June 11, 2013

निदान खोजना ही होगा...

निदान खोजना ही होगा...
 डॉ. रत्ना वर्मा
25 मई 2013 की शाम, जब सूरज ढला नहीं था। छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के कुछ दिग्गज नेताओं और कार्यकर्ताओं का काफिला बस्तर के घने जंगल जीरम घाटी के बीच से गुजर रहा था अपने पूर्व निर्धारित परिवर्तन यात्रा के एक राजनीतिक कार्यक्रम के सिलसिले में, कि एक जोरदार धमाका हुआ और काफिले की सभी लगभग 20 गाडिय़ों के पहिए थम गए। सड़क की दोनों तरफ से उनकी गाडिय़ों पर अंधाधुंध फाइरिंग शुरू हो गई। किसी को भी जरा भी सोचने समझने का समय ही नहीं मिला। जब तक सुरक्षाकर्मियों के पास गोलियाँ थीं जवाबी फायरिंग चलती रही पर आखिर कब तक? उन्हें अपने हथियार डाल देने पड़े। यह खूनी मंजर दो घंटे तक चला और इस दो घंटे में उन्होंने चुन-चुन कर दिग्गज नेताओं पर गोलियाँ दागी उनके नाम पूछ-पूछकर। नक्सलियों की तैयारी इतनी जबरदस्त थी कि उन्होंने बचने का कोई मौका ही नहीं दिया; बल्कि ऐसी दरिंदगी दिखाई कि प्रत्यक्षदर्शियों की आपबीती सुन कर सबके रोंगटें खड़े हो गए। यहाँ उस खूनी मंजर की कहानी दोहराने की जरूरत नहीं क्योंकि मीडिया में लगातार इस खूनी मंजर की दिल दहला देने वाली कहानी को सबने देखा और पढ़ा है।

इस खूनी खेल में प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा के साथ राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष नंद कुमार पटेल और उनके पुत्र दिनेश पटेल तथा पूर्व विधायक उदय मुदलियार सहित कई कांग्रेसी कार्यकर्ता और सुरक्षा कर्मी मारे गए, जिनकी संख्या 30 तक पहुँच गई है। इस हमले में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विद्याचरण शुक्ल भी घायल हैं, जिनका गुडग़ाँव के वेदांता अस्पताल में इलाज चल रहा है।
छत्तीसगढ़ में हुए इस क्रूर हिंसा की वारदात के बाद हर तरफ सिर्फ एक ही आवाज उठ रही है कि नासूर बन चुके इस नक्संलवाद के मर्ज का कारगर इलाज क्या हो? आँकड़ें बताते हैं कि नक्सलियों की गोलियों से मरने वाले लोगों की तादाद देश में आतंकी हमलों में मरने वाले लोगों से कहीं ज्यादा है। देश के 9 राज्य नक्सलवाद की चपेट में हैं जहाँ के लगभग 107 जिले नक्सल प्रभावित हैं। जिनमें छत्तीसगढ़ के 16 जिले शामिल हैं। प्रभावित राज्यों में इस समस्या को खत्म करने के लिए कई दशकों से रणनितियाँ बनाई जाती रहीं हैं पर अब तक कोई ऐसा कारगर कदम नहीं उठाया जिससे इन राज्यों को राहत मिले। फलस्वरूप इन राज्यों में उनकी ताकत बजाय कम होने के लगातार बढ़ती ही जा रही है।
हमारी रक्षातंत्र की कमजोरी इसी से साबित होती है कि नक्सली कितने अत्याधुनिक हथियार से लैस हैं। सुरक्षा एजेंसियों की खुफिया जानकारियाँ भी आसानी से उन्हें उपलब्ध हो जाती हैं और वे अपनी मर्ज़ी से कभी भी और कहीं भी हमला कर सकते हैं। आदिवासी बहुल कई इलाकों में नक्सलियों का समानांतर प्रशासन भी चलता है। वे स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और जन अदालतों का संचालन करते हैं तो ठेकेदारों, खदान मालिकों एवं उद्योगपतियों और यहाँ तक कि सरकारी अधिकारियों से भी पैसा वसूल करते हैं।
प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जितने प्रभावित राज्य हैं वे मिल कर इस समस्या को जड़ से उखाडऩे के बारे में अब तक एकजुट क्यों नहीं हो पाए हैं? केन्द्र सरकार इन राज्यों के साथ गंभीरता से बात करके कोई हल क्यों नहीं निकाल पाई? पानी सर से ऊपर होता जा रहा है पर पिछले सालों में जो भी प्रयास हुए हैं या नक्सलियों से निपटने के लिए जितने भी उपाय करने की बात कही गई या की गई वे सब नाकाफी साबित हुए हैं। यदि अब तक गंभीरता से इस समस्या को खत्म करने के लिए कारगर उपाय हुए होते तो नक्सली हौसले इतने बुलंद नहीं होते और न ऐसा खूनी खेल जारी रख पाते।
कहने को तो आम आदमी को बहुत से अधिकार मिले हुए हैं पर अफसोस हमारे देश की व्यवस्था अपने नागरिकों को पूरी तरह यह विश्वास नहीं दिला पाती कि हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था में उसके जीने के अधिकार की हर हाल में रक्षा की जाएगी। आदिवासी अपनी ही संपदा जल- जंगल और जमीन के लिए लड़ रहा है। विकास के जो कुछ भी कार्य उनके लिए किये जाते हैं उन्हें लगता हैं उन्हें उनकी जमीन से बेदखल करने के लिए किया जा रहा है नतीजा न वहाँ कोई विकास के कार्य होने दिया जाता न आदिवासियों को मुख्य धारा से जुडऩे दिया जाता।
नक्सल प्रभावित इलाकों में आदिसियों को मुख्यधारा में जोडऩे के लिए जरूरी है कि उनतक रोजगार, न्याय, शिक्षा, और चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाएँ आसानी से पँहुचाई जाए। यह तो सर्वविदित है कि बस्तर प्राकृतिक संपदा से भरपूर इलाका है। अब तक यदि इस संपदा का उपयोग क्षेत्र और यहाँ के लोगों के विकास में किया जाता तो आज इन शोषित और सीदे-सादे आदिवासियों का सहारा लेकर नक्सलवाद बेखौफ होकर पनप नहीं पाता। विकास के नाम पर हुआ भी यही कि इस क्षेत्र की सम्पदा का दोहन धनबल, बाहुबल और राजनैतिक संरक्षण प्राप्त करने वाले लोग ही करते रहे हैं। यहाँ का मूल निवासी निरन्तर गरीब और साधनहीन होता गया, रसूख़्वाल वर्ग निरन्तर फलता-फूलता रहा है। सामान्यजन समृद्धि का भागी नहीं बन सका, यही नहीं न्याय भी उसके लिए सहायक नहीं बना। यही वंचना धीरे-धीरे उसके भीतर सुलगती रही और उसके इस विश्वास को पुख़्ता करती गई कि उसके साथ छल किया जा रहा है। अविश्वास की इस खाई को भी पाटना ज़रूरी है। भेदपूर्ण व्यवहार इस समस्या के निवारण में सबसे बड़ी बाधा है।
केन्द्र सरकार ने इस सबसे बड़े नक्सली हमले में हुई चूक को स्वीकार तो कर लिया है और इन हत्याओं की जाँच, नेशनल जाँच एजेंसी- एनआईए को सौंप दी है। राज्य सरकार ने भी इसकी जाँच के लिए एक न्यायिक आयोग बिठा दी है पर यह भी सत्य है कि यह इस समस्या का निदान नहीं है। दरअसल बस्तर में व्याप्त नक्सल समस्या का सफाया मात्र जाँच दल बिठाकर, सुरक्षा बल बढ़ाकर या बस्तर को छावनी में तब्दील करके नहीं होने वाला। इसका खात्मा वहाँ रहने वाले स्थानीय लोगों की जमीनी लड़ाई से जुड़कर करना होगा; क्योंकि हर स्तर पर कई दशकों से वे राजनीतिक, आर्थिक और व्यावसायिक स्तर पर शोषित हो रहे हैं। जिसके कारण आदिवसियों का वर्तमान व्यवस्था पर से भरोसा उठ चुका है और इसी का फायदा नक्सली उठाते हैं, वे आदिवासियों को इस शोषण से मुक्ति दिलाने की बात करते हैं उन्हें वह सब देते हैं जो उन्हें अपनी सरकार से मिलना चाहिए। इतना ही नहीं वे ऐसा माहौल तैयार करते हैं कि सरकारी स्तर पर किए जाने वाले कार्य को भी वे अपने विरूद्ध समझते हैं।
 अतः यह लड़ाई वहाँ रहने वाले सीधे सच्चे और भोले भाले आदिवासियों का विश्वास हासिल करके जीतना होगा।  राजनीतिक दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ एक कारगर रणनीति बनाकर ही इस समस्या से मुक्ति पाई जा सकती है।                                                              

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