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May 10, 2016

आनेमलई

                  आनेमलई

             बाघों के लिए संरक्षित क्षेत्र
                            - पी. एन. सुब्रमणियन
ऊटी जाने का कार्यक्रम बना था. मैं तो अकेला ही था परन्तु छोटे भाई का परिवार भी साथ था. नाश्ता वास्ता कर गाडी में बैठने के बाद भाई ने कहा अपन रात तक वापस आ जायेंगे. हमने कहा यार ऊटी में कमसे कम एक रात दो दिन बिताये बगैर वापस आने का कोई मतलब नहीं होगा. उसने अपनी लाचारी बतायी. दूसरे ही दिन कोई महत्त्वपूर्ण बैठक थी. सो उसने प्रस्ताव रखा. उतनी ही दूरी पर एक और जगह है ‘आनेमलई ‘ (हाथियों का पहाड़), हमने प्रस्ताव को झट मान लिया. हम तो घुमंतू ठहरे. कहीं भी चलो पर कहीं दूर ले चलो.
आनेमलई कोयम्बतूर से दक्षिण   में  ५६ किलोमीटर की दूरी पर है. 40 किलोमीटर चलने के बाद पोल्लाची नामकी एक बस्ती आती है और वहाँ से दाहिनी ओर आनेमलई के लिए रास्ता कटता है. रुकावट के लिए खेद है, बीच में पोल्लाची आ गया. लेकिन उसे तो आना ही था. यहाँ भारत की सबसे बड़ी गुड की मंडी है और यहाँ का जानवरों का बाज़ार भी दक्षिण भारत में सबसे बड़ा है. 
आनेमलई वास्तव में पश्चिमी घाट पर्वत श्रंखला का एक हिस्सा है आगे जाकर इसी पर्वत श्रंखला में भारत की सबसे ऊंची चोटी (हिमालय के बाद) आनामुडी कहलाती है जिसकी ऊँचाई 8842 फीट है. आनेमलई तो मात्र 800 फीट की ऊँचाई पर ही है परन्तु चारों तरफ सदा बहार जंगलों से घिरा है. वैसे तो यह क्षेत्र बाघों के लिए आरक्षित है परन्तु यहाँ हाथियों का भी आवास है. यहाँ से एरविकुलम राष्ट्रीय उद्यान (Eravikulam National Park), चिन्नार वन्य प्राणी अभयारण्य (Chinnar Wildlife Sanctuary), परम्बिकुलम  वन्य प्राणी अभयारण्य (Parambikulam Wildlife Sanctuary), और बगल के इंदिरा गांधी वन्य प्राणी अभयारण्य एवं राष्ट्रीय उद्यान (Indira Gandhi Wildlife Sanctuary and National Park) आसानी से जाया जा सकता है जो सभी केरल प्रांत में पड़ते हैं.
पोल्लाची पहुँच कर हम लोगों ने आनेमलई जाने वाली सड़क पकड़ ली थी. वहाँ से अब दूरी 16 किलोमीटर रह गयी थी. करीब 7/8 किलोमीटर के बाद ही हमें स्वागत द्वार दिखा. वहाँ एक जांच चौकी भी बनी थी. एक सूचना पट्ट दिखा  ’परम्बिकुलम  वन्य प्राणी अभयारण्य’. आनेमलईऔर परम्बिकुलम दोनों के लिए एक ही रास्ता था. उसी जगह किनारे एक महिला फल आदि बेच रही थी. वहाँ से खरीदे गए चीकू बहुत ही मीठे और स्वादिष्ट थे.
यहीं से उस रक्षित वन क्षेत्र की सीमा प्रारंभ हो जाती थी. आगे जंगलों में से गुअजरना हुआ, फिर घाट वाली पहाड़ी.  दूर दूर तक केवल बाँसों के जंगल ही दिख रहे थे और वे भी अच्छे मोटे और लम्बे लम्बे.
दुपहर खाने के वक्त हम लोग ‘टॉप स्लिप’  पर पहुँच गए थे. टॉप स्लिप वह जगह है जहाँ से किसी समय सागौन के गोलों को पहाड़ की तली तक लुढ़का दिया जाता था. यहाँ सभी निजी वाहनों को खड़ा कर दिया जाता है. इसके आगे जाना हो तो जंगल विभाग से वाहन किराये पर लेना पड़ता है. यहाँ पर्यटकों के लिए आवासीय व्यवस्था भी अच्छी बनी है.  रात्रि विश्राम करने वालों को जीप भी किराये से मुहैया करायी जाती है. यहाँ आनेवाले पर्यटक दो प्रकार के हैं; एक ऐसे जो पिकनिक या मौज मस्ती के लिए आते हैं और दूसरे, गंभीर किस्म के जो इन जंगलों/वन्य प्राणियों  का बारीकी से अध्ययन करना चाहते हैं. ऐसे लोगों का यहाँ आना पूर्व नियोजित रहता है. वे पहले से ही जंगल में कॉटेज, वाहन आदि आरक्षित करा लेते हैं. हम तो पहली श्रेणी  के थे. वहाँ के सूचना केंद्र से पूछ ताछ करने पर पता चला कि जंगल में भ्रमण के लिए बस की व्यवस्था तो है परन्तु आवश्यक संख्या में पर्यटकों के न होने से उस दिन वह सेवा बंद थी. विकल्प के तौर पर हाथी की सवारी की जा सकती थी, परन्तु वे अभी जंगल से पहली या दूसरी फेरी कर लौटे नहीं थे. एक हाथी के लिए 400 रुपये देय  था. हम लोगों ने एक हाथी के लिए पर्ची  कटवा ली.   वहाँ एक कैन्टीन  भी थी और जंगल महकमे के कर्मियों के लिए आवास भी बने थे. अब क्योंकि भूख को तो लगना ही था, हम लोगोंने कैन्टीन  का सदुपयोग किया.
कैन्टीन  के पिछवाड़े कई शूकर घूम रहे थे. हमारे भाई को थोडा अचरज हुआ. सीधे पुनः सूचना केंद्र में बैठे रेंजेर  महोदय से पूछा  गया कि वे शूकर क्या जंगली थे. उसने संजीदगी से कहा, मजाक न समझें, वे वास्तव में जंगली ही हैं. यहाँ खाने को आसानी से मिल जाता है इसलिए वे निडर होकर चले आते हैं. हमने भी अपना कौतूहल दूर किया और जाना कि उस जंगल में ३५० से अधिक हाथी हैं और शेरों  की संख्या १८ हैं. इसके अतिरिक्त, तेंदुए, चीतल, साम्भर, गौर, मेकाक बन्दर आदि भी बड़ी संख्या में हैं.  पक्षियों की तो बहुत सारी प्रजातियाँ हैं. यह भी जानकारी मिली कि जंगल विभाग का ही एक बाड़ा  है जिसमें 100 के लगभग हाथी रहते हैं. उन्हें सुबह छोड़ दिया जाता है और वे जंगल में भ्रमण कर शाम तक अपने डेरे में पहुँच जाते हैं. उन्हें देखना हो तो सुबह आना पड़ता है.
हम सभी हाथी की सवारी पहली बार करने जा रहे थे. हमें बैठा कर जंगल के अन्दर ले जाया गया परन्तु देखने के लिए कुछ बड़ी बड़ी पहाड़ी गिलहरियाँ दिखीं और कुछ मेकाक बन्दर जो बहुत ही जल्द आँखों से ओझल भी हो गए.  आधे घंटे के बाद ही हाथी को लौटा दिया गया और हम यह चाह भी रहे थे क्योंकि झटकों से तकलीफ हो रही थी, हालाकि चारों तरफ के हरे भरे जंगल बड़े सुहावने लग रहे थे. हाथी से उतर कर सीधे अपनी गाडी का रुख किया और लौट आये थे. कदाचित आनेमलाई जाने के लिए  अप्रेल का महीना उपयुक्त नहीं था.

Oct 26, 2012

सच्चा मोती साबूदाना

 सच्चा मोती साबूदाना
- पी. एन. सुब्रमणियन
हमारे मोहल्ले के शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में एक बड़ी दुकान किराने की भी है, पहले माले में। जैसे कई दुकानदारों की आदत होती है, उनके भी बहुत सारे सामान बाहर की ओर बरामदे में सजे रखे थे। उसी के बगल में एक एटीएम भी लगी है। हमारे एक मित्र एक दूसरे मित्र के साथ पैसे निकालने गए थे। वापसी में किराने की दुकान के सामने से गुजरना हुआ। मशीन से निकली पर्ची पर ध्यान था इस कारण सामने रखे बोरे से भिड़ गए। बोरे पर लिखा था 'सच्चा मोती’ दुकानदार को कोसते हुए उन्होंने पूछ लिया
- क्या रखा है यार इसमें, अन्दर क्यों नहीं रख लेते
- जवाब मिला साहब, साबूदाना है, अभी व्रत त्योहारों’ का सीजन है इसलिए बाहर रख दिया। यह सुनते ही मित्र को याद आई की उन्हें भी घर के लिए साबूदाना खरीदना है। संवाद आगे जारी रहा-
सबसे अच्छा वाला कौनसा होता है।
जवाब मिला यही है।
- क्या भाव लगा रहे हो
- 250 ग्राम के 15 रुपये
- बहुत महंगा लगा रहे हो 
- साब ए वन है।
- ठीक है फिर दे दो 250 ग्राम।
दोनों मित्र नीचे आकर एक दूसरी दुकान के सामने रखी बेंच पर बैठ गए। उस दिन चर्चा साबूदाने पर केन्द्रित रही। जिस मित्र ने खरीदा था, उनका कहना था कि इसका पेड़ अपने यहाँ तो नहीं होता। दूसरे ने कहा यह पेड़ पर नहीं होता, बनाया जाता है। नहीं यार यह पेड़ का बीज है। बहस यों ही चलती रही।
 उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में खास कर दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में ताड़ जैसे कई पेड़ हैं जिनके तने का गूदा गरीबों
का भोज्य पदार्थ होता है। इनमें 'सागू पाम' (Metro&ylon Palms) के तनों के गूदे से प्राप्त होने वाला स्टार्च (श्वेतसार) साबूदाना बनाने के लिए प्रयुक्त होता है। एक और सागो पाम है जो cycads Palms के अंतर्गत वर्गीकृत है परन्तु इस पौधे का हर हिस्सा जहरीला होता है। यह घर के अन्दर या बागीचे में अलंकरण के लिए रखा जाने वाला 'सैकस' है।
भारत में साबूदाना मुख्यत:  "टपिओका" (Manihot esculenta) नाम के कंद से प्राप्त होने वाले स्टार्च से बनाया जाता है। टपिओका को कसावा भी कहते हैं। बल्कि शायद यह कहना बेहतर होगा कि कसावा के पौधे से टपिओका उत्पन्न होता है। यह दक्षिण अमरीकी मूल का है और पश्चिम द्वीप समूहों के अतिरिक्त भारत तथा अन्य देशों में भी बहुतायत से पैदा किया जाता है। वास्तव में टपिओका करोड़ों लोगों के लिए भोजन का प्राथमिक स्रोत है क्योंकि इसके पौधे अनुपजाऊ भूमि में तथा अल्प वर्षा वाले जगहों में भी आसानी से पनपते हैं। अभी अभी सुनने में आया है कि तंजानिया में टपिओका की फसल कीटग्रस्त हो गयी थी परन्तु इसे अपवाद ही माना जाना चाहिए। टपिओका ही एक ऐसा खाद्य पदार्थ है जिसकी प्रति इकाई भूमि में उत्पादकता सबसे  अधिक है और इस मायने  में यह विश्व में गरीबों के लिए वरदान है। माइक्रोसॉफ्ट कारपोरेशन के भूतपूर्व अध्यक्ष बिल गेट्स ने भी  कुपोषण को दूर करने में टपिओका के महत्व को रेखांकित किया है।  इसके पोषक तत्वों में अभिवृद्धि के लिए और अधिक सक्रियता से शोध किये जाने की आवश्यकता पर भी बल दिया है। इस हेतु उन्होंने अपने न्यासों के माध्यम से एक बड़ी राशि भी उपलब्ध कराने की पेशकस की है।
टपिओका के पौधे तैयार करने हेतु तने के ही कई टुकड़े कर दिए जाते हैं और मिट्टी में निश्चित दूरी पर रोप दिया जाता है। इसकी कुछ प्रजातियों में हानिकारक तत्व भी होते हैं परन्तु सफाई की प्रक्रिया से उन्हें दूर कर लिया जाता है।
भारत में टपिओका का प्रदार्पण 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में हुआ था और इसकी सबसे अधिक खेती केरल, तामिलनाडू और आन्ध्र प्रदेश में होती है। जैसा पूर्व में कहा जा चुका है, यह केरल में भी कई लोगों के दैनिक भोजन का एक प्रमुख हिस्सा है। इसे यों ही उबाल कर भी खाया जा सकता है या फिर सब्जियों के अतिरिक्त पकवान आदि भी बनाए जा सकते हैं। एक प्रकार से यह आलू का विकल्प है। मछली की करी के साथ टपिओका का बहुत चलन है। टपिओका के चिप्स बड़े स्वादिष्ट होते हैं और इसके आटे से पापड़ भी बनता है। इसमें प्रोटीन का अभाव है परन्तु कार्बोहाड्रेट्स की भरमार है। दूसरे पौष्टिक तत्व भी समुचित मात्रा में पाए जाते हैं।
तकनीकी रूप में साबूदाना किसी भी स्टार्च युक्त पेड़ पौधों के गूदे से बनाया जा सकता है। चूंकि टपिओका में स्टार्च की भारी मात्रा होती है, उसे साबूदाने के उत्पादन के लिए उपयुक्त पाया गया। भारत में इसका उत्पादन 1940 के दशक में ही प्रारंभ हो चला था। यह पहले तो कुटीर उद्योग था परन्तु अब तामिलनाडू का एक महत्त्वपूर्ण लघु उद्योग है। संक्षेप में कहा जाए तो पहले कंद के छिलके की मोटी परत को उतारकर धो लिया जाता है। धुलने के बाद उन्हें कुचला जाता है। निचोड़कर इकठ्ठा हुए गाढ़े द्रव को छलनियों में डालकर छोटी छोटी मोतियों सा आकार दिया जाता है। धूप में सुखा लिया जाता है या एक अलग प्रक्रिया के तहत भाप में पकाते हुए एक और गरम कक्ष से गुजारा जाता है। सूखने पर साबूदाना तैयार।

  संपर्क: 23, यशोदा परिसर, कोलार रोड, भोपाल (म.प्र.)      
  मोबाइल- 09303106753, Email- palikara@gmail.com

Feb 28, 2011

छत्तीसगढ़ का प्रयाग राजिम


- पी.एन.सुब्रमणियन
छत्तीसगढ़ की राजधानी, रायपुर से लगभग 45 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में तीन नदियों का संगम है। महानदी (चित्रोत्पला), पैरी तथा सोंढुर। महानदी और पैरी दो अलग- अलग भागों से आकर यहां मिल रही है और एक डेल्टा सा बन गया है जबकि तीसरी नदी सोंढुर कुछ दूरी पर सीधे महानदी से मिल रही है। महानदी अथवा चित्रोत्पला को प्राचीन साहित्य में समस्त पापों का हरण करने वाली परमपुण्यदायिनी कहा गया है। महाभारत के भीष्म पर्व में तथा मत्स्य एवं ब्रह्म पुराण में भी चित्रोत्पला का उल्लेख है। इस नदी के उद्गम के बारे में जो बातें मिलती हैं उससे कोई संदेह नहीं रह जाता कि यह नाम महानदी के लिए ही प्रयुक्त किया गया था। महानदी जैसे पापनाशिनी में दो अन्य नदियों के संगम के कारण यह एक परमपुण्य स्थली मानी जाती है। यही है छत्तीसगढ़ का प्रयाग। संगम में अस्थि विसर्जन तथा संगम तट पर पिंडदान, श्राद्ध एवं तर्पण आदि करते हुए लोगों को देखा जा सकता है। यहां एक प्राचीन नगर राजिम भी है जो महानदी के दोनों तरफ बसा है। उत्तर की ओर की बस्ती नवापारा (राजिम) कहलाती है जब कि दक्षिण की केवल राजिम। यह पूरा क्षेत्र पद्म क्षेत्र कहलाता है और एक अनुश्रुति के अनुसार पूर्व में यह पदमावतीपुरी कहलाता था। राजिम नामकरण के पीछे भी कई किस्से कहानियां हैं, जिसमें राजिम नाम की एक तेलिन से सम्बंधित जनश्रुति प्रमुख है। एक धार्मिक तथा सांस्कृतिक केंद्र के रूप में राजिम ख्याति प्राप्त है। यहां मंदिरों की बहुलता तथा वहां आयोजित होने वाले उत्सव आदि इस बात की पुष्टि करते प्रतीत होते हैं।
यह पूरा क्षेत्र अपनी वन सम्पदा एवं कृषि उत्पाद के लिए सदियों से प्रख्यात रहा है। इसी को ध्यान में रखते हुए उस क्षेत्र की प्राकृतिक सम्पदा के दोहन हेतु अंग्रेजों के शासन काल में बी.एन.आर रेलवे द्वारा रायपुर से धमतरी तथा उसी लाइन पर अभनपुर से नवापारा (राजिम) की एक नेरो गेज रेलवे लाइन प्रस्तावित की गयी। सन 1896 में छत्तीसगढ़ में अकाल पड़ा था अत: उस प्रस्तावित रेलमार्ग को स्थानीय लोगों को रोजगार दिलाने (या यों कहें कम खर्च में काम चलाने के लिए) राहत कार्य के अंतर्गत रेल लाइन का निर्माण प्रारंभ कर दिया गया। सन 1900 में रेल सेवा भी प्रारंभ हो गयी थी। राजिम के आगे गरियाबंद वाले रस्ते के जंगलों के भीतर भी रेल लाइन होने के प्रमाण मिलते हैं। कहीं कहीं पटरियां भी हमने देखी हैं परन्तु वह लाइन कहां तक गयी थी और कहां जाकर जुड़ती थी, इस बात से अवगत नहीं हो सके। विषयांतर हुआ जाता प्रतीत हो रहा है। राजिम के लिए रेलमार्ग के संदर्भवश रेलवे की कहानी संक्षेप में कह डाली। रायपुर से राजिम जाने के लिए सड़क मार्ग ही बेहतर है जबकि रेलमार्ग कष्टदायक।
बात तो राजिम की ही होनी थी। ऊपर हमने वहां मंदिरों की बहुलता का उल्लेख किया था। पुराने मंदिरों में सर्वाधिक ख्याति प्राप्त राजीव लोचन का मंदिर है जिसके अहाते में ही कई और मंदिर हैं। राजेश्वर, दानेश्वर, तेलिन का मंदिर, उत्तर में सोमेश्वर, पूर्व में रामचंद्र तथा पश्चिम में कुलेश्वर, पंचेश्वर एवं भूतेश्वर। इन सभी मंदिरों में अग्रणी एवं प्राचीनतम है राजीव लोचन का मंदिर। इस मंदिर के स्थापत्य के बारे में यहां सूक्ष्म वर्णन मेरा उद्देश्य नहीं है अपितु संक्षेप में कुछ कहना सार्थक जान पड़ता है। स्थापत्य की दृष्टि से यह मंदिर छत्तीसगढ़ के अन्य मंदिरों से भिन्न है एवं अपने आप में विलक्षण है। विद्वानों का मत है कि राजीव लोचन मंदिर का स्थापत्य दक्षिण भारतीय शैली से प्रभावित हुआ है। उदाहरण स्वरूप मंदिर के अहाते में प्रवेश हेतु गोपुरम सदृश प्रवेश द्वार, प्रदक्षिणा पथ, खम्बों में मानवाकार मूर्तियां आदि।
मंदिर का अहाता पूर्व से पश्चिम 147 फीट और उत्तर से दक्षिण 102 फीट है। मंदिर बीच में है। उत्तरी पूर्वी कोने पर बद्री नारायण, दक्षिणी पूर्वी कोने पर वामन मंदिर, दक्षिणी कोने पर वराह मंदिर तथा उत्तरी पश्चिमी कोने पर नृसिंह मंदिर बना हुआ है जिन्हें मूलत: बने राजीव लोचन मंदिर के सहायक देवालय कहा जा सकता है परन्तु उनका निर्माण कालांतर में ही हुआ है। राजीव लोचन मंदिर के पश्चिम में अहाते से लगभग 20 फीट दूर राजेश्वर मंदिर तथा दानेश्वर मंदिर हैं। दोनों ही शिव मंदिर हैं। परन्तु दानेश्वर मंदिर ही एक ऐसा मंदिर है जहां नंदी मंडप बना हुआ है। राजिम में ऐसा अन्यत्र कहीं नहीं। ये दोनों मंदिर भी राजीव लोचन मंदिर के समकालीन नहीं हैं परन्तु स्थापत्य में कुछ समानताएं हैं। इन्ही मंदिरों के आगे राजिम तेलिन का मंदिर है या यों कहें की सती स्मारक है।
इस मंदिर के महामंडप में बारह खम्बे हैं जिनमें बेहद कलात्मक शिल्प उकेरे गए है। गर्भ गृह का प्रवेश द्वार तो लाजवाब है। पत्थर के विशाल चौखट को बड़ी तल्लीनता से शिल्पियों ने अलंकृत किया है। चौखट के ऊपर शेषासायी विष्णु अद्भुत है। गर्भ गृह में प्रतिष्ठा शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किये हुए महाविष्णु की है और यही राजीव लोचन कहलाते हैं। प्रतिदिन उन्हें प्रात: बालरूप में, मध्याह्न युवारूप में और सायं वृद्धरूप में श्रृंगारित किया जाता है परन्तु सिले सिलाये कपड़े पहनाने का रिवाज नहीं है। कपड़ों को मोड़ कर उढ़ा दिया जाता है यहां तक कि गांठ बांधना भी वर्जित है। एक बात और हमने जो जानी वह ये कि यहां के परंपरागत पुजारी क्षत्रिय हैं न कि ब्राह्मण।
कुछ लोगों में भ्रम है कि राजीव लोचन मंदिर भगवान श्री रामचन्द्रजी के लिए बना था। इसका एक कारण यह है कि महामंडप के पीछे की दीवार में जगपाल देव (14 वीं सदी) का एक शिलालेख जड़ा हुआ है जिसमे श्री रामचन्द्रजी के लिए एक नए मंदिर के निर्माण की बात कही गयी है। जगपाल देव कलचुरी शासक पृथ्वी देव द्वितीय का सामंत था। वास्तव में इस सामंत के द्वारा बनवाया गया रामचंद्र मंदिर पूर्व दिशा में अभी भी विद्यमान है। उसी शिलालेख के बगल में एक दूसरा शिलालेख भी है जिसमे राजीव लोचन मंदिर के निर्माण का उल्लेख है। इस शिलालेख में कोई तिथि तो नहीं दी गयी है परन्तु राजा का नाम विलासतुंग बताया गया है। यह नल वंशी था जिनका बस्तर पर अधिपत्य रहा। यही नल वंश सिरपुर के सोमवंशियों का उत्तराधिकारी बना था। शिलालेख की लिपि एवं स्थापत्य के आधार पर राजीव लोचन मंदिर का निर्माण काल सन 700 ईसवी का मान लिया गया है। समय- समय पर विभिन्न शासकों द्वारा मंदिर के मूल संरचना में कुछ नए निर्माण आदि कर परिवर्तित/ संरक्षित किया जाता रहा है।
पैरी और महानदी के संगम पर नदी के बीच 9 वीं सदी का कुलेश्वर महादेव मंदिर (उत्पलेश्वर) है और यह मंदिर भी विलक्षण है। पिछले वर्षों में यहां का परम्परागत माघ पूर्णिमा मेला अब विशाल हो कर राजिम कुंभ कहलाने लगा है।
पता: 23, यशोदा परिसर, कोलार रोड, भोपाल मो. 09303106753
राजिम कुंभ
छत्तीसगढ़ में महानदी का वही स्थान है जो भारत में गंगा नदी का है। यहां का सबसे बड़ा पर्व महाशिवरात्रि है जो माघ मास की पूर्णिमा से शुरु होकर फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि तक चलता है। इस अवसर पर राजिम एक तीर्थ का रूप ले लेता है। यहां हजारों श्रद्धालु संगम स्नान करने और भगवान राजीव लोचन तथा कुलेश्वर महादेव के दर्शन करने दूर- दूर से पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि जगन्नाथपुरी की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं होती जब तक कि वे राजिम की यात्रा नहीं कर लेते।
2005 से छत्तीसगढ़ शासन ने राजिम मेले के आयोजन को राजिम कुंभ का स्वरूप देकर लोकव्यापी बनाने की दिशा में एक नई पहल की है। यही वजह है कि राजिम कुंभ के अवसर पर पर्यटकों की संख्या बढ़ जाती है। कुंभ में देश भर से पर्यटकों की भीड़ के साथ श्रद्धालु एवं साधु- महात्माओं के अखाड़े विशेष रूप से आमंत्रित रहते हैं।
राजिम कुंभ तक पहुंचने के लिए
हवाई मार्ग- रायपुर (45 किमी) निकटतम हवाई अड्डा है तथा दिल्ली, मुंबई, नागपुर, भुवनेश्वर, कोलकाता, रांची, विशाखापट्नम और चेन्नई से जुड़ा हुआ है।
रेल मार्ग- रायपुर निकटतम रेलवे स्टेशन है जो कि मुंबई-हावड़ा रेल मार्ग पर स्थित है।
सड़क मार्ग- राजिम नियमित बस तथा टैक्सी सेवा से रायपुर व महासमुंद से जुड़ा हुआ है।
तीर्थ यात्रियों के ठहरने के लिए कुंभ के अवसर पर संस्कृति विभाग विशेष रुप से व्यवस्था करता है। सामान्य पर्यटकों के लिए रायपुर में अनेक होटल उपलब्ध हैं।