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Aug 1, 2026

पर्व - संस्कृतिः हरेली तिहार आ गे

  -  रविन्द्र गिन्नौरे

सावन मास की अमावस्या, जब वसुंधरा हरित परिधान ओढ़ लेती है। गाँव- गँवई के खेत खलिहान, नदी, तालाब जल से छलक- छलक उठते हैं। खेतों में धान के बिरवा हर ओर हरियाते नज़र आने लगते हैं जो हवाओं के साथ लहराते दिख पड़ते हैं। खेती- किसानी का काम संपन्न हो जाता है और तब मनाया जाता है छत्तीसगढ़ का पहला त्योहार 'हरेली'। छत्तीसगढ़ की परंपरा, संस्कृति और आस्था को संजोकर जन कल्याण की भावना के साथ मनाई जाती है 'हरेली'।

लोक पर्व हरेली के दिन सुबह- सुबह हर दरवाजे पर नीम की एक डाल खोंची जाती है। वहीं गाँव के लुहार देहरी पर एक कील ठोंकते हुए नज़र आते हैं। किसी अनिष्ट की संभावना से बचने के लिए यह परंपरा निभाई जाती है। गाँव का हर वर्ग हरेली में अपनी अपनी- अपनी भूमिका निभाता है। राऊत, बढ़ई, लोहार, बैगा, गुनिया सभी भागीदारी निभाते हैं। गाँवों में सुबह से ही हर ओर उल्लास और उमंग से भरे लोगों का हुजूम दिख पड़ता है। मस्ती से भरे ठिठोली करते हुए बच्चे गेड़ी चढ़ गाँव की गलियों में दौड़ लगाते हैं। हर ओर बच्चों की टोली का शोर सुनाई पड़ता है।

  धान के लहलहाते खेतों को देख महसूस होता है कि हर ओर हरियाली फैली हुई है। आकाश में बादलों की गरजना, कहीं रिमझिम बरसते मेध, तो कहीं दूर कौंधती बिजली मानो प्रकृति भी हरेली का स्वागत करने आतुर हो उठीं हो। पर्यावरण, संरक्षण, संवर्धन का संदेश देते, वहीं कर्म को बल देते, गाँव में आपसी सौहार्द को अपने में समेटे हुए मनायी जाती है 'हरेली'। अपने श्रम सीकरों से फसलों के लिए किसान अपने कृषि औजारों, गोधन की साज संभाल करते हैं। अनजाने अनिष्टों से बचने के लिए अनुष्ठान करते हैं। इसी के साथ उल्लासित होते मनती है 'हरेली'।

पशु कल्याण –

गोधन संस्कृति गाँव को आर्थिक स्वालंबन देती है। गोधन संवर्धन के लिए राऊत आज भी अपनी अहम् भूमिका निभाते हैं, जो सतत पशुओं के कल्याण में लगे रहते हैं। हरेली के पहले ही जंगल में जाकर भांवर पेड़ की छाल बटोरते हैं। दशमूल कंद को खोदकर लाते हैं। वनौषधियों से काढ़ा तैयार किया जाता है। हरेली की सुबह 'सांहड़ा देव' की पूजा अर्चना कर गाँव में काढ़ा बांटा जाता है। ग्रामीण अपने गाय, बैल, भैसों को आटे की लोदी खिलाते हैं और काढ़ा पिलाते हैं। यह औषधि गाँव के पशुधन को बीमारियों से बचाती है। राऊत सभी को शुभकामना देते हुए कह उठते हैं- 

"धन दुगानी पावय भझ्या

पावय हमर असीसे, 

नाती पूत ले घर भरय 

जीर्यों लाख बरीसे।"

पौराणिक मान्यता-

प्राकृतिक, देवीय और मानवीय संकटों से गाँव की रक्षा के लिए बैगा की अपनी भूमिका निभाता है। मान्यता है कि गाँव का बैगा ही संक्रामक रोगों, शत्रुओं और कष्टों से रक्षा करने में समर्थ होता है। गाँव बंद किया जाता है और रात में सवनाई चलाई जाती है। हर घर की दीवारों पर गोबर से 'पुतरा पुतरी' अंकित किए जाते हैं। पशुधन को खुरहा चपका बीमारी से बचाने के लिए अर्जुन के दस नामों का स्मरण किया जाता है।

 पौराणिक कथा के अनुसार महाभारत काल में अर्जुन  अपने अज्ञात वास में छिपने के लिए विराटनगर में वृहनल्ला बने थे। अर्जुन जब अपने असली रूप में वापस आये तब विराटनगर में फैली पशुओं की बीमारी अपने आप समाप्त हो गयी। इस घटना को ध्यान में रखकर पशुओं को बीमारी से बचाने के लिए अर्जुन के नाम का स्मरण किया जाता है।

कृषि औजारों की पूजा -

 हरेली का तीसरा महत्वपूर्ण चरण है कृषि उपयोगी औजारों की साज सम्हाल। खेती का काम पूरा हो जाता है फिर नागर, कुदारी, रांपा, बसुला, टँगिया, आरी, भँवारी, साबर, चटवार, हँसिया, बिंधना जैसे उपकरणों को निकालकर धोया जाता है। ग्राम- देवताओं और लोक देवताओं के साथ इनकी भी पूजा-अर्चना की जाती है। देवों को चीला रोटी का भोग लगाया जाता है। कृषि औजार किसानों के अंलकार हैं। इनकी सुरक्षा उतना ही जरूरी है जितनी कि आभूषण की। इस पर कहा गया है,

"नागर तुतारी टँगिया 

कुदारी किसान के गहना,

अऊ किसनिन के रापा

 गैंती झऊंहा नहना ।।"

लोक देवी-देवता- 

   लोक देवताओं के बारे में मान्यता है कि ये ग्रामीणों का दुख दूर करते हैं। हर गाँव के अपने एक अलग देवी-देवता होते हैं जिनकी पूजा अर्चना की जाती है। गाँवों में तो हरेली से लेकर ऋषि पंचमी तक तंत्र- मंत्र सीखने की प्रक्रिया भी चलती रहती है। तन्त्र मंत्र सीखने की शुरुआत हरेली से होती है इस दिन 'पाठ पीढ़ा' दिया जाता है।

हरेली का उल्लास -

   बच्चों के साथ वृद्धों का उत्साह देखते बनता है। हरेली के दिन बांस से बनी गेंड़ी चढ़ने की परंपरा निभाई जाती है। कीचड़ पानी से सराबोर हुई गाँव की गलियों में गेड़ी पर चलते लोग दिखते हैं। हरेली त्यौहार में गेड़ी दौड़ प्रतियोगिता आयोजित होती है, कहीं गेंड़ी नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है। महीने भर गेंड़ी का आनंद लेने के बाद इसे विसर्जित कर दिया जाता है।     

  हरेली पर गाँव के चौपाल में पारंपरिक रूप से धार्मिक अनुष्ठान होता है। कहीं आल्हा सुनाई देता है, तो कहीं रामायण की स्वर लहरियाँ गूँज उठती हैं। लोक मान्यता है कि जब तक हरियाली रहेगी, तब तक किसानों के खेत आबाद रहेंगे। जंगल हरे-भरे रहेंगे। जंगल हरे रहेंगे, तो उनके पशुओं के उत्तम स्वास्थ्य के लिए ‘दिव्य रसायन’ की प्राप्ति होती रहेगी। हर हमेशा हरियाली बनी रहे, जो सब का पोषण करती रहे, ऐसी परंपराओं को संजोए हरेली त्यौहार हर बरस मनाया जाता है।

ravindraginnore58@gmail.com

Jul 1, 2026

ललित निबंधः घिर घिर आये काले कजरारे मेघ

 - रविन्द्र गिन्नौरे

  मानसून आने का उल्लास आस बाँधे उन किसानों की आखों से झलकता है जो जेठ की तपती हुई धरती माता के दुख से व्यथित होकर आसमान की ओर टकटकी लगाये बादलों की प्रतीक्षा करते हैं कि कब बादल छाए और बरसात हो। बादलों के छाते ही मोरों के पैर थिरक उठते हैं, पपीहे के बोल फूट पड़ते हैं, दादुरों का राग, झींगुरों का संगीत मुखरित हो उठता है। ऐसा मधुरम संगीत जिसके स्वागत के लिए वो अतिथि कितना अमृतमयी होगा। मानसून के आते ही धरा पर काले कजरारे मेघ छा जाते हैं, रिमझिम बरसात से चराचर जीवन धन्य हो उठता है। हर कवि ने प्रकृति के इस अनूठे कौतुक को अपने काव्य में पिरोया है। लोक गायकों ने अपने गीतों के माध्यम से इसकी यशोगाथा गाई है, जिनमें बादलों के लिए जीवन्त प्रतीकों का इस्तेमाल किया है। संस्कृत कवियों ने बादलों को अमृतमयी व वात्सल्य से भरे कहा है तो कहीं उनके विद्रूप रूप को भी प्रस्तुत किया है। महाकवि जयदेव ने बादलों को ऐसे ही दूसरे रूप में प्रस्तुत करते हुए 'भामिनी विलास' में लिखा है -

 "धनी से अपने लिए धन लेने वाले का मुँह यदि काला हो, तो क्या विचित्रता है कि दूसरों के लिए भी समुद्रों से जल लेने वाले मेघ पूरा का पूरा ही काला हो जाता है-

“स्वार्थ धनानि धनिकात् प्रतिगृह्रतो यत् आस्यं, भजेन्मालिनता किमिद विचित्रम, गृहणः परार्थमपि वारिनिधेः पयोऽपिं, मेघोऽ‌यमेति सकलोऽपि च कालिमान्‌म।"

     पौराङ्गनाएँ कटाक्षों से मेघ के साथ विलास करती हैं। उज्यियिनी की उन्मादिनियाँ मेघ दर्शन से उन्मन्त हो जाती हैं। जनपद की वधुएँ कामपुरुष मेघ के अभिराम रूप का पान करती हैं, किन्तु यह सब निरर्थक नहीं है, उनका लक्ष्य कृषि फल प्राप्ति है। मेध कृषि प्रवर्तक हैं, यदि इनके आगमन में विलंब हो जाये तो संपूर्ण वन प्रकृति विस्फारित नेत्रों से आकाश की ओर एकटक निहारने लगती है। मेघ का सुधावर्षण उनके लिए प्राणद है। मेघदूत में कालिदास ने इसलिए ही कहा है-

"त्वरयत्यायतकृषिफलमिति भूविलासानभिज्ञैः

प्रीतिस्निग्धैर्जनपदवधूधूलिचनैः पीयमानः।।"

    मानसून के आते ही विरहणी की दशा कैसी हो जाती है उनके विरह को संस्कृत कवियों ने चित्रित किया है। विरहणी वर्षा की शोभा को कातर दृष्टि से देख अपनी सखी से कहती है, "देखो आषाढ़ आ गया है, दसों दिशाओं में मेघ आच्छादित हो चुके हैं। कजरारे बादलों के साथ हवाएँ कैसी अठखेलियाँ कर रही हैं, पर है सखी मेरी आशा मुझे केवल धोखा दे रही है-

आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाशास्ते ।

प्रिय सखि मम पुनराशा भ्रमयति भूरि ॥

      वैसे वर्षा का अनूठा सौंदर्य किसका मन नहीं मोह लेता है। पृथ्वी पर फैली हरियाली और काली घटाओं के बीच रह रह कर प्रदीप्त होती चपला बिजली की चमक अद्‌भुत दिखती है। फूलते हुए कदम्ब के पेड़ पर नाचते मोरों की थिरकन को देखने इंद्रवधू भी घरा पर आ उतरती है। कविवर नंददास ने अत्यंत सूक्ष्मता से बरसात के मौसम का हृदयग्राही चित्र अपनी काव्य पंक्तियों के माध्यम से दिखाया है-

घन होति हरीरी मही को लखै, निरखै घन जो घनज्योति छटा ।

 अवलोकति इन्द्रवधू की पत्यारी,विलोकति है खिन कारी घटा । 

ताकि डार कदंबन की बरसे दरसे, उत नाचत मोर अटा ।

 अधऊरध आवत जात भयो, चित नागरि को नर कैसो बटा ।।

उमड़‌ते घुमड़‌ते बरसते काले बादलों के बीच चंचला बिजली रह रह कर थिरक उठती है, कहीं जल-वृष्टि के बाद निष्प्रभ हो श्वेत हो जाना, कैसा सुन्दर व्यतिरेक है। जिसको देख विरही पपीहा बोल उठता है ,कोयल कूक उठती हैं। कलरव करते पक्षियों के साथ दादुर भी सुर मिलाते हैं। विरही का मन इन आवाज़ों को सुन कम्पित हो उठता है। तारों की चमक देख विरहिणी कहती है कि मैं प्रीतम को मना करती रही, जिसके बिना मेरा तन विरह से जल रहा है। सावन के ये बादल मेरी विरहाग्नि को और बढ़ा रहे हैं।

 कविवर मतिराम ने विरहिणी की विषम व्यथा को उकेरते हुए कहा है-

उमड़ि घुमड़ि धन छोड़त अखंड धार, चंचला उठति तामें तरजि तरजि कै। 

बरही, पपीहा, भेक, पिग, खग टेरत हैं, धुनि सुनि प्राण प्राण उठे लरजि लरजि कै । 

कहै कवि राम लखि चमक खदोतन की, प्रीतम को रही मैं तो बरजि बरजि बरजि कै।

 लगे तन तावन बिना री मनभावन कै, सावन दुक्न आयो गरजि गरजि कै।।

         ग्रीष्म की भीषण ज्वाला को, वर्षा की सौंद‌र्यमयी अद्‌भुत छटा अपने आगोश में ले लेती है। धूल के बवंडर बरसात की श्वेत चाँदी सी बूँदों में मिल एकाकार हो जाते हैं। घरा पर सोंधी महक और शीतल प्राणद वायु से चहुंओर हर्षोल्लास हो उठता है। वर्षा जल ग्रहण करने के लिए चातक स्वाति नक्षत्र की प्रतीक्षा करता है। मेंढ़क बादल गर्जना से होड़ लिये टर्राने लगते हैं। स्याह बाद‌लों के बीच कौंधती बिजली क्षण भर को दसों दिशाओं को प्रकंपित कर देती है। पहली वर्षा में बगुले भी पंक्तिबद्ध हो आकाश में विचरते बागों का सौंदर्य निहारने उड़ान भरने लगते हैं। ऋतुओं का वर्णन करने वाले कवि पद्‌माकर ने वर्षा का अनूठा चित्रण किया है-

दौरत ददेरी देत दादुर सूँ दू़दै दीह, 

दामिनी दमंकत दिसान में दसा की है, 

पहलन बूँदन बिलोक बगुलान बाग. 

बंगलान बेगिन बहार बरषा की है।

   घने काले बादल चारों ओर से उमड़‌ते घुमड़ते बरस घिर आए हैं, कविवर द्विजदेव की नायिका अपनी सखी से कहती है, सखी! ऐसी वर्षा मुझे विरह में विष बूँद- सी लगती है। वह उलाहना देते कहती है कि पापी पपीहा तुझे मेरी सौगंध, ऐसी छटा में अपना दाँव मत चूक, जो बार बार प्रीतम की टेर लगाए हुए मुझे सुना रहा है,

बाद‌लों को संदेश वाहक बनाते समय कालिदास का मन कितना व्यथित होगा! इस की कल्पना करना सहज नहीं है। कालिदास की इन्हीं भावनाओं पर कवि नागार्जुन ने मर्म कटाक्ष करते के हुए कहते हैं-

वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका,

प्रथम दिवस आषाढ़ मास का,

रोया यक्ष कि तुम रोए थे,

कालिदास, सच-सच बतलाना।

ravindraginnore58@gmail.com

Mar 1, 2026

शब्द चित्रः मक्खी नाना

  - रविन्द्र गिन्नौरे 

   मक्खी नाना कहते ही एक ऐसी कद काठी का अक्स सामने उभर आता है, जिसे भुला पाना मुश्किल है। इकहरी काया उस पर लमतोरा सपाट झुर्रीदार चेहरा, खल्लवाट पर लहराते लंबे लंबे कुछ खिचड़ी बाल, आँखें मानों गहरे कुएँ में धँसी हों मगर होठों पर हमेशा अलमस्त मुस्कान बिखेरे रहते हैं मक्खी नाना।      

    हमेशा एक जैसा पहनावा जिन्हें दूर से देख कर जाना जा सकता है कि वो मक्खी नाना हैं। आधी बाहों की सफेद सी शर्ट और नीचे पतला लाल गमझा लपेटे हुए, जिसमें उनका लंगोट झलक जाता है। ऐसे हैं हमारे मक्खी नाना।

        हम बचपन में उन्हें 'मक्खी नाना' कह चिढ़ाते और मज़ा लिया करते थे। अब हम चड्डी से पेन्ट शर्ट पहन, दाढ़ी मूँछ बनाने लग गए; मगर मक्खी नाना की सेहत पर मौसम का कोई फर्क नहीं पड़ा। जस के तस रहे, न मरे ना मुटाए। जिन्हें हमने कभी जवां नहीं देखा, न ही बुढ़ापे की छाप उन पर नजर आई।

  अलबत्ता अब बच्चे उन्हें चिढ़ाना बंद कर 'नाना' कहने लगे‌ और वे 'जगत नाना' बन गए। नाना के बड़े भाई भौजाई तक उन्हें नाना कहने लगे।

    नाना चिर कुँवारे ही रह गए। शादी उनके लिए एक बुरा सपना बन कर रह गई। नाना ने अपनी शादी के लिए बड़े अरमान पाले थे। बहुत पापड़ बेले, कि कोई लड़की 'हां' तो कह दे! शादी के लिए राजी हो जाए। जिस लड़की को देखने जाते वह नाना को देखते ही बिदक उठती थी। यह बात आज तक समझ में नहीं आई।

    नाना जब पहली पहली बार लड़की देखने जाने वाले थे, तब खूब तैयारी की, बड़े सजे-धजे थे। तंग मोहरी का चटख नीले रंग का फुलपेन्ट और पूरी बाहों वाली सफेद कमीज़ इन कर उस पर चौड़ा बेल्ट ऐसा खींच कर बाँधा था कि उनकी पतली क़मर अलग से उभर पड़ी। चमड़े का नोंकदार चमचमाता काला जूता पहना था। सजे संवरे इतने कि उन्हें देख कर लोग 'मक्खी नाना' कहना ही भूल गए। जाने से पहले आधा गाँव का चक्कर लगा आए और सबको बता आए कि लड़की देखने जा रहें हैं भई। फिर कई दिनों तक नाना नजर नहीं आए। बाद में पता चला कि लड़की ने नाना को नापसंद कर दिया। नाना कई बार लड़की देखने गए। जहाँ भी लड़की होने की खबर मिलती, नाना किसी को साथ लेकर पहुँच जाते।

लड़की देखने नाना जाते! लेकिन फिर क्या हुआ यह जानने की उत्सुकता सभी को बनी रहती थी। उसके बाद नाना कई दिनों तक घर से बाहर नहीं निकलते, फिर किसी दिन चाय की दुकान पर दिख पड़ते और अपनी आप बीती खुद बताते। कि कैसे लड़की ने इनकार कर दिया! आखिरी में नाना बताते कि हम ही ने ना कर दिया। लड़की और उसके परिवार वालों के कई नुक़्स निकालते और पूछ बैठते कि "बताओ" ! भाई ऐसी लड़की से हम शादी कैसे कर लेंगे।"

  नाना की शादी नहीं हुई, इसकी क्या वजह हो सकती है ? ऐसे में नाना ने अपनी मर्दानगी सिद्ध करने के लिए कई जौहर दिखाए। हर बार नाना मुँह की खाते और लुटे-पिटे आते और फिर से नई तैयारी में जुट जाते। अलबत्ता मर्दानगी के जौहर में नाना कभी शहीद नहीं हुए। नाना से जुड़ी ऐसी अनेक घटनाएँ घटी जिसे लोग सुन सुनाकर खूब मजा लेते। नाना से जब कोई पूछता, तो वह खिसिया जाते और कहते, 

"यह कोई शोभा वाली बात थोड़ी है जो बताई जाए"।

      शादी नाना के भाग्य में नहीं थी। कोई लड़की अर्धांगिनी नहीं बनी, तो ना सही। वैसे नाना अपने नाम के एक थे अपनी रोटी वो खुद थोप लेते थे। जब उनकी भौजी परलोक सिधारी तो उनके बड़े भैया ने दो बच्चों सहित पूरी गृहस्थी का बोझ नाना पर डाल दिया। नाना बाप तो बन नहीं सके लेकिन अपने भतीजों के नाना बन जरूर बन गए। दोनों बच्चों को गोद में उठा कर घुमाते लोगों को बताते कि ये उनके नाती हैं।

   नाना कभी ठलहे नहीं रहे, ना ही उन्होंने मुफ्त की रोटी तोड़ी। धंधे बहुत किए। सेल्समैनशिप के गुर सीखना हो तो नाना से सीख ली जा सकती है। बीड़ी बेचने से लेकर जमीन दलाली तक करते। नाना की लच्छेदार बातों में दम दिखता था। जिधर नाना हो उधर पलड़ा भारी दिखता था। बात के धनी, इनाम के पक्के नाना ने कभी पैसे की परवाह नहीं की, जितना मिला उसी से संतोष कर लिया। गप्प सड़ाका मारने में नाना का कोई जवाब नहीं! प्रेम प्यार की कोई बात हो या कोई वारदात, नाना उस में इतना रस घोलते कि उनका पूरा किस्सा सुने बिना उठने का मन ही नहीं होता। पोलपट्टी खोलने में नाना उस्ताद थे। लोगों की पोल खोलने बैठते तो उसके सात पुरखों के नाम पर पानी फेर देते थे। चाय सुड़कते हुए नाना जब कभी किसी की पोल खोलने बैठते तो लोगों के कान उधर लग जाते थे और तब चाय का मजा दुगना हो जाता था।

कुछ भी हो, नाना सबके काम में पहले आगे आते थे। जिसका कोई नहीं उसके लिए नाना हरदम तैयार रहते थे। चाहे जैसा काम हो, सारा भार उठा लेते थे। जिंदा दिल इंसान कैसा हो? उसकी साक्षात मिसाल थे नाना, जो किताब के पन्ने से निकले नायक जैसे हमारे बीच रहे।

 नाना के झुर्रीदार चेहरे पर कानों तक खींची मुस्कान उन्हें जीवन्त बनाएँ रखती, ऐसी ही प्रेरणा उनसे कोई ले मगर यह संभव नहीं है।

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Jan 1, 2026

प्रकृतिः आते हैं नभ से जल के मेहमान

 - रविन्द्र गिन्नौरे 

    प्रवासी पक्षियों का आगमन बदलते मौसम की सूचना सुखद जलवायु के साथ होता है। हर बरस हजारों मील की यात्रा करके पक्षी भारत सहित दूसरे देशों में सर्दियों में इसलिए आते हैं कि यहाँ का मौसम उनके लिए अनुकूल है। ऐसे पक्षियों की मूल भूमि का तापमान काफी गिर जाता है, जहाँ उन्हें अपना भोजन जुटाने के साथ अनुकूल वातावरण नहीं मिलता। विश्व स्तर पर प्रवास करने वाले पक्षियों के अपने निर्दिष्ट स्थान हैं। नियमित रूप से साल दर साल पक्षी प्रवास कर अपना निवास बनाकर प्रजनन वहीं करते हैं जहाँ उनका भोजन भी उपलब्ध रहता है।

   सदियों से पक्षियों का प्रवास चल रहा है, जिसे मानव ने बहुत बाद में जाना। चार दशक पूर्व तक इन पक्षियों का शिकार काफी होता रहा। शिकार के कारण पक्षियों ने अपनी जगह भले बदली परंतु प्रवास करना नहीं छोड़ा। पक्षियों की संख्या में कमी जरूर होती थी, परंतु उस खतरनाक स्थिति में नहीं पहुँचती थी कि इनकी प्रजाति ही विलुप्त हो जाए। बढ़ते प्रदूषण के कारण पक्षियों की अनेक प्रजातियाँ खतरे में पड़ गई हैं। बदलते मौसम और फसल चक्र में परिवर्तन के कारण प्रवासी पक्षी अपनी निर्धारित ठौर से भटकने को मजबूर हो गए हैं।

    तूफान और बाढ़ जैसी विभीषिका लगातार होने के कारण पक्षियों के प्रवास में बाधा पड़ती है। वैसे प्राकृतिक घटनाओं का आभास पक्षियों को पहले ही हो जाता है। ऐसे स्थिति में पक्षी तूफान के बाद, प्राकृतिक स्थिति निर्मित होते ही आ जाते हैं। 

      भारत में शरद ऋतु आते ही कुररी पक्षी (arctic tern) उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव के लिए उड़ान भरता है और वसंत आने पर प्रजनन करने अपने घर लौट आता है। यही कोई 35 हजार किलोमीटर की खतरों से भरी तूफानी यात्रा करके हर साल सफ़र करता है कुररी। आश्चर्य है कि कुररी पक्षी दो विपरीत ध्रुवों को जोड़ता है।

    सर्दियों के मौसम में खंजन भी आता है। तुलसी दास रामचरित मानस में लिखते हैं, 

'जानि सरद रितु खंजन आए, 

पाइ समय जनु सुकृत सुहाए।' 

           यह हमारे पुण्यों का सुफल है कि शरद ऋतु में खंजन आए। खंजन हर साल 5000 किलोमीटर दूर साइबेरिया, मंगोलिया आदि से हिमालय पार करके आते हैं। जो देश के जलाशयों को सुंदर तथा जीवंत बनाते हैं।

 खूबसूरत प्रवासी पक्षी-   रंग बिरंगे खूबसूरत अदा लिए तरह तरह के पक्षी नम भूमि में मनोरम दृश्य प्रस्तुत करते हैं। स्वेंसन बाज (Swainsons's hawk) उत्तर-पश्चिमी अमरीका से चल कर अर्जेंटाइना पहुँचते हैं। खंतिया हंसक (shoveller) यूरेसिया से भारत तथा अन्य देशों में प्रवास करते हैं। लाल वारिरंक (red knot) कनाडा के ध्रुवीय क्षेत्रों से दक्षिण अमेरिका के दक्षिण कोने पेटागोनिया तथा तियेरा दैल फ्यूएगो में प्रवास करते हैं। ये प्रवासी पक्षी अपनी ख़तरनाक यात्रा के दौरान भूमध्य रेखा क्षेत्र के सदाबहार वनों को पार करते हैं। किन्तु, वहाँ रुकते नहीं ? क्योंकि पक्षी अपने गृह क्षेत्रों के समान ही प्राकृत वास तथा आहार पाना चाहते हैं। इस लिए ही अलास्का जैसे शीत प्रधान क्षेत्र में ध्रुव कूजिनी (arctic warbler) भूमध्यरेखीय फिलीपींस जैसे ग्रीष्म वर्षा के क्षेत्र में प्रवास करती है। 

आहार और आश्रय के लिए यात्रा पक्षियों के लिए मनोरंजन नहीं है। उनका प्रवास तो जीवन-मरण की यात्रा है। जो मौसम के अनुसार, आहार-शून्य होते प्रजनन क्षेत्र से पर्यावास के लिए साहसिक अभियान के साथ उड़ान भरते है। जब भी पक्षी के गृह क्षेत्र में आहार का 'अकाल' पड़ना शुरू होता है, पक्षियों को विशाल साहसिक उड़ान भरने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

    वास्तव में पृथ्वी पर जितने भी जीव हैं, उनमें खोजने, घूमकर खोजने की सहजवृत्ति बराबर कार्य करती है। इसी सहजवृत्ति के कारण मानव सारी पृथ्वी पर फैले। प्रवास करने वालों की खोज या तो ऐसे आवास की होती है, जहाँ उन्हें बेहतर या घर जैसा माहौल मिल सके, जहाँ वे अपने घर जैसे आहार-शून्य मौसम में निर्भर रह सकें। पक्षियों को फल और कीट तो हमेशा रूचिकर लगते हैं। उनके शावकों को प्रचुर मात्रा में प्रोटीन भरे कीट भी जरूरी होते हैं। अपने शावकों को वे भरपूर मात्रा में कीट मिले! संभवतः इसीलिए वयस्क पक्षी फलाहारी भी हो जाते हैं।

मौसम और जलवायु-

उत्तरी गोलार्द्ध में जब उत्तरी क्षेत्र में अत्यधिक ठंड पड़ती है, तब दक्षिण दिशा की ओर यात्रा करें तो पहले समशीतोष्ण तथा बाद में भूमध्यरेखीय गर्म जलवायु मिलती है और उड़ते  रहें तो दक्षिणी गोलार्द्ध की ग्रीष्मकालीन भूमध्यरेखीय उष्ण जलवायु मिलती है। इससे भी और आगे उड़ते रहने पर समशीतोष्ण जलवायु मिलती है।

   अतएव अधिकतर पक्षी प्रवास उत्तर-दक्षिण दिशाओं में होते हैं। जैसे अभी तक की जानकारी के अनुसार पोइड क्रेस्टेड ककू दक्षिण अफ्रीका से मानसून आते ही भारत में प्रवास के लिए आते हैं जो वर्षा ऋतु पश्चात् लौट जाते हैं। चातक पक्षी अपने प्रवास क्षेत्र में प्रजनन करते हैं। यह उस नियम का अपवाद है, जिसमें माना जाता है कि प्रवासी पक्षी अपने गृह क्षेत्र में ही प्रजनन करते हैं; लेकिन इन्हें प्रजनन क्षेत्र में शावकों के साथ पालन के लिए पूरा समय नहीं मिलता। इस समस्या के हल के लिए मादा चातक अपना अंडा दूसरे पक्षी के घोंसले में देकर निश्चिंत हो जाती है।

     पक्षियों के प्रवास मार्ग का निर्धारण पर्वत श्रृंखलाओं, सागर तटों, हवाओं की दिशा, नदियों तथा विकास प्रक्रिया आदि से होता है। आहार की सुलभता, शिकारी पक्षियों, जानवरों तथा मनुष्यों से सुरक्षा तथा लाखों पक्षियों के ठहरने के स्थान भी प्रवास मार्ग का निर्धारण करते हैं। यथा संभव हवा की दिशा के अनुकूल उड़ना ही पक्षियों के लिए लाभकारी होता है। हवा का वेग उनके वेग में जुड़कर उनके यात्रा वेग को बढ़ाकर उनकी यात्रा समय कम कर देता है।

भारत में आने वाले प्रवासी पक्षी -

  भारत में प्रवास करने वाले पक्षियों में ग्रेट व्हाइट पेलिकन जो मुख्य रूप से यूरोप और मध्य एशिया से आते हैं इन्हें असम और उत्तर प्रदेश में देखा जाता हैं। द रफ, यूरोप और साइबेरिया से आते हैं यह उत्तर प्रदेश और त्रिपुरा जाते हैं। ब्लूथ्रोट अलास्का से राजस्थान के भरतपुर पहुंचते हैं।ग्रेटर फ्लेमिंगो अफ्रीका और यूरोप से आकर गुजरात के पक्षी अभयारण्यों में विचरण करते हैं। द गैडवाल यूरोप और उत्तरी अमेरिकी से मध्यप्रदेश और ओडिशा की ओर जाते हैं। स्पॉटेड रेडशैंक आर्कटिक और यूरोप आकर हरियाणा के जलाशयों में रहते हैं। रोजी पेलिकन यूरोप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में ठहरते हैं। ब्लू-टेल्ड, बी-इटर दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया से आते हैं, जिन्हें दक्षिण भारत की नमभूमि में देखा जा सकता हैं। साइबेरियन सारस (साइबेरियन क्रेन): पश्चिमी साइबेरिया से आते हैं जो भरतपुर नेशनल पार्क की शोभा बढ़ाते हैं। यूरेशियन स्पैरोहॉक ज्यादातर उत्तरी एशिया, यूरोप, साइबेरिया और टुंड्रा क्षेत्रों से लंबा सफर करके भारत में आते हैं और मार्च तक भारत में रहते हैं।

छत्तीसगढ़ में आने वाले प्रवासी पक्षी- 

   छत्तीसगढ़ में सर्दियों के मौसम में कई प्रवासी पक्षी आते हैं जो हजारों किलोमीटर का लंबा सफर तय करके यहाँ डेरा डालते हैं। प्रमुख प्रवासी पक्षियों में गार्गनीज़, टफ्टेड डक, साइबेरियन स्टोनचैट, ब्लैक स्वान, कार्लोलाइन डक, क्रिस्टेड डक, मस्कोवी डक आदि शामिल हैं। इसके अलावा, गिधवा परसदा, बारनवापारा में दुर्लभ मलार्ड पक्षी आने लगे हैं, जो यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका के ठंडे इलाकों से आते हैं। सरगुजा संभाग में पाइड एवोसेड और मार्श हैरियर जैसे  विदेशी प्रवासी पक्षियों का भी आगमन होता है। धमतरी जिले में यूरोप, रूस, अमेरिका, साइबेरिया और अन्य दूर देशों से कई प्रवासी पक्षी आते हैं जैसे पैसेफिक गोल्डन प्लोवर, व्हिम ब्रेल, डनलीन, रिवर लैपविंग और टैमनिक स्टींट।ये पक्षी छत्तीसगढ़ के जंगलों, जलाशयों और दलदली इलाकों में प्रजनन और प्रवास करते हैं, जिससे प्रदेश की जैव विविधता समृद्ध होती है।    

    छत्तीसगढ़ वन विभाग और स्थानीय लोग अब पक्षी संरक्षण के लिए जागरूक हुए हैं। 

छत्तीसगढ़ के प्रवासी पक्षी- गार्गनीज़, टफ्टेड डक, साइबेरियन स्टोनचैटब्लैक स्वान, कार्लोलाइन डक, क्रिस्टेड डक, मस्कोवी डकमलार्ड (दुर्लभ प्रजाति) पाइड एवोसेड, मार्श हैरियर पैसेफिक गोल्डन प्लोवर, व्हिम ब्रेल, डनलीन, रिवर लैपविंग, टैमनिक स्टींट आदि हैं। छत्तीसगढ़ प्रवासी पक्षियों की विविधता जैविक और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। 

       पक्षियों के आगमन से तालाब, झील का इलाका चहचहाहट से गूँज उठता हैं। मनमोहक पक्षियों को निहारने का आनन्द हर साल आता है सर्दियों में।

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Sep 1, 2025

पर्व - संस्कृतिः देवों के देव गणपति

  - रविन्द्र गिन्नौरे 

     गणपति की उपासना भारत में प्राचीन काल से चली आ रही है। समस्त कार्य प्रारम्भ ही श्रीगणेश कहा जाता है। देवों के देव गणपति हैं। विघ्न को हरने वाले ‘विघ्नेश्वर’ को वेदों गणपति कहा गया है। ऋग्वेद में गणपति की स्तुति करते हुए कहा गया है-

        “हे गणपति तुम सब प्राणियों के स्वामी हो, तुम श्रोताओं के मध्य सुशोभित होओ। कार्यकुशल व्यक्तियों में तुम सबसे अधिक बुद्धिमान हो। हमारी ऋचाओं को बढ़ाकर विभिन्न फल वाली करो।”

       भगवान विष्णु ने गणेश की स्तुति करते हुए इन्हें एकदन्त नाम दिया। सामवेद में भगवान विष्णु ने माता को गणपति के ‘नामाष्टक स्रोत’ का स्मरण कराया जो सम्पूर्ण विघ्नों के नाशक हैं। नामाष्टक में गणेश, एकदन्त, हेरम्ब, विघ्ननाशक, लम्बोदर, शूपकर्ण, गजवकत्र, गुहाग्रज नाम दिए हैं।

‘गणेशमेकदन्तं च हेरम्बं विघ्ननायकम्।

 लम्बोदरं शूपकर्ण गजवकत्रं गुहाग्रजम् ॥

आत्मस्वरूप गणपति-

      उपनिषद काल में भी गणपति की पूजा की परम्परा रही। गणपत्युपनिषद् इसका प्रमाण है, जिसमें गणेश जी को कर्ता-धर्ता और प्रत्यक्ष तत्त्व कहा गया है। जिनके रूपों में साक्षात ब्रह्म व आत्म स्वरूप बताया गया है। स्मृति काल में भी गणेश पूजा का विधान रहा। नवग्रहों के पूजन के पूर्व गणेश की पूजा करने का निर्देश है। इनसे ही लक्ष्मी की प्राप्ति सम्भव होती है। पुराण युग में इस पूजा का उज्ज्वल रूप में उदय हुआ। एक अलग गणेश पुराण की रचना भी इसी काल में की गई। यह तंत्र के पाँचों सम्प्रदायों, वैष्णव, शैव, शाक्त, गाणपत्य और सौर के लौकिक और वैदिक शुभ और अशुभ सभी तरह के कार्यों में प्रथम पूज्य हैं।

‘शैवेस्तत्रदीयैरुत वैष्णवैश्य, शाकतैश्व सौरेरपि सर्वकार्ये। 

शुभाशुभे लैकिक वैदिक च, द्वमर्चनीयः प्रथमं प्रयत्नाम् ॥’

     श्री गणेश जी महेशतनय हैं, स्कन्द अथवा षडानन इनके अग्रज हैं, सभी मंगल कार्यों में इनकी पूजा होती है। गणपति अग्रपूजार्ह माने गए हैं। यह पद इन्होंने अपने ज्ञान बल से प्राप्त किया है। पौराणिक कथा के अनुसार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने का श्रम उठाने का प्रयत्न न कर गणेशजी ने प्रणवाक्षर की प्रदक्षिणा देवताओं से पहले की। श्री गणेश चतुर्दश विद्या के प्रभु हैं; इसलिए ही इनके भक्तों में बुद्धि की प्रचुरता होती है। गजानन की आकृति सर्वश्रुत है। इनके छोटे चरण तथा विशाल उदर, वक्षस्थल पर पड़ी हुई शुराडा गोलार्ध और एकदन्तरूपी अनुस्वार देखने से प्रणवाक्षर (ॐ) का स्मरण हो आता है। ओंकार स्वरूपी गणेश जी अग्रपूजक माने गए। ॐकार स्वरूप ही परम पवित्र उच्चतम, विचार परिपूर्ण, सर्वथा निर्मल और परिशुद्धता का प्रतीक है। आचरण और मन से शुद्ध, परोपकारी और मितभाषी ये सारे तत्त्व गणेश की आकृति में समाहित हैं। ये सब गुण ॐ में एकीकृत भाव से हैं। देवाधि देव, गणनायक इन्हें इसलिए ही कहा गया है। 

      दीन हीनों का पालन करने वाले, सम्पदा के दाता, ज्ञानरूप गणपति ने सम्पूर्ण महाभारत लिखा जिसे महर्षि वेदव्यास ने कहा।

यह कौतुक कथा पौराणिक ग्रंथों में है। महर्षि वेदव्यास ने यह शर्त रखी कि वे श्लोक कहेंगे, गणेश जी उसे लिखकर उसका अर्थ भी लिखेंगे। यह धाराप्रवाह क्रम टूटे नहीं। वेदव्यास जी विचारने के साथ कठिन श्लोक कह देते थे, जिसके अर्थ में गणेश जी को देर होती थी, उतनी देर में महर्षि कई श्लोक रच डालते थे। महर्षि वेदव्यास और श्री गणेश दोनों अद्वितीय थे, जिसका फल महाभारत है।

‘प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्।

भक्तया व्यासः स्मरेन्नित्यमायुः कामार्थ सिद्धये।।

भारत में पूजा अर्चना-

हिन्दू धर्म के साथ अनेक मत, संप्रदाय और पंथ हैं, जिनमें अधिकांशतः अपनी अभिव्यक्ति प्रदर्शित करते हैं। इन्हें अनेक नाम, रूपों में पूजा जाता है। किसी कार्य को प्रारंभ करने का पर्यायवाची शब्द श्रीगणेश ही प्रचलित है। धार्मिक अनुष्ठान, समारोह, वैवाहिक अवसरों में गणेश पूजा का महत्त्व आज भी विद्यमान है। मंगल कार्यों में इन्हें प्रथम स्मरण किया जाता है। ऋद्धि के स्वामी होने के कारण साधन तथा सामाग्री में, सिद्धि स्वामी होने से श्रीगणेश अपने भक्तों को कभी असिद्धि का दर्शन नहीं होने देते। गोस्वामी तुलसीदास ने गणेश जी की सर्वप्रथम वंदना रामचरित मानस में की है। आगे उन्होंने लिखा है कि “जिन्हें स्मरण करने से सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं, जो गुणों के स्वामी और सुंदर हाथी के मुख वाले हैं, वे ही बुद्धि के राशि और शुभ गुणों के स्वामी श्रीगणेश मुझ पर कृपा करें।

‘जो सुमिरत सिधि होई गणनायक करिवर बदन।

करहुँ अनुग्रह सोई बुद्धि रासि सुभ गुन सदना।

विदेशों में तांत्रिक पूजा-

विश्व के अनेक देशों में गणेश जी को आज भी पूजा जाता है। इंडोनेशिया की मुद्रा में गणेशजी का चित्रण है जबकि वह मुस्लिम देश है। हिन्दू के दूसरे ऐसे कोई देव नहीं जिन्हें दूसरे देशों के निवासी भी पूजते हों। वृहत्तर भारत के साथ जो देश थे उनमें हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ मिलती हैं, लेकिन अब उन्हें पूजा नहीं जाता। चीन में गणेश पूजा ‘मियाकियों’ के नाम से होती है, जिसका शाब्दिक अर्थ रहस्य है। रहस्यमय पूजा विधान को चीन तक पहुँचाने का श्रेय भारतीय श्रमण वज्रबोधी को है जो अपने शिष्य अमोध वज्र के साथ 720 ईस्वी में पहुँचे थे। जापान में गणेश की पूजा ‘कांगीतेन’ नाम से की जाती है। शिंगोन संप्रदाय ने व्यक्ति और विश्वात्मा में एकात्मता का सिद्धांत मानते हुए ‘कांगीतेन’ नाम से की जाती है। शिंगोन संप्रदाय ने व्यक्ति और विश्वात्मा में एकात्मता का सिद्धांत मानते हुए कांगीतेन की रहस्यमयी मूर्ति की पूजा का विधान बनाया, जिसमें गणेश की युग्ममूर्ति पूजा होती है। यहाँ इनकी पूजा रहस्यमय तांत्रिक ढंगों से पूर्ण होती है जिसमें अनार की बलि दी जाती है। तांत्रिक विधि के अनुरूप इन मूर्तियों को ढककर रखा जाता है। इन विधियों से गुप्त तंत्र विद्या सीखी जाती है।

     हर वर्ष भादों मास में श्रीगणेश की स्थापना घर के साथ सार्वजनिक जगहों पर की जाती है। हर ओर गणेशोत्सव की धूम रहती है जहाँ गणपति बप्पा मोरया का उद् घोष करते हुए भक्त उनकी पूजा-अर्चना करते हैं।■

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Jan 1, 2025

पर्व – संस्कृतिः धरती पर सनातन संस्कृति का कुंभ मेला प्रयागराज में

  - रविन्द्र गिन्नौरे 

पृथ्वी का विशालतम मानव समागम का कुंभ , जहाँ  स्नान, दान और दर्शन से मानव को अनंत चक्र से मुक्ति मिल जाती है। हर बारह बरस में मानव मोक्ष के द्वारा ज्योतिष शास्त्र के अनुसार खुलते हैं। 2025 में बृहस्पति मेष राशि में और सूर्य, चन्द्र मकर राशि पर अमावस्या तिथि पर आएँगे तब प्रयागराज में कुंभ का योग बनेगा। प्रयागराज के गंगा यमुना और सरस्वती नदियों के संगम तट पर कुंभ मेला आयोजित होगा।

कुंभ में स्नान, दान- 

     कुंभ एक तरह से कोई संगठित आयोजन नहीं बल्कि एक आंतरिक, प्राचीन और निरंतर घटना है। एक रहस्यमय आयोजन जिसमें लाखों लोग शांति पूर्ण रूप से शामिल होते हैं। भारतीय उपमहाद्वीप का धार्मिक, सांस्कृतिक, पौराणिक और आर्थिक महत्त्व का विशालतम आयोजन है। धार्मिक तीर्थ करते हुए स्नान और दान जीवन और मृत्यु के साथ मोक्ष को साकार करता है। वहीं कुंभ मेला ‘पवित्र’ नदी के तट पर आयोजित किए जाते हैं जो विशेष मुहूर्त में स्नान के अनुष्ठानों से गहराई से जुड़े हैं। कुंभ मेला पूर्व निर्धारित,अद्वितीय और शुभ खगोलीय घटना के दौरान होते हैं, जिसमें विभिन्न नक्षत्रों में सूर्य, चंद्रमा या बृह- स्पति शामिल होते हैं। इनके प्रभाव को समझने के लिए, हमें मूल तत्वों के रूप में समझना शुरू करना होगा। पंच महाभूतों में से जल मानव जाति के लिए लगभग उतने ही समय से गहरा, सहज महत्त्व रखता है, जितने समय से मानवता का अस्तित्व रहा है। जल, आत्मा का तत्त्व और जीवन देने वाला ग्रह और शरीर दोनों का सबसे बड़ा घटक है। वैदिक काल से ही भारत में जल के महत्त्व को शाब्दिक रूप से दर्ज किया गया है। ऋग्वेद में इसकी स्तुति करते हुए कहा गया है,

"या आपो दिव्या वा स्त्रवंति खनित्रिमा उत वा याः स्वयंजाः ।

समुद्रार्थ याः शुचयः पावकास्ता आपो देवीरिह मामवन्तु।" 

बादल और बूँद, नहरें और नदियाँ और समुद्र, सब एक ही के विस्तार हैं। यह दिव्य गुणों वाला जल हमारी रक्षा करे।

भारत के चार स्थानों पर गिरने वाले अमरता के अमृत की कथा को देखें, जहाँ कुंभ मेला मनाया जाता है। पवित्र गंगा या संगम में स्नान के लाभकारी गुणों में विश्वास और कुंभ के शक्तिशाली आकर्षण को आत्मसात् करने हर कोई लालायित हो उठता है।

अमृत के लिए संघर्ष- 

  पौराणिक आख्यान के अनुसार महर्षि दुर्वासा के श्राप से देवराज इंद्र और देवता श्रीहीन हो गए। तब समुद्र मंथन के लिए देव दानव एक साथ जुट गए। मंथन से निकले अमृत कलश को दैत्यों से बचने के लिए देवराज इंद्र के पुत्र जयंत उसे लेकर भागे। बृहस्पति, चंद्रमा और सूर्य ने उसकी सहायता की। अमृत कलश को लेकर भागते हुए जयंत ने हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन में कलश को रखा , जहाँ  कलश से अमृत की बूंदें छलक पड़ी। अमृत कलश के लिए बारह दिनों तक देव-दानवों के बीच संघर्ष चलते रहा और यही अवधि कुंभ मेला के लिए ज्योतिष शास्त्र के अनुसार निर्धारित हुई।

तीर्थराज प्रयाग -

  हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार महाकुंभ मेला बारह साल में मनाया जाता है। बारह वर्षों के दौरान चार बार कर तीर्थ पर कुंभ आयोजित होता है। पहला उत्तराखंड की गंगा नदी पर हरिद्वार में दूसरा मध्यप्रदेश की शिप्रा नदी पर उज्जैन में तीसरा महाराष्ट्र की गोदावरी नदी पर नासिक में और चौथा उत्तर प्रदेश की गंगा यमुना और सरस्वती नदियों के संगम पर प्रयागराज में कुंभ मेला 2025 में आयोजित हो रहा है।

    तीर्थराज प्रयाग पवित्र स्थलों में सबसे ऊपर माना जाता है। पवित्रता का प्रतीक कही गई गंगा नदी, जिसे पुण्यदायिनी कहा जाता है। पुण्य और धार्मिकता की दाता गंगा भक्ति की प्रतीकात्मक यमुना नदी से मिलती है जिनसे अदृश्य स्वरूप वाली ज्ञान की प्रतीक सरस्वती मिलती है। तीर्थराज प्रयाग की त्रिवेणी के कुंभ को शक्तिशाली कहा गया है।

 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रहों का शुभ फल मानव जीवन पर पड़ता है। बृहस्पति जब विभिन्न ग्रहों के अशुभ फलों को नष्ट कर पृथ्वी पर शुभ प्रभाव का विस्तार करते हैं तब शुभ स्थानों में अमृत पद कुंभ योग अनुष्ठित होता है और इस शुभ घड़ी में कुंभ मेला का आयोजित किया जाता है। प्रयागराज में कुंभ मेला बृहस्पति मेष राशि में और सूर्य चंद्र मकर राशि में माघ मास की अमावस्या तिथि पर आते हैं यही कुंभ का योग बनता है।

प्रयागराज कुंभ- मेला देखा चीनी यात्री सुयेनच्यांग ने-

सातवीं सदी में भारत आए चीनी यात्री सुयेनच्यांग ने प्रयागराज के कुंभ मेला का आँखों देखा हाल का वर्णन करते हुए कहा है,...गंगा-यमुना के संगम तट पर बहुत दूर तक जो अनुमानतः दस 'ली' से ऊपर होगा, रेत पड़ी हुई थी। यह रेत स्वच्छ बालू की है और सर्वत्र समतल है। इसे यहाँ के लोग महादान क्षेत्र कहते हैं। प्राचीनकाल से बड़े बड़े राजे महाराजे, सेठ-साहूकार यहाँ पर दान करते चले आए हैं। उस समय भी राजा श्रीहर्ष शिलादित्य प्रति पाँचवें वर्ष यहाँ आता था और बड़ा दान-पुण्य करता था। उस समय यहाँ बड़ा मेला लगता था और भारतवर्ष के सब बड़े-बड़े राजा और गणमान्य मेले में आते थे। भारतवर्ष भर के साधु- महात्मा, श्रमण- ब्राहमण आदि इकट्ठे हो जाते थे। राजा पहले पूजा करता था फिर यथाक्रम पहले यहाँ के श्रमणों का फिर आए हुए श्रमणों और भिक्षुओं को, फिर विद्वानों और पंडितों को, फिर यहाँ के ब्राह्मणों और पंडों को और अंत में विधवाओं, अनाथों, लंगड़े लूले, निर्धन और भिगमंगों को भोजन, वस्त्र, धन, रत्न प्रदान करता था। इस प्रकार वह नित्य दान-पुण्य करके अपने कोष के रुपये खर्च कर देता था और जब कुछ भी नहीं रह जाता था तो अपना मुकुट-वस्त्राभूषण और वाहनादि सब कुछ लुटा देता था। जब उसके पास एक कौड़ी भी नहीं रह जाती थी तब वह बड़े आनंद से कहता था कि "आज मैने अपने सारे कोष और धन को अक्षय कोश में रख दिया, वहाँ यह घटने का नहीं है।" फिर अन्य देश के राजा लोग भी दान करते थे।

   दान क्षेत्र के आगे पूर्व दिशा में गंगा यमुना के संगम पर सहस्रों की भीड़ लगी रहती है। कितने तो स्नान करके चले जाते हैं कितने यहाँ कल्पवास करते हैं और मरने के लिए यहाँ आकर रहते हैं। उस देश में लोगों का विश्वास है कि यहाँ आकर एक समय भोजन कर स्नान करते हुए जो कल्पवास करता प्राण त्यागता है वह मरने पर स्वर्ग को प्राप्त होता है। यहाँ स्नान करने से जन्म जन्म के पापक्षय हो जाते हैं। दूर दूर से लोग यहाँ स्नान करने आते हैं।

     कुंभ मेला सनातन परंपरा की प्राचीन धार्मिक सर्वोच्च तीर्थ यात्रा पवित्र परंपरा को लिए स्नान कर ज्ञान की पिपासा लिए मानव संत समागम करते हैं। मोक्ष की आस दिए सर्वस्व दान करते जहां मंत्रोच्चार के बीच अनहत नाद सी ध्वनित होती है। ऐसे सुंदरतम दृश्य को निहारने अपार जनसमूह आ जुटता है कुंभ के मेला में...!

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Nov 1, 2024

पर्व- संस्कृतिः कैसे करें माँ लक्ष्मी की आराधना

  - रविन्द्र गिन्नौरे

बदलते परिवेश में दीपावली पर्व की उत्सवधर्मिता प्रकृति बिखर गई। धर्म, संस्कृति, परम्परा को सँजोए  त्योहार की उल्लासमयी रौनक खास वर्ग तक सिमट गई है। ज्योति पर्व से सम्बद्ध सांस्कृतिक परम्पराएँ विलुप्त होती जा रही हैं। ग्राम्य धरोहर को सँजोने वाली परंपराएँ उपभोक्ता संस्कृति की भेंट चढ़ गई। उल्लासमयी दीपावली आधुनिकता के दौर में प्रदूषणकारी बन गया है। दीप पर्व में समाज का कला-कौशल जो जन अभिव्यक्ति को प्रश्रय देता रहा, वह भी तिरोहित हो चु्का है।

बाजार में खो गई परंपराएँ-

    राम के अयोध्या आगमन पर घर-घर उनके स्वागत में दीप जले। लक्ष्मी की पूजा-आराधना के लिए दीप जले। अनेक आख्यान ज्योति पर्व में जुड़ते गए, सभी में दीप ज्योति को सर्वोपरि महत्त्व दिया गया। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी अनेक परम्पराएँ दीप पर्व के साथ जुड़ी। हमारी सारी परम्पराएँ अभिजात्य उत्सवधर्मी बाजार में खो गईं। मिट्टी के दीपक बिकते नहीं, कुम्हार बेरोजगार हो गए। पर्व में निर्धन और धनिकों की खाई इतनी बढ़ गई कि रोशनी भवनों तक सिमट गई। निर्धन तो बेबस, लाचार बन गया। ग्रामीण उत्पाद वैश्वीकरण के दौर में बेकार साबित होते चले गए। दीपावली की रौनक साधन सम्पन्नों के बीच रच-बस गई है। मध्यम वर्ग तो महँगाई की मार से दोराहे में आ खड़ा हुआ है। फिर दीन-हीनों की कैसी दीपावली! कैसा उत्सव!

पाँच दिनों का उत्सवधर्मी पर्व अपने सिमटे रूप में सम्पन्न होता है। सहमे से लोग बस परम्पराओं का निर्वाह करते हैं।

पाँच दिनों का त्योहार-

      7 धनतेरस आयुर्वेद के जनक धन्वंतरि की जयंती है। एक और पौराणिक आख्यान है जहां यम और यमराज की कथा में दीप दान को महादान कहा गया। यह दीपदान का भी पर्व है। पौराणिक आख्यानों, परम्पराओं से हटकर धनतेरस धनपूजा का पर्व कहलाने लगा है। बाजार बढ़ गया। बही-खाता खरीदने का शुभ मुहूर्त के लिए खरीदारी करते हैं। सोने-चाँदी के बाजार सज उठते हैं। मध्यम वर्ग तो जरूरत के सामान खरीद कर संतोष कर लेता है। निर्धन तो हमेशा की तरह याचक बनकर रह जाता है। नरक चौदस महिलाओं के पुनर्जागरण, उनको सम्बल प्रदान करने का दिवस है। पौराणिक आख्यान में प्राग्ज्योतिषपुर के नरकासुर ने सोलह हजार युवतियों को कैद कर रखा था। नरकासुर की नारकीय यंत्रणा से त्रस्त युवतियों का उद्धार भगवान कृष्ण ने किया। तब से यह दिन युवतियों के लिए सौभाग्य की कामना व शृंगार का रहा। आज के बदलते माहौल में, बढ़ती महँगाई ने इसे विस्तृत कर दिया।

तमसो मा ज्योतिर्गमय-

      ज्योति पर्व दीपावली विजय, उत्सव, पूजा-अर्चना के साथ अमावस्या के निविड़ अंधकार को दूर कर , 'तमसो मा ज्योतिर्गमय'  का उद्घोष करता है। इसी दिन महापुरुषों के निर्वाण दिवस पर दीप प्रज्ज्वलित कर उन्हें नमन करने की परम्परा जुड़ती चली गई है। ज्योति पर्व में दीपक अब नहीं जलते, घर रोशन होते हैं बल्बों, झालरों से। राम का अयोध्या आगमन और उनकी विजय, स्वागत के दीप नहीं सजते। गुरुनानक जी स्मृति में प्रकाश पर्व, दयानंद सरस्वती के निर्वाण की ज्योति को मानने वाले आधुनिक परिवेश के परम्परा वादी हो गए। गौतम बुद्ध ने अपने निर्वाण पर कहा था, 'अप्प दीपों भव' अर्थात् खुद दीपक बनो। महापुरुषों के वचनों को हमने विस्मृत कर दिया और अपनी परंपरा से हटकर आधुनिक बन बैठे।

प्रकृति को सहेजना भूले-

       दीपावली की रात अब आतिशबाजी, पटाखों को समर्पित हो गई। पटाकों के धमाकों के बीच हृदय विदारक घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। हर वर्ष ऐसे धमाकों में हजारों अपंग हो जाते हैं। पटाखों का बाजार बढ़ता जा रहा है, जिसे बनाने वाले हजारों अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। कानफोड़ धमाकों से, प्राकृतिक परिवेश भी छिन्न-भिन्न हो रहा है। इसकी किसी को कोई परवाह ही नहीं है। निरीह पशु-पक्षियों पर इसका कैसा असर होता है, यह बात कोई नहीं समझना चाहता क्योंकि पक्षियों का कलरव को सुनने के लिए अब कौन सुबह उठता है।

      लक्ष्मी पूजा के लिए लाई-बताशे की जगह मेवा मिष्ठान्नों की दुकानों में भीड़ लगती हैं। आम्र पत्तों की वंदनवार ने प्लास्टिक का जामा पहन लिया। मिट्टी के दीपों को महँगाई लील गई। कुम्हार के दिये अब कौन खरीदेगा। लक्ष्मी को प्रिय लगने वाले कमल अब दुर्लभ होने लगे, जिनको संजोने वाले तालाब तो कहीं-कहीं रह गए हैं। घर-घर बनते पकवानों की महक मिलावट में खो गई, तो कहीं महँगाई ने दूर कर दिया। धनदेवी लक्ष्मी माता की बाट जोहते रात्रि जागरण अब कठिन हो गया है।

लोक परंपराएँ हुईं विस्मृत-

       भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में उत्सव मनाने की अपनी-अपनी परम्परा रही है। फसल कटाई के बाद उत्सव प्रारंभ होते हैं। लोक नृत्य गीतों की शुरूआत दीप पर्व के साथ प्रारंभ होती है। छत्तीसगढ़ में ग्रामीण इलाकों की महिलाएँ सुआ नृत्य करती हैं। सुआ नृत्य की मनोहर छटा अब कहीं-कहीं दिखती है, वहीं उसके गीत व्यावसायिकता का जामा पहन बैठे हैं। यादव समाज का राउत नाच बिखर रहा है। नृत्य में गड़वा वाद्य उसके वादक कम हो चले हैं। देश के विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले लोक नृत्य ऐसे ही खत्म हो चले हैं।

      गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव कृषि और ग्राम्य जीवन के लिए विशेष रहा है। श्रीकृष्ण ने इन्द्र पूजा की जगह वन-पर्वत को पूजने की परम्परा चलाई। वन, पहाड़ ही वर्षा को आकर्षित करते हैं। देवराज इन्द्र ने क्रोधवश मूसलाधार बारिश की, जिससे बचने के लिए श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को ही उठा लिया। पर्वत के नीचे सभी को आश्रय मिला। इस की स्मृति में यह दिन वनश्री, पहाड़ को पूजने का दिन बन गया। जंगलों में पशुधन को ले जाकर अन्नकूट महोत्सव मनाया जाता है। अब गोवर्धन पर्वत की परंपरा पूजा तक सिमट गई है। पहाड़ तोड़े जा रहे हैं, जंगल काटे जा रहे हैं। देशी गाय को उन्नत नस्ल के नाम विकृत किया जा रहा है। अन्नकूट महोत्सव अब देवालयों तक सिमट कर रह गया है।

    ज्योतिपर्व दीपावली का उत्सवधर्मी पर्व पर वह उल्लास नजर नहीं आता। दीपों का उजास भी बेबस हो रहा है, हमारे मन के अँधकार को दूर करने में। प्रकृति के संरक्षण, संवर्धन करने वाले लोग निमित्त मात्र रह गए हैं। दीपावली जिसमें हर वर्ग की भागीदारी रहती थी अब वह बिग बाज़ार की चकाचौंध में गुम हो चली है। आमजन का आर्थिक संबल जहां बिखर गया है तो ऐसे में वे कैसे करे मॉ की आराधना...!

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Jan 1, 2024

12 जनवरी जयंतीः वैदिक ज्ञान से विश्व को आलोकित करते महर्षि महेश योगी

  -  रविन्द्र गिन्नौरे

"आओ..! मैं जीवन में झांकने का अवसर देता हूं, ताकि लोग शांति और खुशी के हर क्षण का आनंद ले सकें।" ऐसा आव्हान करते हुए महर्षि महेश योगी ने वैदिक ज्ञान से विश्व को आलोकित करते हुए अपने भावातीत ध्यान की विशिष्ट शैली से व्यक्ति की चेतना को निरंतर विकास की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त किया।

 ऐसे समय में जब शांति का सूरज पश्चिम में अस्ताचल हो रहा था। पश्चिम के लोगों में अपने जीवन के प्रति एक ऊब गहराने लगी थी और अकारण हिंसा का सैलाब उमड़ रहा था। शांति की तलाशते युवा नशे में डूब रहे थे। एक विकृत संस्कृति का बोलबाला हो उठा जो हिप्पी संस्कृति का चोला पहन शांति, सौंदर्य की आस में कर्म हीन जीवन की ओर अग्रसर हो रहे थे, जहाँ उदय हुआ महर्षि का 'भावातीत ध्यान'।

  1957 से महर्षि महेश योगी ने 150 देशों का भ्रमण कर भारतीय आध्यात्मिक तथा भावातीत ध्यान को एक आंदोलन का रूप दिया। योगी के दर्शन का मूल आधार था कि 'जीवन परम आनंद से भरपूर है और मानव का जन्म इस आनंद उठाने के लिए हुआ है। हर व्यक्ति में उर्जा, ज्ञान और सामर्थ्य अपरिमित है इसका सदुपयोग कर जीवन को सुखद बनाया जा सकता है।' विश्व को शांति और सदाचार की शिक्षा देते हुए योगी ने विश्व भ्रमण करते रहे। भावातीत ध्यान का अलख योगी ने लगाया और दुनिया भर में उनके साठ लाख से ज्यादा अनुयाई बन गए।

महर्षि का भावातीत ध्यान-  

  भावातीत ध्यान में भाव जागृत होकर भावातीत हुआ जाता है क्योंकि संसार भवसागर है। भाव को जानो तो भावातीत हुआ जा सकेगा। भाव को जानकर ही भवसागर से मुक्ति संभव है।  

   जब तक चित्त शांत नहीं होता तब तक ध्यान घटित नहीं होगा। योगनिद्रा प्राप्त करके शांत होना सीखना चाहिएं। शरीर को शिथिल कर के हर अंग को ऊर्जावान बनना चाहिए, यही महर्षि के ध्यान का ध्येय है।

 भावातीत ध्यान (Transcendental Maditation) एक मंत्र है, जो शांत मुद्रा में दोहराए गए मंत्र के ऊपर ध्यान केंद्रित कर के आंतरिक शांति और नवीनीकरण प्राप्त करने की एक आध्यात्मिक तकनीक है। 

ऐसी स्थिति तब आती है, जब मन स्थिर हो जाता है विचार से परे चले जाने में अभ्यास कर्ता सक्षम हो जाता है और तब वह परम सुख और निस्तब्धता की एक मूक अवस्था में प्रवेश करता है। महर्षि का भावतीत ध्यान ऐसी ही सुखद स्थिति में ला खड़ा करता है।

 महर्षि के 'भावातीत ध्यान' से प्रभावित होकर 1968 में ख्याति प्राप्त 'रॉक म्यूजिक ग्रुप बीटल्स' उनके आश्रम पर पहुंचा और सभी उनके अनुयाई बन बैठे। 1975 तक 'भावातीत ध्यान' पश्चिमी देशों में अत्यधिक लोकप्रिय हो गया यही समय था जब पश्चिम के प्रसिद्ध अखबारों और पत्रिकाओं में महर्षि महेश योगी सुर्खियों में आए। 'ध्यान ही सारी समस्याओं का समाधान का समाधान है' और इसे महर्षि ने चरितार्थ कर दिखाया।

 फ्लाइंग योगा-

    महर्षि फिर सुर्खियों में छाए रहे जब उन्होंने अपना अनुयायियों को उड़ना सिखाने का दावा किया। फ्लाइंग योगा- अनुभवातीत ध्यान का एक हिस्सा था जिसने उनके भक्त फुदकते हुए उड़ने की कोशिश करते थे।

 फ्लाइंग योगा को महर्षि ने 'ट्रासेडेंटल मेडिटेशन सिद्धि प्रोग्राम' नाम दिया और इसे ध्यान चिकित्सा के तौर पर प्रायोजित किया।

  1990 में महर्षि हालैंड के व्लोड्राप गांव में अपना आश्रम स्थापित किया जहां से वे अपनी संस्थाओं का संचालन करने लगे। महर्षि ने अपने अनुयायियों के माध्यम से अनेक संस्था बनाई। 2008 तक योगी के 150 देशों में 500 स्कूल, 4 महर्षि विश्वविद्यालय और वैदिक संस्थान संचालित थे। संस्थाओं में आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति और प्राकृतिक तरीके से बनाई हर्बल दवाओं के उपयोग को बढ़ावा दिया गया। महर्षि ने भारत की आध्यात्मिक ज्ञान की प्राचीन परंपरा को दुनिया के सामने रखा। ध्यान को अभ्यास को रहस्यवाद से हटकर अभ्यास को वैज्ञानिक रूप से स्वास्थ्य कार्यक्रम तक बढ़ा दिया।

रामनाम मुद्रा -

 महर्षि महेश योगी ने विदेश में रामनाम की मुद्रा चलाई। रामनाम की इस मुद्रा में भगवान राम के चमकदार चित्र वाले एक,पांच और दस के नोट थे। राम मुद्रा को महेश की महर्षि की संस्था 'ग्लोबल कंट्री आफ द वर्ल्ड पीस' ने अक्टूबर 2002 में जारी किया। 

नीदरलैंड सरकार ने 2003 में रामनाम मुद्रा को कानूनी मान्यता दी। अमेरिका के आईवा राज्य के महर्षि वैदिक सिटी में भी रामनाम की मुद्रा प्रचलित थी। राम पर आधारित बांड्स भी अमरीका के कई राज्यों में प्रचलन में आए।

महाशून्य में विलीन हुए- 

 अपनी अंतिम यात्रा से पहले एकाएक 11 जनवरी 2008 को महर्षि ने घोषणा कर दी कि 'उनका काम पूरा हो गया है और गुरु के प्रति जो कर्तव्य था वह पूरा हो गया है।' ऐसा कहते हुए महर्षि अपने कमरे में सिमट गए। 91 वर्ष की अवस्था में 5 फरवरी 2008 को महर्षि महेश योगी महाशून्य में विलीन हो गए।

जीवन परिचय-

 वैदिक ज्ञान से विश्व को आलोकित करने वाले महर्षि का जन्म छत्तीसगढ़ में राजिम के समीप ग्राम पाण्डुका में 12 जनवरी 1918 को हुआ था। पाण्डुका में इनके पिता राम प्रसाद श्रीवास्तव राजस्व विभाग में कार्यरत थे। पाण्डुका से गाडरवारा में स्थानांतरण हुआ और बालक महेश की शिक्षा हितकारिणी स्कूल जबलपुर में हुई। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भौतिक में स्नातक होकर दर्शनशास्त्र में इन्होंने स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की।

जबलपुर की गनकैरिज फैक्ट्री में कार्य के दौरान स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती से इनकी भेंट हुई और यहीं से उनके जीवन में एक नया मोड़ आया। महेश से योगी बन अध्यात्म की ओर अग्रसर हुए थे और फिर ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य ब्रह्मानंद सरस्वती के सानिध्य में 13 वर्ष तक शिक्षा ग्रहण की। इसी के साथ शुरू हुआ आध्यात्मिक योग और साधना की दीक्षा देने का सिलसिला। शंकराचार्य की मौजूदगी में महर्षि महेश योगी ने रामेश्वरम में दस हजार ब्रह्मचारियों को दीक्षा दी। इसके पश्चात हिमालय की उपत्यकाओ में दो वर्ष की मौन साधना के बाद ध्यान को विश्व कल्याण के लिए उसे एक आंदोलन के रूप में चलाया जो जीवन पर्यंत चलता रहा।

    "मेरे ना होने से कुछ नुकसान नहीं होगा। मैं नहीं होकर और भी ज्यादा प्रगाढ़ हो जाऊंगा...!" महर्षि महेश योगी के ये शब्द पहले से ज्यादा आज प्रासंगिक हो गए हैं ऐसे योगी जिन्होंने भारतीय संस्कृति के संदेशवाहक, आध्यात्मिक पुरुष बन कर विश्व बंधुत्व बढ़ाते हुए संसार के महान समन्वयक होने का गौरव प्राप्त किया। ■

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Aug 1, 2023

पर्यावरणः आजादी के बाद कहाँ गुम हो गई हमारी शस्यश्यामलां धरती

 - रविन्द्र गिन्नौरे

वन्दे मातरम्। 

सुजलाम् सुफलाम मलयजशीतलाम ।

शस्यश्यामलां मातरम् ।

शुभ्र ज्योत्स्ना-पुलकित यामिनीम, 

फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनीम...

 प्रकृति की नैसर्गिक छटा को चित्रित करता हमारा राष्ट्रगीत सांप्रदायिक राजनीति में घिसटकर प्रदूषित हो गया। अब इसे स्कूलों में गाए जाने पर परहेज किया जा रहा है। धरती पर प्रदूषण इतना बढ़ रहा कि हमारे पोते, पड़पोते सुजला सुफला-शस्य श्यामला का ही नहीं, शुभ्र ज्योत्स्ना का मतलब पूछ बैठेंगे! एयरकंडीशंड के फौलादी जंगल में बैठ कर तब उन्हें इसका मतलब क्या बताएँगे? क्योंकि तब तक तो भारत में ताजी हवा लेने के लिए पेशाबघरों जैसे शुद्ध वायु लेने के लिए बूथ बन चुके होंगे।

जन्मजात बच्चे रोगी-

  गर्म होती हुई धरती के मिजाज ने अहसास करा दिया है कि बदलती आबोहवा उस मोड़ तक आ पहुँची है, जहाँ हम बूढ़े नहीं होंगे याने अल्पायु में रोग घेर लेंगे। लाइलाज होते रोग उम्रदराज नहीं होने देंगे। भूख से किसी की मौत नहीं होगी। हर आदमी किसी-न-किसी बीमारी से अभिशप्त हो जाएगा। राजा और प्रजा बराबर हो जायेंगे। आम आदमी भी बड़े मजे से राजरोग का शिकार होता रहेगा। जनसंख्या घटाने के लिए सरकारी कार्यक्रमों पर खर्च होने वाली राशि बच जाएगी। जनसंख्या नियंत्रण का वृहत कार्यक्रम भी बंद करा दिया जाएगा, क्योंकि आदमी इतना निरीह हो जाएगा तो बच्चे पैदा कहाँ से कर सकेगा। अभी ही कई देशों में प्रदूषण के चलते जन्म दर गिर गई है, वहीं जन्मजात शिशु कई रोगों के साथ पैदा हो रहे हैं।

बारिश हुई तेजाबी-

विकासवाद के सिद्धांत के अनुसार औद्योगिक विकास के शिखर पर पहुँच चुके देश अब अपनी बगलें झांक रहे हैं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दे दी है कि अब पेड़ न काटे जाएँ। जंगलों को लगे रहने दें। प्रदूषण का खरदूषण उन काले-कजरारे मेघों को भी लील गया है जो अमृतमयी वर्षा करते हैं। अब जहाँ-तहा अम्लीय वर्षा जीवन को शून्य कर रही है। उमड़ते-घुमड़ते बादल कब बरसे, इसकी आस लिए आसमान की ओर अब निहारेंगे नहीं बल्कि रिमझिम वर्षा से बचने के लिए हमें कंकरीट के जाल का सहारा लेना पड़ेगा, क्योंकि अब ऐसी बरसात विषैली, अम्लीय होगी। तब के लोग मेघदूत को पढ़ेंगे तो कालिदास पर हंसी आएगी कि इतना महान कवि कितना बेवकूफ था और कैसा था उसका यक्ष, जिसने ऐसे विष भरे मेघों को अपना संदेशवाहक बनाया वह भी अपनी प्रियतमा के पास संदेशा देने के लिए...।

हमारा विष भरा भोजन-

 आज का मानव भगवान शंकर का सहोदर बन गया है, जिन्होंने समुद्र मंथन से निकले विष को अपने कंठ में धारण कर लिया था। अब हम सब नीलकंठ विषपायी बन अपने कंठ में नहीं, बल्कि उदर विषपायी बन चुके हैं। हम हर रोज भोजन के साथ अनेक विषैले तत्वों को हजम कर रहे हैं। डीडीटी, एल्ड्रिन, पेस्टीसाइड्स, हर्बीसाइड्स जैसे खतरनाक विष कीड़े तो मार देते हैं और उसी का अंश हम रोज थोड़ा-थोड़ा निगल रहे हैं। तेज से तेज जहर अब खोजें जा रहे हैं। डीडीटी एडिक्ट हुए मच्छर अब दुनिया में मलेरिया का आतंक फैला रहे हैं। प्रकृति को नष्ट करते पेड़ों की हजारों प्रजातियाँ व जीव-जंतुओं की प्रजातियाँ अब नहीं रहीं। ऐसी प्रजातियाँ बर्दास्त नहीं कर पाईं प्रदूषित होते बदलाव को, जैसा कि आज मनुष्य में बदलाव आया है।

पृथ्वी की छतरी में छेद-

स्माग स्मोक एँड फॉग अर्थात् धुआँ और कोहरा उस भस्मासुर की याद दिलाता है, जिसके डर से भगवान शंकर भी डरकर भागे-भागे फिरे थे। तब देवी पार्वती ने मनमोहनी रूप धारण कर उसे भस्म किया था। अब हजारों हजार भस्मासुरों ने सिर उठा लिया है। औद्योगिक विकास के पर्याय बने भस्मासुर दिन-रात उगल रहे हैं धुआं। सडक़ों पर रेंगते वाहन ऐसे भस्मासुर के ही लघु रूप है। अब कोई मनमोहिनी इन भस्मासुर को खत्म नहीं कर सकती। आखिर, इतने सारे भस्मासुरों के लिए एक मनमोहिनी तो पर्याप्त नहीं होगी। फैलता धुआँ और गहराती कालिख ने एक परत बिछा दी है।

गहराते प्रदूषण से हमारी ओजोन परत भी विदीर्ण होने लगी है। अंटार्कटिका में ओजोन की परत में छेद हो गया। इसका पता वैज्ञानिकों को 1984 में लगा। इसके साथ ही उत्तरी गोलार्ध, एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के एक बड़े भाग के ऊपर आसमान में ओजोन को विघटित करने वाले रसायनों का जमाव हो गया है। सूर्य की पराबैगनी घातक किरणें इन्हीं विदीर्ण राह से आ रही हैं, जो तेजी से चर्म रोग तो फैला रही हैं, वहीं खेती और पशुपालन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। सूर्य की घातक किरणों को रोकने के लिए हमारे वैज्ञानिकों के पास अंजनीपुत्र हनुमान नहीं हैं, जिसे वे आदेश देते। आज हनुमान नहीं हैं, नहीं तो वे सूर्य को लील लेते, तब तक हम ओजोन की छतरी की मरम्मत कर लेते। पराबैगनी किरणों से बचने के लिए अब हमें शुतुरमुर्ग का अनुसरण कर सिर छिपाना होगा। रेफफ्रिजरेटर, एयरकंडीशनरों और उन उत्पादों को हम छोड़ नहीं सकते, जिन्हें बनाने में क्लोरो-फ्लोरो कार्बन का इस्तेमाल होता है।यही गैस जिम्मेदार है, ओजोन की छतरी को विदीर्ण करने के लिए। इनका उत्पादन बढ़ता ही जा रहा है। नीम की छांव में बैठने की बजाए हमें गद्देदार बिस्तर ही सुकून देते हैं, जहां एयरकंडीशनर हो। मशीनी मानव को इतनी फुरसत कहाँ मिलती है कि वह पेड़ों की छांव तलाशे। अब तो ड्राइंग रूम में टीवी के ऊपर रखे गमले में प्लास्टिक का पेड़ ही हरे रंग का अहसास करा रहे हैं।

जंगल हुए वीरान-

यावत् भूमंडल धत समृगवन कानन्। 

तावत तिष्ठति मेदिन्याम् संतति: पुत्र पौत्रिकी।

वेदों के रचने वालों ने वनों के महत्त्व को बताते हुए कहा था कि "जब तक धरती वृक्षों एवं वन्य जीवों से समृद्ध वनों से सम्पन्न है, तब तक वह मनुष्यों की संतानों का पोषण करती रहेगी।" जंगलों,पहाड़ों को समृद्ध बनाने के लिए द्वापर युग में श्रीकृष्ण सबसे पहले आगे आए। गौपालक कृष्ण ने इन्द्र पूजा को नकार कर गोवर्धन पर्वत और वनों की पूजा का धार्मिक विधान बनाया। जंगल, पहाड़ों से ही जल और वायु शुद्ध होते हैं। इन्द्र के कुपित होने पर कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर लोगों की रक्षा की थी। अब जगह जगह बादल फटने लगें हैं, ऐसी विभीषिका से बचाने एक कृष्ण कहाँ-कहाँ जाएँगे!

नदियाँ हुई बदहाल-

 हमारी जीवनदायिनी नदियाँ विषाक्त हो चली हैं। श्रीकृष्ण ने यमुना नदी को ज़हरीला करने वाले कलियानाग का दमन किया था। अब यमुना ही क्या गंगा, कृष्णा, कावेरी, ब्रह्मपुत्र सहित देश की हर नदियाँ प्रदूषित हो गई हैं। अधिकांश नदियाँ मैला ढो रही है और सभ्य समाज उसमें अपना सीवेज डाल रहा है। 

श्रीकृष्ण ने ही गोवंश के महत्त्व को समझाया। गोधन दम पर भारत कभी सोने की चिडिय़ा कहलाता था। जहाँ दूध-दही की नदियाँ बहती थीं। उसी देश में आज सिंथेटिक दूध बिक रहा है। दूध के नाम पर जहर भरा सफ़ेद पानी पीने के लिए विवश हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए निरापद नहीं है। हम यह जानते हैं, फिर भी उसका उपयोग कर रहे हैं।

लौटें प्रकृति की ओर-

धर्म और समाज में सन्निहित मानव प्रकृति का अविभाज्य अंग है। जहाँ सूर्य चमकता है, हवा बहती है

और नदियाँ जल देती हैं। प्रकृति की नैसर्गिक धरोहर को हमारा आधुनिक सभ्य समाज संजो नहीं पाया है। मध्यकाल में विश्नोई समाज के सैकड़ों लोगों का आत्मोसर्ग अब इतिहास के पन्ने में सिमटकर रह गया है। विश्नोई समाज  के लोगों ने पेड़ों को काटने के खिलाफ उनसे लिपट कर अपने प्राण दे दिए।  जिनकी दारूण गाथा में मानव का प्रकृति के साथ अटूट रिश्ते का संदेश निहित है। 

अब कभी कभार होने वाले समारोह और गोष्ठियों में वन, प्रकृति, जल, जंगलों को याद कर लिया जाता है, परन्तु इनका अनुसरण करके हम सब सुंदरलाल बहुगुणा क्यों नहीं बन सकते, जिन्होंने ‘चिपको आंदोलन’ से वनों को संरक्षित करने की दिशा दी। आज हालात इतने बिगड़ गये हैं कि जलवायु परिवर्तन का भयावह संकट दुनिया के सामने आ खड़ा हुआ है फिर भी हम नहीं चेते!

आज हम पर्यावरण बचाने का नाटक करते हैं, प्रतीकात्मक रैली निकालकर, सडक़ों पर प्रदर्शन कर अपनी शक्ति प्रदर्शन करते हैं। जिसके बाद शुरू होती है, बड़ी-बड़ी गोष्ठी, एयरकंडीशन हाल में बैठकर जंगलों और वन्य जीवों पर चिंता व्यक्त की जाती है।  नीलकंठ विषपायी मानव को आज जरूरत है कृष्ण का अनुसरण करने की। समाज को चाहिए कि वह विश्नोई समाज को आदर्श माने और अपनी ही लगाई बगिया में जाकर उन बचे-खुचे पेड़ों को थोड़ा सा सहेज ले तो घर ही नहीं, देश-दुनिया फिर हरी-भरी हो जाएगी। 

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Jul 1, 2023

31 जुलाई - जन्म दिवसः प्रेमचंद ने जैसा देखा वैसा ही लिखा

- रविन्द्र गिन्नौरे
हिंदी साहित्य में एक ऐसा भी लेखक हुआ जिसने समाज की विसंगतियों पर चोट की, जिनकी रचनाओं से जन जागरण का एक दौर चला। अपनी क्रांतिकारी कहानियों से जनमानस में देश प्रेम का जज्बा पैदा किया। अंग्रेजों ने इनकी अनेक रचनाओं पर प्रतिबंध लगाया, जिससे जन क्रांति फैल सकती थी। अपनी कलम से युद्ध लड़ा, उन सभी के खिलाफ, जो सामान्य जीवन को नकारते थे। प्रेमचंद की इन्हीं खूबियों के कारण उन्हें 'कलम का सिपाही' कहा गया। गरीबों के सच्चे हमदर्द रहे प्रेमचंद ने जो कुछ लिखा, वैसा ही जीवन जीकर एक आदर्श भी समाज के सामने रखा।

  प्रेमचंद के संपूर्ण जीवन को हम देखें कि उनकी कथनी और करनी में कितना सामंजस्य रहा है! वाराणसी के पास एक छोटे से गाँव लमही के कृषक परिवार अजायब लाल के यहाँ 21 जुलाई 1880 को प्रेमचंद जन्में। अपने सभी भाई- बहनों में छोटे होने के कारण इनके चाचा प्यार से 'नवाब राय,' कह कर पुकारते थे। बचपन में इनकी माता का स्वर्गवास हो गया और सौतेली माँ की परवरिश में इन्हें अनेक कष्ट सहने पड़े।

 विवाह भी छोटी उम्र में हुआ, जो नहीं रही, फिर इन्होंने अपने विचारों के अनुरूप बाल विधवा शिवरानी देवी से विवाह किया।

धनपत राय इनका असली नाम है; मगर साहित्य- जगत् में इन्हें इस नाम से नहीं जाना गया। उर्दू में यह अपने उपनाम 'नवाब राय' के नाम से क्रांतिकारी कहानियाँ लिखते रहे। हिंदी साहित्य में प्रेमचंद के नाम से प्रसिद्ध हुए, यह नाम 1910 में मुंशी दयाराम निगम के परामर्श से रखा गया, इसी नाम से प्रेमचंद पूरे विश्व में प्रसिद्ध भी हुए। प्रेमचंद ने अपने जीवन में बहुत उतार- चढ़ाव देखे मगर कलम नहीं छोड़ी। लेखन के लिए सरकारी नौकरी छोड़ी और सिने- जगत् से मोह त्याग दिया। सन् 1900 में अध्यापक बने और पदोन्नत हुए। महात्मा गांधी के पहले सत्याग्रह के शुरुआती दौर में नौकरी छोड़ने वालों में प्रेमचंद भी एक थे।

 प्रेमचंद की रचनाओं में ग्रामीण परिवेश झलकता है; परंतु अंधविश्वास, रूढ़िगत मान्यताओं का कोई स्थान नहीं है। शोषण, अत्याचार के खिलाफ प्रेमचंद ने जेहाद छेड़ रखा था। जमीदारों, पूँजीवादियों की कुरीतियों पर प्रहार किया, तो वहीं उन्होंने सर्वहारा वर्ग के जीवन परिवेश को ज्यों का त्यों अपनी कहानी में उतार दिया। 

   हिंदी से पहले प्रेमचंद उर्दू साहित्य में नवाब राय के नाम से प्रसिद्ध हुए । 1901 में इन्होंने उर्दू में रचनाएँ लिखनी शुरू कीं। उर्दू कथा संग्रह 'सोज़े वतन' को बगावत फैलने के डर से अंग्रेज सरकार ने जप्त कर ली। इन दिनों तिलस्मी और राजा रानी की रूमानी कहानियों और उपन्यासों का दौर था। सब से अलग हटकर आम जनजीवन पर अपनी कलम चलाने वाले प्रेमचंद एक थे। महात्मा गांधी के संपर्क में आने से पहले इन्होंने राष्ट्रीयता को लक्ष्य रखकर कहानियाँ लिखीं और फिर अंधविश्वास, छुआछूत, कुप्रथा को लेकर अपनी कलम चलाई। प्रेमचंद की ऐसी कहानियाँ उस समय काफी लोकप्रिय हुई जो आज भी समसामयिक हैं।

की अपेक्षा हिंदी साहित्य में प्रेमचंद को काफी ख्याति मिली। हिंदी में खड़ी ठेठ भाषा में कौशल चित्रण इन्हें सही सभी साहित्यकारों से अलग करता हुआ विशेष दर्जा देता है। यथार्थ जीवन को चित्रित करने में जो सफलता पाई उससे प्रेमचंद को विश्व स्तरीय स्थान मिला। ग्रामीण जीवन को अपनी कहानियों में अविकल रखा, जिससे भाषा अनुकरणीय होने के साथ जीवंत हो गई। कल्पना और रोमांस से हटकर प्रेमचंद मानवीय संवेदनाओं के मुखर हो गए। हिंदी साहित्य के प्रारंभिक दौर में प्रेमचंद ने एक नई दिशा दी जिनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन में जीते पात्र आस- निरास के बीच सुखी- संतोषी दिखते हैं। परंपरा से अलग हटकर लिखने के कारण प्रेमचंद को ब्राह्मण द्रोही, जमींदार विरोधी कहा गया, पर यह विरोध उनके सामने ज्यादा दिन नहीं ठहर सका। आडंबर को नकार कर सत्य लिखने का विरोध तो इन्हें सहना ही पड़ा, इसी सहनशीलता ने प्रेमचंद को हिंदी साहित्य में अमर कर दिया जिनकी ऊँचाई को दूसरा लेखक नहीं छू सका।

 प्रेमचंद ने जैसा लिखा, उसे अपने जीवन में उसे ढाला और अपने अभियान के पक्के रहे। जीवन भर की जमा पूंजी को प्रेमचंद ने पत्रकारिता के माध्यम से जनमत एकत्र करने में लगा दी। अपनी नौकरी ठुकरा कर 'हमदर्द' उर्दू के संपादक बने। साप्ताहिक 'प्रताप' में रहने के बाद सन् 1920 में काशी प्रेस से जुड़ गए। 1922 में लखनऊ की साहित्यिक पत्रिका 'माधुरी' में आए, यहाँ उन्हें ऐसी स्वतंत्रता हासिल नहीं हो सकी, जो वे चाहते थे। इन्हीं दिनों गोरखपुर में हुए असहयोग आंदोलन के आह्वान पर प्रेमचंद जेल गए। 'स्वदेश' में प्रेमचंद अंग्रेजों के खिलाफ तीखी टिप्पणी लिखा करते थे, यह बात बहुत कम लोगों को मालूम है; क्योंकि टिप्पणी में प्रेमचंद का नाम नहीं जाता था। काशी विद्यापीठ में अध्यापन करने के साथ 'मर्यादा' में इन्होंने अपनी संपादन कला का परिचय दिया। काशी से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक 'जागरण' में संपादक बनकर 1932 में आए जिसका ऐतिहासिक महत्व पत्रकारिता के रूप में आज भी मील का पत्थर है।

  हिंदी पत्रकारिता में राष्ट्रीय सूत्र के साथ नव अध्याय की आकांक्षाओं का सूत्रपात हुआ, प्रेमचंद के 'हंस' प्रकाशन पर। 'हंस' में संपादन की गौरवशाली परंपरा को कायम रखते हुए, देशवासियों की आत्मा की आवाज को जीवंत रखने का यत्न किया गया। 'हंस' के माध्यम से अनेक कथाकारों को प्रेरणा मिली जिन्होंने समाज का सच्चा चित्रण कर आम लोगों के साथ जुड़ने का हौसला रखा। प्रेमचंद के विचारों के अनुरूप तब कई साहित्यकार आगे आए। हंस के माध्यम से प्रेमचंद ने बताया कि 'यथार्थवाद का अर्थ सनकीपन नहीं है'!

 हिंदी साहित्य और पत्रकारिता में प्रेमचंद ने नए आयाम स्थापित किए। हंस और जागरण ने इन्हें प्रसिद्धि तो दी; परंतु धन नहीं दिया। इन्हीं दिनों मुंबई की एक फिल्म कंपनी ने अपने यहाँ काम करने का प्रस्ताव रखा। फिल्मों के लिए काम कर कुछ कर्ज उतार सकूँ ऐसा विचार कर एक साल तक प्रेमचंद ने काम किया; परंतु फिल्म प्रोड्यूसर के अनुरूप प्रेमचंद अपने आप को नहीं ढाल सके और वहाँ उन्हें सब कुछ निरर्थक- सा लगने लगा और फ़िल्म लाइन ही छोड़ दी। सिनेमा बारे में प्रेमचंद ने एक पत्र लिखा, “सिनेमा साहित्यिक आदमी के लिए नहीं है। मैं इस लाइन में यह सोचकर आया था कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सकने की कुछ संभावनाएँ इसमें दिखाई देती थीं; लेकिन अब मैं देख रहा हूँ कि यह मेरा भ्रम था और मैं फिर साहित्य की ओर लौट रहा हूँ। सच तो यह है कि मैंने लिखना कभी बंद नहीं किया और मैं उसे अपना जीवन का लक्ष्य समझता हूँ।"

  प्रेमचंद की रचनाओं में नयापन था। अपनी रचनाओं के बारे में प्रेमचंद ने खुद कहा –“इसमें नयापन कुछ नहीं है जिन की आवाजें, उनके अंतर्मन को साहित्य में लानी चाहिए उन्हीं को लाने के लिए मैंने भरपूर कोशिश की है।” सचमुच प्रेमचंद ऐसे लेखक रहे, जिनके व्यक्तित्व व कृतित्व का एक ही मार्ग था, वही मार्ग आज हम सबके लिए खुला है।   ■■

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Jun 1, 2022

जीव- जगत ऑरेंज ऑकलीफ- तितली सुन्दरी

 -रविन्द्र गिन्नौरे

  सबसे सुंदर रंग-बिरंगी तितली कौन-सी है! सुन्दर तितली का चयन विश्व सुंदरी की तर्ज पर हुआ। तितली सुन्दरी प्रतियोगिता में 'ऑरेंज ऑकलीफ' ने बाजी मारी और उसका नाम भारत की राष्ट्रीय तितली में दर्ज हो गया। छत्तीसगढ़ की तितली ऑरेंज ऑकलीफ को सुन्दरता का खिताब दिया गया वहीं इन तितलियों का निवास कवर्धा भी चर्चित हो गया।

तितली सुंदरी ऑरेंज ऑकलीफ-

ऑरेंज ऑकलीफ को राष्ट्रीय तितली यूं ही नहीं बनाया गया है। एक लंबा इसने सफर तय किया उसके बाद ही उसका नाम घोषित किया गया। 2020 के दौरान सितंबर अक्टूबर में भारत की 1500 प्रकार की तितलियों में से सात प्रजातियों को राष्ट्रीय तितली की रेस में शामिल किया गया। निर्णायकों को अब फैसला करना था कि इन सात तितलियों में सबसे सुंदर कौन है? इसके लिए के लोगों ने ऑनलाइन वोटिंग की। सबसे ज्यादा वोट 'ऑरेंज ऑकलीफ' को मिले। सात अक्टूबर वन्यजीव सप्ताह समापन पर तितली सुंदरी की घोषणा की गई। इस तरह यह भारत की राष्ट्रीय तितली बन गई।

तितली सुंदरी ऑरेंज ऑकलीफ का सौंदर्य तब दिखता है जब यह अपने पूरे पंख पसार बैठती है। पंख खुलते ही तीन रंग बरबस चमक उठते हैं। पंख के आगे भाग पर काला फिर नारंगी पट्टा और उसके बाद गहरा नीला रंग दिख पड़ता है। काले रंग के आधार पर दो सफ़ेद बिंदु इसके सौंदर्य में चार चांद लगा देते हैं। पंख के सिमटते ही यह एक सूखे पत्ते जैसी नज़र आती है। शिकारियों से बचने के लिए प्रकृति ने इसे ऐसा रूप प्रदान किया है।

छत्तीसगढ़ कवर्धा के जंगलों में बसेरा है, इस सुन्दर तितली का। भोरमदेव अभ्यारण के लगभग सात एकड़ इलाके में यह बहुतायत पाई जाती है। इसी के साथ भारत के वेस्टर्न घाट और उत्तर-पूर्व के जंगलों में यह पाई जाती है जहाँ इसे डेडलीफ के नाम से जाना जाता है।

प्रतियोगिता में शामिल तितलियाँ-

कृष्णा पीकॉक बड़े पंखों वाली तितली के पंख 130 एम एम तक होते हैं। पंख के अग्रभाग में काला रंग जिस पर पीले रंग की लंबी धारी और नीचे की ओर नीले, लाल बैंड होते हैं। यह उत्तर पूर्वी जंगलों सहित हिमालय में पाई जाती है।

 कामन जेजबेल के पंख 66.83 एम एम आकार के होते हैं। पंख की ऊपरी सतह सफेद और निचली सतह पीली होती है जिस पर मोटी काली धारियां और किनारे किनारों पर नारंगी छोटे-छोटे धब्बे इसे आकर्षक बनाते हैं।

फाइफ बार स्वार्ड टेल 70 से 90 एम एम पंखों वाली तितली जिसके पीछे के पंखों पर एक लंबी सी तलवार जैसी पूंछ इसकी विशेषता है। पंखों के काले सफेद पट्टे पर हरे पीले रंग का सम्मिश्रण इसे सुंदर बनाता है।

कामन नवाब तितली के ऊपरी पंख काले और नीचे के चॉकलेटी रंग के पंखों के बीच एक हल्की हरी पीली सी टोपी जैसी रचना नजर आती है इसलिए इसे नवाब कहा गया है। यह पेड़ों के ऊपरी हिस्सों पर पाई जाती है इसलिए यह बहुत कम दिखाई पड़ती है लेकिन बहुत तेज उड़ती है।

यलो गोरगन तितली के अनूठे पंख कोण सा बनाते हैं, पंखों की ऊपरी सतह पर गहरा पीला रंग होता है। यह मध्यम आकार वाली सुंदर तितली है जो पूर्वी हिमालय और उत्तर-पूर्व के जंगलों में पाई जाती है।

नार्दन जंगल क्वीन तितली का रंग चॉकलेट ब्राउन होता है और उस पर नीली धारियां इसे और सुंदरता प्रदान करती है। पंखों पर चॉकलेटी गोल घेरे इसकी विशेष पहचान बताते हैं यह फ्लोरोसेंट कलर में भी दिखाई देती है। अरुणाचल प्रदेश में यह बहुतायत पाई जाती है।

पर्यावरण संकेतक है तितली-

राष्ट्रीय तितली के अभियान में बहुत सारी संस्थाएँ सामने आईं। 'राष्ट्रीय तितली अभियान संघ' ने यह अभियान प्रारंभ किया। तितलियाँ प्रकृति संरक्षण और महत्त्वपूर्ण जैविक संकेतकों की दूत हैं जो हमारे स्वास्थ्य पर्यावरण को दर्शाती है। एक राष्ट्रीय तितली होना इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह लोगों में प्रकृति के बारे में जागरूकता फैलाने में मदद करेगा। तितलियों की प्रजातियाँ पर्यावरण में बदलाव जैसे प्रदूषण के बारे में चेतावनी कैसे देती है यह हमें समझना चाहिए। मुंबई में जूलॉजी के प्रोफेसर अमोल पटवर्धन कहते हैं, एक बार चुन लेने के बाद यह विशेषताएँ  देश के लिए सांस्कृतिक पारिस्थितिक और संरक्षण महत्त्व को परिभाषित करने में मदद करेगी और यहाँ तक कि बाद के वर्षों में पर्यटन को भी आकर्षित करेगी। इसी के साथ छत्तीसगढ़ के भोरमदेव अभ्यारण को नए सिरे से संरक्षित किया जा रहा है जहाँ राष्ट्रीय तितली ऑरेंज ऑकलीफ बहुतायत पाई जाती है।

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