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Dec 18, 2017

एआई का मारा मैं बेचारा

एआई का मारा मैं बेचारा 
 - रवि रतलामी
(कृत्रिम बुद्धिमत्ता युक्त गूगल होम स्पीकर-स्पीकर के सामने कुछ कहें, यह आपकी बात समझने की कोशिश करेगा और तदनुसार कार्य करेगा।)
अब आप एआई का मतलब किसी इंस्पेक्टर से मत जोड़ लीजिएगा। वैसे भी अपने देश में पग -पग पर इंस्पेक्टर मिलते हैं, और उनमें से किसी न किसी एक किस्म के इंस्पेक्टर का मारा, डगडग में। बहरहाल, मैं बात कर रहा हूँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता की। सरल शब्दों में कहें तो आर्टीफ़िशल इंटेलिजेंस की। एक बात और, शीर्षक जल्द ही एआई की मारी दुनिया बेचारी! में जल्द बदलेगा। अत: थोड़ा ध्यान से।
तो, किसी बुरे दिन को मैंने डेढ़ होशियारी दिखाई और अपने पैरों में कुल्हाड़ी मार ली। मैं एआई युक्त एक अदद होम असिस्टेंट ले आया। जब चहुँ ओर कोर्टाना, बिक्सबी, सिरी, अलेक्सा, गूगल होम असिस्टेंट आदि-आदि की बातें हो रही हों तो आदमी कितने दिनों तक दूरी बनाए रख सकता है भला। और इस तरह मेरे बहुत- बहुत बुरे दिनों की शुरूआत हो गई।
होम असिस्टेंट को मैंने अपने घर के नेटवर्क से जोड़कर आरंभिक सेटअप पूरा किया। एक-दो आसान से चरणों में यह पूरा हो गया। फिर यह बड़े ही नर्म किस्म के आवाज में पूछा- मैं आपका नया सहायक हूँ। मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?
कल भले ही इतवार था, परंतु मैंने इसे जाँचने परखने के लिहाज से कह दिया- ठीक है, मेरे सहायक, कल सुबह छ: बजे मुझे जगा देना।
कोई तीन बजे रात को अलार्म की कर्कश आवाज से मेरी नींद खुली। मेरा होम असिस्टेंट अपनी प्यारी मगर मॉडुलेटेड मशीनी आवाज में कह रहा था- आपको इस लिए उठाया गया है कि आपके शरीर में जल की मात्रा सामान्य से कम हो गई है, अत: तुरंत एक गिलास पानी पिएँ।
वाह! यह है बुद्धिमत्ता। मैं बड़ा प्रसन्न हुआ, कि यह सहायक तो बड़े काम का है, सोते में भी मेरा खयाल रखता है। इसने मेरे हाथ में बंधे फिटनेस बैंड से स्वचालित तरीके से संचार प्रारंभ कर लिया था, और मेरे स्लीपपैटर्न का रीयल टाइम में मॉनीटरिंग कर रहा था, और जब इसे एबनॉर्मल सिग्नल मिला कि मेरे शरीर में फ्लूइड की मात्रा कम हो रही है तो इसने मुझे जगा दिया कि भइए, एक गिलास ठंडा पानी पीने में ही भलाई है। भले ही रात के तीन बजे हों। मगर मुझे यह पता नहीं था कि मेरी प्रसन्नता क्षणिक है, और मैं बड़ी कृत्रिम किस्म की मुसीबतों में फँसने वाला हूँ!
घंटे भर बाद फिर अलार्म बजा। बढिय़ा सपने देख रहा था मैं। स्विटजरलैंड के कोमो झील में नौकायन कर रहा था सपने में, और मेरे नव सहायक का अलार्म बजा। मजा किरकिरा हो गया। क्या यह असिस्टेंट सपने में नहीं झाँक सकता? अर्थ यह कि यह तब उठाए, जब बुरे, डरावने सपने आ रहे हों? अलार्म के बीच असिस्टेंट कह रहा था- आप जिस करवट लेटे हैं उसे बदलें क्योंकि आप जरूरत से ज्यादा और बड़ी खर्राटे भर रहे हैं।
चलो, यह भी ठीक है। आदमी खर्राटे हमेशा नींद में ही निकालता है और अनजाने में लोगों की हँसी का पात्र बनता है। मेरा यह नया सहायक मेरे खर्राटे कंट्रोल करने में बड़ा सहायक होगा। मैंने उसे शाबासी देना चाही, मगर उसका पीठ कहीं दिखा नहीं। पर जब इस सहायक ने महज बीस मिनट बाद ही मुझे फिर से जगाया यह बोलकर कि नींद में आपकी गर्दन तकिये से नीचे गिर गई है और आपकी गर्दन की नसों को नुकसान पहुँच सकता है, तो मेरा पारा गर्म हो गया। एक बार मन हुआ कि इसे उठाकर कहीं दूर फेंक दूँ। और, इसने बाकायदा छ: बजे फिर से अलार्म बजा दिया- सुप्रभात। उठिए, आपके कार्य का समय प्रारंभ हो गया है- मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ। मैं बिस्तर से ही चिल्लाया- मेरे बाप! जरा शांति बनाए रख, मुझे सो लेने दे।
मेरा सहायक वापस बोला- क्षमा कीजिएगा, मैं आपकी बात समझ नहीं पाया। मुझे फिर से निर्देश दें। स्पष्ट शब्दों में बोलने का प्रयास करें ताकि मैं आपकी बात समझ सकूँ।
ये ल्लो! ये अब मुझे समझाने लगा कि मैं किस तरह और कैसे बात करूँ! हद है!
सुबह नौ बजे दरवाजे की घंटी बजी। मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ कि कौन हो सकता है। आज किसी का एप्वाइंटमेंट भी नहीं था और न ही कोई मेहमान अपेक्षित था। दरवाजा खोला तो सामने अमेजन ऑनलाइन स्टोर का मिनी डिलीवरी ट्रक खड़ा दिखा। डिलीवरीमैन किराने के सामानों से भरा बास्केट लेकर खड़ा था।
मैंने आश्चर्य से उससे कहा- भाई शायद आप गलत पते पर आ गए हैं। मैंने कोई सामान नहीं मँगवाया है।
सर, ऑर्डर तो आप ही का है- यह देखिए- और उसने मेरे हाथों में बिल की कॉपी थमा दी। रात बारह बजे ऑनलाइन ऑर्डर हुआ था। मेरे घर से, मेरे खाते से।
समझने में मुझे कुछ समय लगा। तो, यह मेरे नए, कृत्रिम बुद्धिमत्ता युक्त सहायक का किया धरा है! उसने मेरे एआई युक्त फ्रिज- जिसकी क्षमताओं के बारे में मुझे भी इतना नहीं पता था, से संचार संपर्क स्थापित किया, जानकारी ली, मेरी पिछली आवश्यकताओं और कंजप्शन पैटर्न को खंगाला, और फ्रिज में उपलब्ध अनुपलब्ध सामानों तथा पिछले आर्डर और कंजप्शन के आधार पर आवश्यक सामानों की सूची बनाया और मेरे खाते से स्वयमेव आर्डर कर दिया ताकि सुबह-सुबह मेरी आवश्यकताओं का सारा सामान मुझे मिल जाए!
बाकी सामानों का तो फिर भी ठीक था, मगर दूध, मक्खन और दही जैसी जल्द खराब हो सकने वाली चीजों का मैं क्या करूंगा? वह भी इतनी मात्रा में? बीबी अभी परसों ही दो हफ्ते के लिए मायके गई थी, और मैं तो मित्र मंडली के साथ पार्टी के मंसूबे बनाया हुआ था। होम असिस्टेंट, सत्यानाश हो तेरा!
 जल्द ही मैं अपने इस एआई युक्त सहायक से भर पाया। मैंने इसे अपने होम नेटवर्क से पासवर्ड बदल कर निकाल बाहर किया, उसका पावर सप्लाई बंद किया और एक डब्बे में लपेट कर रख दिया, और ओएलएक्स पर डाल दिया ताकि जो भाव मिले, बेच दूं। मगर, ये क्या? हफ़्ते गुजर गए कोई लेवाल नहीं मिला। शायद सबके सब एआई सहायक के मारे हुए हैं। अब तो यह डर भी लगा रहता है कि कहीं यह सहायक रिनीवेबल, सेल्फसस्टेंडएनर्जी न जनरेट करने लगे और फिर से जीवित हो जाए सहायता करने को!
लेखक परिचय:रविशंकर श्रीवास्तव, उपनाम- रवि रतलामी, विगत 20 वर्षों से हिन्दी में तकनीकी/साहित्य लेखन व संपादन तथा कंप्यूटरों, आईटी के हिन्दी व छत्तीसगढ़ी भाषा में स्थानीयकरण में सक्रिय भूमिका, शासकीय विद्युत मंडल में 20 वर्ष से अधिक का प्रसाशकीय/प्रबंधन/तकनीकी अनुभव (भाषाई कंप्यूटिंग के क्षेत्र में कार्य करने हेतु 2003 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्त)  प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में तकनीकी स्तंभ व साहित्य लेखन, 10 वर्षों से नियमित हिन्दी में तकनीकी/हास्य-व्यंग्य ब्लॉग लेखन, ऑनलाइन पत्रिका रचनाकार.ऑर्ग का संपादन तथा हिन्दी की सर्वाधिक समृद्ध ऑनलाइन वर्गपहेली का सृजन। पुस्तकें- रवि रतलामी के व्यंग्य, रवि रतलामी के ग़ज़ल और व्यंज़ल, लिनक्स पॉकेट गाइड हिन्दी में आसपास की कहानियाँ (हिन्दी में सह-अनुवाद) पुरस्कार- रवि रतलामी का हिन्दी ब्लॉग (वर्तमान नाम छींटे और बौछारें)- माइक्रोसॉफ़्ट भाषा इंडिया सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉग 2006, 2007-9 माइक्रसॉफ़्ट मोस्ट वेल्यूएबल प्रोफ़ेशनल, अभिव्यक्ति.ऑर्ग टेक्नोलॉजी लेखक 2007, छत्तीसगढ़ी गौरव सम्मान 2008 - सृजन सम्मान रायपुर छत्तीसगढ़, IN 2008 - Nrcfoss  (नेशनल रिसोर्स कौंसिल फ़ॉर फ्री ओपन सोर्स सॉफ़्टवेयर) प्रायोजित राष्ट्रीय पुरस्कार (KDE हिन्दी अनुवाद हेतु), आई टी मंथन 2009 (छत्तीसगढ़ी लिनक्स हेतु) 
सम्पर्क: 101, आदित्य एवेन्यू, एयरपोर्ट रोड, द्रोणांचल के सामने, भोपाल म.प्र. 462030, मो. 9329490014, Email- raviratlami@gmail.com,

Mar 10, 2013

व्यंग्य


सोशल मीडियाई और गॅजेटियाई होली

- रवि रतलामी

दद्दू यादों में खोए थे और अपने पोते मुन्नू को, जो अपने नए नवेले, एकदम ताज़ातरीन स्मार्टफ़ोन, ब्लैकबेरीएक्स 01 को हैक कर उसमें कस्टम रोमइंस्टाल करने की बेतरह कोशिश कर रहा था, अपने बचपन के दिनों में खेली गई होली के बारे में बता रहे थे...
आह! बेटा! वो दिन भी क्या दिन थे! आई मीन, वो होली के दिन भी क्या दिन थे, और क्या रंगीन दिन थे.
महीनों से होली की हुलक मन में रहती थी, और पखवाड़े भर पहले से फाग मंडली के साथ गाने और होली के लिए लकड़ी का जुगाड़ लगाने के साथ अर्धरात्रि जागरण का प्रकल्प पूरा करते फिरते थे. पड़ोसी की परछत्ती और बरसाती से पुराने फर्नीचर को होली की लकड़ी के नाम पर चुराने का अपना मजा रहता था. ये तुम फ्लैट और कवर्डकैंपस में रहने वाले क्या जानो! और, होली जल जाने के बाद भी उसकी आग हफ्तों तक चले ऐसा जुगत लगाते फिरते थे और मन में ये संताप भी यदा कदा आ जाता था कि बाजू मोहल्ले की होली में इस बार जलाया गया लट्ठ बड़ा भारी है जो पंद्रह दिन तक तो सुलगता रहेगा.
और, बेटा! धुलेंडी की तो बात ही मत पूछो. अपने राम को रत्ती भर रंग न लगे, मगर सामने वाले को भीतर तक रंग देने के तमाम मंसूबे हफ़्तों पहले से बनाते थे और उस हिसाब से तैयारी भी पूरे तन-मन-धन, होशो-हवास और जोश-उल्लास से करते थे. ऐसे भरपूर रंगने वालों की सूची में कई दोस्त भी शामिल रहते थे तो कई दुश्मन भी. मिठाई और नमकीन में भाँग मिलाकर खिलाने और फिर उसके मजे लेने के तो मजे ही मजे रहते थे. बेटा! तुम्हें उन दिनों के किस्से डिटेल में सुनाने जाएँ, तो हर होली के किस्से तीन सौ पन्नों में भी न निपटे....
और इधर दद्दू की बात सुनी-अनसुनी करते हुए मुन्नू अपने मोबाइल में कस्टम रोमइंस्टाल करने में सफल हो गया था और अपने दोस्तों को एसएमएस करने तथा फ़ेसबुक में स्टेटस चेंपने के साथ-साथ वो दद्दू की बात काटते हुए बोला -
अरे,दद्दू, रहने भी दो. हमारे भी दिन हैं और क्या रंगीन दिन हैं!
होली की हुलक हमें भी महीनों पहले से होने लगती है.होली के महीने भर पहले से होलियाना कविताओं का दौर तमाम फ़ोरमों और समूहों में चलने लगता है उसका मजा आपके सैकड़ों घंटों के फाग से कई गुना अधिक होता है, उसे आप क्या जानो! ब्लॉग और ट्विटर पर होली-होली खेलने का अपना अलग मज़ा है. फ़ेसबुक-मित्रों, ब्लॉग-प्रशंसकों, ट्विटर-फ़ॉलोअरों के सैकड़ों-हजारों स्टेटस-अपडेटों, ब्लॉगों और ट्वीटों में छपे तमाम अगले-पिछले वर्षों के होली के फोटू और वीडियो देख-देख अपनी होली और रंगीन हो जाती है – ऐसी रंगीन कि सैमसुंग गैलेक्सी के 64 मिलियन कलर भी शरमाजाएँ!.
होली के चार दिन पहले से चार दिन बाद तक ईमेल और एसएमएस-एमएमएस से होली के सैकड़ों-हजारों बधाई संदेश और शुभकामना के संदेश तो दद्दू तुम्हें क्या मिले होंगे कभी. होली के दिन, दिन भर में कभी दस पाँच दोस्तों और उनकी मंडली के बीच होली खेल-खाल लिया होगा, गले-वले मिल लिये होगे, रंग-वंग लगा लिया होगा और बहुत हुआ तो अपने ऑफ़िस या व्यवसाय की बिरादरी में बीस-पच्चीस के साथ हुल्लड़ मस्ती कर ली होगी बस्स. इधर देखो– हम तो होली का ईमेल  संदेश फारवर्ड ही तीन हजार को मारने जा रहे हैं, और फ़ेसबुक में तो हम अपने पूरे पाँच हज्जार फ्रेंड को स्टेटस टिकाएँगे कि देखो हम्मारी होली! ट्विटर में होली-ट्वीट मारेंगे तो बारह हज्जार फ़ॉलोअर हमारे संग ट्विटरियाना होली खेलेंगे. और अभी तो मोबाइल एसएमएस की शुरूआत ही नहीं हुई है. हमने तो इस दफ़ा होली के लिए अनलिमिटेड फ्री टाकटाइम और एसएमएस का प्लान लिया है. बैलेंस खत्म होने की चिंता ही नहीं रहेगी.
और, आप और आपके समय का समाज तो वातावरण, पर्यावरण की चिंता ही नहीं करता था. सैकड़ों टन लकड़ी फालतू आग के हवाले कर देते थे. करोड़ों लीटर पानी रंग में बहा देते थे, जिसे बदन से हटाने के लिए अरबों लीटर पानी की जरूरत होती थी. ऊपर से रंगों की वजह से स्किन की समस्या अलग होती थी. हमें देखो– होली में पूरे दिन अपने बेडरूम में जमे रहकर हम अपने कंप्यूटर और मोबाइल के जरिए अपने मित्रों के फोटुओं में रंग लगाते हैं और शेयर करते हैं. होली का एनीमेटेड फ्लैश वीडियो बना कर और उसे मित्र मंडली में साझा करके प्रतीकात्मक होली जलाते हैं. और, मोबाइल, कंप्यूटर और इंटरनेट से चिपके रहने, फ़ेसबुक में जमे रहने के जैसा नशा तो भाँग की दस गोलियों से भी नहीं आ सकता! और अगर हम भी अपनी पिछली होली की डिटेल बताने लगें तो कंप्यूटर के दस डिस्क भर जाएँ!
मुन्नू की बहुत सी बातें दद्दू के पल्ले नहीं पड़ीं. जैसे दद्दू कला के विद्यार्थी हों और गलती से मुन्नू के विज्ञान की कक्षा में आ गए हों, और इसीलिए झपकियाँ मारने लगे थे.
बहरहाल, यदि आपको ये होलियाना किस्सा पढ़कर झपकी नहीं आई हो तो कृपया बताएं कि दद्दू की होली भली थी कि मुन्नू की है, और, इस बार की आपकी अपनी होली कैसी रहेगी–दद्दूटाइप या मुन्नू टाइप?
संपर्क: रविशंकर श्रीवास्तव, 101, आदित्य एवेन्यू, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462032,
 E-mail- raviratlami@gmail.com