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Sep 5, 2026

पर्यावरणः जलवायु परिवर्तन और लुप्त होता अमरनाथ शिवलिंग

  - पंकज चतुर्वेदी

करोड़ों हिंदुओं की गहरी आस्था का केंद्र अमरनाथ यात्रा को चलना तो 57 दिन हैं । तीन  जुलाई 2026 को यात्रा शुरू होने के बाद पाँचवें दिन के अंत तक दर्शनार्थियों की  संख्या बढ़कर 1,13,800 तक  पहुँच चुकी थी; लेकिन  इसी दिन से शिविलिंग लगभग 90 फीसदी पिघल गया । समझना होगा कि  यह आस्था के साथ-साथ स्थानीय लोगों के रोजगार का सवाल तो है ही, बल्कि यह हमारे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य का एक बड़ा पैमाना भी है। लेकिन इस वर्ष 2026 की यात्रा ने एक ऐसा सच सामने रखा है, जो न केवल हैरान करने वाला है, बल्कि पर्यावरण के प्रति हमारे लापरवाह रवैये पर कड़े सवाल भी खड़े करता है। अमरनाथ गुफा में जो पवित्र हिम-शिवलिंग प्राकृतिक रूप से बनता है, वह इस बार यात्रा के महज 5-6 दिनों में ही 90 प्रतिशत तक पिघल गया और उसकी ऊँचाई सिमटकर मात्र एक फुट रह गई ।  यह स्थिति किसी आपदा से कम नहीं है और यह हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव को रेखांकित करती है।

यात्रा के लिए निर्धारित 57 दिनों की अवधि के बीच में ही शिवलिंग का इस तरह विलीन हो जाना यह दर्शाता है कि हम प्रकृति के साथ किस हद तक खिलवाड़ कर रहे हैं।  वैज्ञानिक और स्थानीय जानकारों का मानना है कि इसके पीछे कई ठोस कारण हैं। इस साल कश्मीर घाटी में तापमान ने कई पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। मई और जून के महीनों में पड़ी तेज धूप और गर्म हवाओं ने गुफा के आसपास के वातावरण को बुरी तरह प्रभावित किया।  इसके अलावा, पिछली सर्दियों में कम बर्फबारी हुई, जिससे गुफा के पास वह प्राकृतिक ठंडक नहीं बन पाई जो हिमलिंग को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए जरूरी होती है।

पिछले वर्षों के रुझानों को देखें तो यह स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई है। वर्ष 2024 में कश्मीर घाटी में जून-जुलाई के दौरान भीषण गर्मी की लहर देखी गई थी, जिसे हिमलिंग के जल्दी पिघलने का प्रमुख कारण माना गया।  इसी तरह, वर्ष 2025 में भी मौसमी अस्थिरता साफ दिखाई दी, जहाँ बर्फबारी के बाद न्यूनतम तापमान में 6 डिग्री तक का उछाल दर्ज किया गया, जो इस बात का संकेत है कि हिमालय में मौसमी पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं।  ये आँकड़े बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के मामले में दुनिया के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक है।

इस विषय पर एक बड़ी चुनौती सही डेटा के अभाव की भी है। अमरनाथ गुफा एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है, लेकिन वहाँ स्थायी रूप से काम करने वाले ऑटोमेटेड वेदर स्टेशनों का सार्वजनिक डेटा सीमित है।  भारतीय मौसम विभाग मुख्य रूप से 5 से 7 दिनों का पूर्वानुमान और जिला-स्तर के अपडेट देता है, न कि दशकों पुरानी क्लाइमेटोलॉजिकल सीरीज़।  इसी कारण शोधकर्ता और मीडिया अक्सर श्रीनगर, पहलगाम या अनंतनाग जैसे निकटवर्ती स्टेशनों के डेटा को आधार मानकर गुफा-स्तर के स्थानीय अवलोकनों—जैसे हवा, नमी और बर्फबारी—को जोड़ते हुए स्थिति का आकलन करते हैं।

सबसे गंभीर पहलू मानवीय हस्तक्षेप का है। अमरनाथ गुफा का तापमान वहाँ मौजूद ‘माइक्रोक्लाइमेट’ पर निर्भर करता है।  एक अध्ययन के अनुसार, गुफा के भीतर जाने वाला हर श्रद्धालु लगभग 100 वाट ऊष्मा उत्सर्जित करता है।  जब लाखों लोग वहाँ पहुँचते हैं, तो गुफा के अंदर की गर्मी और नमी खतरनाक स्तर तक बढ़ जाती है, जिससे बर्फ का शिवलिंग तेजी से पिघलने लगता है।  इसके ऊपर गुफा के आसपास होने वाली मशीनी गतिविधियाँ और शोर-शराबा भी वहाँ के तापमान को प्रभावित करते हैं, जिसका सीधा असर शिवलिंग के अस्तित्व पर पड़ता है। बढ़ती यात्रियों की संख्या के लिए सुविधाएँ जुटाने, वाहनों की अनुमति , पक्के निर्माण जैसे की कारण है जिसके चलते  अमरनाथ शिवलिंग समय से बहुत पहले सिमट गया ।

पर्यावरण विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी दे रहे हैं कि ग्लेशियरों का सिकुड़ना और बर्फबारी के बदले हुए पैटर्न इस बात के स्पष्ट सबूत हैं कि हम जलवायु संकट के बीच में खड़े हैं।  पवित्र हिमलिंग का निर्माण एक अत्यंत सूक्ष्म प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें छत से टपकने वाली जल-बूँदें जमाव बिंदु के नीचे के तापमान में शिवलिंग का आकार लेती हैं।  जब हम उस स्थान के स्थानीय तापमान में मानवीय गतिविधियों या अत्यधिक भीड़ के जरिए बदलाव लाते हैं, तो यह कुदरती प्रक्रिया ठप हो जाती है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या हम अपनी आस्था के प्रतीक को बचाने के लिए कुछ बदलाव के लिए तैयार हैं? हमें यह समझना होगा कि तीर्थयात्रा का अर्थ केवल वहाँ तक पहुँचना नहीं है; बल्कि उस स्थान के प्रति सम्मान और संतुलन बनाए रखना भी है। इसके लिए विशेषज्ञों के सुझावों पर अमल करना अनिवार्य हो गया है।  हमें यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की दैनिक संख्या को नियंत्रित करना होगा; ताकि गुफा के भीतर का तापमान स्थिर रहे।  गुफा के आसपास मशीनों और अन्य यांत्रिक साधनों के उपयोग पर पूरी तरह रोक लगानी होगी।  साथ ही, हिमालयी क्षेत्र की विशिष्ट जलवायु को देखते हुए हमें अपनी विकासवादी सोच में बदलाव लाना होगा और जलवायु अनुकूलन पर जोर देना होगा।

आस्था और प्रकृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं होने चाहिए। अगर हम आने वाली पीढ़ियों के लिए इस पवित्र धरोहर को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो हमें विकास और दर्शन के नए और सतत तरीके खोजने होंगे। यह समय चेतने का है; क्योंकि प्रकृति के साथ खिलवाड़ की कीमत अक्सर बहुत बड़ी चुकानी पड़ती है। क्या हम प्रकृति के इस नाजुक संतुलन को बनाए रखने के लिए अपनी जीवनशैली और यात्रा के तरीकों में बदलाव करने को तैयार हैं? हिमालय की गोद में बसी यह गुफा हमें बार-बार यह याद दिलाती है कि हम धरती के मालिक नहीं; बल्कि इसके संरक्षक हैं। आने वाले वर्षों में हमारी रणनीति केवल तीर्थयात्रा के प्रबंधन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; बल्कि यह जलवायु सुरक्षा का एक बड़ा अभियान होनी चाहिए, ताकि हिमलिंग का यह पवित्र रूप भविष्य में भी श्रद्धालुओं को दर्शन देता रहे। ■ (indiaclimatechange.com से साभार)


Jun 1, 2026

प्रकृतिः मौसम की मार से कराहती मानवता

 - पंकज चतुर्वेदी

आज हम जिस भीषण गर्मी का सामना कर रहे हैं, वह वैश्विक वायुमंडलीय बदलावों और स्थानीय स्तर पर पर्यावरण के प्रति बरती गई नीतिगत लापरवाही का एक मिला-जुला परिणाम है।

भारत में मौसम का बदलता मिजाज और वैशाख के महीने में जेठ जैसी तपिश का अहसास होना अब केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक गहरे पारिस्थितिक संकट की चेतावनी है। अक्सर भीषण गर्मी और लू के लिए अल नीनो या वैश्विक जलवायु परिवर्तन को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारी से बचते रहे हैं; लेकिन वास्तविकता यह है कि यह संकट काफी हद तक मानव-निर्मित है।

आज हम जिस भीषण गर्मी का सामना कर रहे हैं, वह वैश्विक वायुमंडलीय बदलावों और स्थानीय स्तर पर पर्यावरण के प्रति बरती गई नीतिगत लापरवाही का एक मिला-जुला परिणाम है।

जब हम अपनी विकास योजनाओं के नाम पर हज़ारों हेक्टेयर प्राथमिक जंगलों, पहाड़ियों और जल निकायों को नष्ट करते हैं, तो हम अनजाने में उन प्राकृतिक ‘कूलिंग एजेंटों’ को खत्म कर देते हैं जो इस तपिश के खिलाफ हमारी एकमात्र सुरक्षा थे।

बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में, जहाँ तापमान अब नियमित रूप से 48°C के स्तर को छूने लगा है। यह स्पष्ट है कि हमारी विकास की भूख ने धरती के प्राकृतिक थर्मोस्टेट को बिगाड़ दिया है।

इस मानव-निर्मित गर्मी की सबसे प्रत्यक्ष और क्रूर मार उन मजदूरों और सड़क किनारे काम करने वाले श्रमिकों पर पड़ती है, जो इस ढाँचे का निर्माण कर रहे हैं। भारत के करोड़ों निर्माण श्रमिक, रेहड़ी-पटरी वाले और गिग-इकोनॉमी के कर्मचारी इस गर्मी को केवल एक आँकड़े के रूप में नहीं, बल्कि एक शारीरिक हमले के रूप में महसूस करते हैं। आँकड़ों के अनुसार, गर्मी के कारण भारत को 2030 तक अपने कुल कामकाजी घंटों का 5.8% हिस्सा खोना पड़ सकता है, जो लगभग 3.4 करोड़ पूर्णकालिक नौकरियों के बराबर है।

बांदा जैसे शहरों में, कंक्रीट और कोलतार की सड़कें गर्मी को सोखकर रात में भी उसे वापस छोड़ती हैं, जिससे ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव पैदा होता है और स्थानीय तापमान ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में 5°C से 7°C तक अधिक बना रहता है।

नीतिगत स्तर पर मजदूरों के लिए ‘छाया का अधिकार’ या लू के दौरान काम के घंटों में बदलाव जैसे नियम केवल कागजों तक सीमित हैं, जो हमारे विकास के उस अंधेपन को दर्शाते हैं जहाँ श्रम को एक जैविक इकाई के बजाय केवल एक मशीन समझा जाता है।

गर्मी का यह घातक रूप हमारी खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ रहा है। ‘थर्मल शॉक’ के कारण गेहूँ जैसी प्रमुख फसलों के दाने दूध भरने की अवस्था में ही सूख रहे हैं, जिससे पैदावार में 15% से 25% तक की गिरावट दर्ज की जा रही है। मिट्टी की नमी खत्म होने से उपजाऊ जमीन अब मरुस्थल में बदल रही है, फिर भी हमारी नीतियाँ सूखे क्षेत्रों में अधिक पानी चाहने वाली फसलों को बढ़ावा दे रही हैं।

इसी तरह, जंगलों के विखंडन और अवैध खनन ने वन्यजीवों के लिए भोजन  का संकट पैदा कर दिया है। छतरपुर और पन्ना टाइगर रिजर्व के आसपास के इलाकों में, खनन के कारण प्राकृतिक जल स्रोत सूख चुके हैं, जिसके परिणामस्वरूप जंगली जानवरों का बस्तियों की ओर आना 40% तक बढ़ गया है। यह केवल मानव-पशु संघर्ष नहीं है, बल्कि उस पारिस्थितिक सुरक्षा चक्र का टूटना है जो इंसानों और जानवरों को एक साथ सुरक्षित रखता था।

वर्तमान ‘हीट एक्शन प्लान’ (एच ए पी) की सबसे बड़ी विफलता यह है कि वे केवल शहरों में मौतों को रोकने पर केंद्रित हैं, जबकि जमीन, जल और मिट्टी के गिरते स्वास्थ्य की अनदेखी करते हैं। अब समय आ गया है कि नीतिगत स्तर पर ‘वन हेल्थ’ के दृष्टिकोण को अपनाया जाए, जहाँ मिट्टी की नमी, पशुधन का स्वास्थ्य और वन्यजीवों का संरक्षण एक ही इकाई के रूप में देखा जाए।

हमें केवल वृक्षारोपण की रस्म अदायगी से ऊपर उठकर बुंदेलखंड के चंदेलकालीन तालाबों जैसे पारंपरिक जल-प्रबंधन तंत्र को पुनर्जीवित करना होगा। ये तालाब केवल पानी का स्रोत नहीं थे, बल्कि वे स्थानीय पारिस्थितिकी को ठंडा रखने के विकेंद्रीकृत साधन थे।

नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि राजमार्गों के लिए काटे गए पेड़ केवल लकड़ी नहीं थे, बल्कि वे उस सूक्ष्म-जलवायु का हिस्सा थे जो फसलों को झुलसने से बचाती थी।

हमें विकास की अपनी परिभाषा को बदलना होगा। बुंदेलखंड में पत्थर खनन के लिए काटी गई हर पहाड़ी और उत्तराखंड में कंक्रीट के विस्तार के लिए नष्ट की गई हरियाली हमारे भविष्य की ठंडी हवाओं को रोक रही है।

आर्थिक लाभ की तुलना में गर्मी के कारण होने वाला स्वास्थ्य और कृषि का नुकसान कहीं अधिक है। भविष्य की नीतियों की सफलता अब इस जवाबदेही पर टिकी है कि हम बुनियादी ढांचे के निर्माण में ‘ग्रीन इंजीनियरिंग’ को कितनी प्राथमिकता देते हैं और पर्यावरण नियमों की अनदेखी को कब बंद करते हैं।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि पर्यावरण का संरक्षण अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा है। तभी हम इस मानव-निर्मित भट्टी से बाहर निकल पाएँगे और आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसी धरती दे पाएँगे जो केवल झुलसती नहीं, बल्कि जीवन भी प्रदान करती है। (Indiaclimatechange.com)

Mar 1, 2026

पर्व- संस्कृतिः स्वच्छता का पर्व है होली

- पंकज चतुर्वेदी 
होली भारत में किसी एक जाति, धर्म या क्षेत्र विशेष का पर्व नहीं है, इसकी पहचान देश की संस्कृति के रूप में होती है । वसंत ऋतु जनजीवन में नई चेतना का संचार कर रही होती है, फागुन की सुरमई हवाएँ वातावरण को मस्त बनाती हैं, तभी होली के रंग लोकजीवन में घुल जाते हैं । इन्हीं दिनों नई फसल भी तैयार होती है और किसानों के लिए यह उल्लास का समय होता है। तभी होली के बहाने नए अन्न की पूजा पूरे देश में की जाती है। यही नहीं पूरी दुनिया में होली की ही तरह  अलग-अलग समय में त्योहार मनाए जाते हैं, जिनका असल मकसद तनावों से दूर कुछ पल मौज-मस्ती के बिताना और अपने परिवेश  के गैरजरूरी सामान से मुक्ति पाना होता है। विडंबना है कि अब होली का स्वरूप भयावह हो गया है।

वास्तव में होली का अर्थ है – हो ली, यानी जो बीत गई सो बीत गई, अब आगे की सुध है। गिले-शिकवे  मिटाओ, गलतियों को माफ करो और एक दूसरे का रंगों में सराबोर कर दो- रंग प्रेम के, अपनत्व के, प्रकृति के। विडंबना है कि भारतीय संस्कृति की पहचान कहलाने वाला यह पर्व पर्यावरण का दुश्मन, नशाखोरी, रंग की जगह त्वचा को नुकसान पहुँचाने, आनंद की जगह भोंडे ऊधम के लिए कुख्यात हो गया है। पानी की बर्बादी और पेड़ों के नुकसान ने असल में हमारी आस्था और  परंपरा की मूल आत्मा को ही नष्ट  कर दिया है।

कहानियाँ, किवदंतियाँ कुछ भी कहें; लेकिन इस पर्व का वास्तविक संदेश तो – स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण ही है। यह दुखद है कि अब इस त्योहार ने अपना पारंपरिक रूप और उद्देश्य  खो दिया है और इसकी छवि पेड़ व हानिकारक पदाथों को जलाकर पर्यावरण को हानि पहुँचाने और रंगों के माध्यम से जहर बाँटने की बनती जा रही है; हालाँकि देश के कई शहरों और मुहल्लों में बीते एक दशक के दौरान होली को प्रकृति-मित्र के रूप में मनाने के अभिनव प्रयोग भी हो रहे हैं।  हमारा कोई भी संस्कार या उत्सव उल्लास की आड़ में पर्यावरण को क्षति की अनुमति नहीं देता।

होलिका दहन के साथ सबसे बड़ी कुरीति हरे पेड़ों को काटकर जलाने की है। वास्तव में होली भी  दीपावली की ही तरह खलिहान से घर के कोठार में फसल आने की ख़ुशी व्यक्त करने का पर्व है।  कुछ सदियों पहले तक ठंड के दिनों में भोज्य पदार्थ, मवेशियों के लिए चारा, जैसी कई चीजें भंडार कर रखने की परंपरा थी। इसके अलावा ठंड के दिनों में कम रौशनी  के कारण कई तरह का कूड़ा भी घर में ही रहा जाता था। याद करें कि होली में गोबर के बने उपले की माला अवश्य  डाली जाती है। असल में ठंड के दिनों में जंगल जाकर जलावन लाने में डर रहता था, सो ऐसे समय के लिए घरों में उपलों को भी एकत्र करके रखते थे।

चूँकि अब घर में नया अनाज आने वाला है सो, कंडे- उपले की जरूरत नहीं, तभी उसे होलिका दहन में इस्तेमाल किया जाता है। उपले की आँच धीमी होती है, लपटें ऊँची नहीं जातीं, इसमें नए अन्न – गेहूँ की बाली या चने के छोड़ (डण्ठल) को भूना भी जा सकता है, सो हमारे पूर्वजों ने होली में उपले के प्रयोग किए। दुर्भाग्य है कि अब लोग होली की लपटें आसमान से ऊँची दिखाने के लिए लकड़ी और कई बार प्लास्टिक जैसा जहरीला कूड़ा इस्तेमाल करते हैं।  एक बात और आदिवासी समाज में प्रत्येक कृषि  उत्पाद के लिए ‘नवा खाई’ पर्व होता है – जो भी नई फसल आई , उसके लिए प्रकृति का धन्यवाद। होली भी किसानों के लिए कुछ ऐसा ही पर्व है।

होलिका पर्व का वास्तविक समापन शीतला अष्टमी को होता है। पूर्णिमा की होली और उसके आठ दिन बाद अष्टमी  का यह अवसर! शक संवत का पहला महीना चैत्र और इसके कृष्ण  पक्ष पर  बासी खाना खाने का बसौड़ा। इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलता और एक दिन पहले ही पक्की रसोई यानी पूड़ी कचौड़ी, चने, दही बड़े आदि बन जाते हैं। सुबह सूरज उगने से पहले होलिका के दहन स्थल पर शीतला मैया को भोग लगाया जाता है।

स्कंद पुराण शीतलाष्टक  स्तोत्र  के अनुसार-

‘वन्देहं शीतलां देवींरासभस्थां दिगम्बराम। मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालड्कृतमस्तकाम।।’

अर्थात् गर्दभ पर विराजमान दिगम्बरा, हाथ में झाड़ू तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तकवाली भगवती शीतला की मैं वंदना करता हूँ।

 शीतला माता के इस वंदना मंत्र से स्पष्ट है कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में मार्जनी (झाड़ू) होने का अर्थ है कि समाज को भी सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए। कलश से तात्पर्य है कि स्वच्छता रहने पर ही स्वास्थ्य रूपी समृद्धि आती है। मान्यता के अनुसार, इस व्रत को रखने से शीतला देवी प्रसन्न होती हैं और व्रती के कुल में चेचक, खसरा, दाह, ज्वर, पीतज्वर, दुर्गधयुक्त फोड़े और नेत्रों के रोग आदि दूर हो जाते हैं।  हकीकत में संदेश यही है कि यदि स्वच्छता रखेंगे, तो ये रोग नहीं हो सकते।

तनिक गौर करें, होली का प्रारंभ हुआ, घर-खलिहान से कूड़ा-कचरा बुहारकर होली में जलाने से, पर्व में शरीर पर विभिन्न रंग लगाए और  फिर उन्हें छुड़ाने के लिए रगड़-रगड़कर स्नान किया। पुराने कपड़े फटे व नए वस्त्र धारण किए और समापन पर स्वच्छता की देवी की पूजा-अर्चना की। लोगों को अपने परिवेश  व व्यक्तिगत सफाई का संदेश दिया। गली-मुहल्ले के चौराहे  पर होली दहन स्थल पर बसौड़ा का चढ़ावा चढ़ाया, जिसे समाज के गरीब और ऐसे वर्ग के लोगों ने उठाकर भक्षण किया, जिनकी आर्थिक स्थिति उन्हें पौष्टिक आहार से वंचित रखती है। चूँकि भोजन ऐसा है, जो कि दो-तीन दिन खराब नहीं होना, सो वे घर में संग्रह कर भी खा सकते है और फिर यही लोग नई उमंग-उत्साह के साथ फसल की कटाई से लेकर अगली फसल के लिए खेत को तैयार करने का कार्य तपती धूप में भी लगन से करेंगे। 

इस तरह होली का उद्देश्य  समाज में समरसता बनाए रखना, अपने परिवेश  की रक्षा करना और जीवन में मनोविनोद बनाए रखना है, यही इसका मूल दर्शन  है।

साभार (indiaclimatechange)

Jun 1, 2025

पर्यावरणः गर्मी में भी घुट रही है दिल्ली की सांसें

  - पंकज चतुर्वेदी

पंजाब के सुदूर गाँव की रहने वाली इस युवती ने  हिन्दी में पी एचडी किया और दिल्ली के प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान में काम मिल गया। होली गुजरी ही थी कि उसकी साँस घुटने लगी। फिर शरीर पर एलर्जी उभरने लगी। जब दवा भी माकूल असर नहीं दिखा पाई, तो डॉक्टर ने कह दिया कि  इस मौसम में दिल्ली में न रहो। अजब है दिल्ली, जाड़े में स्मॉग से दम घुटता है और साँस की बीमारी के लोगों को कह दिया जाता है कि दिल्ली छोड़ दो ।

गर्मी आई तो भी साँसों का संकट यथावत। अब बरसात होती ही कितने दिन की है ? बहादुरगढ़ से फरीदाबाद और गुरुग्राम से गाजियाबाद-नोएडा तक फैले दिल्ली एनसीआर में। कोई  पाँच करोड़ की आबादी पर बढ़ते तापमान के साथ  शुद्ध पेय जल के साथ साफ हवा की कमी और गहरा रही हैं ।

कैसी विडंबना है कि जो पेड़ पर्यावरण सुधारने के इरादे से सड़क किनारे और सार्वजनिक स्थानों में लगाए गए वे ही लोगों के दम घुटने का कारक बन रहे हैं। सिरस, गुलमोहर, सफेदा,  शिरीष, आम, नीम, मोलसरी जैसे कई ऐसे पेड़ दिल्ली में छाए हैं, जिनके परागण से साँस की बीमारी पर चर्चा कम ही होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार पराग कणों की ताकत उनके प्रोटीन और ग्लाइकॉल प्रोटीन में निहित होती है, जो मनुष्य के बलगम के साथ मिल कर करके अधिक जहरीले हो जाते हैं।

ये प्रोटीन जैसे ही हमारे खून में मिलते हैं, एक तरह की एलर्जी को जन्म देते हैं। एक बात और कि हवा में परागणों के प्रकार और धनत्व का पता लगाने की कोई तकनीक बनी नहीं है। वैसे तो परागणों के उपजने का महीना मार्च से मई मध्य तक है: लेकिन जैसे ही जून-जुलाई में हवा में नमी का स्तर बढ़ता है:  तो पराग और जहरीले हो जाते हैं। हमारे रक्त में अवशोषित हो जाते हैं, जिससे एलर्जी पैदा होती है। यह एलर्जी इंसान को साँस की गंभीर बीमारी की तरफ ले जाती है। चूंकि गर्मी में ओजेन लेयर और मध्यम आकार के धूल कणों का प्रकोप ज्यादा होता है, ऐसे में परागण के शिकार लोगों के फेंफड़े  ज्यादा क्षतिग्रस्त होते हैं। 

इस मौसम में  दिल्ली के लोगों को साँस लेने के लिए साफ हवा का दूसरा अदृश्य सबसे बड़ा दुश्मन हैं वाहनों की बढ़ती संख्या। हर वाहन के चलने से टायर घिसते ही हैं और इससे टायर की रबर, उसको बनाने में लगे  गोंदयुक्त रसायन आदि के 2.5 पी एम के कण निकलते हैं। सड़क गरम होती है, तो घिसाई अधिक होती है और ऐसे में हवा न चलने पर ये कण मानव के आवासीय ऊँचाई तक ही सीमित रह जाते हैं ।

इसमें तड़का लगता है वाहन के लिए अनिवार्य एलईएडी बेतरी से निकलने वाले  रासायनिक जहरीले धुएँ का। भले ही यह वायु प्रदूषण ठंड  के दिनों की तरह  प्रत्यक्ष दिख नही रहे हों:  लेकिन मानव शरीर  पर इसकी घातकता उतनी ही हैं। देश की राजधानी के गैस चैंबर बनने में 43 प्रतिशत जिम्मेदारी धूल-मिट्टी व हवा में उड़ते मध्यम आकार के धूल कणों की है। दिल्ली में हवा की सेहत को खराब करने में गाड़ियों से निकलने वाले धुएँ से 17 फीसदी, पैटकॉक जैसे पेट्रो-इंधन की 16 प्रतिशत भागीदारी है। इसके अलावा भी कई कारण हैं जैसे कूड़ा जलाना व परागण आदि।

इस बार गरम हवाएँ  या लू जल्दी चल रही हैं और ऐसी हवा एक से डेढ़ किलोमीटर तेज गति से बहती है: इसी लिए मिट्टी के कण और राजस्थान -पाकिस्तान के रास्ते आई  रेत लोगों को साँस लेने में बाधक बनती है। अरावली को नुकसान पहुँचने से  सीमा पार से आने वाली रेत अब दिल्ली की हवा और आसमान को धुंधला बनाती है।

जितनी गर्मी होती है, दिल्ली महानगर में उससे जूझने के लिए वाहन, घर दफ्तरों में एसी का प्रयोग बढ़ जाता है।  एसी चलते हैं हाइड्रो क्लोरो फ्लोरो कार्बन गैस से जो कि पृथ्वी की ओज़ोन परत के लिए घातक है। यही नहीं,  इतने सारे वातानुकूलन संयत्र चलाने के लिए लगने वाली  बिजली उत्पादन से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है, जो जलवायु परिवर्तन में योगदान करते हैं। जलवायु परिवर्तन ओजोन परत को भी प्रभावित कर सकता है।

समझना होगा कि वायुमंडल में ओजोन का स्तर 100 एक्यूआई यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स होना चाहिए। लेकिन जाम से हलकान दिल्ली में यह आँकड़ा 190 तो सामान्य ही रहता है। वाहनों के धुएँ में बड़ी मात्रा में हाइड्रो कार्बन होते हैं और तापमान चालीस के पार होते ही यह हवा में मिलकर ओजोन का निर्माण करने लगते हैं। यह ओजोज इंसान के शरीर, दिल और दिमाग के लिए जानलेवा है। इसके साथ ही वाहनों के उत्सर्जन में 2.5 माइक्रो मीटर व्यास वाले पार्टिकल और गैस नाइट्रोजन ऑक्साइड है, जिसके कारण फेंफड़े बेहद कमजोर  हो जाते हैं ।

आखिर इससे निबटा कैसे जाए ? एक तो अब दिल्ली की सजावट के लिए जहाँ भी  हरियाली लगाई जाए , उसके लिए पेड़ों की प्रजातियाँ चुनते समय जलवायु परिवर्तन- गर्मी और  परागण की समस्या को ध्यान रखा जाए।  फिर सड़कों पर कम वाहन  निकलें, जाम न हो, इसकी योजना बने और कड़ाई से लागू हो। पानी का छिड़काव  एक ऐसा तरीका है जिससे काफी कुछ गर्मी और और उससे उपज रहे साँसों के संकट से जूझा जा सकता है। लाखों की संख्या  में चल रहे एसी और  करोड़ों की संख्या के  पानी के आर ओ  से निकलने वाले जिस पानी को हम बेकार समझ कर नाली में बहा  देते हैं, उसके जल संचयन और छिड़काव में इस्तेमाल से इस महा समस्या को कम किया जा सकता हैं ।( indiaclimatechange से साभार)

Apr 20, 2016

हमारी नदियोँ के किनारे फैला है

     
हमारी नदियोँ के किनारे फैला है

                                  ज्ञान और अध्यात्म का पाठ
                                    - पंकज चतुर्वेदी
बहुत पुरानी बात है, हमारे देश में एक नदी थी सिंधु। इस नदी की घाटी में खुदाई हुई तो मोहन जोदड़ों नाम का शहर मिला, ऐसा शहर जो बताता था कि हमारे पूर्वजों के पूर्वज बेहद सभ्य व सुसंस्कृत थे और नदियों से उनका शरीर-श्वांस का रिश्ता था। नदियों के किनारे समाज विकसित हुआ, बस्ती, खेती, मिट्टी व अनाज का प्रयोग, अग्नि का इस्तेमाल के अन्वेषण हुए।
मन्दिर व तीर्थ नदी के किनारे बसे, ज्ञान व अध्यात्म का पाठ इन्हीं नदियों की लहरों के साथ दुनिया भर में फैला। कह सकते हैं कि भारत की सांस्कृतिक व भावात्मक एकता का सम्वेत स्वर इन नदियों से ही उभरता है। इंसान मशीनों की खोज करता रहा, अपने सुख-सुविधाओं व कम समय में ज्यादा काम की जुगत तलाशता रहा और इसी आपाधापी में सरस्वती जैसी नदी गुम हो गई। गंगा व यमुना पर अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया।
बीते चार दशकों के दौरान समाज व सरकार ने कई परिभाषाएँ, मापदण्ड, योजनाएँ गढ़ीं कि नदियों को बचाया जाये, लेकिन विडम्बना है कि उतनी ही तेजी से पावनता और पानी नदियों से लुप्त होता रहा।
हमारे देश में 13 बड़े, 45 मध्यम और 55 लघु जलग्रहण क्षेत्र हैं। जलग्रहण क्षेत्र उस सम्पूर्ण इलाके को कहा जाता है, जहाँ से पानी बहकर नदियों में आता है। इसमें हिमखण्ड, सहायक नदियाँ, नाले आदि शामिल होते हैं।
जिन नदियों का जलग्रहण क्षेत्र 20 हजार वर्ग किलोमीटर से बड़ा होता है, उन्हें बड़ा-नदी जलग्रहण क्षेत्र कहते हैं। 20 हजार से दो हजार वर्ग किलोमीटर वाले को मध्यम, दो हजार से कम वाले को लघु जल ग्रहण क्षेत्र कहा जाता है। इस मापदण्ड के अनुसार गंगा, सिंधु, गोदावरी, कृष्णा, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, तापी, कावेरी, पेन्नार, माही, ब्राह्मणी, महानदी और साबरमति बड़े जल ग्रहण क्षेत्र वाली नदियाँ हैं। इनमें से तीन नदियाँ - गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र हिमालय के हिमखण्डों के पिघलने से अवतरित होती हैं। इन सदानीरा नदियों को ‘हिमालयी नदी’ कहा जाता है। शेष दस को पठारी नदी कहते हैं, जो मूलतः वर्षा पर निर्भर होती हैं।
यह आँकड़ा वैसे बड़ा लुभावना लगता है कि देश का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.80 लाख वर्ग किलोमीटर है, जबकि सभी नदियों का सम्मिलित जलग्रहण क्षेत्र 30.50 लाख वर्ग किलोमीटर है। भारतीय नदियों के मार्ग से हर साल 1645 घन किलोलीटर पानी बहता है जो सारी दुनिया की कुल नदियों का 4.445 प्रतिशत है। आँकड़ों के आधार पर हम पानी के मामले में पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा समृद्ध हैं, लेकिन चिन्ता का विषय यह है कि पूरे पानी का कोई 85 फीसदी बारिश के तीन महीनों में समुद्र की ओर बह जाता है और नदियाँ सूखी रह जाती हैं।
नदियों के सामने खड़े हो रहे संकट ने मानवता के लिये भी चेतावनी का बिगुल बजा दिया है, जाहिर है कि बगैर जल के जीवन की कल्पना सम्भव नहीं है। हमारी नदियों के सामने मूलरूप से तीन तरह के संकट हैं - पानी की कमी, मिट्टी का आधिक्य और प्रदूषण।
 धरती के तापमान में हो रही बढ़ोत्तरी के चलते मौसम में बदलाव हो रहा है और इसी का परिणाम है कि या तो बारिश अनियमित हो रही है या फिर बेहद कम। मानसून के तीन महीनों में बमुश्किल चालीस दिन पानी बरसना या फिर एक सप्ताह में ही अन्धाधुन्ध बारिश हो जाना या फिर बेहद कम बरसना, ये सभी परिस्थितियाँ नदियों के लिये अस्तित्व का संकट पैदा कर रही हैं।
बड़ी नदियों में ब्रह्मपुत्र, गंगा, महानदी और ब्राह्मणी के रास्तों में पानी खूब बरसता है और इनमें न्यूनतम बहाव 4.7 लाख घनमीटर प्रति वर्गकिलोमीटर होता है। वहीं कृष्णा, सिंधु, तापी, नर्मदा और गोदावरी का पथ कम वर्षा वाला है सो इसमें जल बहाव 2.6 लाख घनमीटर प्रति वर्गकिलोमीटर ही रहता है। कावेरी, पेन्नार, माही और साबरमति में तो बहाव 0.6 लाख घनमीटर ही रह जाता है। सिंचाई व अन्य कार्यों के लिये नदियों के अधिक दोहन, बाँध आदि के कारण नदियों के प्राकृतिक स्वरूपों के साथ भी छेड़छाड़ हुई व इसके चलते नदियों में पानी कम हो रहा है।
नदियाँ अपने साथ अपने रास्ते की मिट्टी, चट्टानों के टुकड़े व बहुत सा खनिज बहाकर लाती हैं। पहाड़ी व नदियों के मार्ग पर अन्धाधुन्ध जंगल कटाई, खनन, पहाड़ों को काटने, विस्फोटकों के इस्तेमाल आदि के चलते थोड़ी सी बारिश में ही बहुत सा मलबा बहकर नदियों में गिर जाता है।
परिणामस्वरूप नदियाँ उथली हो रही हैं, उनके रास्ते बदल रहे हैं और थोड़ा सा पानी आने पर ही वे बाढ़ का रूप ले लेती हैं। यह भी खतरनाक है कि सरकार व समाज इन्तजार करता है कि नदी सूखे व हम उसकी छोड़ी हुई जमीन पर कब्जा कर लें। इससे नदियों के पाट संकरे हो रहे हैं उसके करीब बसावट बढ़ने से प्रदूषण की मात्रा बढ़ रही है।
आधुनिक युग में नदियों को सबसे बड़ा खतरा प्रदूषण से है। कल-कारखानों की निकासी, घरों की गन्दगी, खेतों में मिलाए जा रहे रासायनिक दवा व खादों का हिस्सा, भूमि कटाव, और भी कई ऐसे कारक हैं जो नदी के जल को जहर बना रहे हैं। अनुमान है कि जितने जल का उपयोग किया जाता है, उसके मात्र 20 प्रतिशत की ही खपत होती है, शेष 80 फीसदी सारा कचरा समेटे बाहर आ जाता है। यही अपशिष्ट या माल-जल कहा जाता है, जो नदियों का दुश्मन है। भले ही हम कारखानों को दोषी बताएँ, लेकिन नदियों की गन्दगी का तीन चौथाई हिस्सा घरेलू मल-जल ही है।
आज देश की 70 फीसदी नदियाँ प्रदूषित हैं और मरने के कगार पर हैं। इनमें गुजरात की अमलाखेड़ी, साबरमती और खारी, हरियाणा की मारकंडा, मप्र की खान, उप्र की काली और हिण्डन, आन्ध्र की मुंसी, दिल्ली में यमुना और महाराष्ट्र की भीमा मिलाकर 10 नदियाँ सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं।
हालत यह है कि देश की 27 नदियाँ नदी के मानक में भी रखने लायक नहीं बची हैं। वैसे गंगा हो या यमुना, गोमती, नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, ब्रह्मपुत्र, झेलम, सतलुज, चेनाब, रावी, व्यास, पार्वती, हरदा, कोसी, गंडगोला, मसैहा, वरुणा, बेतवा, ढौंक, डेकन, डागरा, रमजान, दामोदर, सुवर्णरेखा, सरयू, रामगंगा, गौला, सरसिया, पुनपुन, बूढ़ी गंडक, गंडक, कमला, सोन एवं भगीरथी या फिर इनकी सहायक, कमोेबेश सभी प्रदूषित हैं और अपने अस्तित्व के लिये जूझ रही हैं।
दरअसल पिछले 50 बरसों में अनियंत्रित विकास और औद्योगीकरण के कारण प्रकृति के तरल स्नेह को संसाधन के रूप में देखा जाने लगा, श्रद्धा-भावना का लोप हुआ और उपभोग की वृत्ति बढ़ती चली गई। चूँकि नदी से जंगल, पहाड़, किनारे, वन्य जीव, पक्षी और जन-जीवन गहरे तक जुड़ा है, इसलिये जब नदी पर संकट आया, तब उससे जुड़े सभी सजीव-निर्जीव प्रभावित हुए बिना न रहे और उनके अस्तित्व पर भी संकट मँडराने लगा। असल में जैसे-जैसे सभ्यता का विस्तार हुआ, प्रदूषण ने नदियों के अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया।
राष्ट्रीय पर्यावरण संस्थान, नागपुर की एक रपट बताती है कि गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी सहित देश की 14 प्रमुख नदियों में देश का 85 प्रतिशत पानी प्रवाहित होता है। ये नदियाँ इतनी बुरी तरह प्रदूषित हो चुकी हैं कि देश की 66 फीसदी बीमारियों का कारण इनका जहरीला जल है। इस कारण से हर साल 600 करोड़ रुपए के बराबर सात करोड़ तीस लाख मानव दिवसों की हानि होती है।
अभी तो देश में नदियों की सफाई नारों के शोर और आँकड़ों के बोझ में दम तोड़ती रही हैं। बड़ी नदियों में जाकर मिलने वाली हिण्डन व केन जैसी नदियों का तो अस्तित्व ही संकट में है तो यमुना कहीं लुप्त हो जाती है व किसी गन्दे नाले के मिलने से जीवित दिखने लगती है। सोन, जोहिला, नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक से ही नदियों के दमन की शुरुआत हो जाती है तो कही नदियों को जोड़ने व नहर से उन्हें जिन्दा करने के प्रयास हो रहे हैं। नदी में जहर केवल पानी को ही नहीं मार रहा है, उस पर आश्रित जैव संसार पर भी खतरा होता है। नदी में मिलने वाली मछली केवल राजस्व या आय का जरिया मात्र नहीं है, यह जल प्रदूषण दूर करने में भी सहायक होती हैं।
 जल ही जीवन का आधार है, लेकिन भारत की अधिकांश नदियाँ शहरों के करोड़ों लीटर जल-मल व कारखानों से निकले जहर को ढोने वाले नाले का रूप ले चुकी हैं। नदियों में शव बहा देने, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को रोकने या उसकी दिशा बदलने से हमारे देश की असली ताकत, हमारे समृद्ध जल-संसाधन नदियों का अस्तित्व खतरे में आ गया है।
आज फिर तालाब की याद आ रही है
यह देश-दुनिया जब से है तब से पानी एक अनिवार्य जरूरत रही है और अल्प वर्षा, मरूस्थल, जैसी विषमताएँ प्रकृति में विद्यमान रही हैं- यह तो बीते दो सौ साल में ही हुआ कि लोग भूख या पानी के कारण अपने पुश्तैनी घरों-पिण्डों से पलायन कर गए। उसके पहले का समाज तो हर जल-विपदा का समाधान रखता था। अभी हमारे देखते-देखते ही घरों के आँगन, गाँव के पनघट व कस्बों के सार्वजनिक स्थानों से कुएँ गायब हुए हैं।
बावडिय़ों को हजम करने का काम भी आजादी के बाद ही हुआ। हमारा आदि समाज गर्मी के चार महीनों के लिए पानी जमा करना व उसे किफायत से खर्च करने को अपनी संस्कृति मानता था। वह अपने इलाके के मौसम, जलवायु चक्र, भूगर्भ, धरती संरचना, पानी की माँग व आपूर्ति का गणित भी जानता था। उसे पता था कि कब खेत को पानी चाहिए और कितना मवेशी को और कितने में कण्ठ तर हो जाएगा।
वह अपनी गाड़ी को साफ करने के लिए पाईप से पानी बहाने या हजामत के लिए चालीस लीटर पानी बहा देने वाली टोंटी का आदी नहीं था। भले ही आज उसे बीते जमाने की तकनीक कहा जाए, लेकिन आज भी देश के कस्बे-शहर में बनने वाली जन योजनाओं में पानी की खपत व आवक का वह गणित कोई नहीं आँक पाता है जो हमारा पुराना समाज जानता था।
राजस्थान में तालाब, बावडिय़ाँ, कुईं और झालार सदियों से सूखे का सामना करते रहे। ऐसे ही कर्नाटक में कैरे, तमिलनाडु में ऐरी, नागालैण्ड में जोबो तो लेह-लद्दाख में जिंग, महाराष्ट्र में पैट, उत्तराखण्ड में गुल, हिमाचल प्रदेश में कुल और जम्मू में कुहाल कुछ ऐसे पारम्परिक जल-संवर्धन के सलीके थे जो आधुनिकता की आँधी में कहीं गुम हो गए और अब आज जब पाताल का पानी निकालने व नदियों पर बाँध बनाने की जुगत अनुतीर्ण होती दिख रही हैं तो फिर उनकी याद आ रही है।
गुजरात के कच्छ के रण में पारम्परिक मालधारी लोग खारे पानी के ऊपर तैरती बारिश की बूँदों के मीठे पानी को 'विरदा' के प्रयोग से संरक्षित करने की कला जानते थे। सनद रहे कि उस इलाके में बारिश भी बहुत कम होती है। हिम-रेगिस्तान लेह-लद्दाख में सुबह बर्फ रहती है और दिन में धूप के कारण कुछ पानी बनता है जो शाम को बहता है। वहाँ के लोग जानते थे कि शाम को मिल रहे पानी को सुबह कैसे इस्तेमाल किया जाए।
तमिलनाडु में एक जल सरिता या धारा को कई-कई तालाबों की शृंखला में मोड़कर हर बूँद को बड़ी नदी व वहाँ से समुद्र में बेजा होने से रोकने की अनूठी परम्परा थी। उत्तरी अराकोट व चेंगलपेट जिले में पलार एनीकेट के जरिए इस 'पद्धति तालाब' प्रणाली में 317 तालाब जुड़े हैं। रामनाथपुरम में तालाबों की अन्तरशृंखला भी विस्मयकारी है।
पानी के कारण पलायन के लिए बदनाम बुन्देलखण्ड में भी पहाड़ी के नीचे तालाब, पहाड़ी पर हरियाली वाला जंगल और एक तालाब के ''ओने''  (अतिरिक्त पानी की निकासी का मुँह) से नाली निकालकर उसे उसके नीचे धरातल पर बने दूसरे तालाब से जोडऩे व ऐसे पाँच-पाँच तालाबों की कतार बनाने की परम्परा 900वीं सदी में चन्देल राजाओं के काल से रही है।
वहाँ तालाबों के आन्तरिक जुड़ावों को तोड़ा गया, तालाब के बन्धान फोड़े गए, तालाबों पर कालोनी या खेत के लिए कब्जे हुए, पहाड़ी फोड़ी गई, पेड़ उजाड़ दिए गए। इसके कारण जब जल देवता रुठे तो पहले नल, फिर नलकूप के टोटके किए गए। सभी उपाय जब हताश रहे तो आज फिर तालाबों की याद आ रही है।
यह जान लेना जरूरी है कि धरती पर इंसान का अस्तित्व बनाए रखने के लिए पानी जरूरी है तो पानी को बचाए रखने के लिए बारिश का संरक्षण ही एकमात्र उपाय है। यदि देश की महज पाँच प्रतिशत जमीन पर पाँच मीटर औसत गहराई में बारिश का पानी जमा किया जाए तो पाँच सौ लाख हेक्टेयर जमीन पर पानी की खेती की जा सकती है। इस तरह औसतन प्रति व्यक्ति 100 लीटर पानी प्रति व्यक्ति पूरे देश में दिया जा सकता है।
और इस तरह पानी जुटाने के लिए जरूरी है कि स्थानीय स्तर पर सदियों से समाज की सेवा करने वाली पारम्परिक जल प्रणालियों को खेाजा जाए, उन्हें सहेजने वाले, संचालित करने वाले समाज को सम्मानित किया जाए और एक बार फिर समाज को ' पानीदार' बनाया जाए। यहाँ ध्यान रखना जरूरी है कि आंचलिक क्षेत्र की पारम्परिक प्रणालियों को आज के इंजीनियर शायद स्वीकार ही नहीं पाएँ सो जरूरी है कि इसके लिए समाज को ही आगे किया जाए।
जल संचयन के स्थानीय व छोटे प्रयोगों से जल संरक्षण में स्थानीय लोगों की भूमिका व जागरुकता दोनों बढ़ेगी, साथ ही इससे भूजल का रिचार्ज तो होगा ही जो खेत व कारखानों में पानी की आपूर्ति को सुनिश्चित करेगा।(इंडिया वाटर पोर्टल से साभार)

Apr 21, 2012

विश्व पुस्तक दिवसः दूर हैं किताबें? क्या पाठकों से

-  पंकज चतुर्वेदी
नई टेक्नॉलॉजी ने भले ही ज्ञान के क्षेत्र में क्रांति ला दी है, लेकिन पुस्तकें आज भी विचारों के आदान- प्रदान का सबसे सशक्त माध्यम है। साथ ही आम आदमी के विकास हेतु जरूरी शिक्षा और साक्षरता का एकमात्र साधन किताबें ही हैं। यह सच है कि सूचनाओं के प्रसार में इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया मुद्रण माध्यमों पर भारी पड़ रहा है। पलक झपकते ही दुनिया के किसी भी कोने में कंप्यूटर या टीवी स्क्रीन पर सूचनाओं को पहुँचाया जा सकता है, लेकिन इस बात को भी स्वीकारना होगा कि किताबें सर्वाधिक आज्ञाकारी संयमित माध्यम है। पुस्तके पाठक को उनकी क्षमता के अनुरूप ज्ञान का आकलन करने और जानकारियों का गहराई तक विश्लेषण और समालोचना का मौका प्रदान करती है।
ऐसे ही कई सत्यों- तथ्यों को समाज स्वीकारता है। इसके बावजूद आज भी किताबें घर या बच्चों के लिए 'आवश्यक' की सूची में नहीं आ पाई हैं। विशेष रूप से हिन्दी पुस्तकों का बाजार 'स्वान्त: सुखाय' वाला हो गया है। कई वरिष्ठ और नवोदित लेखक अपना पैसा लगा कर 1000 किताबें छपवाते हैं। फिर यार- दोस्तों की चिरौरी कर अखबार- पत्रिकाओं में उनकी समीक्षा प्रकाशित करवाते हैं। जुगतबाजी कर कुछ सरकारी सप्लाई या फिर सरकार- पोषित पुरस्कार, केवल यहीं तक सिमट कर रह गई है पुस्तकों की दुनिया।
इसके विपरीत देश के बड़े हिस्से में बच्चों के लिए किताब का अर्थ पाठ्यक्रम की पुस्तकों से अधिक नहीं है। यदा- कदा जब वहाँ तक कुछ पठनीय पहुँचता है तो खरीदा भी जाता है और पढ़ा भी। जिस पर हिंदी के पुरोधा चिंता जताते हैं कि 'वर्दी वाला गुंडा' या 'मनोहर कलियाँ' लाखों में बिक रही हैं।
इससे यह भी तुरत- फुरत आकलन कर लिया जाता है कि समाज की पठन-  अभिरुचि सस्ते साहित्य में हो गई है। परंतु जब टीवी पर निर्मला, तमस, या फंतासी 'चंद्रकांता' सीरियल के रूप में आते हैं तो लोग तन्मयता से देखते हैं। जाहिर है कि किताबों तक पाठकों की पहुँच में कहीं बाधा जरूर है।
लेकिन यह भी तस्वीर का एक अर्ध- सत्य है। बानगी के तौर पर राजधानी दिल्ली के एक डिग्री कॉलेज में पढ़ाने वाली महिला के साथ अपने अनुभवों को साझा करना चाहूँगा। वे अपनी बेटी के लिए नेशनल बुक ट्रस्ट की चित्र पुस्तकों का सेट चाहती थीं, जिसकी कीमत बमुश्किल 75 रुपए होगी। उन्होंने छह महीने पहले मुझसे ये किताबें लाने को कहा था। फिर यदा- कदा जब मिलतीं तो उसके लिए याद दिलातीं। उक्त प्राध्यापिका अपनी इकलौती बेटी को आइसक्रीम खिलाने के लिए 16 किमी दूर कनॉट प्लेस तक कई बार ले गईं। छह महीने में तीन बार अप्पू घर और फन एंड फूड विलेज भी ले गईं, लेकिन किताबें खरीदने के लिए किसी दुकान पर जाने के लिए उन्हें समय नहीं मिला। जाहिर है कि उनके लिए किताबें प्राथमिक जरूरतों में से नहीं है।
यह घटना देश के आम मध्यम वर्ग की मानसिकता का साझा चित्र पेश करती है। बच्चों के मानसिक विकास की समस्याओं को आज भी गंभीरता से नहीं आँका जा रहा है। मध्य वर्ग अपने बच्चों की शिक्षा और मानसिक विकास के लिए अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ाई और अच्छा खाने- पिलाने से आगे नहीं सोच रहा है। यही कारण है कि 'अपने प्रिय को उपहार में पुस्तकें दें' का नारा व्यावहारिक नहीं बन पाया है।
इन दिनों दुनिया का व्यापारिक जगत, भारत में अपना बाजार तलाशने में लगा हुआ है। दैनिक उपभोग की एक चीज बिकते देख दर्जनों कंपनियाँ वही उत्पाद बनाने, बेचने लग जाती हैं। होड़ इतनी कि ग्राहकों को रिझाने के लिए छूट, ईनाम, फ्री सर्विस की झड़ी-  सी लगी हुई है। आप मुँह तो खोलें, वांछित चीज आपके दरवाजे पर होगी। आम आदमी की खरीद - क्षमता बढ़ रही है। पैसे के बहाव के इस दौर में भी किताबें दीन- हीन सी हैं। इतनी निरीह कि हिंदी प्रकाशक को तो अपनी पहचान का संकट सता रहा है। अभी एक साहित्यिक पत्रिका में हिंदी के नामी- गिरामी प्रकाशक का विज्ञापन छपा था। उक्त प्रकाशक ने प्रेमचंद से लेकर राजेन्द्र माथुर तक सब को छापा है। इसके बावजूद उसे अपने पते में लिखना पड़ता है कि 'सबलोक क्लिनिक के पास'। यानी साहित्य जगत के इतने बड़े नामों की तुलना में सबलोक क्लिनिक अधिक चर्चित और सुविख्यात है।
लुब्बेलुबाब यह है कि किताबों की लोकप्रियता में कई बातें आड़े आ रही हैं- प्रकाशकों में आम लोगों तक पुस्तके पहुँचाने की इच्छा शक्ति का अभाव, पढ़े- लिखे समाज का किताबों की अनिवार्यता को न समझना और बाजार की अनुपस्थिति। यह त्रासदी है कि निजी प्रकाशक की तरह ही नेशनल बुक ट्रस्ट, प्रकाशन विभाग और अन्य सरकारी प्रकाशक भी सरकारी खरीद पर निर्भर होते जा रहे हैं। कुछ साल पहले नेशनल बुक ट्रस्ट के तत्कालीन अध्यक्ष डा. सुमतीन्द्र नाडिग ने कहीं सार्वजनिक समारोह में कह दिया था कि सरकारी सप्लाई पठन अभिरुचि के विकास में बाधक है, सो इस पर रोक लगनी चाहिए। इस पर भारी हंगामा हुआ और सभी प्रकाशक खफा हो गए। वे किताबों के लिए डीलर, विक्रेता तलाशने के बनिस्बत एक जगह कमीशन देकर 'सरस्वती' का सौदा करना अधिक सहूलियतमंद समझते हैं। आखिर यह क्यों नहीं सोचा जाता कि 'वर्दी वाला...' या  'मधुर कलियाँ' की लाखों में बिक्री का एकमात्र कारण यह है कि वे हर गांव- कस्बे के छोटे- बड़े सभी मैगजीन स्टैंड पर बिकती है। तथाकथित दोयम दर्जे का साहित्य प्रकाशित करने वाला प्रकाशक जब इतनी दूर तक अपना नेटवर्क फैला लेता है तो सात्विक साहित्य क्यों नहीं ?
हमारे देश की तीन- चौथाई आबादी गाँवों में रहती है और दैनिक उपभोग का सामान बनाने वाली कंपनियाँ अपने उत्पादों का नया मार्केट वहाँ खंगाल रही है। दुर्भाग्य है कि किताबों को वहाँ तक पहुँचाने की किसी ठोस कार्य- योजना का अभी भी दूर- दूर तक अता- पता नहीं है। गाँव की जनता भले ही निरक्षर है, मगर वह सुसंस्कृत है। वह सदियों से दु:ख- सुख को झेलती आ रही है। इसके बावजूद वह तीस- चालीस रुपए की रामायण या सुखसागर वीपीपी से मँगवा कर सुख महसूस करता है। आजादी के 65 साल बाद भी गाँव वालों की रुचि परिष्कृत कर सकने वाली किताबें प्रकाशित नहीं हो सकीं हैं।
सन् 1996 में यूनेस्को की आम बैठक में यह निर्णय लिया गया कि प्रत्येक वर्ष 23 अप्रैल को 'विश्व पुस्तक दिवस' के रूप में मनाया जाएगा। इसके तहत दिल्ली व कुछ नगरों में कुछ सरकारी कार्यक्रम होते भी हैं। लेकिन अधिकतर में आम पाठक की भागीदारी नहीं होती है- कुछ मठाधीश किस्म के लेखक भाषण देते हैं, चिंता जताते हैं और आयोजन की औपचारिकता पूरी कर ली जाती है।
दावा किया गया कि दुनिया में सबसे ज्यादा किताबें हम छापते हैं। यानी बिकती भी हैं। फिर पाठक की निष्क्रियता क्यों थी?  'वेलेंटाइन डे' या 'न्यू ईयर' के प्रति जिस तरह का उत्साह समाज, सरकार और बाजार दिखाता रहा है, ठीक वैसा विश्व पुस्तक दिवस के प्रति भी उभरता तो कुछ उम्मीद की जा सकती थी। वरन हालत वही 'ढाक के तीन पात' रहेगी। किताबें छपेंगी, सरकारी खरीद की बदौलत आलमारियों में कैद होकर किताबें बिसुरेंगी, हर साल पुस्तक दिवस पर भाषणबाजी होगी, चिंता जताई जाएगी ताकि इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया पर अपना चेहरा दिखाया जा सके उसके बाद बस।
संपर्क- नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, 5 नेहरू भवन वसंत कुंज
       इंस्टीट्यूशनल एरिया, फेज-2, नई दिल्ली-110070
         मो. 09891928376,
      pankaj_chaturvedi@hotmail.com

Oct 23, 2010

औरत को मारने के बहाने

औरत को मारने के बहाने
- पंकज चतुर्वेदी
मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचलों में जमीन हदबंदी कानूनों के लचरपन और पंचायती राजनीति के नाम पर शुरू हुई जातीय दुश्मनियों की परिणति महिलाओं की हत्या के रूप में हो रही है।
बात उन दिनों की है जब संसद के भीतर संसद व अन्य विधायी संस्थाओं में महिलाओं के लिए एक- तिहाई आरक्षण की मांग पर हंगामा हो रहा था और मुदित मीडिया पूरे देश में अंर्तराष्ट्रीय महिला वर्ष के जश्नों की झलकियां दिखा रहा था। सब कुछ इतना चमकीला और चकाचौंध भरा था कि भारत में नारी- शक्ति पर किसी को भी गुमान हो जाता। ठीक उसी दिन में झारखंड के जसीडीह जिले के सिमडेगा थाना में गीता नामक एक महिला को भीड़ ने घेर कर मार डाला। भीड़ में केवल पुरुष ही नहीं थे, बड़ी संख्या में महिलाएं भी थीं।
महिला की नृशंस हत्या का कारण था गांव का एक बीमार बच्चा। गांव वाले गीता के पास गए कि वह बच्चे को ठीक कर दे, उसने अनभिज्ञता जाहिर की और बस लोगों ने उसे मार दिया। उस पर डायन होने का आरोप था। एक तरफ संसद में आरक्षण के रथ पर सवार हो कर पहुंचने की लालसा लिए नाचती-कूदती नारे लगाती महिलांए दूसरी तरफ 'गीताएं'। महिला सशक्तीकरण की तकरीर करने वालों को शायद यह पता भी नहीं है कि पूरे देश के कोई आधा दर्जन राज्यों में ऐसे ही हर साल सैंकड़ों औरतों को बर्बर तरीके से मारा जा रहा है। वह भी 'डायन' के अंधविश्वास की आड़ में।
मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचलों में जमीन हदबंदी कानूनों के लचरपन और पंचायती राजनीति के नाम पर शुरू हुई जातीय दुश्मनियों की परिणति महिलाओं की हत्या के रूप में हो रही है। कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर राज्य शासन ने एक जांच रिर्पोट तैयार की है जिसमें बताया गया है कि अंधविश्वास और अशिक्षा के कारण टोनही या डायन करार दे कर किस तरह निरीह महिलाओं की आदिकालीन लोमहर्षक ढंग से हत्या कर दी जाती है। औरतों को ना केवल जिंदा जलाया जाता है, बल्कि उन्हें गांव में नंगा घुमाना, बाल काट देना, गांव से बाहर निकाल देना जैसे निर्मम कृत्य भी डायन या टोनही के नाम पर होते रहते हैं। इन शर्मनाक घटनाओं का सर्वाधिक अफसोसजनक पहलू यह है कि इन महिला प्रताडऩाओं के पीछे ना सिर्फ महिला की प्रेरणा होती है, बल्कि वे इन कुकर्मों में बढ़- चढ़ कर पुरूषों का साथ भी देती हैं।
मध्यप्रदेश से अलग हुए आदिवासी बाहुल्य छत्तीसगढ़ राज्य में बैगा, गुनियाओं और ओझाओं के झांसे में आकर पिछले तीन वर्षों में तीन दर्जन से अधिक औरतों को मार डाला गया है। कोई एक दर्जन मामलों में आदमियों को भी ऐसी मौत झेलनी पड़ी है। मरने वालों में बूढ़े लोगों की संख्या ज्यादा है। किसी को जिंदा जलाया गया तो किसी को जीवित ही दफना दिया गया। किसी का सिर धड़ से अलग कर दिया गया तो किसी की आंखें निकाल ली गईं। ये आंकड़े मात्र वही हैं जिनकी सूचना पुलिस तक पहुंची। खुद पुलिस भी मानती है कि दर्ज नहीं हो पाए मामलों की संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक है। प्रशासन के रिकार्ड मुताबिक बीते तीन सालों के दौरान सरगुजा में आठ, बिलासपुर में सात, रायपुर में पांच, रायगढ़ में चार, राजनांदगांव व दंतेवाड़ा में दो- दो और बस्तर में एक ऐसा मामला कायम हुआ है। यहां जानना जरूरी है कि बस्तर, दंतेवाड़ा के बड़े हिस्से में पुलिस या नागरिक प्रशासन अभी तक नहीं पहुंच पाया है। यही वे क्षेत्र हैं जहां अंधविश्वास का कुहासा सर्वाधिक है। किसी गांव में कोई बीमारी फैले या मवेशी मारे जाएं या फिर किसी प्राकृतिक विपदा की मार हो, आदिवासी इलाकों में इसे 'टोनही' का असर मान लिया जाता है। भ्रांति है कि टोनही के बस में बुरी आत्माएं होती हैं, इसी के बूते पर वह गांवों में बुरा कर देती है । ग्रामीणों में ऐसी धारणाएं फैलाने का काम नीम- हकीम, बैगा या गुनिया करते हैं। छत्तीसगढ़ हो या निमाड़, या फिर झारखंड व उड़ीसा सभी जगह आदिवासियों की अंधश्रद्धा इन झाड़- फूंक वालों में होती है। इन लोगों ने अफवाह उड़ा रखी है कि 'टोनही' आधी रात को निर्वस्त्र हो कर श्मशान जाती है और वहीं तंत्र- मंत्र के जरिए बुरी आत्माओं को अपना गुलाम बना लेती है। उनका मानना है कि देवी अवतरण के पांच दिनों- होली, हरेली, दीवाली और चैत्र व शारदीय नवरात्रि के मौके पर 'टोनही' सिद्धि प्राप्त करती हंै। गुनियाओं की मान्यता के प्रति इस इलाके में इतनी अगाध श्रद्धा है कि 'देवी अवतरण' की रातों में लोग घर से बाहर निकलना तो दूर, झांकते तक नहीं हैं। गुनियाओं ने लोगों के दिमाग में भर रखा है कि टोनही जिसका बुरा करना चाहती है, उसके घर के आस- पास को वह अभिमंत्रित कर बालों के गुच्छे, तेल, सिंदूर, काली कंघी या हड्डी रख देती है।
अधिकांश आदिवासी गांवों तक सरकारी स्वास्थ्य महकमा पहुंच नहीं पाया है। जहां कहीं अस्पताल खुले भी हैं तो कर्मचारी इन पुरातनपंथी वन पुत्रों में अपने प्रति विश्वास नहीं उपजा पाए हैं। तभी मवेशी मरे या कोई नुकसान हो, गुनिया हर मर्ज की दवा होता है। उधर गुनिया के दांव- पेंच जब नहीं चलते हैं तो वह अपनी साख बचाने कि लिए किसी महिला को टोनही घोषित कर देता है। गुनिया को शराब, मुर्गे, बकरी की भेंट मिलती है बदले में किसी औरत को पैशाचिक कुकृत्य सहने पड़ते हैं। ऐसी महिला के पूरे कपड़े उतार कर गांव की गलियों में घुमाया जाता है, जहां चारों तरफ से पत्थर बरसते हैं। ऐसे में हंसिए से आंख भी फोड़ दी जाती है।
मप्र के झाबुआ- निमाड़ अंचल में भी महिलाओं को इसी तरह मारा जाता है; हां, नाम जरूर बदल जाता है- डाकन। गांव की किसी औरत के शरीर में 'माता' प्रविष्ट हो जाती है। यही 'माता' किसी दूसरी 'माता' को डायन घोषित कर देती है। और फिर वहीं अमानवीय यंत्रणाएं शुरू हो जाती हैं। अकेले झाबुआ जिले में हर साल 10 से 15 'डाकनों' की नृशंस हत्या होती हैं। इसी तरह के अंधविश्वास और त्रासदी से झारखंड, उड़ीसा, बिहार, बंगाल और असम के जनजातीय इलाके भी ग्रस्त हैं। रूरल लिटिगेशन एंड एंटाइटिलमेंट केंद्र नामक गैरसरकारी संगठन की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दे कर डायन- कुप्रथा पर रोक लगाने की मांग की गई थी, जिसे गत 12 मार्च 2010 को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि इस याचिका को हाईकोर्ट में लगाना चाहिए। संस्था ने आंकड़े पेश किए कि गत 15 सालों से देश के विभिन्न राज्यों में 2500 से अधिक औरतों को डायन करार दे कर मारा जा चुका है। ठेठ आदिम परंपराओं में जी रहे आदिवासियों के इस दृढ़ अंध विश्वास का फायदा इलाके के असरदार लोग बड़ी चालाकी से उठाते हैं। अपने विरोधी अथवा विधवा- बूढ़ी औरतों की जमीन हड़पने के लिए ये प्रपंच किए जाते हैं। थोड़े से पैसे या शराब की बदौलत गुनिया बिक जाता है और किसी भी महिला को टोनही घोषित कर देता है। अब जिस घर की औरत को 'दुष्टात्मा' बता दिया गया हो या निर्वस्त्र कर सरेआम घुमाया गया हो, उसे गांव छोड़ कर भागने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है। कई मौकों पर ऐसे परिवार की बहू- बेटियों के साथ गुनिया या असरदार लोग कुकृत्य करने से बाज नहीं आते हैं। यही नहीं अमानवीय संत्रास से बचने के लिए भी लोग ओझा को घूस देते हैं।
मप्र शासन की जांच रपट में कई रोंगटे खड़े कर देने वाले हादसों का जिक्र है। लेकिन अब अधिकारी सांसत में हैं कि अनपढ़ आदिवासियों को इन कुप्रथाओं से बचाया कैसे जाए। एक तरफ आदिवासियों के लिए गुनिया- ओझा की बात पत्थर की लकीर होती है, तो दूसरी ओर इन भोले- भाले लोगों के वोटों के ठेकेदार 'परंपराओं' में सरकारी दखल पर भृकुटियां तान कर अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहते हैं। गुनिया- ओझा का कोप भाजन होने से अशिक्षित आदिवासी ही नहीं, पढ़े- लिखे समाज सुधारक व धर्म प्रचारक भी डरते हैं। तभी इन अंचलों में सामुदायिक स्वास्थ्य, शिक्षा या धर्म के क्षेत्र में काम कर रहे लोग भी इन कुप्रथाओं पर कभी कुछ खुलकर नहीं बोलते कारण- गुनिया की नाराजगी मोल ले कर किसी का भी गांव में घुस पाना नामुमकिन ही है। कहने को झारखंड सरकार ने इस कुप्रथा के खिलाफ एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बनवाई थी, लेकिन गुनिया- ओझा के डर से उसका सही तरीके से प्रदर्शन भी नहीं हुआ। मिथ्या धारणाओं से ओत- प्रोत जनजातीय लोगों में औरत के प्रति दोयम नजरिया वास्तव में उनकी समृद्ध परंपराओं का हिस्सा नहीं है। यह तो हाल के कुछ वर्षों में उनके बीच बढ़ रहे बाहरी लोगों के दखल और भौतिक सुखों की चाहत से उपजे हीन संस्कारों की हवस मात्र है।
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