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Apr 1, 2026

आलेखः जीवन के उत्तरकाल को सहजता से जीना सीखें

 - सीताराम गुप्ता

जीवन के उत्तरकाल में व्यक्ति की मनोदशा में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। वह शेष जीवन में बहुत कुछ और बहुत अच्छा करना चाहता है। पिछले दिनों मेरे एक मित्र के जन्मदिन की पचहत्तरवीं वर्षगाँठ थी। पचहत्तरवीं वर्षगाँठ की पूर्वसंध्या पर उन्होंने एक संदेश भेजा - मैं कल से वाट्सएप का प्रयोग नहीं करूँगा अतः कृपया वाट्सएप पर मुझे कोई संदेश न भेजें। बहुत ज़रूरी हो तो आप मुझे फोन कर सकते हैं। इससे एक सप्ताह पूर्व भी उनका एक संदेश आया था कि एक सप्ताह बाद वे पचहत्तर वर्ष के हो जाएँगे और सभी लोग उनके लिए प्रार्थना करें कि वे अपना शेष जीवन सांसारिक मोह-माया से मुक्त होकर व्यतीत कर सकें। हमारे यहाँ जीवन को चार अवस्थाओं में विभक्त किया गया है - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व संन्यास। यदि हम इस दृष्टि से देखें तो पचहत्तर वर्ष की आयु के उपरांत संन्यास की अवस्था प्रारंभ हो जाती है। पारंपरिक वैदिक रीति से जीवन व्यतीत करने की आकांक्षा उत्तम है लेकिन यह विचार करना भी अनिवार्य है कि आज की परिस्थितियों में यह कहाँ तक संभव अथवा उपयुक्त है?

     आज परिस्थितियाँ बहुत बदल चुकी हैं। आज की परिस्थितियों में हजारों वर्ष पूर्व की दिनचर्या अथवा जीवनचर्या का पालन करना कठिन ही नहीं असंभव है। पुरातन परंपरा के अनुसार पचहत्तर वर्ष के बाद की अवस्था संन्यास की है जिसमें घर-बार छोड़कर जंगल में जाकर जीवन व्यतीत करना होता है। क्या आज ये संभव है? यदि हम संन्यास ले लेंगे, तो कहाँ जाएँगे? जंगलों में जहाँ वन्य जीवों के लिए ही स्थान कम पड़ रहा है, वहाँ मनुष्य द्वारा जंगलों में जाकर अपना शेष जीवन व्यतीत करने की सोचना भी उचित प्रतीत नहीं होता। जो लोग एक निश्चित उद्देश्य के लिए कम आयु में ही संन्यास लेकर संन्यस्थ जीवन व्यतीत कर रहे हैं उनमें से शायद ही कोई सही अर्थों में संन्यासी हो। वैसे भी संन्यस्थ जीवन का पालन तभी उचित लगता है जब उससे पूर्व का जीवन भी उसी पद्धति से अवस्थानुकूल व्यतीत किया गया हो।

     यदि जीवन के अंतिम क्षणों तक सामान्य रीति से जीवन व्यतीत हो जाए तो उसमें भी कोई दोष दिखलाई नहीं पड़ता। वास्तव में बहुत सामान्य बने रहना ही लोगों के लिए कठिन होता है क्योंकि वे निर्लिप्त, विरक्त अथवा मोह-माया से मुक्त आदि होना नहीं चाहते अपितु घर-परिवार और समाज को ऐसा कुछ दिखाना चाहते हैं जिससे उनकी समाज में एक विशेष छवि बन जाए। न शरीर की आवश्यकताओं की उपेक्षा संभव है, न मन की इच्छाओं की। अच्छा तो यही है कि जीवन को जितना संतुलित कर सकते हैं करें, शेष सामान्य रीति से घटित होने दें। जहाँ तक सुविधाओं और तकनीक के प्रयोग का प्रश्न है इनका विवेकपूर्ण प्रयोग करने में कोई दोष नहीं। जैसे-जैसे आयु बढ़ती है वैसे-वैसे इन सब चीजों से हमें आसानी ही होती है। आज के व्यस्त जीवन में संचार के आधुनिक विकसित साधनों का कितना महत्त्व है यह बतलाने की आवश्यकता नहीं। है। आयु बढ़ने के साथ तो कई सुविधाएँ अत्यावश्यक की श्रेणी में सम्मिलित हो जाती हैं।

     यदि वाट्सएप की ही बात करें, तो ये एक अत्यंत उपयोगी माध्यम है। यदि हम इसके द्वारा निरर्थक मेल भेजने में लगे रहते हैं, तो ये हमारा दोष है न कि वाट्सएप का। यदि हम आयु के किसी पड़ाव पर निर्णय लेते हैं कि अब हम वाट्सएप अथवा अन्य संचार सुविधाओं का उपयोग नहीं करेंगे तो इसका एक अर्थ ये भी निकलता है कि अब तक हम इनका अत्यधिक उपयोग अथवा दुरुपयोग कर रहे थे। वास्तव में इन सब बातों पर समय रहते विचार करना अनिवार्य होता है। हाँ, वाट्सएप, फेसबुक अथवा अन्य सुविधाएँ एक लत बन गई हैं, तो उन्हें छोड़ने का निर्णय उत्तम होगा इसमें संदेह नहीं। हमारे लिए उचित तो यही होगा कि हम ग़लत अथवा अनुपयोगी चीजों अथवा आदतों को छोड़कर अन्य उपयोगी अथवा आवश्यक चीजों को अपना भी लें। घोर व्यावसायिक वृत्ति को त्याग दें लेकिन हमारी रचनात्मकता में किसी भी कीमत पर कमी नहीं आनी चाहिए। इससे स्वयं का विकास भी होगा और समय भी अच्छा व्यतीत होगा।

     यदि हम अकेले अथवा जीवनसाथी के साथ परिवार से अलग रहते हैं तथा घर के काम में सहायता के लिए सर्वेंट अथवा मेड रखते हैं तो क्या उन्हें भी हटा देंगे? यदि हम पेंशनर हैं, तो क्या पेंशन लेना भी बंद कर देंगे? शायद ये सब संभव न हो; क्योंकि आज के युग में पैसों के बिना किसी का जीवन नहीं चल सकता। साधु-संन्यासियों का भी नहीं। फिर केवल कुछ बातों के विषय में भावनात्मक निर्णय क्यों? एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न और भी है और वह यह है कि यदि हम अपने जीवनसाथी के साथ रहते हैं, तो क्या उसको भी ऐसा करने की छूट देते हैं? प्रायः ऐसा होता है कि हम अपने जीवनसाथी अथवा परिवार को तो यथावत सब करने की छूट दे देते हैं; लेकिन स्वयं महात्मा बनने का नाटक करते रहते हैं। ऐसी नाटकीयता का कोई लाभ नहीं। यथार्थ से पलायन भी हमारी समस्याओं को बढ़ा देता है। वास्तविकता को स्वीकार कर लेने से बहुत- सी समस्याएँ उत्पन्न ही नहीं होतीं।

     वास्तव में जब तक जीवन है इस संसार में मोह-माया की पूर्णतः उपेक्षा संभव ही नहीं। मोह के कारण ही हम आपस में जुड़े हुए हैं। स्पष्ट है कि सेवानिवृत्ति अथवा साठ-सत्तर अथवा पचहत्तर-अस्सी वर्ष की आयु के बाद भी हमें इसी दुनिया में रहना है, तो फिर इस आकर्षक संसार से जान-बूझकर विरक्ति अथवा पलायन क्यों? ऐसा भी संभव है कि अधिक मोह-माया की मुक्ति के नाटक के कारण हम कहीं के भी न रह पाएँ। कुछ लोगों की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी होती है कि वे कोई भी सहायक आसानी से रख सकते हैं। मेरा मानना है कि यदि आपके पास पहले से कोई सहायक नहीं है और आपको कार्य करने में असुविधा होती है, तो कोई न कोई सहायक रख लीजिए। इससे न केवल आपको जीवन में सुविधा हो जाएगी; अपितु किसी ज़रूरतमंद को रोजगार भी मिल जाएगा।

     प्रायः अधिकतर लोग कुछ सकारात्मक व्यावहारिक कदम उठाने की बजाय ऊलजलूल निर्णय ले बैठते हैं। कई लोग न तो आत्म-प्रदर्शन व आत्म-प्रशंसा का लोभ छोड़ पाते हैं और न ही दूसरों के द्वारा प्रशंसा पाने का लोभ ही छोड़ पाते हैं; इसलिए वे लोग कुछ ऐसा करना चाहते हैं, जिससे वे चर्चा में बने रह सकें अथवा लोगों की प्रशंसा पा सकें बेशक उनके कार्य कितने ही अनुपयोगी अथवा अव्यावहारिक क्यों न हों। कई लोगों की आदत होती है कि भजन-कीर्तन करते हुए अथवा माला फेरते हुए भी न केवल इधर-उधर देखते रहते हैं; अपितु बच्चों को डाँटने-डपटने के साथ-साथ दूसरे लोगों को निर्देश भी देते रहते हैं। ऐसी नाटकीयता का कोई लाभ नहीं। हमें हर तरह के आडंबर व पाखंड तथा आत्म-प्रदर्शन व आत्म-श्लाघा से दूर रहने और एक व्यावहारिक व सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास करना चाहिए। 

     आयु के साथ-साथ कुछ गतिविधियाँ अथवा कुछ चीजें स्वतः छूट जाती हैं। ऐसे में हमें उपयोगी वस्तुओं और सुविधाओं की बजाय निरर्थक चीजों से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए। कुछ लोग एक अवस्था के बाद हर काम करना छोड़ देते हैं अथवा किसी भी बात में रुचि नहीं लेते। जब तक जीवन है हमें न केवल काम करते रहना चाहिए अपितु इस सुंदर संसार की हर बात में रुचि भी बनाए रखनी चाहिए। शरीर और मन को स्वस्थ रखने के लिए दोनों चीजें अनिवार्य हैं। वास्तव में लोग आयु के बढ़ने से बूढ़े नहीं होते अपितु इसलिए बूढ़े हो जाते हैं कि उनके पास जीवन को जीने का कोई लक्ष्य नहीं होता। जेआरडी टाटा, डॉ. मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया अथवा एमएफ हुसैन आदि महानुभावों ने लंबी आयु पाई व जीवन की अंतिम साँस तक कार्य किया और अपने अंतिम दिनों में जो कार्य किया, वह उनके पिछले कार्यों के मुकाबले में भी बहुत बेहतर था। यही वास्तविक संन्यास है; क्योंकि संन्यासी भी समाज को कुछ देने के लिए ही इस क्षेत्र में पदार्पण करते हैं। अंतिम दिनों में समाज को अपना सर्वस्व दे देने से अच्छा कुछ भी नहीं।

     सादगी से जीवन जीना अच्छी बात है; लेकिन सादगी का अर्थ अकर्मण्यता अथवा पलायन नहीं होता। सादगी से तात्पर्य कंजूसी अथवा असामान्य अवस्था में रहना भी नहीं है। अच्छे ढंग से रहने और अच्छे कपड़े पहनने में भी कोई बुराई नहीं होती। सलीके से रहना और कार्य करना न केवल व्यक्ति के आत्मविश्वास में वृद्धि करता है अपितु समाज में भी यथोचित सम्मान दिलवाता है। कई बार सादगी अथवा विशेष रीति से जीवन जीने के लिए हम परिवार के सदस्यों अथवा समाज के लिए मुसीबतें खड़ी कर देते हैं जो किसी भी तरह से ठीक नहीं कहा जा सकता। अपनी उपयोगिता कभी नष्ट नहीं होने देनी चाहिए। अधिक नाटकबाजी और अपनी अनुपयोगिता के कारण ही अधिकतर लोग संबंधों के कूड़ेदान में फेंके जाने को अभिशप्त होते हैं। सादगी व्यवहार व चरित्र में होनी चाहिए, न कि वस्त्रों में। साधारण अथवा अवसरानुकूल वस्त्रों के अभाव में एक बड़ा विद्वान् भी सभा में अपेक्षित सम्मान नहीं पाता है।

     हमें स्वयं को संकुचित दायरे में डालने की बजाय स्वयं में घर-परिवार और समाज के लिए और अधिक व्यापक दृष्टि व सहयोग की भावना का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। यदि हम समाज में रहते हैं, तो उससे कटकर नहीं रह सकते। घर-परिवार व समाज से जुड़े रहने के लिए भी साधनों की उपेक्षा संभव नहीं। बढ़ती आयु के साथ-साथ व्यक्ति को दूसरे लोगों के साथ और सहयोग की अपेक्षाकृत अधिक आवश्यकता होती है। यदि बड़ी आयु में हम सचमुच जीवन को अधिक सार्थक व गरिमापूर्ण बनाना चाहते हैं, तो हमें अपनी संकीर्ण मनोवृत्ति को त्यागकर उसे अधिकाधिक व्यापक बनाना चाहिए। हमारी स्वीकार्यता घटने के बजाय बढ़नी चाहिए। इस अवस्था तक पहुँचते-पहुँचते मनुष्य अनुभवों की खान बन जाता है। उसके अनुभवों तथा उसकी योग्यता और क्षमता का उपयोग सीमित न रहकर, पूरे समाज के लिए होना चाहिए। संकुचित दृष्टिकोण रखने वाला अथवा एकाकी जीवन व्यतीत करने की आकांक्षा रखने वाला व्यक्ति परिवार, समाज अथवा राष्ट्र को शायद ही कुछ दे पाए!■

सम्पर्कः  ए.डी. 106 सी., पीतमपुरा, दिल्ली- 110034, मो. 9555622323, Email : srgupta54@yahoo.co.in


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