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Jul 1, 2022

यादें- जीवन के सफर में राही मिलते हैं बिछड़ जाने को...

 - वीणा विज ‘उदित’

तन्हाई का मंजर हो और पुराने फिल्मी गीत पार्श्व में बज रहे हों, तो अतीत के गवाक्ष या झरोखे खुलने लग जाते हैं और मन की गहराइयों से कई तस्वीरें उतरकर सामने मुँह निकालकर आपको उसी दौर में बुलाने लगती हैं । मंत्रमुग्ध से खिंचे चले जाते हैं उस दौर के दीवाने हम जैसे...!

नजर लागी राजा तोरे बंगले पर

जो मैं होती राजा तुम्हरी दुल्हनिया

मटक रहती राजा तोरे बंगले पर’.....

किशोरी बाई का किरदार निभाती नलिनी जयवंत नवकेतन फिल्म्स की ‘काला पानी’ फिल्म में मटकती हुई आज भी आँख के समक्ष आ जाती है। पुराने जमाने में हर कामयाब हीरोइन एक बार कोठे वाली का रोल अवश्य करती थी, तभी वह उच्च कोटि की सफल अभिनेत्री मानी जाती थी। देवानंद और मधुबाला की रोमांटिक जोड़ी के साथ नलिनी जयवंत कोठेवाली बनी थी। इस फिल्म में नलिनी जयवंत को फिल्म फेयर का बेस्ट स्पोर्टिंग एक्ट्रेस का अवार्ड मिला था। नरगिस, बीना राय, मीना कुमारी, मधुबाला, रेखा, ऐश्वर्या सभी ने कोठे वालियों के मशहूर रोल निभाए हैं अपने जीवन में। 1958 में यह फिल्म रिलीज हुई थी और हिट साबित हुई थी।

 इससे 2 साल पहले देवानंद और नलिनी जयवंत की रोमांटिक फिल्म ‘मुनीमजी’ देखी थी ।

हम जवाँ होती लड़कियों के बदन में हार्मोनल बदलाव आ रहे थे, तो स्वाभाविक है- रोमांटिक मूवी से अधिक ही रोमांचित और प्रभावित हो रही थीं हम सब! हमारे स्कूल की दसवीं की एक मॉडर्न सिंधी छात्रा राधा लालवानी ने  तो  लगातार 9 दिन पिक्चर हॉल में जाकर यह फिल्म देखी थी! छोटा शहर था यह बात बहुत फैल गई थी। सबकी जुबान पर उसका चर्चा था। मुझे याद है हमारे ग्रुप ने भी राधा के कारण ‘मुनीमजी’ देखी और मन ही मन उसे धन्यवाद देते हुए, बहुत पसंद की थी।

उसी वर्ष मैं नौवीं कक्षा में पढ़ती थी। हमारे स्कूल की ओर से पहली बार तब इंदौर में ए.सी.सी. का सोशल सर्विस कैंप लगने जा रहा था। कुल पंद्रह लड़कियाँ ,कटनी से इंदौर एक हफ्ते के कैंप के लिए चुनी गईं थीं और साथ में मिस शाह( क्रिश्चियन) टीचर जा रही थीं। एक हफ्ते के टूर का सारा इंतजाम इंदौर की कोई संस्था कर रही थी। बहुत उत्साह और रोमांच था हवाओं में! खुशी के मारे जमीन पर पैर नहीं पड़ रहे थे हम सहेलियों के । यह सोचकर कि हम दिन-रात इकट्ठे रहेंगी! क्योंकि उस जमाने की बंदिशों के मुताबिक हम सपने में भी ऐसी बातें नहीं सोच सकते थे।

 खैर, निश्चित दिन कटनी से सुबह रेलगाड़ी में जनाना डब्बे में हमें प्रिंसिपल मिसेज कुक ने बिठाकर विदा किया। उस जमाने में औरतों के लिए जनाना डब्बे होते थे। जबलपुर से होते हुए हम जब तक खंडवा पहुँचे तब तक सूर्य सिर पर था और धूप आसमान पर तेजी बिखेर रही थी। खंडवा में 10 मिनट का स्टापेज था..,,,, उसके बाद इंदौर के लिए 5 घंटे का सफर अभी बाकी था। 10 मिनट के बाद, जैसे ही गाड़ी चलने लगती,  चक्के की चरमराहट की आवाज रेल की पटरियों पर अभी आरंभ ही होती कि फिर रुक जाती !  ऐसा बार - बार हो रहा था।  हम सब साथ में खिड़की से मुँह निकालकर बाहर झाँकने लगीं;  क्योंकि यह लकीर से हटकर रवैया हो रहा था । उन दिनों खिड़कियों पर लोहे की छड़ें नहीं होती थीं। खिड़की बंद करने के लिए धड़ाम से कपाट नीचे गिरता था, जिसमें उँगली या हाथ आने का डर बना रहता था। उसमें लगे लकड़ी के हैंडल से खींचकर उसे ऊपर टिकाना पड़ता था। और कोयले का ईंधन इंजन में जला करता था, जिससे मुँह बाहर निकालते ही इंजन से निकलते धुँए में कोयले के कण से आँख में किरकिरी हो जाती थी। खैर ,हमने बाहर देखा तो हैरान रह गए यह देखकर कि वहाँ सैकड़ों लोग खड़े थे, स्टेशन पर और रेलगाड़ी के आसपास। बहुत से लोग इंजन को आगे बढ़ने से रोकने के लिए रेल की पटरियों पर बिछे जा रहे थे।

 हम सब सहेलियाँ तरह-तरह की अटकलें लगा रही थीं कि तभी पिछले दरवाजे से बुर्के में लिपटी एक औरत हमारी बोगी में चढ़ी और उसे छोड़कर कुछ लोग पीछे से ही नीचे उतर कर गायब हो गए थे।  वह मोहतरमा चुपचाप बुर्का ओढ़े एक सीट पर हम सब के बीच आकर बैठ गई थीं। काफी देर बाद गाड़ी ने चलना आरंभ किया और हल्के- हल्के गाड़ी खिसकने लगी। तब हमने अपने चेहरे भीतर की ओर घुमाए और अपने एकछत्र साम्राज्य में एक घुसपैठिया देखकर चुपचाप आँखों के इशारे करने लगीं। हाँ, इतना चैन जरूर आया कि घंटे बाद रेल गाड़ी चली, तो सही आखिर।

हमारी एक साथिन विजय तिवारी बहुत चुलबुली थी उसने उस बुर्के वाली के पैर देखे और हम सबको इशारा किया कि उधर देखो। हम देखकर हैरान थे कि उस काले बुर्के के पैर सफेद संगेमरमर के लग रहे थे एक शानदार सैंडल में।  शायद उस मोहतरमा ने हमारी नजरों को पर्दे की जाली  के अंदर से भाँप लिया और पैर छुपाने के चक्कर में उसने हाथों से बुर्का पैरों पर डालने का यत्न किया, तो उन खूबसूरत हाथों को देखकर तो हम सभी की आँखें फटी की फटी रह गईं। अब ‘बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे ?’ सबकी नजर मुझ पर आकर ठहर गईं। मानो कह रही हों कि तुम पता करो यह कौन है। लो जी, जब गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली, तो कुछ सहज होते हुए मैंने हिम्मत करी और उनके पास जाकर बैठ गई।  वह भी शायद अब सहज होने का यत्न करने लगी थीं। हमारी मैडम तो किसी पंगे में नहीं पड़ना चाहती थी। वह मस्त कोई उपन्यास पढ़ने में मशगूल थीं।  मैंने जैसे ही पूछा, ‘आप भी इंदौर चल रही है क्या ?’ तो उन्होंने इधर- उधर देख कर इत्मीनान से अपना बुर्का पलट दिया। लगा,  चौदहवीं का चाँद आसमाँ की हदों को पार कर हमारी बोगी में आ गया हो।  बला की खूबसूरत थीं वह मोहतरमा!

हम सब लड़कियों की दिल की धड़कनें मानो रुक गई थीं। मुँह खुले रह गए थे।

मैं,  नलिनी जयवंत !’

 क्या आप, फिल्म हीरोइन नलिनी जयवंत हैं?’

 तो चेहरे पर एक मीठी मुस्कान बिखेरते हुए उन्होंने आँखों की मस्ती से ‘हाँ’ कहा । बड़ा दिलकश स्टाइल था उनका!

 क्या अदा थी!

 उस पुराने जमाने में फिल्मी अदाकार पर्दे की चीज हुआ करते थे। आम आदमी की पहुँच से परे ...लोग उनसे ख्वाबों में ही मिल सकते थे। हकीकत में उनको देखना मिलना या बात करना तो कोई सोच ही नहीं पाता था। हम सबकी बैठे -बिठाए लॉटरी लग गई थी। मैडम भी उपन्यास बीच में ही छोड़कर हमारे बीच पहुँच गई।

काले फ्रॉक पर सफेद बताशे वाला प्रिंट, सफेद सलवार और काली जाली का दुपट्टा ओढ़े उस संगेमरमर की मूरत को हम सब अपलक निहार रहे थे । उसी वर्ष उनकी नई फिल्म ‘काला पानी’  रिलीज हुई थी।  उत्सुकतावश मैंने पूछ लिया,’आप बंबई से खंडवा कैसे आ गईं? क्या यहाँ  की रहने वाली हैं?’

 नहीं, फिल्म की शूटिंग खत्म करके मैं रिलैक्स होने के लिए अशोक कुमार जी के परिवार में खंडवा आई थी कुछ दिनों के लिए।  ऐसी खबरें छुपती नहीं, फैल जाती हैं। आज मुझे वापस जाना था बंबई। यह भी रेलवे स्टेशन वालों से या कहीं से जनता को पता लग गया। सब मुझे देखना और मुझसे मिलना चाहते थे। इस चिलचिलाती धूप में भी रेल की पटरी पर बारी-बारी से लोग लेटे जा रहे थे कि जब तक मैं उनको नहीं मिलूँगी ,वह गाड़ी को आगे नहीं जाने देंगे। तभी आप लोगों को भी इतनी देर यहाँ रुकना पड़ा। पर एक इसी बोगी में केवल आप लोग थीं, सो मेरे बॉडीगार्ड मुझे यहाँ छोड़ गए कि मैं यहाँ बची रहूँगी। इस आकस्मिक मुसीबत से मेरी रक्षा करने के लिए आप सब का शुक्रिया!’

    ‌ वह बोल रही थीं और हमें लग रहा था उनके होंठों से फूल झड़ रहे हैं। बहुत मीठी और सुरीली आवाज थी उनकी। लगा कोई इतना खूबसूरत कैसे हो सकता है! स्वर्ग की अप्सराएँ भी ऐसी ही होती होंगी अवश्य! तभी तो ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र भी विमुग्ध हो गए थे मेनका पर और काम वासना में लिप्त हो गए थे।

मैडम ने अचानक पूछ लिया,  आप खंडवा ही क्यों आईं ?  कहीं और चली जातीं।’

असल में मैं अशोक कुमार जी (दादा मोनी) से मिलना चाहती थी। हमारे संबंध आत्मीय हैं हम पिछले कई वर्षों से एक साथ रहते हैं। फिल्म समाधि, संग्राम और मिस्टर एक्स में हम दोनों ने 1950 में इकट्ठे काम किया था जिससे हमारी नजदीकियाँ काफी बढ़ गई थीं। अभी वह अपने परिवार में आए हुए थे । मैं फिल्म शूटिंग समाप्त होने पर उनके पास ही आना चाहती थी- सो आ गई थी।’

आप कब से फिल्मों में काम कर रही हैं?’

उन्होंने प्यार से हमें देखा और  बताना शुरू किया…

‘12- 13 वर्ष की थी ! अपनी चचेरी बहन नूतन की माँ शोभना समर्थ के जन्मदिन पर उनके घर गई थी। तब वहाँ आए प्रोड्यूसर डायरेक्टर कांति भाई देसाई (शायद) ने मुझे देखते ही फिल्म ऑफर की और मैं तभी से अब तक ढेरों फिल्में कर चुकी हूँ।’

कोई चार -पाँच घंटे हम लोग साथ थे और ढेरों बातें चल रही थीं। उन्होंने भी हमसे पूछा ,

आप लोग इकट्ठे होकर कहाँ जा रही हैं ? कितना अच्छा लगता है ना ऐसी आजाद , मस्त जिंदगी जीना!’

हमने अपने ट्रिप की डिटेल उनको बताई।  हीरोइन बनने के बाद आजादी खत्म हो जाती है, यह तो हम उनको देखकर समझ ही रहे थे; क्योंकि उनकी हसरतें जाहिर हो रही थीं। वह बोलीं ,चलो हम सब गाना गाते हैं…

जीवन के सफर में राही मिलते हैं बिछड़ जाने को

और दे जाते हैं यादें, तन्हाई में तड़पाने को --हो हो- हो हो’

और तालियाँ बजा -बजाकर हम सब उनकी ही फिल्म ‘मुनीम जी’ का गाना गा रहे थे। बहुत ही सधे स्वर में गा रहीं थीं वो। पूछने पर उन्होंने बताया कि कई फिल्मों में वे अपने गीत स्वयं ही गाती रहीं थीं।

     एक दूसरे से सवाल- जवाब करने से हम आपस में जुड़ते चले जा रहे थे। शायद वह इस बात से बेफिक्र थीं कि उनकी कोई बात पत्रिका या किसी अखबार में लीक हो जाएगी। उस जमाने में हम लोग एक दम लल्लू थे। हमें इतना भी होश नहीं था कि हम उनका पता ले लेते! फोटो खींचने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था। उनके पास से कोई खुशबू धीरे- धीरे हमारे मन को भा रही थी-आज सोचती हूँ उन्होंने अवश्य कोई इत्र लगाया होगा। लगता था यह सफर कभी खत्म ना हो! लेकिन अंत तो हर सफर का होता है। इंदौर में हम जब स्टेशन पर उतर रहे थे, तो नामालूम कैसे उस काले बुर्के में वो एकदम से गायब हो गईं। और हम उनके गाने की लाइन दोहराते रहे...

जीवन के सफर में राही मिलते हैं बिछड़ जाने को’  

Jan 1, 2022

यात्रा- संस्मरणः दक्षिण भारत के छुटपुट अफसाने

-वीणा विज ‘उदित’

    बच्चों की दिसंबर की छुट्टियों में हमने मद्रास और रामेश्वरम जाने का प्रोग्राम बना लिया था।  रेलगाड़ी का लंबा सफर! पर हम सब हर तरह से तैयार थे।

   दिल्ली से सीधे हम मद्रास (चेन्नई ) गए । वहाँ मेरी भाभी की बहन रहती थीं। उनकी बेटी ‘सपना’ दक्षिण भारतीय फिल्मों की और बॉलीवुड की एक्ट्रेस थी।  ‘फरिश्ते’ हिंदी फिल्म में भी वह रजनीकांत के ऑपोजिट थी । उसके ब्लैक एंड वाइट आदम कद फोटोज़ से घर की दीवारें भरी थी । जिससे उनका घर कुछ अलग ही लग रहा था बच्चों को वहाँ बहुत अच्छा लगा, यह सब देखकर।

  वहाँ से हम महाबलीपुरम और गोल्डनबीच गए, जो समुद्री तट था । जहाँ एक तामिलियन फिल्म की शूटिंग चल रही थी।  ढेरों मटकों से सेट को सजाया गया था । दूसरी ओर भी अलग सेट लगे हुए थे। गोल्डन बीच शूटिंग के लिए मशहूर है; क्योंकि वह प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है।

 अगला पड़ाव ‘वेनम सेंटर’ था ! जहां विदेशियों ने सांपों का जहर निकालने की मशीनें लगाई हुई थीं।  गाँव के लोग जंगलों से सांप पकड़ कर थैलों में लाते थे और इन्हें 5 या ₹10 में बेच जाते थे।  गाँव वालों के लिए सांप हाथ से पकड़ना वहाँ पर आम बात थी। अद्भुत था, इतनी ढेर सारे सापों को बड़ी सी हौदी में इकट्ठे रेंगते देखना।

  वहाँ तालाब जैसे पौंड में ‘एलीगेटर’ भी थे।  कुछ किनारों पर शायद धूप लेने के लिए लेटे हुए थे और बाकी तालाब के बीच में घूम रहे थे। इतने करीब से मगरमच्छ लेकर बच्चे बहुत रोमांचित हो रहे थे।  बार-बार उनकी क्रीडा देख रहे थे । बच्चों के ज्ञान वर्धन के साथ-साथ हमारा भी ज्ञान वर्धन हो रहा था।

   अगले दिन हम सब मिलकर मद्रास के ‘मरीना बीच’ गए । वहाँ तमिल गरीब महिलाएँ जगह-जगह स्टोव पर कच्चे केले के चिप्स तलकर बेच रही थीं गरमा गरम। इससे वहाँ गंदगी हो गई थी। हमें वह बीच बिल्कुल पसंद नहीं आया । लगा, समुद्र का किनारा और काली चट्टानों पर सिर पटकती लहरें अपना ही राग अलाप रही थीं... जबकि महाबलीपुरम का ‘गोल्डन बीच’ मनभावन लगा था। वहाँ समुद्र की लहरें समुद्र की छाती पर कलोल करती हुई मधुर संगीत सुना रही थीं।

  लो जी अब, मद्रास से हम दक्षिण पूर्व किनारे 375 किलोमीटर दूरी पर रामेश्वरम के लिए ट्रेन में बैठ गए थे। बच्चों के साथ रामायण की बातें करते रहे और प्रभु राम का स्मरण होता रहा । हम बहुत भाग्यशाली थे जो उस जगह पर जा रहे थे जहाँ प्रभु राम के कभी चरण पड़े थे। श्री नरेश मेहता जी की  ‘संशय की एक रात’ लंबी कविता भी मेरे दिमाग में घूम रही थी!

  भारत की धरती पर समुद्र किनारे ‘मंडपम’ शहर में पहुँचने पर रामेश्वरम जाने के लिए हमें ‘पंबन द्वीप’ जाना था। वहाँ जाने के लिए हमें समुद्र पर बने एक लंबे पुल को ट्रेन से पार करना था। यह एक ‘रेल समुद्री पुल’ था , जो 2000 मीटर लंबा था । इस पुल के दोनों और रेलिंग भी नहीं थी। देखने से ही डर लग रहा था । उन्होंने बताया कि यह दुनिया में सबसे लंबा और खतरनाक समुद्री पुल है यह 1914 में अंग्रेजों ने बनाया था। चारों ओर पानी ही पानी दिखता था केवल पानी और बीच में हमारी ट्रेन!!

 ‘जब ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना?’

   सो बैठ गएउस हिलते -जुलते पुल के ऊपर चलती ट्रेन में हम सब। बंगाल की खाड़ी का नीला समुद्र और ऊपर स्वच्छ नीला आकाश... दूऽ ऽ र तक यही था!  गाड़ी जरा भी हिलती तोस्वाभाविक है सब को डर लगता था (आखिर जान से बढ़कर क्या है?) लेकिन, यह मन का वहम था, जो लहरों के उफान को देखकर हो रहा था। थोड़ी ही देर में हम इसके अभ्यस्त हो गए थे। पुल के बीचों-बीच छोटे समुद्री जहाज के निकलने के लिए ज्वाइंट था। जो जहाज को रास्ता देने के लिए खुल जाता था । तब ट्रेन जहाँ की तहाँ खड़ी हो जाती थी और उस में बैठकर जहाज निकलने का इंतजार करना होता था।  यह भी दिलचस्प नजारा था।  ऐसा हम पहली बार देख रहे थे।  इसे ‘Rail Ship Sea Bridge’ भी कहते हैं।

  पंबन द्वीप में पहुंचकर होटल में सामान रखकर हम लोग सीधे रामेश्वरम के ‘रामानाथा स्वामी मंदिर’  में भगवान शिव के दर्शन के लिए चल पड़े थे ।वहाँ पहले समुद्र में स्नान करना होता हैफिर मंदिर में दर्शन करने जाते हैं। हम सब ने भी पहले समुद्र में स्नान किया, फिर भीतर रुख़ किया ।

     भीतर पहुँचने के लिए बहुत लंबा और बेहद खूबसूरत मूर्तियों वाला गलियारा था। कहते हैं उसके हजार खंभे हैं। वहाँ के पंडितों ने कहा कि आपको 22 कुंडों के स्नान करने पड़ेंगे दर्शन से पहले।  अपना गाईड साथ लेकर हम चल पड़े थे स्नान के लिए । हमारा गाईड हाथ में पकड़ी बाल्टी और रस्सी से कुंड रूपी कुएँ से पानी निकालता था और हम पाँचों पर डाल देता था। 22 स्नान पूरे होने के बाद हम लोग साथ लाए बैग में से सूखे कपड़े पहनकर दर्शन के लिए पंक्ति में जाकर लग गए थे, जैसा वहाँ का चलन था। वहाँ दो तरफ रस्सियाँ लगी थीं।  हम भी वहीं खड़े हो गए थे क्योंकि अभी  लाइनें भी लंबी नहीं थी लोग कम थे।

हम बाई तरफ वाली लाइन में थे । अचानक पीछे से बहुत लोगों के आने से जोर का धक्का लगा और मैं उस रस्सी के बाहर बाईं ओर जा गिरी । एकदम से घबरा गई थी मैं! उधर एक पर्दा लगा था। जब मैं उठी तो देखती हूँ कि मैं पर्दे के भीतर हूँ। स्वाति (मेरी 9 साल की बेटी) भी मेरे पीछे-पीछे वहीं आ गई थी। तभी पंडित जी ने मुझे उठा कर बैठाया और मेरे हाथ में मौली धागा बाँध दिया ! मैं हैरान थी... मुझसे विधिवत पूजा भी करवाई । वहाँ एक मोटी सी बहुत अमीर महिला गहनों से लदी पहले से बैठी हुई थी। पंडित जी ने मुझे भी साथ में वहीं बैठा लिया । असल में उस तरफ ₹5000 देने वाले लोग पूजा करते थे और हम तो ₹100 वालों में खड़े थे। मैं समझ नहीं पा रही थी यह कैसा धक्का था!

     ईश्वर की इस लीला पर मैं नतमस्तक हो, भक्ति के तीक्ष्ण आवेग से रोए जा रही थी और मेरे नेत्रों से जल धाराएँ बह रही थीं।  मुझे कैसे अपने चरणों में मेरी श्रद्धा का मान रखने के लिए ईश्वर ने बुला लिया था।  मेरा रोम- रोम सिहर उठा था। जब भी सोचती हूँ हैरान होती हूँ, मेरे साथ यह क्या लीला रची थी प्रभु ने!!!!!!

     स्वाति को साथ लिए दर्शन करने के बाद प्रभु के प्रेम में गद्गगद हो जहाँ मैं खड़ी थी, वहीं रवि जी और दोनों बेटे मोहित रोहित भी दर्शन करके आ गए थे।

     एक पंडित जी ने बताया कि इस ज्योतिर्लिंग का महत्त्व 4 पीठों में से एक माना जाता है । काशी पीठ के दर्शन की तरह दक्षिण में रामेश्वरम के शिवलिंग दर्शन का महत्त्व है।

 हमारा अगला दर्शनीय स्थल था ‘गंधामाधाना पर्वतम्’!

जो हमारे होटल से तीन-चार किलोमीटर पर था । अगले दिन हम वह देखने गए । यह वह पर्वत है, जो अब दो मंजिला मंदिर के रूप में स्थापित है।  जिसे हनुमान रामायण वर्णित घटना... लक्ष्मण के बेहोश होने पर संजीवनी बूटी के लिए हिमालय से कंधे पर उठाकर लाए थे।  यहाँ पर एक चक्र के ऊपर श्री राम भगवान के पैरों के निशान बने हैं और उसकी बहुत मान्यता है ।

    ‌रामेश्वरम में यह सबसे ऊँची जगह है ।जहाँ से पूरा रामेश्वरम दिखता है लगता था अनगिनत सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे हैं लेकिन ऊपर पहुँचकर ठंडी हवा के झोंकों में स्थिर रहना मुश्किल हो रहा था, लगता था खड़े रहे तो हवा के झोंके हमें साथ ही उड़ा कर ले जाएँगे सो हवा की दिशा देखते हुए हम सब इकट्ठे होकर मंदिर के चारों तरफ बने चबूतरे पर बैठ गए थे।  श्री राम के चरणों में बैठना सुखद और स्वर्गीय अनुभव था।

    जिन दिनों पंजाब में ठंड से बुरा हाल होता हैवहाँ गर्मी लग रही थी और ठंडी हवा के झोंके मदमस्त कर रहे थे। वहीं हमने जो कुछ खाने को साथ लाए थे , बैठकर खाया और दो-तीन घंटे बिताकर वापस होटल आ गए थे।

  तमिलनाडु राज्य का विस्तारपूर्वक भ्रमण करके आत्म संतुष्ट होकर हम लौट आए थे पंजाब ! भविष्य में कन्याकुमारी में भारत माता के चरणों पर माथा टेकने के सपने संजोए और स्वामी विवेकानंद के मेडिटेशन सेंटर देखने की आस लिए...!

सम्पर्कः 469-R, Model Town. Jalandhar 144003, Mobile..9682639631  

Oct 2, 2018

कद्दूओं का त्योहारः हैलोवीन

कद्दूओं का त्योहारः
हैलोवीन
-वीणा विज
31 अक्टूबर आते- आते हर तरफ सिर्फ़  छोटे- बड़े कद्दू ही दिखाई देने लगते हैं, ख़ासकर अमेरिका,इंगलैंड व योरपियन देशों में। आयरलैड और स्काटलैंड से जन्मी हैलोवीन मनाने की यह प्रथा 19वीं सदी में उनके साथ उत्तर अमेरिका आ गई। 20वीं सदी तक आते- आते पूरे पाश्चात्य जगत के त्यौहारों में रच बस गई और इतनी कि अब उनकी अपनी धरोहर बन गई है। योरप में सैल्टिक जाति के लोग ऐसा मानते थे (अभी भी मानते हैं) कि इस समय मृत लोगों की आत्माएँ आकर संसारिक प्राणियों से साक्षात्कार करती हैं।इस को सैमहैनभी कहते हैं ।यह वह दिन होता है, जब ये सोचते थे कि उनके मरे हुए पुरखों की आत्मा धरती पर आएगी,जिससे उनका फसल काटना आसान हो जाएगा।इसीलिए वे चुड़ेलें बनते और जानवरों के मुखौटे, उनकी चमड़ी, उनके सिर पहनकर अलाव के आसपास नाचते -गाते थे।वे मानते थे कि कोई विशिष्ट सर्वोच्च प्राकृतिक शक्ति है।इसे ‘All Saints-Day’-All Hallows (holy)  याHallows Eve मानते थे, जो धीरे- धीरे Halloween बन गया।इस दिन खाने-पीने के उपहार भी देते-लेते थे।यू. के में इन भटकती आत्माओं के लिए केक भी बनाते थे।इन दिनों सेव के मौसम के कारण मीठे सीरे में सेव बनाकर खाते हैं।
अमेरिका मे तो इसे harvest -time के साथ भी जोड़ा जाता है।यहाँ कद्दू बहुतायत में व बड़े- बड़े मिलते हैं, जिन्हें आसानी से काटा भी जा सकता है।सामने की तरफ इस पर डरावने व बेढंगे से मुँह काटकर, बीच में जलती हुई मोमबत्ती रख देते हैं।जिन्हें पुरानी सदी की याद में रात को अँधेरे में घर की चौखट पर रखते हैं।इसे Jack-O-lanterns कहते हैं।इस दिन कद्दू के बीज भूनकर खाए जाते हैं।इसके अलावा कद्दू की ब्रेड, कद्दू की खीर भी बनाई जाती है।लोग कद्दू के पोस्टर भी घरों के बाहर लगाते हैं।कद्दू के रंग के कपड़े भी पहनते हैं।जापान और जर्मनी में भी यह अमेरिकन पॉप कल्चर की नकल के फलस्वरूप लोकप्रिय हो गया है।
हैलोवीन कब से मनाया जाता- इस विषय में कहा जाता है कि आज से दो हजार वर्ष पूर्व आयरलैंड में इस त्यौहार की शुरूआत हुई थी। पहले योरप के देशों में इसे पहली नवम्बर को मनाया जाता था। 31 अक्टूबरको Halloweve कहते थे। फिर धीरे-धीरे यह 31 अक्टूबरको ही पक्का कर दिया गया। इस दिन को फसल के मौसम का आखरी दिन एवम् सर्दियों की शुरूआत का पहला दिन मानते हैं । अब इसे भी Christian Festival  मानते हैं, जिससे यह अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया,न्यूज़ीलैंड आदि देशों में भी प्रचलित है।
अक्टूबर माह के आरंभ होते ही हर शहर के बड़े-बड़े स्टोर्स में ' हैलोवीन' से संबंधित सामान दिखाई देने लगता है। कुछ लोग  Haunted House का सामान खरीद कर हमेशा के लिए रख लेते हैं। अधिकतर लोग  भूत , पिशाच , अस्थि-पंजरएवं समुद्री डाकू और परियों,जिप्सी डांसर,फूलों आदि  की पोशाकें किराए पर ही लेते हैं। इनका किराया भी काफी होता है।पर कहते हैं न कि शौक़ की कोई कीमत नहीं होती।सो, बच्चों के शौक की ख़ातिर सब चलता है। फिर स्कूल में  ' हैलोवीन परेड' में बच्चा हिस्सा ले रहा है, तो उसे हर बार नए पात्र कीपोशाकचाहिए। आखिर इस परेड को देखने बच्चों के माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी सभी तो आते हैं।
फिर तरह- तरह की पोशाकें पहनकर विभिन्न रूप बनाए जाते हैं।जैसे-भूत-पिशाच, चुड़ैल, शैतान, अस्थि पंजर आदि।अच्छे रूप भी होते हैं जैसे-राजकुमारियाँ समुद्री -डाकू, स्पाईडरमैन, सुपरमैन, विदूषक, ख़ानाबदोश, विभिन कहानियों के पात्र आदि।स्कूलों में बच्चे इन पोशाकों में परेड करके दिखाते हैं।विभिन्न मेले सजते हैं।पोशाक- पार्टियाँ होती हैं।निषेध-घरों को भूतों के डेरे सा सजाकर- उनमें प्रवेश निषेध होता है।डर जगाया जाता हैं।
दोपहर होते ही  कद्दूनुमा  टोकरी हाथ में पकड़े विभिन्न ड्रेसेस में बच्चे व बड़े सभी सजे हुए आपके द्वार पर आ कर बोलते हैं 'Trick or Treat ' ।यदि आप  Trick बोलते हैं तो वे डरकर भागते हैं और खूब चीखेंछोड़ते हैं व हँसते हैं। वहीं  Treat बोलने पर टोकरी आपके सामने आ जाती है। अब आप को उस में कैंडीस व चॉकलेट्स डालनी होती हैं। सरकार व कुछ संस्थाओं की ओर से मेले भी लगते हैं। उनमें  Haunted House बनाए होते हैं। जिनके पास जाते ही नकली चुड़ैलें अचानक बाहर निकलकर डराती हैं।  लटकता अस्थिपंजर  अचानक बाहों से पकड़ लेता है। वहाँ काला जाल बिछाकर डरावना माहौल बनाया गया होता है। खूब चीखना- चिल्लाना होता है जिस से बहुत मनोरंजन होता है। 
घर के बड़े-बूढ़े भी कोई सिर पर सींग वाला बैंड, कोई जोकर के कपड़े तो कोई खानाबदोश बना होता है।  हर घर के बाहर कुछ कद्दू नैन-नक्श काटकर उस कद्दू में मोमबत्ती जलाकर लालटैन बनाकर रखे जाते हैं।यह  सारे कद्दू कुछ दिनों पूर्व कद्दुओं की मंडी से खरीदे जाते हैं। क्योंकि इस समय कद्दू की फसल बहुतायत में होती है।ऐसे कद्दुओं  को ही Jack - o- Lanterns कहते हैं। इस नाम की भी कहानियाँ हैं।लेकिन मान्यता यही है कि मरे हुए पूर्वज मौसम की बदलाहट के समय आशीर्वाद देने धरती पर आते हैं, तो उन्हें रास्ता दिखाया जाता है!


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