तताओं में कुछ इस कदर उलझे रहते हैं कि वहाँ रहने के दौरान भी उसे अक्सर अकेलापन महसूस होता है । इसी लिए वह तन्मय के बुलाने पर भी जाने से कतराने लगी थी । सुयश से तो तन्मय वैसे भी नाराज़ ही रहता है, सो उसे अपने पास बुलाने में उसे कभी कोई रुचि नहीं रही । सुयश भी जैसे भूल चुके हैं कि उसका अपना एक बेटा भी है, पर वह कैसे भूलती ?

कितना कष्ट सहकर उसे पाल-पोस कर बड़ा किया था...और वह बड़ा भी तो कितना हो गया था। खुद ही लड़की पसंद कर ब्याह कर लिया था, उसके लिए कुछ बोलने या नाराज़ होने की कोई कसर ही नहीं छोड़ी। नाराज़ होकर वह करती भी क्या ? उसके पास था ही क्या जो सपने पालती...।

सहसा वह चौंकी । यादों की गुफ़ा में वह इतनी दूर निकल गई थी कि नहाना ही भूल गई थी । उसने आलमारी से कपड़े निकाले और बाथरूम में घुस गई । सिर के ऊपर शॉवर से गिरता ठंडा पानी उसे राहत भी देता है तो कहीं-न-कहीं बेचैन भी करता है...। उसे लगता जैसे ज़ोरों की बारिश हो रही है, चारो तरफ अजीब सा कोलाहल है...। सड़कों पर भरा पानी कहीं-कहीं कीचड़ भी जमा रहा है...उसके ऊपर चलते हुए पैर फिसल रहे हैं और वह...?

दूसरों का वह नहीं जानती पर अपनी ज़िंदगी के रास्तों पर जमे कीचड़ में वह बार-बार फिसल ही तो रही है । समझ नहीं पाती कि इस कीचड़ को वह कैसे साफ़ करे ? कैसे वह सूखी और साफ़-सुथरी ज़मीन पर चले...किसका हाथ थामे...? भाई-बहन, रिश्तेदारों की अपनी दुनिया है और उन सबकी दुनिया में वह सेंध नहीं मारना चाहती...फिर...?

‘फिर’ पर आकर उसकी ज़िंदगी अटक जाती है । ठीक उस दिन की तरह जब कीचड़ भरी सड़क पर सुयश का दोस्त छदम फिसलकर किसी गाड़ी की चपेट में आकर दूसरी दुनिया में चला गया था और उसकी पत्नी गौरी अपने दो बच्चों के साथ अकेली पड़ गई थी । सास-ससुर थे नहीं, ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी...। मायके में सारी ज़िंदगी हाथ थमने को कोई तैयार नहीं था । छदम चूँकि बैंक में ही था , सो गौरी को बैंक में आया की नौकरी मिल गई । उसकी ज़िंदगी के कठिन रास्ते के सारे कंकड़-पत्थर चुनकर सुयश ने उसे आगे के लिए इतना आसान कर दिया कि गौरी को भी लगने लगा कि सुयश का हाथ थाम कर वह बाकी का रास्ता आसानी से पार कर लेगी ।

सुयश के वे दोस्त जो कभी घर आ चुके थे , उन्होंने उसे आगाह किया था पर वह जानती थी कि भटके हुए इंसान को रास्ते पर लाया जा सकता है; पर जिसका चरित्र ही घिनौना हो, उसे सुधारा नहीं जा सकता । सुयश की ज़िंदगी में गौरी न होती तो कोई और होती ।

सहसा उसे लगा, यादों की गुफा में कितना अँधेरा है, अगर उसने हाथ बढ़ा कर उजाला नहीं किया तो इस अँधेरे में घुट कर मर जाएगी।

शाम का झुटपुटा धीरे-धीरे नीचे झुकने लगा था । उसने हाथ बढ़ाकर स्विच-बोर्ड का बटन दबा दिया । कमरा हलकी रौशनी से नहा गया । उसने घड़ी पर निगाह डाली, उसकी सुई छह पर चहलकदमी कर रही थी । सुमन शाम की सब्जी बना कर फ्रिज में रख गई थी । सुयश अगर जल्दी आ गए, तो बस रोटी ही बनानी रहेगी, वरना वह कुछ हल्का-फुल्का ही खा लेगी ।

वह अँधेरी गुफा में दुबारा नहीं जाना चाहती थी । इसी से वह आराम की मुद्रा में सोफे पर अधलेटी हो गई । मेज पर कुछ मैगजीन और अखबार स्पर्श के इंतज़ार में थे । उसने उन पर एक निगाह डाली और फिर अखबार उठाकर पढ़ने लगी ।

अभी चंद लाइनें ही पढ़ी थीं कि दरवाज़े की घंटी बजी । उठकर दरवाज़ा खोला, तो सामने सुयश खड़े थे...हलके, बेचैन से...। कारण पूछते-पूछते वह रुक गई । सुयश कभी-कभार ही जल्दी घर आते थे । बिना किसी आश्चर्य के वह चुपचाप रसोई में चाय बनाने चली गई । अभी चाय में ठीक से उबाल भी नहीं आया था कि सुयश की आवाज़ ने उसे रोक दिया, “सुनो, चाय रहने दो, मैं पीकर आया हूँ । तुम बस आठ बजे तक मुझे खाना दे दो । मैं जल्दी सोऊँगा...सुबह की शताब्दी से दिल्ली जाना है, ऑफिस के काम से...।”

उसकी इच्छा हुई कि खुद भी सुयश के साथ दिल्ली जाने को कहे, पर अपनी इच्छा को उसने अपने भीतर ही दबा लिया । ऑफिस के काम से सुयश अक्सर कहीं-न-कहीं टूर पर जाता रहता था । एक बार जिद करके उसने भी साथ जाने को कह भर दिया था, उसके बाद घर में जो तूफ़ान मचा था कि पूरा घर तहस-नहस हो गया था । महीनों वह सकून से सो नहीं पाई थी। उसके बाद अपनी उस इच्छा का उसने खुद ही गला घोंट दिया था । शादी से पहले अपने पिताजी के साथ जितना घूम पाई थी, उसे ही अपनी यादों का हिस्सा मान लिया था । बाद में तो इस पिंजरे में इस तरह क़ैद होकर रह गई थी कि खुली हवा में साँस लेना ही भूल गई थी।

अपनी घुटती साँसों के साथ अँधेरे से जूझते कब सुबह की रौशनी उसके रूबरू आ गई, उसे पता ही नहीं चला। अहसास तो तब हुआ जब अपने आप ही चाय बनाकर पी चुके सुयश ने उसे आवाज़ दी, “दरवाज़ा बंद कर लो, मैं जा रहा हूँ ।”

“भाभी जी, एक बात कहूँ, बुरा न मानिएगा । वैसे तो यहाँ सब जानते हैं कि गौरी के कारण आपके जाने का कोई स्कोप नहीं, पर फिर भी...सुयश भाई साहब के साथ आप भी बाहर जाने की कोशिश किया कीजिए...।” पिछली बार सुयश के मुंबई जाने पर उसके सहकर्मी पाण्डे की बीवी ने उसका हालचाल पूछने के बहाने फोन पर कहा था, तो उसकी आवाज़ में सहानुभूति की बजाय एक आनंदित खनक को महसूस कर वह अन्दर तक तिलमिला गई थी। भीतर कहीं गहरे तक अपमान की एक टूटन भी चुभी थी, पर वह खामोश रह गई थी । जब अपना सोना खोटा तो परखइए का क्या दोष...।

दिन के उजाले के बावजूद अँधेरा उसे फिर अपनी गिरफ्त में लेता कि तभी उसने चाय की प्याली छान ली और उसे लेकर सोफे पर आकर बैठ गई । आज का अखबार मेज पर अभी अनछुआ ही पड़ा था । चाय की चुस्की लेते हुए उसने उसे खोला तो सामने ही एक विज्ञापन पर उसकी नज़र गई । शहर के मशहूर महिला डिग्री कॉलेज में हॉस्टल वार्डन और आया की ज़रूरत थी...।  तनख्वाह के अलावा रहना-खाना भी शामिल था ।

सुख की लहर उसे कहीं दूर ले जाती कि तभी दरवाज़े की घंटी ने उसे आवाज़ देकर रोक लिया । सुमन आ गई थी और वह उसे भी अपने साथ उस लहर में बहा ले जाना चाहती थी । चहकती- सी वह बहुत कुछ कहने को आतुर थी | हाथ धोकर सुमन एक कप और चाय के साथ नाश्ता भी ले आई, “क्या बात है दीदी, आज बहुत खुश दिख रही ?”

“एक बात बताओ सुमन, अगर कभी मेरे साथ कहीं रहने को मिले तो क्या तुम चलोगी ?”

“हाँ...क्यों नहीं दीदी...वैसे भी कौन मेरे लिए पीछे रोने को बैठा है...।”

सच ही तो कह रही थी सुमन...। एक तरह से देखा जाए तो यह उन दोनों का ही सच था । अपना कहने को न सुमन के पास घर था न उसके पास...। दोनों के ही बहू-बेटे के पास उनके लिए वक़्त नहीं था और पति नाम का जीव...?

सुयश एक हफ्ते के लिए बाहर गए थे, तब तक उसे भी कोई निर्णय ले लेना था । उसने दिए गए नम्बर पर संपर्क करके संक्षेप में अपने और सुमन के बारे में बताया तो उन्होंने उसे उसी दिन इंटरव्यू के लिए आने को बोल दिया । सुमन से वह कुछ कह पाती, उससे पहले ही उसने उसे रोक दिया, “मैं सब सुन रही थी दीदी...। तुम कुछ कहती नहीं तो क्या, मैं सब समझती हूँ । दिन भर बस सफ़ेद दीवारों से बातें करने से तो अच्छा है, अब अपने बारे में कुछ सोचा जाए...। दीदी, तुम जहाँ रहोगी, मैं वही तुम्हारे पास रह कर अपने दिन गुज़ार लूँगी...। कम-से-कम हम लोग खुश तो रहेंगे न...।”

उसकी आँखें पूरी तरह छलकती, उससे पहले ही वह बाथरूम में घुस गई, “सुमन, जब तक मैं नहा कर आती हूँ, तुम फटाफट काम निपटा लो...। मेरे पास एक साड़ी है, तुम भी यहीं तैयार हो लेना...। हम लोग को आज ही इंटरव्यू के लिए चलना है...।”

इस एक पल में उसने अपने साथ-साथ सुमन की ज़िंदगी के लिए भी एक सही फैसला ले लिया था...।

सम्पर्कः एम.आई.जी-292, कैलाश विहार, आवास विकास योजना संख्या-एक, कल्याणपुर, कानपुर-208017 (उ.प्र), ईमेल: premgupta.mani.knpr@gmail.com, ब्लॉग: www.manikahashiya.blogspot.in. 

Apr 5, 2021

कहानीः तलहटी

- प्रेम गुप्तामानी

अगर तैयारी पूरी हो तो न जन्म लेने में वक़्त लगता है...न इस संसार से विदा होने में...। लेकिन कभी-कभी पूरी तैयारी के बावजूद वक़्त जैसे ठहर जाता है और उस ठहरे हुए वक़्त के बिछावन पर जन्म देने वाली माँ प्रसव पीड़ा से छटपटाती है, तो मृत्यु के समय भी व्यक्ति एक अनकही पीड़ा से मुक्त होने के लिए छटपटाता है...पर...?

सारी पीड़ा...सारे पापों की सज़ा तो केशव बाबू ने पहले ही पूरे दस बरस अस्पताल और घर के बीच झूलते हुए भुगत ली थी, फिर इस छटपटाहट भरे जीवन का क्या अर्थ? शरीर में अब कुछ ऐसा बचा भी तो नहीं था। डॉक्टर ने दो बरस पहले ही जवाब दे दिया था, पर रमा देवी किसी तरह उन्हें जिलाए रखना चाहती थी...। एक भारतीय नारी के पास सुहागन होने का जो सब से बड़ा सुख होता है, उसे वे खोना नहीं चाहती।

यद्यपि केशव बाबू की पीड़ा को उनके साथ-साथ खुद भी भुगतते हुए वे इतना अभ्यस्त और तटस्थ हो गई हैं अब यह पीड़ा उन्हें कहीं से भिगोती भी नहीं है...। उनका मन उस बंजर ज़मीन की तरह हो गया है, जिस पर बरसों से पानी की एक बूँद भी नहीं पड़ी है...पर फिर भी वे महसूस तो करती ही हैं...

उन्हें इस बात का अहसास है कि अपने समय में केशव बाबू कितने नामी वकील रहे...। कितना नाम-दाम कमाया...। आलीशान मकान बनवाया और सन्तान न होने के बावजूद अपने दोनो के भविष्य के लिए मोटा बैंक-बैलेन्स रखा...। यह सब कुछ अब रमा देवी का ही तो है...। केशव बाबू चाहें तो भी अब कुछ नहीं कर सकते, पर उन से जो सुहागन होने का दंभ मिला है, वह धन से भी ज़्यादा सुरक्षा का अहसास देता है और इसी को वे महसूसते रहना चाहती हैं।

सत्तर बरस की उमर में भी उनकी ठसक देखते ही बनती है...। जब कलफ़ लगी मँहगे वॉयल की साड़ी सरिया कर करीने से बनाए गए प्लीट्स के साथ वे पहनती हैं तो फ़ैशनपरस्त लड़कियों की भीवाहनिकल जाती है। कभी-कभी कोई परिचित लड़की तो पीछे भी पड़ जाती है, ‘दादीऽऽऽ, हमें भी सिखाइए न...कैसे बाँधती हैं इतनी बढ़िया साड़ी...? अरे, इस तरह साड़ी तो मॉडल ही पहन पाती हैं...

चल हटऽऽऽ...बेवकूफ़ बनाती है...

नहीं दादी, सच कहती हूँ...

अच्छा ठीक है, सिखा दूँगी...। अब पीछा छोड़...ऊपर से वे भले ही झिड़क देती, पर भीतर से काफ़ी आह्लादित हो जाती। जवानी के दिनो में केशव बाबू के दोस्त भी अक्सर बहाने सेआह! वाह!’ किया करते थे। नैन-नक्श ज़्यादा तीखे नहीं थे तो क्या...? जब चौड़ी बीच की माँग में ढेर सारा जोगिया सिन्दूर भर कर, हल्के लम्बोतरे चेहरे पर पाउडर और माथे पर बड़ा सा ईंगुरी टीका लगा कर बाहर निकलती तो उनसे कम उम्र की औरतें भी जल-भुन जाती थी...। यह बात वह अच्छी तरह से जानती थी...और इसी लिए वह अपने इस रूप को खोना नहीं चाहती...। भले ही इसके लिए उन्हें बहुत कुछ सहना पड़ता है...रातों की नींद...दिन का चैन...चौबीसों घण्टे किसी बैल की तरह बंजर ज़मीन पर जुते रहना...। सुबह का सूरज उगा नहीं कि पति की चाकरी में व्यस्त...। नाश्ता-पानी, खाना तो है ही, ऊपर से उनका बार-बार हगना-मूतना...। हर बार उनकी चादर बदलना और डॉक्टर की सख़्त हिदायत के अनुसार खाना देना...। सूरज ढल जाता है, तो भी उन्हें आराम नहीं...। कभी-कभी उन्हें लगता है कि सधवा से ज़्यादा अच्छा तो विधवा हो जाना है, पर अगले ही क्षण वे काँप जाती हैं...नहीं...

और इधर केशव बाबू को क्या कहा जाए...? उम्र अस्सी बरस...पूरा शरीर सुइयों से चिथा हुआ...। सिकुड़े हुए माँस पर जगह-जगह घाव, जो शुगर कि बीमारी के चलते भरने का नाम ही नहीं लेते...और यही नहीं...ऐसा ही घाव उनकी दोनो आँखों को भी ले गया। सड़न से बचाने के लिए डॉक्टर को उनकी दोनो आँखें निकाल देनी पड़ी। अब उनकी जगह दो गड्ढे भर हैं...। उफ़! देखने वाला एक अजीब वितृष्णा से भर जाता है, ‘यह बुढ्ढा तो जाने का नाम ही नहीं लेता और इसकी मेहरारू को देखो...अधमरे-अन्धे के लिए इतना सिंगार-पटार...

पता नहीं कभी केशव बाबू ने सुन लिया या भगवान ने...एक दिन जब रात का आखिरी पहर बीतने को था, चारो तरफ़ क़ब्रिस्तान सा सन्नाटा पसरा हुआ था...कुत्ते की रिरियाती आवाज़ मनहूसियत का पैग़ाम दे रही थी और बीच-बीच में चौकीदार की सीटी उस सन्नाटे को तोड़ रही थी, केशव बाबू ने चुपके से अन्तिम हिचकी ले ली...

सुबह रमा देवी उठी तो सनाका खा गई। काफ़ी देर तक तो उन्हें समझ ही नहीं आया कि यह क्या हो गया? उनके पति नीम बेहोशी में हैं या...? कान लगा कर दिल की धड़कन सुनने की कोशिश की...। हाथ-पैर डुलाए पर कोई हरकत न देख कर डॉक्टर को फोन कर दिया...। दॉक्टर दस कदम की दूरी पर ही रहते थे, आए और मृत बता कर चले गए...। उस दिन फीस भी नहीं ली, पर रमा देवी...उनके इतने दिनों की तपस्या...उनका श्रंगार...? पल भर पथरायी सी खड़ी रही, फिर नथुनों से बदबू का एक झोंका टकराया तो जैसे होश में आकर बुक्का फाड़ कर रो पड़ी...

अब वे क्या करें? इस तरह अचानक यह हो जाएगा, अन्देशे के बावजूद उन्हें यह विश्वास नहीं था। उन्होंने उठ कर केशव बाबू के चेहरे की ओर देखा...। चेहरे पर पीड़ा नहीं थी पर उनकी आँखों के गड्ढों में अब भी ढेर सारा पानी कीचड़ के साथ जमा था...। पानी भरा होने के कारण शायद प्राण को उस रास्ते से बाहर जाने में परेशानी हुई सो वह नीचे के रास्ते निकल गया, पूरी बेमुरव्वती से... 

केशव बाबू का पूरा शरीर टट्टी से सना हुआ था और हाथ-पैर ऐंठ गए थे...। टेढ़े होंठों को देख कर लगा कि शयद अन्तिम हिचकी आने से पहले उन्होंने आवाज़ देने की कोशिश की होगी, पर वह भी गले में घुट कर रह गई थी।

थोड़ी देर रो लेने के बाद जब उन्हों ने पति की ओर देखा तो जैसे भीतर बहुत कुछ भर गया...। सारी ज़िन्दगी पिसती रही...अब अन्तिम जून और सही...। ज़्यादातर नाते-रिश्तेदार उसी शहर में थे, पर नामी वकील होने और अपार धन के दंभ ने कभी किसी को अपना नहीं बनाने दिया था...सो रिश्तेदार तो दूर हो ही गए, मोहल्ले वालोम से भी बस दुआ-सलाम का ही नाता था। पर रमा देवी अच्छी तरह जानती थी कि इस समय वे अकेली कुछ नहीं कर सकती...। रिश्तेदारों के साथ-साथ मोहल्ले वालों को भी ख़बर करनी ही होगी...

रमा देवी ने बड़ी समझदारी से दरवाज़ा खोला और फिर चीख-चीख कर रोने लगी, ‘हे भगवानऽऽऽ...अब मैं क्या करूँ...? तुम मुझे इस तरह छोड़ कर क्यों चले गए...? अब मैं किसके सहारे जिऊँगी...?’
सुबह के पाँच बज रहे थे। कई घरों के दरवाज़े खुल गए रमा देवी की चीख से...। बच्चे तो रोज की तरह अपने स्कूल जाने की तैयारी में जुट गए, पर कुछ बड़े लोग केशव बाबू के घर आ गए। दस बरस से बीमार चल रहे थे, कहीं कुछ हो हवा तो नहीं गया...? उनसे व्यवहार भले ही न हो पर इस समय पल भर के लिए ही सही, खड़ा तो होना ही पड़ेगा...

गेट के बाहर मोहल्ले के लोग जुट गए थे। उनके बीच कानाफूसी का दौर शुरू हो गया, ‘क्यों, क्रियाकर्म का इंतज़ाम किस तरह से किया जाएगा...? रमा भाभी तो बिल्कुल अकेली हैं...’

अरे भैय्या, आदमी इसी दिन को तो औलाद के लिए तरसता है...। अरे, अपनी नहीं हुई तो किसी को गोद तो लेना चाहिए था कि नहीं...? अपना तो रोने-धोने में लगी हैं, इंतज़ाम कौन करेगा...?’

परेशान काहे होते हो भाई...?’ मुँह में पान-मसाले की पुड़िया उँडेलते खरे साहब काफ़ी देर से सब की बात सुन रहे थे। ग्यारह-बारह साल पहले मकान की रजिस्ट्री को लेकर कुछ कानूनी दाँव-पेंच में उलझ गए थे, सो उस समय केशव बाबू की सहायता से ही उबरे थे...। अब यह बात दूसरी थी कि इसके एवज में केशव बाबू ने उनसे मोटी रकम झटक ली थी, पर फिर भी क्या...? कम-से-कम उन्हें परेशानी से तो मुक्त कर दिया था...
उस मुकदमे के दौरान ही आपस में कुछ अंतरंगता सी हो गई थी, पर बाद में केशव बाबू के बीमार पड़ने से सम्बन्ध ख़त्म से हो गए थे, लेकिन उन्हें पता था कि उनके कुछ रिश्तेदार इसी शहर में हैं...

खरे साहब ने पूरा पान मसाला मुँह के बाएँ तरफ़ दबा लिया था और फालतू थूक सड़क पर थूकते हुए बोले,  अरे भाई, इनके कुछ रिश्तेदार इसी शहर में हैं...। भाभी जी से नम्बर लेकर अभी फोन कर देता हूँ...। फिर वे जाने, उनका काम...हम लोगों को क्या करना...? मोहल्ले के नाते थोड़ी सी फ़ॉर्मेल्टी तो पूरी करनी ही है...बस्स...

वर्मा जी के चेहरे पर ऊब साफ़ झलक आई थी, ‘आज इण्डिया वर्सेज इंग्लैण्ड का वन-डे मैच है...मैं ज़्यादा देर नहीं रुक पाऊँगा...। वैसे भी मुझे किसी को मरा-वरा देख कर घबराहट होती है...

वर्मा जी के जाते ही एक ज़ोर का ठहाका लगा, ‘भाभी जी मरी-वरी तब कहाँ भागेंगे-वागेंगे...? कौन सा मैच देखेंगे भई...?’

अरे अपने देश में मैच की कमी है क्या भाई...? पैसा फेंको, तमाशा देखो...खेल समझ में आए चाहे न आए, पर देखो ज़रूर...

हल्के ठहाके से दूर खरे साहब केशव बाबू के रिश्तेदारों को फोन कर रहे थे, साथ ही हिदायत भी देते जा रहे थे, ‘ज़रा जल्दी आने की कोशिश करिएगा...। केशव बाबू की डेड बॉडी की बड़ी बुरी गत है...। ज़्यादा देर रखना ठीक नहीं...’

खरे साहब जब तक फोन करने में व्यस्त रहे, उतनी देर में रमा देवी ने स्टोर रूम और अलमारि वाले कमरे मेम ताला डाल दिया। अभी सब भड़भड़ा कर आ जाएँगे तो वे क्या करेंगी...? अकेली औरत ज़ात...भीड़ में किसी ने कुछ पार कर दिया तो...?

रमा देवी को पहली बार अहसास हुआ कि ढेर सारे रिश्तेदार होने के बावजूद वह कितनी अकेली हैं...। केशव बाबू भले ही कुछ न करते रहे हों पर उनके कारण किसी और के होने व बोलने-बतियाने से घर के भरा होने का एक भ्रम तो था, पर अब तो वह भी टूट गया...

रमा देवी कि जितना केशव बाबू के जाने का दुःख नहीं हो रहा था, उतना अकेलेपन का अहसास उन्हें तोड़ रहा था। वे पल भर सकपकाई सी भीतर आती औरतों को देखती रही, फिर बुक्का फाड़ कर रो पड़ी।

उनके रोने कि आवाज़ कमरे की दीवारों को भेदती हुई बाहर गेट तक जा रही थी, पर वहाँ इक्का-दुक्का को छोड़ कर बाकी सब सतक लिए थे। किसी को ऑफ़िस जाना था तो किसी को वन-डे मैच देखने...। कौन इस फ़ज़ीहत में पड़े...रमा देवी के रिश्तेदार जानें...। जीते-जी जब कोई वास्ता नहीं रहा तो अब मरने के बाद क्या...?

गेट के बाहर और कमरे के भीतर भीषण बदबू के साथ एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया था। रमा देवी की चीख हल्की सुबकी में बदल गई थी और मोहल्ले की औरतें उन्हें समझा-बुझा कर एक-एक कर के बाहर निकल गई थी...। कुछ इस तरह जैसे इस युग की पूरी संवेदना इंसान की आत्मा से इंसानियत को भी घसीट कर ले गई थी और अब पत्थर और आदमी में कोई फ़र्क नहीं रह गया था...

रमा देवी के भीतर भी जैसे कोई पत्थर गुस्से की सीमेण्ट से जम गया था। एकान्त पाकर उन्होंने केशव बाबू की ओर देखा, ‘खुद तो मर कर मुक्त हो गए...अपनी खड़ूसियत के कारण मुझे परेशानी में डाल गए...। न खुद किसी से व्यवहार रखा, न मुझे रखने दिया...

कमरे में बदबू की भीषणता बढ़ती जा रही थी। उससे परेशान होकर जो दो-चार लोग अभी आए थे, वे भी बाहर खड़े हो गए। खुद रमा देवी भी बेचैन थी...जितनी जल्दी हो सके इन्हें यहाँ से हटाया जाए...

सहसा उनके भीतर जैसे कोई चौंका हो...यह क्या सोच रही हैं वह...? अपने साज-श्रंगार के लिए दस-बारह साल से जिस आदमी का गू-मूत साफ़ करती रही...जिसके लिए रात-दिन रसोई में खटती रही और जिसके कारण अपनी अनगिनत रातों की नींद हराम की, पर फिर भी उन्हें हमेशा साफ़-सुथरा रखा, वह इस वक़्त...?

केशव बाबू का पूरा शरीर सूज कर बुरी तरह फूल गया था...। गन्दगी के कारण शरिर पर मक्खियाँ भिनभिनाने लगी थी और आँखों के गड्डों का कीचड़ बाहर गालों तक इस तरह आ गया था जैसे किसी नाले का कीचड़ भरा पानी उफ़न कर बाहर आ गया हो।

वे ज़िन्दा होते तो एक मिनट भी इस तरह बर्दाश्त न करते। रमा देवी को अच्छी तरह याद है कि एक दिन वे नहा रही थी कि तभी उन्हें प्रेशर आ गया। वे गुसलखाने से चिल्लाती रही किआ रही हूँ’, पर केशव बाबू जो गुस्से में आ गए कि बड़ी देर मनाने के बाद ही माने...। रमा देवी को उस ठण्ड में दुबारा नहाना पड़ा, सो अलग...। केशव बाबू की आँखें ही अन्धी नहीं हो गई थी, उनकी तो सोच भी जैसे अन्धी हो गई थी...। बीमारी के दौरान उन्हें बस अपना ही अपना दिखता था...। रमा देवी के सुख-दुःख से न पहले उन्हें कोई सरोकार था और न बीमार पड़ने के बाद...

कभी-कभी रमा देवी ही खिजला कर सोचती, इस ज़िन्दगी से तो अच्छा है कि या तो ये मर जाएँ या वे खुद...। आज ये मरे तो, पर पूरी गन्दगी लपेट कर...। एक जी चाहा रहा कि पोंछपाछ कर उन्हें साफ़ कपड़े पहना दें, पर...ज़िन्दा का तो किया जा सकता है, पर मरे का...छूने में भी भीतर से डर लगता है...

रमा देवी का दिमाग़ सुन्न होता कि दूर-पास के रिश्तेदारों की आवाजाही शुरू हो गई। उन्हें देख कर रमा देवी की रुलाई फिर फूट पड़ी, ‘ऐ भाभीऽऽऽ, ऐ भैय्याऽऽऽ...हम तो बिल्कुल अकेले हो गए...। अब हम किसका मुँह देख कर जिएँ...। हे भगवान! हमें भी इनके साथ ही अपने पास बुला लो...। अरे ये तो हमारा पूरा श्रंगार ले गए...

भाभी, अपने को सम्हालो...अकेली क्यों समझती हो अपने आप को...हम लोग हैं न...

केशव बाबू के सगे छोटे भाई बद्री ने पूरे ग्यारह साल बाद उस घर में कदम रखा था। बेटी की शादी में दो लाख के लिए ज़िद करके झगड़ क्या बैठा, केशव बाबू ने उसे लालची, कमीना, कुत्ता कह कर घर से ही नहीं, दिल से भी निकाल दिया, ‘सब साले मतलबी हैं...। अरे तुमने पैदा किया है तो खर्चा भी तुम ही करो...। सब हरामज़ादों की निगाह हमारी जायदाद पर है...। निपूते हुए तो क्या, हमारी अपनी ज़िन्दगी नहीं है क्या...

रमा देवी ज़्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी, पर इस बात को अच्छी तरह समझती थी कि वक़्त-बेवक़्त के लिए समाज में बनाए रखना ज़रूरी होता है, फिर चाहे वह खून का रिश्ता हो या न हो, पर इस बात को वह कभी केशव बाबू को नहीं समझा पाई। उनके लिए तो कानून की मोटी-मोटी किताबें ही सब कुछ थी। कचहरी से आते ही वह अपनी लायब्रेरी में घुस जाते, वहीं अपने क्लायण्ट के केस का अध्ययन करते, कुछ समझ न आने पर किताबों को खंगालते और फिर दूसरे दिन के लिए चुस्त-दुरुस्त...। उनकी इस गहराई ने ही कभी उन्हें हारने नहीं दिया, पर इस जीत के बीच भी वे कभी समझ ही नहीं पाए कि दुनियादारी को वह किस कदर हार गए हैं...। इस हार का अहसास जब उन्हें होगा तब तक बहुत देर हो चुकी होगी...। पर अब उन्हें क्या...?

अब सब कुछ भुगतना तो रमा देवी को है...। सारी ज़िन्दगी तो उनके कारण भुगता ही, अब अन्तिम जून और सही...

उन्होंने अपने देवर बद्री बाबू से हाथ जोड़ कर क्षमा माँगी, ‘लालाऽऽऽ...भैय्या तो अब गए। उनकी पिछली बातों को दिल में न रखना। इस समय तुम्हारा ही सहारा है...आखिर बड़े भाई थे तुम्हारे...

देवरानी ने आगे बढ़ कर उन्हें गले से लगा लिया, ‘कैसी बात करती हैं दीदी...जेठ जी ने कुछ कह भी दिया तो क्या हुआ? ज़रा-ज़रा सी बात पर खून के रिश्ते टूटते हैं क्या...?’

देवी जोर से रो पड़ी, ‘खून के रिश्ते टूटते तो नहीं हैं पर कभी तुम लोगों ने ख़बर भी तो नहीं ली...

अरे भाभी...हम तो भैय्या के डर के मारे नहीं आते थे, पर खोज-ख़बर पूरी रखते थे...। देखोऽऽऽ...ख़बर मिलते ही आए कि नहीं? और हाँ...फिर कहता हूँ।  अपने को कभी अकेली मत समझना...। आज से बच्चे तुम्हारे हुए...समझीऽऽऽ...। अच्छा चलो, अब थोड़ा दिल कड़ा करो...आखिर भैय्या के क्रियाकर्म का भी तो इंतज़ाम करना है...’

बद्रीबाबू ने आँखों पर रुमाल रख तो लिया था, पर उनके कोनो पर एक अजीब सी चकाचौंध भर गई थी...एकदम निपूते रहे भैय्या, पर शानोशौकत तो देखो...। क्या नहीं है इस घर में...। मोटा बैंक-बैलेन्स...कीमती सामानों से सजा घर...संगमरमरी ज़मीन, खुशबू से भरी रसोई और किसी भी स्टार के बाथरूम-सा स्नानघर...। उनका मन ललचा गया...। कितना ज़िन्दा रहेगी यह बुढ़िया

...? सत्तर बरस की तो हो गई है...बहुत हुआ तो दो-चार साल और...। वे एकलौते भाई हैं...। बाकी पाँच बहनें तो दूर-दराज ब्याही हैं। उन्हें इनकी जायदाद से वैसे भी कुछ लेना-देना नहीं...। किसी तरह भाबी को पटा कर वसीयत अपने नाम करानी है...फिर...?

सहसा रमा देवी कुनमुनाई, ‘लालाजीऽऽऽ...क्या सोच रहे...?’

भाभी...क्या करूँ, कुछ समझ में नहीं आ रहा है। बड़ी जिज्जी, छोटी...सभी बहनों को ख़बर तो कर दी है, पर उन्हें आते-आते शाम हो जाएगी, फिर सब कोई आज ही आ पाए, ये भी कोई पक्का नहीं...। बम्बई, कलकत्ता, चंडीगढ़...सब कितने दूर-दूर हैं...और भैया की हालत ऐसी है कि बर्फ़ की सिल्ली पर रखना भी अब मिट्टी की दुर्दशा करना ही है...

केशव बाबू का मृत शरीर भी वाकई दुर्दशा की कगार पर ही था। इस समय उन्हें देख कर कोई अन्दाजा भी नहीं लगा सकता था कि बीमारी के दौरान भी वे कितने साफ़-सुथरे रहते थे। तीन-चार बार तो कपड़ा ही बदलते थे...और इसमें सारी मेहनत रमा देवी की होती थी। जितनी बार उन्हें प्रेशर आता, उतनी बार उनकी चादर, धोती, कुर्ता, तौलिया...सब बदल जाता। एक धोबी लगा था जो बिना मुँह बनाए उनके गन्दे कपदए भी साफ़ तो कर देता था, पर पैसे दुगुने वसूलता था। रमा देवी की उम्र भी ढलान पर थी। घर की साफ़-सफ़ाई, बर्तन महरी कर जाती और कपड़े का काम धोबी निपटा देता...। वे तो रसोई और केशव बाबू की सेवा से ही इतना निढाल हो जाती कि कभी-कभी तो उठने-बैठने की ताकत भी नहीं बचती, पर क्या करती...?

उस शहर में रहने वाले अधिकतर रिश्तेदार आ गए थे। बाहर का दालान कानाफूसी से भरा हुआ था। बीच-बीच में सिर्फ़ रमा देवी की सुबकन थी। बाकी सब एकदम तटस्थ और व्यस्त...कुछ इस तरह जैसे केशव बाबू के जाने पर घर की सारी जिम्मेदारी उन्हीं पर तो आ गई है। यद्यपि ऐसे मौकों पर खाने के लिए कुछ लाने का रिवाज था, पर यहाँ तो जितने भी आए थे, सब के हाथ खाली थे।

सब के साथ रमा देवी भी अपनी ननदों को जानती थी। भाई के ज़िन्दा रहते, उनके इतना बीमार रहते जब कभी कोई नहीं आई तो अब क्या आएँगी। जिसका अन्देशा था, वही हुआ। बारी-बारी से सभी के फोन आ गए, रुँधी हुई आवाज़ के साथ, ‘ऐ भाभीऽऽऽ, ये क्या हो गया...? भैय्या इस तरह अचानक चले गए...। अब हम कैसे देखेंगे उन्हें...? क्या करें भाभी, घर-गृहस्थी के कारण तो निकलना दूभर हो गया है...और फिर अम्मा-बाबू भी तो हम को इतनी दूर ब्याह दिए...। चाहे भी तो जल्दी एक-दूसरे का मुँह नहीं देख सकते...। भाभी, सब्र करो...अब तो सब तुम्हीं को सम्हालना है...। यही सोच कर सन्तोष कर लो कि भैय्या अपना पूरा जीवन तो जी लिए...

पर बहिन जी, आखिरी बखत भाई का मुँह तो देख लो...। प्लेन से जल्दी आ जाओगी...। किसी तरह आ जाओ...उनकी आत्मा को सन्तोष तो होगा...

भाभीऽऽऽ, चाहें तो भी नहीं आ पाएँगे...। गुड्डू की अगले हफ़्ते शादी है...सारी तैयारी धरी रह जाएगी...और फिर रेनू के भी तो ऑपरेशन से बेटा हुआ है, उसकी देखभाल भी तो मेरे जिम्मे है...। क्या करें भाभी, दुःखी मत होना...। हम सब तुम्हारे साथ हैं...। वैसे बद्री भैया तो वहीं हैं न...?’

अचानक फोन कट गया और साथ में रमा देवी की आस भी...। उन्हें केशव बाबू पर बहुत गुस्सा आया। खुद तो मर गए, साथ में उन्हें भी मार ही गए...। आज अगर सब से बना कर रखते...लेना-देना, तीज-त्योहार करते रहते तो शायद उसी की लालच में सब जुड़े तो होते...पर नहीं...उनकी तो बस एक ही ज़िद थी,"हमारी कोई सन्तान नहीं है न, इसी से सब सालों के मुँह से लार टपकती है...। लावारिस मर जाऊँगा पर इन्हें एक फूटी कौड़ी भी नहीं दूँगा..." और अब ये तो मर गए न...खुद लावारिस कहाँ मरे? वे तो हैं उनका करने के लिए, पर उनका कौन करेगा...?

भाभीऽऽऽ, दस हजार देना...सामान लाना है...। पता नहीं कितना खर्चा हो...आखिर में हिसाब दे दूँगा...

रमा देवी दस हजार सुन कर चौंकी तो ज़रूर, पर मजबूर थी। ज़रा भी ना-नुकुर करती तो ये भी हाथ धर कर बैठ जाते। उन्होंने चुपचाप अलमारी से दस हजार निकाल कर बद्री बाबू के हाथ में थमा दिए।

बद्री बाबू रुपया हाथ में आते ही इस तरह व्यस्त हो उठे जैसे शुरू से सारी जिम्मेदारी वही तो उठाते आ रहे हैं। उनकी पत्नी की आँखों में भी एक अजीब-सी चमक उभर आई, ‘भाभीऽऽऽ...ये भी बस भोले के भोले ही रहे...। अरे, आजकल भला दस हजार में कुछ होता है...? इत्ते से तो बस जेठ जी का ही सामान आ पाएगा, बाकी...? दान-दक्षिणा...पंडित...लकड़ी कितनी तो मँहगी हो गई है...। आप ऐसा कीजिए, दस-पन्द्रह हजार इन्हें और दे दीजिए...। क्रिया-कर्म के बाद हिसाब-किताब तो हो ही जाएगा...

हिसाब-किताब की बात रमा देवी अच्छी तरह समझती थी। पहले भी ये लोग किसी--किसी काम के बहाने रुपया झटकते रहते थे। आखिर में जब लम्बी रकम के लिए मुँह बाया तभी केशव बाबू ने उन्हें दुत्कारा। बद्री केशव बाबू से बहुत छोते हैं। इन्हें हमेशा केशव बाबू ने बेटे की तरह चाहा, पर ये...?

आज अपनी सन्तान होती तो क्या दुःख के समय इस तरह हिसाब-किताब की बात करती? अरे, इस घड़ी तो पराए भी खर्च करने से नहीं चूकते, हिसाब तो बाद की बात होती है, पर...

पहली बार उन्होंने निःसन्तान होने का दुःख पूरी शिद्दत से महसूस किया और जोर से बिलख पड़ी, ‘रुपए की कोई बात नहीं लाला जी...बस किसी तरह इनका क्रिया-कर्म अच्छी तरह से निपटा दीजिए...

अरे भाभी...कैसी बात करती हैं...। आपका और भैय्या का हम नहीं करेंगे तो और कौन करेंगे...?’

पन्द्रह हज़ार भाभी के हाथों से लेते उनकी आँखों की चमक दुगुनी हो गई।

घर दूर और पास के रिश्तेदारों से भर गया था, पर जिसका था वह एकदम अकेला था। गन्दगी के कारण बदबू इतनी भीषण थी कि दूसरों की कौन कहे, रमा देवी खुद भी बहाने से थोड़ी दूर बैठ गई थी।

बद्री बाबू को गए काफ़ी देर हो गई थी। रिश्तेदारों के चेहरे की ऊब भी आवरण से बाहर आ गई, ‘दीदीऽऽऽ,बड़ी देर हो गई है...। रात पता नहीं कितने बजे मौत हुई और इस समय एक बजने जा रहा है...। शुगर के कारण जीजा का शरीर भी कैसा फूल गया है...। क्या करना है, कुछ सोचा है...?’

भैया, हमें तो कुछ पता नहीं। जब तक लाला जी आएँ तब तक तुम लोग ही इन्हें नहलाने का इन्तज़ाम कर दो...बड़ी मेहरबानी होगी...। सारी ज़िन्दगी साफ़-सुथरे रहे, अब इस आखिरी बखत कैसे इस गन्दगी के साथ विदा करूँ...?’

चचेरा भाई सोच में पड़ गया। पूरा शरीर गन्दगी से इस कदर सना पड़ा था कि इन्हें छूने या नहलाने की कौन कहे, कोई पास जाने को भी तैयार नहीं था...फिर...?

दीदीऽऽऽ...जानती हो, जीजा को इस हालत में कोई नहीं नहलाएगा...। तुम कहो तो किसी जमादार को देखूँ...?’

रमा देवी खुद दुविधा में थी। ज़िन्दा और मरे आदमी में बहुत फ़र्क होता है...। ज़िन्दा थे तो नहाने-धोने से लेकर कपड़ा-चद्दर बदलने में खुद भी इधर-उधर हट-बढ़ कर किसी तरह सहयोग तो कर देते थे, पर अब...?

एकदम बेजान पड़े शरीर को वह कैसे साफ़-सुथरा करें...? घिन के मारे भीतर से खुद उनका भी बुरा हाल था। भाई की बात पर वह पल भर चुप्पी साधे रही, फिर धीरे से फुसफुसाई, ‘रहने दो, तुम इस पचड़े में मत पड़ो...। जमादार के आने पर जो जगहँसाई होगी, सो तो अलग बात है, पर किसी मुर्दे की साफ़-सफ़ाई के लिए शायद कोई जमादार भी तैयार नहीं होगा...

वह फिर सुबक पड़ी, ‘ज़िन्दा थे तब तो साफ़-सफ़ाई के लिए कोई मिला नहीं, अब क्या मिलेगा...? अब तो लाला जी जो समझें, करें...

तब तक सारे साजो-सामान के साथ बद्री बाबू आ गए थे। बाहर मर्द लोग अर्थी तैयार करने में जुट गए। बाँस सस्ता था तो क्या हुआ...अर्थी तो सही तरीके से तैयार हो गई...। कपड़ा झीना था, पर क़फ़न तो था...। गेंदे की आठ-दस मालाएँ भी थी। जो डालना चाहे, डाल सकता है।

बद्री बाबू के सामने भी सफ़ाई की समस्या पेश की गई, पर वे तटस्थ रहे,  भाभी, आप परेशान न हों...मैं समझ लूँगा...

आगे बोलने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। अपने छत्ते से जैसे ढेर सारी मधुमक्खियाँ बाहर आ गै हों, वैसे ही बन-भन की आवाज़ का शोर गेट के बाहर की सड़क को मनसायन कर रहा था...

बद्री बाबू ने इत्र की पूरी शीशी को गंगाजल में घोल कर केशव बाबू के पूरे बदन पर छिड़क दिया था। उसकी खुशबू के बीच बदबू की भीषणता थम-सी गई थी। बदबू कम होते ही कुछ लोग कमरे के भीतर आ गए और फिर एक चादर से केशव बाबू का पूरा शरीर ढाँक दिया गया।

ऊपर और नीचे की चादर में उनका भारी शरीर लपेट कर उठाया गया और फिर हाँफते हुए लोगों ने आँगन में रखी अर्थी पर उसे रख दिया...। बद्री बाबू ने उनके ऊपर जैसे ही सफ़ेद क़फ़न डाल कर रस्सी से उनके शरीर को बाँधा, लोगों नेराम नाम सत्यकी उद्घोषणा के साथ गेंदे की माला को अर्थी पर इस तरह फेंका, जैसे केशव बाबू की आराधना कर रहे हों...। इस दौरान कुछ लोगों ने रस्म-अदायगी के तौर पर आँखों पर रुमाल रख लिया था, तो कुछ लोग वास्तव में उनकी यह दुर्दशा देख कर रो पडे थे, ‘भगवान किसी को ऐसा दिन न दिखाए...

अरे इसी दिन के लिए तो इन्सान सब से बना कर चलता है...

कुछ नहीं होया भइयाऽऽऽ...बना कर चलते भी तो क्या आप इस गन्दगी को साफ़ कर पाते...?’

प्रश्न सुनते ही कहने वाला पीछे खिसक गया, ‘भाड़ में जाएँ सब...औलाद बराबर सगा भाई जब कुछ नहीं कर रहा तो हमें क्या...?’

आसपास खुश्बू-बदबू के साथ तरह-तरह की बातें भी फैल रही थी पर उसस्र तटस्थ रमा देवी एकदम जड़-सी बैठी थी अर्थी के पास...। उन्हें लगा जैसे भीतर का सारा पानी एकबारगी ही सूख गया है...। दस बरस रोने के लिए बहुत होता है, अब चाहें बी तो...

राम नाम सत्य है...सत् बोलो गत है... उनका श्रंगार ख़त्म हो गया...। अर्थी तेज़ी से बाहर चली गई...। नौकरानी ने केशव बाबू का सामान बाहर मैदान में डाल दिया और फिर पानी डाल कर पूरा घर साफ़ करने में जुट गई, पर रमा देवी ज्यों-की-त्यों बैठी रही एक अजीब अहसास के साथ...

शादी के करीब दो बरस बाद केशव बाबू उन्हें दिल्ली ले गए थे। चाँदनी चौक, कुतुबमीनार, लाल किला, वहाँ के बाज़ार, म्यूज़ियम के साथ मछलीघर भी दिखाने ले गए थे।

बड़े-बड़े शीशे के बक्से में इतनी तरह-तरह की मछलियाँ तैर रही थी कि वे हैरत में पड़ गई थी। कुछ मछलियाँ उस बक्से में पानी के एकदम नीचे बने नकली फूलों, चट्टानों के बीच बची ज़मीन पर जैसे पल भर को ठहर-सी गई थी।

केशव बाबू ने हँस कर कहा था, ‘ये तैरते-तैरते जब थक जाती हैं तो नीचे तलहटी में पल-दो-पल आराम करके एक नई ऊर्जा प्राप्त करती हैं...आगे की ज़िन्दगी के लिए...

सहसा रमा देवी को लग्गा कि वे भी एक मछली हैं...एक ऐसी बड़ी-सी मछली जो घर रूपी बक्से में इधर से उधर बस तैरती ही रही हैं पर अब...एकदम इतना ज़्यादा थक गई हैं कि...

घाट से लोग अपने-अपने घर को लौट गए थे। खुद बद्री बाबू व उनकी पत्नी भी चले गए थे, तेरहवीं से पहले आने की बात कह कर...। घर एकदम खाली हो गया था, पर पता नहीं क्यों, रमा देवी को किसी बात से फ़र्क नहीं पड़ा...। वे आज उस सुख का भरपूर अहसास करना चाहती थी जो उस मछली ने उस शीशे के बक्से की तलहटी में पल भर ठहरते वक़्त किया था...

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