June 11, 2013

इस अंक में

उदंतीः जून 2013



प्रकृति अपरिमित ज्ञान का भंडार है, पत्ते-पत्ते में शिक्षापूर्ण पाठ है, परंतु उससे लाभ उठाने के लिए अनुभव आवश्यक है।                                                     - हरिऔध




 अनकही: निदान खोजना ही होगा... - डॉ. रत्ना वर्मा
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अनकही

निदान खोजना ही होगा...
 डॉ. रत्ना वर्मा
25 मई 2013 की शाम, जब सूरज ढला नहीं था। छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के कुछ दिग्गज नेताओं और कार्यकर्ताओं का काफिला बस्तर के घने जंगल जीरम घाटी के बीच से गुजर रहा था अपने पूर्व निर्धारित परिवर्तन यात्रा के एक राजनीतिक कार्यक्रम के सिलसिले में, कि एक जोरदार धमाका हुआ और काफिले की सभी लगभग 20 गाडिय़ों के पहिए थम गए। सड़क की दोनों तरफ से उनकी गाडिय़ों पर अंधाधुंध फाइरिंग शुरू हो गई। किसी को भी जरा भी सोचने समझने का समय ही नहीं मिला। जब तक सुरक्षाकर्मियों के पास गोलियाँ थीं जवाबी फायरिंग चलती रही पर आखिर कब तक? उन्हें अपने हथियार डाल देने पड़े। यह खूनी मंजर दो घंटे तक चला और इस दो घंटे में उन्होंने चुन-चुन कर दिग्गज नेताओं पर गोलियाँ दागी उनके नाम पूछ-पूछकर। नक्सलियों की तैयारी इतनी जबरदस्त थी कि उन्होंने बचने का कोई मौका ही नहीं दिया; बल्कि ऐसी दरिंदगी दिखाई कि प्रत्यक्षदर्शियों की आपबीती सुन कर सबके रोंगटें खड़े हो गए। यहाँ उस खूनी मंजर की कहानी दोहराने की जरूरत नहीं क्योंकि मीडिया में लगातार इस खूनी मंजर की दिल दहला देने वाली कहानी को सबने देखा और पढ़ा है।

इस खूनी खेल में प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा के साथ राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष नंद कुमार पटेल और उनके पुत्र दिनेश पटेल तथा पूर्व विधायक उदय मुदलियार सहित कई कांग्रेसी कार्यकर्ता और सुरक्षा कर्मी मारे गए, जिनकी संख्या 30 तक पहुँच गई है। इस हमले में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विद्याचरण शुक्ल भी घायल हैं, जिनका गुडग़ाँव के वेदांता अस्पताल में इलाज चल रहा है।
छत्तीसगढ़ में हुए इस क्रूर हिंसा की वारदात के बाद हर तरफ सिर्फ एक ही आवाज उठ रही है कि नासूर बन चुके इस नक्संलवाद के मर्ज का कारगर इलाज क्या हो? आँकड़ें बताते हैं कि नक्सलियों की गोलियों से मरने वाले लोगों की तादाद देश में आतंकी हमलों में मरने वाले लोगों से कहीं ज्यादा है। देश के 9 राज्य नक्सलवाद की चपेट में हैं जहाँ के लगभग 107 जिले नक्सल प्रभावित हैं। जिनमें छत्तीसगढ़ के 16 जिले शामिल हैं। प्रभावित राज्यों में इस समस्या को खत्म करने के लिए कई दशकों से रणनितियाँ बनाई जाती रहीं हैं पर अब तक कोई ऐसा कारगर कदम नहीं उठाया जिससे इन राज्यों को राहत मिले। फलस्वरूप इन राज्यों में उनकी ताकत बजाय कम होने के लगातार बढ़ती ही जा रही है।
हमारी रक्षातंत्र की कमजोरी इसी से साबित होती है कि नक्सली कितने अत्याधुनिक हथियार से लैस हैं। सुरक्षा एजेंसियों की खुफिया जानकारियाँ भी आसानी से उन्हें उपलब्ध हो जाती हैं और वे अपनी मर्ज़ी से कभी भी और कहीं भी हमला कर सकते हैं। आदिवासी बहुल कई इलाकों में नक्सलियों का समानांतर प्रशासन भी चलता है। वे स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और जन अदालतों का संचालन करते हैं तो ठेकेदारों, खदान मालिकों एवं उद्योगपतियों और यहाँ तक कि सरकारी अधिकारियों से भी पैसा वसूल करते हैं।
प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जितने प्रभावित राज्य हैं वे मिल कर इस समस्या को जड़ से उखाडऩे के बारे में अब तक एकजुट क्यों नहीं हो पाए हैं? केन्द्र सरकार इन राज्यों के साथ गंभीरता से बात करके कोई हल क्यों नहीं निकाल पाई? पानी सर से ऊपर होता जा रहा है पर पिछले सालों में जो भी प्रयास हुए हैं या नक्सलियों से निपटने के लिए जितने भी उपाय करने की बात कही गई या की गई वे सब नाकाफी साबित हुए हैं। यदि अब तक गंभीरता से इस समस्या को खत्म करने के लिए कारगर उपाय हुए होते तो नक्सली हौसले इतने बुलंद नहीं होते और न ऐसा खूनी खेल जारी रख पाते।
कहने को तो आम आदमी को बहुत से अधिकार मिले हुए हैं पर अफसोस हमारे देश की व्यवस्था अपने नागरिकों को पूरी तरह यह विश्वास नहीं दिला पाती कि हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था में उसके जीने के अधिकार की हर हाल में रक्षा की जाएगी। आदिवासी अपनी ही संपदा जल- जंगल और जमीन के लिए लड़ रहा है। विकास के जो कुछ भी कार्य उनके लिए किये जाते हैं उन्हें लगता हैं उन्हें उनकी जमीन से बेदखल करने के लिए किया जा रहा है नतीजा न वहाँ कोई विकास के कार्य होने दिया जाता न आदिवासियों को मुख्य धारा से जुडऩे दिया जाता।
नक्सल प्रभावित इलाकों में आदिसियों को मुख्यधारा में जोडऩे के लिए जरूरी है कि उनतक रोजगार, न्याय, शिक्षा, और चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाएँ आसानी से पँहुचाई जाए। यह तो सर्वविदित है कि बस्तर प्राकृतिक संपदा से भरपूर इलाका है। अब तक यदि इस संपदा का उपयोग क्षेत्र और यहाँ के लोगों के विकास में किया जाता तो आज इन शोषित और सीदे-सादे आदिवासियों का सहारा लेकर नक्सलवाद बेखौफ होकर पनप नहीं पाता। विकास के नाम पर हुआ भी यही कि इस क्षेत्र की सम्पदा का दोहन धनबल, बाहुबल और राजनैतिक संरक्षण प्राप्त करने वाले लोग ही करते रहे हैं। यहाँ का मूल निवासी निरन्तर गरीब और साधनहीन होता गया, रसूख़्वाल वर्ग निरन्तर फलता-फूलता रहा है। सामान्यजन समृद्धि का भागी नहीं बन सका, यही नहीं न्याय भी उसके लिए सहायक नहीं बना। यही वंचना धीरे-धीरे उसके भीतर सुलगती रही और उसके इस विश्वास को पुख़्ता करती गई कि उसके साथ छल किया जा रहा है। अविश्वास की इस खाई को भी पाटना ज़रूरी है। भेदपूर्ण व्यवहार इस समस्या के निवारण में सबसे बड़ी बाधा है।
केन्द्र सरकार ने इस सबसे बड़े नक्सली हमले में हुई चूक को स्वीकार तो कर लिया है और इन हत्याओं की जाँच, नेशनल जाँच एजेंसी- एनआईए को सौंप दी है। राज्य सरकार ने भी इसकी जाँच के लिए एक न्यायिक आयोग बिठा दी है पर यह भी सत्य है कि यह इस समस्या का निदान नहीं है। दरअसल बस्तर में व्याप्त नक्सल समस्या का सफाया मात्र जाँच दल बिठाकर, सुरक्षा बल बढ़ाकर या बस्तर को छावनी में तब्दील करके नहीं होने वाला। इसका खात्मा वहाँ रहने वाले स्थानीय लोगों की जमीनी लड़ाई से जुड़कर करना होगा; क्योंकि हर स्तर पर कई दशकों से वे राजनीतिक, आर्थिक और व्यावसायिक स्तर पर शोषित हो रहे हैं। जिसके कारण आदिवसियों का वर्तमान व्यवस्था पर से भरोसा उठ चुका है और इसी का फायदा नक्सली उठाते हैं, वे आदिवासियों को इस शोषण से मुक्ति दिलाने की बात करते हैं उन्हें वह सब देते हैं जो उन्हें अपनी सरकार से मिलना चाहिए। इतना ही नहीं वे ऐसा माहौल तैयार करते हैं कि सरकारी स्तर पर किए जाने वाले कार्य को भी वे अपने विरूद्ध समझते हैं।
 अतः यह लड़ाई वहाँ रहने वाले सीधे सच्चे और भोले भाले आदिवासियों का विश्वास हासिल करके जीतना होगा।  राजनीतिक दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ एक कारगर रणनीति बनाकर ही इस समस्या से मुक्ति पाई जा सकती है।                                                              

विश्व पर्यावरण दिवस


महाविनाश के मुहाने पर धरती
- राजेश कश्यप
धरती दिनोंदिन गरमा रही है। मौसम में जो अप्रत्याशित परिवर्तन व असंतुलन निरन्तर बढ़ रहे हैं, असाध्य बीमारियों का जो मकडज़ाल लगातार फैलता चला जा रहा है, समय-असमय जो अतिवृष्टि व अनावृष्टि हो रही है, जिस तेजी से भूस्खलन निरन्तर बढ़ रहे हैं, भूकम्प आ रहे हैं, हिमनद सूख रहे हैं और जिस तरह से उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों की बर्फ पिंघलकर महाविनाश की भूमिका तैयार कर रही है, वह सब चरम सीमा पर पहुँच रहे पर्यावरण प्रदूषण के परिणामस्वरूप ही हो रहा है।
समस्त जीव-जगत के जीवन में जो जहर घुल चुका है और जो निरन्तर घुल रहा है, उसके लिए कोई एक प्रदूषक तत्त्व जिम्मेदार नहीं है। वर्तमान पर्यावरण प्रदूषण में वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, नाभिकीय प्रदूषण आदि सब प्रदूषक शामिल हैं। वायु को प्रदूषित करने वाले मुख्यत: तीन कारक हैं, अचल दहन, चलायमान दहन और औद्योगिक अपशिष्ट। अचल दहन के तहत जब कोयला, पेट्रोलियम आदि जीवाश्मी ईंधन जलते हैं तो इससे सल्फर डाइऑक्साइड, सल्फर ट्राइऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड आदि गैंसें निकलती हैं और वातावरण में मौजूद जलीय कणों के साथ मिलकर गन्धकीय तेजाब, सल्फ़्यूरिक अम्ल, नाइट्रिक अम्ल आदि का निर्माण करती हैं और अम्लीय वर्षा के रूप में पृथ्वी पर आकर अपने घातक प्रभाव डालती हैं। इन घातक प्रभावों में मुख्य रूप से पौधों की बढ़वार प्रभावित होना, मृदा के पोषक तत्त्वों का हनन होना, मत्स्य प्रजनन का रुकना, श्वसन तंत्र का प्रभावित होना आदि-आदि शामिल हैं। इन सबके अलावा भी इन गैसों के कुप्रभाव देखने में आते हैं।
चलायमान दहन के तहत स्कूटर, मोटरसाइकिल, कार, बस, हवाई जहाज, रेल आदि परिवहन के समस्त साधनों से निकलने वाले धुएँ से वातावरण में जहर घुलता है। इस धुएँ में कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड तथा हाइड्रोकार्बन का मिश्रण होता है। इसके अलावा पेट्रोलियम के जलने से टेऊटाइथल लैड, टेऊटामिथाइल लैड जैसे लैड योगिक पैदा होते हैं और शरीर में हीमोग्लोबिन के निर्माण को रोककर बेहद घातक कुप्रभाव डालते हैं। औद्योगिक कारखानों में रासायनिक प्रक्रियाओं से होने वाले उत्पादन, उद्योगों से निकलने वाली कार्बन मोनोक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड आदि विषैली गैसों और औद्योगिक कारखानों से निकलने वाले प्रदूषित कचरे से पर्यावरण बेहद प्रदूषित होता है। जल प्रदूषण के लिए हमारी छोटी बड़ी सभी लापरवाहियाँ उत्तरदायी हैं। इनमें मशीनों का असहनीय शोर-शराबा, डायनामाइट विस्फोट, गोला-बारूद का प्रयोग, हथियारों व बमों का परीक्षण, वाहनों का भारी शोर, लाउडस्पीकर्स आदि सब चीजें जिम्मेदार हैं। विकिरण प्रदूषण ने तो समस्त जीव जगत के जीवन पह गहरे प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं आणविक विखण्डनों से होने वाली विघटनाभिका प्रक्रिया के तहत विकिरण प्रदूषण होता है। इतिहास साक्षी है वर्ष 1945 का, जिसके दौरान अमेरिका ने जापान के दो प्रमुख नगरों हीरोशिमा व नागासाकी में अणु बम गिराए थे और जिससे पूरी दुनिया दहल  उठी थी। आज साढ़े छह दशक बाद भी उन नगरों को उस आणविक हमले की चोट से मुक्ति नहीं मिली है। क्योंकि नाभिकीय अपशिष्ट के रेडियोऐक्टिव तत्व कम से कम एक हजार वर्षों तक सक्रिय रहने की क्षमता रखते हैं। नाभिकीय परीक्षणों के चलते तो विकिरण प्रदूषण विश्व के लिए एक गंभीर स्थिति पैदा हो चुकी है।
कुल मिलाकर पर्यावरण प्रदूषण ने मौसम और अन्य पर्यावरणीय समीकरणों को गड़बड़ाकर रख दिया है। मौसम और पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक अपनी चरम प्रदूषण के चलते एशिया के सात देशों की जलवायु में अप्रत्याशित परिवर्तन आ चुका है और स्थिति निरन्तर भयावह होती चली जा रही है। गत दशक में ही आठ देशों के सरकारी और निजी अनुसंधान संस्थानों के 60 से भी अधिक विशेषज्ञों ने चेताया था कि भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम और फिलीपीन जलवायु परिवर्तन के दुश्चक्र में फँस चुके हैं और इन देशों के तापमानों व समुद्री जल स्तर में निरन्तर वृद्धि हो रही है, जिससे इन देशों के तटवर्ती स्थानों पर समुद्री तूफान अपना कहर बरपाएँगे, करोड़ों लोग शरणार्थियों का जीवन जीने के लिए बाध्य होंगे और महामारियों की बाढ़ भी आएगी।
विशेषज्ञों ने जो भी चिन्ताएँ व्यक्त कीं वो अक्षरश: सत्यता की तरफ अग्रसर होने लगी हैं। भारत के केरल, आन्ध्र प्रदेश और बांग्लादेश, चीन, जापान, अमेरिका आदि देशों के समुद्री तटवर्ती क्षेत्रों में आने वाले समुद्री तूफान धीरे-धीरे विकराल रूप धारण करने लग गए हैं। गत कुछ वर्षों के समुद्री तूफानों ने विश्वभर में भारी तबाही मचाई है। दिसम्बर, 2004 में 'सुनामी ने दक्षिण एशियाई देशों भारत, इंडोनेशिया, श्रीलंका, मालदीव, थाईलैण्ड, मलेशिया आदि देशों में, अगस्त, 2005 में 'कैटरिना ने अमेरिका में, नवम्बर, 2009 में 'मिरिना ने वियतनाम में, नवम्बर, 2009 में ही 'सीडर ने बांग्लादेश में, मई, 2010 में 'लैला ने भारत में, मार्च, 2011 में 'गत 140 साल के इतिहास के सबसे भयंकर सुनामी ने जापान में, अगस्त, 2011 में 'आइरीनने अमेरिका में, अगस्त, 2011 में ही 'मुइफा’ ने चीन में, सितम्बर, 2011 में 'तलसने जापान में, सितम्बर, 2011 में ही 'नेसाट’ ने चीन में और दिसम्बर, 2011 में 'सुनामी’ ने फिलीपींस में न केवल भयंकर तबाही मचाई, अपितु हजारों लोगों को मौत की नींद सुला दिया, लाखों लोगों के जीवन को तबाह कर दिया, अरबों-खरबों की सम्पति को पानी में मिला दिया और प्रकृति को भारी नुकसान पहुँचाया।
एक अनुमान के अनुसार धरती पर पाई जाने वाली लगभग चार करोड़ प्रजातियों में से लगभग एक सौ प्रजातियाँ प्रतिदिन नष्ट हो रही हैं। एक प्रसिद्ध जीव विज्ञानी के अनुसार तो वनों की अंधाधुंध कटाई से प्रतिदिन एक सौ चालीस रीढ़ वाले जीवों की प्रजातियाँ लुप्त हो रही हैं। समुद्र में तेल के रिसाव व पानी में गन्दे कूड़े-कचरे के बहाव के चलते कई समुद्री जीवों का तो अस्तित्व ही खतरे में पड़ चुका है। पेयजल के बढ़ चुके संकट ने दुनिया की नींद हराम करके रख दी है। बाढ़ व सूखे की विकरालताओं ने भी सबको हिलाकर रख दिया है। कृषि की उपज व मिट्टी की उपजाऊ क्षमता में भी भारी कमी आने लगी है। कई छोटे समुद्री द्वीपों के डूबने का खतरा भी मँडराने लगा है। हमारी लापरवाहियों के चलते पर्यावरण प्रदूषण बढ़ा है और उसी के चलते धरती गरमा उठी है। विशेषज्ञों का कहना है कि पर्यावरण प्रदूषण से उत्पन्न होने वाली गैसें पृथ्वी का तापमान बढ़ाने के साथ-साथ मानव जीवन की रक्षा-कवच ‘ओजोन परत’ को भी बड़ी तेजी से छिन्न-भिन्न कर रही हैं। यह ओजोन परत गैस की ऐसी परत है, जो सूर्य की पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकती हैं और हमें चमड़ी के रोगों व कैंसर जैसी असंख्य दु:साध्य बीमारियों के प्रकोप से बचाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार निरन्तर बढ़ रहे पर्यावरण प्रदूषण के चलते हमारी रक्षा-कवच ओजोन परत अत्यन्त क्षीण हो चुकी है और इसमें किसी भी समय भयंकर छिद्र हो सकता है। अगर ऐसा हुआ तो पृथ्वी के समस्त जीवों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा और पृथ्वी का स्वर्गिक वातावरण नरक में तब्दील हो जाएगा।
निरन्तर बढ़ रहे पर्यावरण प्रदूषण के प्रति सभी देशों की सरकारें अत्यन्त गंभीर तो हैं, लेकिन, इसे रोकने में अहम् भूमिकाएँ नहीं निभा पा रहे हैं। आए बन भयंकर बमों व मिसाइलों का परीक्षण, परमाणु परीक्षण, सरकारी लापरवाहियों के चलते आयुध भण्डारों में लगने वाली आग, समुद्री युद्ध परीक्षण, सरकारी गोदामों का सड़ा गला व विषैला खाद्य-भण्डार समुद्र के हवाले करना, समुद्री दुर्घटनाएँ आदि सब प्रदूषण को रोकने की प्रतिबद्धता की पोल खोल रहे हैं। पिछले वर्षों में जो कई देशों द्वारा परमाणु परीक्षण किए गए और अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान व इराक में जो बड़े भारी भयंकर व विनाशकारी बमों की वर्षा की गई, वो सब भी विश्व पर्यावरण प्रदूषण को उसकी चरम सीमा पर पहुँचाने की बराबर जिम्मेदार घटनाएं हैं। पिछले वर्षों में सॉर्स ने पूरे विश्व में कोहराम मचाया, वह भी एक देश द्वारा किए जाने वाले जैविक बम के परीक्षण को सन्देह के दायरे में लाया जा चुका है। कैटरिना जैसे समुद्री तूफानों ने भी भयंकर कहर बरपाया है।
कहने का अभिप्राय यह है कि सैकड़ों देश प्रतिवर्ष इकट्ठे बैठकर पर्यावरण प्रदूषण पर जो चिन्ताएँ व्यक्त करते हैं और उससे निपटने के लिए जो बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाते हैं, उन्हें वास्तविकता में तब्दील करने की कड़ी आवश्यकता है, वरना सभी देशों की यह सब गतिविधियाँ एक ढ़कोसले के सिवाय कुछ भी नहीं होंगी।
विश्व के देशों की सरकारों के साथ-साथ प्रत्येक व्यक्ति को भी पर्यावरण प्रदूषण के प्रति जागरूक होना होगा और पर्यावरण प्रदूषण के प्रति अपनी लापरवाही, अज्ञानता व स्वार्थपरता पर एकदम अंकुश लगाना होगा। इसके लिए जरूरी है कि जन-जन को अधिक से अधिक पेड़ लगाने का दृढ़ संकल्प लेना होगा और लगे हुए पेड़ों के संरक्षण पर भी बराबर ध्यान रखना होगा। कुल मिलाकर, पर्यावरण प्रदूषण के लिए जिम्मेदार कारकों पर तुरन्त अंकुश लगाना, अधिक से अधिक पेड़ लगाना और उनकीं रक्षा करना ही पर्यावरण प्रदूषण के प्रकोप से बचने के अचूक उपाय हैं।  (लेखक स्वतंत्र पत्रकार, समाजसेवी एवं पर्यावरण प्रेमी हैं।)

सम्पर्क: मकान नं. 1229, पाना. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला- रोहतक, हरियाणा-124005
मो. नं. 09416629889
Email-rajeshtitoli@gmail.com, rkk100@rediffmail.com

गिरमिट के 140 वर्ष


अँधियारी रातें और उजला सवेरा
- भावना सक्सैना
वही दिनवा जब याद आवेला अँखिया में भरेला पानी रे।
हिंदुस्तान से भागकर आइली यही है अपनी कहानी रे
भाई छूटा, बाप छूटा और छूटी महतारी रे।
अरकटिया खूब भरमवलीस कहै पैसा कमैबू भर-भर थाली रे
वही चक्कड़ मा पड़ गइली, बचवा याद आय गइल नानी रे।
मारिया भैश के जंगल मा बीती मोरी जवानी रे
तब भी कमाय कमाय के लड़कन के खूब पढ़वली रे।
डॉक्टर वकील, सेस्तर, जज, सिपाही, मेस्तर खूब बनवली रे
(सूरीनाम के कवि श्री अमर सिंह रमन की रचना आप्रवासी यादगार)

1870 में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया और हॉलैंड के सम्राट विलियम तृतीय के बीच हुए एक समझौते के परिणाम स्वरूप भारत से सूरीनाम के लिए शर्तनामे पर मजदूरों की भर्ती शुरू हुई और पुरानी दास प्रथा को शर्तबंधी का नया जामा पहनाकर पुनरुजीवित किया गया। सूरीनाम के लिए भारतीय मजदूरों के निर्यात हेतु डच एजेंटों ने कलकत्ता में अपना मुख्य डिपो खोला और भर्ती के लिए गोरखपुर, इलाहबाद, बनारस, बस्ती व मथुरा में उपकेंद्र खोले। उत्तरप्रदेश के पूर्वी भागों व बिहार की ग्रामीण जनता के बीच यह प्रचार किया गया कि समुद्र के बीचों बीच श्रीराम द्वीप हैं जहाँ हर प्रकार की सुख-सुविधाएँ हैं और बेहतर जीवन के साथ धर्म कमाने का भी लाभ मिल सकता हैं।
श्रीराम देश के सुख और धर्म प्राप्ति की लालसा में भोले-भाले लोग अनजाने स्थान पर जाने को तैयार हो गए। भर्ती किए गए कुल 410 लोगों में से अधिकतर उत्तरप्रदेश के थे और इन सभी कोलकत्ता ङिपो से 26 फरवरी 1873 को लालारुख जहाज से रवाना किया गया। अनेक कठिनाइयों, खराब मौसम आदि का सामना करते हुए यह जहाज तीन माह एक सप्ताह बाद 5 जून 1873 को पारा मारिबो पहुँचा और भारतीयों के कदम सूरीनाम की पावन धरती पर पड़े, कालांतर में 64 जहाजों द्वारा 34304 भारतीय मजदूर सूरीनाम पहुँचाए गए।
लालारुख से सूरीनाम आगमन के पश्चात् हिंदुस्तानियों को जिस कठिन दौर से गुजरना पड़ा वह एक दर्द भरी कहानी हैं, यहाँ पहुँचने पर इन सभी लोगों को एक डिपो में छोटी-छोटी कोठरियों में रखा जाता था, इन कोठरियों का आकार इतना छोटा होता था कि जिसमें एक व्यक्ति सीधा लेट भी न पाए।  और फिर यहीं पर श्रम शक्ति का बँटवारा करके अलग-अलग प्लैंटेशनों पर भेज दिया जाता था। उदाहरण के लिए पहले जहाज लालरुख से आए श्रमिकों को प्लैंटेशन अलायंस, जुलन, आलख़मार, होइलैंड और रेसोलूसी प्लैंटेशन में भेजा गया। एक गाँव के लोगों को प्राय: अलग -अलग स्थान पर भेजा जाता, यहाँ तक कि कहीं-कहीं एक  परिवार के लोग जो यहाँ आए ,वे भी यहाँ आकर बिछड़ गए। कुली शब्द से संबोधित इन भारतवंशियों के साथ बहुत अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता था। सूरीनाम में भारतवंशियों के इतिहास से संबंधित अधिकतर मूल लेखन डच में ही हुआ है। इनमें मुख्य हैं- ईसाई मिशनरी, डॉ. सीजे एम दॅक्लॉर्क द्वारा लिखित दो पुस्तकें- सूरीनाम में हिंदुस्तानियों का आप्रवास, और रूढि़वादी हिंदुओं के रीति-रिवाज। इसके अतिरिक्त डॉ. जे. डीस्पैकमैन की एक पुस्तक।  अत: आज जो भी लिखित इतिहास प्रत्यक्ष रूप से सामने आता है वह एकतरफा है, कितना तथ्यपरक है यह भी नहीं कहा जा सकता ; किन्तु पुरखों के सुनाए किस्से जिनके आधार पर कालांतर में साहित्य की रचना आरंभ हुई कवियों व लेखकों के शब्दों में परिलक्षित होते हैं जिसका उदाहरण सूरीनाम के प्रसिद्ध कवि श्री अमरसिंह रमन की ऊपर उद्धृत कविता है।
सूरीनाम के अभिलेखागार में मुझे दो हस्तलिखित पत्र भी मिले। कलम से लिखे गए पीले पड़ चुके कागज़ पर कई जगह कलम की स्याही कुछ उड़ गई है। लिखने वाले व्यक्तियों ने वर्णों को जिस प्रकार मिला कर लिखा है उसके दो कारण हो सकते है या तो वह स्वयं बहुत शिक्षित नहीं था अथवा अन्य कोई उसे सरलता से न समझ सके इसलिए ऐसा लिखा। सुनी सुनाई कहानियों के इन लिखित दस्तावेजों का अध्ययन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँची कि अनुमानत: यह  गिरमिट काट रहे व्यक्तियों द्वारा तत्कालीन उच्चाधिकारियों को लिखे गए हैं। पत्रों पर कोई तारीख तो स्पष्ट नहीं है किन्तु यह अवश्य स्पष्ट होता है कि उस समय वह कितने कष्ट में थे, पहला पत्र किसी कुली इंदर अथवा इंद्रा का है, जिसने उच्चाधिकारी से सरदार को बदलने कि अपील की है ;क्योंकि चीनी माँझा उनकी बात नहीं सुनता सरदार की ही बात मानता है, कमिश्नर के आ कर चले जाने पर भी उन्हें किसी प्रकार की राहत नहीं मिली है, करुण शब्दों में की गई यह अपील निश्चित रूप से हृदय को द्रवित करती है। 
दुख -दर्द की यह दास्ताँ समय के साथ भारत भी पहुँची और वहाँ शर्तबंधी समाप्त करने के लिए आवाज़ उठाई गयी। उस समय भारत से दो व्यक्ति चिम्मनलाल और मकेनल महोदय को विदेशों में भारतीय श्रमिकों की दशा देखने के लिए भेजा गया। जब सूरीनाम में रहने वाले भारतीयों को इस बारे में पता लगा तो हजारों व्यक्तियों द्वारा हस्ताक्षर किया गया एक पत्र इंग्लैंड की सरकार के पास भेजा गया और आग्रह किया गया कि उन दोनों व्यक्तियों को सूरीनाम भी भेजा जाए। 1913 में दोनों सर्वेक्षणकर्ता सूरीनाम आए; किन्तु उनकी सूरीनाम यात्रा से किसी को लाभ नहीं हुआ ; क्योंकि वह, तोलक श्री शीतल महाराज के अतिथि बने और शीतल महाराज सदा अफसरों के पक्ष में ही रहते थे ; अत: उन्हें बताया गया कि सूरीनाम में भारतीयों के साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया जाता है और वह इसे सत्य मानकर वापस लौट गए।  लेकिन इसके पूर्व जब कुछ भारतीय शर्तबंधी प्रथा से मुक्त हुए तो उन्होंने जनसमाज कल्याण के लिए कुछ कदम बढ़ाए और 1910 में भारत उदय नामक संस्था का गठन किया। कुछ समय सही रूप से चलने के बाद सभा में मतभेद उत्पन्न हो गए और कुछ लोगों ने सभा छोड़ दी और सन 1911 में एक नई सभा का गठन किया जिसका नाम रखा अख्तयार और हक। उस सभा कि संरक्षिका एक यूरोपीय महिला श्रीमती स्नैदेर्स थी। श्रीमती स्नैदर्स ने भारतीय श्रमिकों के साथ खराब व्यवहार के बारे में आपत्ति उठाई और सभा की सम्मति से एक पत्र भारत भेजा जिसमें चिम्मनलाल और मकेनल की रिपोर्ट को गलत बताया। इस घटना को सुनकर श्री मदन मोहन मालवीय, और महात्मा गाँधी, श्रीमती शेख महताब, कुमारी बेलियामा, श्री गोखले और श्री शौकत अली आदि ने दिल्ली में नई क्रांति शुरू की , जिसके परिणाम स्वरूप 20-03-1916 को लॉर्ड हार्डिंग ने कानून जारी किया और उसी समय से सूरीनाम में भारतीय मजदूरों का आना बंद हुआ।
भारतीय श्रमिक प्लैंटेशनों पर उनसे लिए जा रहे अत्यधिक कार्य व मँझा और अधिकारियों के व्यवहार से असंतुष्ट थे। एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार भी अफसरों से मतभेद के कारण 1876 में अनेक प्लांटेशनों पर समय समय पर झगड़े होने लगे थे। कहीं कहीं आग भी लगाई गई थी; जिसके परिणाम स्वरूप कईं मजदूरों की मृत्यु भी हुई। उल्लेखनीय घटनाएँ हैं अलाइन्स प्लैंटेशन, मरियम बर्घ प्लैंटेशन, जुलन और सोर्ख प्लैंटेशन हैं। कहीं-कहीं तो सेना बुलाने की अवश्यकता भी पड़ी। इन सभी झगड़ो का कारण अत्यधिक कार्य, कम मजदूरी से उत्पन्न असंतोष था।
अनेक किस्से हैं, जो रिपोर्टों में बंद हैं इन सब के साथ-साथ अभिलेखागार में सूरीनाम पहुँचने वाले सभी श्रमिकों का विवरण भी उपलब्ध है तो भी बहुत लोग भारत जाकर अपनी जड़ों को नहीं खोज पाते हैं, इसका कारण उनके नामों में हुआ परिवर्तन है, यह तथ्य सामने आया सूरीनाम के तीसरे राष्ट्रपति श्री रामदत्त मिसिर की पत्नी श्रीमती हिलडा दुर्गा  देवी दीवानचंद से बातचीत के दौरान। श्रीमती मिसिर ने बताया मेरे पिता श्री दीवानचंद        और राजनीति को दिशा प्रदान की। सर्वश्री चंदी साऊ, हीरा सिंह,  बाबूराम, शिवप्रसाद, हरी मूंगरा, ज्ञान अधीन, गजधर, भगवानदीन, करामत अली, मित्रासिंह, रामनिवास, त्रिभुवन सिंह, अजोध्या, मिश्र, बाल उमराव सिंह, राम दिहल, रघुबरसिंघ तथा वंशराज जाने माने वकील रहे हैं तो डॉ. अधीन, डॉ. शुक्ल, डॉ. करामत अली, डॉ. राधाकृष्ण, डॉ. गफूर खान, डॉ. एस. मूंगरा, डॉ. एल मूंगरा, डॉ. तिवारी, डॉ. रघुनाथ, डॉ. विशेश्वर, हीरा सिंह,  डॉ. रतन, डॉ. जीत नाराइन, डॉ. जमालुद्दीन, डॉ. पुनवासी, यहाँ के प्रसिद्ध चिकित्सकों में हैं। उल्लेखनीय व्यक्तियों कि सूची बहुत लंबी है और इसमें शामिल हैं सूरीनाम के तीसरे राष्ट्रपति श्रीमान रामदत्त मिसिर व चौथे राष्ट्रपति श्री राम सेवक शंकर जो हिंदुस्तानी मूल के रहे। पूर्व उप राष्ट्रपति श्री सरजू व मौजूदा उप राष्ट्रपति रौबेर्ट अमीरली भी हिंदुस्तानी मूल के ही हैं। इसके अतिरिक्त कईं हिंदुस्तानी समय-समय पर मंत्री पदों पर आसीन रह चुके हैं। सुश्री इंद्रा ज्वालाप्रसाद राष्ट्रीय असेंबली की सभानेत्री रही हैं; श्रीमती कृष्णा हुसैन अली मथुरा पुलिस चीफ रह चुकी हैं।
ध्यान देने का मुख्य बिन्दु यह है कि वर्षों के संघर्षों के बाद आज  हिंदुस्तानी वंशजों ने इस देश में अपना स्थान बनाया है। अपने पूर्वजों का नाम रोशन किया है, उन पूर्वजों का जो गिरमिट काटने एक अनजान देश आए थे और जिनमें से बहुत अपना मूल नाम भी खो चुके थे। सूरीनाम में हिंदुस्तानियों के पारिवारिक नाम कुछ अलग मालूम पड़े जैसे दुखी, सुखी, सुखाई, गरीब, जंगली, कल्लू, मथुरा, भुलई, भोंदू, आदि। इसके कई कारण हैं, कहा जाता है कि गिरमिट पर भेजने के लिए एजेंट कम पढ़े लिखे श्रमिक वर्ग के लोगों को ही भर्ती करते थे, किन्तु कुछ लोग ऐसे भी थे जो स्वयं अपनी तात्कालिक परिस्थितियों से बचकर भागना चाहते थे और सुख की लालसा में काफी लोग नाम बदल कर भर्ती हुए। दूसरा कारण रहा कि नाम लिखने के लिए अंग्रेज़ी वर्तनी का प्रयोग किया जाता था और उच्चारण भिन्न होने के कारण लिखे गए नाम मूल नामों से अलग थे। जैसे माथुर बन गया मथुरा और कहीं-कहीं मतौ; श्री प्रसाद बन गया सीपर्सौद। एक अन्य कारण है कि जब श्रमिक सूरीनाम पहुँचे उनसे डिपो में दोबारा नाम पूछा गया और तीन माह की कष्टकारी यात्रा के बाद खीझे हुए लोगों में किसी ने अपना नाम दुखी कह दिया तो किसी ने गरीब, डच अधिकारी इन शब्दों के अर्थ नहीं जानते थे और उन्होंने वास्तव में उनके नाम समझकर उन्हें उसी नाम से दर्ज कर दिया। और इस तरह उनके नए नाम पड़ गए। किन्तु नाम जो भी पड़े हों आज यहाँ की कुल जनसंख्या के एक-तिहाई हिंदुस्तानियों का सूरीनाम की धरती पर परचम लहरा  रहा है और अपनी भाषा व संस्कृति के प्रति आरंभ से सजग रहे इन हिंदुस्तानियों ने विषम परिस्थितियों के बावजूद आज भी अपनी भाषा व संस्कृति की ज्योति को जलाए रखा है।   

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