मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।
Showing posts with label पीयूष कुमार मिश्रा. Show all posts
Showing posts with label पीयूष कुमार मिश्रा. Show all posts

Jun 18, 2012

चौसर

-पीयूष कुमार मिश्रा
अनगिनत मोहरों के बीच
मैं खड़ा हूँ -
एक मोहरा
किसी ने चाल चल दी है
और अब एक मोहरा खड़ा है सामने मेरे
अब मुझे चलना है
और मैं सोच में हूँ ...
अगर हम हार गए
तो हमारे ये जो खाने हैं ...
सफेद और काले
क्या उनके हो जायेंगे?
उन अजनबियों के, रकीबों के?
और अगर हम जीत गए
तो ये जो अजनबी मोहरे हैं
क्या गुलाम हो जायेंगे हमारे?
मगर ,
मैं तो सिर्फ एक मोहरा हूँ
मेरी तो सिर्फ एक जमीन है...
सिर्फ एक खाना और ,
कोई मोहरे का गुलाम कैसे हो सकता है
तो ये तो यकीन है
ये जंग नहीं!
शायद ये खेल है कोई
मगर इस खेल में ऐसा क्यूँ है
कि कोई प्यादा अगर बढ़ गया आगे
तो फिर पीछे नहीं आ सकता...
और वजीर की जिधर मर्जी उधर जा सकता है?
प्यादा एक मर गया कभी तो
आंसू भी नहीं आते, गम भी नहीं होता
मगर बादशाह पर किसी ने
नजर भी की तिरछी
तो बाकी के सारे मोहरे
टूट पड़ते हैं उस पर ?
खेल में तो सबका हक
बराबरी का होता है...
ये शायद खेल भी नहीं!
ये जंग भी नहीं
ना जीत अहम है इसमें
न हार से कोई फर्क पड़ता है
ये खेल भी नहीं
यहाँ कोई बराबर भी नहीं!
मैं सोच में हूँ...
मैं कौन सी चाल चलूँ
एक मोहरा मेरे सामने खड़ा है
कि मैं अगर
उसके सीने पर पाँव रखकर आगे ना बढ़ गया
तो कुछ ही देर में
वो मुझे चीरता हुआ आगे निकल जायेगा!

Address-
Matri Chhaya, East Ashok Nagar, Road No 14,
Near Vijay Market, Kankerbagh Colony,
Patna - 800020,
http://mera-panna.blogspot.in