February 10, 2015

लघु कथाएँ - श्याम सुन्दर अग्रवाल

टूटी ट्रे
कमरे के दरवाजा थोड़ा-सा खुला तो किशोर चंद जी भीतर तक काँप गए। उन्होंने अपनी ओर से बहुत सावधानी बरती थी। सुबह आम दिनों से घंटा भर पहले ही उठ गए थे। टूथब्रश बहुत धीरे-धीरे किया ताकि थोड़ी-सी भी आवाज़ न हो। रसोईघर में चाय बनाते समय भी कोई खड़का न होइस बात का विशेष ध्यान रखा। फिर भी।
सत्तर वर्ष की उम्र में अब इतनी फुर्ती तो थी नहीं कि बहू के देखने से पहलेकिसी तरह ट्रे और चाय के कपों को छिपा लेते।
बहू उनके सामने आ खड़ी हुई थी, 'बाबू जीक्या बात आज दो कप चाय?’
'नहीं बेटीचाय तो एक ही कप बनाई थीउसे ही दो कपों में डाल लिया।‘  गले से डरी हुई- सी आवाज़ निकली।
'और बाबू जीयह टूटी हुई ट्रे! आप इसे बार-बार प्रयोग न करेंइसलिए यह तो मैंने डस्ट-बिन में डाल दी थीवहाँ से भी निकाल ली आपने।
'वो क्या है कि बेटी’  उनसे कुछ कहते नहीं बना। फिर थोड़ा रुक कर बोले, 'मैंने इसे साबुन लगा कर धो लिया था।‘  
अचानक पता नहीं क्या हुआ कि बहू का स्वर कुछ नर्म हो गया, 'बाबू जीइस टूटी हुई ट्रे में क्या खास हैमुझे भी तो पता चले’ 
सिर झुकाए बैठे ही किशोर चंद जी बोले, 'बेटीयह ट्रे तुम्हारी सास को बहुत पसंद थीइसलिए हम सदा इसी ट्रे का प्रयोग करते थे। दोनों शूगर के मरीज थे। पर लाजवंती को फीकी चाय स्वाद नहीं लगती थी। उसकी चाय थोड़ी चीनी वाली होती। इस ट्रे के दोनो तरफ फूल बने हैंएक तरफ बड़ादूसरी ओर छोटा। हममें से चाय कोई भी बनातालाजवंती का कप बड़े फूल की ओर रखा जाता ,ताकि पहचान रहे
'मगर आज ये दो कप?’
'आज हमारी शादी की सालगिरह है बेटी। इस बड़े फूल की ओर रखे आधा कप चाय में चीनी डाल कर लाया हूँ लग रहा था जैसे वह सामने बैठी पूछ रही है 'चाय में चीनी डाल कर लाये हो न?’  कहते हुए किशोर चंद जी का गला भर आया।
थोड़ी देर कमरे में खामोशी छाई  रही। फिर किशोर चंद जी ने चाय के कपों को ट्रे में से उठा कर मेज पर रख दिया। फिर ट्रे उठाकर बहू की ओर बढ़ाते हुए कहा, 'लेबेटीइसे डस्ट-बिन में डाल देटूटी हुई ट्रे घर में अच्छी नहीं लगती।
बहू से ट्रे पकड़ी नहीं गई। उसने ससुर की ओर देखा। वृद्ध आँखों से अश्रु बह रहे थे। 

असली मुज़रिम
देश के सभी समाचार-पत्रों में पुलिस वालों द्वारा निरीह लड़की की बेरहमी से की गई पिटाई की तस्वीरों समेत विस्तृत समाचार छपा था। पुलिस अधिकारियों ने पहले तो ऐसी घटना से इंकार ही कर दियालेकिन जब सभी राष्ट्रीय टी.वी चैनलों पर विडियो-क्लिप के साथ समाचार प्रस्तुत हुआ व बार-बार दोहराया गया तो जवाब देना कठिन हो गया।
बात बड़े अधिकारियों तक पहुँची। आनन-फानन में कुछ पुलिस वालों को सस्पैंड कर दिया गया। मंत्री को प्रेस के सामने आकर घटना पर दु:ख व्यक्त करना पड़ा। उच्चस्तरीय जाँच की बात भी कहनी पड़ी।
वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने ऊपर से मिली लानत को थानेदार तक पहुँचा दिया।
'तुमसे कितनी बार कहा कि ऐसी शर्मनाक स्थिति पैदा न होने दिया करो। मंत्री जी ने आज मुझे क्या-क्या नहीं कहा। सरकार और पुलिस की कितनी बदनामी हुई है।
'सॉरी सर! समझाता तो बहुत हूँपर गुस्से में या फिर किसी खास आदमी के कहने पर कर बैठते हैं सिपाही कुछ गलत।
'मुझे पता है खास हालात में ऐसा हो जाता है। पर कितनी बार कहा है कि कुशल अपराधियों की तरह अपराध का कोई सबूत न छोड़ो। अब ये वीडियो सामने न आया होता तो मुकरना कितना आसान हो जाता। पहले तो मैंने घटना से साफ इंकार कर ही दिया था।
'ऐसी स्थिति के लिए ये वीडियो वाले ही जिम्मेदार हैं सरनहीं तो
'हाँइस असली मुजरिम को ढूँढ़ो और ऐसी सज़ा दो कि आगे से कोई ऐसा करने से पहले सौ बार सोचे।‘  अधिकारी ने दृढ़ता से कहा।
                    
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