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Apr 5, 2021

गीतः वो देखें तो !


-डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

आया है रंगीला मौसम,

कैसा छैल-छबीला मौसम।

 

सब्ज धरा के अंग -अंग पर,

लाल, गुलाबी , पीला मौसम।

 

बागों में बौराया डोले

सुन्दर, खूब सजीला मौसम।

 

आकर बैठ गया धरने पर,

देखो आज हठीला मौसम।

 

आँखों में अक्सर रहता है,

सूखा कभी पनीला मौसम।

 

धोखा देकर इन कलियों को,

भाग गया फुर्तीला मौसम।

 

वो देखें तो मुझपर छाए,

जाने क्यों शर्मीला मौसम।


सम्पर्कः वापी, गुजरात

Jul 12, 2018

बैरन वर्षा

बैरन वर्षा
- डॉज्योत्स्ना शर्मा
1
नींव मुस्काई
उसने जो घर की
देखी ऊँचाई.
2
सजाये सदा
हिल-मिल सपने
प्यारा वह घर।
3
गाँव, शहर
टुकड़ों में बँटता
रोया है घर।
4
नेह की डोर
खींच लिये जाए है
छूटे घर।
5
देखे, सँजोए
तार-तार सपने
बेचैन घर।
6
रिसते जख्म
पर्त-पर्त उघड़े
सिसका घर।
7
महका घर
आने की आहट से,
तेरे इधर!
8
बैरन वर्षा
ले गई सारे रंग
बेरंग घर।
9
थके नयन
जोहे बाट किसकी
ये खण्डहर।
10
होने दूँगी
नीलाम, सपनों का-
ये प्यारा घर!

उलझन !
1
रस्मों के गाँव
उलझ गए मेरे
भावों के पाँव।
2
उलझे मिले-
लालच की चादर
रिश्तों के तार।
3
किरन सखी
खोले है उलझन
नन्ही कली की।
4
प्रेम की डोर
उलझा मन, जाए-
तेरी ही ओर!
5
यूँ लुटाना,
धीरज से सीपी में
मोती छुपाना।
6
यादों के मेले
सजाते रहो मन !
कहाँ अकेले?
7
कैसा मंजर!
अपनों के हाथों में
मिले खंजर!
8
खाली हाथों में
तन्हाई की लकीर
क्या तकदीर!
9
तुम मुस्काओ,
जले दीप मन के
आओ आओ!
10
दे गए पीर
चाहत के बदले
बातों के तीर!

चोका
हरित परिधान
देता ही रहा
सागर तो जी भर
धूप तपाए
तो बादल बनाए
खूब बरसे
यूँ धरा सींच आए
महका जग
खिले फूल-कलियाँ
धरा ने धरा
हरित परिधान
लगता प्यारा
खूबसूरत नज़ारा !...
मन के मथे
दुनिया को दे रहा
रत्नों के ढेर
मोती-भरी सीपियाँ
भरी-भरी हैं
लहरों की वीथियाँ
नहीं अघाया
जो डूबा, वो हीपाया
दिया अमृत
सबको तूने सारा
क्यों रहा आप खारा !!

सम्पर्कः  H-604 , Pramukh Hills, Chharawada Road, Vapi-396191,
 District-Valsad (Gujarat), email- jyotsna.asharma@yahoo.co.in

Mar 24, 2018

हम संग मुस्काएँगे!

हम संग मुस्काएँगे! 
- डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

कितनी बरसात हुई
वीर शहीदों से
सपने में बात हुई। 1

बोला इक मत रोना
दिल के ज़ख्मों को
आँसू से मत धोना। 2

थोड़ा समझा देना
संदेशा मेरा
घर तक पहुँचा देना। 3

माँ! सुत था अलबेला
वैरी की गोली
छाती पर हँस झेला। 4

बाबा कब हारे हैं
ये मेरे साथी
सब पुत्र तुम्हारे हैं। 5

गुड़िया से कहना है
तू मजबूर नहीं
वीरे की बहना है। 6

कहना ना हरजाई
लिपट तिरंगे में
जब घर लौटे भाई। 7

हाँ फ़र्ज़ निभाया है
माटी का हमने
बस क़र्ज़ चुकाया है। 8

कह देना प्यारी से
राह तके मेरी
इकटक सुकुमारी से। 9

क्या पूछो कैसी है
वो मेरी चाहत
फूलों के जैसी है। 10

हाथों भर हो चूड़ा
सिन्दूरी बिंदी
महके गजरा जूड़ा। 11

वादा ना निभ पाया
कहकर भी मिलने
मैं लौट नहीं आया। 12

थोड़ी मजबूरी थी
सीमा की रक्षा
भी बहुत ज़रूरी थी। 13

विनती है, सुन लेना
साँसों की डोरी
ख़ुशियों को चुन लेना। 14

है उम्र अभी छोटी
मुश्किल है सहना
जग की नज़रें खोटी। 15

काँटो पर मत चलना
जीवन की भट्टी
यूँ ठीक नहीं जलना। 16

होनी से खुद लड़कर
चुन लेना साथी
कोई आगे बढ़कर। 17

तड़पी,फिर बोल गई
मन की सब पीड़ा
रो-रो कर खोल गई। 18

कैसे कायर माना
क्यों, मनमीत कहो
मुझको ना पहचाना। 19

पूरी तैयारी है
तेरा क़र्ज़ चुका
अब मेरी बारी है ।20

पीछे तो आना था
नन्हे को लेकिन
फ़ौलाद बनाना था। 21

मैं वचन निभाऊँगी
माँ-बाबा मेरे
हर सुख पहुँचाऊँगी। 22

बहना का ज़िक्र करो
ख़ूब सजे डोली
उसकी मत फ़िक्र करो। 23

पक्की है नींव बड़ी
सुन लेना, प्यारी
सरहद पर आन लड़ी। 24

जब लाल बड़ा होगा
बन दीवार अटल
सरहद पे खड़ा होगा। 25

वो पल भी आएँगे
नभ के तारों में
हम संग मुस्काएँगे। 26

सुनकर मन डोल गया
जय उन वीरों की
सारा जग बोल गया। 27

सम्पर्क: एच-604प्रमुख हिल्स, छरवाडा रोड, वापी, जिला- वलसाडगुजरात, Mo. 9824321053,  

Jan 27, 2018

हो सबका अभिमान

 हो सबका अभिमान
डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
कहीं रहूँ सुखकर बहुत, सारा ही परिवेश।
मधुरिम हिन्दी गीत जब, बजते देश-विदेश।।1
तुच्छ बहुत वह जन बड़ा’, निन्दित उसका ज्ञान।
अपनी हिन्दी का नहीं, जिसके मन सम्मान।।2
करना सीखा है सदा, सबका ही सम्मान।
लेकिन क्यों खोनी भला, खुद अपनी पहचान।।3
कटीं कभी की बेडिय़ाँ, ज़ादी त्योहार।
फिर क्यों अपने देश में, हिन्दी है लाचार।।4
हिन्दी मन की दीनता, अँग्रेजी सरताज।
कैसे मानूँ भारती, पाया पूर्ण स्वराज।।5
कितनी मीठी बोलियाँ, बहे मधुर रसधार।
सबको साथ सहेज कर, हो हिन्दी विस्तार।।6
एक राष्ट्र की अब तलक, भाषा हुई, न वेश।
सकल विश्व समझे हमें, जयचंदों का देश।।7
अपने अपनाए नहीं, गैरों को जयमाल।
मन ही मन करती रही, हिन्दी बहुत मलाल।।8
चली प्रगति के पंथ पर, हुई बहुत अनमोल।
सजते अंतर्जाल पर, मोती जैसे बोल।।9
विविध विधा के संग सखि, पाया है विस्तार।
सहज, सरल हिन्दी  हुई, वाणी का शृंगार।।10
शुभ्र चंद्रिका सी खिले, कभी तेजसी धूप।
कितने ग्रन्थों में सजा, हिन्दी रूप-अनूप।।11
ममता बरसी सूर से, तुलसी जपते राम।
वाणी अमर कबीर की, मीरा रत्न ललाम।।12
सम्पर्क: एच-604, प्रमुख हिल्स, छरवाडा रोड, वापी, जिला- वलसाड, गुजरात (भारत),
Email- Jyotsna.asharma@yahoo.co.in, Sharmajyotsna766@gmail.com, Mo.9824321053