मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।
Showing posts with label मधु बी. जोशी. Show all posts
Showing posts with label मधु बी. जोशी. Show all posts

Feb 1, 2025

दो कविताएँ

- मधु बी. जोशी 

 1. एक सच के लिए


कमाती हूँ शब्द

जीवन से

जैसे कमाता है

चमड़ा चमार


गूँथती हूँ शब्द

अर्थ के उतरने 

के लिए

जैसे 

जूता गाँठता है

मोची


जीवन मथता है

मुझे अहर्निश

और

सम्भव करता है

एक सच

-----------

2. हवा


हवा

खिलाती है

फूल


बिखराती है

पराग


सहलाती है

पानी की चादर को


गीत ढालती है

वेणुवन में


तराशती है

चट्टानें


Oct 1, 2024

कविताः तीर्थ के साथ आते हैं पिता

  - मधु बी. जोशी


पिता के साथ 

आता था हरिद्वार

लाख के सुन्दर गिट्टों में

सुगढ़ गंगाजलियों में

लकड़ी के लुभावने खिलौनों 

शंख की सुन्दर मालाओं में


प्रसाद भी लाते थे पिता

मीठे इलायचीदाने

फीके मुरमुरे

तुलसीदल और फूल


प्रसाद बड़े लोगों की चीज था

वे श्रद्धा से उसे माथे लगाते

फिर मुँह में डालते

हम तो यूँ ही चबा जाते

इलायचीदाने और मुरमुरे

रोज बेचता था मालीराम

तुलसीदल और फूल

हमारी बाड़ी में बहुत थे

बड़े हुए तो जाना 

हरिद्वार 

एक व्यावसायिक कस्बा है

मन्दिर हैं वहाँ, 

मठ भी

महन्त और दुकानदार भी

मीठे इलायचीदाने

फीके मुरमुरे

तुलसीदल और फूल

सभी तीर्थनगरों की 

साझी सौगात हैं

 

आज भी आता है तीर्थ

लाख के सुन्दर गिट्टों,

सुगढ़ गंगाजलियों

लकड़ी के लुभावने खिलौनों 

शंख की सुन्दर 

मालाओं के साथ

 

तीर्थ के साथ आते हैं पिता


Mar 1, 2022

कविता- पहाड़ यात्रा

 - मधु बी. जोशी

1.

रोपणी 

ऊँची सड़क से

फूलों- सी दिखती

बहनों-बेटियों,

ऐसी ही फलो-फूलो

ऐसे ही गाती रहो

गीत सुख के, दुख के

बहन का मान रखने वाले गबरू

और मनमौजी अँछरियों के।

बनी रहे तुम्हारे हाथों की जीवनी

जमें रहें तुम्हारे पाँव घरती पर

हरे रहें तुम्हारे खेत।

2.

हहराती चली आई

कितनी बिसरी वनस्पति गंधें

दौड़े चले आए

कितने वृक्ष, 

लताएँ, क्षुप

जैसे साथी स्कूली दिनों के।

कुछ दिख जाते रहे कभी

किसी भीड़ में, 

उनके चेहरे याद थे

बात नहीं हुई थी उनसे 

स्कूल में भी कभी।

कुछ याद तक नहीं थे।

उनके बिना भी 

चलता रहा था जीवन

निर्बाध।

इतने समय बाद दिखे

वे जाने-बिसरे चेहरे

भरापूरा हो गया

मेरा जगत।


छोटे शहर की कहानियाँ 

(कथाकार जयशंकर के लिए)

एक जीवन में,

कितने जीवन।

एक कहानी में,

कितनी कहानियाँ।

एक मानुस में,

कितने कितने मानुस।