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Mar 1, 2025

दो लघुकथाएँः

- सुधा भार्गव
1.सुहाग की निशानी

“बाबा, झुक- झुककर क्या देख रहे हो? कहीं कमर में दर्द न हो जाए!”

“क्या बताऊँ बेटा, तेरी दादी का एक बिछुआ  न जाने कहाँ गुम हो गया । दो दिन से ढूँढ रहा हूँ मगर आँखों की नजर ऐसी कमजोर हो गई है कि अगर पड़ा  भी होगा तो दिखाई न देगा।”

“दादी तो बहुत साल से घिसा हुआ बिछुआ पहन रही थी ।  जाने दो... दूसरा आ जाएगा।”

“माँ, शाम को तैयार रहना । बाजार जाकर दादी के लिए बिछुए ले आएँगे।” पोते ने कुछ ज्यादा ही ज़ोर से  कहा । 

“तू किस चक्कर में पड़ गया ! आजकल कोई बिछुआ पहनता है ! इतनी शानदार कॉलोनी में हम रहते हैं- ये दक़ियानूसी बातें यहाँ नहीं चलती। कोई सुनेगा तो हँसेगा।” 

“बहू, मेरी  पत्नी आजकल की नहीं , पुराने समय की है । उसका मन नहीं मानता।”

 “इन फालतू की चीजों में खर्च करने को मेरे पास पैसा नहीं है !”

“तुम खरीद लो - पैसे मैं  दे दूँगा।”

“कह तो ऐसे रहे हो,  जैसे पैसों का पहाड़ लगा हो। घर के खर्चे के लिए तो फूटी कौड़ी नहीं निकलती।” बहू की आवाज में तीखापन था।

 “ओह माँ बस भी करो। वे दिन तो जरा याद करो, जब बाबा मेरे पर कितना खर्च करते थे।” वह खिन्न हो ऑफिस चला गया।

दादी फूट पड़ी-“बहू  से कहकर क्यों अपनी इज्जत छोटी की। एक अँगूठे  में पहनूँ या दोनों  में - क्या फरक पड़ता है । सच्चा सुहाग तो  मेरे सामने बैठा है।”

2. मान का पान  
उसकी एक बात हो तो कहूँ! चलो कल का ही किस्सा सुना देती हूँ। बात कुछ ऐसी है कि मैं 2 महीने से अपने बेटे के यहाँ अमेरिका आई हुई हूँ । मेरे दोनों भाई तो 15 दिन पहले ही  यहाँ आ गए थे।  अपनी बेटी के यहाँ ठहरे हुए हैं ।एक हफ़्ते बाद भारत जाने वाले भी हैं। मैंने सोचा कुछ समान अपने भतीजों के लिए भी भेज दूँ। पर मुसीबत ! न तो अकेली ख़रीदारी को जा सकती हूँ न ही उसका कैश पेमेंट कर सकती हूँ। पेमेंट ऑनलाइन बहू ही करती है।
अब उससे कहना तो पड़ता ही।
भूमिका बाँधते हुए  अपने मन की बात कहने एक दिन बैठ ही गई- “बहू , यह तो ठीक है मेरी मनपसंद का सब सामान खरीद कर ले आती हो। मुझे तो फ्री में माल मिल जाता है; लेकिन कुछ सामान भतीजे- भतीजी के लिए  खरीदकर अपने भाइयों के साथ इंडिया भेजना चाहती हूँ।”
“ठीक है । बताइए …आप क्या-क्या भेजना चाहती हैं। मैं खरीद करके ले आऊँगी या आप मेरे साथ मॉल चलिएगा।”
“यह तो ठीक है; लेकिन यह सामान तो मैं अपने भाइयों को भेजना चाहती हूँ न; इसलिए इसका पेमेंट मैं करूँगी।”
“क्या फर्क पड़ता है मम्मी जी, मैं करूँ या आप करो । सब एक ही तो पैसा  है। मैं तो अलग-अलग समझती ही नहीं।”
मैं हैरानी की दलदल में फँस गई। मुँह से  निकल गया … “ऐसे संस्कार ! तुमने  पाएँ कहाँ से!”
“आपसे।” उसने हँसते हुए कहा।
“मुझसे !”
“हाँ मम्मी जी, आपको याद है पिछली बार आपने  अपने गहनों की  एक संदूकची दी थी और कहा था… इसे  अपने लॉकर में रख दो और इन्हें खूब पहनो। जब मेरी इच्छा होगी, तो मैं लेकर पहन लूँगी।’
कुछ दिन पहले  भी तो नया घर खरीदने की खुशी में आपने हमें जो उपहार दिया था, वह अपने हाथों से न देकर जेठ जी के हाथों से दिलवाया था। जब आप छोटे को इतना मान देती हैं, तो हम आपको  क्यों ना मान दें।”

Apr 1, 2022

दो लघुकथाएँः

1. वात्सल्य की हिलोरें
- सुधा भार्गव

सोहर गाई जा रही थी । सोहर गीत पीड़ा और  आनंद के खट्टे - मीठे अनुभवों से लबालब भरे हुए थे। जच्चा बनी वह बिस्तर पर लेटे प्रसव की पीड़ा को भुला मातृत्व के अनोखे आनंद  में डूबी हुई थी। बधाइयों का ताँता लगा हुआ था। बच्चे के पैदा होते ही घर में खुशियों की भरमार जो हो  गई थी। अचानक घर से बाहर तालियों की थाप पर बहुत से स्वर गूँज उठे। 'अम्मा तेरा बच्चा बना रहे। तेरे आँगन में फूल खिलें । हाय हाय कितनी देर  हो गई बालक कू तो दिखा दे । नहीं तो घर में ही घुस जाएँगे । फिर न कहियो हम ऐसे हैं ।' पुन: वही तालियों की थाप। अंतिम वाक्य  सुनते ही जच्चा काँप उठी। समस्त ज़ोर लगाकर चिल्लाई -"इनको जो चाहिए दे दो। बच्चा तो अभी- अभी सोया है।"

"अइयो रामा तेरे कलेजे का टुकड़ा हमारा भी तो कुछ लगे है। ठप्प ठप्प … चट्ट चट्ट.. कैसे छोड़ देंगे अपनी जात के को।" एक बोली 

"ला-- ला हमारी गोद में डाल दे।" दूसरी बोली।

बच्चे को उठाए लड़खड़ाती जच्चा बाहर आई।  कातर स्वर में बोली-"न न अभी नहीं। कुछ दिन मेरी गोदी में खेलने दो। कितनी मुश्किल से गोद हरी हुई है। इसके बिना  मैं मर जाऊँगी। कैसा भी है मेरा खून है।"

"माई  बड़ी -बड़ी  बात न कर । क्या तू इसके लिए अपने पूरे समाज से लड़ सकेगी।"

 "हाँ हाँ क्यों नहीं!। आज तुम अपने अधिकारों की बात करती हो  तो इससे तो इसका अधिकार न छीनो।  माँ -बाप और घर से उसे अलग करके तुम्हें क्या मिलेगा!"

"अरी प्रधाना तू क्यों चुप है। कुछ बोलती क्यों नहीं!  तू तो पढ़ी लिखी है। मेरी समझ में इसकी बात धिल्लाभर ना आ रही।" प्रधाना की साथिन ही हाथ नचाते बोली।

 प्रधाना दूसरी दुनिया में ही खोई थी । ‘अपने से अलग करते समय माँ ने उसे कितना चूमा चाटा था । आँचल फैलाकर रुक्का बाई से दया की भीख माँगी थी। पर वह न पिघली तो न ही पिघली । माँ की पकड़ से खीचते हुए वह उसे दूर बहुत दूर ले  गई।’ उसकी आँखों से दो आँसू चूँ पड़े।

"अरे किस दुनिया में खो गई।" उसकी साथिन ने झिंझोड़ते हुए कहा।

प्रधाना ने चौंक कर जच्चा की ओर देखा । वह एक माँ की तड़पन देख चुकी थी। एक और माँ को बिलखता देखने की शक्ति उसमें  नहीं थी।

उसने एक पल गोद में लिए जच्चा को ऊपर से नीचे तक देखा।   फिर दृढ़ता से बोली- ‘हम  यहाँ बच्चे को  आशीर्वाद देने आए हैं उसे लेने नहीं।’  

2. धन्ना सेठ

लगता है लॉक डाउन का जमाना लड़ गया है । भगवान न करे, फिर लौटकर आए। पर अतीत की यह याद कहाँ ले जाऊँ!

  “आज पहला लॉक डाउन ख़तम होने वाला था। पर उससे  पहले ही दूसरे लॉक डाउन की घोषणा हो गई। है। यह तो 3 मई तक चलेगा।”

      “हाँ सिम्मी , पिछले महीने का पैसा तो बाई को दे दिया है। उसने तो 19 तारीख  तक ही  काम किया था  पर  पप्पू के पापा तो इतने रहम दिल हैं कि क्या बताऊँ !बोले- पूरे माह का ही दे दो। सो भइया 10 दिन  का  ज्यादा ही उसे मिल गया । लेकिन इस माह तो पूरे महीने काम पर बाई नहीं  आएगी, सो उसे तनख्वाह देने की कोई तुक ही नहीं।”

     “लेकिन बाई का तो कोई कसूर  नहीं। चाहकर  भी न आ सकी।”

    “भई मैं तो सब काम नियम -कायदे से  करती हूँ।”

     “शकीला, कभी -कभी मानवीयता की खातिर नियम- कायदे ताक पर रखने  पड़ते हैं। 2-3 हजार देने से न तुझे कोई कमी होगी न घर भरेगा पर बाई के बच्चों का पेट भर जाएगा। उनके चेहरे एक बारगी  खिल उठेंगे ।”

       “मैंने क्या उसके पूरे कुनबे  का ठेका ले रखा है!” शकीला चिढ़- सी गई।

     “ऐसी ही बात समझ।  साल- साल  बाई हमारे काम करती है। एक दिन न आएँ तो कितनी परेशानी हो जाती है। फिर उनकी  परेशानी  में हम काम क्यों न आएँ । यह तो फर्ज बनता है ।”

     “फर्ज तो तभी निभाया जाता  है जब  किसी की औकात हो  तुम्हारा क्या! तुम तो सिठानी हो... दो-दो होटल चलते  हैं ।”

 “ लॉकडाउन में होटल तो बंद हैं।  पर दो कर्मचारियों के रहने और खाने-पीने की व्यवस्था होटल में कर दी है। वक्त -बेवक्त  शायद वे काम आ जाएँ ।”

  “तो हुआ क्या फायदा उनसे... तुम्हारे घर तो खाना बनाकर ला नहीं सकते । बाहर निकलने पर भी तो पाबंदी है।”

    “फायदे की न पूछ .. इतना फायदा हो रहा है... इतनी संतुष्टि मिल रही है कि कह नहीं सकती! प्रवासी मजदूरों के तो खाने के लाले ही पड़ गए हैं । नौकरी जो छूट गई !उनके कष्टों को सोच-सोच कर तो मेरे रोएँ खड़े हो जाते हैं। मेरे दोनों कर्मचारी 100 के करीब मजदूरों को दोनों वक्त  का खाना बनाकर खिलाते हैं । सोच तो कितनी दुआएँ देते होंगे।”

     “भगवान् जाने दुआएँ देते होंगे भी! पर  यह तो वही बात हुई आ बैल तू मुझे  मार । पैसा तो आपदा में सोच-समझ कर ही खर्च करना होगा। सुनते हैं कोरोना  दानव से निबटने के लिए सरकार को बड़ी -बड़ी फैक्टरियों के मालिकों से मदद चाहिए । मालिक भी अपने कर्मचारियों की जेब में ही सेंध लगाएँगे।  कहने को तो  पप्पू के पापा  बड़ी सी फैक्टरी के मैनेजर हैं, पर उनकी  जेब  पर भी न  जाने कब छापा पड़  जाये । ऐसे में तो बाई की तनख्वाह देने का सवाल ही नहीं उठता । तेरा क्या तू तो धन्ना सेठ है। तुझे ही दान-पुण्य का काम मुबारक हो।

     “दान पुण्य के लिए धन्ना सेठ होना जरूरी नहीं शकीला .. इसका सम्बन्ध तो दिल की अमीरी से है।”

Sep 3, 2021

बाल कहानी- चोरनी

-सुधा भार्गव

  सुंदर सी  एक खंजन चिड़िया थी। बड़ी रंगबिरंगी! काली, सफेद, भूरी। उसकी सुंदरता का रहस्य उसकी चंचल आँखें थीं। उसे  नदी- तालाब का किनारा बहुत अच्छा लगता। जब देखो वहाँ बैठी पूँछ हिलाती रहती। उसके चलने का तरीका भी अजीब था। फुदकती नहीं बल्कि दौड़कर चलती।  खेतों में खूब मस्ती से दौड़ लगाती, कीड़े -मकोड़े गपक गपक खाती। उसके डर से कीड़ों में भगदड़ मच जाती पर वह तो उड़ते कीड़ों को भी लपक लेती।  ठंडी हवा में उसकी लहराती उड़ान देखते ही बनती। इतराती  हुई चिटचिट करती सुरीली आवाज में उसका स्वर गूँजता तो खंजन चिड़ा बड़ा खुश होता और उस पर ढेर सा  प्यार उमड़ पड़ता।  

    फुर्सत में वह नदी के घाट पर उतर पड़ती जहाँ धोबिनें कपड़े धोतीं। वह मजे से उनके बीच टहलने लगती और छेड़ देती अपनी मधुर तान। बेचारा चिड़ा उसका इंतजार करता रहता। जब बहुत देर हो जाती तो झुँझलाकर चिल्लाता  ‘अरे धो लिए बहुत कपड़े ..अब आजा धोबिन।’ 

   चिड़िया तुरंत उड़कर प्यालेनुमा घोसले में पहुँच जाती। जहाँ चिड़ा उसके इंतजार में आँखें बिछाये रहता।

     खंजन चिड़िया को गर्मी बहुत लगती थी। गरम हवा चलने पर वह बेचैन रहने लगी। 

एक दिन खंजन चिड़ा से बोली – ‘तू  मुझे बहुत प्यार करता है ?’

‘हाँ इसमें पूछने की क्या बात है ?’

‘जो मैं कहूँगी मेरे प्यार की खातिर करेगा ?’

‘यह तिरवाचा क्यों भरवा रही है ? जो कहना है सीधी तरह बोल दे।’ 

‘मुझे तो कश्मीर जाना है। सुना है वहाँ फूलों से ढकी घाटियाँ हैं। खुशबू भरी हवा सब समय बहती है। बीच बीच में पानी के झरने फूट पड़ते हैं। तुझे तो मालूम ही है मुझे पानी का किनारा बहुत अच्छा लगता है। झरने के किनारे बैठकर उसका ठंडा  मीठा पानी पीऊँगी और पानी से भी मीठा गाना गाकर तुझे खुश कर दूँगी।’ चिड़ा उसकी बात पर हंस पड़ा। 


    अगले  दिन सुबह ही दोनों कश्मीर की ओर उड़ चले। वहाँ पहुँचते ही खंजन चिड़ा ने सबसे पहले अपनी चिड़िया के लिए हरे भरे पेड़ पर सुंदर सा घोंसला बनाया। वह पेड़ एक झील के  किनारे था। झील की लहरें जब पेड़ के लंबे मजबूत तने से टकरातीं तो  घोंसले में बैठी खंजन चिड़िया का  पंख फैला कर ठुमकने का मन होता।     

    कुछ दिनों बाद खंजन चिड़िया सलोने से दो बच्चों की माँ बन गई। वे बड़े ही नाजुक थे। उनके पँख भी नहीं निकले थे। दोनों पीले थे। इसलिए एक का नाम निबुआ  और दूसरे का नाम पिलुआ  रख दिया । चिड़िया उनकी देखभाल करती और चिड़ा उनके लिए दाना लेने जाता। चिड़िया अपनी चोंच में दाना लेकर बच्चों की चोंच में डालने की कोशिश करती पर वे तो अपनी चोंच ठीक से खोल ही नहीं पाते थे। इसलिए दाना अंदर न जाकर  बार बार बाहर की ओर लुढ़क पड़ता । लेकिन चिड़िया अपनी कोशिश नहीं छोड़ती  । अपने प्यारे बच्चों को भूखा कैसे देख सकती थी! बच्चों का पेट भर जाता तब कहीं उसकी आँखों में चमक आती। 

   एक दिन खंजन चुग्गे की तलाश में गया। लौटते समय बरसते पानी में भीग गया। घोंसले में आते ही आंक्ची.. आंक्छी शुरू हो गई। सुबह देर से उसकी नींद खुली।  बुखार के कारण उसके सिर में  इतना दर्द कि उससे उठा ही नहीं गया। इधर -उधर आँख  घुमाई चिड़िया कहीं नजर न आई । समझ गया वह दाना लेने जा चुकी है।

   खंजन माँ  एक खेत में उतरी कुछ दाने खाकर अपना पेट भरा और कुछ दाने अपनी चोंच में भर लिए। वह उड़ने ही वाली थी कि एक किसान ने दूर से उस पर एक अंगोछा फेंक दिया । वह उसकी लपेट में  आ गई। अँगोछे को  उठाते हुए किसान चिहुँक पड़ा –‘पकड़ लिया.. पकड़ लिया  चोरनी को। न जाने कब से चोरी चोरी मेरा अनाज खा रही है और ढेर सा चुराकर ले जाती है। आज तुझे नहीं छोडूँगा।’ 

  चिड़िया गिड़गिड़ाई –‘किसान भाई मेरे बच्चे भूखे होंगे। मुझे दाने ले जाने दे । उन्हें खिलाकर वापस आ जाऊँगी। तब चाहे तुम सजा दे देना। मैं सब भुगतने को तैयार हूँ।’ 

   ‘मुझे क्या पागल कुत्ते ने काटा है जो तुझे छोड़ दूँ। एक बार गई तो क्या लौटकर आने वाली है। चोरनी कहीं की।’ उसने आँखें तरेरीं।   

   चिड़िया गुस्से से भर उठी और बोली- ‘देख किसान गाली तो दे मत।  मैं चोरनी किस बात की! तेरे खेत के कीड़े खा- खा कर फसल को बचाती हूँ। वरना वो कीड़े तेरी फसल को सफाचट कर के रख दें। एक तरह से तेरे खेत के लिए तो काम ही करती हूँ। उस मेहनत के बदले तू मुझे क्या देता है? इस फसल पर मेरा भी तो हक है। चोर तो तू है जो मेरा हक मारे बैठा है। मैंने चार दाने क्या खा लिए मुझे चोरनी कहता है। तू तो न जाने मेरे हिस्से का  कितना  अनाज  हजम कर चुका है। अब बता चोर तू है या मैं।’ 

  ‘ज्यादा बढ़ बढ़कर मत बोल । मैंने कहा था क्या ..मेरे खेत के कीड़े -मकोड़े साफ कर दे। कल से आने की जरूरत नहीं।’

   चिड़िया की चीं-चीं और किसान की टै-टै सुन चिड़ियों के झुंड आकाश से उतर  पड़े और उन्हें घेर लिया। एक बूढ़ी समझदार चिड़िया आगे आकर बोली – ‘खंजन बिटिया चिंता न कर। हम सब तेरे साथ हैं। कल से कोई चिड़िया किसी खेत की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखेगी। और किसान तू भी सुन ले। जब तक तू और तेरे साथी हमें नहीं बुलाएँगे  हममें से कोई इधर झाँकेगा भी नहीं।’

     कुछ दिन किसान बड़े खुश रहे चलो चोरनियों से छुटकारा मिला। लेकिन ज्यादा दिनों तक यह खुशी न रही।  कुछ महीने में ही खेतों में छोटे -छोटे कीड़े रेंगने लगे। पत्तों में सफेद सफेद फुनगी सी जम गई। पत्ते काले से हो गए। वे बीमार नजर आने लगे। यह देख किसान घबरा गए। अब उन्होंने समझा कि चिड़ियाँ कीड़े -मकोड़े खाकर उनका कितना उपकार करती थी। 

    एक सुबह किसान के बच्चों का कोलाहल सुनाईं  दिया।  वे मुट्ठी भर  दाना बिखेरते हुए चिल्ला रहे थे ..

आओ री चिड़िया  

चुग्गो री खेत 

खाओ री दाना 

भर -भर पेट 

जल्दी ही आकाश पंखों की सरसराहट से भर उठा। भोले-भाले  बच्चों के बुलाने  पर चिड़ियाँ  अपने को रोक न सकीं। मन की सारी कड़वाहट घुल गई।  झुंड के झुंड चिड़ियों के धरती पर उतर पड़े। इस बार उन्हें कोई चोरनी कहने वाला न था। सारे किसान और बच्चे उनको चुगता देख बहुत आनंदित हो रहे थे।

 

सम्पर्क: जे. 703, स्प्रिंग फील्ड्स, 17/20 अम्बालिपुरा  विलेज, बल्लान्दुर गेट, सर्जापौरा रोड, बंगलौर 560102, Email-subharga@gmail.com


Jun 5, 2021

कहानी- 80 का प्रवेश द्वार

-सुधा भार्गव

वर्ष 80 का प्रवेश द्वार मेरे लिए बड़ा रोमांचक अकल्पनीय और सुखद आश्चर्य से भरा सिद्ध हुआ। जिसके कारण कोरोना से तप्त संतप्त हृदय कुछ समय के लिए हरहरा उठे।

      बड़े बेटे ने कहना शुरू कर दिया था -माँ मार्च तक मेरा घर बन कर तैयार हो जाएगा । बस फिर आपको यहाँ  आना है।  मैंने सोचा उसने इतने शौक से घर बनवाया है। अब वह चाहता है सबसे पहले उसकी माँ घर में प्रवेश करे। स्वाभाविक भी है।

पहली मार्च से ही उसका फोन आने लगा –‘माँ तैयारी कर ली।’  ‘काहे की?’

 ‘मेरे पास आने की।’

 ‘अरे तेरे घर आने को क्या तैयारी करूँ!’

 ‘तब भी अच्छी -अच्छी ड्रेस रख लो।’

 ‘बेटा इस कोरोना में  कहीं आना -जाना तो है नहीं। फिर अच्छी ड्रेस का क्या होगा ?’

 ‘तब भी रख लो।’

      मुझे बड़ा अजीब लगा। मैंने बहू को फोन किया –‘ऐसे समय में तुम्हारी कहीं पार्टी -वार्टी तो नहीं है। मैं तो एकदम नहीं जाऊँगी।’

‘मम्मी जी कोई पार्टी नहीं है।’

‘तब बेटा क्यों बोल रहा था -अच्छी अच्छी ड्रेस लेकर आना।’

‘आप तो जानती ही हैं , घूमते -घूमते ही लोग मिल जाते हैं , सब तो अच्छे -अच्छे कपड़े पहने रहते हैं। फिर आपको तो सब जानते ही हैं। कोई मिलने भी तो घर में आ सकता है।’

असन्तुष्ट- सी मैं चुप हो गई।

    छोटा बेटा मेरे एपार्टमेंट में ही रहता है। उससे तो रोज ही मिलना, खाना -पीना चलता रहता है। एक रात घूमता हुआ आया। मेरी  ओर गौर से देखा और हाथ में हाथ लेता बड़ी आत्मीयता से बोला –‘माँ किसी चीज की जरूरत तो नहीं।’

‘न .. न मुझे कुछ जरूरत नहीं। जब जरूरत होती है, तब तो बोल ही देती हूँ। हाँ मेरा आई पैड बड़ा स्लो हो गया है । मैंने तेरे भाई  से कहा था नया खरीदने को।  उसने कोशिश भी की पर क्रोमो शॉप पर था ही नहीं। हो जाएगा उसका भी इंतजाम । मुझे ऐसी कोई जल्दी नहीं।’

न जाने क्यों उस दिन उसका पूछना –‘माँ किसी चीज की जरूरत तो नहीं।’ बड़ा अजीब- सा लगा।

      चार मार्च को बड़े बेटे का फिर फोन आया –‘माँ मैं कल आपको लेने आ रहा हूँ। तैयार  रहना।’ मैंने चार कपड़े रखे कि 2-3 दिन बाद तो आ ही जाऊँगी । रात को सोने ही जा रही थी कि कानपुर से बेटी का फोन आ गया -‘माँ जरा दिखाओ तो अटैची में क्या क्या रखा है?’

    मैंने कपड़ों के बारे में बताया तो बोली –‘यह सब नहीं चलेगा । फेस टाइम पर आ जाओ। अपनी अलमारी खोलकर  मुझे दिखाओं।’

    राजधानी की तरह छुक-छुक बोलते बता दिया ..ये रखो ये रखो ... । और हाँ मैचिंग पर्स और चप्पल भी रख लेना। सोचने के लिए बहुत कुछ छोड़कर वह मजे से सो गई होगी। करीब चार  सूट और दो साड़ियाँ ! मेरा दिमाग भन्ना गया । दिखाते- दिखाते मेरी  सारी अलमारी अस्तव्यस्त हो गई । मैं बड़बड़ाती रह गई, पर  बेटी की बात को टाल भी न सकी। लगता था बेटे के नहीं किसी शादी में जा रही हूँ। जैसे- तैसे सब सामान जगह पर रखा और थककर सो गई।                  

    दूसरे दिन  अलसाए भाव से मैंने  अटैची लगाई । अपना लैपटॉप ,आई पैड बैग में रख बड़े बेटे -बहू का इंतजार करने लगी। वह मेरे फ्लैट से करीब 10 किलोमीटर पर रहता है। मन में आया भी कि छोटे बेटे को कह  दूँ -वह भी वहाँ आ जाए। फिर सोचा -3-4 दिन बड़े के पास रहने का प्रोग्राम बना कर जा रही हूँ। छोटा भी एक दिन जरूर आकर मिलेगा। फिर उसी के साथ वापस आ जाऊँगी।

     पाँच मार्च की सुबह मैं बड़े बेटे के घर आ गई। घर काफी अच्छे से सजाकर रखा था । मेरे तबियत खुश हो गई। कमरों में नई चादरें, नई क्रॉकरी, सजावटी चीजों पर धूल का एक कण नहीं। बातों  ही बातों में बहू ने बताया ‘कल सुबह लंच पर सोनू भैया जी शिल्पी और बच्चे भी आएँगे। मुझे बड़ी सुबह ही एक काम से जाना है।’

‘कहाँ ? ऐसा क्या जरूरी काम आन पड़ा कि सुबह  ही निकल जाओगी। सोना को भी लंच पर बुलाया है। कैसे काम होगा।’ मैं तुनक पड़ी।

‘आप चिंता न करो माँ सब हो जाएगा।’ बेटे की बात पर मैं चुप हो गई। पर मन ही मन कुढ़ रही थी –‘कल  ही का  दिन जाने को मिला। काम टाला भी तो जा सकता था।’

     बहू अगले दिन सुबह ही निकल गई। मैंने 9 बजे तक उसका इंतजार किया फिर बोली –‘बेटा लगता है रचना को लौटने में देरी होगी मैं तो नाश्ता कर लेती हूँ।’ बाहर झाँकते बोला –‘माँ थोड़ा इंतजार कर लो । आती ही होगी। अनिच्छा से रसोई में ही छोटी मेज के सामने रखी कुर्सी पर  बैठ गई। समय काटने को मीनाक्षी अपनी  सहेली को  फोन  लगा बैठी। तभी मुझे आभास हुआ कोई मुझे पुकार रहा है। मैंने समझा बहू की सहेली है। वह अक्सर आती रहती है। तभी दुबारा आवाज आई माँ … माँ । मैंने सिर उठाया रसोई के दरवाजे पर मास्क लगाए बेटी से मिलती जुलती एक  युवती को खड़े देखा। मास्क के कारण पहचान न पा रही थी। बेटी के होने की तो कल्पना ही नहीं कर सकती थी; क्योंकि एक घंटे पहले ही मेरी  उससे बातें हुई थीं –‘माँ कानपुर से तुम्हारे पास कब आऊँ? होली से पहले या बाद में ।’

‘बेटा होली के बाद ही आना। तब तक दूसरा वैक्सीन लगे तुम्हें 15 दिन  हो जाएँगे। तुमने ही तो कहा था इम्यूनिटी के लिए 15 दिन इंतजार करना पड़ेगा।’

‘पर माँ होली के तो अभी कई दिन है।’

‘हाँ,  यह तो है। पर क्या किया जाए। मजबूरी है।’

फोन कट गया।

   मैं बड़ी उलझन में पड़ी हुई थी। जिसने कानपुर से कुछ देर पहले मुझसे बातें की हैं वह मेरे सामने कैसे हो सकती है। सामने खड़ी होने वाली को किसी तरह भी  मेरा मन बेटी मानने को तैयार न था, जिससे मिलने को तड़पती रहती हूँ।  जिसकी सुरक्षा की दिन रात कामना करती हूँ । डॉक्टर होने के नाते उसे तो रोज हॉस्पिटल जाना ही पड़ता है। 

        मेरी  मन:स्थिति वह ताड़ गई। वह हँसी ..वही जानी पहचानी हँसी मैंने सुनी पर हिली नहीं। वह  मुझे झिंझोड़ते हुए बोली –‘माँ मैं हूँ तुम्हारी पिंकी।’ तब भी मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। वह मेरे  नजदीक सिमट  आई। मैंने उसके हाथों को अपने हाथों में लिया । छूकर विश्वास करना चाहा कि मेरे सामने मेरी बेटी ही है या कोई सपना देख रही हूँ। आश्वस्त होने पर मैंने उसके दोनों हाथ थाम  लिये । चूमे और आँखों से लगा लिये। खुशी के अतिरेक से बच्ची की तरह सिसक पड़ी और गिरने लगे टप -टप आँसू वह भी बेटी की हथेली पर। ‘आह मेरे बेटी !अब कुछ दिन मेरे पास रहेगी।’ इसकी तसल्ली होते ही मुझे इतनी खुशी मिली -इतनी खुशी मिली थी कि उसको बयान करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं।

     हाँ, अब मेरी आँखे और दिमाग तेजी से कम करने लगे। बेटी के पीछे मेरी नातिन भी खड़ी थी। उसके आने की तो सोच ही नहीं सकती थी। कोरोना के कारण लॉ कालिज बंद है। ऑनलाइन पढ़ाई हो रही है। इसी कारण वह अपनी नानी से मिलने आ सकी। मैं उसे देख फूली न समाई।  उसे प्यार से गले लगा लिया।  बेटा भी कनखियों से माँ-बेटी के मिलन को 3 गज की दूरी से देख रहा था। मुझे एक साथ असीमित खुशी मिली यह देख उसकी आँखें मुस्कुरा रही थीं।  तब तक न जाने कब -कब में बड़ी बहू ने आकर वीडियो लेना शुरू कर दिया था।  उसने फॅमिली ग्रुप वाट्स एप पर पोस्ट भी कर दिया। मैंने  वीडियो  देखा ..उफ कैसी  सुबकती रोती हैरान सी। झट से मैंने आँसू कसकर पोंछ लिये। असल में सुबह बड़ी बहू बेटी को लेने एयरपोर्ट ही गई थी। मुझ बुद्धू को असलियत का जरा भी आभास न हुआ।


 
तभी छोटे बेटे ने घर में प्रवेश किया –
‘माँ हमने आपका जन्मदिन आज से ही मनाना शुरू कर दिया है । कैसी रही शुरुआत! लो अपना गिफ्ट। अरे जल्दी से खोलो। अच्छा मैं ही खोल देता हूँ।’

‘अरे नहीं हम तीनों मिलकर देंगे।’ पीछे से बेटी चिल्लाई। कुछ ही पलों में एपल का नया आइ पैड मेरे हाथ में था। तब मुझे मालूम पड़ा क्यों उस दिन सोना ने पूछा था ..माँ किसी चीज की जरूरत तो नहीं।

    अंग- अंग से मेरे खुशी टपकने लगी। पुलकित हो यही कहते बना –‘तुम शैतानों की टोली ..तुम क्या क्या प्लान बना डालते हो मुझे कानोंकान खबर नहीं होती। लेकिन तुम्हारे दिये एक के बाद एक आश्चर्य जब अपने दोस्तों को सुनाती हूँ तो वे भी आश्चर्य में पड़ जाते हैं।’

‘अरे माँ अभी तो देखती जाओ, आगे होता है क्या क्या।’

‘क्या मतलब?’

‘मतलब यह कि कल 7.. फिर  8 मार्च.. । आपका जन्मदिन मनाते ही रहेंगे ।’ छोटा बोला। 

‘अब तो मम्मी जी को बता दीजिए। क्यों उन्हें परेशान करते हैं!’ छोटी बहू बोली।

‘क्या बता दूँ कुछ बताने को है ही नहीं। उसने नटखटपने से कहा।’

‘उफ! अच्छा मैं बताती हूँ।  हम  सब 7- 8मार्च को  मेरियट होटल में रहेंगे।आप  एक अटैची वहाँ के लिए लगा लीजिए।’ 

‘ओहो ,इसलिए साड़ी -सूट लाने को कहा जा रहा था। तुम लोगों को मेरा इतना ख्याल!’ अनायास ममता हिलोरें लेने लगी।   साथ ही  मन का एक कोना फीका- फीका सा बोल पड़ा –‘बेटा कोरोना के समय होटल !’

‘कोई भीड़ नहीं हैं । अगर कुछ गड़बड़ देखेंगे, तो चले आएँगे। वैसे होटल में बहुत सावधानी से कोरोना के नियमों का पालन किया जा रहा है।’

 दिल को तसल्ली तो हुई;  पर मुझे पहले पता होता तो साफ मना कर देती।

     उम्र का  सफर  तय करते हुये 80 में प्रवेश करने वाली थी।  दो दिन मास्क और दूरी का ध्यान रखते हुए  आशा के विपरीत रिश्तों को महकने का मौका मिला। कोरोना के कारण जो कदम एक दम रुक गए थे  उनको गति मिली। दिल के तारों को कैमरे में कैद करने की निराली कोशिश थी । हँसी मज़ाक ,बेफिक्री के चंद घंटों ने  न  जाने कितनी उम्र बढ़ा दी ।

     अप्रैल में ही फिर कोरोना का मिजाज गरम हो गया और हम घर में बंद से ही हैं । पर मार्च की यादों ने अपनी खुशबू नहीं छोड़ी है। रहरह कर उसका झोंका आता है और हम उसमें डूब से जाते हैं।

लेखक के बारे में -  विभिन्न विधाओं पर लेखन जैसे कहानी, लोककथा, लघुकथा, बालसाहित्य, निबंध,  संस्मरण तथा कविताएँ। 21 वर्षों तक बिरला हाई स्कूल कलकत्ता में शिक्षण कार्य। लगभग सभी विधाओं में किताबें प्रकाशित। समय- समय पर संकलनों व अन्तर्जाल पत्रिका में विभिन्न विधाओं में रचनाओं का प्रकाशिन। बालसाहित्य से सम्बंधित 6 किताबों को kindle. amajon पर देखा जा सकता है। 

सम्पर्क: जे. 703, स्प्रिंग फील्ड्स, 17/20 अम्बालिपुरा  विलेज, बल्लान्दुर गेट, सर्जापौरा रोड, बंगलौर 560102, Email-subharga@gmail.com

Mar 24, 2018

माँ का आँचल

खेलमखेल
माँ का आँचल 
-सुधा भार्गव
मैं जब छोटी थी मुझे खेलने का बड़ा शौक था। यह  निश्चित था कि हम भाई -बहन शाम को एक घंटे जरूर खेलने जायेंगे पर एक घंटे से क्या होता है। हम खींचतान कर उसे डेढ़ घंटा तो कर ही देते थे। वैसे तो घर में हमें फाँसने के लिए बहुत से खेल थे- लूडो, कैरम, व्यापार, साँप सीढ़ी आदि। पर जो बाहर दौड़ा- दौड़ी में आनंद था वह घर में कहाँ!
इतवार की इतवार घर से बाहर छोटे से मैदान में क्रिकेट खेला जाता था। चाचा जी पिता जी और उनके दोस्त खेला करते थे। मुझे तो खेलने का कोई मौका ही नहीं देता था, बस दूर -दूर से गेंद उठाकर लाने का काम था। मैं तो हाँफ जाती थी; मगर खड़ी रहती शायद चांस दे दें। जिस दिन चांस मिल जाता ,खुशी से जमीन पर पैर नहीं पड़ते थे।
मुझे तो लट्टू घूमता बहुत अच्छा लगता था। मानो वह कह रहा हो -देखो -देखो एक पैर पर कैसा नाच रहा हूँ , तुम भी मुझे नचाओ। मेरी तरह से तुम्हें भी खुशी मिलेगी। बस मैंने भी सोच लिया लट्टू घुमाना सीख कर ही रहूँगी। किसी तरह से बाजार से तो ले आई पर दिमाग में खलबली मच गई सीखूँ किस्से? दोस्तों से सीखने को कहती तो हँसी उड़ाते -लो इसे इतना भी नहीं आता..। भाई की 2-3 दिनों तक खुशामद की तब उसने मुझे सिखाया। लट्टू तो मेरा गोल -गोल जमीन पर घूमने लगा पर उसे हथेली पर कभी न उठा सकी। इसका अफसोस आज भी है।
गोल -गोल चमकती -लुढक़ती काँच की गोलियों की तरफ मैं खिंची चली जाती। उनसे मैं खेलती तो नहीं थी पर वे मुझे बहुत सुंदर लगती थीं। उन्हें कंचे कहते थे। एक लडक़ा अपने कंचे से दूसरे लडक़े के कंचे में उँगलियों के सहारे निशाना लगाता। कामयाब होने से निशाना लगाने वाले का कंचा हो जाता।  एक दिन छोटे भाई की जेब में कंचे खनखनाते हुए सुन समझ गई -वह बाहर उनसे  खेलने जाने वाला है। मैं  भी उसके साथ हो ली। मगर वह अड़ गया -आप नहीं जाओगी, किसी की बहन खेलने नहीं आती ।
- अरे मैं खेलूँगी नहीं..। बस देखूँगी ।
- नहीं..। मैं नहीं ले जाऊँगा ।
- तब मैं पिता जी से तेरी शिकायत लगा दूँगी ।
पिता जी इस खेल के सख्त खिलाफ थे इसलिए मेरी  धमकी  काम कर गई। पर उसका मुँह फूला ही रहा जितनी देर खेला।
घर से बाहर हमारे खेलने को- इप्पल -दुपपल, कीलम काटी झर्रबिल्इया, चूहा भाग बिल्ली आई, घोड़ा है जमालशाही पीछे देखो मार खाई न जाने कितने खेल थे पर गिल्ली -डंडे में खूब मन लगता था। मेरा एक थैला गिल्लियों से भरा रहता । बढ़ई काका खूब बना-बना कर देते। एक खो जाय तो दूसरी हाजिर। अक्सर छोटे डंडे से गिल्लियाँ उड़ जाती जो मिलती नहीं थीं। कभी -कभी अपने साथियों को भी गिल्ली दे देती, फिर वे मेरी बात बहुत मानते ।
 इस खेल पर कोई पाबंदी भी नहीं थी, पिताजी ताऊ जी तो खुद खेलते थे। एक बार  ताऊ जी गिल्ली खेल रहे थे। काफी दूर पर उनकी बेटी खड़ी तमाशा देख रही थी। ताऊ जी ने ज़ोर से गिल्ली को डंडे से उछालकर उसमें ज़ोर से ऐसा छक्का मारा कि उसकी नोंक दीदी की आँख में चुभ गई और ले बैठी उनकी आँख की रोशनी। तब से थोड़े सावधान हो गए  पर गिल्ली खेलनी नहीं छोड़ी ।
ठंड  में दिन छोटे होने के कारण हमें शाम को खेलने का मौका कम मिलता। पर  उसकी कसर स्कूल की छुट्टी के दिन खूब निकालते।
छुट्टी के दिन सबसे आनंद दायक हमारा इकलौता खेल होता -कूदमकूद। एक कमरे में दो बड़े -बड़े अलम्यूनियम बॉक्स  थे जिनमें गद्दे -लिहाफ रखे जाते थे। वे केवल सर्दियों में खुलते थे। सर्दी की एक सुबह नौकर ने बिस्तरे ठीक किए और लिहाफों की तह करके उन्हें बक्सों पर रख दिए। दोपहर को खाना खाने के बाद हम भाई -बहन उस कमरे में घुस गए। हमारे बाद अम्मा ने खाना खाया। छोटे भाई को सुलाते वे भी सो गईं। हमें धींगामस्ती का समय मिल गया। और तो और अंदर से कमरे की कुंडी भी लगा ली, ताकि कोई नौकर शिकायत न कर दे। हम भाई -बहनों ने छोटे -छोटे हाथों से बड़े-बड़े लिहाफ नीचे खींच लिये, फिर उन पर खूब कूदे -उछले। कोई कहीं गिरा कोई कहीं लुढक़ा।  अम्मा ने हमारे लिए अलग से तकिये बनाए थे हम छोटे थे तो हमारे तकिये भी छोटे थे। उन्हें एक दूसरे पर पूरी ताकत लगाकर फेंकने लगे। जब वह किसी  के सिर या मुँह से टकराता तो खूब हँसते—इतना हँसते कि पेट में बल पड़ जाते। कितना समय निकल गया पता ही नहीं चला पर अम्मा की नींद टूट गई ।
हममें से किसी को आसपास न देख खोज-ख़बर लेने में जुट गईं। दरवाजा बंद देख अम्मा को हमारी शैतानी का अंदाजा लग गया और कुंडी खटखटा दी। एक मिनट को हम सब बुत बन गए। उपद्रव करने वाले हाथ रुक गए। डाँट के डर से समझ नहीं पाए क्या करें। लिहाफों की तह करके उन्हें बाक्स पर रख नहीं सकते थे, माँ का सामना करने से बच नहीं सकते थे।
मैंने दरवाजा खोला, अम्मा ने जोर से मेरा कान ऐंठ दिया। समझ गईं -यह किसके दिमाग की उपज  है। दोनों भाई छिपने की कोशिश करने लगे कोई दरवाजे के पीछे, कोई पलंग के नीचे। अम्मा को ज्यादा गुस्सा नहीं आता था पर उस दिन तो मेरी बांह में चिकौटी भी काटी थी लगा जैसे लाल चींटी ने काट खाया हो ।
इतने में पिता जी न जाने से कहाँ से आ गए और दहाडऩे लगे -तुमने इन बच्चों को बिगाड़ दिया है। निकालो इन्हें कमरे से -अभी सबक सिखाता हूँ।
माँ का गुस्सा कपूर की तरह उडऩ छू हो गया। हमें अपने स्नेही आँचल में छिपाकर पिता जी की लाल पीली आँखों से दूर ले गईं ।
काश! आज भी वह स्नेह कवच मेरे इर्द गिर्द लिपटा होता।
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