मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।
Showing posts with label सुकेश साहनी. Show all posts
Showing posts with label सुकेश साहनी. Show all posts

Aug 1, 2026

दो लघुकथाएँ

 - सुकेश साहनी

1. आखिरी तारीख

“वर्माजी!” उसने पुकारा।

बड़े बाबू की मुद्रा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। उनकी आँखें बंद थीं और दाँतों के बीच एक बीड़ी दबी हुई थी। ऐश-ट्रे माचिस की तीलियाँ और बीड़ी के अधजले टुकड़ों से भरी पड़ी थी।

सुरेश को आश्चर्य हुआ। द्फ्तर के दूसरे भागों से भी लड़ने-झगड़ने की आवाज़ें आ रही थीं। बड़े बाबू की अपरिवर्तित मुद्रा देखकर वह सिर से पैर तक सुलग उठा। उसकी इच्छा हुई एक मुक्का उनके जबड़े पर जड़ दे ।

“वर्माजी, आपने आज बुलाया था!” अबकी उसने ऊँची आवाज में कहा।

बड़े बाबू ने अपनी लाल सुर्ख आँखें खोल दीं। सुरेश को याद आया- पहली दफा वह जब यहाँ आया था तो बड़े बाबू के व्यवहार से बहुत प्रभावित हुआ था। तब बड़े बाबू ने आदर के साथ उसे बिठाया था और उसके पिता की फाइल ढ़ूँढ़कर सारे कागज़ खुद ही तैयार कर दिए थे। दफ्तर के लोग भी एकाग्रचित् हो काम कर रहे थे।

बड़े बाबू अभी भी उसकी उपस्थिति की परवाह किए बिना टेबल कैलेंडर पर एक तारीख के इर्द-गिर्द पेन से गोला खींच रहे थे। उसने बड़े बाबू द्वारा दायरे में तारीख को ध्यान से देखा तो उसे ध्यान आया, आज महीने का आखिरी दिन है और पिछली दफा जब वह यहाँ आया था, तब महीने का प्रथम सप्ताह था। बड़े बाबू के तारीख पर चलते हाथ से ऐसा लग रहा था मानो वे इकतीस तारीख को ठेलकर आज ही पहली तारीख पर ले आना चाहते थे।

एकाएक उसका ध्यान आज सुबह घर के खर्चे को लेकर पत्नी से हुए झगड़े की तरफ चला गया। पत्नी के प्रति अपने क्रूर व्यवहार के बारे में सोचकर उसे हैरानी हुई। अब उसके मन में बड़े बाबू के प्रति गुस्सा नहीं था बल्कि वह अपनी पत्नी के प्रति की गई ज्यादती पर पछतावा हुआ। वह कार्यालय से बाहर आ गया।

2. खरबूजा

बड़े साहब आफिस से घर लौटे तो काफी थके हुए लग रहे थे। चपरासी ने उनके सूटकेस के साथ-साथ एक पुराना टू इन वन और प्रेशर कुकर भी भीतर रखा तो मेम साहब चौंक पड़ीं।

“ये सब किसका है?” उन्होंने साहब से पूछा ।

“वही---चीफ साहब,” वे चिढ़कर बोले, “मीटिंग के बाद चलने लगा तो बोले-हमारा टू इन वन और प्रेशर कुकर कई दिनों से खराब पड़ा है, तुम्हारे शहर में अच्छी दुकानें हैं, रिपेयर कराकर भेज देना।”

“अपना टेप रिकार्डर भी महीनों से खराब पड़ा है, उसे भी साथ भेजना न भूलिएगा,” मेम साहब ने कहा,---“हाँ, याद आया, राम खिलावन पर सख्ती कीजिए---चोरी करने लगा है।”

“मैं आज विरमानी स्टोर्स गई थी, मैंने बातों ही बातों में उससे कहा कि मिक्सी की मरम्मत के बहुत पैसे ले लिये। तब उसने मुझे बताया कि राम खिलावन ने ही वाउचर में कुछ रुपये बढ़वाए थे।”

“राम खिलावन!” बड़े साहब ने सख्त आवाज़ में कहा, “कब से कर रहे हो चोरी?”

“मैं कुछ समझा नहीं, हुजूर!” वह बिना घबड़ाए बोला।

“विरमानी कह रहा था, तुमने उस ट्यूब लाइट वाले वाउचर में कुछ रुपए बढ़वाए थे?”

“अच्छा, वो” राम खिलावन ने कहा, “आपने उस दिन शाम को मिक्सी रिपेयर करवाने को दी थी, स्टोर बद हो चुका था इसलिए मैं मिक्सी घर ले गया था। हुजूर! मेरी घरवाली थोड़ी तेज है, पूछने लगी-यह क्या है, किसका है। मुझे ‘सबकुछ’ बताना पड़ा। बस, फिर क्या था, पीछे पड़ गई । कहने लगी-साहब लोग दफ्तर के खर्चे से न जाने क्या-क्या घर ले जाते हैं, मुझे भी एक सिलबट्टा चाहिए। हुजूर आपकी मिक्सी रिपेयर के वाउचर में उसी सिलबट्टे के लिए कुछ रुपए बढ़वाए थे।” राम खिलावन ने रुककर बारी-बारी से साहब और मेम साहब की ओर देखा, फिर ढिठाई से बोला, “इसे चोरी तो नहीं कहेंगे, साहब!”

“तू बहुत बातें बनाने लगा है। चल जा---काम कर्।” इस बार बड़े साहब की आवाज़ खोखली थी।

May 1, 2026

दो लघुकथाएँ

 -सुकेश साहनी 

1. कूप मण्ड़ूक

"विजय कहाँ है?" उन्होंने पत्नी से पूछा।

"दोस्तों के साथ फ़िल्म देखने गया है।"

"मुझसे पूछकर क्यों नहीं गया?" वे चिल्लाए, "मैं अभी मरा तो नहीं हूँ ।"

"आखिर बात क्या है?" वह हैरान थी।

"बात पूछती हो।" उन्होंने आँखें निकालीं, "ये आजकल की फ़िल्में! तुम बच्चों को बर्बाद करके छोड़ोगी।"

"पड़ोसी बता रहे थे- अच्छी पारिवारिक फ़िल्म है, तभी मैंने जाने दिया। आपको हुआ क्या है?" फिर थोड़ा रुककर बोली, "सुबह से घर में बैठे- बैठे बोर हो गए होंगे। न हो तो थोड़ा घूम आइए, मन ठीक हो जाएगा।"

"साफ- साफ क्यों नहीं कह देतीं कि घर से चला जाऊँ! अब तुम्हें मेरा घर पर रहना भी नहीं भाता!" उन्होंने चटपट चप्पल पहनी और घर से बाहर सड़क पर आ गए।

पत्नी से हुई तकरार से उनका दिमाग़ अभी तक भन्ना रहा था। "कलयुग! घोर कलयुग! !" वे बुदबुदाए।

उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि किधर जाएँ! हर महीने उन्हें अपने पुश्तैनी मकानों के किरायेदारों से किराया लेना होता था और यह काम वह कर चुके थे। अब उनके पास करने को कोई काम नहीं था। तभी सामने से जोशी आता दिखाई दिया। उन्हें लगा, जोशी उनसे कन्नी काटकर निकलना चाहता है। वे उसके बिल्कुल सामने खड़े हो गए।

"कहो क्या हाल है?" जोशी ने पूछ लिया।

"जोशी, तुम्हें नहीं लगता, हालात दिन-प्रतिदिन बहुत खराब होते जा रहे हैं?"

"कैसे हालात?"

"यही कि दुनिया हम जैसे लोगों के रहने के काबिल नहीं रही। आज की पीढ़ी किस क़दर पथ-भ्रष्ट हो गई है।" उन्होंने निराशा से सिर हिलाया, "ये लोग देश को रसातल में पहुँचाकर छोड़ेंगे हम लोग अपने ज़माने में ऐसे तो नहीं थे!"

"आखिर बात क्या है?" जोशी के चेहरे पर ऊब के लक्षण दिखाई देने लगे थे।

"तुमने कभी सोचा, इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेवार है?"

"मैंने इस पर कभी नहीं सोचा,’’ जोशी ने घड़ी देखते हुए जल्दी से कहा, ‘‘मुझे बच्चों को योगा सिखाने जाना है, देर हो रही है। फिर कभी फुर्सत में बातें होंगी।’’

उन्हें जोशी की बुद्धि पर तरस आया। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर लोगों को क्या होता जा रहा है!

वे काफ़ी देर तक सड़कों पर फालतू घूमते रहे। फिर थककर बैठ गए। सत्तर वर्षीय गुरबख्श बढ़ई पूरी तन्मयता से दरवाज़े के पल्लों पर रंदा चला रहा था।

‘‘गुरबख्श, बहुत खराब वक़्त आ गया है!’’ वे थकी आवाज़ में बोले।

"की होया?" उसने बिना सिर उठाए पूछा।

"दो-दो जवान बेटों के होते हुए भी अपनी हड्डियाँ गला रहे हो। मैं तुम्हारी जगह होता तो दोनों को लात मारकर घर से निकाल देता।"

"नहीं बाबूजी, इस उम्र में पैसों के लिए थोड़े न काम करता हूँ। वाहे गुरु ने इन हाथों को हुनर दिया है, वह किसी काम आ सकें, यही इच्छा है। रही बात बच्चों की उन्हें यह काम पसंद नहीं था, इसलिए अपनी मर्जी के कामों में लग गए हैं।"

"फिर भी ये आजकल के लड़के अपनी जिम्मेवारी तो समझते नहीं हैं। एक हमारा ज़माना था।" उन्होंने ठंडी सांस ली। वे बोलते रहे और गुरबख्श जवाब में हूँ- हाँ करते हुए अपने काम में लगा रहा।

"बाबूजी चाय पियोगे?" थोड़ी देर बाद गुरबख्श से पूछा। 

"नहीं जी, बहुत-बहुत मेहरबानी!" वे चिढ़कर बोले-" आप अपना काम करो! " वे उदास कदमों से घर की ओर लौट पड़े।

रास्ते में पान की दुकान पर टी.वी. में कार्टून शो चल रहा था और कुछ बच्चे टी.वी. देखकर तालियाँ पीट रहे थे। उन्होंने जलती निगाहों से पान वाले को देखा।

"भाई साहब," वे दुकान पर सिगरेट सुलगा रहे एक व्यक्ति से बोले, "आपको नहीं लगता टी.वी. हमारे समाज में बढ़ती हुई हिंसा के लिए ज़िम्मेदार है?"

उस व्यक्ति ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया और सिगरेट सुलगाकर दुकान से आगे बढ़ गया।

"सब के सब जाहिल! बेवकूफ!" वे चिल्ला पड़े।

2. बैल 

"इसके दिमाग़ में गोबर भरा है गोबर!" विमला ने मिक्की की किताब को मेज पर पटका और पति को सुनाते हुए पिनपनाई, "मुझसे और अधिक सिर नहीं खपाया जाता इसके साथ। मिसेज आनंद का बंटी भी पाँच साल का ही है, उस दिन किटी पार्टी में उन्होंने सबके सामने उससे कुछ क्वश्चन पूछे...वह ऐसे फटाफट अंग्रेज़ी बोला कि हम सब देखती रह गईं। एक अपने बच्चे हैं..."

"मिक्की इधर आओ।"

वह किसी अपराधी की भाँति अपने पिता के पास आ खड़ा हुआ।

"हाउ इज फूड गुड फॉर अस? जवाब दो, बोलो!"

"इट मेक्स अस स्ट्रांग, एक्टिव एंड हैल्प्स अस टू...टू...टूऊ ऊ..."

"क्या टू-टू लगा रखी है! एक बार में क्यों नहीं बोलता?" उसने आँखें निकालीं, "एंड हैल्प्स अस टू ग्रो।"

"इट मेक्स अस अस्ट्रांग ...!" वह रुआँसा हो गया।

"असट्रांग! यह क्या होता है, बोलो... 'स्ट्रांग' ...स्ट्रांग' ...तुम्हारा ध्यान किधर रहता है...हंय?" उसने मिक्की के कान उमेठ दिए।

"इट मेक्स स्ट्रांग..." उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े।

"यू-एस... 'अस' कहाँ गया। खा गए!" तड़ाक् से एक थप्पड़ उसके गाल पर जड़ता हुआ वह दहाड़ा, "मैं आज तुम्हें छोडूँगा नहीं..."

"फूड स्ट्रांग अस..."

"क्या?" वह मिक्की को बालों से झिंझोड़ते हुए चीखा।

"पापा! प्लीज, मारो नहीं...अभी बताता हूँ...स्ट्रांग ...फूड...अस...इट...हाउ...इज..." वह फूट-फूटकर रोने लगा।

Jan 1, 2026

खलील जिब्रान की दो लघुकथाएँ

 अनुवाद: सुकेश साहनी

1. सफाई 

दार्शनिक ने गली के सफाईकर्मी से कहा, "मुझे तुम पर दया आती है, तुम्हारा काम बहुत ही गंदा है।"

मेहतर ने कहा, "शुक्रिया जनाब, लेकिन आप क्या करते हैं?"

प्रत्युत्तर में दार्शनिक ने कहा, "मैं मनुष्य के मस्तिष्क उसके कर्मो और चाहतों का अध्ययन करता हूँ।"

तब मेहतर ने गली की सफाई जारी रखते हुए मुस्कराकर कहा, "मुझे भी आप पर तरस आता है।"

2. लीडर 

पवित्र नगर की तलाश में जाते हुए मेरी मुलाकात एक दूसरे यात्री से हुई, मैंने उससे पूछ लिया, "पवित्र नगर पहुँचने का सही रास्ता यही है क्या?"

उसने कहा, "मेरे पीछे-पीछे चले आओ, चौबीस घंटों के भीतर तुम पवित्र नगर पहुँच जाओगे।"

मैं उसके पीछे चल पड़ा। हम दिन-रात चलते रहे, कई दिन बीत गए, पर हम पवित्र नगर नहीं पहुँचे।

तभी अप्रत्याशित बात हुई,  वह मुझ पर बरस पड़ा; क्योंकि मैं जान गया था कि उसे पवित्र नगर के रास्ते के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

लघुकथाः दुर्गंध

- सुकेश साहनी

उस बूढ़े का झुर्रियोंभरा चेहरा आँसुओं से तर है। वह अजय को अपनी बीमार पत्नी की मृत्यु के बारे में बताते हुए बच रही दवाइयाँ और इंजेक्शन वापस ले लेने के लिए कहता है। अजय मेरी ओर देखता है। वह हाल ही में नौकरी पर लगा है, इसलिए निर्णय नहीं ले पाता। मुझे उसकी इस आदत से ख़ुशी होती है। मैं उसकी मदद के लिए उसके पास जाता हूँ। बूढ़े की दवाओं पर निगाह डालते ही मुझे अपनी दुकान का नकली माल- पहचानने में देर नहीं लगती।

"बाबा, माफ़ करो!" मैं कहता हूँ, "बिका हुआ माल वापस नहीं होगा, अगर चाहो तो इसके बदले में दूसरी दवाई दे सकता हूँ।"

बूढ़ा फिर गिड़गिड़ाता है और आशाभरी नज़रों से मेरी ओर ताकता है। अजय भी आँखों ही आँखों में मुझसे बूढ़े की सिफ़ारिश करता है।

"तुमसे कहा न, जाओ। हमें काम करने दो!" मैं सख्ती से कहता हूँ और बूढ़ा सिर झुकाए दुकान से बाहर निकल जाता है।

"सर! उसकी बीवी मर गई है।" अजय को मेरे व्यवहार से ठेस लगती है। "हो सकता है उसे रुपयों की सख्त ज़रूरत हो..."

"अजय, तुम सोचते बहुत हो!" मैं नरमी से कहता हूँ, "हम तुम्हारी तरह सोचने लगे तो कर चुके दुकानदारी!"

वह उदास कदमों से ग्राहकों के लिए दवाइयाँ निकालने लगता है। मैं उसकी परिस्थितियों पर ग़ौर करता हूँ। लंबी बेरोज़गारी के बाद उसे यहाँ नौकरी नसीब हुई और क्षयरोग से पीड़ित पत्नी अस्पताल में पड़ी है। मुझे लगता है, वह जल्दी ही मेरे मुताबिक ढल जायेगा। मैं वापस अपनी कुर्सी पर आ जाता हूँ।’’

कोई ग्राहक अजय से कैशमीमो के लिए ज़िद कर रहा है। "देखिए, कैशमीमो अभी छप रहे हैं।" अजय मेरे कहे अनुसार ग्राहक को बताता है।

"आप सादे कागज़ पर ही बनाकर स्टैंप लगा दीजिए।" ग्राहक अभी भी अड़ा हुआ है।

"हमारा टाइम खराब मत करो,"मैं उठकर उसके हाथ से दवाएँ छीन लेता हूँ, "जहाँ से तसल्ली हो, वहाँ से खरीद लो!"

"सर!" खरीदार के दुकान से जाते ही अजय ने मेरी आँखों में झाँकते हुए पूछता है, "क्या हम  नकली दवाएँ बेचते हैं?"

"देखो, तुम फिर सोचने लगे,"मैं उसे बड़े प्यार से समझाता हूँ, "जितनी भी सेल तुम्हारे हाथों हो रही है, उसका बीस प्रतिशत तुम्हें तनख्वाह के अलावा मिलेगा। तुम्हारे व्यवहार से हमारी प्रतिदिन की सेल काफ़ी बढ़ गई है। मैं मेहनती लोगों की बहुत कद्र करता हूँ।"

"मैं यह काम नहीं कर पाऊँगा।" पहली बार बिना 'सर' सम्बोधित किए उसके बर्फीले शब्द मेरे कान में पड़ते हैं।

"मैं तुम्हें- तुम्हें अपनी बीमार पत्नी के बारे में तो सोचना चाहिए... " -मैं कहता हूँ और फिर अपनी कमज़ोर और फटी-फटी आवाज़ पर ख़ुद ही हैरान रह जाता हूँ।

वह बिना मेरी ओर देखे अपना टिफिन उठाता है और दृढ़ कदमों से दुकान से बाहर निकल जाता है।

मैं हैरानी से उसे जाते हुए देखता रह जाता हूँ। काउंटर पर ग्राहक इकट्ठे हो जाते हैं। अजय का चेहरा मेरी आँखों के आगे से हटाये नहीं हटता। मैं सिर झटककर दवाएँ निकालने लगता हूँ। जल्द ही मैं पसीने से नहा जाता हूँ। पसीने और दवाइयों की मिली-जुली दुर्गन्ध से दिमाग़ भन्ना जाता है। मैं हैरानी में डूब जाता हूँ , ऐसी दुर्गन्ध पहले तो कभी महसूस नहीं हुई!

Nov 2, 2025

कहानीः साफ -सुथरी आँखों वाले

 - सुकेश साहनी

दफ्तर से लौटा तो गेट के पास मटमैले रंग का एक लिफाफा पड़ा हुआ था। लिफाफे पर जगह-जगह ग्रीस के दाग और कालिख लगी हुई थी। लिफाफे के एक ओर मोटे-मोटे शब्दों में बचकाने ढंग से लिखा था-सत्ते उस्ताद।

पिछले हफ्ते मेरी एक कहानी स्थानीय अखबार में छपी थी। पाठकों के दो-तीन खत मुझे रोज ही मिल रहे थे। यह लिफाफा भी मुझे उसी तरह का लगा, पर लिफाफे की मोटाई और भेजने वाले का अपने नाम के आगे उस्ताद लिखना मुझे बहुत अटपटा लग रहा था। घर में प्रवेश करते ही मैंने उसे खोल डाला।

पत्र किसी सत्ते उस्ताद ने ही मुझे लिखा था। भीतर के कागजों पर भी जगह-जगह दाग-धब्बे लगे हुए थे और लिखावट तो बहुत ही बचकाना थी। पत्र में उसने मेरी सोने के हार वाली कहानी से प्रभावित होने की बात एक-दो पंक्तियों में लिखी थी। शेष पत्र में उसने अपने जीवन की कुछ घटनाओं के बारे में लिखा था। सत्ते उस्ताद ने क्या सोचकर मुझे अपने जीवन के बारे में लिखा होगा? हो सकता है, उसे लगता हो कि उसके जीवन में ऐसा कुछ है, जिस पर कहानी लिखी जा सकती है। जो भी हो, उस बचकाना ढंग से लिखे गए खत में मुझे ऐसी खुशबू महसूस हुई थी कि मैं उसके खत को पूरा पढ़े बिना नहीं छोड़ सका था। यही नहीं, उसकी कहानी को आपके साथ साझा भी करना चाहता हूँ-

सत्ते को नहीं याद कि उसके माँ-बाप कौन थे। बचपन की कोई स्मृति भी शेष नहीं है। जब उसने होश सँभाला तो खुद को बनारसी उस्ताद की शागिर्दी में पाया। धंधा-वही पाकेटमारी, उठाईगीरी या फिर जब जैसा दाँव लग जाए. जैसा कि अमूमन होता है, बनारसी उस्ताद की मौत के बाद उस्तादी की गद्दी अपने हुनर के बल पर सत्ते के हाथ आ गई थी और वह कहलाने लगा था- सत्ते उस्ताद।

सत्ते की अँगुलियों में बला का जादू था। उसके बारे में कहा जाता था कि उस्ताद पास बैठे आदमी के कपड़े उतार ले और उसको पता भी नहीं चले। चुस्ती-फुर्ती इतनी कि प्रतिद्वंद्वी वार करने की सोचे ही सोचे कि चारों खाने चित्त और सत्ते उस्ताद का कमानीदार चाकू उसकी गर्दन पर। अपने हुनर के बल पर सत्ते के दिन मजे में कट रहे थे। तभी एक विचित्र घटना घटी।

उस दिन सत्ते बहुत सवेरे ही घर से निकल पड़ा था। अपने शिकार का पीछा करते हुए वह बस अड्डे तक पहुँच गया था। वह लड़की बस में चढ़ गई थी। उसका पति भी उसके साथ था।

वह भी उनके पीछे-पीछे बस में चढ़ गया। उसने उचटती-सी निगाह चारों ओर डाली। लड़की और उसका पति ड्राइवर के पीछे वाली सीट पर बैठे हुए थे। बस लगभग भर चुकी थी। खिड़की के पास वाली खाली सीट पर वह भी बैठ गया।

आदत के मुताबिक सत्ते अपने आपसे उलझा हुआ था, "सत्ते गुरु, बहुत दिनों बाद मोटी मुर्गी हाथ लगी है...अबे देख...उसके गले में खालिस सोने की मटरमाला और हाथों में चम-चम करते कड़े। ...हाँ, अगर लड़की के साथ यह रखवाला न होता तो काम थोड़ा आसान हो जाता। साला...अब इस धंधे में भी कुछ रहा नहीं। लोग बहुत होशियार हो गए है। औरतों ने गहने पहनकर बाहर निकलना बंद कर दिया है। इक्का-दुक्का शिकार नजर आ भी जाए तो साथ में यह...बॉडीगार्ड ...अबे, लौंडिया का रखवाला तो इधर ही देख रहा है...कहीं इसे शक तो नहीं हो गया? ...तूने अभी किया ही क्या है, जो उसे शक हो जाएगा। बेट्टा, अब तेरी फूँक बहुत जल्दी सरक जाती है।

खिड़की से सीधी धूप सत्ते पर पड़ रही थी। वह पसीने-पसीने हो रहा था। ड्राइवर-कंडक्टर का कहीं पता नहीं था। लोग बस के न चलने से परेशान थे। इस बात को लेकर बस में तेज शोर हो रहा था। धूप जब असह्य हो गई तो सत्ते अपनी सीट से उठकर कंडक्टर की सीट के पास खड़ा हो गया। वह बार-बार रुमाल से अपना पसीना पोंछ रहा था।

लोगों के शोर का असर हुआ था। ड्राइवर ने अपनी सीट पर बैठकर बस स्टार्ट कर दी थी।

"सुनिए..."

"जी?" युवक के सम्बोधन से सत्ते बुरी तरह चौंक पड़ा। पहली बार उसने युवक की आँखों में सीधे देखा। सत्ते को उसकी आँखें बहुत अजीब लगीं।

"शायद आप धूप से परेशान हैं?" उसने मुस्कराकर कहा।

"जी हाँ," उधर की सीट पर सीधी धूप पड़ रही है।" अब वह सँभल गया था।

"आप चाहें तो यहाँ बैठ सकते है," युवक ने अपनी सीट की ओर संकेत किया, "मैं तो इन्हें छोड़ने आया था...यहीं उतर रहा हूँ।"

"शुक्रिया!" सत्ते को अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ, अंधा क्या माँगे- आँखें। उसने देर नहीं की, युवती के बगल में धीरे से बैठ गया।

सीट पर बैठते ही सत्ते खुद से बातें करने लगा, "बेटा, आज ऊपर वाला मेहरबान है, रास्ते का एकमात्र काँटा भी दूर हो गया। अब तो मैदान बिल्कुल साफ है...इतना माल हाथ लग गया तो कई दिनों की छुट्टी. आखिर उस आदमी ने तुझमें क्या देखा, जो तुझे अपनी सीट दे दी?"

बस ने गति पकड़ ली थी। सत्ते ने युवती की ओर देखा, वह खिड़की से सिर टिकाए किसी गहरी सोच में डूबी हुई थी। कंडक्टर यात्रियों को टिकट के लिए आवाज दे रहा था। सत्ते के लिए यह जानना ज़रूरी था कि उसके शिकार की मंजिल क्या है, ताकि उसी के अनुसार वह भी अपना टिकट ले सके। उसने सीट से उठते हुए युवती से पूछा, "आपका टिकट? क्या मैं मदद कर सकता हूँ?"

वह चौंक पड़ी, फिर उसने पर्स खोला, तभी सत्ते ने आँखें भरकर उसके कड़ों की ओर देखा, तीन-तीन तोले से कम के नहीं होने चाहिए, उसने सोचा।

युवती ने पचास का नोट सत्ते की ओर बढ़ाते हुए कहा- "मुरादाबाद।"

उसने दो टिकट मुरादाबाद के लिये और अपनी सीट पर लौट आया।

बस पूरी रफ्तार से दौड़ने लगी थी। सत्ते ने इस बार थोड़ा ध्यान से युवती की ओर देखा। सत्ते की नजर लड़कियों के मामले में उसे कभी धोखा नहीं देती। पहली नजर में ही वह ताड़ लेता है कि लड़की सीधी-सादी है या खुर्राट, या फिर उसी की तरह कोई सड़क-छाप। शिकार के बारे में राय कायम करने के बाद ही वह आगे की योजना बनाता है। भोली-भाली लड़कियों के मामले में वह स्पर्श से शुरुआत करता है। वह जानता है, अच्छे घर की लड़कियाँ लज्जावश उसे बर्दाश्त करती रहती हैं और धीरे-धीरे पूरी तरह उसके चंगुल में फँस जाती हैं।

सत्ते की नजरें ड्राइवर के सामने वाले शीशे के बाहर सड़क पर स्थिर थीं...चेहरे पर दीन-दुनिया से बेखबरी का भाव लिये। बस की गति के साथ उसके और युवती के बीच की बची-खुची दूरी भी कम होती जा रही थी।

उसने पतलून से कटर निकालकर अपनी कमीज की ऊपर वाली जेब में रख लिया था, ताकि मौका मिलते ही इस्तेमाल कर सके।

सत्ते अजीब उलझन में था। वह पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पा रहा था। युवती का पति उसके सामने आकर उसकी एकाग्रता को भंग कर देता था...क्या सोचकर उसने उसे अपनी पत्नी के साथ की सीट पर बैठने को कहा होगा...उस युवक ने निश्चित रूप से उसे शरीफ आदमी समझा होगा। सत्ते के यार-दोस्तों का कहना है कि गुंडई तो सत्ते की आँखों से हर वक्त टपकती रहती है...तो फिर? उस युवक की आँखें हवा में तैरती हुई आईं और उसके सामने स्थिर हो गईं...उसने ध्यान से देखा...ऐसी साफ-धुली आँखें उसने अपने जीवन में किसी की नहीं देखी थीं...बिल्कुल साफ, निर्दोष, चम-चम चमकती आँखें।

युवती ऊँघने लगी थी।

बस गजरौला अड्डे पर रुकी तो भीड़ का रेला बस में आया। चढ़ने-उतरने वालों के बीच धक्का-मुक्की का माहौल था। सत्ते को तो ऐसे ही मौके की तलाश रहती है। भीड़-भाड़ में अपना काम आसानी से निबटाकर वह खिसक लेता है।

इस बार वह चाहकर भी मौके का फायदा नहीं उठा सका। विचित्र-सी शिथिलता उस पर छाती जा रही थी। सत्ते को अपनी कमजोरी पर आश्चर्य हुआ, पर वह निश्चिंत था-अपने काम के लिए दो घंटे का समय उसके पास था।

बस अब चौड़ी- चिकनी सड़क पर पहले से कहीं तीव्र गति से भागी जा रही थी। ऐसा लगता था मानो युवती कई रातों की जागी हो, क्योंकि वह चाहते हुए भी खुद पर नियंत्रण नहीं रख पा रही थी। ऊँघते हुए उसका सिर बार-बार आगे की ओर लुढ़क जाता था। बस में दूसरे यात्री भी ऊँघने लगे थे। किसी का ध्यान सत्ते की ओर नहीं था। सत्ते के सामने स्वर्ण अवसर था, पर वह खुद को बेबस महसूस कर रहा था...उसकी आँखों के सामने धुंध -सी फैलती जा रही थी...उसने महसूस किया कि उसका शरीर धीरे-धीरे एक पेड़ में तबदील हो रहा है...पहले पैर तने के रूप में फिर बाहें शाखाओं के रूप में...धीरे-धीरे वह एक घने छायादार वृक्ष में बदल जाता है...तभी कहीं से थकी-हारी चिड़िया उड़ती हुई आती है और उसकी घनी छाया के बीच एक डाल पर सुस्ताने लगती है...वह हैरानी से देखता है...चिड़िया, चिड़िया न होकर बस वाली लड़की है! एकाएक धुंध बर्फ के रूप में गिरने लगती है...बेआवाज। चारों ओर बर्फ ही बर्फ है...एक नन्ही-सी बच्ची बाहें फैलाए उसकी ओर दौड़ी आ रही है...ठंड से उसका चेहरा और होंठ नीले पड़ गए हैं...वह उससे चिपट जाती है, काँपती आवाज में कहती है, "पापा...मुझे नींद आ रही है।"

बस के हार्न से सत्ते चौंक गया। बस अभी भी सड़क का सीना चीरते हुए दौड़ी जा रही थी...युवती का सिर सत्ते के कंधे से टिका हुआ था। वह गहरी नींद में थी। सत्ते अपने काम पर बिल्कुल चौकन्ना रहता है, झपकी लेने की बात तो वह सोच भी नहीं सकता है। आज उसके साथ यह क्या हो रहा है, उसने सोचा। सपने के बारे में सोचकर उसके शरीर में झुरझुरी-सी दौड़ गई. इस सपने का क्या मतलब है? उसकी तो अभी शादी भी नहीं हुई...फिर...वह बच्ची। सपने के प्रभाव से वह खुद को मुक्त नहीं कर पा रहा था। उसने युवती को उसी तरह सोने दिया।

बस के मुरादाबाद में प्रवेश करते ही ट्रैफिक के शोर से वह जाग गई. खुद को सत्ते के कंधे पर सिर टिकाए सोते देख वह शर्म से लाल हो गई, फिर संभलकर बैठ गई। अड्डे पर बस के रुकते ही वह अन्य सवारियों के साथ उतर गई। सत्ते को जैसे लकवा मार गया था। वह युवती को जाते देखता रहा।

तभी सत्ते को लगा, युवती ने पलटकर उसकी ओर देखा है। युवती की आँखों में उसे अपने लिए आदर के भाव दिखाई दिए। युवती की आँखें भी बिल्कुल अपने पति जैसी थीं...साफ-सुथरी। सत्ते को विचित्र अनुभूति हुई। उसने अब तक लोगों की नजरों में अपने लिए नफरत और घोर उपेक्षा के भाव ही देखे थे।

विचारों में डूबता-उतराता सत्ते बस-अड्डे से सीधे अपने कमरे में लौट आया। दो दिन तक अपने कमरे से बाहर नहीं निकला। आँखें मीचे चुपचाप चारपाई पर पड़ा रहा। दोस्तों ने समझा-उस्ताद नशा करने लगे हैं।

दो दिन बाद सत्ते उस्ताद अपने कमरे से बाहर आया तो उसे दुनिया बदली-बदली नजर आ रही थी। वह घर से सीधे इरफान के मोटर गैराज पहुँचा और उससे काम माँगा। इरफान ने डरकर उसे काम पर रख लिया।

कुछ दिनों बाद जब सत्ते के हाथ का हुनर मोटरों की मरम्मत में अपना रंग जमाने लगा, तो इरफान उसकी बहुत इज्जत करने लगा। कहने वाले कहते हैं कि सत्ते उस्ताद की अँगुलियाँ मोटरों के पेंच-पुर्जों से बातें करती हैं। इस तरह अब सत्ते उस्ताद इरफान मोटर गैराज की ज़रूरत हो गया है।

सत्ते के पुराने साथी एवं चेले-चापड़ कहते फिरते हैं- "सत्ते ने चूड़ियाँ पहन ली हैं...सत्ते उस्ताद चुक गए।" सत्ते इन बातों की फिकर नहीं करता। इस तरह के फिकरे सुनकर उसके होठों पर बारीक मुस्कान रेंग जाती है। सत्ते बहुत खुश है। उसके जीवन के सबसे खुशी भरे क्षण वे होते हैं- जब वह 'ड्राइविंग सीट' पर बैठा गाड़ी का ट्रायल ले रहा होता है और उसके बगल में निश्चित बैठा कार का मालिक उसकी ओर प्रशंसा भरी नजरों से देखता है या फिर जब मोटर की स्पीड चेक करते हुए गाड़ी की गति खतरनाक हद तक बढ़ जाती है और उसके साथ बैठी मोटर की युवा मालकिन के चेहरे पर डर या असुरक्षा के भाव दिखाई नहीं देते। सत्ते उस्ताद के अनुसार उसके अतीत की पृष्ठभूमि में ये क्षण उसे ताकत देते हैं, उसे और भी मेहनत एवं ईमानदारी से काम करने के लिए प्रेरित करते हैं।

सत्ते उस्ताद की भेजी कहानी यहीं खत्म हो जाती है। कभी-कभी मुझे यह महसूस होता है कि यह कहानी सत्ते उस्ताद की कहानी न होकर, इस दुनिया के तमाम साफ-सुथरी आँखों वाले लागों की कहानी है। क्या आपको भी ऐसा लगता है!

Sep 1, 2025

चार लघुकथाएँः

 - सुकेश साहनी

1. शिक्षाकाल 

"सर, मे आय कम इन?"- उसने डरते-डरते पूछा।

"आज फिर लेट? चलो, जाकर अपनी सीट पर खड़े हो जाओ।"

वह तीर की तरह अपनी सीट की ओर बढ़ा।

"रुको!"-टीचर का कठोर स्वर उसके कानों में बजा और उसके पैर वहीं जड़ हो गए। तेजी से नज़दीक आते कदमों की आवाज़-"जेब में क्या है? निकालो।"

कक्षा में सभी की नज़रें उसकी ठसाठस भरी जेबों पर टिक गई। वह एक- एक करके जेब से सामान निकालने लगा। कंचे, तरह-तरह के पत्थर, पत्र-पत्रिकाओं से काटे गए कागज़ों के रंगीन टुकड़े, टूटा हुआ इलैक्ट्रिक टैस्टर, कुछ जंग खाए पेंच-पुर्जे।

"और क्या-क्या है? तलाशी दो।"-उनके सख्त हाथ उसकी नन्ही जेबें टटोलने लगे। तलाशी लेते उनके हाथ गर्दन से सिर की ओर बढ़ रहे थे-"यहाँ क्या छिपा रखा है?" उनकी सख्त अँगुलियाँ खोपड़ी को छेदकर अब उसके मस्तिष्क को टटोल रहीं थीं।

वह दर्द से चीख पड़ा और उसकी आँख खुल गई।

"क्या हुआ बेटा?"- माँ ने घबराकर पूछा।

"माँ, पेट में बहुत दर्द हैं"- उसने पहली बार माँ से झूठ बोला-"आज मैं स्कूल नहीं जाऊँगा।"■

2. पिंजरे 

उसके क़दमों की आहट से चौंककर नीलू ने आँखें खोलीं, उसे पहचान कर धीरे से दुम हिलाई और फिर निश्चिन्त होकर आँखें बंद कर लीं। चारों पिल्ले एक दूसरे पर गिरते पड़ते माँ की छाती से दूध पी रहे थे। वह मंत्रमुग्ध-सा उन्हें देखता रहा।

नीलू के प्यारे-प्यारे पिल्लों के बारे में सोचते हुए वह सड़क पर आ गया। सड़क पर पड़ा टिन का खाली डिब्बा उसके जूते की ठोकर से खड़खड़ाता हुआ दूर जा गिरा। वह खिलखिलाकर हँसा। उसने इस क्रिया को दोहराया। तभी उसे पिछली रात माँ के द्वारा सुनाई गई कहानी याद आ गई जिसमें एक पेड़ एक धोबी से बोलता है, "धोबिया, वे धोबिया! आम ना तोड़..."

उसने सड़क के दोनों ओर शान से खड़े पेड़ों की ओर हैरानी से देखते हुए सोचा—"पेड़ कैसे बोलते होंगे? कितना अच्छा होता, अगर कोई पेड़ मुझ से भी बात करता!"

पेड़ पर बैठे एक बंदर ने उसकी ओर देखकर मुँह बनाया और फिर डाल पर उलटा लटक गया। यह देखकर वह ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा।

ख़ुद को स्कूल के सामने खड़ा पाकर वह चौंक पड़ा। घर से स्कूल तक का लम्बा रास्ता इतनी जल्दी तय हो गया, उसे हैरानी हुई। पहली बार उसे पीठ पर टँगे भारी बस्ते का ध्यान आया। उसे गहरी उदासी ने घेर लिया। तभी पेड़ पर कोयल कुहकी। उसने हसरत भरी नज़र कोयल पर डाली और फिर मरी-मरी चाल से अपनी कक्षा की ओर चल दिया। ■

3. बोंजाई 

"मम्मी जाने दो न! "- मिक्की ने छटपटाते हुए कहा," मैदान में सभी बच्चे तो खेल रहे हैं! "

"कहा न, नहीं जाना! उन गंदे बच्चों के साथ खेलोगे?"

"मम्मी- वे गंदे नहीं हैं",फ़िर कुछ सोचते हुए बोला, "अच्छा- घर के बाहर सेठ अंकल के बरामदे में तो खेलने दो-"

"नहीं- सामने बिजी रोड है, किसी गाड़ी की चपेट में आ जाओगे।" मिसेज आनंद ने निर्णायक स्वर में कहा, "तुम्हें ढेरों गेम्स लाकर दिए हैं, कमरे में बैठकर उनसे खेलो।"

"मिक्की!" ड्राइंग रूम से मिस्टर आनंद ने आवाज़ दी।

"जी- पापा।"

"कम हियर।"

ड्राइंग रूम के बाहर मिक्की ठिठक गया। भीतर पापा के मित्र बैठे हुए थे। वह दाँतों से नाखून काटते हुए पसीने-पसीने हो गया।

उसने झिझकते हुए ड्राइंग रूम में प्रवेश किया।

"माय- सन!" आनंद साहब ने अपने दोस्त को गर्व से बताया।

"हैलो यंग मैन," उनके मित्र ने कहा, "हाऊ आर यू?"

"ज- जा- जी ई!" मिक्की हकलाकर रह गया। उसे पापा पर बहुत गुस्सा आया- क्या वह कोई नुमाईश की चीज है, जो हर मिलने वाले से उसका इस तरह परिचय करवाया जाता है।

मिस्टर आनंद फ़िर अपने मित्र के साथ बातों में व्यस्त हो गए थे। गमले में सजाए गए नींबू के बोंजाई के पास खड़ा मिक्की खिड़की से बाहर मैदान में क्रिकेट खेल रहे बच्चों को एकटक देख रहा था। ■

4. प्रक्षेपण

"रोहित, रमन अंकल के यहाँ से अख़बार माँग लाओ।"

"पापा...मैं वहाँ नहीं जाऊँगा..."

"क्या कहा? नहीं जाओगे!" उन्होंने गुस्से से रोहित को घूरा, "क्या वे अख़बार देने से मना करते हैं?"

"नहीं...पर" पाँच वर्षीय रोहित ने झुँझलाते हुए कहा, "...मैं कैसे बताऊँ... मैं जब अख़बार माँगने वहाँ जाता हूँ तो वे लोग न जाने कैसे-कैसे मेरी ओर देखते हैं।"

"किसी ने तुमसे कुछ कहा?"

सब्जी काट रही माँ हाथ रोकर बेटे की ओर देखने लगी, नीतू भी अपने छोटे भाई के नज़दीक आकर खड़ी हो गई।

"कुछ कहा तो नहीं पर..." उसे चेहरे पर अपनी बात न कह पाने की बेबसी साफ़ दिखाई दे रही थी, "मैं जब अख़बार माँगता हूँ तो वे लोग आपस में एक दूसरे की ओर इस तरह देखते हैं कि...मुझे अच्छा नहीं लगता है!"

"वे रोजाना अख़बार दे देते हैं...तुझसे कभी कुछ कहा भी नहीं, फिर क्यों नहीं जाएगा?" उन्होंने आँखें निकालीं।

"नवाब साहब को अच्छा नहीं लगता! ...कामचोर!" सब्जी काटते हुए माँ बड़बड़ाई।

"पापा, ये बहुत बहानेबाज हो गया है।" नीतू भी बोली।

"अब जाता क्यों नहीं?" उन्होंने दाँत पीसते हुए रोहित की ओर थप्पड़ ताना।

रोहित डरकर रमन अंकल के घर की तरफ़ चल दिया। बरामदे में उनका झबरा कटोरे से दूध पी रहा था। रोहित का मन हुआ-लौट जाए। उसने पीछे मुड़कर अपने घर की ओर देखा। उसे लगा, पापा अभी भी जलती हुई आँखों से उसे घूर रहे हैं।

उसने दीर्घ निःश्वास छोड़ी उसकी आँखों की चमक मंद पड़ती चली गई. उसने बेजान कदमों से रमन अंकल के घर में प्रवेश किया। ■

Dec 1, 2024

लघुकथाः 1.नागरिक, 2. हैड एंड टेल, 3.अंन्ततः

  - सुकेश साहनी

1. नागरिक

‘‘क्या हुआ,बेटी?’’ बूढ़ी आँखों में हैरानी थी।

‘‘कैसी अजीब आवाजें निकाल रहे हैं,’’ बहू ने तिनमिनाकर कहा, ‘‘गुड़िया डरकर रोने लगी है, कितनी मुश्किल से सुलाया था उसको!’’

‘‘अच्छा!’’ उन्हें हैरानी हुई, ‘‘नींद में पता ही नहीं चला, ऐसा पहले तो कभी नहीं हुआ!’’ पैर में बँधे ट्रेक्शन की वजह से वह खुद को बहुत असहाय पा रहे थे। उन्हें गाँव की खुली हवा में साँस लेने की आदत थी। महानगरों के डिब्बेनुमा मकानों में उनका दम घुटता था। पिछले दिनों गाँव में हैडपम्प पर नहाते हुए उनका पैर फिसल गया था और कुल्हे की हड्डी टूट गई थी। खबर मिलने पर बेटा उन्हें इलाज के लिए शहर ले आया था। डाक्टरों की राय थी कि आपरेशन कर दिया जाए, ताकि वे जल्दी ही चलने फिरने लगे। दूसरे विकल्प के रूप में ट्रेक्शन था, जिसमें छह महीने तक एक ही पोजीशन में लेटे रहने के बावजूद इस उम्र में हड्डी जुड़ने की संभावना काफी कम थी, बेड सोल और पेट संबंधी विकारों का खतरा अलग से था। सभी बातों पर गौर करने के बाद बेटे ने आपरेशन कराने का फैसला किया, तो बहू ने रौद्र रूप धारण कर लिया था, ‘‘अपनी सारी बचत इनके इलाज पर लगा दोगे, तो गुड़िया की शादी पर किससे भीख माँगोगे? पड़े–पड़े जुड़ जाएगी इनकी हड्डी, फिर जल्दी ठीक होकर इन्हें कौन- सा खेतों में हल चलाना है।’’

अंतत: उनके पैर में ट्रेक्शन बाँध दिया गया था।

सोचते–सोचते फिर उनकी आँख लग गई और वे जोर–जोर से खर्राटे लेने लगे। ‘‘हे भगवान!’’ बिस्तर पर करवटें बदलते हुए बहू भुनभुनाई।

‘‘उधर ध्यान मत दो, सोने की कोशिश करो।’’ पति ने सलाह दी।

‘‘दिन भर काम में खटते रहो,’’ वह बड़बड़ाई, ‘‘जब दो घड़ी आराम का समय होता है, तो ये शुरू हो जाते हैं। कुछ करो, नहीं तो मैं पागल हो जाऊँगी।’’

झल्लाकर वह उठा, दनदनाता हुआ वह पिता के पास पहुँचा और उन्हें झकझोर कर उठा दिया।

बेटे की इस अप्रत्याशित हरकत से वे भौंचक्के रह गए। ट्रेक्शन लगे पैर में कूल्हे के पास असहनीय पीड़ा हुई और उनके मुख से चीख निकल गई।

‘‘खर्राटे लेना बंद कीजिए,’’ पीड़ा से विकृत उनके चेहरे की परवाह किए बिना वह चिल्लाया, ‘‘आपकी वजह से घर में सबकी नींद हराम हो गई है।’’

बेटे से ऐसे व्यवहार की वे कल्पना भी नहीं कर सकते थे। थोड़ी देर तक उनकी समझ में कुछ नहीं आया, पर सच्चाई का आभास होते ही उनकी आँखें ही नहीं पूरा शरीर डब- डब करने लगा। आँखों की कोरों से कुछ आँसू निकले और दाढ़ी में गुम हो गए।

उस रात फिर उनके खर्राटे किसी को सुनाई नहीं दिए। सुबह उनका शरीर बिस्तर पर निश्चल पड़ा था। फटी–फटी चुनौती–सी देती आँखें छत पर टिकी हुई थीं।

पिता के दाह–संस्कार के बाद मृत्यु पंजीयन रजिस्टर में शहरी बेटे ने मृत्यु का कारण लिखाया–ओल्ड ऐज।

2. हैड एंड टेल 

हम ख़ुशी से उछल पड़े, टॉस हमारे पक्ष में गया था। अब उन दो रास्तों में से किसी एक को हम चुन सकते थे।

पहला रास्ता बहुत ही बीहड़ था, उस पर चलते हुए हमें आग उगलते सूरज का सामना करना पड़ता जबकि दूसरा रास्ता समतल, साफ-सुथरा था, उसके दोनों ओर घने पेड़ों की छाया थी। उस पर चलते हुए सूर्य की ओर हमारी पीठ रहनी थी।

हमने दूसरा रास्ता चुना।

हम बेफिक्र थे। टॉस ने हमारा काम आसान कर दिया था। हमने पलक झपकते ही निर्धारित दूरी तय कर ली थी। लेकिन लक्ष्य पर पहुँचते ही हमें शॉक-सा लगा, हमारी ख़ुशी काफूर हो गई।

प्रतिद्वंद्वी टीम उस दुर्गम रास्ते से चलकर हमसे पहले ही वहाँ पहुँच कर जश्न मना रही थी। वे पसीने से तर बतर थे। श्रम की आँच से उनके चेहरे दमक रहे थे।

हमारे चेहरे बुझ गए थे। हमारे पास अपनी लम्बी होती परछाइयों के सिवा कुछ भी नहीं था।

3. अन्तत: 

"आज दफ्तर नहीं जाना हैं क्या?"

"तुम्हें दफ्तर की पड़ी है..." श्यामलाल झुँझलाकर पत्नी से बोले, "दो महीने बाद जब मैं रिटायर कर दिया जाऊँगा, तब तुम्हें आटे-दाल का भाव मालूम पड़ेगा। आज मैं ऑफिस न जाकर सेवा-मुक्ति के विरुद्ध अपने प्रत्यावेदन को अंतिम रूप दूँगा..."

"क्यों नाहक अपना खून जलाते हो, ..." पत्नी ने कहा, "अकेले तुम्हीं तो रिटायर होने नहीं जा रहे।"

"जब तुम्हारे दिमाग में भूसा भरा है तो क्यों हर मामले में अपनी टाँग अड़ाती हो?" श्यामलाल ने कुढ़कर जलती हुई आँखों से पत्नी को घूरा, "सारे कायदे-कानून हमारे लिए ही तो बने हैं। अवतार सिंह को ही ले लो, उसने शासन में अपनी ऐसी गोट फिट कर रखी है कि साठ साल की सेवा के बाद एक-एक साल के दो एक्सटेंशन ले चुका है। इन राजनीतिज्ञों को देख लो...इनके सेवा काल में उम्र कहीं आड़े नहीं आती। तुम्हें मेरी क्षमता का अभी कोई अंदाजा नहीं है, मैं आज भी तीन-चार आदमियों का काम अकेले कर सकता हूँ। आजकल के एम.ए. पास छोकरे मेरे आगे पानी भरते हैं- श्यामलाल जी यह बता दीजिए, यह एप्लीकेशन जाँच दीजिए... इस पत्र का जवाब बनवा दीजिए.। और मुझे ही रिटायर किया जा रहा है। मैं कल हर हालत में निदेशक को अपना प्रत्यावेदन भेज दूँगा।" थोड़ा रुककर बोले, "अच्छा-खासा लिखने का मूड था, तुमने चौपट करके रख दिया। थैला लाओ, ...पहले बाज़ार से सामान ले आता हूँ।"

इस बार पत्नी कुछ नहीं बोली। उसने चुपचाप थैला उन्हें थमा दिया। रोज़गार कार्यालय के सामने से लौटते हुए श्यामलाल ठिठक गए। उन्होंने हैरानी से देखा...परेशान-से इधर-उधर घूमते पच्चीस-तीस वर्षीय बूढ़े युवक-युवतियाँ ...चश्मों के मोटे-मोटे शीशों के पीछे सोचती हुई उदास आँखें...न जाने कितनी चलती-फिरती लाशें। उन बेरोज़गार युवक-युवतियों की भीड़ को एकटक देखते हुए श्यामलाल गहरी सोच में डूब गए।

सीटी की आवाज़ से श्यामलाल की पत्नी चौंक पड़ी। इस तरह की सीटी जवानी के दिनों में श्यामलाल बजाया करते थे। उसे लगा तीस साल पहले वाले जवान श्यामलाल ने घर में प्रवेश किया है। उन्होंने सामान का थैला पत्नी को दिया और मुस्कराकर बोले, "एक प्याला गर्म-गर्म चाय तो पिलाओ।" कहकर वह आरामकुर्सी पर पसर गए। अगले ही क्षण वह अपने विदाई समारोह की कल्पनाओं में खो गए थे।

Mar 7, 2024

लघुकथाः अथ विकास कथा

 - सुकेश साहनी

बड़े साहब के चेम्बर में बड़े बाबू विकास सम्बंधी कार्यों के बिल पारित करवा रहे थे। ब्रीफिंग के लिए छोटे साहब भी वहाँ मौजूद थे।

"यह बिल किस काम का है?" बीस लाख के एक बिल पर हस्ताक्षर करने से पहले बड़े साहब ने जानना चाहा।

"सर, यह बिल उस पीरियड से सम्बंधित कार्यों का है, जब माननीय मंत्री जी क्षेत्रीय निरीक्षण पर आए थे।"

"ग्राम मेवली में कुछ ज़्यादा ही ख़र्च नहीं हो गया?" अगले बिल को देखते हुए बड़े साहब ने पूछा।

"नहीं सर! दीवाली पर प्रमुख सचिव महोदय से आपकी जो वार्ता हुई थी, उसी के अनुसार बिल तैयार कराए गए हैं।"

" ये छोटे-छोटे कई बिल......?

"ये सभी बिल चीफ साहब से सम्बंधित है, जब नैनीताल से लौटते हुए उन्होंने तीन दिन हमारे क्षेत्र में आकस्मिक निरीक्षण हेतु हाल्ट किया था।"

"हमारी बेटी की शादी भी करीब आ गई है।" बड़े साहब ने अर्थपूर्ण ढंग से छोटे साहब की ओर देखा।

"पूरी तैयारी है, सर!" छोटे साहब ने उत्साह से बताया और बड़े बाबू ने तत्काल एक बिल बड़े साहब के सामने हस्ताक्षर हेतु रख दिया।

"इन बिलों को शामिल करते हुए क्षेत्र के विकास के लिए प्राप्त कुल धनराशि के विरूद्ध खर्चे की क्या स्थिति है?"

"शत प्रतिशत!" छोटे साहब ने चहकते हुए बताया।

"एक्सीलेंट जॉब!" बड़े साहब ने शाबाशी दी।

                                  ■


Dec 2, 2022

लघुकथाः इमीटेशन

- खलील जिब्रान (अनुवाद :सुकेश साहनी)

शरतकाल में मैंने अपने सभी दुखों को एकत्र कर अपने बगीचे में दफना दिया।

जब अप्रैल में वसन्त ने धरती को अपने आलिंगन में लिया तो मेरे बगीचे में दूसरे फूलों से अलग बहुत ही खूबसूरत फूल उग आए।

और तब मेरे पड़ोसी उन फूलों को देखने आए और मुझसे बोले, "अगले शरत में बुवाई के समय इन फूलों के बीज हमें भी देना ताकि हम भी इनसे अपने बगीचों की शोभा बढ़ा सकें। ●

Nov 1, 2022

कहानीः बकरी

- सुकेश साहनी
आँख खुलते ही रात वाली घटना फिर उसकी आँखों के आगे घूमने लगी। वह ऐसा कैसे कर सकता है? कहीं वह कोई सपना तो नहीं देख रहा? उसे आशा बँधी।

वह धीरे से उठा, शरीर में जैसे जान ही नहीं थी। पैर घसीटते हुए वह अलमारी तक पहुँचा, काँपते हाथों से ड्राअर खोल के देखा, सच्चाई उसे मुँह चिढ़ाती नजर आईं, वह बुझे मन से चारपाई पर ढेर हो गया।

उसका सिर किसी फोड़े की तरह दुख रहा था। उस घटना के बाद रात भर वह अंगारों पर लोटता रहा था। कुछ देर पहले आँख लगी थी, मुश्किल से एक घंटे की नींद ली होगी।

बंद दरवाजे के नीचे से अखबार फर्श पर फिसलता हुआ चारपाई के पास आकर टिक गया। उसने अखबार उठाने के लिए हाथ नहीं बढ़ाया। सूनी-सूनी आँखों से हैड लाइंस को ताकता रहा। उसे डर था कि अखबार खोलते ही रात वाली घटना उसमें छपी दिखाई देगी।

दीवार पर टँगे फोटोग्राफ में पत्नी ने उसके गले में बाहें डाल रखी थीं और वह मुस्करा रहा था। क्या वह इस लायक है कि पत्नी उसके गली में बाहें डाले? उसने सोचा और फिर जल्दी से फोटो पर से नजरें हटा लीं।

वॉशबेसिन में कुल्ला करते हुए उसकी नजर आईने पर पड़ी, तो वह एकटक देखता रह गया। रात भर में उसका चेहरा कितना बदल गया है, आज अपनी ही आँखें ...नाक...होंठ...सब कितने पराए- से लग रहे हैं...

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

वह इस तरह चौंका मानो किसी ने चोरी करते पकड़ लिया हो। उसने जल्दी-जल्दी चेहरे पर पानी के छींटे मारे॥ फिर तौलिए से जोर-जोर से चेहरा रगड़ने लगा मानो उस पर चिपकी किसी वस्तु को रगड़ कर छुड़ा देना चाहता हो।

दरवाजे तक आते-आते उसके माथे पर पसीने की नन्ही-नन्ही बूँदे चमकने लगीं। उसने झिझकते हुए दरवाजा खोला।

सामने शुचि खड़ी थी।

दालान के बाहर लोहे का गेट खुला हुआ था। शांति मौसी के घर के बाहर बँधी बिंदिया उसे स्पष्ट नजर आ रही थी। उसे लगा वह तिरछी आँखों से उसी को घूर रही है, बकरी के चेहरे पर उसे उसके प्रति घृणा और उपहास के मिले-जुले भाव दिखाई दे रहे थे। उसकी आँखें झुक गई, पीठ में झुरझुरी-सी दौड़ गईं।

"अंकल...यह प्राब्लम सोल्व करवा दीजिए"- शुचि कह रही थी।

कल तक बिंदिया की आँखों में उसके प्रति कितना प्यार दिखाई देता था और आज इतनी नफरत...

"अंकल, क्या हुआ है आपको" -शुचि ने फिर कहा।

वह अपने चारों ओर विचित्र-सी रिक्तता महसूस कर रहा था...एक शून्य, जो उसे बार-बार सोच के गहरे कुएँ में उतार ले जाता था, शुचि की आवाज उसे बहुत दूर से आती मालूम दे रही थी। उसने सिर झटका, पर सोच के चुम्बक ने फिर उसे गहरे कुएँ में खींच लिया...क्या अब वह शुचि को भीतर आने के लिए कह सकता है? ...शिथिलता की एक और परत उसके शरीर पर चढ़ती चली गई। शुचि फिर प्रॉब्लम सॉल्व करवाने को कह रही थी।

"माँ ने नाश्ते के लिए भी बुलाया है।" शुचि की समझ में नहीं आ रहा था कि आज अंकल को हुआ क्या है, न बोलते हैं...न चालते हैं, भीतर आने को भी नहीं कहा। पहले चाहे कितने भी बिजी हो...सारे काम छोड़कर प्रॉब्लम समझाने बैठ जाते थे, हँसोड़ इतने कि हँसते-हँसते पेट में दर्द हो जाए।

" शुचि, तुम चलो...मैं आता हूँ। उसने कमजोर आवाज में कहा।

" प्रॉब्लम  कब समझाएँगे?"

"वहीं ...वहीं समझा दूँगा।" उसने जल्दी से कहा और खट से दरवाजा बंद कर लिया। उसने साफ महसूस किया कि दरवाजे के उस तरफ शुचि अभी तक खड़ी है। मानो उसके अप्रत्याशित व्यवहार ने उसके पैरों को अभी तक जकड़ रखा हो।

वह शांति मौसी के घर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। सबसे अधिक डर उसे बिंदिया से था । जो मौसी के घर के प्रवेश द्वार पर ही बँधी थी। बिंदिया का कल रात वाला आक्रामक पोज किसी सिनेमा स्लाइड की तरह बार-बार उसकी आँखों के आगे आने लगा। उसने ठंडी साँस छोड़ी। मौसी के घर जाए बिना काम नहीं चलेगा। उसे पता था कि अब यदि उसने और देर की तो मौसी खुद चली आएँगी और अपने प्यार भरे अंदाज से उसकी खबर लेंगी। वह जैसे-तैसे तैयार हुआ और फिर घर से बाहर आ गया।

 उसे बिंदिया से आँख मिलाने की हिम्मत नहीं हुई।  वह उससे थोड़ी दूर पर ठिठक गया। मौसी के घर के भीतर जाने के लिए बिंदिया के बिल्कुल नजदीक से होकर गुजरना था। उसे बकरी से डर लग रहा था।

उसका इस तरह खड़े रहना गली से गुजर रहे लोगों को और अटपटा लग सकता था, यह महसूस कर उसने हिम्मत बटोरी और बिंदिया की ओर देखे बिना तीर की तरह मौसी के घर में घुस गया। उसके नजदीक से गुजरते हुए उसे लगा था, मानो बिंदिया ने अपने सींग तेजी से उसकी ओर घुमाए थे। तीस कदम का फासला उसे मीलों लंबा मालूम हुआ। वह बैठक में पहुँचकर कुर्सी पर ढह गया।

"क्या हुआ बेटा?" मौसी ने कमरे में आते हुए कहा।

"कुछ नहीं...कुछ भी तो नहीं" -वह सकपकाकर कुर्सी पर सीधा हो गया।

"तबीयत तो ठीक है न?" मौसी ने नजदीक आकर उसके माथे पर हाथ रखा तो उसकी आँखें नम हो गई।

"मैं बिल्कुल ठीक हूँ ...आप चिंता ...न करें।" उसने आँख मिलाए बिना कहा, ताकि वे उसकी आँखों के भाव न पढ़ सकें।

"शुचि भी कह रही थी कि तुम कुछ परेशान दिखाई दे रहे थे, बेटा मैं भी तुम्हारी माँ जैसी हूँ...मुझसे कुछ मत छिपाना। दफ्तर की कोई परेशानी है क्या?"

उसे लगा मौसी इसी तरह पूछताछ करती रहीं तो वह अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रख पाएगा।

मौसी सब ठीक-ठाक है। आप तो वैसे ही परेशान हो रही हैं...सिर में हल्का दर्द है...बस, वह खोखली हँसी हँसा। "

"पहले क्यों नहीं बताया? तू नाश्ता कर ले, शुचि बाम मल देगी।" उन्होंने ममता भरे स्वर में कहा।

"मामूली दर्द है...अपने आप ठीक हो जाएगा।"

"बहू और बच्चे मायके से कब लौटेंगे?"

"कल वापस आ जाएँगे।" उसने बताया।

"आने दे बहू को, कहूँगी-तुझे अकेला न छोड़ा करे।"

मौसी ने अपनी बात बहुत स्वाभाविक ढंग से कही थी, पर उसका ध्यान रात वाली घटना की ओर खिंच गया और उसका चेहरा बिल्कुल सफेद हो गया...यदि कल रात रमा घर में होती, तो वह ऐसा काम करता...शायद नहीं। यह सोचकर वह और उदास हो गया... शुचि पकौड़े भरी प्लेट उसके सामने रख गई थी। उसकी कुछ भी खाने-पीने की इच्छा नहीं हो रही थी। पर मौसी के सामने उसकी एक नहीं चलने वाली थी। उसने बेमन से एक पकौड़ा उठाया और धीरे-धीरे कुतरने लगा।

"अंकल, अब तो सवाल समझा दो।" नाश्ते के बाद शुचि फिर किताब लेकर उसके सामने आ खड़ी हुई.

वह सोच के कुएँ में डूबा हुआ था।

' शुचि आज मन नहीं है, कल समझा दूँगा"- उसने छत की ओर देखते हुए कहा।

"शुचि!" तभी मौसी ने कमरे में प्रवेश करते हुए कहा, "तू फिर उसे तंग करने लगी, उसके सिर में दर्द है, तू अपने सवाल रहने दे बाम लाकर मल दे।"

"बाम की कोई ज़रूरत नहीं है..." उसने कहना चाहा।

"पागल कहीं का!" मौसी ने प्यार से झिड़कते हुए कहा, अपनी मौसी से शर्म करता है? आज वीराँवाली होती तो तेरे इतने दर्द पर पूरा घर सिर पर उठा लेती।

शुचि न जाने कब बाम की शीशी लेकर उसके पीछे आ खड़ी हुई थी और हल्के हाथों से माथे पर बाम मल रही थी। बाहर बिंदिया की 'मे...मय' काफी बढ़ रही थी। उसे लगा जब से वह मौसी के घर में आया है, बकरी कुछ ज़्यादा ही शोर करने लगी है मानो अपनी जुबान में चिल्ला-चिल्लाकर मौसी से कल वाली घटना का बयान कर रही हो, उसके शरीर में कंपकंपी-सी दौड़ गई।

"बेटी, तूने स्टोर वाली अलमारी में देखा कि नहीं? इस बुढ़ापे में भूलने की बीमारी भी लग जाती है।"

"माँ, मिल जाएगा। तुमने कहीं सँभालकर ही रखा होगा। पहले भी कई बार ऐसा हो चुका है।" शुचि ने तसल्ली दी।

"क्या खो गया?" जानते हुए भी उसे पूछना पड़ा। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा था।

"बेटा, मेरा सोने का हार नहीं मिल रहा, पूरे दस तोले का है,"- मौसी ने बताया, "पता नहीं कहाँ रख दिया है।"

"घर से कहाँ जाएगा," उसने कमजोर आवाज में कहा, "मिल जाएगा।"

बिंदिया जोर-जोर से "मे..." करने लगी थी। उसे लगा जैसे बकरी ने उनकी बातें सुन ली हैं और अपना रोष प्रकट कर रही है। उसकी आँखों के आगे वह दृश्य फ्रीज हो गया, जब गुस्से में उबलते हुए बिंदिया ने अपने नन्हे सींग आक्रमण की मुद्रा में उसकी ओर ताने थे।

"बेटा, तू किसी जानवरों के डॉक्टर को जानता है।" मौसी ने उससे पूछा।

“डॉक्टर की क्या ज़रूरत पड़ गई? "

"बेटा, बिंदिया पेट से है...कल रात से तबीयत कुछ ज़्यादा खराब लगती है...बहुत बेचैन है, शोर बहुत मचा रही है, सोचती हूँ डाक्टर को दिखा दूँ..."

"पता करके बताऊँगा।" बड़ी मुश्किल से इतना कह पाया। बिंदिया की तबीयत के लिए वह खुद को जिम्मेदार समझ रहा था...डंडे का पहला वार बिंदिया के पेट पर ही तो हुआ था...वह इतना क्रूर भी हो सकता है? उसे अपने आप से नफरत-सी हुई, इसका मतलब तो ये हुआ कि यदि अवसर मिले, तो वह किसी भी स्तर तक नीचे गिर सकता है। कुर्सी पर उसका शरीर किसी लकड़ी की तरह अकड़ गया था...क्या वह इस लायक है कि शुचि जैसी भोली लड़की उसके नजदीक भी फटके..."

"शुचि ...बस करो।" उसके मुँह से निकला।

"चुपचाप बैठे रहिए," शुचि ने आदेश भरे अंदाज में कहा, "अभी सिर तो दबाया ही नहीं।"

"कहा न छोड़ दो!" वह चिल्ला पड़ा।

मौसी और शुचि हक्के-बक्के रह गये।

"क्या हुआ बेटा? शुचि! तूने ज़रूर कोई शरारत की होगी।" मौसी को हाथ-पाँव पड़ गए थे।

"मैंने कुछ भी नहीं किया, माँ।" शुचि घबराकर रोने-रोने को हो आई।

यह देखकर वह और भी घबरा गया।

"मौसी!" अगले ही क्षण वह खुद को नियंत्रित करते हुए बोला, "शुचि ने कुछ नहीं किया। मैं बिल्कुल ठीक हूँ। घर जाकर थोड़ी देर लेटूँगा तो बिल्कुल ठीक हो जाऊँगा।"

कहकर वह कमरे से बाहर आ गया। उसकी आँखें बिंदिया की आँखों से टकरा गईं...दो घृणा भरी आँखें ...खिल्ली उड़ाने के अंदाज से लटका हुआ मुँह...वह सिहर उठा। उसने आँखें झुका लीं और जल्दी से घर के भीतर घुस गया। एक प्रश्न लगातार उसके सामने मुँह बाए खड़ा था-कल जब रमा लौटेगी...तब?

“तुम्हें हुआ क्या है? " रमा ने पूछा।

"कुछ नहीं...तुम सो जाओ."

"जब से आई हूँ , तुम उखड़े-उखड़े लग रहे हो, बच्चों से भी ढंग से बात नहीं की। आखिर हुआ क्या है?"

 "इस बार मम्मी ने आपके लिए गर्म सूट का कपड़ा नहीं दिया, इसलिए नाराज हैं?"

"तुम मुझे इतना कमीना आदमी समझती हो?" वह बिफर पड़ा। तभी जैसे किसी अदृश्य रिमोट कंट्रोल से रात वाली घटना उसके मस्तिष्क में सजीव हो उठी। वह हवा निकले गुब्बारे की तरह सिकुड़ गया और फिर पत्नी की ओर से करवट लेकर लेट गया।

"इधर मुँह करो न, इतने दिनों बाद मिले हैं, फिर भी तुम..." पत्नी ने अपने शरीर का भार उसकी पीठ पर छोड़ा तो चौंक पड़ी। इतनी गर्मी में भी उसका शरीर बर्फ की तरह ठंडा था।

वह घबरा गई। उसने लपककर लाइट जला दी।

पति का चेहरा हल्दी जैसा पीला हो रहा था।

"तुम मुझसे कुछ छिपा रहे हो?"

"पागल मत बनो...लाइट बंद कर दो।" उसने आँखों पर हाथ रखते हुए कहा।

" तुम्हें मेरी कसम, जो मुझसे कुछ छिपाओ।

वह उठकर बैठ गया। पत्नी से बिना आँख मिलाए काँपती आवाज में बुदबुदाया, "सुनोगी तो तुम मुझसे नफरत करने लगोगी, शायद तुम्हें विश्वास ही न हो..."

"ऐसा क्या कर दिया तुमने?" वह हैरान थी।

"परसों रात की बात है," उसने कहना शुरू किया, "' मैं रमन के घर से लौटा, तो देखा बिंदिया हमारे दालान में घूम रही है। पहले भी कई बार वह हमारे यहाँ आ जाती थी, मैं मौसी को आवाज देकर बकरी ले जाने के लिए बुलाने ही वाला था कि मेरी नजर सींग से लटकती चमकीली-सी चीज पर पड़ी। नजदीक आकर देखा, सोने का हार था- काफी भारी। । बिंदिया तो हम लोगों से भी हिली-मिली हुई थी। वह प्यार से अपने सींग मेरी टाँगों पर रगड़ रही थी। मेरा दिल बड़ी तेजी से धड़कने लगा था। मैंने मौसी को आवाज नहीं दी, बल्कि दरवाजा खोलकर उसे भीतर आने दिया...ट्यूबलाइट की रोशनी में उसके सींग में उलझा हुआ हार चमक रहा था। मन में आया कि हार निकाल लूँ...किसी को पता नहीं चलेगा...बकरी खुद उठाकर लाई है। मौसी और शुचि को भी कभी पता नहीं चल पाएगा। मैंने बिंदिया के सींग से उलझा हार निकाल लिया और दराज में रख दिया। तभी मेरी नजर बिंदिया पर पड़ी...वह विचित्र नजरों से मेरी ओर देख रही थी... मुझे डर-सा लगा। उसकी आँखों में मेरे प्रति पहले वाला प्यार नहीं था। मैंने उसे बाहर निकालने की कोशिश की तो वह अड़ गई थी। मुझे लगा उसकी आँखों से नफरत उफन रही है और... उसने अपने सींग आक्रमण की मुद्रा में तान लिये हैं। सच कहूँ ... मैं मारे डर के काँपने लगा था। मैंने डंडा उठाया और उसके ऊपर दो-तीन वार किए। वह डरकर भाग गई थी..."

वह बुरी तरह हाँफने लगा।

“हार कहाँ है?" पत्नी ने पूछा।

वह किसी शराबी की तरह लड़खड़ाता हुआ अलमारी के पास गया और सोने का हार लाकर रमा को थमा दिया।

"उस दिन मुझे अवसर मिला और मैं नहीं चूका...! मैंने...इन्हीं हाथों से बिंदिया पर डंडे बरसाए..."

रमा तनकर बैठ गई थी और अपने पति के चेहरे पर छलक आए पसीने की असंख्य बूँदों को हैरानी से देख रही थी।

"इस हार के बारे में क्या सोचा है..."

"मौसी और शुचि को हार के चोरी हो जाने के बारे में कुछ नहीं पता है। वे समझ रही हैं कि कहीं रखकर भूल गई हैं। तुम ये हार उनके घर में कहीं रख आना..."

"ठीक ही तो है," पत्नी ने खुश होते हुए कहा।

"पर इतने परेशान क्यों हो? भूल जाओ सब कुछ।"

"इतना आसान नहीं है," उसने कमजोर काँपती आवाज में कहा, "बकरी का सामना कैसे कर पाऊँगा?"

●

सम्पर्कः 185, उत्सव, महानगर पार्ट–2, बरेली– 243122 (उ.प्र.)

Oct 6, 2020

लघुकथाः नशा

- ख़लील जिब्रान  (अनुवाद : सुकेश साहनी)

       उस धनी आदमी को अपने पास जमा शराब के भण्डार पर बहुत नाज़ था। उसके पास बहुत पुरानी शराब से भरा एक जग था, जिसे उसने किसी खास मौके के लिए सम्भाल कर रखा हुआ था।
       राज्य का गर्वनर उसके यहाँ आया तो उसने सोचा, एक मामूली गवर्नर के लिए इस जग को नहीं खोलना चाहिए।
     बिशप का आना हुआ तो उसने मन ही मन कहा, नहीं, मैं जग नहीं खोलूँगा। भला वह इसकी कीमत क्या जाने, उसकी नाक तो इसकी सुगन्ध को भी नहीं महसूस कर पाएगी।
     राजा ने आकर उसके यहाँ भोजन किया तो उसने सोचा यह कीमती शराब एक राजा के लिए नहीं है।
     यहाँ तक कि अपने भतीजे की शादी पर भी उसने खुद को समझाया-इन मेहमानों के लिए जग खोलना बेकार है।
     वर्ष बीतते गए और एक दिन वह मर गया। उस बूढ़े आदमी को भी दूसरे लोगों की तरह दफना दिया गया।
जिस दिन उसे दफनाया गया, पुरानी शराब से भरा जग भी दूसरी शराब के साथ बाहर लाया गया। अड़ोस-पड़ोस के 
किसानों ने उस शराब का आनन्द लिया, पर किसी को भी शराब की उम्र की जानकारी नहीं थी। उनके लिए तो प्यालों में 
ढाली जा रही शराब महज शराब थी।

Jun 6, 2020

गोल्डन बैल्ट

गोल्डन बैल्ट
-ख़लील जिब्रान  (अनुवाद : सुकेश साहनी)

सालामिस शहर की ओर जाते हुए दो आदमियों का साथ हो गया। दोपहर तक वे एक नदी तक आ गए, जिस पर कोई पुल नहीं था। अब उनके पास दो विकल्प थे-तैरकर नदी पार कर लें या कोई दूसरी सड़क तलाश करें।
    
‘‘तैरकर ही पार चलते हैं,’’ वे एक दूसरे से बोले, ‘‘नदी का पाट कोई बहुत चौड़ा तो नहीं है।’’

उनमें से एक आदमी, जो अच्छा तैराक था, बीच धारा में खुद पर नियंत्रण खो बैठा और तेज बहाव की ओर खिंचने लगा। दूसरा आदमी, जिसे तैरने का अभ्यास नहीं था,आराम से तैरता हुआ दूसरे किनारे पर पहुँच गया । वहाँ पहुँचकर उसने अपने साथी को बचाव के लिए हाथ पैर मारते हुए देखा तो फिर नदी में कूद पड़ा और उसे भी सुरक्षित किनारे तक ले आया।
   
‘‘तुम तो कहते थे कि तुम्हें तैरने का अभ्यास नहीं है, फिर तुम इतनी आसानी से नदी कैसे पार गए?’ पहले व्यक्ति ने पूछा।
    
‘‘दोस्त,’’ दूसरा आदमी बोला, ‘‘मेरी कमर पर बंधी यह बैल्ट देखते हो, यह सोने के सिक्कों से भरी हुई है, जिसे मैंने साल भर मेहनत कर अपनी पत्नी और बच्चों के लिए कमाया है। इसी कारण मैं आसानी से नदी पार कर गया। तैरते समय मैं अपने पत्नी और बच्चों को अपने कन्धे पर महसूस कर रहा था।’’
’

May 15, 2020

चार लघुकथाएँ

 1. आधी दुनिया
-सुकेश साहनी
  
....साड़ी पहनकर दिखाओ, लूजफिटिंग के सूट में फिगर्स का पता ही नहीं चलता... चलकर दिखाओ... लम्बाई? ऐसे नहीं-बिना सैडिंल के चाहिए... मेकअप तो नहीं किया है न?... पार्क में चलो, चेहरे का रंग खुले में ही पता चलता है... बड़ी बहन की शादी में क्या दिया था? ...क्या-क्या पका लेती हो? ...घर सम्हालना आता है? आज के समय में नौकर-मेहरी रखना ‘सेफ’ नहीं है।
  ...‘जयमाल’ के समय सूट पहनना, लहँगा-चोली नहीं चलेगा... डार्लिंग, ये देहाती औरतों वाला अंदाज़ छोड़ दो ...आज की रात हम जो कहेंगे, करना होगा ...हमसे कुछ मत छिपाना ...शादी से पहले किसी से प्यार किया था? ...कितना नमक झोंक दिया है सब्जी में?! ...स्वीटहार्ट! इधर आओ, हमारे करीब ...दिनभर की थकान हम अभी दूर किए देते हैं! ...चूमने का ये अंग्रेजी अंदाज कहाँ से सीखा? तुम तो छिपी रुस्तम निकली! ...कैसा खाना बनाया है? देखते ही भूख मर गई।
  ...खिड़की पर मत खड़ी हुआ करो ...बेमतलब खी-खी मत किया करो! ...तुम्हारे घर वालों में जरा भी अक्ल नहीं है, इस कूड़े-कबाड़ की जगह कार ही दे देते। ...अक्ल से बिल्कुल पैदल हो! प्यार करने के तरीके इन विदेशी मेमो से सीखो। ...कितनी बार कहा है बेवक्त घर का रोना मत रोया करो, सारा मजा किरकिरा हो जाता है। ...मुझसे पहले तुम कैसे सो सकती हो? ...दोस्त आएँ, तो उन्हें चाय-पानी के लिए पूछा करो। ...दोस्तों के सामने मुँह उठाए क्यों चली आती हो? उनसे ज्यादा हँस-हँसकर बात मत किया करो।
 ....बहुत फालतू-खर्च करने लगी हो!! ...तुम्हारे खानदान में किसी ने बेटा जना है जो तुम जनोगी! मैं तो फँस गया!! ...दिन-रात मायकेवालों का जाप मत किया करो। ...किसे चाय-पानी के लिए पूछना है किसे नहीं, ये सब भी सिखाना पड़ेगा तुम्हें? ...तुम्हारी बहन की शादी में बहुत माल खर्च कर रहे हैं, हमें तो बहुत सस्ते में ही निबटा दिया था बुढ़ऊ ने।
  ...आए दिन पर्स उठाकर कहाँ चल देती हो? घर का नाम मत डुबो देना! ...बेटियों को चौपट करोगी तुम! भगवान के लिए उन्हें अपने जैसा मत बनाना। ...रोजाना माँ को देखने मत चल दिया करो। बुढ़िया के प्राण इतनी आसानी से नहीं निकलने वाले, अब ‘खबर’ आने पर ही जाना। ...दिन-रात घुटनों को लेकर ‘हाय-हाय’ करना छोड़ दो। घर में घुसते ही मूड खराब हो जाता है।
  ...कितनी ठंडी होती जा रही हो दिन-ब-दिन! ...मोहल्ले की इन दो टके की औरतों से बात मत किया करो ...अब ये रोना धोना बंद करो! माँ के मरने पर नहीं पहुँच सकी तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा। ...ये चोंचले मुझे मत दिखाओ! ...ज्यादा अगर-मगर मत करो ...शक्की बुढ़िया की तरह ‘बिहेव’ मत करो ...दिमाग का इलाज कराओ ...सिर मत खाओ ....ज्यादा चीं-चपड़ मत करो! मुझसे ऊँची आवाज में बात मत करना ...तुम्हारी ये मजाल?! ....मुझे आँखें दिखाती हो! निकलो ...अभी निकलो ‘मेरे’ घर से।

2.सेल्फी
   
उसका पूरा ध्यान आँगन में खेल रहे बच्चों की ओर था। शुचि की चुलबुली हरकतों को देखकर उसे बार-बार हँसी आ जाती थी। कल शुचि जैसी बच्ची उसकी गोद में भी होगी, सोचकर उसका हाथ अपने पेट पर चला गया। उसे पता ही नहीं चला कब राकेश उसके पीछे आकर खड़ा हो गया था।
   ‘‘जान! आज हम तुम्हारे लिए कुछ स्पेशल लाए हैं।’’
  ‘‘क्या है?’’
 ‘‘पहले तुम आँखें बंद करो, आज हम अपनी बेगम को अपने हाथ से खिलाएँगे।’’ राकेश ने अपने हाथ पीठ पीछे छिपा रखे थे।
   ‘‘दिखाओ, मुझे तो अजीब-सी गंध आ रही है।’’
  ‘‘पनीर पकौड़ा है-स्पेशल!’’ उसके होठों पर रहस्यमयी मुस्कान थी।
  उसका ध्यान फिर शुचि की ओर चला गया, वह मछली बनी हुई थी, बच्चे उसके चारों ओर गोल दायरे में घूम रहे थे, ‘‘हरा समंदर, गोपी चंदर। बोल मेरी मछली कितना पानी? शुचि ने अपना दाहिना हाथ घुटनों तक ले जाकर कहा, ‘‘इत्ता पानी!’’
  ‘‘कहाँ ध्यान है तुम्हारा?’’ ,राकेश ने टोका, ‘‘लो, निगल जाओ!’’
  ‘‘है क्या? क्यों खिला रहे हो!’’
  ‘‘सब बता दूँगा, पहले तुम खा लो....।’’
  आँगन से बच्चों की आवाजें साफ सुनाई दे रही थी, ‘‘बोल मेरी मछली…  पानी’’ छाती तक हाथ ले जाकर बोलती शुचि, ‘‘इत्ता .. इत्ता पानी!’’
  ‘‘मुझसे नहीं खाया जाएगा।’’
  ‘‘तुम्हें आने वाले बच्चे की कसम.... खा लो।’’
  ‘‘तुम्हें हुआ क्या है? कैसे बिहेव कर रहे हो, क्यों खिलाना चाहते हो?’’
  ‘‘यार, तुम भी जिद करने लगती हो, दादी माँ का नुस्खा है आजमाया हुआ। इसको खाने से शर्तिया लड़का पैदा होता है।’’
  सुनते ही चटाख से उसके भीतर कुछ टूटा, राकेश उससे कुछ कह रहा था, पर उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। वह डबडब करती आँखों से देखती है ...शुचि की जगह वह खड़ी है, बच्चे उसके चारों ओर गोलदायरे में दौड़ते हुए एक स्वर में पूछ रहे हैं ...बोल मेरी मछली ...कित्ता पानी? उसकी आँखों में दृढ़ निश्चय दिखाई देने लगता है ...अब तो पानी सिर से ऊपर हो गया है। वह अपना हाथ सिर से ऊँचा उठाकर कहती है, ... इत्ता ...इतना पानी!!!
  ‘‘क्या हुआ?’’राकेश ने मलाई में लिपटी दवा उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा,’’आइ लव यू, यार!!’’
  ‘‘नहीं!!’’ राकेश के हाथ को परे धकेलते हुए सर्द आवाज में उसने कहा, ‘‘दरअसल तुम मुझे नहीं, मुझमें खुद को ही प्यार करते हो!’’

3. ब्रेक पांइट
  ‘
‘माँ जी, आपके पति बहुत बहादुर हैं...’’ राउण्ड पर आए डॉक्टर ने नाथ की पत्नी से कहा, ‘‘एकबारगी हम भी घबरा गए थे, पर उस समय भी इन्होंने हिम्मत नहीं हारी थी। अब खतरे से बाहर हैं।’’
  पूरे अस्पताल में नाथ की बहादुरी के चर्चे थे। चलती ट्रेन  से गिरकर उनका एक बाजू कट गया था और सिर में गम्भीर चोट आई थीं। घायल होने के बावजूद उन्होंने दुर्घटना स्थल से अपना कटा हुआ बाजू उठा लिया था और दूसरे यात्री की मदद से टैक्सी में बैठकर अस्पताल पहुँच गए थे। चार घण्टे तक चले जटिल ऑपरेशन के बाद वह सात दिन तक आई.सी.यू. में जिंदगी और मौत के बीच झूलते रहे थे। आज डॉक्टरों ने उन्हें खतरे से बाहर घोषित कर जनरल वार्ड में शिफ्ट कर दिया था।
  ‘‘विक्की दिखाई नहीं दे रहा है...?’’ दवाइयों के नशे से बाहर आते ही उन्होंने पत्नी से बेटे के बारे में पूछा।
  ‘‘सुबह से यहीं था, अभी-अभी घर गया है।’’ शीला ने झूठ बोला, जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल उलट थी। माँ-बाप को छोड़कर सपत्नीक अलग रह रहा पुत्र अपनी नाराजगी के चलते पिता के एक्सीडेंट की बात जानकर भी उन्हें देखने अस्पताल नहीं आया था।
  थोड़ी देर तक दोनों के बीच मौन छाया रहा।
  ‘‘मेरे ऑपरेशन की फीस किसने दी थी?’’  उन्होंने फिर पत्नी से पूछा।
  इस दफा शीला से कुछ बोला नहीं गया। वह चुप रही। नाथ ने आँखें खोलीं और सीधे पत्नी की आँखों में झाँकने लगे। शीला ने जल्दी से आँखें चुरा लीं। उनको अपनी जीवनसंगिनी का चेहरा पढ़ने में देर नहीं लगी। उनकी आँखें पत्नी की कलाई पर ठहर गईं, जहाँ से सोने की चूड़ियाँ गायब थीं।
  ‘‘शाबाश पुत्र!!’’ उनके मुँह से दर्द से डूबे शब्द निकले और उनकी आँखें डबडबा आईं।
  शीला ने पैंतीस वर्ष के वैवाहिक जीवन में पहली बार अपने पति की आँखों में आँसू देखे तो उसका कलेजा मुँह को आने लगा। यह पहला अवसर नहीं था जब जवान बेटे ने उनके दिल को ठेस पहुँचाई थी, पर हर बार बेटे की इस तरह की हरकतों को उसकी नादानी कहकर टाल दिया करते थे।
  एकाएक उनकी तबियत बिगड़ने लगी। डयूटी रूम की ओर दौड़ती हुई नर्सें... ब्लड प्रेशर नापता डाक्टर... इंजेक्शन तैयार करती स्टाफ नर्स....
  उनकी साँस झटके ले लेकर चल रही थी...
  डॉक्टर ने निराशा से सिर हिलाया और चादर से उनका मुँह ढक दिया। वह हैरान था, उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि जिस आदमी ने अपनी बहादुरी और जीने की प्रबल इच्छा के बल पर सिर पर मँडराती मौत को दूर भगा दिया था, उसी ने एकाएक दूर जाती मौत के आगे घुटने क्यों टेक दिए थे?!

4.विजेता

"बाबा, खेलो न!"
"दोस्त, अब तुम जाओ। तुम्हारी माँ तुम्हें ढूँढ रही होगी।"
"माँ को पता है, मैं तुम्हारे पास हूँ । वो बिल्कुल परेशान नहीं होगी। पकड़म-पकड़ाई ही खेल लो!"
"बेटा, तुम पड़ोस के बच्चों के साथ खेल लो। मुझे अपना खाना भी तो बनाना है।"
"मुझे नहीं खेलना उनके साथ । वे अपने खिलौने भी नहीं छूने देते ।" ...अगले ही क्षण कुछ सोचते हुए बोला... "मेरा खाना तो माँ बनाती है ,तुम्हारी माँ कहाँ है?"
"मेरी माँ तो बहुत पहले ही मर गयी थी।" ...नब्बे साल के बूढ़े ने मुस्कराकर कहा।
"बच्चा उदास हो गया। बूढ़े के नज़दीक आकर उसका झुर्रियों भरा चेहरा अपने नन्हें हाथों में भर लिया... "अब तुम्हें अपना खाना बनाने की कोई जरूरत नहीं, मैं माँ से तुम्हारे लिए खाना ले आया करूँगा। अब तो खेल लो!"
"दोस्त!" --बूढ़े ने बच्चे की आँखों में झाँकते हुए कहा... "अपना काम खुद ही करना चाहिए|और फिर, अभी मैं बूढ़ा भी तो नहीं हुआ हूँ, है न !"
"और क्या, बूढ़े की तो कमर भी झुकी होती है।"
"तो ठीक है, अब दो जवान मिलकर खाना बनाएँगें ।" ...बूढ़े ने रसोई की ओर मार्च करते हुए कहा। बच्चा खिलखिलाकर हँसा और उसके पीछे-पीछे चल दिया।
कुकर में दाल-चावल चढ़ाकर वे फिर कमरे में आ गये । बच्चे ने बूढ़े को बैठने का आदेश दिया, फिर उसकी आँखों पर पटटी बाँधने लगा । पटटी बँधते ही उसका ध्यान अपनी आँखों की ओर चला गया। मोतियाबिन्द के आपरेशन के बाद एक आँख की रोशनी बिल्कुल खत्म हो गई थी। दूसरी आँख की ज्योति भी बहुत तेजी से क्षीण होती जा रही थी।
"बाबा,पकड़ो, पकड़ो!" ...बच्चा उसके चारों ओर घूमते हुए कह रहा था |
उसने बच्चे को हाथ पकड़ने के लिए हाथ फैलाए तो एक विचार उसके मस्तिक में कौंधा... जब दूसरी आँख से भी अँधा हो जाएगा, तब? तब? तब वह क्या करेगा? किसके पास रहेगा? बेटों के पास? नहीं-नहीं! बारी-बारी से सबके पास रहकर देख लिया। हर बार अपमानित होकर लौटा है। तो फिर?
"मैं यहाँ हूँ ।मुझे पकड़ो!"
उसने दृढ़ निश्चय के साथ धीरे-से कदम बढ़ाए। हाथ से टटोलकर देखा। मेज, उस पर रखा गिलास, पानी का जग, यह मेरी कुर्सी और यह रही चारपाई...और...और...यह रहा बिजली का स्विच। लेकिन तब मुझ अँधे को इसकी क्या ज़रूरत होगी?...होगी। तब भी रोशनी की ज़रुरत होगी... अपने लिए नहीं... दूसरों के लिए... मैंने कर लिया... मैं तब भी अपना काम खुद कर लूँगा!
"बाबा, तुम मुझे नहीं पकड़ पाए। तुम हार गए ...तुम हार गए!" बच्चा तालियाँ पीट रहा था।
बूढ़े की घनी सफेद दाढ़ी के बीच होंठों पर आत्मविश्वास से भरी मुस्कान थिरक रही थी।