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Aug 1, 2026

पर्व - संस्कृतिः हरेली तिहार आ गे

  -  रविन्द्र गिन्नौरे

सावन मास की अमावस्या, जब वसुंधरा हरित परिधान ओढ़ लेती है। गाँव- गँवई के खेत खलिहान, नदी, तालाब जल से छलक- छलक उठते हैं। खेतों में धान के बिरवा हर ओर हरियाते नज़र आने लगते हैं जो हवाओं के साथ लहराते दिख पड़ते हैं। खेती- किसानी का काम संपन्न हो जाता है और तब मनाया जाता है छत्तीसगढ़ का पहला त्योहार 'हरेली'। छत्तीसगढ़ की परंपरा, संस्कृति और आस्था को संजोकर जन कल्याण की भावना के साथ मनाई जाती है 'हरेली'।

लोक पर्व हरेली के दिन सुबह- सुबह हर दरवाजे पर नीम की एक डाल खोंची जाती है। वहीं गाँव के लुहार देहरी पर एक कील ठोंकते हुए नज़र आते हैं। किसी अनिष्ट की संभावना से बचने के लिए यह परंपरा निभाई जाती है। गाँव का हर वर्ग हरेली में अपनी अपनी- अपनी भूमिका निभाता है। राऊत, बढ़ई, लोहार, बैगा, गुनिया सभी भागीदारी निभाते हैं। गाँवों में सुबह से ही हर ओर उल्लास और उमंग से भरे लोगों का हुजूम दिख पड़ता है। मस्ती से भरे ठिठोली करते हुए बच्चे गेड़ी चढ़ गाँव की गलियों में दौड़ लगाते हैं। हर ओर बच्चों की टोली का शोर सुनाई पड़ता है।

  धान के लहलहाते खेतों को देख महसूस होता है कि हर ओर हरियाली फैली हुई है। आकाश में बादलों की गरजना, कहीं रिमझिम बरसते मेध, तो कहीं दूर कौंधती बिजली मानो प्रकृति भी हरेली का स्वागत करने आतुर हो उठीं हो। पर्यावरण, संरक्षण, संवर्धन का संदेश देते, वहीं कर्म को बल देते, गाँव में आपसी सौहार्द को अपने में समेटे हुए मनायी जाती है 'हरेली'। अपने श्रम सीकरों से फसलों के लिए किसान अपने कृषि औजारों, गोधन की साज संभाल करते हैं। अनजाने अनिष्टों से बचने के लिए अनुष्ठान करते हैं। इसी के साथ उल्लासित होते मनती है 'हरेली'।

पशु कल्याण –

गोधन संस्कृति गाँव को आर्थिक स्वालंबन देती है। गोधन संवर्धन के लिए राऊत आज भी अपनी अहम् भूमिका निभाते हैं, जो सतत पशुओं के कल्याण में लगे रहते हैं। हरेली के पहले ही जंगल में जाकर भांवर पेड़ की छाल बटोरते हैं। दशमूल कंद को खोदकर लाते हैं। वनौषधियों से काढ़ा तैयार किया जाता है। हरेली की सुबह 'सांहड़ा देव' की पूजा अर्चना कर गाँव में काढ़ा बांटा जाता है। ग्रामीण अपने गाय, बैल, भैसों को आटे की लोदी खिलाते हैं और काढ़ा पिलाते हैं। यह औषधि गाँव के पशुधन को बीमारियों से बचाती है। राऊत सभी को शुभकामना देते हुए कह उठते हैं- 

"धन दुगानी पावय भझ्या

पावय हमर असीसे, 

नाती पूत ले घर भरय 

जीर्यों लाख बरीसे।"

पौराणिक मान्यता-

प्राकृतिक, देवीय और मानवीय संकटों से गाँव की रक्षा के लिए बैगा की अपनी भूमिका निभाता है। मान्यता है कि गाँव का बैगा ही संक्रामक रोगों, शत्रुओं और कष्टों से रक्षा करने में समर्थ होता है। गाँव बंद किया जाता है और रात में सवनाई चलाई जाती है। हर घर की दीवारों पर गोबर से 'पुतरा पुतरी' अंकित किए जाते हैं। पशुधन को खुरहा चपका बीमारी से बचाने के लिए अर्जुन के दस नामों का स्मरण किया जाता है।

 पौराणिक कथा के अनुसार महाभारत काल में अर्जुन  अपने अज्ञात वास में छिपने के लिए विराटनगर में वृहनल्ला बने थे। अर्जुन जब अपने असली रूप में वापस आये तब विराटनगर में फैली पशुओं की बीमारी अपने आप समाप्त हो गयी। इस घटना को ध्यान में रखकर पशुओं को बीमारी से बचाने के लिए अर्जुन के नाम का स्मरण किया जाता है।

कृषि औजारों की पूजा -

 हरेली का तीसरा महत्वपूर्ण चरण है कृषि उपयोगी औजारों की साज सम्हाल। खेती का काम पूरा हो जाता है फिर नागर, कुदारी, रांपा, बसुला, टँगिया, आरी, भँवारी, साबर, चटवार, हँसिया, बिंधना जैसे उपकरणों को निकालकर धोया जाता है। ग्राम- देवताओं और लोक देवताओं के साथ इनकी भी पूजा-अर्चना की जाती है। देवों को चीला रोटी का भोग लगाया जाता है। कृषि औजार किसानों के अंलकार हैं। इनकी सुरक्षा उतना ही जरूरी है जितनी कि आभूषण की। इस पर कहा गया है,

"नागर तुतारी टँगिया 

कुदारी किसान के गहना,

अऊ किसनिन के रापा

 गैंती झऊंहा नहना ।।"

लोक देवी-देवता- 

   लोक देवताओं के बारे में मान्यता है कि ये ग्रामीणों का दुख दूर करते हैं। हर गाँव के अपने एक अलग देवी-देवता होते हैं जिनकी पूजा अर्चना की जाती है। गाँवों में तो हरेली से लेकर ऋषि पंचमी तक तंत्र- मंत्र सीखने की प्रक्रिया भी चलती रहती है। तन्त्र मंत्र सीखने की शुरुआत हरेली से होती है इस दिन 'पाठ पीढ़ा' दिया जाता है।

हरेली का उल्लास -

   बच्चों के साथ वृद्धों का उत्साह देखते बनता है। हरेली के दिन बांस से बनी गेंड़ी चढ़ने की परंपरा निभाई जाती है। कीचड़ पानी से सराबोर हुई गाँव की गलियों में गेड़ी पर चलते लोग दिखते हैं। हरेली त्यौहार में गेड़ी दौड़ प्रतियोगिता आयोजित होती है, कहीं गेंड़ी नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है। महीने भर गेंड़ी का आनंद लेने के बाद इसे विसर्जित कर दिया जाता है।     

  हरेली पर गाँव के चौपाल में पारंपरिक रूप से धार्मिक अनुष्ठान होता है। कहीं आल्हा सुनाई देता है, तो कहीं रामायण की स्वर लहरियाँ गूँज उठती हैं। लोक मान्यता है कि जब तक हरियाली रहेगी, तब तक किसानों के खेत आबाद रहेंगे। जंगल हरे-भरे रहेंगे। जंगल हरे रहेंगे, तो उनके पशुओं के उत्तम स्वास्थ्य के लिए ‘दिव्य रसायन’ की प्राप्ति होती रहेगी। हर हमेशा हरियाली बनी रहे, जो सब का पोषण करती रहे, ऐसी परंपराओं को संजोए हरेली त्यौहार हर बरस मनाया जाता है।

ravindraginnore58@gmail.com

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