शाम ढलने को आतुर थी। धूल ने आसमान का नीलाभ ढक दिया था। मेले में आए लोगों की आस्था से बाज़ार गर्म था। कुछ बहुरूपिये भिखारियों की जेबें भी। इन बातों से बेखबर, मंदिर की सीढ़ियों के ऊपरी चबूतरे के एक कोने पर पिछले आठ घंटे से पिता के साथ बैठा वह नन्हा बालक पुरानी मैली कुचली टोपी से कानों और उतने ही मैले जैकेट से थरथराती देह को भुलावा देता हुआ अपने नन्हें हाथों की जादूगरी नगाड़े और ढोलक पर बिखेरता रहा। पिता की शहनाई के साथ नगाड़े पर छड़ी से स्वर लहरी बिखेरता वह बीच-बीच में सिर उठाकर देख लेता कि कोई कद्रदान उन्हें सुन भी रहा है या नहीं। भीड़ सेल्फी लेती हुई सीढ़ियाँ चढ़ती जाती। कोई पल भर को रुकता भी तो लोक कलाकार की कलाकारी पर मुग्ध न होता। क्षण भर को रुककर उसने पपड़ाते होंठों पर जीभ फेरी और काम में लगा रहा।
अँधेरा छाने लगा। अब तक कुछ सिक्के सामने आ गिरे थे। नगाड़ा बजाता हुआ वह सामने पड़े सिक्के देखकर सोचने लगा, 'लोग सिक्के फेंककर क्यों देते हैं, जैसे कि उस भिखारन को? कोई ताली भी नहीं बजाता।
उसने सिर घुमाकर पिता की तरफ़ देखा जो बगल में खड़ी एक युवती की आँखों में अपनी कला का मान देखकर तन्मय होकर बजा रहे थे। वह युवती कुछ देर खड़ी रही, फिर झुककर कुछ सिक्के दोनों के सामने रख दिए। उसने देखा, वह अब उसकी बगल आ खड़ी हुई और उसे देखती हुई ध्यान से सुन रही है। उसे अच्छा लगा। रोटी-प्याज भूलकर वह साज बजाने में लीन होने लगा। अचानक उसने अपने सिर पर झुके हाथ के साथ ही पहले हल्की ठंड, फिर गर्माहट महसूस की तो हैरान हुआ। वह युवती अब सीधी खड़ी होकर मुस्कुरा रही थी। पुरानी टोपी उसकी गोद में पड़ी थी। उसने सिर पर हाथ फेरा। उसके हाथ में नरम, मुलायम नग जड़ी नई सुनहरी टोपी मुस्कुरा रही थी।
उसकी आँखों में झिलमिलाते बल्ब जल गए। उसने उसे देखा, आँखों से धन्यवाद दिया और उसके इशारे पर नई टोपी पहन ली। युवती आगे बढ़ी, झुककर उसे गले लगाया और बुदबुदाई, “नन्हे कलाकार! तुम्हारे हाथ में जादू है। काश! किसी मेहरबान की नज़र तुम पर पड़े और तुम मंच पर हुनर दिखलाओ।” वह चुप हो गई। उसे लगा, उनकी आँखों में पानी उमड़ आया है। उसके सिर पर हाथ फेरकर वह जल्दी से खड़ी हो गई। चबूतरा अँधेरे में डूबने लगा मगर उसकी खुशी नगाड़े पर पड़ती हर चोट से तरंगित होती हुई रोशनी फैला जाती। पहली बार उसे अपने कलाकार होने पर गर्व का अनुभव हुआ। टोपी उसे सिर पर सजा ताज लगने लगी।
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