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Mar 1, 2026

कहानीः अकालग्रस्त इलाका

 - प्रेम गुप्ता ‘मानी’/ प्रियंका गुप्ता

चंद लम्हों पहले ही तो आसमान एकदम साफ़ था। उसकी आसमानी नीली चादर पर काले बादलों के कुछ नन्हे टुकड़े तैर रहे थे, पर पल भर बाद हवा के झोंके उन्हें कहीं दूर धकेल देते, तो लगता, सब कुछ ठीक है...। मौसम विभाग कहीं-न-कहीं गड़बड़ा गया लगता है...उसके अनुसार तो तेज़ बारिश की संभावना है। 

यद्यपि, हफ्ते भर पहले ही तेज़ आँधी के बाद इतनी ज़ोर की बारिश हुई थी कि बहुत कुछ अस्त-व्यस्त हो गया था। धूल-भरी आँधी ने घर के नक्शे को इस कदर बेरंग कर दिया था कि सफ़ाई करने का सोचकर ही मैना घबरा गई थी। आँधी के कारण पूरे इलाके की बत्ती जो गुल हुई, सो अलग... उस पर बला की गर्मी...?

उस समय उलझन के एक अजीब माहौल ने सबको जकड़ रखा था कि तभी बादलों की तेज़ गड़गड़ाहट के साथ धरती पर झमाझम गिरती बारिश की बूँदों ने जैसे सबको एकदम निहाल कर दिया था। घर की साफ़-सफ़ाई के बाद मैना भी उस सकून से भर गई थी। 

उस दिन जमकर पानी बरसा। लगा, जैसे आकाश उसी दिन अपना पूरा भरा घड़ा खाली कर देगा...। सड़कें घुटने-घुटने पानी से भर गई थीं, तिस पर जहाँ-तहाँ कीचड़...गंदगी...। शुक्र था कि उस दिन इतवार था। सब घर पर ही थे। मौसम का मज़ा लेने के लिए मैना ने ढेर सारी बेसन की पकौड़ियाँ बनाई थीं और साथ में गर्मागर्म चाय भी...। बड़े इत्मीनान से सबने खाया। 

पकौड़ियों का मज़ा बरसात के मौसम में ही तो है, पर उसके बाद हफ्ते भर तक कुछ भी नहीं...। अपना घड़ा एक ही दिन में खाली करके आकाश तो शांत हो गया था; पर नीचे धरती पर सारे जीव कुलबुला उठे थे। कितनी अजीब बात थी...बारिश की ठंडी-ठंडी बूँदें धरती का ताप कम कर देती हैं, पर उसके थमते ही धरती फिर झुलसने लगती है...। मैना को वैसे भी गर्मी बहुत लगती है, तिस पर गोकुल की ज़िद, “एसी नहीं चलेगा...बिजली का बिल बहुत ज़्यादा आता है...।”

इधर मैना की उलझन...पंखे की गर्म हवा किसी तरह दिन में तो झेल लेती है, पर रात में...?

पंखे की गर्म हवा राहत देने की बजाय उसे बेचैन कर देती। पूरा बदन अजीब तरह से चिपचिपा उठता। ऐसे में नींद कैसे आती? इस चिपचिपी उमस भरी रात में गोकुल पता नहीं कैसे सो जाता और वह पूरी रात बालकनी में काट देती। एसी लगे होने के बावजूद वह कुछ नहीं कर पाती। एक-दो बार जबरिया उसने एसी चलाया भी, लेकिन गोकुल ने झुँझलाते हुए उसे बंद कर दिया। गर्मी का मौसम वैसे भी उसके लिए काल बन जाता है, तिसपर गोकुल से रोज-रोज रात को उलझना...। ज़िद में आकर वह दूसरे कमरे में सोने को भी तैयार नहीं होता था। हारकर उसे ही चुप रहना पड़ता था। 

आज भी खाना-पीना निबटाकर वह बालकनी में बैठी ही थी कि अचानक आसमान पर काले बादलों के विशाल टुकड़ों ने हमला बोल दिया। पहले तो वे पूरे ज़ोर से गरजे और फिर बरस पड़े...पर उनका यह गरजना-बरसना भी बस चंद घंटों के लिए ही था, लेकिन यह वक़्त भी उसके लिए बेहद सकून भरा था। 

सकून से भरी वह आराम करने की सोच ही रही थी कि तभी उसका मोबाइल कुनमुना उठा...कोई अनजान नंबर था। आमतौर पर वह कोई अनजान नंबर रिसीव नहीं करती, पर इस समय...?

पता नहीं क्या सोचकर उसने मोबाइल उठा ही लिया। उधर की आवाज़ सुनते ही वह चौंक गई। पूरे साल भर बाद यह क्या...? रीमा को उसकी याद कैसे आ गई? इतने समय से तो जैसे रीमा ने उससे सारे रिश्ते-नाते ही तोड़ लिये थे। उसने यह भी नहीं सोचा कि माँ के जाने के बाद मैना ने बड़ी बहन का ही नहीं, बल्कि एक माँ का भी फ़र्ज़ अदा किया था। उसे जब भी कोई ज़रूरत पड़ती, मैना तुरंत हाज़िर हो जाती...। हारी-बीमारी में उसके पास पहुँच ही जाती थी। अपने खर्चे से कटौती करके, गोकुल से छिपाकर पैसे-रुपये से भी उसकी मदद करती, लेकिन यह रीमा...? 

रीमा को इन सबसे जैसे कभी कोई सरोकार रहा ही नहीं। वह कहाँ से और कैसे उसकी मदद कर पाती है, यह जानने की उत्सुकता उसमें कभी थी ही नहीं। कभी भूले-भटके बातों के दौरान अगर मैना अपनी तकलीफ़ों का ज़िक्र करना भी चाहती, तो अगले ही पल रीमा किसी-न-किसी बहाने फोन काट देती। ऐसे में मैना को हल्की कोफ़्त भी होती थी। कितनी अजीब और मतलबपरस्त लड़की है...अपनी जरूरतों और कष्टों की रामकहानी सुना डाली; लेकिन उसकी बारी आई तो बस्स...अच्छा दीदी, थोड़ा काम है, बाद में बात करती हूँ...कहकर कॉल रख दिया? कई बार मैना का दिल भी करता, अगली बार जब यह अपना दुखड़ा रोएगी तो वह भी ऐसे ही काम का बहाना करके फोन रख देगी...न तो उसका दुखड़ा सुनेगी, न उसकी मदद करने के लिए खुद को परेशानी में डालेगी। लेकिन मैना तो बस मैना थी...। माँ-बाप के दिए संस्कारों का सबसे ज़्यादा असर शायद उसी पर हुआ था, तभी तो किसी की परेशानी सुनी नहीं कि सबसे पहले सहायता करने को तैयार...। जब बाहरी लोगों के साथ मैना ऐसी थी तो रीमा तो फिर भी अपनी सगी छोटी बहन ही थी न...। उसकी मदद से भला वो कैसे पीछे हट सकती थी। 

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आज भी फोन उठाते ही रीमा का चिर-परिचित लहजा...हम हैं...मानो उसके इस ‘हम’ में समस्त ब्रह्मांड समाया हो। मैना अक्सर उसके इस तरीके पर चुटकी ले चुकी थी, पर उसकी तमाम दूसरी बातों की तरह रीमा इस बात को भी हमेशा अनसुना करके निकल जाती थी। 

‘यह किसका नंबर है?”

“अरे, यह मेरे मोहल्ले की पार्लर वाली का नंबर है। एक शादी में जाना है, तो बाल-आइब्रो सब करवाने आए हैं। दीदी, मेरे मोबाइल का रिचार्ज खतम हो गया है, ज़रा पाँच सौ वाला करवा दो...। वहाँ जाएँगे तो ज़रूरत पड़ेगी न...। अच्छा, सुनो, हम फटाफट सब करवा लें, नहीं तो पहुँचने में बहुत लेट हो जाएगा। बाद में बात करते हैं।”

इससे पहले कि मैना कुछ कह-सुन पाती, रीमा ने फोन काट दिया। कुछ पल के लिए मैना फोन वैसे ही हाथ में पकड़े सन्नाटे-सी अवस्था में बैठी रह गई। साल भर बाद फोन किया भी तो अपने मतलब से...? न हाल, न चाल, बस रिचार्ज करा दो। मन हुआ, अभी पलटकर उसे इसी नंबर पर कॉल करे और खरी-खरी सुना दे। तुम्हारा ठेका ले रखा है क्या? अपने आदमी से जो पैसा पार्लर के लिए लेकर आई हो, उससे खुद रिचार्ज कराओ...। कौन सा पहले की तरह मेरे रिचार्ज करने के बाद मुझसे बात करने वाली हो?

पर मन की बात मन में ही रखते हुए मैना ने एक लंबी साँस भरते हुए खुद को संयत किया और दस मिनट बाद ही रिचार्ज के लिए रीमा का नंबर सेलेक्ट कर लिया। क्या पता, कहाँ जा रही हो। कम-से-कम पास में हाड़े-गाढ़े काम आने के लिए मोबाइल चालू तो रहना चाहिए न। हाँ, इतना ज़रूर पक्का था कि इस बार वो सबसे कम कीमत का ही रिचार्ज कराएगी। बस इतना भर कि कहीं भी बात कर सके। 

रिचार्ज होने के बाद भी रीमा की तरफ से कोई कॉल, तो कौन कहे, एक मैसेज तक नहीं आया। हमेशा की तरह बस एक चुप्पी...जो जाने कितने दिनों तक चलेगी। 

मैना अभी भी बालकनी में बैठी थी। बारिश थम चुकी थी, लेकिन रेलिंग से बूँदें थोड़ा-थोड़ा करके रिस रही थी...। मैना को लगा, ये बारिश की बूँदें नहीं, बल्कि उसका रिश्ता हो जो धीरे-धीरे रिसता जा रहा था। 

मैना ने मोबाइल मेज पर रखा और चाय का प्याला उठा लिया। इतनी देर में चाय पूरी तरह ठंडी हो चुकी थी, पर फिर भी उसकी इच्छा नहीं हुई उसे गरम करने की..। एक साँस में ही वह ठंडी चाय गटक गई। 

कुछ देर यूँ ही बैठी वह आसमान ताकती रही, फिर पता नहीं क्या सोचकर मोबाइल उठाकर रीमा का नंबर डायल कर दिया। लगातार बजती घंटी सुनकर वह फोन रखने ही वाली थी कि तभी रीमा ने कॉल उठा लिया, “रिचार्ज हो गया दीदी...बताया था न कि अभी इनके एक फ्रेंड के यहाँ शादी में जा रहे हैं, तो पार्लर आए हैं तैयार होने...बाद में बात करते हैं...और हाँ, अगली बार ज़्यादा नेट वाला रिचार्ज कराना...यह एक जीबी बहुत जल्दी खत्म हो जाता है...ठीक है? चलो रखते हैं...।”

इससे पहले कि मैना कुछ कह-सुन पाती, रीमा ने फोन रख दिया। मैना को लगा, वह अंदर तक आसमान में घिरे काले बादलों की तरह भारी हो गई है...अगर जल्दी ही ना बरसी तो फट जाएगी। 

पर बरसे भी तो कहाँ जाकर...? माँ-बाप हैं नहीं, मायके के नाम पर एक भाई-भाभी, पर वे भी बस अपनी दुनिया में मस्त...और रीमा...? उसके जैसी मतलबपरस्त इंसान से तो कोई उम्मीद रखना ही बेमानी था। कहने को पति के रूप में गोकुल उसके साथ थे, पर वे भी अति-व्यावहारिक और आत्मकेंद्रित...संवेदना शायद अंश-मात्र भी नहीं थी उनमें...। दुनिया के लिए वे बेहद व्यवहारकुशल व्यक्ति थे; लेकिन उनके साथ भावात्मक संवाद कर पाने की गुंजाइश कहीं से भी नहीं थी। ऑफिस, पैसे की चिंता और घर एक निश्चित बजट में चलाने तक ही उनकी दुनिया सीमित थी; इसलिए गर्मी में एसी ना चलाने देने की ज़िद हो या सर्दियों में हीटर और गीज़र के लिए होने वाली बहसें हों, मैना हर परिस्थिति में सामंजस्य बैठाने का प्रयत्न करती। वह जानती थी, फालतू की लड़ाइयों में कुछ नहीं रखा। हरेक बात पर लड़ना जितना आसान होता है, चुप रहकर निभा ले जाना उतना ही कठिन...। वैसे भी वह रिश्तों को निभाने में यकीन रखती थी, सो अधिकतर चुप ही रह जाती। 

अचानक ही मैना की आँखों के सामने जैसे रीमा की पूरी ज़िंदगी घूम गई। उसके स्कूल में रहते ही पहले पापा, और फिर माँ का जाना...। भाई-भाभी को तो तब भी कोई खास फ़र्क नहीं पड़ा था, पर रीमा के लिए अगर वो दुखद घटनाएँ थीं, तो मैना के लिए तो जीवन-भर का खालीपन और अकेलापन था। रीमा का बोझ उठाने के लिए भाभी तैयार नहीं हुई तो बेहद चिरौरी करके मैना ने किसी तरह गोकुल को मनाया था, रीमा को अपने साथ रखने के लिए...। संवेदनाओं से कोसों दूर रहने वाले गोकुल जाने कैसे उस घड़ी थोड़े द्रवित होकर उसकी बात मान गए थे, यह मैना आज भी नहीं समझ पाई; पर जो भी हो, गोकुल की सहमति से मैना के दिल से जैसे बहुत बड़ा बोझ उतर गया था। 

गोकुल पैसे को दाँत से पकड़ने वाले लोगों में से थे; इसलिए रीमा के पालन-पोषण के लिए मैना ने खुद पार्ट-टाइम नौकरी कर ली। उसके कालेज के फॉर्म भरने से लेकर उसकी नौकरी लगने और शादी तक की सारी ज़िम्मेदारी मैना ने बड़ी बहन बनकर नहीं, बल्कि माँ की तरह पूरी शिद्दत से निभाई। 

डेढ़ साल पहले उसकी एक बड़ी बदतमीजी पर जब मैना ने उसे यही सब याद दिलाकर समझाना चाहा था, तब रीमा ने बड़ी तल्खी से और उल्टा जवाब दे दिया था, “दीदी, तुमने जो भी किया, अपनी मर्ज़ी से किया था। मैंने नहीं कहा था तुमसे कि मेरी ज़िम्मेदारी उठाओ...। खुद की यह महानता अपने पास रखो। अपनी औलाद नहीं थी, तो मुफ़्त में मेरी माँ बनने की कोशिश न करो। अपने मन से किए गए कामों के लिए मुझ पर अहसान न जताओ...” कहते हुए रीमा ने फोन पटक दिया था। 

मैना अवाक्-सी चुप रह गई थी। रीमा की बातों के हंटर से उसका दिल छलनी हो गया था। कुछ देर के लिए मानो उसके दिल-दिमाग पर लकवा मार गया। जब ऑफिस से आए गोकुल ने कई बार आवाज़ देने के बाद उसे झिंझोड़ा, तो जैसे उसे होश आया। गोकुल चाहे जैसे रहे हों, पर शादी के इतने सालों बाद भी औलाद न हो पाने का कोई तंज या दोषारोपण उन्होंने उस पर नहीं किया। पर रीमा...? 

मैना अक्सर अपने जीवन में संतोष अपने आसपास ही ढूँढती थी...पड़ोस की बिल्लियों को दूध डाल देना, मंदिर की सफाई में हाथ बँटाना, या कॉलोनी की बस्ती की लड़कियों को खाली समय में पढ़ा देना। ये सब काम उसे सुकून देते थे, जैसे वह अपने भीतर की रिक्तता को भर रही हो। पर उस दिन रीमा की बातों की वजह से उसका मन इन सबसे भी उचाट-सा हो गया। क्या फायदा किसी के लिए कुछ करके अपने अंदर सुकून और शांति महसूस करने का...?

इस घटना के लगभग चार-पाँच महीने बाद रीमा का फोन आया भी तो अपनी बदतमीजी के लिए माफी माँगने नहीं, बल्कि अपने पति की आर्थिक सहायता के लिए...। मैना ने जैसे ही अपनी असमर्थता जताई, रीमा ने फिर फोन काट दिया और आज लगभग एक साल बाद फिर अपने मतलब के लिए ही फोन किया। 

मैना का दिल तो चाहा था, वो भी कटी-कटी सुना दे और रिचार्ज करने से साफ इंकार कर दे, पर उसके अंदर की ममता ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। वैसे भी रीमा पहले ही एक-दो बार बता चुकी थी कि उसका पति जाने क्यों उसका फोन रिचार्ज करने में बड़ी आनाकानी करता है। आज भी मैना को हमेशा की तरह लगा, रात में निकलेगी, कम-से-कम सुरक्षा के लिए मोबाइल में बैलेंस तो होना ही चाहिए। 

अचानक मैना की आँखें भर आईं। वह गोकुल के सामने ऐसे रोने से बचती है। पिछली बार रीमा के इतने दिनों से संपर्क न करने की बात कहकर रो दी, तो गोकुल ने इस बात पर तो कटाक्ष कर ही दिया था, “तुम उसकी बड़ी बहन थोड़े न हो...तुम तो उसकी एटीएम हो, जब चाहेगी, तुमसे पैसे निकाल लेगी। अपनी तनख्वाह से करती हो; इसलिए नहीं बोलता, वरना मैं तो कब का ऐसे मतलबी लोगों को लात मारकर अपनी ज़िंदगी से बाहर कर चुका होता...।” 

गोकुल ने कुछ गलत तो नहीं कहा था; लेकिन मैना को तब भी हल्का अपमानित-सा महसूस हुआ। कुछ भी हो, रीमा थी तो उसका ही खून...उसके मायके का एक हिस्सा...। यही कारण था कि मैना कभी भी अपने भाई-भाभी या रीमा से जुड़ी कोई भी बात गोकुल से शेयर नहीं करती थी। 

अचानक से बारिश फिर शुरू हो गई। आसपास का वातावरण भीगा हुआ था...। सामने के पार्क का हरेक पेड़-पौधा हरा-भरा था। मैना की नज़र अपनी बालकनी में रखे गमलों पर गई। उन पर हवा के साथ उड़कर आई बारिश की कुछ बूँदें ही पड़ी थी, जिन्हें गमलों की भुरभुरी-सूखी मिट्टी ने पल भर में सोख लिया था और अब भी वे वैसे ही सूखे और प्यासे थे। उनमें लगे पौधे मुरझा रहे थे। 

मैना को लगा, उसका मन भी तो उसी मिट्टी की तरह है...जिसके आसपास अगर कहीं से रिश्तों, भावनाओं और अपनेपन की बारिश की बौछारें पड़ती भी हैं तो भी उसे पूरी तरह भिगो नहीं पाती। बाद में बस वही सूखापन...वही सूनापन...। वह भी तो इन्हीं पौधों की तरह मुरझाती जा रही है। बाहर की बारिश के साथ-साथ उसकी आँखों से भी बरसात शुरू हो गई थी। 

उसके मन में उठा तूफ़ान धीरे-धीरे थम रहा था, लेकिन भीतर की सूखी धरती अब भी हरियाली से महरूम थी। सहसा, पता नहीं क्या सोचकर मैना एक झटके से उठ खड़ी हुई। एक-एक करके सूखे गमलों को उठाकर उसने रेलिंग के पास रख दिया। अभी बारिश की बूँदों से उनको जितना जीवन मिल सकता है, मिलने देगी...वरना कल सुबह वह खुद उनको पानी से नहलाकर फिर से ज़िंदगी जीने का एक मौका ज़रूर देगी। 

मैना ने अपने अंदर एक नई ऊर्जा महसूस की। जरूरी तो नहीं कि इन फूलों को खिलने-खिलाने के लिए बारिश का ही मुँह ताका जाए। अपने चारों तरफ पनप गए उस अकालग्रस्त इलाके में हरियाली लाने जितना पानी तो उसके पास भी मौजूद है ही न...।

 000 (स्व. प्रेम गुप्ता मानी जी की अधूरी कहानी को उसी संवेदनशीलता के साथ पूरा किया है उनकी बेटी प्रियंका गुप्ता ने )

 सम्पर्कः ‘प्रेमांगन’, एम.आई.जी- 292, कैलाश विहार, आवास विकास- एक, कल्याणपुर, कानपुर- 208017 (उ.प्र)

ईमेल- priyanka.gupta.knpr@gmail.com, ब्लॉग- www.priyankakedastavez.blogspot.in


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