February 11, 2015

इस अंक में

 चित्रः राघव वर्मा
उदंती.com जनवरी- फरवरी 2015           
सबसे जीवित रचना वह है जिसे पढ़ने से प्रतीत हो कि लेखक ने अंतर से सब कुछ फूल सा प्रस्फुटित किया हो। -शरतचन्द्र 
लघुकथा विशेष
लघुकथा: संचेतना एवं अभिव्यक्ति - रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' 
दुआ, नींद  - रमेश बतरा
ज़िंदगी, बेटी का ख़त  - सुकेश साहनी
बीमार, सहयात्री   - सुभाष नीरव
छोटे बड़े सपने, कट्टरपंथी  - रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
टूटी ट्रे, असली मुजरिम    - श्याम सुन्दर अग्रवाल
खेलने के दिन, अनर्थ   - कमल चोपड़ा
बेडिय़ाँ  - डॉ. पूरन सिंह
सच झूठ, हद  - डॉ. श्याम सुंदर 'दीप्ति' 
पहला संगीत   - अखिल रायजदा
 माँ, तोहफा  - प्रेम गुप्ता 'मानी'
रब करदा है सो,  रोशनी  - मुरलीधर वैष्णव
माँ, युग परिवर्तन, मासूम अपराध  - ऋता शेखर 'मधु'
जहर की जड़ें, निर्मल खूबसूरती  - बलराम अग्रवाल
 मर्यादा,  बेखबर   - डॉ. सुधा ओम ढींगरा
मुआयना, आश्वस्त, गम   - हरदर्शन सहगल
अप्रत्याशित, विकल्प - शकुंतला किरण
21वीं सदी का सपना, स्त्री का दर्द  - अमर गोस्वामी
निरुत्त्तर, बोकरा भात  - के. पी. सक्सेना 'दूसरे'
प्रॉब्लम चाइल्ड, सच - शेफाली पाण्डेय 
मेरे अपने, इस बार  - कमलेश भारतीय
अंतहीन सिलसिला, सर्वशक्तिमान, कारण  - विक्रम सोनी
फेलोशिप, स्वाद   - दीपक मशाल
अन्धा, पीड़ान्तर, मूल्यांकन, बेकार  - आलोक सातपुते
सदुपयोग, समय चक्र, दो रुपये का अखबार - बालकृष्ण गुप्ता 'गुरु'
एक सच्ची रिर्पोट, भूकंप पीडि़त  - महेश राजा
भूकंप, बाहर का मोह  - डॉ. करमजीत सिंह नडाला
खलल  - आशीष दशोत्तर
मानव धर्म, दीया तले   - सुरेश शर्मा
कागज की किश्तियाँ, रिश्ते   - डॉ. अशोक भाटिया
भूख, मिट्टी तेल और मेरिट  - रवि श्रीवास्तव
अमंगल, बीस जोड़ी आँखें, मिसाल  - डॉ. शील कौशिक  
फीस, बड़ा होने पर   - गंभीर सिंह पालनी
आवरण चित्र: राघव वर्मा

February 10, 2015

लघुकथा -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

 संचेतना एवं अभिव्यक्ति
रचना जीवन की अभिव्यक्ति है। जीवन का प्रवाह ही रचना का प्रवाह है और यही उसका मानदण्ड भी। किसी भी विधा का मूल्यांकन बाहर से थोपे गए मानदण्डों से नहीं हो सकता। विकासशील विधा को कुछ निश्चित तत्त्वों की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता; क्योंकि उसकी संभावनाएँ और क्षमताएँ चुकी नहीं हैं। कविता, कहानी, उपन्यास  आदि के साथ यही बात है। लघुकथा भी इससे परे नहीं है। यह सामयिक प्रश्नों का उत्तर देने के साथ-साथ जीवन के शाश्वत मूल्यों से भी जुड़ी है। लघुकथा अपनी संक्षिप्तता, सूक्ष्मता एवं सांकेतिकता में जीवन की व्याख्या को नहीं वरन् व्यंजना को समेट कर चली है। कोई विषय लघुकथा के लिए वर्जित नहीं है; लेकिन विषय- चयन से अभिव्यक्ति तक की यात्रा चुनौतीपूर्ण है। इस चुनौती को लघुकथाकारों ने सहर्ष स्वीकार किया है।
युगबोध से साक्षात्कार, अनुभवों की उर्वरता , अनुभूति की सघनता एवं संवेदना का संश्लिष्ट प्रभाव लघुकथा की संचेतना का आधार बन सकते है। मानव बाह्य जगत् से जितना जुड़ा है; उतना ही वह अन्तर्जगत् में भी जी रहा है। बाहरी संसार के नदी, पर्वत, पशु-पक्षी उसके मन से जुड़े हैं; तो वह मानव होकर भी मानवेतर पात्रों से जुड़ा है। गतिशील होकर भी वह स्थिर,गतिशील मूर्त्त-अमूर्त्त सभी का सगा- सम्बन्धी है; अत: लघुकथा से इन पात्रों को निर्वासित नहीं किया जा सकता। ऐसे पात्रों का सही निर्वाह न होने पर रचना कमजोर तो हो ही जाएगी।
व्यंग्य को लघुकथा के लिए वर्जित या अनिवार्य नहीं माना जा सकता। विद्रुपताओं पर प्रहार करने के लिए व्यंग्य की आवश्यकता पड़ सकती है। कभी-कभी व्यंग्य रचना में आद्योपांत पिरोया हुआ हो सकता है तो कभी कथा के समापन बिन्दु के साथ व्यंजित होता है। हमें व्यंजनावृत्ति द्वारा बोधित अर्थ और चुटकुले में अंतर करना होगा। जो संकेतितार्थ को नहीं पकड़ पाते; उन्हें कोई लघुकथा चुटकुला लगे तो क्या किया जा सकता है?
लघुकथा में वर्णन और विवरण का अवकाश नहीं होता; वरन् विश्लेषण, संकेत और व्यंजना से काम चलाया जाता है; अत: रचना को धारदार बनाने के लिए भाषिक संयम की नितान्त आवश्यकता है। जहाँ कई वाक्यों की बात कम से कम वाक्यों में कहीं जा सके, कथन स्फीत न होकर संश्लिष्ट हो; वहाँ भाषिक संयम स्वत: आ जाएगा। दिनभर की व्यस्तता को प्रकट करने के लिए बहुत सारी बातों का वर्णन किया जा सकता है; परन्तु लघुकथा में इसी बात को कम से कम शब्दों में भी अभिव्यक्त किया जा सकता है। 
कथ्य में प्रखरता लाने के लिए प्रतीकों का प्रयोग किया जा सकता है लेकिन प्रतीकों को सिद्ध करने के लिएकथ्य  बुनना उचित नहीं है। प्रतीकार्थ प्रस्तुत अर्थ का सहायक हो, उसे उलझाने वाला न हो। कथ्य की माँगपर ही प्रतीक का प्रयोग होना चाहिए। प्रतीक-प्रयोग से यदि कथ्य की संवेदना आहत होती है; तो यह दोष प्रयोक्ता का है, प्रतीक का नहीं। बच्चे के हाथ में धारदार चाकू दे दिया जाए तो वह अपना हाथ भी काट सकता है। अच्छे प्रभाव के लिए प्रतीक को तात्कालिकता के प्रभाव से मुक्त करना जरूरी है: दुर्बोध प्रतीक रचना को कमजोर ही कर सकते हैं। मिथकों का प्रयोग भी बहुत सारे लघुकथाकारों ने किया है। जरा-सी असावधानी पूरे मिथकीय परिप्रेक्ष्य को ध्वस्त कर सकती है। कथ्य के अनुरूप ही मिथक का चयन करना चाहिए। मिथकों की अपनी एक मर्यादित स्थिति है, उसमें रद्दोबदल करना रचना के साथ धोखा करना है। 
कथानक का अपना अस्तित्व है। कथ्य ताज़ा दम है या बासी यह लघुकथा को एक हद तक ही प्रभावित करता है। कथानक की प्रस्तुति प्रचलित कथानक को भी सशक्त बना सकती है। प्रस्तुति ठीक न होने पर नया कथ्य भी प्रभावशून्य सिद्ध होगा। 
भाषा को लेकर लघुकथा में ढेर सारी भ्रांतियाँ हैं, सच तो यह है कि संवेदना की भाषा और अभिव्यक्ति की भाषा के बीच एक अन्तराल है। संवेदना के स्तर पर जी लेने के बाद ही लिखने की बारी आती है, पहले नहीं। लिखने के लिए थोड़ा पीछे मुडऩा पड़ता है;  अत: अनुभूति के साथ एक अनकहा समझौता करना पड़ता है। भाषा में सरलीकरण की क्रिया या आम बोलचाल की भाषा कोई सायास कार्य नहीं है;  वरन् सतत अभ्यास का प्रतिफल है। सायास होने पर भाषा की सहजता जरूर नष्ट होगी। जिस विधा की सारी संभावनाएँ चुक गई हों, भाषा को पंगु बनाना हो उसके लिए सरलीकरण प्रमुख हो सकता है। भाषा किसी रचना के ऊपर नहीं थोपी जाती। भाषा कथ्य के भीतर से ही उपजती है। भाषा केवल पात्रानुकूल ही नहीं होती वरन् परिस्थिति, मानसकिता एवं परिदृश्य के भी अनुकूल होती है। एक ही पात्र हर्ष, शोक या भय में एक जैसी भाषा प्रयुक्त नहीं करेगा। पत्नी, अधिकारी, पुत्र और नौकर के सामने भाषा का स्वर और स्तर भिन्न-भिन्न हो जाएगा। आज का जीवन बहुत जटिल है, मानसिक गठन और भी अधिक जटिल। इसका प्रभाव अभिव्यक्ति पर पड़े बिना नहीं रह सकता। संस्कृतनिष्ठ भाषा न कोई खतरा और न दबाव; क्योंकि भाषा की वास्तविक निष्ठा कथ्य से है, फारसी या संस्कृत से नहीं। सरल भाषा में यहाँ तक की आम बोलचाल की भाषा में लिखी गई ढेर सारी नई कविताएँ दुर्बोध है। यह दुर्बोधता भाषा के कारण नहीं आई वरन् कवि की जटिल, विचार-संकुल अनुभूतियों के कारण आई है। लघुकथाकारों में एक वर्ग ऐसा है, जो भाषा के प्रति बिल्कुल लापरवाह है। अच्छी-भली रचना कमजोर भाषा के घेरे में आकर अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ सकती।
लघुकथाओं में बाह्य-संघर्ष तो खूब मिलता है। शायद इसका कारण वे विषय हैं, जिनमें जनसाधारण की आवाज बनकर लघुकथा ने अपना रास्ता तय किया है। परन्तु एक लम्बे अर्से तक एक ही दिशा में दौड़ लगाना हितकर नहीं। लघुकथा को नए आयाम खोजने पड़ेंगे। अन्तद्वन्द्व एवं अन्त:संघर्ष को लेकर कई रचनाएँ सामने आई हैं। इस तरह के विषयों में भाषा अतिरिक्त अनुशासन की माँग करती है। 
अब आवश्यकता है कि नए से नए विषयों का संधान किया जाए; जिससे लघुकथा गिने-चुने विषयों के दायरे से बाहर आकर अपने सशक्त रूप की छाप छोड़ सके। यह तभी संभव है; जब पूर्वाग्रह-मुक्त होकर लघुकथाओं पर विचार किया जाए।
उदन्ती के इस अंक में नए-पुराने 32 लघुकथाकारों की  67 लघुकथाएँ दी गई हैं; जो अपने कथ्य और प्रस्तुति से विधागत विशेषताओं और वैविध्य को प्रस्तुत करती हैं। आशा है लघुकथाओं पर केन्द्रित यह अंक पसन्द आएगा।                                                        000

लघुकथाएँ -रमेश बतरा

दुआ

वह दफ्तर में था। शहर में दंगा हो गया है, यह खबर ढाई बजे मिली। वह भागा और जिन्दगी में पहली बार शाम का अखबार खरीद लिया। दंगा उसी इलाके में हुआ था, जहाँ उसका घर था। यह जानते हुए भी कि उसके पास पैसे नहीं हैं, वह स्कूटर रिक्शा में बैठ गया। पिछली बार वह स्कूटर में कब बैठा था, उसे याद नहीं। वह हमेशा बस में सफर करता है।
दफ्तर पहुँचने में देर हो रही हो या कोई कितना भी जरूरी काम हो, न तो उसे उस बस की प्रतीक्षा से ऊब ही होती है और न लाइन तोडऩे में जिन्दगी का कोई आदर्श टूटता नजर आता है। यानी तब वह सोचता नहीं था और आज उसके पास सोचने की फुर्सत नहीं थी। वह घर पहुँचकर सबकी खैर- कुशल पाने को चिन्तित हो रहा था। बीवी तो घर पर ही होगी, लेकिन बच्चे स्कूल जाते हैं और इसी वक्त लौटते हैं। कहीं...वह सोचता जा रहा था।
स्कूटरवाले ने दंगाग्रस्त इलाके से कुछ इधर ही ब्रेक लगा दी, 'बस, इससे आगे नहीं जाऊँगा।'
'चलो, चलो यार, मैं जरा जल्दी में हूँ।'
'मुझे अपनी जान से कोई बैर नहीं है जी !' वह मीटर
देखकर बोला, 'पाँच रुपए सत्तर पैसे।'
'तुम्हें पैसों की पड़ी है और मेरी जान पर बनी हुई है।' वह जेब में हाथ डालकर बोला, 'सवारियों से बदतमीजी करते हो, तुम्हें शर्म आनी चाहिए...यह तो कोई तरीका नहीं।' वह गुस्साता हुआ उतरा और उतरते ही जेब में हाथ डाले- डाले, स्कूटरवाले की तरफ से आँख मूँदकर भागने लगा।
'ओए, तेरी तो...बे।' स्कूटरवाला कुछ देर तक उसके पीछे भागा, मगर उसे गोली की तरह दंगाग्रस्त इलाके में पहुँचता पाकर हाँफता हुआ खुद ही से बड़बड़ाने लगा, 'साला हिन्दू है तो मुसलमानों के हाथ लगे और मुसलमान है तो हिन्दुओं में जा फँसे!'

नींद

वे हो- हल्ला करते एक पुरानी हवेली में जा पहुँचे। हवेली के हाते में सभी घरों के दरवाजे बंद थे। सिर्फ एक कमरे का दरवाजा खुला था। सब दो- दो, तीन- तीन में बँटकर दरवाजे तोडऩे लगे और उनमें से दो जने उस खुले कमरे में घुस गए।
कमरे में एक ट्रांजिस्टर हौले- हौले बज रहा था और एक आदमी खाट पर सोया हुआ था।
'यह कौन है?' एक ने दूसरे से पूछा।
'मालूम नहीं,' दूसरा बोला, ''कभी दिखाई नहीं दिया मुहल्ले में।'
'कोई भी हो,' पहला ट्रांजिस्टर समेटता हुआ बोला, 'टीप दो गला!'
'अबे, कहीं अपनी जाति का न हो?'
'पूछ लेते हैं इसी से।' कहते- कहते उसने उसे जगा दिया।
'कौन हो तुम?'
वह आँखें मलता नींद में ही बोला, 'तुम कौन हो?'
'सवाल- जवाब मत करो। जल्दी बताओ वरना मारे जाओगे।'
'क्यों मारा जाऊँगा?'
'शहर में दंगा हो गया है।'
'क्यों.. कैसे?'
'मस्जिद में सूअर घुस आया।'
'तो नींद क्यों खराब करते हो भाई ! रात की पाली में कारखाने जाना है।' वह करवट लेकर फिर से सोता हुआ बोला, 'यहाँ क्या कर रहे हो?...जाकर सूअर को मारो न !'

लेखक के बारे में: 23 नवम्बर, 1950 जालन्धर (पंजाब) में जन्में स्वर्गीय श्री रमेश बतरा दीपशिखा, साहित्य निर्झर, सारिका, नवभारत टाइम्स और सन्डे मेल में सम्पादन से सम्बद्ध रहे। उन्होंने लघुकथा को सही दिशा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। नंग- मनंग, पीढिय़ों का खून, फाटक उनके कहानी संग्रह है। फखर जमान के उपन्यास 'बन्दीवान' का अनुवाद किया। 15 मार्च, 1999 को दिल्ली में उनका असामयिक निधन हो गया।

लघु कथाएँ - सुकेश साहनी

ज़िदगी

पेट में जैसे कोई आरी चला रहा हैं... दर्द से बिलबिला रहा हूँ....। पत्नी के ठंडेकाँपते हाथ सिर को सहला रहे हैं। उसकी आँखों से टपकते आँसुओं की गरमाहट अपने गालों पर महसूस करता हूँ। उसने दो दिन का निर्जल उपवास रखा है। माँग रही है कैंसर ग्रस्त पति का जीवन ईश्वर से। ...ईश्वर? ....आँखों पर जोर डालकर देखता हूँधुँध के उस पार वह कहीं दिखाई नहीं देता...।
घर में जागरण है। फिल्मी गीतों की तर्ज पर भजनों का धूम-धड़ाका है। हाल पूछने वालों ने बेहाल कर रखा है। थोड़ी-थोड़ी देर बाद कोई न कोई आकर तसल्ली दे रहा है, ''सब ठीक हो जाएगाईश्वर का नाम लो।....ईश्वर?....फिल्मी धुनों पर आँखों के आगे थिरकते हीरो-हीराइनों के बीच वह कहीं दिखाई नहीं देता....
नीम बेहोशी के पार से घंटियों की हल्की आवाज सुनाई देती है। ऊपरी बलाओं से मुझे मुक्ति दिलाने के कोई सिद्ध पुरूष आया हुआ है...। नशे की झील में डूबते हुए पत्नी की प्रार्थना को जैसे पूरे शरीर से सुन रहा हूँ, ''इनकी रक्षा करोईश्वर!’....ईश्वर?....मंत्रोच्चारण एवं झाड़-फूँक से उठते हुए धुँए के बीच वह कहीं दिखाई नहीं देता...
श्मशान से मेरी अस्थियाँ चुनकर नदी में विसर्जित की जा चुकी हैं। पत्नी की आँखों के आँसू सूख गए हैं। मेरी मृत्यु से रिक्त हुए पद पर वह नौकरी कर रही है। घर में साड़ी के पल्लू को कमर में खोंसेवह काम में जुटी रहती है। मेरे बूढ़े माँ-बाप के लिए बेटा और बच्चों के लिए बाप भी बनी हुई है। पूजा पाठ (ईश्वर) के लिए अब उस समय नहीं मिलता। ....ईश्वर?...वह उसकी आँखों से झाँक रहा है!


बेटी का  ख़त
बेटी का खत पढ़ते ही बूढ़े बाप के चेहरे पर हवाइयाँ उडऩे लगीं।
'खैरियत तो है न?’ पत्नी ने पूछा, 'क्या लिखा है?’
'सब कुशल-मंगल है,’ आवाज में कंपन था।
'फिर पढ़ते ही घबरा क्यों गए?’  पत्नी बोलीफिर उसके हाथ से चिट्ठी लेकर खुद पढऩे लगी।
खत खैरियत वाला ही था। बेटी ने माँ-बाप की कुशलता की कामना करते हुए अपनी राजी-खुशी लिखी थीअंत में लिखा था-राजू भइया की बहुत याद आती है। पत्र पढ़ने के बाद पत्नी निश्चिंत होकर रसोई में चली गई।
            जब लौटी तो देखा पति अभी भी उस खत को एकटक घूरे जा रहा हैचेहरा ऐसा मानो किसी ने सारा खून निचोड़ लिया हो।
पत्नी को देखते ही उसने सकपकाकर खत एक ओर रख दिया। सहज होने का असफल प्रयास करते हुए बोला, 'सोचता हूँकल रजनी बेटी के पास हो ही आऊँ।
पत्नी ने उसके पीले उदास चेहरे की ओर ध्यान से देखाफिर रुँधे गले से बोली, 'आखिर हुआ क्या हैअभी कल ही तो दशहरे पर बेटी के यहाँ जाने की बात कर रहे थेफिर अचानक ऐसा क्या जो... तुम्हें मेरी सौं जो कुछ भी छिपाओ!
इस बार वह पत्नी से आँख नहीं चुरा सकाभर्राई आवाज में बोला, 'पिछली दफा रजनी ने मुझे बताया था कि ससुराल वाले उसकी लिखी कोई चिट्ठी बिना पढ़े पोस्ट नहीं होने देतेतब मैंने उससे कहा था कि भविष्य में अगर वे लोग उसे तंग करें और वह हमें बुलाना चाहे तो खत में लिख दे- राजू भइया की बहुत याद आती है। इस बार उसने खत में यही तो लिखा है’- कहते हुए बूढ़े बाप की आँखें छलछला आर्इं।

संपर्क: 193121, सिविल लाइंसबरेली -243001, Email- sahnisukesh@gmail.com

लघुकथाएँ - सुभाष नीरव

बीमार
चलो, पढ़ो।
तीन वर्षीय बच्ची किताब खोलकर पढऩे लगी- अ से अनाल... आ से आम... एकाएक उसने तुतलाते हुए पूछा- पापा, ये अनाल क्या होता है ?
यह एक फल होता है, बेटे। मैंने उसे समझाते हुए कहा, इसमें लाल- लाल दाने होते हैं, मीठे- मीठे!
पापा, हम भी अनाल खायेंगे... बच्ची पढऩा छोड़कर जिद-सी करने लगी। मैंने उसे डपट दिया, बैठकर पढ़ो। अनार बीमार लोग खाते हैं। तुम कोई बीमार हो! चलो, अंग्रेजी की किताब पढ़ो। ए फार एप्पिल... एप्पिल माने...
सहसा, मुझे याद आया, दवा देने के बाद डाक्टर ने सलाह दी थी- पत्नी को सेब दीजिये, सेब।
लेकिन मैं मन ही मन पैसों का हिसाब लगाने लगा था। सब्जी भी खरीदनी थी। दवा लेने के बाद जो पैसे बचे थे, उसमें एक वक्त की सब्जी ही आ सकती थी। बहुत देर सोच- विचार के बाद, मैंने एक सेब तुलवा ही लिया था- पत्नी के लिए।
बच्ची पढ़े जा रही थी, ए फार एप्पिल... एप्पिल माने सेब...
पापा, सेब भी बीमाल लोग खाते हैं ? जैसे मम्मी ?...
बच्ची के इस प्रश्न का जवाब मुझसे नहीं बन पड़ा। बस, उसके चेहरे की ओर अपलक देखता रह गया था।
बच्ची ने किताब में बने सेब के लाल रंग के चित्र को हसरत-भरी नजरों से देखते हुए पूछा- मैं कब बीमाल होऊँगी, पापा?

                               सहयात्री
बस रुकी तो एक बूढ़ी बस में चढ़ी। सीट खाली न पाकर वह आगे ही खड़ी हो गयी। बस झटके के साथ चली तो वह लडख़ड़ा कर गिर पड़ी। सीटों पर बैठे लोगों ने उसे गिरते हुए देखा। जब तक कोई उठकर उसे उठाता, वह उठी और पास की एक सीट को कस कर पकड़कर खड़ी हो गई।
जिस सीट के पास वह खड़ी थी, उस पर बैठे पुरुष ने उसे बस में चढ़ते, अपने पास खड़ा होते और गिरते देखा था। लेकिन अन्य बैठी सवारियों की भाँति वह भी चुप्पी साधे बैठा रहा।
अब बूढ़ी मन ही मन बड़बड़ा रही थी- कैसा जमाना आ गया है! बूढ़े लोगों पर भी लोग तरस नहीं खाते। इसे देखो, कैसे पसरकर बैठा है। शर्म नहीं आती, एक बूढ़ी- लाचार औरत पास में खड़ी है, लेकिन मजाल है कि कह दे, आओ माताजी, यहाँ बैठ जाओ...।
तभी, उसके मन ने कहा, क्यों कुढ़ रही है?... क्या मालूम यह बीमार हो, अपाहिज हो? इसका सीट पर बैठना जरूरी हो। इतना सोचते ही वह अपनी तकलीफ भूल गयी। लेकिन मन था कि वह कुछ देर बाद फिर कुढऩे लगी, क्या बस में बैठी सभी सवारियाँ बीमार-अपाहिज हैं ?... दया- तरस नाम की तो कोई चीज रही ही नहीं।
इधर जब से वह बूढ़ी बस में चढ़ी थी, पास में बैठे पुरुष के अन्दर भी घमासान मचा हुआ था। बूढ़ी पर उसे दया आ रही थी। वह उसे सीट देने की सोच रहा था, पर मन था कि वहाँ से दूसरी ही आवाज निकलती, क्यों उठ जाऊँ ? सीट पाने के लिए तो वह एक स्टाप पीछे से बस में चढ़ा है। सफर भी कोई छोटा नहीं है। पूरा सफर खड़े होकर यात्रा करना कितना कष्टप्रद है। और फिर, दूसरे भी तो देख रहे हैं, वे क्यों नहीं इस बूढ़ी को सीट दे देते?
इधर, बूढ़ी की कुढऩ जारी थी और उधर पुरुष के भीतर का द्वंद। उसके लिए सीट पर बैठना कठिन हो रहा था। क्या पता बेचारी बीमार हो?.. शरीर में तो जान ही दिखाई नहीं देती। हड्डियों का पिंजर। न जाने कहाँ तक जाना है बेचारी को! तो क्या हुआ?.. न, न! तुझे सीट से उठने की कोई जरूरत नहीं।
माताजी, आप बैठो। आखिर वह उठ ही खड़ा हुआ। बूढ़ी ने पहले कुछ सोचा, फिर सीट पर सिकुड़ कर बैठते हुए बोली- तू भी आ जा पुत्तर, बैठ जा मेरे संग। थक जाएगा खड़े- खड़े।

सम्पर्क- 372, टाइप-4, लक्ष्मीबाई नगर, नई दिल्ली-110023, मो. 9810534373, 
subhashneerav@gmail.com

लघु कथाएँ - रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

छोटे- बड़े सपने...


तीनों बच्चे रेत के घरौंदे बनाकर खेल रहे थे।
सेठ गणेशीलाल का बेटा बोला 'रात मुझे बहुत अच्छा सपना आया था।'
'हमको भी बताओ।' दोनों बच्चे जानने के लिए चहके।
'उसने बताया 'सपने में मैं बहुत दूर घूमने गया, पहाड़ों और नदियों को पार करके।'
नारायण बाबू का बेटा बोला 'मुझे और भी ज्यादा मजेदार सपना आया। मैंने सपने में बहुत तेज स्कूटर चलाया। सबको पीछे छोड़ दिया।'
जोखू रिक्शेवाले के बेटे ने अपने पेट पर हाथ फेरते हुए कहा 'तुम दोनों के सपने बिल्कुल बेकार थे।'
'ऐसे ही बेकार कह रहे हो। पहले अपना सपना तो बताओ।' दोनों ने पूछा।
इस बात पर खुश होकर वह बोला 'मैंने रात सपने में खूब डटकर खाना खाया। कई रोटियां, नमक और प्याज के साथ, पर....'।
'पर...पर क्या?' दोनों ने टोका।
'मुझे भूख लगी है।' कहकर वह रो पड़ा।

कट्टरपंथी
पूरे शहर में मौत जैसा सन्नाटा छाया हुआ था। सुनसान गलियों में आतंक पहरा दे रहा था। लोग जरा- सी तेज आवाज पर भी चौंक उठते। पंडित दीनदयाल आंगन में बैठे हुए थे।
दरवाजे पर थपथपाहट हुई। बिना कुछ सोचे- समझे उन्होंने द्वार खोल दिया। एक युवक तेजी से भीतर आया और गिड़गिड़ा उठा 'मुझे बचा लीजिए। कुछ गुण्डे मेरे पीछे पड़े हैं।' याचना उसकी आंखों में तैर रही थी।
पंडित किंकर्तव्यविमूढ़ । कट्टरता नस- नस में बसी थी। किसी का छुआ अन्न-जल तक ग्रहण नहीं करते थे। उन्होंने आग्नेय नेत्रों से युवक को घूरा। वह सिहर उठा।
भीड़ दरवाजे पर आ चुकी थी। युवक को उन्होंने भीतर कोठरी में जाने का इशारा किया।
भीड़ में से एक बाहर निकल आया- 'पंडित जी, एक काफिर इधर आया था। हमने उसको इसी दरवाजे में घुसते देखा है। देखिए न, वह अन्दर कोठरी में बैठा है।'
पंडितजी हंसे- 'उसे तुम काफिर कह रहे हो? अरे वह तो मेरा भतीजा सोमदत्त है। आज ही जबलपुर से आया है। बाहर घूमने निकल गया था। वह तुमको मुसलमान समझकर भाग खड़ा हुआ होगा।'
'पंडितजी, आप झूठ बोल रहे हैं।' कई स्वर उभरे 'अगर आप इसके हाथ का पानी पी लें तो हमें यकीन हो जाएगा।'
पंडितजी ऊंची आवाज़ में बोले- 'बेटा सोमदत्त, एक गिलास पानी ले आना।' पानी आ गया। पंडितजी एक ही सांस में गट्गट् पी गए- 'अब तो तुम्हें विश्वास हो गया?'
'हां! हो गया।' और भीड़ लौट गई।
युवक की आंखों में कृतज्ञता तैर रही थी।

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लघु कथाएँ - श्याम सुन्दर अग्रवाल

टूटी ट्रे
कमरे के दरवाजा थोड़ा-सा खुला तो किशोर चंद जी भीतर तक काँप गए। उन्होंने अपनी ओर से बहुत सावधानी बरती थी। सुबह आम दिनों से घंटा भर पहले ही उठ गए थे। टूथब्रश बहुत धीरे-धीरे किया ताकि थोड़ी-सी भी आवाज़ न हो। रसोईघर में चाय बनाते समय भी कोई खड़का न होइस बात का विशेष ध्यान रखा। फिर भी।
सत्तर वर्ष की उम्र में अब इतनी फुर्ती तो थी नहीं कि बहू के देखने से पहलेकिसी तरह ट्रे और चाय के कपों को छिपा लेते।
बहू उनके सामने आ खड़ी हुई थी, 'बाबू जीक्या बात आज दो कप चाय?’
'नहीं बेटीचाय तो एक ही कप बनाई थीउसे ही दो कपों में डाल लिया।‘  गले से डरी हुई- सी आवाज़ निकली।
'और बाबू जीयह टूटी हुई ट्रे! आप इसे बार-बार प्रयोग न करेंइसलिए यह तो मैंने डस्ट-बिन में डाल दी थीवहाँ से भी निकाल ली आपने।
'वो क्या है कि बेटी’  उनसे कुछ कहते नहीं बना। फिर थोड़ा रुक कर बोले, 'मैंने इसे साबुन लगा कर धो लिया था।‘  
अचानक पता नहीं क्या हुआ कि बहू का स्वर कुछ नर्म हो गया, 'बाबू जीइस टूटी हुई ट्रे में क्या खास हैमुझे भी तो पता चले’ 
सिर झुकाए बैठे ही किशोर चंद जी बोले, 'बेटीयह ट्रे तुम्हारी सास को बहुत पसंद थीइसलिए हम सदा इसी ट्रे का प्रयोग करते थे। दोनों शूगर के मरीज थे। पर लाजवंती को फीकी चाय स्वाद नहीं लगती थी। उसकी चाय थोड़ी चीनी वाली होती। इस ट्रे के दोनो तरफ फूल बने हैंएक तरफ बड़ादूसरी ओर छोटा। हममें से चाय कोई भी बनातालाजवंती का कप बड़े फूल की ओर रखा जाता ,ताकि पहचान रहे
'मगर आज ये दो कप?’
'आज हमारी शादी की सालगिरह है बेटी। इस बड़े फूल की ओर रखे आधा कप चाय में चीनी डाल कर लाया हूँ लग रहा था जैसे वह सामने बैठी पूछ रही है 'चाय में चीनी डाल कर लाये हो न?’  कहते हुए किशोर चंद जी का गला भर आया।
थोड़ी देर कमरे में खामोशी छाई  रही। फिर किशोर चंद जी ने चाय के कपों को ट्रे में से उठा कर मेज पर रख दिया। फिर ट्रे उठाकर बहू की ओर बढ़ाते हुए कहा, 'लेबेटीइसे डस्ट-बिन में डाल देटूटी हुई ट्रे घर में अच्छी नहीं लगती।
बहू से ट्रे पकड़ी नहीं गई। उसने ससुर की ओर देखा। वृद्ध आँखों से अश्रु बह रहे थे। 

असली मुज़रिम
देश के सभी समाचार-पत्रों में पुलिस वालों द्वारा निरीह लड़की की बेरहमी से की गई पिटाई की तस्वीरों समेत विस्तृत समाचार छपा था। पुलिस अधिकारियों ने पहले तो ऐसी घटना से इंकार ही कर दियालेकिन जब सभी राष्ट्रीय टी.वी चैनलों पर विडियो-क्लिप के साथ समाचार प्रस्तुत हुआ व बार-बार दोहराया गया तो जवाब देना कठिन हो गया।
बात बड़े अधिकारियों तक पहुँची। आनन-फानन में कुछ पुलिस वालों को सस्पैंड कर दिया गया। मंत्री को प्रेस के सामने आकर घटना पर दु:ख व्यक्त करना पड़ा। उच्चस्तरीय जाँच की बात भी कहनी पड़ी।
वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने ऊपर से मिली लानत को थानेदार तक पहुँचा दिया।
'तुमसे कितनी बार कहा कि ऐसी शर्मनाक स्थिति पैदा न होने दिया करो। मंत्री जी ने आज मुझे क्या-क्या नहीं कहा। सरकार और पुलिस की कितनी बदनामी हुई है।
'सॉरी सर! समझाता तो बहुत हूँपर गुस्से में या फिर किसी खास आदमी के कहने पर कर बैठते हैं सिपाही कुछ गलत।
'मुझे पता है खास हालात में ऐसा हो जाता है। पर कितनी बार कहा है कि कुशल अपराधियों की तरह अपराध का कोई सबूत न छोड़ो। अब ये वीडियो सामने न आया होता तो मुकरना कितना आसान हो जाता। पहले तो मैंने घटना से साफ इंकार कर ही दिया था।
'ऐसी स्थिति के लिए ये वीडियो वाले ही जिम्मेदार हैं सरनहीं तो
'हाँइस असली मुजरिम को ढूँढ़ो और ऐसी सज़ा दो कि आगे से कोई ऐसा करने से पहले सौ बार सोचे।‘  अधिकारी ने दृढ़ता से कहा।
                    
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लघु कथाएँ - कमल चोपड़ा

खेलने के दिन
स्टोर खिलौनों से भर गया था। पत्नी का विचार था कि उन्हें किसी कबाड़ी के हाथों बेच दिया जाए और जगह खाली कर ली जाए, क्योंकि बच्चे बड़े हो गए हैं और अब उन खिलौनों की तरफ देखते भी नहीं थे। कुछ को छोड़कर ज्यादातर खिलौने नए जैसे ही थे। वह झुंझलाकर बोला था 'हर साल बच्चों का बर्थ-डे मनाते रहे और जब ढेर खिलौने आते रहे, तब भी दूसरों के बर्थ-डे पर बाजार से खरीद खरीदकर नए देते रहे....ढेर तो लगना ही था। कबाड़ी क्या देगा....सौ-पचास?'
बाबूजी ने सुझाया 'जो हुआ, सो हुआ। हमारे बच्चों का बचपन खिलौनों में बीता बस, यही संतोष की बात है। अब यह है कि अगर कहो, तो मैं ये खिलौने ले जाकर किन्हीं गरीब बच्चों में बांट आऊं? और कुछ नहीं, तो एक नेक काम ही सही....।'
वे कुछ नहीं बोल पाए थे। बाबूजी इसे दोनों की सहमति समझकर सभी खिलौने लेकर चल दिए।
बड़े उत्साह के साथ वे इंडस्ट्री एरिया के पीछे बनी झुग्गियों की ओर चल दिए। कितने खुश होंगे वे बच्चे इन खिलौनों को पाकर। रोटी तो जैसे-तैसे वे बच्चे खा ही लेते हैं। तन ढंकने के लिए कपड़े भी मांग तांगकर पहन ही लेते हैं, पर खिलौने उन बेचारों के नसीब में कहां? उनके चेहरे खिल उठेंगे, आंखें चमक जाएंगी खिलौने देखकर....उन्हें खुश होता देखकर मुझे कितनी खुशी होगी। इससे बड़ा काम तो कोई हो ही नहीं सकता...।
झुग्गियों के पास पहुंचकर उन्होंने देखा मैले फटे कपड़े पहने दो बच्चे सामने से चले आ रहे हैं। उन्हें पास बुलाकर उन्होंने कहा 'बच्चो, ये खिलौने मैं तुम लोगों के बीच बांटना चाहता हूं.....इनमें से तुम्हें जो पसंद हो, एक-एक खिलौना तुम ले लो.....बिल्कुल मुफ्त...।'
हैरान होकर बच्चों ने उनकी ओर देखा, फिर एक-दूसरे की तरफ देखा, फिर अथाह खुशी भरकर खिलौनों को उलट-पुलटकर देखने लगे। उन्हें खुश होता देखकर बाबूजी की खुशी का ठिकाना न रहा। कुछ ही क्षणों में बाबूजी ने देखा- दोनों बच्चे कुछ सोच में पड़ गए। उनके चेहरे बुझते से चले गए।
'क्या हुआ?' एक बच्चे ने खिलौने को वापस उनके झोले में डालते हुए कहा 'मैं नहीं ले सकता। मैं इसे घर ले जाऊंगा, तो मां-बाप समझेंगे कि मैने मालिक से ओवरटाइम के पैसे उन्हें बिना बताए ले लिये होंगे और उनका खिलौना ले आया होऊंगा... वे नहीं मानेंगे कि किसी ने मुफ्त में दिया होगा। शक में मेरी तो पिटाई हो जाएगी।'
दूसरा बच्चा खिलौनों से हाथ खींचता हुआ बोला, 'बाबूजी, खिलौने लेकर करेंगे क्या? मैं फैक्टरी में काम करता हूं। वहीं पर रहता हूं। सुबह मुंहअंधेरे से देर रात तक काम करता हूं। किस वक्त खेलूंगा? आप ये खिलौने किसी 'बच्चे' को दे देना।'

अनर्थ
चीख बहुत दूर- दूर तक सुनी थी लोगों ने। चीखने के बाद तिवारी जी बाकायदा चिल्लाने लगे थे अनर्थ....घोर अनर्थ.....महापाप...महापाप।
कुछ ही क्षणों में आ जुटी भीड़ को वहां ऐसा हौलनाक सा कुछ भी घटित हुआ नहीं दिख रहा था। क्या हुआ? हुआ क्या है?
कांपती काया और सूखते गले से बमुश्किल बोल पाए वह- यहां सामने की दुकान वाले ने भगवान जी की मूर्ति बीच सड़क पर दे मारी। टुकड़े-टुकड़े हुए पड़े हैं भगवान जी..... देखो।
फटे पुराने कैलेण्डर और कागज वगैरह को झाड़ू से बाहर करता हुआ सामने वाली दुकान का मालिक दुकान के बाहर लोगों को जुटा देखकर सहम गया था। पहले इस दुकान का मालिक कोई हिन्दू था जो दो दिन पहले अपनी दुकान दूसरे धर्म के इस दुकानदार को बेच गया था। नया दुकानदार आज आकर इसकी साफ सफाई कर रहा था।
फिर चीखे तिवारी जी वो देखो भगवान जी के कैलेंडर को झाड़ू मार रहा है ये विधर्मी..... इधर भगवान जी के टुकड़े पैरों के नीचे आने लगे हैं..... डरे सहमे दुकानदार ने कहा माफ कीजिये माफ कीजिए ... पैरों के नीचे कुछ नहीं आएगा.... मैं इस कचरे को इक_ा करके अग्नि के सुपुर्द कर दूंगा...
भगवान जी को कूड़ा कह रहा है? मारो साले को..... लोगों का गुस्सा दुकानदार पर उतरने लगा। लहुलुहान दुकानदार सड़क पर बिछा दिया गया। उसका लहू भगवान जी के टुकड़ों को भिगाने लगा था। उसकी दुकान को अग्नि के सुपुर्द कर दिया गया। आग फैलती जा रही थी। मामला धर्म का था। शटर गिरने लगे। भगदड़ मच गई।
दूसरे धर्म वालों के हत्थे न चढ़ जाए, सोचकर तिवारी जी भी उल्टे पांव घर की ओर दौड़ पड़े। पकड़ो मारो का शोरगुल और धर्म के जयकारे और शोरगुल उनका पीछा कर रहा था।
दूसरे धर्म वालों के नारे की आवाजें नजदीक आती लगी तो तिवारी जी और तेज दौडऩे लगे। टूटी हुई चप्पलें दौडऩे में रूकावट डालने लगीं तो उन्होंने चप्पल उतारकर फेंक दी और पूरा दम लगाकर नंगे पैर दौडऩे लगे।
अचानक उनके नंगे पैर में कोई चीज चुभी। तब तक वे घर के नजदीक पहुंच चुके थे। दर्द से बिलबिला उठे वे। झुककर उन्होंने वह चीज उठाई। किसी का गले में लटकने वाला बड़ा सा लॉकेट था जिस पर भगवान जी की तस्वीर थी। एक हाथ से उन्होंने अपने पैर को सहलाया। दूसरे हाथ से भगवान जी के चित्र वाला लॉकेट सड़क पर दे मारा। लॉकेट लुढ़कता हुआ नाली में जा गिरा। इस बार तिवारी जी की चीखें नहीं निकली।

सम्पर्क- 1600/114, त्रिनगर, दिल्ली- 110035, फोन- 011-27381899

लघुकथाएँ डॉ. पूरन सिंह

बेढिय़ाँ
बहुत छोटा था देवेश तब। तभी एक दिन रामबाबू बाज़ार से उसके नन्हें -नन्हें पाँव के लिए छोटी-छोटी पायलों की तरह के कड़े ले आए थे जिनमें घुंघुरू लगे थे और अपने बेटे देवेश के दोनों पांव में पहना दिए थे । देवेश जैसे ही पैर जमीन पर रखतारून झुन- रून झुन  की आवाजें होती तो फिर वह अगले पैर और जल्दी जल्दी रखने लगता था। खुश हो जाते थे रामबाबू। कभी - कभी तो इतने खुश होते कि बुलाने लगते अपनी पत्नी रामसुती को, ‘ अरे देखो तो रामादेबू कैसे जल्दी - जल्दी चल रहा है। .....अरे आओ भईतुम भी चलाओ इसे।’ और रामसुती उन्हें अपलक देखती रहतीसोचती मानो उन्हें पूरी दुनियाँ की दौलत मिल गई हो ।
 धीरे-धीरे देवेश बड़ा होने लगा। रामबाबू ने उसे पढ़ायालिखाया और आज देवेश ओ एन जी सी में सीनियर सांइटिस्ट है। हालांकि देवेश को यहाँ तक लाने में रमाबाबू की ग्यारह बीघा जमीन स्वाहा हो गई थी फिर भी उन्हें संतोष था कि बेटा बड़ा आदमी बन गया। 
देवेश की नौकरी लगने के ठीक एक माह बाद रामसुती अपने पति को छोड़कर दूसरी दुनियाँ में चली गई थी। दु:ख-सुख में बराबर साथ देने वाली अपनी पत्नी के बिछोह को सहन न कर सके थे रामबाबू और चारपाई पकड़ ली थी । कई बार तो उठकर चौंक पड़ते थे, ‘ रामा आ गई तुम।’ फिर चारों तरफ देखते कहीं बेटाबहू सुन न रहे हों । और जब यह विश्वास हो जाता कि बेटा बहू ने सुना नहीं है तो अपने ही आपसे कहने लगते,  ‘तुम नहीं आओगी न तो मुझे ही बुला लो अपने पास...बुला लो न....।’ लगता मानो कोई अबोध बालक चिज्जी माँगने की जिद कर रहा हो ।
 लेकिन रामसुती ने उन्हें अपने पास नहीं बुलाया । स्थिति यह हो गई कि रामबाबू को अपने शरीर का कोई ध्यान नहीं रहता था। कई बार तो हालत यह हो जाती कि टट्टी-पेशाब की भी सुध नहीं रहती ।
  एक दिन खाने पर बुलाया था देवेश ने मुझे । पूरी कोठी दिखाई थी अपनी लेकिन पीछे की तरफ वह नहीं ले गया था । मुझे वहाँ से कुछ आवाज सी सुनाई दी थी और आवाज के साथ-साथ दुर्गंध भी लगी थी । मैं उधर जाने को हुआ तो रोकने लगा था देवेश मुझे। तब तक तो मैं पहुंच गया था वहाँ।
 मैंने देखा थाएक टूटी चारपाई पर एक बुजुर्ग लेटे थे। जगह -जगह टट्टी पड़ी हुई थी और मैंने देखा था कि उन बुजुर्ग का एक पैर एक बड़ी सी जंजीर से चारपाई के पाए के साथ बांध दिया गया था मानो किसी को बेडिय़ाँ पहना दी गई हों । उन्होंने मुझे बेबस निगाहों से देखा था और अनायास ही उनके होठों से बेटा निकल गया था।
  मैंने देवेश की ओर घृणा से देखा तो वह बेशर्मों की तरह बोला था, ‘ डैडी.....डैडी हैं मेरेयू नोपूरे घर में इधर उधर घूमते हैं। टट्टी पेशाब भी कहीं भी....। विनीतामाई वाइफ फील्स.....यू नोआई थिंक दिस इज द प्रोपर वे ।
'नो.....दिस इज नॉट द प्रोपर वे....यू.....यू.... लर्न..... यू विल आलसो बी कम आन दिस स्टेज ....लर्न ......ही इज डैडी नॉट एन एनीमल।’ और इतना कहने के बाद मैं वहाँ से  बाँधकर भागा था तो अपने घर पर ही साँस ली थी।
 भ्रम    
 सुमित्रा के तीन बेटे हैं और तीनों को उसके पति ने खूब पढ़ाया लिखाया। आज तीनों ही नौकरी करते हैं। तीनों की शादी भी सुमित्रा के पति ने कर दी थी। वे सेवा में थे तभी।
  सुमित्रा के पति समय से सेवा निवृत्त हुए और अपनी सेवा निवृत्ति के दो ढाई वर्ष के बाद ही भगवान को प्यारे हो गए। पति की मृत्यु के दुख और उनके वियोग में सुमित्रा बीमार रहने लगी तो सबसे पहली समस्या आई कि आखिर सुमित्रा को कौन रखे। जो बच्चे जब सुमित्रा ठीक थी और उसका पति कमाकर लाता था तब 'मम्मी-मम्मीकी रट लगाए रहते थे आज उन्हें रखने के लिए 'मुडफुटौव्वरकरने पर उतर आए थे ।
'मम्मी को मझले वाला रखे मेरे पास पहले से ही बहुत जिम्मेदारियाँ है।बड़े वाले का तर्क बिच्छू के डंक के मानिंद खड़ा रहता।  मैं क्यों रखूँछोटे वाला रखे । मम्मी ने सारी चीज - गहने उसी की बहू के पास रखे हैं। वही कराए इलाज मम्मी का।मँझले वाला अपनी नौकरी पेशा पत्नी के सुर में सुर मिलाते हुए रेंकता ।
 'मैंमैं क्यों रखूँ ,मम्मी को। मैं तो सबसे छोटा हूँ । बड़े भइया को रखना चाहिए। बड़े भइया के पास ही तो पूरे घर की मालिकी है... ना बाबा ना...मैं.. मैं तो मम्मी को किसी कोस्ट (कीमत) पर नहीं रखने वाला।अपनी पत्नी के घूँघट में मुँह छिपाकर छोटे वाला मिमियाता।
सुमित्रा की स्थिति दिनों- दिन खराब होती जा रही थी। तभी पड़ौस के देवी चाचा ने सुमित्रा को सरकारी अस्पताल में भर्ती करवा दिया था । ज्यों-ज्यों सुमित्रा का इलाज चलता त्यों-त्यों उसकी तबियत और ज्यादा बिगड़ती जाती थी। हार-थककर एक दिन डॉक्टरों ने अपना निणर्य सुना दिया था हम चाहते हैं माँ जी कि आप अपने घर जाएँ और अपने अपनों के बीच ही रहें।
 डॉक्टरों की बात सुनकर सुमित्रा के होंठ कँपकपाए थे, ' बेटाअगर आप मेरे बेटा - बहुओं को मेरा अपना कहते हो तो मुझे इतना बता दो यदि वे मेरे अपने हैं तो फिर बेगाने कौन होते हैं।....बेटा...मेरे बच्चों....मैं घर नहीं जाऊंगी .....मैं इसी अस्पताल में ही मरना चाहती हूँ। कम से कम यहाँ कोई भ्रम तो नहीं है कि यहाँ कोई मे.....रा....अ....प.....ना ।और इतना कहने के ठीक दो घड़ी के बाद ही सुमित्रा अपनी अंतिम यात्रा पर निकल पड़ी थी ।

सम्पर्क: 240 बाबा फरीद पूरी,  वेस्ट पटेल नगर, 
न्यू दिल्ली 110008
मो. 09868846388, drpuransingh64@gmail.com

लघुकथाएँ - डॉ. श्याम सुन्दर 'दीप्ति'

 सच झूठ
सुरेन्द्र सर्वेक्षण में लगी अपनी ड्यूटी करता हुआ, एक घर से दूसरे घर जा रहा था।
एक घर में उसे दो सदस्य मिले, बाप- बेटा।
उसने एक फार्म निकाला और अपने ढंग से भरने लगा। घर के मुखिया का नाम, पता, काम लिखने के बाद, पूछना शुरू किया-
'आटा कितना लग जाता होगा?'
'जितना मर्जी लिख लो जनाब ! '
'फिर भी, बीस- पच्चीस किलो तो लग ही जाता होगा?'
'हां जी।'
'दालें कितनी खा लेते हो? '
'आप समझदार हो, लिख लो खुद ही।'
'पांच- छह किलो तो खा लेते होंगे? '
'क्यों नहीं, क्यूं नहीं।'
'घी? '
'खाते हैं जी।'
'वह तो परमात्मा की कृपा से खाते ही होंगे। कितना शुद्ध और दूसरा कितना? '
'देसी घी? वह तो आपने याद दिला दिया। दिल तो बहुत करता है।' उसके चेहरे पर जरा- सी उदासी आ गई।
'मीट- अण्डों का सेवन?'
'परमात्मा का नाम लेते हैं जी, पर जी में बहुत आता है।' कहते हुए उसने एक गहरी सांस ली।
इसी तरह दो सौ साठ प्रश्नों वाला फार्म, सुरेन्द्र ने एक- एक करके भरा। पूरी बात हो जाने पर, सुरेन्द्र ने फार्म से अंदाजा लगाया और पूछा, 'बाकी तो सब ठीक है, पर जो आपने बताया है, उससे अनुमान होता है कि आप कुछ ज्यादा नहीं बता पाए।'
इस बार बेटे ने जवाब दिया, 'दरअसल सही बात बताएं, हम घर में रोटी बनाते ही नहीं। हम बाप- बेटे दो आदमी यहां रहते हैं। बाकी तो गांव में हैं। हमने एक होटल वाले से बात तय कर रखी है। दाल- रोटी सुबह, यूं ही शाम को।'
सुरेन्द्र दोनों की तरफ टिकटिकी बांधे देखता रहा घंटा पौन लगाया फार्म भरने में और निकला..
'भई! ये क्या किया आपने?'
'किया क्या बेटा ! पहले तो मुझे लगा कि मैं यह क्या बता रहा हूं। फिर ज्यों- ज्यों तू पूछता रहा, मेरा मन किया कि तुझसे बातें जरूर करूं।'
'पर आपने झूठ क्यों बो?'
'झूठ कहां बोला बेटा। यह तो सब सच है। झूठ तो बेटा यह है जो हम अब गुजर कर रहे हैं।'
हद
एक अदालत में मुकदमा पेश हुआ।
'साहब, यह पाकिस्तानी है। हमारे देश में हद पार करता हुआ पकड़ा गया है।'
तू इस बारे में कुछ कहना चाहता है ? मजिस्ट्रेट ने पूछा।
मुझे क्या कहना है, सरकार! मैं खेतों में पानी लगाकर बैठा था। हीर के सुरीले बोल मेरे कानों में पड़े। मैं उन्हीं बोलों को सुनता चला आया। मुझे तो कोई हद नजर नहीं आई।

सम्पर्क: 97, गुरु नानक एवेन्यू, मजीठा रोड,अमृतसर (पंजाब)-143004, मो. 09815808506 . ईमेल: drdeeptiss@yahoo.co.in

लघुकथा - अखिल रायजादा

पहला संगीत

रोज की तरह एक गर्मबेवजह उमस भरा दिन। पसीने में नहातेकिसी तरह साँस लेते यात्रियों को समेटे लोकल ट्रेन पूरी रफ्तार से चली जा रही थी। यात्रियों की इस भीड़ में मैं भी अपना नया खरीदा गिटार टाँगे खड़ा था। इस हालत में स्वयं और नए गिटार को सम्हालने में बड़ी परेशानी हो रही थी।
सौभाग्यवश दो स्टेशनों के बाद बैठने की जगह मिली। लोकल के शोर में एक सुर सुनाई पड़ा, 'जो दे उसका भलाजो न दे उसका भी भला... एक लंगड़ा भिखारी भीख माँगते निकला फिर दो बच्चे भीख माँगते निकलेफिर एक औरत खीरा बेचती आई। एक चायवाला और उसके पीछे गुटकातम्बाखूपाउच वाले चिल्लाते निकले। किनारे की सीट पर साथ बैठे परेशान सज्जन बड़े ध्यान से इन्हें देख रहे थेबोल पड़े- 'इतनी भीड़ में भी इन फेरी वालोंभिखारियों को जगह मिल ही जाती है। अभी मेरे ऊपर गर्म चाय गिरते-गिरते बची है। आजकल तो छोटे-छोटे बच्चे भी भीख माँग रहे है।
तभी एक लड़की छोटे से लड़के को गोद में उठाए भीख माँगते गुजरी। उनके कटे-फटे कपड़े उनका परिचय करा रहे थे। दूसरे सहयात्री ने कहा- 'ये देखिए भावी भिखारी। पता नहीं इनके माँ-बाप पैदा क्यों करते हैं? '
विगत छह माह से मैं भी इस रूट पर चल रहा हूँ परन्तु मैंने इन बच्चों को पहले भीख माँगते कभी नहीं देखा था। पहले सहयात्री ने कहा- 'अरे परसो जिस भिखारिन की ट्रेन से कटकर मौत हुई थी ये उसी के बच्चे है! '
अब छोटे बच्चों के भीख माँगने के कारण ने अजीब सी खामोशी की शक्ल ले ली। सभी फेरीवालोंभिखारियों की तरह उस लड़की ने भी बच्चे को गोद में उठाए कई चक्कर लगाए। मैंने ध्यान दिया उसकी नजरें मुझ पर रुकती थी। ट्रेन चली जा रही थीलोकल का अंतिम पड़ाव और मेरा गंतव्य आने में अब कुछ ही समय बचा था। 
बिखरे बाल और उदास चेहरा ओढ़ेफटी हुई किसी स्कूल की ड्रेस में बच्चा गोद में उठाए वो लड़की अब मेरे ठीक सामने थी। मैंने पाया कि इस बार वो ना केवल मेरी ओर देख रही थी बल्कि उसने अपना हाथ भी आगे बढ़ा रखा था। मुझे अपनी ओर देखते वो बोली- 'आज मेरे भाई का जन्मदिन है।अमूमन मेरी जेब में चाकलेट पड़ी रहती है। मैंने गोद में रखा गिटार किनारे रख कर जेब टटोली दो चाकलेट निकाल कर उसे दी। छोटा बच्चा किलकारी मारता उन पर झपटापरन्तु बच्ची की उँगली फिर भी मेरी तरफ थी। अब तक इस अजीब सी स्थिति ने सभी यात्रियों का ध्यानाकर्षण कर लिया था। कुछ उन्हें गालियाँ देकर वहाँ से जाने को कहने लगे।
इसके पहले कि मैं कुछ समझूँ उसने कहा- 'आज मेरे भाई का जन्मदिन है... मैं प्रश्नवाचक चिह्न-सा उसे ताक रहा था। वह लड़की फिर बोली- 'आज मेरे भाई का जन्मदिन है। हैप्पी बर्थ डे बजा दो ना... लोकल अपनी रोज की रफ्तार में थी। मैंने केस से अपना नया गिटार बाहर निकाला और हैप्पी बर्थ डे टू यू बजाने लगा। छोटा बच्चा गोद से उतर कर नाचने लगा। सहयात्री आश्चर्य में थे। लड़की की आँखों में अद्भूत चमक थी। 'हैप्पी बर्थ डे टू यू बजाते पहली बार मेरी आँखें नम थी।
सम्पर्क: 20/265, रामनगरडबरीपारासिम्स के पासबिलासपुर 495001 (छ.ग.), Email: akhil.royzada@gmail.com

लघु कथाएँ - प्रेम गुप्ता 'मानी’

माँ

रात का गहरा काला अँधेरा आकाश से उतर कर पूरी तरह नीचे आ गया थापर तेज रफ्तार से अपने गंतव्य की ओर जा रही ट्रेन के यात्री थे कि चारों ओर से बेखबर हो सुख की नींद ले रहे थे।
अचानक 'धाप’ की आवाज हुई तो सब हड़बड़ा कर उठ बैठे। आसपास आँखें फाड़ कर देखाआवाज कहाँ से आईकोई चोर-डकैत तो नहीं आ गयाआशंका से सारी बत्तियाँ जल गई तो सभी की आँखें भी जैसे गुस्से से जल उठी।
ऊपर की बर्थ से एक नन्हा-सा बच्चा पता नहीं कैसे नींद के झोंके में नीचे गिर गया था। उसका कोमल शरीर फर्श से टकरायातभी 'धाप’ की आवाज हुई थी। पता नहीं चोट लगने से या सदमे से बच्चा एकदम शान्त हो गया था पर नीचे चारों ओर शोर मच गया था, 'अरे देखोमर तो नहीं गया?’
'अरेकैसी बेवकूफ औरत है...बच्चे को पीछे सुलाना चाहिए और यह है कि...
'गँवार औरत... पालना नहीं आता था तो पैदा क्यों कर लिया?’
'क्यों री करमजली....बेहोशी में थी क्या....नन्हें को कुछ हो गया तो यहीं चीर कर फेंक दूँगा।
चारों तरफ शोर का एक अजीब से गुबार उठ रहा था पर ऊपर की बर्थ पर अवाक्गुमसुम सी बैठी बेहद कालीपर मासूम-सी चेहरे वाली षोडशी अपनी गँवई कुर्ती को बार-बार उठा कर बच्चे का सिर सहलाती हुई उसे दूध पिलाने की कोशिश में जुटी थी। इसी कोशिश में दूध की हल्की-सी धार फूटी तो बच्चा कुनमुनाया।
बच्चे की कुनमुनाहट के साथ माँ भी कुनमुनाई,’ मेरो लाल जि़न्दो है...।
थोड़ी देर बाद बच्चा छाती से लग कर दूध पीने लगा तो सबकी नजर बचा कर उसने अपनी गीली आँखें पोंछ लीं.....।


तोहफा

नींद की खुमारी में वह पूरी तरह डूबता कि तभी बगल में लेटी पत्नी ने उसे हल्का सा झिंझोड़ दिया- सुनोतुम्हें पता हैकल कौन सा दिन है?
ऊहँ... जो भी दिन होगाअच्छा ही होगापर इस समय तो सोने दो....।
ऊहूँ... मुँह इधर करो न...अभी तो ग्यारह ही बजे हैं और तुम हो कि...। पत्नी ने जबर्दस्ती उसे अपनी ओर खींचा तो न चाहते हुए भी उसे अपनी नींद से बोझिल पलकों को खोलना ही पड़ाअच्छा बाबा बताओ....क्या है कल....?
कल...कल नए साल का पहला दिन है न....।
हाँ है तो..... वह तो हर साल होता है....इसमें नई बात क्या है....खामख्वाह नींद खराब कर दी....। उसके चेहरे पर हल्का क्रोध उगा कि तभी पत्नी ने उसके खुरदरे गाल को चुम्बित कर दियाइस बार नए साल पर तुमसे एक तोहफा चाहती हूँ.. .बोलो दोगे...?
पत्नी के चेहरे पर जब उसने प्यार का भरपूर सूरज उगे देखा तो फिर अपने को भी रोक नहीं पाया और पत्नी को आलिंगन में जकड़ लिया- बोलोक्या चाहिए तुम्हें....?
बस यही कि सुबह खिले हुए मिलो...। सुना है नए साल की शुरुआत जैसी होती हैवैसा ही पूरा साल गुजरता है....। मैं चाहती हूँ कि पिछली बार की तरह इस बार सुबह उठते ही तुम मुझसे लड़ो नहीं...। हर बार किसी न किसी बात पर लडऩे की शुरुआत कर ही देते हो....।
मुझे लडऩे का शौक चर्राया है....उसकी जकड़ अपने आप ढीली पड़ी तो पत्नी कसमसा उठीनहीं...शौक तो मुझे है।
जब देखो तब चिड़चिड़ा उठते हो.....। अब मैं तुम्हारी कोई बँदी तो हूँ नहीं जो हर वक्त चाकरी में जुटी रहूँ...।
नहीं जनाब....नौकर तो मैं तुम्हारा हूँजो कहती होहाजिर कर देता हूँ...। वह ताव में उठ कर बैठ गया तो पत्नी भी उठ बैठी।
देखोआधी रात के समय लड़ाई मत शुरू करो....। क्या मैं जानती नहीं कि क्या हो तुम....?
जानती हो तो क्या कर लोगी तुमबड़ी आई नए साल का तोहफा लेने वाली...। इन दस सालों में बड़ा जी खुश कर दिया है न जो तुम्हें तोहफों से लाद दूँ.....?
हाँ- हाँ....सुबह जाती हो तो अभी चली जाओपर मेरा दिमाग मत खाओ...। पता नहीं अनजाने ही वह कैसे चीख पड़ा तो पत्नी सिसकियाँ भरने लगी।
रात के बारह बज चुके थे। पास ही कहीं नए साल के आगमन पर खुशियों का उजाला फैला था और संगीत की चहकन से पूरा वातावरण गुंजित हो रहा था पर अंदर उनके कमरे में गहरे अँधेरे का तोहफा उनको मुँह चिढ़ा रहा था...।

संपर्क: एम.आई.जी-292, कैलाश विहारआवास विकास योजना संख्या-एककल्याणपुरकानपुर-208017 (उप्र) E-mail- premgupta.mani.knpr@gmail.com

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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