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Jul 1, 2026

प्रकृतिः कैलाश-मानसरोवर में भी है फूलों की घाटी

 - सीताराम गुप्ता

मानसरोवर यात्रा के दौरान दिल्ली से अल्मोड़ा, घारचूला, मांगटी, गाला, मालपा व लमारी होते हुए बुधि पहुँचते हैं। बुधि से गुंजी का सफ़र शुरू होता है। कभी गर्मी लगती है तो कभी ठंड। रास्ते के पहले भाग में खड़ी चढ़ाई है। पहले कुछ यात्रा पैदल तय की उसके बाद की कुछ यात्रा घोड़े पर सवार होकर। इतनी खड़ी चढ़ाई है कि घोड़े पसीना-पसीना हो जाते हैं। वैसे हमें क्या हक़ है कि हम निरीह पशुओं पर इतना अत्याचार करें वो भी धार्मिक यात्राओं के दौरान। पशुओं से काम लेने की भी एक सीमा होनी चाहिए। कल मैंने घोड़े की आँखों में ज़बरदस्त गुस्सा देखा था। लगता था विद्रोह करने ही वाला है। मैं सहम सा गया था। मैंने साथ चल रहे घोड़े के स्वामी परदेसी से घोड़े की आँखों में व्याप्त गुस्से का ज़िक्र किया।

     परदेसी ने बतलाया कि साथ वाले घोड़े-घोड़ियाँ आगे चले गए हैं और ये अकेला पीछे रह गया है इसी से गुस्से में है; लेकिन मैं स्पष्ट रूप से अनुभव कर रहा था कि उसका गुस्सा मुझ पर भी था। इन ख़तरनाक रास्तों पर घोड़े, खच्चर आदि जानवरों का चलना ही मुश्किल है पीठ पर सवारी बिठाकर अथवा बोझ लादकर चलना तो बहुत ही कष्टप्रद है इसमें संदेह नहीं। ख़ैर चलते-चलते छियालेख पहुँच जाते हैं। छियालेख पहुँचकर वहाँ  हमने सबसे पहले पूरी-छोले खाई और चाय पी।  छियालेख के बाद रास्ता कुछ ठीक है; लेकिन चढ़ाई-उतराई का क्रम समाप्त हो गया। ऐसी कोई बात नहीं; लेकिन कुछ रास्ता अपेक्षाकृत कम ऊँचा-नीचा था। यहाँ के लोगों के लिए तो ऐसा रास्ता समतल मैदान जैसा ही समझो। इसके बाद फूलों की घाटी आती है। छियालेख और गर्ब्यांग के बीच स्थित है यह फूलों की घाटी।

     इसे फूलों की घाटी ही कहा जाता है; लेकिन यह वो फूलों की घाटी नहीं है जो पर्यटन के लिए विश्व प्रसिद्ध है और जो उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में बद्रीनाथ के पास पुष्पावती नदी के समीप राज्य के चमोली ज़िले में पड़ती है। यह फूलों की घाटी उत्तराखंड से होकर गुज़रने वाली कैलाश-मानसरोवर यात्रा के मार्ग में पड़ती है जो राज्य के कुमाऊँ मंडल के पिथौरागढ़ ज़िले में स्थित है। उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में स्थित फूलों की घाटी एक विश्व प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है जो नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क का एक भाग है और ये यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित है। कुमाऊँ मंडल में छियालेख स्थित फूलों की घाटी एक स्वतंत्र पर्यटक स्थल नहीं है जहाँ पर्यटक इसे देखने के लिए आते हों और इसका कारण है मार्ग का अति दुर्गम होना।

     गढ़वाल मंडल में स्थित विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी तक पहुँचने के लिए गोविंद घाट से घंघरिया तक 16 किलोमीटर की यात्रा पैदल अथवा घोड़ों पर की जा सकती है। गोविंद घाट से घंघरिया तक हेलिकॉप्टर सेवा भी उपलब्ध है, जबकि कुमाऊँ मंडल में छियालेख स्थित इस दुर्गम फूलों की घाटी तक पहुँचने के लिए लंबी ट्रैकिंग अपेक्षित है। पहले यहाँ तक पहुँचने के लिए तीन दिन की ट्रैकिंग अपेक्षित थी; लेकिन अब यहाँ पास तक सड़कें बनाई जा रही हैं। लोग बतलाते हैं कि सड़कें बनाने से यहाँ के फूलों और औषधी

य पौधों और दूसरी वनस्पतियों को नुकसान भी पहुँच रहा है। इस फूलों की घाटी को भी विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित फूलों की घाटी की तरह ही संरक्षित किया जाना चाहिए। मुझे इन दोनों ही फूलों की घाटियों को देखने का सुअवसर मिला है। दोनों का अपना-अपना विशिष्ट सौंदर्य है।

     छियालेख उच्च हिमालय का प्रवेश द्वार है क्योंकि यहीं से उच्च हिमालय का प्रारंभ होता है। यहाँ से चलने के कुछ देर बाद फूलों की घाटी आती है। अगस्त-सितंबर के महीनों में लगभग चार किलोमीटर क्षेत्र में फैली छियालेख घाटी सैकड़ों प्रजातियों के मनमोहक फूलों से महक उठती है; क्योंकि यहाँ सामान्य पर्यटकों का आना असंभव है अतः केवल कैलाश-मानसरोवर यात्री अथवा स्थानीय व्यक्ति ही अपनी यात्रा के दौरान इस घाटी के अद्वितीय सौंदर्य का आनंद उठा सकते हैं। पहाड़ों की निचली ढलानों पर तथा घाटी से गुज़रने वाले रास्ते के आसपास विभिन्न प्रकार के असंख्य नन्हे-नन्हे फूल रंग-बिरंगी चादर-सी बिछी दिखलाई पड़ रही है। विविध आकार और वर्ण के फूल चारों और दृष्टिगोचर हो रहे हैं। ऐसे-ऐसे रंग के फूल कि पहले कभी भी कहीं देखे ही नहीं। नीले, पीले, सफ़ेद, बैंगनी और न जाने कितने रंगों के ख़ूबसूरत फूल।

     कुछ फूलों का रंग तो ऐसा पारदर्शी नीला, कि लगता हैं मानो अभी-अभी नील मिले पानी में डुबोकर निकाले गए हों। सभी रंगों के फूलों में पर्याप्त विविधता है; लेकिन नीले रंग के फूलों में इतनी अधिक विविधता है कि रंगों की सूची बनाना भी संभव नहीं। इनमें से अनेक प्रजातियाँ औषधीय गुणों से भी युक्त हैं। फूल तो फूल उनके पौधों की पत्तियाँ भी विविधता व विशिष्टता लिए हुए ही हैं। एक बात ज़रूर है और वो ये कि फूल अपेक्षाकृत छोटे आकार के हैं। 

     बुधि कैंप में भी डेलिया व होलीहॉक्स व अन्य कई क़िस्म के फूलों के पौधे लगे हुए थे; लेकिन ये पूर्ण विकसित बड़े आकार के थे।   

 फूलों की घाटी और अन्य पेड़-पौधे व वनस्पतियाँ यात्रा मार्ग को अविस्मरणीय बना देती हैं।

सम्पर्कः ए.डी. 106 सी., पीतमपुरा, दिल्ली – 110034, मोबा- नं. 9555622323, Email : srgupta54@yahoo.co.in


Apr 1, 2026

आलेखः जीवन के उत्तरकाल को सहजता से जीना सीखें

 - सीताराम गुप्ता

जीवन के उत्तरकाल में व्यक्ति की मनोदशा में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। वह शेष जीवन में बहुत कुछ और बहुत अच्छा करना चाहता है। पिछले दिनों मेरे एक मित्र के जन्मदिन की पचहत्तरवीं वर्षगाँठ थी। पचहत्तरवीं वर्षगाँठ की पूर्वसंध्या पर उन्होंने एक संदेश भेजा - मैं कल से वाट्सएप का प्रयोग नहीं करूँगा अतः कृपया वाट्सएप पर मुझे कोई संदेश न भेजें। बहुत ज़रूरी हो तो आप मुझे फोन कर सकते हैं। इससे एक सप्ताह पूर्व भी उनका एक संदेश आया था कि एक सप्ताह बाद वे पचहत्तर वर्ष के हो जाएँगे और सभी लोग उनके लिए प्रार्थना करें कि वे अपना शेष जीवन सांसारिक मोह-माया से मुक्त होकर व्यतीत कर सकें। हमारे यहाँ जीवन को चार अवस्थाओं में विभक्त किया गया है - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व संन्यास। यदि हम इस दृष्टि से देखें तो पचहत्तर वर्ष की आयु के उपरांत संन्यास की अवस्था प्रारंभ हो जाती है। पारंपरिक वैदिक रीति से जीवन व्यतीत करने की आकांक्षा उत्तम है लेकिन यह विचार करना भी अनिवार्य है कि आज की परिस्थितियों में यह कहाँ तक संभव अथवा उपयुक्त है?

     आज परिस्थितियाँ बहुत बदल चुकी हैं। आज की परिस्थितियों में हजारों वर्ष पूर्व की दिनचर्या अथवा जीवनचर्या का पालन करना कठिन ही नहीं असंभव है। पुरातन परंपरा के अनुसार पचहत्तर वर्ष के बाद की अवस्था संन्यास की है जिसमें घर-बार छोड़कर जंगल में जाकर जीवन व्यतीत करना होता है। क्या आज ये संभव है? यदि हम संन्यास ले लेंगे, तो कहाँ जाएँगे? जंगलों में जहाँ वन्य जीवों के लिए ही स्थान कम पड़ रहा है, वहाँ मनुष्य द्वारा जंगलों में जाकर अपना शेष जीवन व्यतीत करने की सोचना भी उचित प्रतीत नहीं होता। जो लोग एक निश्चित उद्देश्य के लिए कम आयु में ही संन्यास लेकर संन्यस्थ जीवन व्यतीत कर रहे हैं उनमें से शायद ही कोई सही अर्थों में संन्यासी हो। वैसे भी संन्यस्थ जीवन का पालन तभी उचित लगता है जब उससे पूर्व का जीवन भी उसी पद्धति से अवस्थानुकूल व्यतीत किया गया हो।

     यदि जीवन के अंतिम क्षणों तक सामान्य रीति से जीवन व्यतीत हो जाए तो उसमें भी कोई दोष दिखलाई नहीं पड़ता। वास्तव में बहुत सामान्य बने रहना ही लोगों के लिए कठिन होता है क्योंकि वे निर्लिप्त, विरक्त अथवा मोह-माया से मुक्त आदि होना नहीं चाहते अपितु घर-परिवार और समाज को ऐसा कुछ दिखाना चाहते हैं जिससे उनकी समाज में एक विशेष छवि बन जाए। न शरीर की आवश्यकताओं की उपेक्षा संभव है, न मन की इच्छाओं की। अच्छा तो यही है कि जीवन को जितना संतुलित कर सकते हैं करें, शेष सामान्य रीति से घटित होने दें। जहाँ तक सुविधाओं और तकनीक के प्रयोग का प्रश्न है इनका विवेकपूर्ण प्रयोग करने में कोई दोष नहीं। जैसे-जैसे आयु बढ़ती है वैसे-वैसे इन सब चीजों से हमें आसानी ही होती है। आज के व्यस्त जीवन में संचार के आधुनिक विकसित साधनों का कितना महत्त्व है यह बतलाने की आवश्यकता नहीं। है। आयु बढ़ने के साथ तो कई सुविधाएँ अत्यावश्यक की श्रेणी में सम्मिलित हो जाती हैं।

     यदि वाट्सएप की ही बात करें, तो ये एक अत्यंत उपयोगी माध्यम है। यदि हम इसके द्वारा निरर्थक मेल भेजने में लगे रहते हैं, तो ये हमारा दोष है न कि वाट्सएप का। यदि हम आयु के किसी पड़ाव पर निर्णय लेते हैं कि अब हम वाट्सएप अथवा अन्य संचार सुविधाओं का उपयोग नहीं करेंगे तो इसका एक अर्थ ये भी निकलता है कि अब तक हम इनका अत्यधिक उपयोग अथवा दुरुपयोग कर रहे थे। वास्तव में इन सब बातों पर समय रहते विचार करना अनिवार्य होता है। हाँ, वाट्सएप, फेसबुक अथवा अन्य सुविधाएँ एक लत बन गई हैं, तो उन्हें छोड़ने का निर्णय उत्तम होगा इसमें संदेह नहीं। हमारे लिए उचित तो यही होगा कि हम ग़लत अथवा अनुपयोगी चीजों अथवा आदतों को छोड़कर अन्य उपयोगी अथवा आवश्यक चीजों को अपना भी लें। घोर व्यावसायिक वृत्ति को त्याग दें लेकिन हमारी रचनात्मकता में किसी भी कीमत पर कमी नहीं आनी चाहिए। इससे स्वयं का विकास भी होगा और समय भी अच्छा व्यतीत होगा।

     यदि हम अकेले अथवा जीवनसाथी के साथ परिवार से अलग रहते हैं तथा घर के काम में सहायता के लिए सर्वेंट अथवा मेड रखते हैं तो क्या उन्हें भी हटा देंगे? यदि हम पेंशनर हैं, तो क्या पेंशन लेना भी बंद कर देंगे? शायद ये सब संभव न हो; क्योंकि आज के युग में पैसों के बिना किसी का जीवन नहीं चल सकता। साधु-संन्यासियों का भी नहीं। फिर केवल कुछ बातों के विषय में भावनात्मक निर्णय क्यों? एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न और भी है और वह यह है कि यदि हम अपने जीवनसाथी के साथ रहते हैं, तो क्या उसको भी ऐसा करने की छूट देते हैं? प्रायः ऐसा होता है कि हम अपने जीवनसाथी अथवा परिवार को तो यथावत सब करने की छूट दे देते हैं; लेकिन स्वयं महात्मा बनने का नाटक करते रहते हैं। ऐसी नाटकीयता का कोई लाभ नहीं। यथार्थ से पलायन भी हमारी समस्याओं को बढ़ा देता है। वास्तविकता को स्वीकार कर लेने से बहुत- सी समस्याएँ उत्पन्न ही नहीं होतीं।

     वास्तव में जब तक जीवन है इस संसार में मोह-माया की पूर्णतः उपेक्षा संभव ही नहीं। मोह के कारण ही हम आपस में जुड़े हुए हैं। स्पष्ट है कि सेवानिवृत्ति अथवा साठ-सत्तर अथवा पचहत्तर-अस्सी वर्ष की आयु के बाद भी हमें इसी दुनिया में रहना है, तो फिर इस आकर्षक संसार से जान-बूझकर विरक्ति अथवा पलायन क्यों? ऐसा भी संभव है कि अधिक मोह-माया की मुक्ति के नाटक के कारण हम कहीं के भी न रह पाएँ। कुछ लोगों की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी होती है कि वे कोई भी सहायक आसानी से रख सकते हैं। मेरा मानना है कि यदि आपके पास पहले से कोई सहायक नहीं है और आपको कार्य करने में असुविधा होती है, तो कोई न कोई सहायक रख लीजिए। इससे न केवल आपको जीवन में सुविधा हो जाएगी; अपितु किसी ज़रूरतमंद को रोजगार भी मिल जाएगा।

     प्रायः अधिकतर लोग कुछ सकारात्मक व्यावहारिक कदम उठाने की बजाय ऊलजलूल निर्णय ले बैठते हैं। कई लोग न तो आत्म-प्रदर्शन व आत्म-प्रशंसा का लोभ छोड़ पाते हैं और न ही दूसरों के द्वारा प्रशंसा पाने का लोभ ही छोड़ पाते हैं; इसलिए वे लोग कुछ ऐसा करना चाहते हैं, जिससे वे चर्चा में बने रह सकें अथवा लोगों की प्रशंसा पा सकें बेशक उनके कार्य कितने ही अनुपयोगी अथवा अव्यावहारिक क्यों न हों। कई लोगों की आदत होती है कि भजन-कीर्तन करते हुए अथवा माला फेरते हुए भी न केवल इधर-उधर देखते रहते हैं; अपितु बच्चों को डाँटने-डपटने के साथ-साथ दूसरे लोगों को निर्देश भी देते रहते हैं। ऐसी नाटकीयता का कोई लाभ नहीं। हमें हर तरह के आडंबर व पाखंड तथा आत्म-प्रदर्शन व आत्म-श्लाघा से दूर रहने और एक व्यावहारिक व सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास करना चाहिए। 

     आयु के साथ-साथ कुछ गतिविधियाँ अथवा कुछ चीजें स्वतः छूट जाती हैं। ऐसे में हमें उपयोगी वस्तुओं और सुविधाओं की बजाय निरर्थक चीजों से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए। कुछ लोग एक अवस्था के बाद हर काम करना छोड़ देते हैं अथवा किसी भी बात में रुचि नहीं लेते। जब तक जीवन है हमें न केवल काम करते रहना चाहिए अपितु इस सुंदर संसार की हर बात में रुचि भी बनाए रखनी चाहिए। शरीर और मन को स्वस्थ रखने के लिए दोनों चीजें अनिवार्य हैं। वास्तव में लोग आयु के बढ़ने से बूढ़े नहीं होते अपितु इसलिए बूढ़े हो जाते हैं कि उनके पास जीवन को जीने का कोई लक्ष्य नहीं होता। जेआरडी टाटा, डॉ. मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया अथवा एमएफ हुसैन आदि महानुभावों ने लंबी आयु पाई व जीवन की अंतिम साँस तक कार्य किया और अपने अंतिम दिनों में जो कार्य किया, वह उनके पिछले कार्यों के मुकाबले में भी बहुत बेहतर था। यही वास्तविक संन्यास है; क्योंकि संन्यासी भी समाज को कुछ देने के लिए ही इस क्षेत्र में पदार्पण करते हैं। अंतिम दिनों में समाज को अपना सर्वस्व दे देने से अच्छा कुछ भी नहीं।

     सादगी से जीवन जीना अच्छी बात है; लेकिन सादगी का अर्थ अकर्मण्यता अथवा पलायन नहीं होता। सादगी से तात्पर्य कंजूसी अथवा असामान्य अवस्था में रहना भी नहीं है। अच्छे ढंग से रहने और अच्छे कपड़े पहनने में भी कोई बुराई नहीं होती। सलीके से रहना और कार्य करना न केवल व्यक्ति के आत्मविश्वास में वृद्धि करता है अपितु समाज में भी यथोचित सम्मान दिलवाता है। कई बार सादगी अथवा विशेष रीति से जीवन जीने के लिए हम परिवार के सदस्यों अथवा समाज के लिए मुसीबतें खड़ी कर देते हैं जो किसी भी तरह से ठीक नहीं कहा जा सकता। अपनी उपयोगिता कभी नष्ट नहीं होने देनी चाहिए। अधिक नाटकबाजी और अपनी अनुपयोगिता के कारण ही अधिकतर लोग संबंधों के कूड़ेदान में फेंके जाने को अभिशप्त होते हैं। सादगी व्यवहार व चरित्र में होनी चाहिए, न कि वस्त्रों में। साधारण अथवा अवसरानुकूल वस्त्रों के अभाव में एक बड़ा विद्वान् भी सभा में अपेक्षित सम्मान नहीं पाता है।

     हमें स्वयं को संकुचित दायरे में डालने की बजाय स्वयं में घर-परिवार और समाज के लिए और अधिक व्यापक दृष्टि व सहयोग की भावना का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। यदि हम समाज में रहते हैं, तो उससे कटकर नहीं रह सकते। घर-परिवार व समाज से जुड़े रहने के लिए भी साधनों की उपेक्षा संभव नहीं। बढ़ती आयु के साथ-साथ व्यक्ति को दूसरे लोगों के साथ और सहयोग की अपेक्षाकृत अधिक आवश्यकता होती है। यदि बड़ी आयु में हम सचमुच जीवन को अधिक सार्थक व गरिमापूर्ण बनाना चाहते हैं, तो हमें अपनी संकीर्ण मनोवृत्ति को त्यागकर उसे अधिकाधिक व्यापक बनाना चाहिए। हमारी स्वीकार्यता घटने के बजाय बढ़नी चाहिए। इस अवस्था तक पहुँचते-पहुँचते मनुष्य अनुभवों की खान बन जाता है। उसके अनुभवों तथा उसकी योग्यता और क्षमता का उपयोग सीमित न रहकर, पूरे समाज के लिए होना चाहिए। संकुचित दृष्टिकोण रखने वाला अथवा एकाकी जीवन व्यतीत करने की आकांक्षा रखने वाला व्यक्ति परिवार, समाज अथवा राष्ट्र को शायद ही कुछ दे पाए!■

सम्पर्कः  ए.डी. 106 सी., पीतमपुरा, दिल्ली- 110034, मो. 9555622323, Email : srgupta54@yahoo.co.in


Feb 1, 2026

आलेखः प्रभावशाली बनना है तो दूसरों को महत्त्व दीजिए

 - सीताराम गुप्ता

    हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी के विषय में कहा जाता है कि देवनागरी विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है। इस लिपि की अनेक विशेषताएँ हैं। इसकी एक विशेषता है संयुक्त वर्णों अथवा व्यंजनों का होना जैसे श्र, प्र, क्र, ग्र, द्र, म्र आदि। जब दो व्यंजन मिलाकर लिखे जाते हैं, तो उनमें भी एक विशेषता उत्पन्न हो जाती है। संयुक्त व्यंजनों में पहला वर्ण आकार में प्रायः पूर्ववत अर्थात् अपरिवर्तित रहता है लेकिन उसमें जुड़ने वाला वर्ण आकार में बहुत छोटा हो जाता है। मज़े की बात ये है कि जो वर्ण पूरा नज़र आता है वो आधा अथवा हलंत होता है और जो छोटा नज़र आता है, वह पूरा, सस्वर अथवा स्वरसहित होता है। ऐसे वर्ण जो किसी वर्ण के नीचे के भाग अथवा पैर की तरफ़ लगाए जाते हैं पदेन वर्ण कहलाते हैं। स्थान पैरों में लेकिन रुतबा अथवा प्रभाव पैरों वाले से अधिक। उपर्युक्त स्थिति वर्णों अथवा व्यंजनों पर ही लागू नहीं होती; अपितु हम सब पर भी लागू होती है। जब हम किसी के पैरों के पास बैठ जाते हैं तो कुछ अधिक बड़े हो जाते हैं।

     सुनने में यह अविश्वसनीय अथवा विचित्र लग सकता है लेकिन ये सच है क्योंकि पैरों के पास बैठना साधना अथवा तपस्या जैसा होता है जो बहुत बड़ी बात है। किसी के पैरों के पास बैठने के लिए व्यक्ति को झुकना पड़ता है। झुकना अथवा किसी के पैरों के पास बैठना सरल नहीं होता; क्योंकि ये केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं अपितु मनुष्य के जीवन की एक अत्यंत विकसित अवस्था होती है। इसके लिए व्यक्तित्व में तरलता अनिवार्य है। केवल शरीर में ही लोच नहीं होनी चाहिए अपितु विचारों में भी लचीलापन व सकारात्मकता होनी चाहिए। जब तक हम क्षुद्रता का त्याग करके स्वयं में दूसरों को महत्त्व देने की योग्यता अथवा क्षमता विकसित नहीं कर लेते तब तक हम दूसरों को महत्त्व नहीं दे सकते। दूसरों के सामने छोटा बनकर उन्हें महत्त्व देने का अर्थ है कि हम उन्हें अपने अनुकूल बना रहे हैं। जब तक कोई व्यक्ति हमारे अनुकूल नहीं होता उसके साथ अच्छे संबंध बनाना भी संभव नहीं होता। इस प्रकार से दूसरों को महत्त्व देने का अर्थ है अच्छे संबंधों का विकास। और संबंध अच्छे हों तो छोटे-बड़े का भेद भी समाप्त हो जाता है।

     जब तक हममें किसी भी दृष्टि से बड़े होने का दंभ बना रहता है, हम किसी के पैरों के पास नहीं बैठ सकते अतः बड़े नहीं हो सकते। जब हम किसी के सामने झुक जाते हैं तो हम छोटे नज़र आने लगते हैं लेकिन वास्तव में झुकने अथवा छोटा होने पर ही हम बड़े हो जाते है। बड़े होने की इस प्रक्रिया में हम स्वतः अहंकार से मुक्त हो जाते हैं। अहंकार के साथ-साथ दूसरे विकार भी तिरोहित हो जाते हैं। जब हम किसी के साथ जुड़ते हैं अथवा साथ रहते हैं या उनके साथ मिलकर काम करते हैं तब हमें उनके सामने स्वयं को बड़ा न मानकर उन्हें अधिक महत्त्व देना चाहिए। इससे हमारा महत्त्व अथवा बड़प्पन कम नहीं होगा अपितु हम जिनके साथ जुड़े हैं वे भी न केवल सहजता से हमारे साथ जुड़ जाएँगे अपितु उनका पूरा सहयोग भी हमें मिलना प्रारंभ हो जाएगा। जब हम किसी के सामने छोटे होकर उसको महत्त्व देंगे तो हम छोटे होकर भी महत्त्वपूर्ण ही नहीं अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित भी हो जाएँगे। आध्यात्मिक ही नहीं भौतिक उन्नति के लिए भी यह अनिवार्य है।

     गुरु नानक देव जी ने कहा है - नानक नन्हे ही रहो जैसे नन्ही दूब, बड़े बड़े बह जात हैं दूब ख़ूब की ख़ूब। गुरु नानक देव जी का कहना है कि यदि दूब जैसे नन्हे बने रहोगे तो तुम्हारा कभी कुछ नहीं बिगड़ेगा। दूब एक प्रकार की घास होती है जिसकी कई विशेषताएँ होती हैं। दूब नन्ही अथवा छोटी होती है। साथ ही वह कोमल भी बहुत होती है। जब हम उसके ऊपर चलते हैं तो वह चुपचाप दब जाती है और उसके ऊपर से पैर हटते ही वह पुनः उठ खड़ी होती है। आँधी-तूफ़ान, बाढ़ अथवा तेज़ बारिश में बड़े-बड़े पेड़ उखड़कर नष्ट हो जाते हैं लेकिन नन्ही कोमल दूब का कुछ नहीं बिगड़ता। अपने लघु आकार व कोमल स्वभाव के कारण ही दूब कभी नष्ट नहीं होती। दूब इतनी नन्ही होती है कि कोई उससे ईर्ष्या-द्वेष नहीं करता। जब हम दूब की तरह हो जाएँगे तो हमसे भी कोई ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखेगा जिससे हमारे हर प्रकार के विकास का मार्ग निर्बाध बना रहेगा।

      दूब का रंग भी आकर्षक व ताज़गी प्रदान करने वाला होता है। वह आँखों में चुभता नहीं है। दूब को देखकर ही आँखें तृप्त हो जाती हैं। दूब के ऊपर ही नहीं उसके आसपास चलने वालों को भी प्रसन्नता की अनुभूति होती है। ये सब लघुता की विशेषताएँ हैं। दूब इतनी नन्ही होती है कि दूसरों को उसके सामने कुछ बड़ा होने का एहसास बना रहता है। यदि हमारे लघु बने रहने से किसी को बड़ा अथवा महत्त्वपूर्ण बने रहने की ख़ुशी मिल जाती है अथवा हमारे सान्निध्य में कोई महत्त्वपूर्ण अनुभव करता है तो हमारे लिए इससे अच्छी बात क्या हो सकती है! यदि बड़ा होना है तो आकार को नहीं आचरण को महत्त्व देना होगा। हमारे आचरण का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है हमारी वाणी अतः हमारी वाणी में भी लघुता होनी चाहिए अर्थात् हमें विनम्र होना चाहिए। हम विनम्र बने रहते हैं तो हम न केवल नष्ट नहीं होते अपितु सीखते भी हैं।

     विनम्र हुए बिना कोई कुछ नहीं सीख सकता। कम से कम उदात्त जीवन मूल्य तो नहीं सीख सकता। विनम्रता के अभाव में जीवन जीने की कला नहीं सीखी जा सकती। जिसमें विनम्रता नहीं होती उसे कोई सही व्यक्ति अपने पास नहीं बिठाता। कोई ऐसे व्यक्ति को नहीं सिखाता। जो सिखाने वाले को जितना अधिक मान देता है, जितना उसके सामने विनम्र होकर बैठता है, उतना ही अधिक सीखता है। उर्दू शायर ‘जिगर’ मुरादाबादी ने कहा है - हरीमे-हुस्ने-मानी है ‘जिगर’ काशाना-ए-‘असग़र’, जो बैठो  बाअदब होकर  तो उठो बाख़बर होकर। जब तक हममें बाअदब अर्थात् विनम्र व शिष्ट होकर गुरु के चरणों में बैठने की योग्यता उत्पन्न नहीं होती, हम बाख़बर अर्थात् अभिज्ञ व ज्ञानवान नहीं हो सकते। नवाज़ देवबंदी ने भी कहा है - जूते सीधे कर दिए थे एक दिन उस्ताद के, उसका बदला ये मिला तक़दीर सीधी हो गई। जिसने उस्ताद के जूते सीधे करने व उनके क़दमों में जगह बना लेने की क़ाबिलियत हासिल कर ली उसकी तक़दीर अथवा ज़िंदगी का सँवरना या सफलता मिलना अत्यंत सरल हो जाता है।■

सम्पर्कः ए.डी. 106 सी., पीतमपुरा, दिल्ली- 110034, मो. 9555622323, Email :srgupta54@yahoo.co.in


Sep 1, 2025

प्रसंगः गुरु साध्य नहीं उत्प्रेरक तत्त्व मात्र है

  - सीताराम गुप्ता

कहा गया है कि अप्प दीपो भव लेकिन ये भी ठीक है कि हर व्यक्ति अपना दीपक अथवा गुरु नहीं बन सकता। स्वयं दीपक अथवा प्रकाश बनने के लिए भी उचित मार्गदर्शन अनिवार्य है और ये मार्गदर्शन एक गुरु के बिना, उसकी संगति के बिना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। लेकिन क्या एक योग्य गुरु की तलाश या चुनाव सरल है? यदि हममें योग्य गुरु की तलाश करने की योग्यता हो तो फिर गुरु की आवश्यकता ही क्या है? जो व्यक्ति एक अच्छे गुरु की तलाश करने की योग्यता रखता हो वह तो स्वयं अपना गुरु बन सकता है। व्यक्ति को जहाँ तक संभव हो आत्मविकास कर स्वावलंबी बनने का प्रयास करना चाहिए। इक़बाल ने कहा है:

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,

ख़ुदा  बंदे से  ख़ुद पूछे  बता  तेरी  रज़ा क्या है?

 अज्ञेय लिखते हैं, ‘‘वास्तव में कोई भी किसी को सिखाता नहीं है, जो सीखता है, अपने ही भीतर के किसी उन्मेष से, प्रस्फुटन से सीख जाता है। जिन्हें गुरुत्व का श्रेय मिलता है, वे वास्तव में केवल इस उन्मेष के निमित्त होते हैं और निमित्त होने के लिए किसी गुरु अथवा व्यक्ति की क्या आवश्यकता है? सृष्टि में कोई भी वस्तु उन्मेष का निमित्त बन सकती है।’’ लोग कहते हैं कि गुरु के बिना पूर्णता नहीं मिलती, उत्कर्ष को नहीं पा सकते; लेकिन आज के तथाकथित गुरु ज्ञान कहाँ दे रहे हैं? आपको मुक्त कहाँ कर रहे हैं? आपको अपने आपको जानने का अवसर कहाँ उपलब्ध करा रहे हैं? आज के अधिकतर गुरु तो अपनी महत्ता सिद्ध करके पैसा कूटने में लगे हुए हैं।

परमहंस रामकृष्ण नहीं मिलते, तो नरेंद्रनाथ दत्त विवेकानंद नहीं बन सकते थे। नेत्रहीन स्वामी विरजानंद ने मूलशंकर को स्वामी दयानंद सरस्वती बना दिया। जब मूलशंकर ने स्वामी विरजानंद की कुटिया का द्वार खटखटाया, तो उन्होंने पूछा था- ‘‘कौन है?’’ मूलशंकर ने कहा था, ‘‘यही तो जानने आया हूँ।’’ जिज्ञासा मूलशंकर में थी। उसी जिज्ञासा, उसी ज्ञानलिप्सा ने उन्हें दयानंद सरस्वती बना दिया। हमारी सबसे बड़ी विडंबना है कि हम साधन को लक्ष्य अथवा साध्य मान लेते हैं। चाहे गुरु हों अथवा तीर्थस्थल हों, ये सब साधन हैं, उत्प्रेरक हैं। इनका अपना महत्त्व है; लेकिन मात्र साधन से, उत्प्रेरक से आप अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकते।

गुरु का महत्त्व है, उसको हम मानें, उसके बताए मार्ग पर चलें; लेकिन ख़ुद चलें, अपना मार्ग ख़ुद तय करें। जब तक ख़ुद स्वयं को जानने का प्रयास नहीं करेंगे, तो हम प्रगति नहीं कर सकते। स्वयं को जानने के लिए बाह्य नहीं; अपितु अंतर्यात्रा करनी अनिवार्य है। इस सब की सामर्थ्य हमारे अंदर है। बस उसे पहचानना है। यहीं गुरु का काम प्रारंभ होता है। गुरु हमें हमारी क्षमताओं से परिचित करवाता है, बस और उसके बाद उसका काम समाप्त। खोज हमें स्वयं करनी है  यह खोज दूसरा कोई नहीं कर सकता। गुरु भी नहीं। पहुँचा हुआ गुरु भी नहीं। वह अपनी खोज करता है, हमें अपनी खोज करनी होती है। गुरु इसमें सहायक नहीं होता तो उसकी भूमिका का कोई औचित्य नहीं जान पड़ता। 

 हाँ,  गुरु के प्रति सम्मान व श्रद्धा अनिवार्य है। यह सम्मान व श्रद्धा शिष्य व गुरु के मध्य सीखने- सिखाने का परिवेश निर्मित करने के लिए महत्त्वपूर्ण ही नहीं अनिवार्य भी है। लेकिन जब यही सम्मान व श्रद्धा किसी अयोग्य गुरु अथवा तथाकथित संत-महात्मा के प्रति उत्पन्न हो जाती है तो शिष्य ही नहीं समाज का विनाश भी निश्चित है। कई बार किसी बीमारी के उपचार के लिए हम किसी डॉक्टर के पास जाते हैं। यदि उस डॉक्टर के उपचार से बीमारी में आराम नहीं पहुँचता, तो हम फ़ौरन डॉक्टर बदल लेते हैं। इसी तरह से यदि भूलवश किसी अयोग्य गुरु अथवा तथाकथित संत-महात्मा के प्रति सम्मान व श्रद्धा उत्पन्न हो जाए तो इस बात का पता लगते ही उससे शीघ्र छुटकारा पाने में ही सबका कल्याण है।  ■

Nov 1, 2024

वन्य जीवनः जंगली जानवर सिखाते हैं प्रकृति को अक्षुण्ण बनाए रखने की कला

  - सीताराम गुप्ता

   पिछले दिनों हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत की जन्मस्थली व गांधीजी के चौदह दिवसीय प्रवासस्थल अनासक्ति आश्रम को देखने की तीव्र इच्छा के वशीभूत कौसानी जाना तय हुआ। दिल्ली से ड्राइविंग करते हुए सीधे कौसानी जा पहुँचे। कौसानी से बागेश्वर व बागेश्वर से नैनीताल होते हुए दिल्ली वापसी की। नैनीताल से दिल्ली के लिए प्रमुख रूप से दो रास्ते हैं। एक काठगोदाम व हल्द्वानी होते हुए और दूसरा कालाढूंगी होते हुए। कालाढूंगी के रास्ते पर कालाढूंगी के पास छोटी हल्द्वानी नामक स्थान है जहाँ पर एक छोटा-सा अत्यंत व्यवस्थित संग्रहालय है जिसका नाम है जिम कॉर्बेट संग्रहालय। इसमें जिम कॉर्बेट के जीवन से संबंधित घटनाओं और वस्तुओं को अक्षुण्ण रखने का प्रयास किया गया है।

     जिम कॉर्बेट एक कुशल शिकारी थे जंगल जिनके लिए दूसरा घर था। बाद में उन्होंने शिकार करना छोड़ दिया और एक पर्यावरण व प्रकृति प्रेमी, वन संरक्षक तथा कुशल छायाकार बन गए। आज जिम कॉर्बेट के नाम से जो जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क है वह जिम कॉर्बेट के प्रयासों का ही परिणाम है। जिम कॉर्बेट के प्रयासों से सन् 1935 में वन्य पशुओं को बचाने के उद्देश्य से यह संरक्षित पार्क बनाया गया था और तत्कालीन गवर्नर मालकम हेली के नाम पर इस पार्क का नाम हेली नेशनल पार्क रखा गया था। स्वतंत्रता के बाद इस पार्क का नाम रामगंगा नेशनल पार्क रख दिया गया। बाद में सन् 1957 में इस पार्क का नाम जिम कॉर्बेट के सम्मान में ‘जिम कार्बेट नेशनल पार्क’ रख दिया गया।

     जिम कॉर्बेट एक महान शिकारी, पर्यावरण एवं प्रकृति प्रेमी, वन संरक्षक, कुशल छायाकार ही नहीं एक प्रसिद्ध लेखक भी थे। संग्रहालय में एक छोटी सी सुवनीर शॉप भी है, जहाँ जिम कॉर्बेट की लिखी पुस्तकें भी उपलब्ध हैं। मैंने वहाँ उपलब्ध जिम कॉर्बेट की सभी पाँचों पुस्तकें ख़रीद लीं और घर आकर सभी पढ़ डालीं। जिम कॉर्बेट के बारे में जानने पर ऐसा लगा कि हिंदी भाषा और साहित्य में फादर कामिल बुल्के का जो स्थान व सम्मान है, कुछ वैसा ही स्थान व सम्मान पर्यावरण, प्रकृति व वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में जिम कॉर्बेट का है। जिम कॉर्बेट अपनी पुस्तक ‘जंगल लोर’ में लिखते है, ‘‘प्रकृति में न तो कोई दुख होता है और न ही कोई अफ़सोस। झुंड में से कोई पक्षी बाज़ का शिकार बन जाता है अथवा कोई चौपाया शेर या तेंदुए का शिकार हो जाता है, तो बाक़ी बचे हुए पक्षी और जानवर इस बात की ख़ुशी मनाते हैं कि चलो आज हमारा वक्त नहीं आया। उन्हें आने वाले कल का भी कोई एहसास नहीं होता।’’

     काश हम मनुष्यों को भी आने वाले कल का एहसास नहीं होता। यदि ऐसा होता तो कितना अच्छा होता। हम भी आने वाले कल अथवा भविष्य की चिंता किए बिना निश्चिंत व निर्द्वंद्व होकर मज़े से वर्तमान में जीते। जानवरों को आने वाले कल की कोई चिंता नहीं होती; इसलिए वे मज़े से जीवन व्यतीत करते हैं। उनकी स्वाभाविक मस्ती में कभी कोई कमी नहीं आती। भूख लगने पर ही भोजन के लिए हाथ-पैर मारते हैं। कोई भी मांसाहारी जंगली जानवर अथवा परिंदा बिना भूख के शिकार नहीं करता। पेट भरा होने पर कोई किसी दूसरे जानवर को नहीं मारता। एक बार शिकार करने के बाद, जब तक उस पूरे शिकार को उदरस्थ नहीं कर लेता, दूसरा शिकार हरगिज नहीं करता। उनके जीवन में तनाव नामक तत्त्व होता ही नहीं। जहाँ तक भूख लगने पर शिकार करने का प्रश्न है, यह प्राकृतिक भोजन शृंखला का अंग है, जो वन और वन्यजीवन में संतुलन के लिए अनिवार्य है।

     लेकिन मनुष्य? वह आज या वर्तमान की चिंता करने की बजाय आने वाले कल अथवा भविष्य की चिंता में अधिक डूबा रहता है। इसी से आज तनाव बहुत बढ़ गया है। यह ठीक है कि मनुष्य अपने विकास की उस अवस्था में पहुँच गया है जहाँ उसके लिए भविष्य के बारे में विचार करना भी अनिवार्य है। भविष्य की उचित प्लानिंग तो ठीक है; लेकिन चिंता किसी भी तरह से उचित नहीं मानी जा सकती। कल की चिंता में हम आज में जीवन जीना भूलते जा रहे हैं, जिसके कारण हमेशा तनावयुक्त रहते हैं। यह तनाव भविष्य के सुख को भी, जो एक तरह से काल्पनिक है, चट कर जाता है। हम कई बार देश में कई स्थानों पर जंगल राज की बात करते हैं। शहरों में चाहे जो हो जंगलों में कुछ भी अव्यवस्थित नहीं है। कुछ भी काल्पनिक नहीं है। सब कुछ स्वाभाविक रूप से चलता है। वहाँ परस्पर शोषण की प्रक्रिया नहीं है। वहाँ संग्रह की प्रवृत्ति भी नहीं पाई जाती। वहाँ कोई छोटा या बड़ा नहीं है। कोई प्रतिशोध की आग में नहीं सुलगता। कोई बदला लेने के फ़िराक़ में नहीं घूमता। वहाँ मान-अपमान जैसी काल्पनिक स्थितियाँ भी नहीं मिलतीं।

     अपनी पुस्तक ‘जंगल लोर’ में जिम कॉर्बेट आगे लिखते है, ‘‘जब मैं नादान था तब नन्हे पक्षियों और हिरणशावकों को बाज़ों, चीलों व दूसरे जानवरों के पंजों से छुड़ाने की कोशिश करता था; लेकिन जल्दी ही मुझे पता चल गया कि एक की जान बचाने से दो की जान जाती है। शिकारी पक्षियों अथवा जानवरों के ज़हरीले पंजों की वजह से उनमें से एक प्रतिशत पक्षी अथवा दूसरे नन्हे जानवर ही जीवित रह पाते थे। दूसरी ओर शिकारी जानवर अपना अथवा अपने बच्चों का पेट भरने के लिए फ़ौरन ही दूसरा शिकार कर लेता था। जंगल में कुछ पक्षियों और जानवरों का उत्तरदायित्व प्रकृति में संतुलन बनाए रखने का होता है, जिसके लिए प्रकृति में संतुलन बनाए रखने के साथ-साथ अपना पेट भरने के लिए शिकार करना भी अनिवार्य हो जाता है।’’

     जहाँ तक संतुलन की बात है जीव-जंतुओं की जितनी भी गतिविधियाँ हैं, वे सब प्रकृति के संतुलन को बनाए रखती हैं। उससे प्राकृतिक संतुलन को कोई हानि नहीं पहुँचती। मनुष्य को जंगली जीव-जंतुओं को बचाने की नहीं; अपितु उनका आवास न छीनने की ज़रूरत है। आज मनुष्य न केवल प्रकृति के संतुलन को नष्ट करने पर आमादा है; अपितु स्वयं की सुव्यवस्था को भी नष्ट कर रहा है। मनुष्य जीव-जंतुओं के प्राकृतिक आवास को नष्ट करके ख़ुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चला रहा है। हम चाहें तो इन जंगली जानवरों से न केवल चिंता व तनाव से मुक्त रहने का सूत्र सीख सकते हैं अपितु अपरिग्रह व सीमित उपभोग द्वारा प्रकृति व पर्यावरण को नष्ट होने से बचाने की कला भी सीख सकते हैं।

सम्पर्कः ए.डी. 106 सी., पीतमपुरा,दिल्ली - 110034, मो. 9555622323, Email : srgupta54@yahoo.co.in

Sep 1, 2024

आलेखः हिन्दी के विकास में ख़तरे

  - सीताराम गुप्ता

हिन्दी हमारी संस्कृति की पहचान व वाहक है, इसमें संदेह नहीं; लेकिन हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है अथवा नहीं, यह विवाद का मुद्दा है। संवैधानिक दृष्टि से हिन्दी भाषा आज हमारे देश की राजभाषा तो है; लेकिन राष्ट्रभाषा नहीं। हम हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाए जाने की माँग को लेकर काफी उत्साहित रहते हैं और इसके लिए संघर्ष भी कम नहीं करते; लेकिन समस्या ये है कि हिन्दी के उन्नयन अथवा विकास के संदर्भ में हमारी कथनी व करनी में दिन-रात का अंतर है। हम हिन्दी की बात ज़्यादा करते हैं; हिन्दी में अथवा हिन्दी के बारे में सही बात कम करते हैं। कुछ लोग बड़े गर्व से कहते हैं कि दुनिया की सभी भाषाएँ संस्कृत से निकली हैं और देवनागरी ही एक ऐसी लिपि है, जो पूर्णतः वैज्ञानिक लिपि है, जो पूर्ण सत्य नहीं है। कुछ महाशय देवनागरी के वर्णिक लिपि होने को ही एक बड़ी उपलब्धि मानकर इसकी प्रशंसा में लगे रहते हैं; लेकिन क्या सिर्फ संस्कृत व हिन्दी भाषा व देवनागरी लिपि की शान में कसीदे पढ़ने से हिन्दी का वास्तविक विकास संभव है?

     जहाँ तक समय, श्रम व संसाधनों को लगाने की बात है, हिन्दी के लिए हमारे पास न तो समय ही है ओर न इसके लिए हम विशेष परिश्रम करने को ही तैयार हैं। हिन्दी के उन्नयन व विकास के लिए व्यक्तिगत स्तर पर संसाधनों को लगाने अथवा पैसा ख़र्च करने की बात करना तो बेमानी ही होगा। अंग्रेज़ी भाषा में दक्षता प्राप्त करने के लिए इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स करते हैं, अच्छी बात है; लेकिन हिन्दी के लिए थोड़ा-सा भी अतिरिक्त प्रयास क्यों नहीं करते? अंग्रेज़ी भाषा में न केवल सही स्पैलिंग लिखने के लिए पूरा प्रयास करते हैं; अपितु सही उच्चारण के साथ बोलने के अभ्यास में भी कोई कसर नहीं रख छोड़ते। फिर हिन्दी के प्रति ऐसी उपेक्षा व दोगलापन क्यों? क्या इसीलिए कि ये मातृभाषा के रूप में हमें विरासत में बिना किसी प्रयास के प्राप्त हो गई है? ऐसी स्थिति में केवल इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा दे देने से इसका विकास व राष्ट्रभाषा के पद पर इसकी प्रतिष्ठा बने रहने में संदेह है। हिन्दी के लिए समय और श्रम ही नहीं; इसमें निवेश करने की भी ज़रूरत है।

 अधिकतर माता-पिता अपने बच्चों की अंग्रेज़ी की वर्तनी व उच्चारण दुरुस्त करवाने के लिए पूरी तरह से तत्पर व सतर्क रहते हैं। कितने माता-पिता हैं, जो अपने बच्चों की हिन्दी की वर्तनी (स्पैलिंग) व उच्चारण दुरुस्त करवाने के लिए कोशिश करते हैं? नगण्य अथवा बहुत कम। बच्चों के पैदा होते ही उन्हें अंग्रेज़ी गीत रटवाना शुरू कर देते हैं? हिन्दी के शिशुगीत अथवा कविताएँ क्यों नहीं? अंग्रेज़ी पढ़ाइए और खूब पढ़ाइए; पर हिन्दी की क़ीमत पर नहीं। हिन्दी भी ख़ूब पढ़ने व पढ़ाने की ज़रूरत है। हम सब लोगों के घरों में अंग्रेज़ी के मोटे-मोटे कई शब्दकोश, थिसॉरस व एंसाइक्लोपीडिया मिलेंगे; लेकिन हममें से कितने लोग हैं; जिन्होंने अपने बच्चों के लिए हिन्दी के शब्दकोश, थिसॉरस अथवा विश्वकोश या ज्ञानकोश लाकर दिए हैं? क्या हिन्दीवालों के लिए हिन्दी के शब्दकोशों का महत्त्व नहीं? हमें चाहिए कि हम अपने बच्चों के लिए न केवल अंग्रेज़ी-हिन्दी के अच्छे शब्दकोश लाकर दें; अपितु हिन्दी व हिन्दी-अंग्रेज़ी द्विभाषी कोश भी अवश्य लाकर दें।  

     एक बार एक संस्कृताचार्य से मिलने जाना हुआ। हिन्दी व संस्कृत के मूर्द्धन्य विद्वान हैं। उनके पुत्र की एक कैमिस्ट शॉप है। उनकी दुकान पर मुख्य बोर्ड के सामने एक छोटे बोर्ड पर रेड क्रॉस का चिह्न बना था और लिखा था ‘दवाईयाँ’। यह सही वर्तनी नहीं है। सही वर्तनी ‘दवाईयाँ’ नहीं ‘दवाइयाँ’ है। मैंने जब संस्कृताचार्य महोदय का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया, तो उन्होंने कहा, ‘‘लोगों को क्या फ़र्क़ पड़ता है इससे?’’ 

‘‘लेकिन इसका भाषा के विकास पर तो ग़लत असर पड़ता है न,’’ मैंने प्रतिवाद किया। 

‘‘कौन ध्यान देता है इन छोटी-मोटी बातों पर?’’ वे पूरी तरह से डिफेंसिव थे। क्या हिन्दी भाषा को सही-सही लिखने के लिए ज़्यादा मेहनत लगती है या कुछ ज़्यादा ख़र्च करना पड़ता है? हमें चाहिए कि सार्वजनिक स्थलों पर हिन्दी भाषा की वर्तनी की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें।

एक साधारण- सा नियम है कि जिस एकवचन ईकारांत शब्द के अंत में दीर्घ ई लगती है (बड़ी ई की मात्रा लगती है) बहुवचन में वह ह्रस्व हो जाती है, अर्थात् उसमें छोटी इ की मात्रा लगती है, जैसे- नदी-नदियाँ, रोटी-रोटियाँ, सदी-सदियाँ, कमी-कमियाँ, मिठाई-मिठाइयाँ, लड़ाई-लड़ाइयाँ व दवाई-दवाइयाँ आदि। इसी शृंखला में एक शब्द शृंखला अथवा शृ से प्रारंभ होने वाले कुछ अन्य शब्द हैं जो हम प्रायः श्रृ से लिखते हैं जैसे श्रृंग, श्रृंगार, श्रृगाल आदि। शृ एक संयुक्त वर्ण है, जो श् एवं ऋ के मेल से बनता है। जब हम श् एवं र को संयुक्त रूप से लिखते हैं, तो उसका रूप श्र होता है, जैसे- श्रद्धा, श्राद्ध, श्रावण, श्रीमान, श्रीमती श्रेणी आदि। श् में या तो ऋ जोड़कर संयुक्त वर्ण शृ बनाएँगे या श् में र जोड़कर श्र बनाएँगे। श् में र एवं ऋ एक साथ कैसे जोड़ सकते हैं? अतः श्रृंग, श्रृंगार, श्रृगाल आदि सभी वर्तनियाँ अशुद्ध हैं। इनकी सही वर्तनियाँ शृंग, शृंगार व शृगाल ही लिखनी होंगी।

     एक शब्द है- उज्ज्वल जिसे  अधिकतर व्यक्ति उज्जवल लिखते हैं; क्योंकि अधिकतर ऐसे शब्दों में, जहाँ दो ध्वनियाँ एक साथ आती हैं; प्रायः पहली ध्वनि स्वर-रहित होती है और बाद वाली सस्वर जैसे बच्चन, चप्पल, खद्दर, चद्दर, उद्देश्य, लट्टू, गुड्डू आदि; लेकिन उज्ज्वल में ऐसा नहीं है। इसमें दोनों ही ‘ज’ न केवल स्वररहित हैं; अपितु साथ-साथ भी आते हैं। इसका यह रूप संधि के नियम के प्रभाव से बना है। उत् एवं ज्वल की जब संधि की गई, तो उत् में जो त् की ध्वनि है, वह ज्वल में ज् की ध्वनि के प्रभाव से ज् हो जाती है और संधि से नया शब्द बनता है उज्ज्वल। कुछ लोग उज्ज्वल तो ठीक लिखते हैं; लेकिन जिन शब्दों में भी ज्वल आता है, उन सभी को भी ज्ज् से लिखते हैं- जैसे प्रज्ज्वल। यहाँ प्र एवं ज्वल के मेल से नया शब्द प्रज्वल बनेगा, न कि प्रज्ज्वल। प्रज्ज्वल अथवा प्रज्ज्वलित, दोनों ही अशुद्ध हैं। सही शब्द हैं प्रज्वल व प्रज्वलित। 

भाषा के विकास पर इन छोटी-छोटी अशुद्धियों का बहुत ग़लत असर पड़ता है। यदि आप सर्वेक्षण करें, तो पाएँगे कि दवाविक्रेताओं की दुकान पर दवाइयाँ शब्द प्रायः ग़लत लिखा मिलेगा। मैंने तो आज तक एक भी ऐसी कैमिस्ट शॉप नहीं देखी जिस पर दवाइयाँ शब्द ठीक लिखा हो। क्या ये बहुत कठिन शब्द है? बिलकुल नहीं। यदि ये त्रुटियाँ सार्वजनिक स्थानों पर दिखलाई देंगी, तो पूरे समाज की भाषा विकृत होने का खतरा बना रहता है। हम प्रायः काग़ज़ पर छपे या किसी बोर्ड पर लिखे अक्षरों अथवा शब्दों को सही मान लेते हैं, अतः ऐसे में कोई भी अशुद्धि पूरे समाज को प्रभावित करेगी। हिन्दी के विकास से जुड़ी सरकारी-ग़ैरसरकारी संस्थाओं व अकादमियों को भी इस संबंध में अपेक्षित क़दम उठाने चाहिए। आज सोशल मीडिया भी भाषाओं विशेष रूप से हिन्दी के विकास में बहुत बड़ा ख़तरा बन गया है। सोशल मीडिया पर जिस प्रकार की सामग्री व भाषा का प्रयोग किया जा रहा है, उससे बचना भी अनिवार्य है। ■

सम्पर्कः ए.डी. 106 सी., पीतम पुरा, दिल्ली- 110034, मो. 9555622323, Email :  srgupta54@yahoo.co.in


Aug 1, 2024

चिंतनः उचित नहीं बच्चों के जीवन में अत्यधिक हस्तक्षेप

  - सीताराम गुप्ता

बच्चे हों अथवा बड़े परिवर्तित समय में आज सभी की आकांक्षाएँ व अपेक्षाएँ बदल चुकी हैं। यह अस्वाभाविक भी नहीं। बच्चों के संदर्भ में बड़ों को इस तथ्य को न केवल स्वीकार करना चाहिए अपितु उनके सहयोग के लिए भी तत्पर रहना चाहिए अन्यथा समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। पिछले दिनों एक मित्र महोदय का फोन आया। पौत्र-पौत्रियों के बारे में बातें करने लगे। उनकी पढ़ाई-लिखाई, प्राप्त अंक, करियर, खानपान, दिनचर्या, आदतों व उनके व्यवहार के बारे में काफी बातें कीं। बतलाया कि कई बार छुट्टियों में भी हमारे पास न आकर हॉस्टल में ही पड़े रहते हैं। बच्चों की और भी कई बातों से संतुष्ट नहीं थे। बात करते हुए बीच-बीच में उत्तेजित तक हो जाते थे। अपने किशोर अथवा युवा बच्चों अथवा पौत्र-पौत्रियों को लेकर माता-पिता अथवा घर के बुजुर्गों की चिंता स्वाभाविक है लेकिन हर चीज़ की एक सीमा होती है। अपने बच्चों अथवा पौत्र-पौत्रियों के मामलों में कितनी चिंता की जाए अथवा उनके जीवन में कितना हस्तक्षेप किया जाए। यदि हम इस सीमारेखा को समझकर उसके अनुसार व्यवहार करेंगे, तो उनसे हमारे संबंध सदैव आत्मीय व अर्थपूर्ण बने रहेंगे; अन्यथा हमेशा के लिए तनावपूर्ण हो जाएँगे; क्योंकि आजकल के किशोर अथवा युवा अपने जीवन में दूसरों का अधिक हस्तक्षेप पसंद नहीं करते। 

 जहाँ तक किशोरावस्था का प्रश्न है, यह अत्यंत संवेदनशील अवस्था होती है। अपने किशोर पौत्र-पौत्रियों की पढ़ाई-लिखाई अथवा उनके भविष्य को लेकर घर के बुजुर्गों की चिंता स्वाभाविक है; लेकिन उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुँचने के बाद इसकी मुख्य चिंता बच्चों के माता-पिता पर छोड़ देनी चाहिए और जहाँ बहुत ज़रूरी अथवा अपेक्षित हो वहीं अपनी राय व्यक्त करनी चाहिए। उनकी शिक्षा-दीक्षा और करियर के विषय में उनके माता-पिता अपेक्षाकृत अधिक उचित निर्णय ले सकते हैं। उनको माँगने पर सलाह दी जा सकती है; लेकिन उनके निर्णयों को बदलने अथवा उनमें कमी निकालने का प्रयास किसी भी दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं होता। वैसे भी आज करियर के क्षेत्र में बहुत परिवर्तन हो चुके हैं; अतः समय के अनुसार करियर के सही चयन के विषय में वे स्वयं अधिक जानते हैं। आज के ज़माने की तुलना अपने ज़माने से करना तो किसी भी तरह से उचित नहीं ठहरता। समय के साथ हर चीज़ बदलती है, इस बात को अच्छी तरह से जान लेना और स्वीकार कर लेना चाहिए।

     समय के साथ-साथ नई पीढ़ियाँ भी बदल जाती हैं। उनकी सोच पुरानी पीढ़ियों की सोच जैसी नहीं हो सकती। होनी भी नहीं चाहिए। यदि नई पीढ़ी की सोच में समयानुसार अपेक्षित परिवर्तन नहीं होगा, तो वो आगे बढ़ने की बजाय पिछड़ जाएगी। नई पीढ़ी की सोच ही नहीं उनका खानपान, पहनावा व आदतें सब बदल जाते हैं जो अत्यंत स्वाभाविक है। उनकी दिनचर्या, खानपान व पहनावे को लेकर ज़्यादा टोकाटोकी करना अथवा हर बात में हस्तक्षेप करना, किसी भी तरह से उचित नहीं। विशेष रूप से उनके मित्रों अथवा अपने परिचितों या रिश्तेदारों की उपस्थिति में तो बिलकुल नहीं। उनके स्वास्थ्य के विषय में चिंता व्यक्त की जा सकती है; लेकिन उनकी शारीरिक बनावट अथवा देहयष्टि के विषय में नकारात्मक टिप्पणी करके नहीं। यदि हम किसी बच्चे से कहें कि ये क्या गैंडे जैसा शरीर बना रखा है; तो निश्चित रूप से वो हमसे दूर-दूर रहने और हममें कमियाँ निकालने का प्रयास करेगा। हमारी बातों से किसी भी तरह से बच्चे के स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुँचनी चाहिए। बच्चों के मित्रों के विषय में भी ज़्यादा टीका-टिप्पणी न करके, उन्हें भी अपने बच्चों की तरह ही समझकर व्यवहार करना चाहिए। 

जो बच्चे घर से बाहर रहकर पढ़ाई करते हैं, वे छुट्टियों में अथवा बीच में जब कभी भी घर के सदस्यों से मिलने अथवा छुट्टियाँ बिताने के लिए घर आएँ, तो उनकी हर बात में हस्तक्षेप करने या उन्हें हर बात पर प्रवचन देने से वे घर आना-जाना कम कर देते हैं, जो दोनों के लिए ही ठीक नहीं। माना कि हम अत्यंत सात्त्विक भोजन करते हैं और हमारी दिनचर्या भी आदर्श और व्यवस्थित रहती है; लेकिन बाहर पढ़ने वाले बच्चों के लिए यह संभव नहीं हो पाता। आजकल स्टूडेंट्स पर पढ़ाई का बड़ा प्रेशर रहता है। रात-रात भर जागकर पढ़ने वाले बच्चों के लिए ब्रह्म मुहूर्त्त में उठकर स्नान-ध्यान करना कैसे संभव है? हम अपने बच्चों को डॉक्टर अथवा इंजीनियर बनाना चाहते हैं; लेकिन साथ ही ये भी चाहते हैं कि उनकी दिनचर्या गुरुकुलों में शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों जैसी हो, तो ये असंभव है। बच्चों की दिनचर्या को न केवल महत्त्व ही देना चाहिए; अपितु इसके लिए उन्हें अनुकूल परिस्थितियाँ भी उपलब्ध करवाने का प्रयास करना चाहिए।  

     हमें परिवर्तित समय में परिस्थितियों के अनुसार होने वाले परिवर्तनों को स्वीकार कर लेना चाहिए; अन्यथा ये हमारे लिए ठीक नहीं होगा। बच्चों के पहनावे अथवा कपड़ों को लेकर भी ज़्यादा परेशान रहना ठीक नहीं। यदि हम बच्चों पर अपनी पसंद थोप देंगे, तो इसकी संभावना अधिक है कि वे अपने पीयर ग्रुप में उपहास के पात्र बन जाएँ। इससे उनके व्यक्तित्व का विकास बुरी तरह से प्रभावित हो सकता है, जो हर तरह से उनकी उन्नति में बाधक होगा। बच्चों को उपहार के रूप में देने के लिए अपनी पसंद की नहीं; अपितु उनकी पसंद और उपयोगिता की चीज़ें लानी या मँगवानी चाहिए। खानपान के संबंध में भी ऐसा ही करना चाहिए। यदि बच्चे गलतियाँ करते हैं, तो भी निराश होने की ज़रूरत नहीं; क्योंकि गलतियों से भी वे अधिकाधिक सीखते हैं। यदि बच्चों की गलतियों से परेशान होकर उन्हें टोकते व कुछ नया करने से रोकते रहेंगे, तो उनकी रचनात्मकता समाप्त हो जाएगी और वे बहुत अधिक नया नहीं सीख पाएँगे। इससे उनकी निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। हमें चाहिए कि बच्चों को स्वयं निर्णय लेने के लिए प्रोत्साहित करें। 

     प्रश्न उठता है कि बच्चों के मामले में माता-पिता अथवा बुजुर्गों की भूमिका क्या हो? वे किस सीमा तक उनके जीवन में हस्तक्षेप करें। बच्चों से यहाँ तात्पर्य किशोरों और युवाओं से है। बेटे-बेटियाँ अथवा पौत्र-पौत्रियाँ चाहे वे स्कूल-कॉलेज में पढ़ रहे हों अथवा अन्य किसी प्रकार का प्रशिक्षण ले रहे हों या किसी व्यवसाय अथवा सेवा में जा रहे हों, उनके जीवन में बुजुर्गों की महत्त्वपूर्ण भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता; लेकिन उनकी भूमिका फिलर की तरह होनी चाहिए। पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न रचनाओं अथवा आलेखों के अंत में कई बार कुछ जगह बच जाती है। संपादक उन स्थानों पर छोटी-छोटी रचनाएँ, प्रेरक प्रसंग, दोहे अथवा शेर आदि डाल देते हैं। मज़े की बात तो ये है कि कई बार ये संक्षिप्त प्रस्तुतियाँ मुख्य रचनाओं से भी अधिक महत्त्वपूर्ण और उपयोगी ही नहीं, रोचक भी होती हैं। मुझे याद है कि मैं प्रारंभ से ही जब भी किसी पत्रिका को पढ़ने के लिए खोलता था, तो सबसे पहले इन फिलर्स को ही पढ़ता था। मैंने इन्हें हमेशा ही रोचक व ज्ञानवर्धक पाया। यदि हम बच्चों के जीवन में हस्तक्षेप के मामले में अपनी भूमिका फिलर्स की रखें और अच्छे फिलर्स की रखें, तो बच्चे न केवल हमारी ओर ध्यान देंगे अपितु हमारी बातों से लाभांवित भी होंगे। 

     हम उनके जीवन के उन हिस्सों को प्रभावित करें, जिनका पाठ्यक्रमों में कोई स्थान नहीं अथवा जो अन्य किसी कारण से उपेक्षित रह जाते हैं। जब वे चलते हुए किसी दोराहे पर आकर भ्रमित होकर रुक जाएँ अथवा कोई ग़लती कर बैठें तब उनका मार्गदर्शन करें व उन्हें सही मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। बच्चों की पसंद को महत्त्व दें और उनकी पसंद में अपनी पसंद जोड़ दें; लेकिन आटे में नमक के समान। बच्चों की आलोचना करने की बजाय उनकी अच्छी आदतों को रेखांकित करके इनके लिए उनकी प्रशंसा करें। आज बच्चे ऐसा बहुत कुछ जानते हैं, जो हम बिलकुल नहीं जानते। उनकी नई-नई जानकारियों और ज्ञान को न केवल महत्त्व दें; अपितु उनसे कुछ नया सीखने का प्रयास करें। इससे उन्हें अच्छा लगेगा और वे हमारे और अधिक निकट आने लगेंगे। इससे हमारे आपसी संबंधों में तनाव की अपेक्षा प्रगाढ़ता उत्पन्न होगी। यदि किशोरों से हमारे संबंधों में आत्मीयता होगी तो वे हम पर न केवल पूर्ण विश्वास करेंगे अपितु हमारी बातों को भी अवश्य महत्त्व देंगे और ऐसी अवस्था में उनको समझाना अथवा उनका सही मार्गदर्शन करना सरल हो जाएगा। एक विज्ञापन कहता है कि पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें। इसी प्रकार से पहले बच्चों की परिवर्तित परिस्थितियों को स्वीकार करें, तदुपरांत यदि उनमें कुछ परिवर्तन अपेक्षित व संभव है तो उसके लिए प्रयास करें।

सम्पर्कः ए.डी. 106 सी., पीतम पुरा,, दिल्ली - 110034, मो. नं. 9555622323, Email : srgupta54@yahoo.co.in


Apr 1, 2024

चिंतनः मन थोड़ा बदल जाए तो...

-  सीताराम गुप्ता

प्रसिद्ध उर्दू शायर शुजाअ खावर साहब का एक शेर है – 

थोड़ा-सा बदल जाए, तो बस ताज हो और तख़्त, 

इस दिल का मगर क्या करें सुनता नहीं कमबख़्त। 

यदि हमारा मन थोड़ा सा बदल जाए, तो सचमुच कमाल हो जाए। क्या करें इस मन का? यह मन है कि मानता ही नहीं। यह मन ही है, जो हमें अपने अनुसार चलाता है लेकिन यदि हम मन को अपनी बात सुना सकें, इसे थोड़ा मना सकें और अपने अनुसार चला सकें तो यही मन हमें जीवन के हर क्षेत्र में अपार सफलता और खुशियाँ दिलवा सकता है। हमारे जीवन में क्रांति उत्पन्न कर सकता है। 

कालिदास कहते हैं - नास्त्यगतिर्मनोरथानां अर्थात् मन की इच्छा के समक्ष कुछ भी अगम्य नहीं है। मन , जो चाहे कर सकता है और मन को बदलना, मन पर नियंत्रण कर इसको अपेक्षित दिशा में ले जाना, थोड़ा कठिन जरूर है लेकिन असंभव नहीं। एक बार इस मन को अपने नियंत्रण में ले लिया, इसकी चंचलता पर क़ाबू पा लिया तो जीवन में कुछ भी करना असंभव नहीं रह जाएगा। कहा गया है मन के हारे हार है मन के जीते जीत। वास्तव में जीवन में हम न तो हारते हैं और न ही असफल होते हैं अपितु यह हमारा मन है, जो हमारी हार-जीत अथवा सफलता-असफलता के लिए उत्तरदायी होता है। हार-जीत अथवा सफलता-असफलता की अनुभूति भी मन के कारण ही होती है अन्यथा जीवन में न तो हार-जीत होती है और न ही सफलता-असफलता ही।

 हार-जीत अथवा सफलता-असफलता मन की विभिन्न स्थितियाँ है। एक बच्चा परीक्षा में चालीस प्रतिशत अंक लेकर पास होता है और ख़ुश है लेकिन दूसरे बच्चे के अस्सी प्रतिशत अंक आने पर भी वो दुखी है। यहाँ सफलता अथवा ख़ुशी अंकों के आधार पर नहीं अपितु मन की स्थिति पर निर्भर है। हार-जीत ही क्या किसी भी प्रकार का सुख-दुख, लाभ-हानि, आरोग्य अथवा रुग्णता सब मन की स्थिति पर निर्भर करता है। मन न केवल प्रसन्नता अथवा दुख का कारण बनता है अपितु मन द्वारा ही अपेक्षित प्रसन्नता व सफलता भी प्राप्त की जा सकती है। मन की स्थिति अथवा सोच को परिवर्तित करके न केवल वर्तमान स्थिति में परिवर्तन संभव है अपितु नई लाभप्रद स्थितियों का निर्माण भी संभव है।

  सोच क्या है और इसका प्रभाव कैसे पड़ता है? हमारे शरीर को कई प्रकार से विभाजित और वर्गीकृत किया गया है। इसे कई भागों, कई परतों अथवा कोशों में विभाजित किया गया है लेकिन यहाँ हम मोटे तौर पर शरीर को तीन भागों में विश्लेषित करेंगे। एक है हमारा स्थूल शरीर अथवा भौतिक शरीर (फिजिकल बॉडी), दूसरा है कारण शरीर अथवा मानसिक शरीर अर्थात् ‘मन’ (मेंटल बॉडी अर्थात् माइंड) और तीसरा है सूक्ष्म शरीर अथवा आध्यात्मिक शरीर या ‘चेतना’ (स्पिरिच्युअल बॉडी अथवा कांशियसनेस या सोल)। कारण शरीर अथवा हमारा मन हमारे हाड़-मांस द्वारा निर्मित भौतिक शरीर और हमारी चेतना के मध्य सेतु का काम करता है, हमारे स्थूल शरीर को हमारी चेतना से जोड़ता है और हमारी चेतना ही तमाम संभावनाओं का विपुल क्षेत्र है।

     मन की शक्ति द्वारा जब हम इस अपरिमित ऊर्जा के स्रोत से जुड़ जाते हैं तो जीवन में कुछ भी कर गुज़रना या पा लेना असंभव नहीं रहता। मन में इच्छा उत्पन्न होने की देर है पूरा होने में नहीं। भौतिक शरीर में वांछित सकारात्मक परिवर्तन के साथ-साथ संपूर्ण भौतिक जगत में किसी भी वस्तु की प्राप्ति सुलभ है मन की शक्ति के द्वारा। मन की शक्ति अथवा मन की एकाग्रता के द्वारा अर्थात् मन को केवल एक स्थान, एक स्थिति या एक बिंदु पर केंद्रित करके भौतिक जगत की हर वस्तु की प्राप्ति संभव है। लेकिन मन तो बड़ा चंचल है इसमें परस्पर विरोधी विचारों का ताना-बाना चलता ही रहता है फिर इसे एक विचार पर  कैसे केंद्रित करें और वो भी उपयोगी विचार पर?

     मन में उठने वाले विचारों को हम दो भागों में बाँट सकते हैं। सकारात्मक विचार तथा नकारात्मक विचार। हमारे दोनों प्रकार के विचारों का कारण है हमारा परिवेश, हमारे संस्कार तथा हमारी शिक्षा-दीक्षा। इन्हीं तत्त्वों से हमारे विचारों की उत्पत्ति प्रभावित होती है। समय के अनुसार भी इनमें परिवर्तन होता रहता है। क्योंकि मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है अतः वह अपने विवेक द्वारा अच्छे या बुरे विचारों में अर्थात् सकारात्मक या नकारात्मक विचारों में अतंर करके अपने लिए सकारात्मक विचारों का चुनाव कर सकता है। विचारों का चुनाव ही सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। विचार ही हमारी नियति के निर्धारक तत्त्व होते हैं। सही सकारात्मक विचार के चुनाव के उपरांत उस विचार को एक सपने के रूप में लें। किसी विचार या घटना का चुनाव करने के उपरांत दिन-रात, सोते-जागते, उठते-बैठते उसी का सपना देखें। उस विचार को बीज की तरह बो दें। मन में उसे दृढ़तर करते जाएँ।

     आप , जो भी हृदय से चाहते हैं, आपका जीवन के प्रति , जो दृष्टिकोण है यदि आज उसको एक सपने के रूप में ले सकते हैं, उसका बार-बार ख़्वाब देखने की ताक़त पैदा कर सकते हैं तो आप उसे निश्चित रूप से प्राप्त भी कर सकते हैं। प्रायः कहा जाता है कि व्यक्ति का मनचाहा नहीं होता लेकिन वास्तविकता यही है कि व्यक्ति का मनचाहा ही होता है और केवल मनचाहा ही होता है। क्या मटर के बीज बोने से चने के पौधे उग सकते हैं? नहीं, बिलकुल नहीं। यदि मटर के बीज बोने पर चने के पौधे उग आते हैं तो इसका सीधा सा अर्थ है कि हमें या तो बीजों की पहचान नहीं है या फिर हमने कौन से बीज बोए थे, यह भूल गए हैं। हमें सोच-समझकर सही बीज बोने चाहिए और कौन से बीज बोए थे यह भी याद रखना चाहिए।

     ऐसा ही हमें अपने विचारों के साथ करना चाहिए। हमें न केवल सोच-समझकर उपयोगी विचारों का चयन करना चाहिए अपितु उन्हें याद भी रखना चाहिए। उन्हें बार-बार दोहराते रहना चाहिए। हमारा मनचाहा कभी नहीं होता, यह हमें इसलिए लगता है कि हमारा अपने विचारों पर नियंत्रण नहीं होता। हम , जो चाहते हैं, प्रायः उसका विरोधी विचार हमारे मन पर उससे भी अधिक तीव्रता से प्रभावी हो जाता है और , जो अधिक प्रभावशाली विचार होता है, वही हमारे जीवन की वास्तविकता बन जाता है। यदि हमारा अपने मन पर नियंत्रण हो, तो हम ऐसे विचारों की पहचान कर उनसे बच सकते हैं। इसलिए हमें हर समय अपने विचारों पर नजर रखनी चाहिए और अनपेक्षित विचारों को मन से निकाल देना चाहिए। इसका भी एक तरीक़ा है और वो है जब भी कोई अनचाहा विचार प्रभावी होने लगे फ़ौरन उसका विरोधी विचार, जो स्वयं के लिए उपयोगी हो मन में ले आएँ।

     वास्तव में हम ऐसा कोई स्वप्न देख ही नहीं सकते जिसको पूरा करने की सामर्थ्य या क्षमता हममें न हो। हमारे अंदर किसी विचार, किसी स्वप्न के बीज हैं तो उनको कार्यरूप में परिणत करने की योग्यता भी हममें है। इसके लिए समस्त ब्रह्माण्डीय शक्तियाँ हमारा सहयोग करती हैं ताकि हमारे सपने अथवा विचार वास्तविकता में परिवर्तित हो सकें। गोस्वामी तुलसीदास ने भी कहा है कि-

 जेहि का जेहि पर सत्य सनेहू, 

सो तेहि मिलहिं न कछु संदेहू। 

जिसे हम मन से प्यार करते हैं उसे अवश्य पा लेते हैं। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि जिसे या जिस वस्तु को पाना हो उसे मन से प्यार कीजिए। सच्चा प्यार, अच्छे मित्र, धन-दौलत अथवा मान-प्रतिष्ठा सच्चे मन से चाहने पर कुछ भी असंभव नहीं।

   हमारी वर्तमान स्थिति वास्तव में हमारे पिछले चिंतन अथवा हमारी पिछली सोच का परिणाम मात्र है। जिसे हम कर्म का सिद्धांत कहते हैं वह भी यही है। हम , जो कर्म करते हैं अथवा हमने , जो कर्म किए हैं, वे हमारी सोच द्वारा ही निर्धारित होते हैं। अतः सोच द्वारा कर्म तथा कर्म द्वारा अपने जीवन को अपेक्षित आकार देना हमारे अपने हाथों में ही है। और यह संभव है सकारात्मक सोच द्वारा और सकारात्मक सोच संभव है मन पर नियंत्रण द्वारा। सरल सूत्र है: मन को मनाइए सफलता पाइए, मन को मनाइए प्रभावशाली व्यक्तित्व पाइए अथवा मन को मनाइए अच्छा स्वास्थ्य पाइए। मन की शक्ति द्वारा हम क्या-क्या पा सकते हैं इस सूची की कोई सीमा नहीं है।

   इस प्रकार मन पर नियंत्रण और विचारों के सुसंस्कार द्वारा मनोवृत्तियों का रूपातंरण कर हम जीवन के हर क्षेत्र में अपार सफलता प्राप्त करने में सक्षम हैं। मित्रो! तख़्तो-ताज की प्राप्ति अर्थात् जीवन में सुख-समृद्धि, प्रतिष्ठा, प्रभावशाली व्यक्तित्व, अच्छा स्वास्थ्य या आरोग्य तथा मनोनुकूल परिस्थितियाँ चाहते हो तो आज ही मन को अपने नियंत्रण में करने का प्रयास कीजिए और उसे विवश कर दीजिए कि वो आपकी बात सुने। उससे अपनी बात कहते रहिए, कहते रहिए। वो कब तक आपकी बात नहीं मानेगा? और एक बार उसने आपकी बात मान ली तो परिस्थितियाँ अपने आप अनुकूल होती चली जाएँगी। बस एक ही बात का ध्यान रखना ज़रूरी है और वह यह  है कि हर बात अथवा हर विचार सकारात्मक, सार्थक व उपयोगी हो। ■

सम्पर्कः ए.डी. 106 सी., पीतमपुरा, दिल्ली – 110034, मोबा. नं. 9555622323, Email : srgupta54@yahoo.co.in


Apr 1, 2023

आधुनिक बोध कथाः पुनर्मूल्यांकन

 - सीताराम गुप्ता 

एक मछुआरे ने नदी में जाल डाला। जाल डालने के बाद काफी देर तक वह बैठा रहा लेकिन कोई मछली उसके जाल में नहीं फँसी। कुछ और समय गुज़र जाने के बाद उसे अहसास हुआ कि जाल कुछ भारी हो गया है। उसने जाल को ऊपर उठा कर देखा तो पाया कि उसमें एक सुंदर-सी मछली फँसी हुई है। मछुआरे ने जाल को बाहर निकाला। पास से देखने पर पता चला कि ये मछली आम मछलियों जैसी नहीं है। उसका रंग-रूप अत्यंत आकर्षक तथा आँखें सम्मोहक थीं। मछुआरा तो जैसे सम्मोहित ही होने लगा। उसके मन में मछली के प्रति करुणा के भाव जाग्रत होने लगे। उसने फैसला किया कि वह मछली को वापस पानी में डाल देगा। मछली भी जल के अभाव में बैचेन हो चली थी।

     मछुआरे ने जैसे ही मछली को पानी में पुनः प्रवाहित करने का प्रयास किया मछली ने मछुआरे से पूछा, ‘ मैं तो बहुत सारे जल के बीच थी वह जल कहाँ गया?’ ‘जल तो जाल के अंदर से बह गया,’ मछुआरे ने बतलाया। इस पर मछली ने कहा कि वह दोबारा जल में नहीं जाना चाहती। ‘मगर क्यों ?’ मछुआरे ने पुनः पूछा। मछली ने कहा, ‘मेरा और जल का पुराना संबंध था। जब जाल बाहर आया तो जल मुझे छोड़कर बह गया। ऐसे निष्ठुर जल के पास दोबारा जाने की अपेक्षा मैं उसके वियोग में तड़प-तड़प कर मरना अधिक पसंद करूँगी। अतः मुझे वापस पानी में मत फेंको।’ मछुआरा मछली की बात सुन कर हैरान रह गया। जल से ऐसा प्यार करने वाली मछली उसने इससे पहले कभी नहीं देखी थी। यदि वह मछली को पानी में नहीं फेंकता है तो मछली कुछ ही क्षणों में प्राण त्याग देगी।

     मछुआरा मछली को हर हाल में बचाना चाहता था अतः उसने एक बार फिर उसे समझाते हुए कहा, ‘देखो, तुम सुंदर और स्वाभिमानिनी ही नहीं भावुक भी बहुत हो। तुमने जल से प्रेम किया लेकिन जल तुम्हारे प्रेम की पराकाष्ठा को समझने में असमर्थ रहा अतः उसके लिए जीवन का बलिदान करना किसी भी प्रकार से उचित नहीं। वैसे भी एक मछली पानी के बिना जीवित नहीं रह सकती। पानी उसके लिए अनिवार्य ही नहीं उसमें रहना उसका अधिकार भी है। तुम्हें अपना यह अधिकार हर्गिज़ नहीं छोड़ना चाहिए। अतः काल्पनिक मोह और मानापमान का ख़याल किए बिना तुम्हें वापस पानी में चले जाना चाहिए। यदि जीवन ही नहीं रहा तो जीवन-मूल्यों का क्या महत्त्व है?’ जीवित रह कर ही हम जीवन-मूल्यों की रक्षा कर सकते हैं तथा अनुपयोगी अथवा विकास में बाधक जीवन-मूल्यों को बदल सकते हैं।

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Sep 1, 2022

आलेखः हम अपनी गलतियों से ही सीखते हैं

- सीताराम गुप्ता

  गलतियाँ किससे नहीं होतीं? सबसे होती हैं। इसीलिए कहा गया है कि इनसान गलतियों का पुतला होता है;  लेकिन अपनी गलतियों से सीखकर ही वो आगे बढ़ता है। केवल वे लोग ही गलतियाँ नहीं करते या कर सकते जो कुछ भी नहीं करते क्योंकि न तो वे कुछ करेंगे और न गलतियाँ होने की संभावना होगी। लेकिन गलतियाँ न होने की स्थिति में क्या होगा? हम कुछ भी नहीं सीख पाएँगे। कुछ भी नहीं सीख पाएँगे तो आगे कैसे बढ़ेंगे? आगे बढ़ने के लिए सीखना अनिवार्य है और सीखने की प्रक्रिया में गलतियों का होना स्वाभाविक है लेकिन इसका ये तात्पर्य कदापि नहीं कि इनसान गलतियाँ ही करता रहे। किसी गलती को वह बार-बार दोहराता रहे। गलतियाँ होना स्वाभाविक है लेकिन उन्हें दोहराना अपराध से कम नहीं क्योंकि गलतियों को बार-बार करके ही हम उनके अभ्यस्त हो जाते हैं और पहले छोटी-छोटी गलतियाँ और बाद में बड़ी-बड़ी गलतियाँ करके अपराध तक करने लगते हैं।

व्यक्ति अपनी गलतियों से ही सीखता है और आगे बढ़ता है लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि व्यक्ति अपनी गलतियों को जाने, उन्हें स्वीकार करे और उन्हें दूर करे। प्रायः ऐसा होता है कि जब कोई हमारी किसी गलती की ओर संकेत करता है तो हम उसे स्वीकार करके उसे तत्क्षण सुधारने के बजाय उसे ठीक ठहराने की कोशिशों में लग जाते हैं। उसके लिए तर्क-वितर्क ही नहीं कुतर्क करने से भी परहेज नहीं करते। कई बार इस प्रकार का वाद-विवाद फसाद का रूप ले लेता है। यदि कोई हमारी गलती की ओर संकेत करता है तो कई बार हम अपनी गलती को स्वीकार करने के बजाय सामने वाले की गलतियाँ ही निकालने या गिनवाने लग जाते हैं। कई बार अपनी गलती को स्वीकार करने के बजाय हम उसे गलती ही नहीं मानते और प्रायः कह देते हैं कि ये तो आम बात है या ऐसा तो सभी करते हैं फिर मैं कैसे गलत हुआ? इस प्रकार के तर्क देते-देते व ऐसा आचरण दोहराते-दोहराते कब पूरा समाज रसातल में पहुँच जाता है, पता ही नहीं चलता।

प्रायः जब हमसे कोई गलती हो जाती है, तो उसे स्वीकार करना हम अपनी प्रतिष्ठा के लिए घातक मानते हैं। सोचते हैं कि इससे हमारी प्रतिष्ठा पर आँच आएगी। हम दोषी मान लिये जाएँगे। इससे हमारी इमेज खराब हो जाएगी। हमारी इज़्ज़त चली जाएगी। वास्तव में गलती स्वीकार करने पर हमारी प्रतिष्ठा पर कोई आँच नहीं आती;  अपितु ऐसी स्थिति में लोग हमें सत्यनिष्ठ व ईमानदार मानने लगते हैं। यदि ऐसा है तो हम फिर भी अपनी गलतियों को स्वीकार करने में क्यों हिचकिचाते हैं? वास्तव में गलतियों को स्वीकार करना भी साहस का कार्य है और हम अपेक्षित साहस नहीं जुटा पाते। जब हम बार-बार गलतियाँ करते हैं और उन्हें स्वीकार नहीं करते तो कई बार चाहते हुए भी हम अपनी किसी एक गलती को ये सोचकर स्वीकार नहीं कर पाते कि अब एक गलती को मान लेने से भी क्या हो जाएगा? अब नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली के हज को जाने का क्या औचित्य होगा? वास्तव में इस दुष्चक्र को तोड़ना अनिवार्य है।

किसी भी सूरत में अपनी गलती स्वीकार न करना वास्तव में हमारी उस काल्पनिक छवि को बचाए रखने के प्रयास के कारण होता है, जिसे हम किसी भी हालत में बदलते हुए देखना नहीं चाहते। प्रायः गलत बात पर अड़े रहने अथवा किसी भी सूरत में अपनी गलती न मानने को कुछ लोग एक गुण अथवा दृढ़ता के रूप में लेते हैं। कुछ लोग दूसरों को गलत सिद्ध करने के लिए भी अपनी गलत बात पर अड़ जाते हैं। वास्तव में इस प्रकार का आचरण एक बहुत बड़ा अवगुण ही नहीं;  अपितु एक बहुत बड़ी कमज़ोरी भी है। हम भोजन बनाते समय कुछ मसालों का प्रयोग करते हैं,  जिससे भोजन स्वादिष्ट ही नहीं पौष्टिक व सुपाच्य भी बनता है। यदि हम किसी एक मसाले को भी उचित मात्रा में न डालें अथवा एक ख़राब मसाला डाल दें
, तो पूरा भोजन ही ख़राब हो जाएगा। इसी प्रकार से एक गुण की कमी अथवा एक अवगुण के कारण हमारा व्यक्तित्व व चरित्र भी बुरी तरह से प्रभावित होता है। चरित्रवान अथवा नैतिक होने के लिए मात्र कुछ अच्छे गुणों का होना ही अनिवार्य नहीं अपितु अपनी गलतियों व कमज़ोरियों को सबके समक्ष स्पष्ट रूप से स्वीकार करने का गुण होना भी अनिवार्य है।

अपनी गलती को स्वीकार करना वह गुण है, जो वास्तविक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करने में सक्षम होता है। इस संदर्भ में एक प्रसंग याद आ रहा है-  सड़क सँकरी थी,  फिर भी बस तेज़ी से दौड़ी जा रही थी; क्योंकि ड्राइवर अत्यंत कुशल था। अचानक बस की गति धीमी हो गई। सामने से गन्नों से लदी हुई ट्रॉलियाँ आ रही थीं;  अतः उनको रास्ता देने के लिए भी बस की गति कम करना अनिवार्य था। जब बस गन्नों से लदी हुई ट्रॉलियों के पास पहुँची,  तो वे सड़क से थोड़़ा नीचे उतरकर सड़क के किनारे लगकर खड़ी हो गईं। यह एक पर्यटक बस थी;  जिसमें शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारी और अध्यापक सवार थे,  जो भारत-भ्रमण पर निकले थे। गन्नों को देखकर कई लोगों के मुँह में पानी आ गया; लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हुई कि किसी ट्रॉली में से एक गन्ना भी खींच ले, क्योंकि विभाग के सबसे बड़े अधिकारी भी बस में उपस्थित थे। चाहे कितने भी कामचोर अथवा भ्रष्ट कर्मचारी क्यों न हों; लेकिन अपने विभाग के बड़े अधिकारियों की उपस्थिति में तो वे अधिकाधिक अनुशासनप्रिय, कर्मठ और ईमानदार होने का प्रमाण ही प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। कुछ ऐसी ही विवशता यहाँ भी दिखलाई पड़ रही थी।

बस की गति भी अत्यंत धीमी हो गई थी और बस सड़क के किनारे खड़ी गन्नों से लदी एक ट्रॉली को पार कर रही थी। इतने में शिक्षा अधिकारी महोदय ने बाहर हाथ निकाला और झटपट एक गन्ना खींच लिया। बस फिर क्या था,  सारी वर्जनाएँ टूट गईं। केवल बस की दाईं और बैठे यात्रियों ने ही नहीं, अपितु विपरीत दिशा में बैठे यात्रियों ने भी दूसरी तरफ आ-आकर गन्ने खींचने शुरू कर दिए। बस में भगदड़ जैसी स्थिति हो गई। इतने में एक नवयुवक ने खड़े होकर कहा, ‘‘अरे आप सब लोग ये क्या कर रहे हो? एक किसान, जो इतनी मेहनत से फसल उगाता है, उसे यूँ ही मुफ़्त में झपट रहे हो।’’ इतना कहकर नवयुवक ने शिक्षा अधिकारी की ओर मुँह किया और कहा, ‘‘सर आप भी!’’ सहयात्री नवयुवक को आग्नेय नेत्रों से घूरने लगे और एक व्यक्ति ने कहा, ‘मिस्टर अपनी औक़ात में रहो। शिक्षा अधिकारी से इस तरह बात करने की जुर्अत कैसे की तुमने?’’

अब शिक्षा अधिकारी की बारी थी। वे खड़े हो गए और बोले, ‘‘ठीक ही तो कह रहा है ये नवयुवक। हमें क्या अधिकार है किसी की चीज़ यूँ उठाने का। और चोरी के बाद अब सीनाज़ोरी। नहीं, हम सबने गलत किया है।’’ इसके बाद उन्होंने कहा कि पहले मैंने गलती की और बाद में आप सबने उसे दोहराया। मुझे फ़ख़्र है कि पूरी बस में एक व्यक्ति तो है , जिसमें ईमानदारी व नैतिकता के साथ-साथ निडरता से अपनी बात कहने का साहस भी है, जिसने अपने उच्च अधिकारी की भी ख़बर लेने की हिम्मत की। मैं अपनी गलती स्वीकार करता हूँ और अपने नवयुवक मित्र की ईमानदारी, नैतिकता और साहस की प्रशंसा करता हूँ।

दुर्लभ होते हैं ऐसे नवयुवक और उससे भी अधिक दुर्लभ होते हैं ऐसे उच्च अधिकारी। पद से कोई व्यक्ति बड़ा नहीं होता अपितु बड़ा होता है पद की गरिमा बनाए रखने से और उदात्त जीवन मूल्यों को नष्ट होने से बचाए रखने से। अपनी गलती को स्वीकार करना एक उदात्त जीवन मूल्य है और उसे स्वीकार करने वाला एक बड़ा व्यक्ति।

 एक और घटना याद आ रही है। एक बहुत अच्छे व्यक्तित्व विकास एवं मानव संसाधन विकास प्रशिक्षक हैं। सचमुच बहुत अच्छे प्रशिक्षक। एक बार एक कार्यक्रम में उन्हीं के द्वारा प्रशिक्षित व्यक्तियों की एक प्रतियोगिता चल रही थी। उस प्रतियोगिता के निर्णायकों में वे स्वयं भी थे। प्रतियोगिता अंतिम दौर में थी। अंत में बचे दो प्रतिभागियों में से एक को विजयी घोषित किया जाना था। अंतिम मुक़ाबले के बाद उन्होंने अपनी पसंद के प्रतिभागी को सही बतलाकर उसे विजयी घोषित कर दिया। उनका इतना सम्मान था कि लोग उनकी गलत बात का भी विरोध नहीं कर पाते थे;  लेकिन उस दिन वहाँ उपस्थित अधिकतर लोगों ने उनके निर्णय को गलत बतलाते हुए उनका विरोध किया। इस पर उन्होंने बॉस इज़ ऑल्वेज राइट कहकर सबको चुप रहने के लिए विवश कर दिया। उसके बाद इस प्रकार का आचरण करना उनके लिए सामान्य बात हो गई।

 उनके इस प्रकार के आचरण से उनकी प्रतिष्ठा पर अत्यंत प्रतिकूल प्रभाव पड़ा; क्योंकि उनके सामने सही बोलने का महत्त्व कम होता चला गया अतः सही लोग उनसे दूर होते चले गए और केवल चापलूस क़िस्म के लोग उनके साथ रह गए। उनके कुछ सहयोगी प्रशिक्षक भी उनको छोड़कर चले गए,  जिससे उनके व्यावसायिक हित भी बुरी तरह से प्रभावित हुए। ऐसे अनेक व्यक्ति मिल जाएँगे, जो अपनी हैसियत अथवा प्रतिष्ठा के दंभ में अपनी गलती को स्वयं स्वीकार करना और उसे सुधारना तो दूर उनकी गलती को बतलाने पर भी वे उसे स्वीकार करने और सुधारने को तैयार नहीं होते। कई बार कुछ निहित स्वार्थों अथवा पक्षपातपूर्ण रवैये के कारण भी लोग गलती करते हैं, अतः ऐसी दशा में उनके द्वारा की गई गलती की स्वीकृति और सुधार का प्रश्न ही नहीं उठता। लेकिन जान-बूझकर गलती करने अथवा अपनी गलती को स्वीकार करके उसे नहीं सुधारने का ख़मियाज़ा तो अवश्य ही भुगतना पड़ता है।

प्रायः देखने में आता है कि अधिकतर व्यक्ति अपने से कमज़ोर अथवा कम हैसियत वाले लोगों व अपने विरोधियों में गलतियाँ निकालते रहते हैं व अपने से अच्छी हैसियत वाले लोगों व अपने प्रियजनों अथवा समर्थकों की गलतियों को न केवल नज़रअंदाज़ करते रहते हैं;  अपितु उनकी गलतियों को गलतियाँ न मानकर उन्हें महिमामंडित करने के प्रयासों में लगे रहते हैं। साथ ही एक सही व्यक्ति पक्षपातरहित होकर किसी की गलती को नज़रअंदाज़ करने के बजाय उसे स्पष्ट रूप से कह देता है। वास्तव में गलती तो किसी से भी हो सकती है लेकिन केवल महान व्यक्ति ही अपनी गलती का अहसास होने या कराए जाने पर उसे स्वीकार करने में देर नहीं लगाते। भूल अथवा गलतियाँ होना स्वाभाविक हैं। गलतियों को स्वीकार किए बिना उनका सुधार करना अथवा होना भी असंभव है। हम अपनी गलतियों से ही सबसे ज़्यादा सीखते हैं अतः जो व्यक्ति भी अपनी गलतियों को स्वीकार कर सुधार लेते हैं वे न केवल महान बन पाते हैं अपितु सही अर्थों में वे ही महान होते हैं।

सम्पर्कः ए.डी. 106- सी., पीतमपुरा, दिल्ली- 110034, मो. 9555622323, Email : srgupta54@yahoo.co.in