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Aug 1, 2026

आलेखः पत्रों में लोक-संग्राम

  - प्रमोद भार्गव

हमारे यहाँ स्वतंत्रता संग्राम के इतिहासबद्ध लेखन के परिप्रेक्ष्य में उन पत्रों और साक्ष्यों को लगभग बहिष्कृत किया गया है, जो पत्र और साक्ष्य क्रांतिवीरों ने युद्ध की रणनीति सुनिश्चित करने और हथियार, सेना, धन व खाद्य सामग्री की उपलब्धता प्राप्त करने के लिए लिखे थे। जबकि इसके विपरीत अंग्रेज शासकों ने जो पत्र इत्यादि लिखे, उन्हें 1857 के संग्राम को सैनिक विद्रोह बताने के लिए कुछ इस तरह प्रस्तुत किया गया, जैसे उनकी लिखी सूचनाएँ ब्रह्म वाक्य हों। शासकों की इन सूचनाओं को इतिहास मानने की बड़ी भूल हुई है।

हमारे शहर शिवपुरी में 1857 के संघर्ष से जुड़ी दो बड़ी घटनाएँ घटित हुई हैं। एक तो तात्या टोपे को फाँसी के फंदे पर शिवपुरी में ही लटकाया गया था, दूसरे इतिहास की जिन पुस्तकों में गोपालपुर जागीर का जिक्र है, वह भी शिवपुरी जिले के अंतर्गत है। यही वह स्थल था, जहाँ लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और नाना साहब ने गोपालपुर के जागीरदार रघुनाथ सिंह वशिष्ठ और उनके अनुज गोविंद सिंह के साथ मंत्रणा करके ग्वालियर पर कब्जा करने की योजना को क्रियान्वित किया था। यहाँ के लोक समाज से लक्ष्मीबाई ने सैन्य संगठन भी खड़ा करके अपनी सेना में शामिल किया था।

पत्रों की प्रदर्शनी -

इस जन-संग्राम की प्रामाणिकता की बात प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक तात्या टोपे के बलिदान दिवस से करते हैं। दरअसल शिवपुरी में 18 अप्रैल को प्रतिवर्ष दो दिवसीय मेले का आयोजन तात्या के बलिदान को स्मरणीय बनाए रखने के लिए किया जाता है। इस मेले में अब से बीस साल पहले तक इस संग्राम से जुड़े पत्रों एवं हथियारों की विशाल एवं भव्य प्रदर्शनी लगाई जाती थी। यह प्रदर्शनी लगती अब भी है, लेकिन इसका रूप बहुत संक्षिप्त कर दिया गया है। परिणामतः यह प्रदर्शनी अब इतिहास के जिज्ञासुओं की समझ विकसित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। हालाँकि ये पत्र मूल व संपूर्ण रूप में आज भी राजकीय अभिलेखागार भोपाल में सुरक्षित हैं। दुर्लभ होने के कारण अब पत्रों की छाया प्रतियाँ ही प्रदर्शनी में लगाई जाती हैं।

सौभाग्य से मुझे इन पत्रों को पढ़ने का अवसर मिला है। इन्हें पढ़ने से पता चलता है कि इस संग्राम में खास ही नहीं आम आदमी भी सर्वस्व न्योछावर कर देने की मानसिकता से युद्ध में भागीदारी के लिए मार्ग खोजने में संलग्न थे। चूंकि ये पत्र बुंदेली भाषा में थे और इनमें आंचलिक बोली के शब्द प्रयोग में लाए गए थे, इसलिए इनके वास्तविक अर्थ समझने के लिए मैंने अपने पूज्य गुरुवर डॉ. परशुराम शुक्ल ‘विरही‘ से संपर्क साधा। डॉ. विरही बुंदेली, हिंदी एवं अंग्रेजी के विलक्षण ज्ञाता होने के साथ-साथ बड़े साहित्यकार भी हैं। उन्होंने बताया कि इन पत्रों को वे सत्तर के दशक में ही बुंदेली से हिंदी में अनुवाद कर चुके हैं। उन्हीं के संपादकत्व में पत्रों के संग्रह का प्रकाशन भी हो चुका है;  किंतु दुर्भाग्य से इन दुर्लभ पत्रों की पुस्तक की प्रति उनके पास भी नहीं थी। परंतु उन्होंने मार्ग सुझाया कि यह पुस्तक नगर पालिका परिषद शिवपुरी द्वारा प्रकाशित की गई थी, इसलिए हो सकता है, उनके भंडार- गृह में कुछ पुस्तकें मिल जाएँ।

इस सूत्र वाक्य को पकड़कर जब हमने पालिका का भंडार खँगाला तो बेहद जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पुस्तकों का एक बंडल मिल ही गया। बंडल को खोलने पर ज्यादातर पुस्तकें तो सड़-गल गई थीं, लेकिन बीच की दो-चार पुस्तकें संयोग से ऐसी निकल आईं, जिनमें पत्र संपूर्ण रूप से पढ़ने में आ रहे थे। मेरे लिए ये पत्र बड़ी थाती सिद्ध हुए।

‘1857 की क्रांति' शीर्षक से प्रकाशित इस किताब में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित जो पत्र संगृहीत हैं, वे पत्र महारानी लक्ष्मीबाई, रानी लड़ई दुलैया, राजा बखतवली सिंह, राजा मर्दन सिंह, राजा रतन सिंह और इस क्रांति के महान योद्धा, संगठक एवं अप्रतिम सेनानायक तात्या टोपे द्वारा लिखे गए या उनको अन्य लोगों द्वारा लिखे गए पत्र हैं। इनके अलावा कुछ पत्र ऐसे भी हैं, जो पंडितों और तांत्रिकों द्वारा लिखे गए हैं। इन पत्रों में अतीन्द्रिय शक्तियों से जुड़े ऐसे मंत्रों व जंत्रों का रेखांकन है, जो तात्या टोपे की रक्षा के लिए बतौर सुरक्षा-कवच हैं। इन पत्रों की भावना से यह स्पष्ट होता है कि इस संग्राम का विस्तार दूर-दराज के ग्रामीण अंचलों तक हो रहा था और केवल परतंत्रता की बेड़ियाँ तोड़ने की तीव्र इच्छा से आम-आदमी क्रांति के इस महायज्ञ में अपने अस्तित्व की समिधा डालने को तत्पर था।

इस किताब की भूमिका के अनुसार, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित इन पत्रों की प्राप्ति का इतिहास भी बड़ा रोचक है। आजादी की पहली लड़ाई जब चरमोत्कर्ष पर थी, तब तात्या टोपे अपनी फौज के साथ ओरछा रियासत के गाँव आष्टौन में थे। अंग्रेजों को मुखबिर से यह खबर पता चल गई। अंग्रेजी फौज ने बिना वक्त गँवाए तात्या टोपे के डेरे पर हमला बोल दिया। उस समय तात्या मोर्चा लेने की स्थिति में नहीं थे। लिहाजा, ऊहापोह की हालत में तात्या को अपना कुछ बहुमूल्य सामान यथास्थान छोड़कर नौ-दो-ग्यारह होना पड़ गया।

उस दौरान ओरछा के दीवान नत्थे खाँ थे। तात्या द्वारा जल्दबाजी में छोड़े गए सामान की पोटली नत्थे खाँ के विश्वसनीय सिपाही ने उन्हें लाकर दी। इस सामान में एक बस्ता था, जिसमें जरूरी कागजात व चिट्ठी-पत्री थीं। इसी सामान में एक तलवार और एक उच्च कोटि की गुप्ती भी थी। नत्थे खाँ के यहाँ कोई पुत्र नहीं था, इसलिए यह धरोहर उनके दामाद को मिली। दामाद के यहाँ भी कोई पुत्र नहीं था, गोया तात्या टोपे के सामान के वारिस उनके दामाद अब्दुल मजीद फौजदार बने, जो टीकमगढ़ के निवासी थे।

स्वतंत्र भारत में 1976 में टीकमगढ़ के राजा रहे नरेंद्र सिंह जू देव को अब्दुल मजीद के पास इन पत्रों के होने की खबर आई। नरेंद्र सिंह उस समय मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री थे। उन्होंने इन पत्रों के ऐतिहासिक महत्त्व को समझते हुए तात्या की धरोहर को राष्ट्रीय धरोहर बनाने की दिशा में उल्लेखनीय पहल की। साथ ही पत्रों की वास्तविकता की पुष्टि इतिहासकार दत्तात्रेय वामन पोद्दार से भी कराई। पोद्दार ने पत्रों के मूल होने का सत्यापन करते हुए इन्हें ऐतिहासिक महत्त्व के दुर्लभ दस्तावेज निरूपित किया। झांसी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यासकार डॉ. वृंदावन लाल वर्मा ने भी इन्हें मूल पत्र बताते हुए यह सुनिश्चित किया कि पत्रों के साथ मिला सामान तलवार तथा गुप्ती भी तात्या टोपे की ही हैं। डॉ. वर्मा ने यह भी तय किया कि जिस स्थान और जिस कालखंड में इस सामग्री का उपलब्ध होना बताया जा रहा है, उस समय वहाँ तात्या टोपे के अलावा अन्य किसी सेना-नायक ने पड़ाव नहीं डाला था। 

तात्या के बस्ते से कुल 225 पत्र प्राप्त हुए थे, जो देवनागरी एवं फारसी लिपि में थे। हिंदी पत्रों की भाषा ठेठ बुंदेली है। इन पत्रों में 125 हिन्दी में और 130 उर्दू में लिखे गए हैं। तात्या की तलवार और गुप्ती भी अनूठी है। तलवार सुनहरी नक्काशी में मूठ वाली है, जो मोती बंदर किस्म की बताई गई है। इस तलवार की म्यान में दो कुंदों में चार अंगुल लंबे बाण के अग्रभाग जैसे पैने हथियार हैं। इन हथियारों पर हाथी दाँत की बनी शेर के मुँह की आकृतियाँ जुड़ी हुई हैं। इस तरह जो गुप्ती प्राप्त हुई है, वह विचित्र है। गुप्ती की मूठ सोने की है। इसके सिरे पर एक चूड़ीदार डिबिया लगी हुई है, जिसमें इत्र-फुलेल रखने की व्यवस्था है। तात्या की यह अमूल्य धरोहर अब राजकीय अभिलेखागार, भोपाल का गौरव बढ़ा रही है। 

पत्रों को पढ़ने से पता चलता है कि 1857 का स्वतंत्रता संग्राम किस गहराई से जन-संग्राम में बदलता जा रहा था और आम आदमी किस दीवानेपन से राष्ट्र की बलिवेदी पर आत्मोत्सर्ग के संस्कारों में ढल रहा था। समर के इस अछूते अध्याय की बानगी इन पत्रों में द्रष्टव्य है...,

तात्या टोपे के नाम लिखे एक पत्र में राजा बखतवली सिंह लिखते हैं-

‘एजेंट हैमिल्टन ने गोरी फौज को लेकर राहतगढ़ पर आक्रमण किया है। खुरई, कानपुर में हुई लड़ाई में मानपुर के करीब 700 और अंग्रेजों के करीब 500 सैनिक मारे गए हैं। अंग्रेजों ने बलपूर्वक पन्ना, बिजावर, टेहरी, चरखारी और छतरपुर के राजाओं को अपनी ओर मिला लिया है। अंग्रेज फौज से मुकाबला करने के लिए सहायता भेजी जाए।’

तात्या टोपे के नाम लिखे पत्र में महाराजा रतन सिंह लिखते हैं-

‘हमने तीन लाख रुपया जमा करा लिया है, मगर हमसे कौलनामा किसी पंडित को भेजकर लिखा लिया जाए। हमारी इज्जत रखी जाए। अब हम फौज सहित कूच करते हैं। हमारी ओर से किसी बात पर तकरार नहीं होगी।’

तात्या टोपे के नाम लिखे पत्र में श्री राम शुक्ल तथा गंगाराम लिखते हैं-

‘सिरोली के घाट पर अंग्रेज कैप्टन और नवाब बांदा की भीड़ रोकने के लिए सेना की सहायता एवं तोप चाहिए। चाँदपुर के थानेदार भी दो सौ बंदूक लेकर हमारे साथ हैं।’

एक अन्य पत्र में मानीराम एवं गंगाराम ने तात्या टोपे को लिखा है-

‘सिरोली, चखुरा, भौरा, चाँदपुर और गाजीपुर के जमींदार अंग्रेजों से मोर्चा लेने को तैयार हैं। अंग्रेजों द्वारा गोली चलाने पर वे धावा बोलेंगे। गोरी पलटन को कालपी न पहुँचने देने के लिए कंपू का बंदोबस्त भी किया जाए।’

गुलामी का जुआ उतार फेंकने के लिए उतावले ये वे लोग थे, जिनकी कोई बड़ी जागीर नहीं थी। किसी राज्य के सामंत नहीं थे। चाँदपुर के जिस थानेदार का हवाला दो सौ बंदूकों के साथ रणभूमि में कूदने के लिए दिया गया है, वह सरकारी मुलाजिम होने के बावजूद अपनी नौकरी दाँव पर लगाकर प्राणों की आहुति देने को तत्पर था। इससे साफ है, संघर्ष की शुरुआत वर्षों से दमित अपमान और क्षोभ के प्रकट रूप में हो रही थी।

तात्या टोपे को ही लिखे एक अन्य पत्र में महाराज कुमार गणेशजू देव ने तात्या टोपे को अपने डेरे पर बुलाया तथा लड़ाई में ठाकुरों के साथ होने का हवाला दिया। जिसमें कुँवर बुधसी, क्षमा जूदेव के नामों का उल्लेख है। उन्होंने लिखा है- ‘इन सबके मन साफ हैं और मैं बीच में हूँ।’

तात्या को आमजन मूरतीसिंह, शिवप्रसाद और गौरीशंकर अवस्थी लिखते हैं- ‘हमीरपुर व सिरोली की मदद के लिए दो तोपें, एक कंपनी तथा राजा लोगों की 500 फौज जल्दी भेजें। गोरे सिरोली के उस पार पांच तोपें लगाकर गोलीबारी कर रहे हैं।’

तात्या टोपे को लिखे एक पत्र में जानकारी दी है कि करीब एक सौ अंग्रेज अधिकारी व सिपाही ग्वालियर के किले में घुस गए हैं और इन्हें बेदखल करने के लिए हजारों लोग किले के अंदर पहुँच गए हैं। तात्या टोपे की ग्वालियर विजय पर एक पत्र में जैतपुर के फौजदार सवाई माधोसिंह ने खुशी जाहिर की है। 

रानी लड़ई दुलैया द्वारा राजा बखतवली सिंह के नाम लिखे पत्र में कहा गया है- ‘पन्ना की फौज हटा-दमोह में थी, उसने नदी पार करके यहाँ के इलाके पर तोपें चला दी हैं। फतहपुर को जब्त करने का विचार है। जबलपुर में खराबियों की फौज अंग्रेजों से बिगड़ गई है। पलटन अब हटा खाली करना चाहती है। कई जगह लड़ाई चल रही है। इसलिए पचास-साठ मन बारूद, शोरा और गंधक की जरूरत है।’

तात्या टोपे को लिखे पत्र में रानी लड़ई दुलैया ने सूचित किया है- 

‘पेशवा के पास उन्होंने कुछ लोग भेजे हैं और वे पेशवा के सूबा जलालपुर में ठहरे हुए हैं।’

महारानी लक्ष्मीबाई ने रानी लड़ई दुलैया को एक पत्र लिखकर याद ताजा कराई है- ‘दोनों ओर अच्छे संबंधों की परंपरा रही है, इसलिए आपकी फौज की ओर से कोई वारदात नहीं होनी चाहिए।’

हालाँकि अंततः रानी लड़ई ने लक्ष्मीबाई की मदद तो नहीं की अपितु अंग्रेजों का साथ जरूर दिया।

तात्या टोपे को लिखे एक पत्र में राजा मर्दनसिंह ने लिखा है- ‘फौज समेत फौरन आएँ। बुंदेलखंड के राजा अंग्रेजों से मिल गए हैं। अंग्रेज बानपुर, शाहगढ़ और झांसी पर कब्जा करने की योजना बना रहे हैं।’

बरुआ सागर के जमादार नत्थे खां ने रानी लक्ष्मीबाई को सावधान रहने के लिए लिखे पत्र में लिखा है- ‘आपके समाचार भले चाहिए। यहाँ के समाचार भले हैं। कई रोज से आपके खुशी की खबर नहीं मिली है, सो आपको यह पत्र लिखा है। हमारे बुजुर्ग श्री बड़े जमादार जू से आपको घरोबा रहा है। ताही प्रमाण हमारी तरफ से खातिर रखने में आए। हाल वर्तमान रोशन है। के जॉन रईस की जो रियासत सरकार ओरछे की है, सो अपुन की रोशनी है। मुल्क मालिक के अहद में अपनी ढाबा रियासत मजबूर में कुछ होना होवै सो इहाँ खावंद के हुक्म बमूजिब होने से करने परत। अपुन याकी रंजीदगी को चित पर न रखियो। अपने हक में कौनह दुखन वादी होवे को नहीं। हाल अपुन को झांसी में रहिबो व उहाँ तै और कहीं को जैबो मुनासिब नाहीं। यहाँ पुरानी अमलदारी में जौन मुकाम खुशीपूर्वक रहाइश रहि कि मंजूरी परै तहाँ की तजबीज लिखाई पठैवी।’

तात्या टोपे के नाम लिखे पत्र में मनफूल सुकुल ने जानकारी दी है- ‘गोरों ने मुनादी पिटवाई है कि विद्रोहियों को जो कोई रसद-मदद देगा, उसे बच्चों समेत फाँसी पर लटका दिया जाएगा।’

ओरछा के दीवान नत्थे खाँ ने एक विशेष पत्र हरकारे द्वारा भेजकर रानी झाँसी को सूचित किया है कि मोर्चाबंदी की तैयारी की जाए। पंडित मोहनलाल ज्योतिषी ने तात्या टोपे को लिखे पत्र के साथ अतीन्द्रिय शक्तियों द्वारा रक्षा किए जाने के लिए एक तंत्र भी भेजा। इस पत्र में उल्लेख है- ‘हम फकीर साहब के साथ बैठकर दो जंत्र तैयार कर आपके पास भेज रहे हैं, वह आप बाँध लें और बड़ा जंत्र निशान पर बाँध देना। ईश्वर रक्षा करेगा।-

1857 में ही हमीरपुर से निकलने वाले ‘हमीर’ नामक एक समाचार-पत्र में पत्रकार जलील अहमद ने खबर छापी है- ‘तात्या टोपे की कोठी में दो षड्यंत्रकारी जो बंदूकधारी थे, मोजा रमेली खालपुर में, तात्या टोपे की हत्या की साजिश रचते हुए पकड़े गए। इन्हें तात्या के सामने पेश किया गया।’

‘1857 की क्रांति’ पुस्तक में छपे इन पत्रों के मजमून से स्पष्ट होता है कि भारतीयों के अंतःकरण में दासता से मुक्ति के लिए अंग्रेजों के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश पैदा हो गया था। उस समय आम आदमी ने अपने राष्ट्रीय धर्म का अहसास किया और अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर हुआ। 1857 के इन बलिदानियों ने ही राष्ट्रीय चरित्र की अवधारणा को अभिव्यक्ति दी।

ग्रामीण अंचल से लेकर शहरी भूमि तक अँगड़ाई ले रहा लोक का यह संग्राम हिंदू-मुस्लिम एकता का भी अद्वितीय उदाहरण रहा है; किंतु इतिहास के इस अति महत्वपूर्ण कालखंड की सच्चाई पर पर्दा डाले रखने की कोशिशें इसलिए होती रहीं, क्योंकि इस युद्ध में साधारण भारतीय समाज ने असाधारणता का परिचय दिया था, जिसे संपन्न, शिक्षित व अंग्रेजों के पिट्ठू रहे लोगों को स्वीकारना हमेशा मुश्किल ही रहा है। इस वास्तविकता को छिपाए रखने का एक बड़ा कारण यह भी रहा कि इस मुक्ति संग्राम में अंततः लोक यानी भारतवासी पराजित हुए थे। इस संग्राम का इतिहास लिखने के लिए कोई भी नायक-नायिका न तो जीवित बच पाए और न ही अपने संघर्ष की आपबीती लिखने अथवा लिखाने का समय संघर्ष काल में उनके पास था। जबकि इसके उलट तत्कालीन अंग्रेज इतिहासकारों ने इस लोक के संग्राम के अंतर्निहित सत्य को विकृत करके हकीकत पर आवरण डालने का काम किया।

सम्पर्कः शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224, 09981061100 

Jun 1, 2026

मौसमः सूरज के तीखे होते तेवर

  - प्रमोद भार्गव

देश के ज्यादातर भूभाग पर अँगड़ाई लेता पारा 45 से 48 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है। दिल्ली राजधानी क्षेत्र समेत समूचा मध्य व उत्तर भारत इस समय भीषण गर्मी और लू की चपेट में है। 25 मई को सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश के साथ ही नौतपा शुरू हो गया था, हालांकि भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार धरती का अधिक तपना अच्छी बारिश का संकेत है। मौसम विभाग भी नौतपा में भीषण गर्मी बता रहा है। सनातन पंचांग में उल्लेख मिलता है की इन नौ-दिनों में एक ऐसा समय भी आता है जब सूर्य अपनी सबसे तीव्र ऊर्जा के साथ पृथ्वी पर प्रभाव डालता है। फलतः गर्मी चरम पर पहुँच जाती है। 

   इस परिप्रेक्ष्य में वैज्ञानिकों की मानें तो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में एक ताकतवर महा-अलनीनो आकर ले रहा है। यह 1877 के बाद सबसे विध्वंसकारी मौसमी आपदा साबित हो सकता है। इसका सीधा असर भारत में देखने को मिल सकता है। क्योंकि अल-नीनो भारत की जीवन रेखा कहे जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून को भी प्रभावित कर सकता है। मौसम की जानकारी देने वाली निजी एजेंसी स्काई मेट के अनुसार इसका मुख्य कारण केवल सामान्य मौसमी बदलाव न होकर ऊष्मा का बन जाने वाला छत्रीनुमा गोला है, जो आधे भारत के राज्यों में मँडरा रहा है।

 इस समय दिल्ली, उप्र, राजस्थान, हरियाणा, मप्र, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तेलंगाना में गर्मी एकाएक बढ़ गई है। इस प्राकृतिक स्थिति को ऊष्मा का क्षत्रप (हीट डोम) या गुंबद कहा जा रहा है। यह क्षत्रप तब बनता है, जब वायुमंडल में उच्च दबाव की एक प्रणाली लंबे समय तक किसी एक क्षेत्र में ठहर जाती है। इस समय बर्तन के एक ढक्कन की तरह गर्म हवा ऊष्मा को नीचे धरती की तरफ दबाए रखती है, जो तेज गर्मी का कारण बन जाती है। नतीजतन ऐसे क्षेत्रों में तापमान खतरनाक ढंग से बढ़ जाता है और कई दिनों या हफ्तों तक भीषण गर्मी या लू बनी रहती है। गर्मी की इस प्रचंड स्थिति को ग्लोबल वार्मिंग का कारण बताया जा रहा है।   

     इस बार गर्मी का मिजाज इसलिए भी अलग है, क्योंकि कई तटीय इलाकों और मैदानी क्षेत्रों में नमी वाली गर्मी यानी उमस का असर भी देखने में आ रहा है। इससे लू लगने का खतरा और अधिक बढ़ जाता है। आधे भारत में बढ़ा तापमान  लोगों को पस्त कर रहा है। अतएव हरेक जुबान पर प्रचंड धूप और गर्मी जैसे बोल आमफहम हो गए हैं। हालांकि लू और प्रचंड गर्मी के बीच भी एक अंतर होता है। गर्मी के मौसम में ऐसे क्षेत्र जहाँ तापमान, औसत तापमान से कहीं ज्यादा हो और पाँच दिन तक यही स्थिति यथावत् बनी रहे तो इसे ‘लू‘ यानी गर्मी का गोला कहने लगते हैं। मौसम की इस असहनीय विलक्षण दशा में नमी भी समाहित हो जाती है। यही सर्द-गर्म थपेड़े लू की पीड़ा और रोग का कारण बन जाते हैं। किसी भी क्षेत्र का औसत तापमान, किस मौसम में कितना होगा, इसकी गणना एवं मूल्यांकन पिछले 30 साल के आँकड़ो के आधार पर की जाती है। वायुमंडल में गर्म हवाएँ आमतौर से क्षेत्र विशेष में अधिक दबाव की वजह से उत्पन्न होती हैं। वैसे तेज गर्मी और लू पर्यावरण और बारिश के लिए अच्छी होती हैं। अच्छा मानसून इन्हीं आवारा हवाओं का पर्याय माना जाता है, क्योंकि तपिश और बारिश में गहरा अंतर्सबंध है।

       धूप और लू के इस जानलेवा संयोग से कोई व्यक्ति पीड़ित हो जाता है, तो उसके लू उतारने के इंतजाम भी किए जाते हैं। दरअसल लू सीधे दिमागी गर्मी को बढ़ा देती है। अतएव इसे समय रहते ठंडा नहीं किया तो यह बिगड़ा अनुपात व्यक्ति को बौरा (पागल) भी सकता है। वैसे शरीर में प्राकृतिक रूप से तापमान को नियंत्रित करने का काम मस्तिष्क में ‘हाइपोथैलेमस‘ अर्थात ‘अधष्चेतक‘ क्षेत्र करता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण कार्य पीयूष ग्रंथि के माध्यम से तंत्रिका तंत्र को अंतःस्रावी प्रक्रिया के माध्यम से तापमान को संतुलित बनाए रखना होता है। इसे चिकित्सा शास्त्र की भाषा में हाइपरपीरेक्सिया कहते हैं। यानी शरीर के तापमान में असमान वृद्धि या अधिकतम बुखार का बढ़ जाना। इसकी चपेट में बच्चे और बुजुर्ग आसानी से आ जाते हैं।

   बाहरी तापमान जब शरीर के भीतरी तापमान को बढ़ा देता है, तो हाइपोथैलेमस तापमान को संतुलित बनाए रखने का काम नहीं कर पाता। नतीजतन शरीर के भीतर बढ़ गई अनावश्यक गर्मी बाहर नहीं निकल पाती है, जो शरीर में लू का कारण बन जाती है। इस स्थिति में शरीर में कई जगह प्रोटीन जमने लगता है और शरीर के कई अंग एक साथ निष्क्रियता की स्थिति में आने लग जाते हैं। ऐसा शरीर में पानी की कमी यानी डी-हाईड्रेशन के कारण भी होता है। दोनों ही स्थितियाँ जानलेवा होती हैं। इस स्थिति के निर्माण हो जाने पर बुखार उतारने वाली साधारण गोलियाँ काम नहीं करती हैं; क्योंकि ये दवाएँ दिमाग में मौजूद हाइपोथैलेमस को ही अपने प्रभाव में लेकर तापमान को नियंत्रित करती हैं। जबकि लू में यह स्वयं शिथिल होने लग जाता है।

       हवाएँ गर्म या आवारा हो जाने का प्रमुख कारण ऋतुचक्र का उलटफेर और भूतापीकरण (ग्लोबल वार्मिंग) का औसत से ज्यादा बढ़ना है। इसीलिए वैज्ञानिक दावा कर रहे हैं कि इस बार प्रलय धरती से नहीं आकाशीय गर्मी से आएगी। जिस आकाश को हम निरीह और खोखला मानते हैं, परंतु वास्तव में यह खोखला है नहीं। भारतीय दर्शन में इसे पाँचवाँ तत्त्व यूँ ही नहीं माना गया है। सच्चाई है कि यदि परमात्मा ने आकाश तत्त्व की उत्पत्ति नहीं की होती, तो संभवतः आज हमारा अस्तित्व ही नहीं होता। हम श्वास भी नहीं ले पाते। पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु ये चारों तत्व आकाश से ऊर्जा लेकर ही क्रियाशील रहते हैं। ये सभी तत्व परस्पर परावलंबी हैं। यानी किसी एक तत्व का वजूद क्षीण होगा, तो अन्य को भी छीजने की इसी अवस्था से गुजरना होगा। प्रत्येक प्राणी के शरीर में आंतरिक स्फूर्ति एवं प्रसन्नता की अनुभूति आकाश तत्व से ही संभव होती है, इसलिए इसे ब्रह्म तत्व भी कहा गया है। अतएव प्रकृति के संरक्षण के लिए सुख के भौतिकवादी उपकरणों से मुक्ति की जरूरत है; क्योंकि हम देख रहे कि कुछ एकाधिकारवादी देश भूमंडलीकरण का मुखौटा लगाकर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से दुनिया की छत यानी ओजोन परत में छेद को चौड़ा करने में लगे हैं। यह छेद जितना विस्तृत होगा, वैश्विक तापमान उसी अनुपात में अनियंत्रित व असंतुलित होगा। इस बढ़े तापमान का प्रभाव जिन-जिन क्षेत्रों में पड़ेगा, वहाँ खेत बंजर हो जाएँगे। पालतू मावेशी और वन्य जीव गर्मी से तड़प-तड़पकर प्राण छोड़ने लग जाएँगे, जो मानव समुदाय अभावग्रस्त हैं, उन पर गर्म हवाओं का यह दबाव कहर बनकर टूटेगा। यह जानलेवा भी साबित होगा।

       संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2020 में किए गए एक अध्ययन से स्पष्ट हुआ था कि जलवायु परिवर्तन और पानी का अटूट संबंध है। इस रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण एशिया को 2030 तक बाढ़ों की कीमत प्रत्येक वर्ष चुकानी पड़ेगी। इनसे करीब सालाना 15.6 लाख करोड़ की हानि उठानी पड़ सकती है। साफ है, वैश्विक तापमान के बढ़ते खतरे ने आम आदमी के दरवाजे पर दस्तक दे दी है। दुनिया में कहीं भी एकाएक बारिश, बाढ़, बर्फबारी, फिर सूखे का कहर यही संकेत दे रहे हैं। आँधी, तूफान और फिर यकायक ज्वालामुखी के फटने की हैरतअंगेज घटनाएँ भी यही संकेत दे रही हैं कि अदृश्य खतरे इर्द-गिर्द ही कहीं मंडरा रहे हैं। समुद्र और अंटाकर्टिका जैसे बर्फीले क्षेत्र भी इस बदलाव के संकट से दो-चार हो रहे हैं। दरअसल वायुमंडल में अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड महासागरों में भी अवशोषित होकर गहरे समुद्र में बैठ जाती है। यह वर्षों तक जमा रहती है। पिछली दो शताब्दियों में 525 अरब टन कचरा महासागरों में विलय हुआ है। इसके इतर मानवजनित गतिविधियों से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड का 50 फीसदी भाग भी समुद्र की गहराइयों में समा गया है। इस अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड के जमा होने के कारण अंटार्कटिका के चारों ओर फैले दक्षिण महासागर में इस कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने की क्षमता निरंतर कम हो रही है। इस स्थिति का निर्माण खतरनाक है। ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण के मुताबिक वैज्ञानिकों का कहना है कि दक्षिण महासागर में कार्बन डाइऑक्साइड से लबालब हो गया है। नतीजतन अब यह समुद्र इसे अवशोषित करने की बजाय वायुमंडल में ही उगलने लग गया है। अगर इसे जल्दी नियंत्रित नहीं किया गया तो वायुमंडल का तापमान तेजी से बढ़ेगा, जो न केवल मानव प्रजाति, बल्कि सभी प्रकार के जीव-जंतुओं के अस्तित्व के लिए खतरनाक होगा।

अलनीनो की चपेट में मौसम

 जून के आरंभ में यदि समुद्र तट का तापमान बढ़कर 0.50 डिग्री हो जाता है और यह वृद्धि आगे भी बनी रहती है तो मौसम पर अल-नीनो का प्रभाव दिखाई देने लगता है।  भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के पास अलनीनो के हालात बनना शुरु हो गए हैं। धीरे-धीरे समूचे दक्षिणी गोलार्द्ध को अपनी चपेट में लेने की ओर अग्रसर है । असल में उष्णकटिबंधीय प्रशांत और भूमध्यीय क्षेत्र के सागर में यदि तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों में बदलाव आता है तो इससे उत्पन्न होने वाली समुद्री घटना को ही ‘अलनीनो’ या ’एल-नीनो’ प्रभाव कहा जाता है। यह घटना दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित इक्वाडोर और पेरू देशों के तटीय समुद्री जल में कुछ सालों के अंतर से घटित होती है।  नतीजतन समुद्र के सतही जल का तापमान सामान्य  से अधिक हो जाता है और अल-निनो वजूद में आ जाता है। एल निनो स्पेनिश भाषा का शब्द है। इसका शाब्दिक अर्थ है, ‘उत्पाती छोटा बालक’। अलनीनो का एक प्रभाव यह भी होता है कि वर्षा के क्षेत्रों में परस्पर परिवर्तन जैसे हालात दिखाई देते हैं। मसलन ज्यादा वर्षा वाले क्षेत्रों में कम वर्षा और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में ज्यादा वर्षा होती है। कम वर्षा अथवा अल-नीनो की चपेट में आए मानसून के कारण खेती योग्य कुल कृषि भूमि का 60 फीसदी हिस्सा सूखे के प्रभाव में आ जाता है। इस संकट का कहर किसानों और कृषि पर केंद्रित जनसमुदायों को झेलना होता है। यहाँ यह  भी ध्यान रखने की जरुरत है कि बीते 111 सालों के भीतर जो 20 भयानक सूखे पड़े हैं, उनकी पृष्ठभूमि में अल-नीनो का प्रभाव ही रहा है। 

सम्पर्कः शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी (म.प्र.), मो. 09425488224-9981061100

May 1, 2026

आलेखः मनोरंजन के बहाने आतंक का पाठ पढ़ते बाल-गोपाल

 -  प्रमोद भार्गव

अमेरिकी दैनिक 'न्यूयॉर्क टाइम्स' में छपी खबर के अनुसार, माइनक्राफ्ट और रोब्लॉक्स जैसे लोकप्रिय वीडियो गेम किशोरों और बालकों को आतंकी बनाने का मानवता विरोधी काम कर रहे हैं। अतएव, आपके लाड़ले को यदि मोबाइल पर गेम खेलने की लत लग गई है, तो होशियार हो जाइए, क्योंकि अब बच्चों को इन खेलों के जरिए आतंकवाद का पाठ पढ़ाए जाने का खतरनाक सिलसिला शुरू हो गया है। इन प्रशिक्षित नाबालिगों को बाद में आतंकवादी संगठनों और नफरत फैलाने वाले समूहों में भर्ती करा दिया जाता है, जिससे ये आतंक और नफरत फैलाने के औजार बन जाएँ।

इस सच्चाई को उजागर करने का काम यूनाइटेड नेशंस की 'काउंटर-टेररिज्म कमेटी' ने किया है। इसके अनुसार, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में आतंकवाद से जुड़े मामलों में अब 42 प्रतिशत आरोपी नाबालिग हैं। 2021 की तुलना में यह आँकड़ा तीन गुना अधिक है। नीदरलैंड के हेग स्थित 'इन्टरनेशनल सेंटर फॉर काउंटर-टेररिज्म' के अनुसार, यूरोप में 20 से 30 प्रतिशत आतंकवाद विरोधी गतिविधियों की जांच में 12-13 साल के बच्चे शामिल पाए गए हैं। अनेक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिए कट्टरपंथी संगठन तेजी से किशोरों और बालकों को आतंकी बनाने का खेल खेल रहे हैं। ये प्रशिक्षित बच्चे कट्टरपंथ को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं।

हालाँकि, भारत में आतंक फैलाने की दृष्टि से बच्चों और किशोरों को आतंकी बनाने का काम पाकिस्तानी सेना अर्से से कर रही है। मुंबई के 26/11/2008 के आतंकी हमले में शामिल अजमल कसाब इसका जीता-जागता उदाहरण रहा है। इस सच्चाई का खुलासा संयुक्त राष्ट्र भी कर चुका है। पाकिस्तान के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एवं पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई के सेवानिवृत्त अधिकारी रहे शाहिद अजीज ने ‘द नेशनल डेली’ अखबार में पहले ही यह मुद्दा उठा दिया था— “कारगिल की तरह हमने कोई सबक नहीं लिया है। हकीकत यह है कि हमारे गलत और जिद्दी कामों की कीमत हमारे बच्चे अपने खून से चुका रहे हैं। हमने इस धंधे को व्यापार का जरिया बना लिया है, वह भी अपनी ही कौम के किशोर एवं युवाओं के जीवन को दाँव पर लगाने का खेल खेलते हुए!”

पूरी दुनिया में इस समय डिजिटल खेलों का कारोबार बढ़ रहा है। इस कारण दुनिया इनके निर्माण और निर्यात में दिलचस्पी ले रही है, नतीजतन इसका रूप दैत्याकार होता जा रहा है। फिलहाल विश्व में लोकप्रिय डिजिटल खेलों में मोबाइल प्रीमियर लीग (एमपीएल), फेंटेसी स्पोर्ट्स प्लेटफॉर्म, माइनक्राफ्ट, रोब्लॉक्स, ड्रीम-11, कोरियन लवर गेम और लूडो किंग हैं। ये सभी खेल भारत समेत लगभग सभी देशों में उपलब्ध हैं। भारत से संचालित होने वाली खेल कंपनियों में चीन सहित कई देशों की कंपनियों की पूँजी लगी हुई है। इन खेलों के अमेरिका, चीन, भारत, ब्राजील और स्पेन बड़े खिलाड़ी हैं।

हाल ही में गाजियाबाद में तीन सगी नाबालिग बहनों द्वारा नौवीं मंजिल से छलांग लगाकर आत्महत्या करने का मामला सामने आया है। इन बहनों को ऑनलाइन ‘टास्क बेस्ड कोरियन लवर गेम’ खेलने की लत लग गई थी। इसी आत्मघाती खेल को खेलते हुए इन बहनों ने सामूहिक आत्महत्या कर ली। इस घटना से साफ होता है कि ये खेल कितने खतरनाक हैं।

कोरोना काल में ऑनलाइन शिक्षा के बढ़ते चलन के चलते दुनिया के विद्यार्थियों की मुट्ठी में एंड्रॉयड मोबाइल जरूरी हो गया था। मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्री इसके बढ़ते चलन पर निरंतर चिंता प्रकट कर रहे हैं। अभिभावक बच्चों में गेम देखने की बढ़ती लत और उनके स्वभाव में आते परिवर्तन से चिंतित व परेशान हैं। वे बच्चों का मनोचिकित्सकों से उपचार कराने के बावजूद इस लत से मुक्ति दिलाने में कठिनाई का सामना कर रहे हैं। दरअसल, बच्चों का मोबाइल या टैबलेट की स्क्रीन पर बढ़ता समय आँखों की दृष्टि को खराब कर रहा है। साथ ही, बच्चे अनेक शारीरिक और मानसिक बीमारियों की गिरफ्त में भी आ रहे हैं। यहाँ तक कि बच्चे पोर्न फिल्में देखते भी पाए गए हैं।

अब ऐसे वीडियो खेल भी आभासी दुनिया (Virtual World) के लिए बनाए जाने लगे हैं, जहाँ खिलाड़ी आतंकी हमलों और गोलीबारी की घटनाओं को दोहरा सकते हैं। 2019 में न्यूजीलैंड के चर्च और मस्जिदों पर हुए हमलों को भी खेलों का हिस्सा बनाया जा रहा है। ये उपाय बच्चों को धार्मिक कट्टरपंथी बनाए जाने की दृष्टि से किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में किशोर और युवाओं को लुभाने के लिए ‘एक्टिव क्लब्स’ नाम के समूह बनाए जा रहे हैं। ये ऐसे समूह हैं जो खेलते हुए नस्लीय युद्ध की तैयारी में जुट जाते हैं और नस्लीय भावना से लड़ते दिखाई देते हैं। 27 देशों में फैले इन क्लबों द्वारा 15 से 17 साल के नादान किशोरों को लक्षित किया जा रहा है। इन्हें देखते हुए किशोर अपनी गोरी या काली पहचान से जुड़कर नस्लवादी मानसिकता की गिरफ्त में आकर आतंकी बनने की दिशा में अनायास मुड़ जाते हैं।

ऑनलाइन खेल आंतरिक श्रेणी में आते हैं, जो भौतिक रूप से मोबाइल पर एक ही किशोर खेलता है, लेकिन इनके समूह बनाकर इन्हें बहुगुणित कर लिया जाता है। वैसे तो ये खेल सकारात्मक हो सकते हैं, लेकिन ब्लू ह्वेल, पबजी, माइनक्राफ्ट और रोब्लॉक्स जैसे खेल उत्सुकता और जुनून का ऐसा मायाजाल रचते हैं कि मासूम बालक के दिमाग की परत पर नकारात्मकता की पृष्ठभूमि रच देते हैं।

मनोचिकित्सकों और स्नायु वैज्ञानिकों का कहना है कि ये खेल बच्चों के मस्तिष्क पर बहुआयामी प्रभाव डालते हैं। ये प्रभाव अत्यंत सूक्ष्म किंतु तीव्र व तीक्ष्ण होते हैं; इसलिए ज्यादातर मामलों में अस्पष्ट होते हैं। दरअसल, व्यक्ति की आंतरिक शक्ति से आत्मबल दृढ़ होता है और जीवन क्रियाशील रहता है; किंतु जब बच्चे निरंतर एक ही खेल खेलते हैं, तो दोहराव की इस प्रक्रिया से मस्तिष्क कोशिकाएँ परस्पर घर्षण के दौर से गुजरती हैं। नतीजतन दिमागी द्वंद्व बढ़ता है और बालक मनोरोगों से लेकर नस्लीय गिरफ्त में आता जाता है, जो उसे आतंक की राह में धकेलने का काम कर देते हैं।

ये खेल हिंसक और अश्लील होते हैं; इसलिए बच्चों के आचरण में आक्रामकता और गुस्सा देखने को मिलता है। दरअसल, इस तरह के खेल देखने से मस्तिष्क में तनाव उत्पन्न करने वाले डोपामाइन जैसे हार्मोनों का स्राव होने लगता है। इस द्वंद्व से भ्रम और संशय की मनःस्थिति निर्मित होने लगती है और बच्चों का आत्मविश्वास छीजने के साथ विवेक अस्थिर होने लगता है, जो उन्हें आत्मघाती कदम उठाने को विवश कर देता है। हालाँकि, डोपामाइन ऐसे हार्मोन भी सृजित करता है जो आनंद की अनुभूति के साथ सफलता की अभिप्रेरणा देते हैं; किंतु यह रचनात्मक साहित्य पढ़ने से संभव होता है, जो अब अधिकतर पत्र-पत्रिकाओं और घरों से बाहर होता जा रहा है। यह एक अत्यंत चिंतनीय पहलू है।

सम्पर्क: शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी (म.प्र.) 

Apr 1, 2026

आलेखः महानदी जल-बँटवारा छत्तीसगढ़ और ओडिशा में विवाद

  - प्रमोद भार्गव
        छत्तीसगढ़ और ओडिशा राज्यों के बीच बहने वाली महानदी के जल बँटवारे को लेकर विवाद गहरा गया है। हालांकि यह विवाद आठ दशक से भी ज्यादा पुराना है। समय-समय पर विवाद के हल खोजे जाते रहे हैं, लेकिन अब तक सर्वमान्य हल  निकल नहीं पाया है; परंतु अब बदले राजनितिक परिदृश्य में इस विवाद का स्थायी हल निकलने की उम्मीद बढ़ गई है। एक तो अब दोनों राज्यों में एक ही दल भाजपा की सरकारें हैं,दूसरे केंद्र में भाजपा के ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बैठे हैं,जो बुनियादी समस्याओं के निराकरण में माहिर हैं। ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहनचरण मांझी ने एक  उच्चस्तरीय बैठक की और केंद्र सरकार से समस्या निवारण में सहयोग माँगा है। अब सवाल खड़ा होना जरूरी है कि इस नदी के जल बँटवारे को लेकर विवाद इतना जटिल क्यों बन गया कि और सुलट क्यों नहीं रहा है। 
          छत्तीसगढ़ और ओडिशा भू-क्षेत्र की महानदी सबसे बड़ी नदी है। रामायण और महाभारत काल में भी इस नदी का अस्तित्व मौजूद था। तब इसे चित्रोत्पला, महानंदा और नीलोत्पला नामों से जाना जाता था। इसका उद्गम स्थल छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में स्थित सिहावा नामक पर्वत शृंखलाएँ हैं। महानदी का प्रवाह दक्षिण से उत्तर की और सिहावा से निकलकर राजिम में पहुँचता है, तब इसमें पैरी और सोंदुर नदियाँ  भी मिल जाती हैं। इन नदियों का जल विलय होने के साथ ही यह नदी विशाल रूप धारण कर लेती है। इसके बाद ऐतिहासिक नगर आरंग और सिरपुर से बहती हुई जब शिवरीनारायण में पहुँचती है तो अपने नाम के अनुरूप महानदी का स्वरूप ग्रहण कर लेती है। महानदी के तट पर ही धमतरी, कांकेर, चारामा, राजिम और चंपारण बसे हैं। शिवरीनारायण एक धार्मिक नगरी है। यहीं से यह नदी दक्षिण से उत्तर की ओर न बहकर पूर्व दिशा में बहने लग जाती है। संभलपुर में प्रवेश करने के साथ ओडिशा में बहने लगती है। इसके प्रवाह का आधे से अधिक भाग छत्तीसगढ़ में है। संभलपुर के आगे बलांगीर और कटक से निकलकर महानदी कुल 851 किमी की लंबी यात्रा कर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इस बीच इसमें पैरी, सोंदुर, शिवना, हंसदेव, अरपा, जोंक, ईब, मांड, केलो, बोरई, कंजी, लीलार और तेल नदियाँ  भी मिलती हैं। कटक से लगभग 12 किमी पहले महानदी कई धाराओं में बँटकर बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती है। 

   इस नदी पर कुल 253 बाँध,14 छोटे बाँध और 13 एनीकट हैं।  हीराकुद, रुद्री,गंगरेल और मिनीमाता हसदेव बांगो जैसे प्रमुख बाँध बँधे हैं। 6 बिजली संयंत्र भी बने हुए हैं। महानदी ही पूर्वी मध्यप्रदेश और ओडिशा की सीमाओं को निर्धारित करती है। गिब्सन नामक अंग्रेज ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है कि संभलपुर के निकट हीराकुद का जो द्वीप क्षेत्र है, यहाँ एक समय हीरा मिला करते थे। जिनकी खपत रोम में होती थी। 2011 की जनगणना के अनुसार महानदी क्षेत्र में रहने वाले करीब 30 लाख लोगों की आबादी की आजीविका इसी नदी के पानी पर निर्भर है।  महानदी पर हीराकुद बाँध बनने से पहले तक रोम के सिक्के मिल जाया करते थे, इसी तथ्य को गिब्सन ने इस क्षेत्र में हीरे की खदानें होने से जोड़ा है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा कथा में लिखा है कि मध्यप्रदेश से हीरों का व्यापार ओडिशा के कलिंग में होता था। इन विवरणों से पता चलता है कि महानदी और हीराकुद क्षेत्र में कभी हीरे की खदानें रही हैं।

       छत्तीसगढ़ के कुल भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 55 प्रतिशत हिस्से का पानी महानदी में जमा होता है। यह नदी और इसकी सहायक नदियों के ड्रेनेज एरिया का 53.90 फीसदी हिस्सा छत्तीसगढ़ में है। इसका 45.73 प्रतिशत ड्रेनेज एरिया ओडिशा और 0.35 प्रतिशत अन्य राज्यों में हैं। हीराकुद बांध तक महानदी का जल ग्रहण क्षेत्र 82,432 वर्ग किमी हैं, जिसमें से 71,424 वर्ग किमी क्षेत्र छत्तीसगढ़ में हैं, जो कि इसके संपूर्ण जल- ग्रहण क्षेत्र का 86 प्रतिशत है। हीराकुद बाँध में महानदी का बहाव 40,773 एमसीएम है, इसमें से 35,308 एमसीएम का योगदान छत्तीसगढ़ देता है। जबकि इस समय छत्तीसगढ़ केवल 9000 एमसीएम पानी का उपयोग कर रहा है, जो कि महानदी के हीराकुद में उपलब्ध पानी का महज 25 प्रतिशत है। हालाँकि छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह का  दावा था कि छत्तीसगढ़ केवल 15 प्रतिशत पानी का उपयोग करता है।

      छत्तीसगढ़ क्षेत्र में महानदी पर 9 छोटे-बड़े बाँध  हैं। इन्हीं बाँधों को लेकर विवाद की शुरुआत  2016 में हुई थी। तब ओडिशा सरकार ने आरोप लगाया था कि छत्तीसगढ़ सरकार ने महानदी की सहायक नदियों पर लघु बाँध और एनीकट बनाकर ओडिशा को मिलने वाले पानी को कम कर दिया है। इस कारण गर्मियों में नदी का जलस्तर इतना गिर जाता है कि सिंचाई और पीने के पानी की किल्लत खड़ी हो जाती है, जबकि छत्तीसगढ़ का कहना है कि वह अपने क्षेत्र में ही जल का भंडारण करता है।  अब ओडिशा चाहता है कि छत्तीसगढ़ महानदी की सहायक नदियों पर कोई बाँध नहीं बनाए और जल के प्रवाह को बाधित न करे। इस विवाद को निपटाने के लिए 2018 में सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक ट्रिब्यूनल का गठन किया था; लेकिन प्रकरण का निराकरण अभी तक नहीं हो पाया है। छत्तीसगढ़ के बड़े भू-भाग में कुँएँ और नलकूपों का जलस्तर भी यही, बाँध बनाए रखते हैं। लेकिन यहाँ शोचनीय पहलू है कि ज्यादातर ट्रिब्यूनल नदियों से जुड़े अंतर-राज्यीय जल विवाद निपटाने में सफल नहीं हो पाए हैं; इसलिए राज्य सरकारों को आपसी सहमति से इन समस्याओं का हल ढूढ़ने की जरूरत है। ■        

सम्पर्कः शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224, 09981061100


Mar 1, 2026

आलेखः कृषि और आहार की सनातन संस्कृति

  - प्रमोद भार्गव

ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं

करवावहै तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।

  भारतीय ज्ञान परंपरा में यह भोजन का मंत्र है, जो आज भी गाया जाता है। आहार के प्रति सम्मान का द्योतक है। आहार का सीधा संबंध उदर से है। अतएव उदर को आहार का भंडार गृह भी कहा जाता है। भोजन ग्रहण करने के बाद शरीर में पोषण के लिए आवश्यक रासायनिक व शारीरिक क्रिया होती है। यही भोजन को पचाने का काम करती है। पाचन की प्रक्रिया इसे पचाकर सप्त धातुओं में बदल देती है।

    मानव जीवन अन्न पर निर्भर है। अन्न की उत्पादकता कृषि पर आश्रित हैं। कृषि के लिए उत्तम गुणवत्ता के बीजों की आवश्यकता रहती है। तथापि भोजन केवल कृषि से ही नहीं मिलता है, अपितु फल-फूल और जल व वन्य जीवों से भी मिलता है। परंतु उत्तम आहार अनाज की विभिन्न किस्मों और फलों को ही माना जाता है। इन सब भोज्य पदार्थों की उपलब्धता के तत्पश्चात भी दूध और शहद ऐसे आहार हैं, जिन्हें दंश रहित संपूर्ण आहार माना जाता है। इसलिए बीमारी की अवस्था में चिकित्सक दूध और फल के सेवन की सलाह देते हैं। ज्यादातर आयुर्वेदिक दवाएँ मधु ( शहद ) के साथ खाई जाती हैं। शुद्ध शहद हजारों वर्षा तक खराब नहीं होती। हड़प्पा-मोहन जोदड़ो के उत्खनन में पाँच हजार साल से भी ज्यादा पुराना शहद का भरा मिट्टी का मटका निकला था, जिसकी शहद खाने योग्य थी। हमारी सनातन संस्कृति में भूखा नहीं सोने की अवधारणा ऋग्वैदिक काल से ही प्रचलन में रही है। हमारा यही पारंपरिक बोध मनुष्य ही नहीं, पालतू पशुओं की भूख की चिंता करता है। इसीलिए प्रत्येक सनातनी के घर में पहली रोटी गाय के लिए बनाई जाती है। क्योंकि गाय दूध, दही, घी और मठा तो देती ही है, खेती-किसानी के लिए हलधर बैल भी देती है। इसलिए बच्चों के पालन- पोषण की तरह गाय की भी चिंता की जाती है। इन्हीं आदर्श नैतिक मूल्यों को समाज में स्थापित करने की भावना से भक्ति कालीन कवि कबीर दास कहते हैं,

‘साईं  इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाए।

आपहुँ भूखा न रहे, साधु न भूखा जाए।

    अपरिग्रह की यह चेतना आज भी भारतीय सनातन समाज में व्याप्त है।

    सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही अन्न की आवश्यकता अनुभव हुई। इस समस्या के निवारण की दृष्टि से ही कृषि का आविष्कार हुआ। कृषि, अन्न और आहार एक-दूसरे के पर्याय हैं। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व संभव नहीं है। कृषि कार्य में अनाज की उपलब्धता है और अनाज मानव जीवन की ऊर्जा है, अतएव कृषि को मानव कल्याण का साधन माना गया है। इसीलिए यजुर्वेद में राजा के प्रमुख कर्तव्य के बारे में कहा है कि वह कृषि की उन्नति करे, जिससे धन-धान्य में वृद्धि हो। सतपथ ब्रह्मांड में कृषि कार्य को चार प्रकारों में बाँटा गया है। एक, कर्षण (खेत की जुताई करना), दो वपन (बीज बोना), तीन लवण (पके खेत की कटाई करना) और चार मर्दन अर्थात दाएँ करके स्वच्छ अन्न प्राप्त करना। ऋग्वेद और अथर्ववेद में राजा वेन के पुत्र पृथु को कृषि विद्या का प्रथम आविष्कारक और इंद्र को पहला कृषक माना गया है। इंद्र ने मरुत देवों के साथ मिलकर सरस्वती नदी के किनारे की उर्वरा भूमि पर माधुर्य युक्त जौ की खेती की-

इमं देवा मधुना संयुतं यवं, सरस्वत्यार्मांध मणावचर्कृशुः।

इंद्र आसीत सीरपतिः शतक्रतुः कीनाषा आसन् मरुतः सुदानवः

-अथर्ववेदः6.30.1

    आर्य और अनार्यों के युग में जौ या गेहूँ की खेती बीज भूमि में फेंककर की जाती थी। कालांतर में हल का आविष्कार हुआ और खेती हलों में बैल जोतकर की जाने लगी। हल का उपयोग भविष्य में एक अस्त्र के रूप में भी हुआ। बलराम का अस्त्र हल ही है। वैदिक काल में हलेष्टि यज्ञ होता था। सम्राट हल चलाकर खेत में उत्तम फसलों के बीज बोते थे। भारत कृषि प्रधान देश होने के साथ यहाँ की अर्थ-व्यवस्था की नींव कृषि पर ही टिकी है। हल कृषि कार्य का प्रतीक है। वेद और रामायण काल में हल दहेज में दिया जाता था। वधू चरखा साथ लेकर ससुराल जाती थी। राजा जनक ने हल चलाया था। यही हल एक घड़े से टकराया तो उसमें से सीता उत्पन्न हुईं। महाभारत काल में राजा कुरु ने जिस क्षेत्र में हल चलाया था, वह कुरुक्षेत्र कहलाया। बौद्ध काल में राजा हल चलाते थे और रानी बीज बोती थी। हमारे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान, जय किसान‘ का नारा देकर शौर्य और कृषि को चिह्नित किया था। लोक कवि घाघ ने कहा था, ‘हल लगा पाताल, मिट चला सब अकाल।’

     फसल में पौष्टिकता लाने के लिए वैदिक ऋषियों ने खाद के रूप में दूध, घी और शहद का मिश्रण डालने का उपाय किया था। उत्तम फसल के लिए धूप की भी आवश्यकता है। सूर्य की किरणों से फसल के पौधों को ऊर्जा मिलती है, भोजन के रूप में ग्लूकोज मिलता है। सूर्य की किरणें ही बीज में अंकुरण और वृद्धि का कारण हैं। वायु से फसल को कार्बन डाइऑक्साइड मिलती है। वैदिक युग में भिन्न फसलों की पैदावार प्रमुख रूप से होती थी। धान, जौ, उड़द, तिल, मूँग, चना, कँगुनी, छोटा चावल, साँवा, कोदो, गेहूँ और मसूर। दूध और उससे बनने वाले दही व घी का भोजन में सर्वाधिक प्रयोग होता था; क्योंकि इन्हें पौष्टिक एवं बलवर्धक माना गया है। ऋग्वेद में दूध में पकाए गए चावल का उल्लेख है, जिसे हम खीर कहते है। मिट्टी के घड़ों में भरे हुए दही का उल्लेख है, जिससे पनीर बनाया जाता था। घी में तलकर मालपूए बनाए जाते थे। जौ को कूटकर उसकी भूसी अलग करके भूनकर पीसते थे, उससे बने सत्तू को दही के साथ खाने का चलन था। इस सत्तू में आगे चलकर चना और गेहूँ के साथ मोटे अनाज का उपयोग भी होने लगा था, जिसका चलन वर्तमान में भी है।

  प्राचीन भारतीय समृद्धि और समरसता के मूल में प्राकृतिक संपदा, कृषि और गोवंश थे। प्राकृतिक संपदा के रूप में हमारे पास नदियों के अक्षय-भंडार के रूप में शुद्ध और पवित्र जल स्रोत थे। हिमालय और उष्ण कटिबंधीय वनों में प्राणी और वनस्पति की विशाल जैव-विविधता वाले अक्षुण्ण भंडार और ऋतुओं के अनुकूल पोषक तत्त्व पैदा करने वाली जलवायु थी। मसलन मामूली सी कोशिश आजीविका के लायक पौष्टिक खाद्य सामग्री उपलब्ध करा देती थी; इसीलिए नदियों के किनारे और वन प्रातंरों में मानव सभ्यता और भारतीय संस्कृति विकसित हुई। आहार की उपलब्धता सुलभ हुई तो सृजन और चिंतन के पुरोधा सृष्टि के रहस्यों की तलाश में जुट गए।

 आर्थिक संसाधनों को समृद्ध बनाने के लिए ऋषि-मनीषियों ने नए-नए प्रयोग किए। कृषि फसलों के विविध उत्पादनों से जुड़ी। फलतः अनाज, दलहन, चावल, तैलीय फसलें और मसालों की हजारों किस्में प्राकृतिक रूप से फली-फूलीं। 167 फसलों और 350 फल प्रजातियों की पहचान की गई। अकेले चावल की करीब 80 हजार किस्में हमारे यहाँ मौजूद हैं। 89 हजार जीव-जंतुओं और 47 हजार प्रकार की वनस्पतियों की खोज हुई। मनीषियों ने प्रकृति और जैव-विविधता के उत्पादन तंत्र की विकास सरंचना और प्राणी जगत के लिए उपयोगिता की वैज्ञानिक समझ हासिल की। इनकी महत्ता और उपस्थिति दीर्घकालिक बनी रहे, इसलिए धर्म व अध्यात्म के बहाने अलौकिक तादात्म्य स्थापित कर इनके, भोग के लिए उपभोग पर व्यावहारिक अंकुश लगाया। दूर दृष्टा मनीषियों ने हजारों साल पहले ही लंबी ज्ञान-साधना व अनुभवजन्य ज्ञान से जान लिया था कि प्राकृतिक संसाधनों का कोई विकल्प नहीं है। वैज्ञानिक तकनीक से हम इनका रूपांतरण अथवा कायातंरण तो कर सकते हैं; किंतु तकनीक आधारित किसी भी आधुनिकतम ज्ञान के बूते इन्हें प्राकृतिक स्वरूप में पुनर्जीवित नहीं कर सकते ? तमाम दावों के बावजूद क्लोन से अभी तक जीवन का पुनरागमन नहीं हुआ है। गोया, हमारी कृषि एवं गौवंश आधारित अर्थव्यस्था उत्तरोतर विकसित व विस्तारित हुई। विकास का समावेशी रूप बना रहा। अपढ़ भी गरिमा के साथ स्वावलंबी रहा। नतीजतन हम अर्थ व वैभव संपन्न हुए और सोने की चिड़िया कहलाए।

   ऋषियों ने आहार प्रणालियों में विकास के साथ इनके महत्त्व का निर्धारण करते हुए इन्हें मुख्य रूप से तीन प्रकारों में विभाजित किया। सात्विक आहार, राजसी आहार और तामसिक आहार। सबसे प्रमुख सात्त्विक आहार माना गया; क्योंकि यह आध्यात्मिक विकास के लिए प्रेरित करने वाला माना गया है। इसमें फल-सब्जियां, दूध-दही, अनाज एवं दालें और कई फलों के दाने शामिल है। यह आहार मानसिक शांति और पवित्रता को बढ़ावा देने के साथ, इंद्रियों पर नियंत्रण भी करता है। इससे मानसिक विवेक का संयम बना रहता है। राजसी आहार तामसिक और राजसिक गुणों वाला होता है। इसे आध्यात्मिक उन्नति की दृष्टि से श्रेष्ठ नहीं माना जाता है, क्योंकि इसमें तामसिक तत्वों की अधिकता होती है। यह तत्व मानसिक स्थिति में विचलन पैदा करते है। अतएव चित्त चंचल बना रहता है। इस तरह के भोज्य पदार्थों में तीखा और तला हुआ भोजन, मिठाई, तेज मसाले, शराब और अन्य नशीले पदार्थ शामिल हैं। तामसिक आहार को सनातन संस्कृति में उचित नहीं माना गया है। क्योंकि यह मानसिक अस्थिरता और आध्यात्मिक उन्नति में बाधक होता है। इसे ग्रहण करने से क्रोध और कमुकता बने रहते हैं। इस आहार में मांस से बने भोजन और शराब शामिल रहते हैं।

      यदि हमारा भोजन पौष्टिक और पवित्र बना रहता है तो हम यजुर्वेद के उस मंत्र को साकार रूप में बदलने में सफल होंगे जो भोजन और ऊर्जा के बीच अंतर संबंध की व्याख्या करता है। शरीर को जिंदा रहने के लिए आहार की और आत्मा को अच्छे विचारों की जरूरत पड़ती है, जो शुद्ध और सात्विक भोजन से ही संभव है,

ॐ यन्तु नद्यो वर्षन्तु पर्जन्याः । सुपिप्पला ओषधयो भवन्तु

अन्नवताम मोदनवताम मामिक्षगमयति एशाम राजा भूयासम्।

ओदनम् मुद्रवते परमेष्ठी वा एशः यदोदनः, पमावैनं श्रियं गमयति।

 यजुर्वेद में दिए इस मंत्र का अर्थ है, ‘हे ईश्वर! बादल पानी बरसाते रहें और नदियां बहती रहें। औषधीय वृक्ष फलें-फूलें और सभी वृक्ष फलदायी हों। मुझे अन्न और दुग्ध उत्पादन करने वालों से लाभ प्राप्त हो और ऐसी धरती का मैं राजा बनूँ। हे ईश्वर! थाली में रखा हुआ भोजन आपके द्वारा दिया प्रसाद है। यह मुझे स्वस्थ और समृद्ध बनाए रखेगा।’ साफ है, राजा प्रकृति और अन्नदाता से उत्तम भोजन की सामग्री देते रहने की प्रार्थना कर रहा है। यही प्रार्थना एक समय सभी सनातन संस्कृति के उपासक परमात्मा से करते रहे हैं।

सम्पर्कः  शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी  (म.प्र.), मो. 09425488224, 09981061100

Jan 1, 2026

आलेखः वंदे मातरम् की गौरव गाथा

- प्रमोद भार्गव

वंदे मातरम् को भारत की शाश्वत संकल्पना बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस राष्ट्रीय गीत के 150 वर्ष पूरे होने पर वर्ष भर चलने वाले स्मरणोत्सव का शुभारंभ विशेष डाक टिकट और सिक्के के विमोचन के साथ किया। प्रधानमंत्री ने वंदे मातरम् की गौरव गाथा को विभिन्न उपमाओं- अलंकरणों से स्पंदन देते हुए इससे जुड़े इतिहास के एक काले पन्ने को खोलने के साथ कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की विभाजन कारी मानसिकता का खुलासा किया। उन्होंने कहा कि ‘आजादी की लड़ाई में वंदे मातरम् की भावना ने पूरे राष्ट्र को प्रकाशित किया था, लेकिन दुर्भाग्य से 1937 में इस गीत के महत्त्वपूर्ण पदों को उसकी आत्मा के एक हिस्से को अलग कर दिया गया था। जिस भाव से वंदे मातरम् के टुकड़े किए गए थे, कालांतर में उसी भाव ने विभाजन के बीज बो दिए थे।’ अतीत में इस गीत की मूल रचना के साथ जो भी खिलवाड़ किया गया हो, किंतु यह सच्चाई है कि आजादी की लड़ाई में इस गीत की अहम भूमिका रही है।    


बंकिम चंद्र चटर्जी के बांग्ला भाषा में लिखे उपन्यास ‘आनंद मठ’ से राष्ट्रगीत के रुप में स्वीकारा गया यह गीत कोई मामूली गीत नहीं है। भारत को उसकी व्यापक राष्ट्रीयता की पहचान और स्वाभिमान इसी गीत से प्राप्त हुए। नागरिक सभ्यता की विरासत, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानव सेवा के मूल्यों के उत्स इसी गीत के समवेत स्वर की उपज हैं। अंग्रेजों के विरुद्ध भिन्न जातीय और धर्म-समुदायों को संगठित करने के अभियान में इसी गीत की भूमिका बुलंद थी। तय है, वंदे मातरम् क्रांति के स्वरों में नींव का पत्थर था। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की रक्त धमनियों में विद्रोह की उग्र भावना इसी गीत की देन है। 1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन को देशव्यापी धरातल इसी गीत के बूते मिला था। और वह यही आंदोलन था, जिसमें गांधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया था। सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज के फौजियों ने भी इसी गीत को गाते हुए मातृभूमि की बलिवेदी पर प्राण न्यौछावर किए। 

14 अगस्त 1947 की मध्य-रात्रि में जब देश आजाद हो रहा था, तब इस मंत्र-गीत का गायन श्रीमती सुचेता कृपलानी ने किया और वहाँ उपस्थित लोग इस गीत के सम्मान में गीत खत्म न हो जाने तक खड़े रहे। 15 अगस्त 1947 को जब स्वतंत्रता का सूर्योदय हो रहा था, तब आकाशवाणी पर पंडित ओंकार नाथ ठाकुर ने इसे बड़े ही रोचक ढंग से गाया। आखिरकार 24 अगस्त 1948 को जन-गण-मन के साथ इस गीत को भी राष्ट्र गीत की प्रतिष्ठा मिली। लेखक और दार्शनिक युगद्रष्टा होते हैं, इसलिए बंकिम बाबू ने इस गीत को लिखे जाने के वक्त ही अपनी दिव्य-दृष्टि से अनुभव कर लिया था कि यह गीत राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बनकर लोकप्रियता के शिखर चूमेगा; इसीलिए उन्होंने इसे बांग्ला भाषा में न लिखते हुए संस्कृत में लिखा। मूल और संपूर्ण गीत की केवल नौ पंक्तियाँ बांग्ला में हैं। इस गीत का जो संपादित अंश राष्ट्र गीत के रूप में स्वीकार किया गया है, वह केवल आठ पंक्तियों का है।

वंदे मातरम् को इस्लाम विरोधी जताया जाता रहा है। जब कांग्रेस ने इसे प्रार्थना गीत के रूप में स्वीकार किया था, तब भी इसका विरोध हुआ था। 1937 में कांग्रेस कार्यकारिणी ने आचार्य नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। इसमें मौलाना आजाद, पंडित नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस जैसे प्रखर संस्कृति मर्मज्ञ सदस्य थे। समिति को जिम्मेदारी सौंपी गई थी कि वे रवीन्द्रनाथ ठाकुर से विचार-विमर्श कर वंदे मातरम् के संबंध में दो टूक सलाह दें। समिति द्वारा रवीन्द्रनाथ से परामर्श के बाद जो प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया, उसके उपरांत कांग्रेस कार्यकारिणी ने फैसला लिया कि हरेक राष्ट्रीय व सार्वजनिक सभा में वंदे मातरम् के केवल दो पद गाए जाएँ। ऐसे अवसरों पर भारत विभाजन के जनक मोहम्मद अली जिन्ना भी इस गीत को आदर के साथ खड़े होकर गाया करते थे। तय है, गीत पर विवाद का समाधान स्वतंत्रता से पहले ही हो चुका था। 

बाद में देश -विभाजन के लिए जिम्मेदार मुस्लिम लीग के नेताओं ने जरूर वंदे मातरम् को बुतपरस्ती, अर्थात मूर्तिपूजा मानते हुए इसका विरोध किया। इस बहाने लीगियों ने अल्पसंख्यकों को खूब उकसाया। नतीजतन 1938 तक कांग्रेस के जो प्रमुख मुस्लिम नेता इस गीत की राष्ट्रीय गरिमा का ख्याल रखते चले आ रहे थे, वे भी दबी जुबान से इसका विरोध करने लगे। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप बहुसंख्यक हिंदू और सिख हठपूर्वक इस गीत की महिमा के बखान में लगे रहे। बाद में साझा सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के नजरिये से उर्दू के उदारवादी कवियों व राजनीतिकों ने वंदे मातरम् का अनुवाद ‘ऐ मादर, तुझे सलाम करता हूँ’ किया, अर्थात् हे माता, तुझे प्रणाम करता हूँ। मुल्क को गुलामी से आजाद कराने की इस इबादत में गलत क्या है? अरबी फारसी के अनेक कवियों ने भी देश को ‘माँ’ कहकर संबोधित किया है। लिहाजा राष्ट्र के प्रति अपनी भावनाओं व उद्गारों को प्रचलित रूपकों अथवा प्रतीकों में प्रकट करना मूर्तिपूजा या बुतपरस्ती कतई नहीं है। वंदे मातरम् एक मौलिक रचना है, इसकी व्याख्या धर्म नहीं, केवल साहित्य के संदर्भ में होनी चाहिए। इसे यदि कोई सांसद या विधायक इस्लाम विरोधी जताता है, तो उसका मकसद धर्म के बहाने राजनीतिक रोटियाँ सेंकना है, जो अलगाववादी राजनीति की संकीर्ण मानसिकता का प्रतीक है।

खुद बंकिम चन्द्र ने लिखा है - ‘हिन्दू होने पर ही कोई अच्छा नहीं होता है, मुसलमान होने पर कोई बुरा नहीं होता और न ही मुसलमान होने पर कोई अच्छा होता है या हिन्दू होने पर कोई बुरा होता है। अच्छे बुरे दोनों जातियों में हैं। गोया, निर्वाचित चंद मुसलिम प्रतिनिधि इस्लाम के बहाने जिस राष्ट्रीयता का अपमान करते हैं, उसी राष्ट्रीयता के सम्मान में अन्य मुस्लिम प्रतिनिधि सुर में सुर मिलाते हैं। ऐसे ही चंद सिरफिरे मुस्लिमों ने आजाद हिंद फौज के नारे, ‘जय हिंद’ का भी विरोध किया था, जब दैनिक अखबार ‘डान’ ने वंदे मातरम् की आलोचना की तो महात्मा गांधी को कहना पड़ा, ‘वंदे मातरम् कोई धार्मिक नारा नहीं है, यह विशुद्ध राजनीतिक नारा है।’ यही नारा था, जिसने सोये हुए भारत को जगाने का काम करके, आजादी हासिल कराई थी।

सम्पर्कः शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224, 9981061100

Dec 3, 2025

आलेखः बस्तर में अंतिम साँसे गिनता नक्सलवाद

 - प्रमोद भार्गव

  छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश की सीमा पर हुई मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने शीर्ष माओवादी क्रूर हिंसा के प्रतीक बन चुके हिड़मा को मार गिराने के बाद सात अन्य नक्सलियों को मार गिराने के साथ तय है कि अब नक्सली हिंसा अपने अंतिम चरण में है। मार्च 2026 तक इसका समूल नाश हो जाएगा ; क्योंकि अब प्रमुख नक्सली सरगनाओं की गिनती मात्र 3-4 तक सिमट गई है। यदि वे हथियार डालकर समर्पण नहीं करते हैं, तो उनका भी अंत होना तय है। हालाँकि इस मुठभेड़ में मप्र के बालाघाट में पदस्थ निरीक्षक आशीष शर्मा को बलिदान देना पड़ा है। माओवादी अरसे से देश में एक ऐसी जहरीली विचारधारा रही है, जिसे नगरीय बौद्धिकों का समर्थन मिलता रहा है। ये बौद्धिक नक्सली संगठनों को आदिवासी समाज का हितचिंतक मानते रहे हैं, जबकि जो आदिवासी नक्सलियों के विरोध में रहे, उन्हें इनकी हिंसक क्रूरता का शिकार होना पड़ा है। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि देश के वामपंथी दलों को कभी भी सुरक्षाबलों का नक्सलियों के खिलाफ चलाया जा रहा सफाये का अभियान पसंद नहीं आया। इससे पहले छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ के जंगल में सुरक्षा बलों के नक्सल विरोधी अभियान में बड़ी सफलता तब मिली थी, जब डेढ़ करोड़ के इनामी बसव राजू समेत 27 माओवादियों को सुरक्षा बलों ने मार गिराया था। यह कुख्यात दरिंदा होने के साथ गुरिल्ला लड़ाका था। माओवादी पार्टी का इसे पर्याय माना जाता था। इसका नक्सली सफर 1985 से शुरू हुआ था। इसने वारंगल के क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाई की थी। 

नक्सली हिंसा लंबे समय से देश के अनेक प्रांतों में आंतरिक मुसीबत बनी हुई है। वामपंथी माओवादी उग्रवाद कभी देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा माना जाता रहा है। लेकिन चाहे जहाँ रक्तपात की नदियाँ बहाने वाले इस उग्रवाद पर लगभग नियंत्रण किया जा चुका है। नई रणनीति के अंतर्गत अब सरकार की कोशिश है कि सीआरपीएफ की तैनाती उन सब अज्ञात क्षेत्रों में कर दी जाएँ, जहाँ नक्सली अभी भी ठिकाना बनाए हुए हैं। इस नाते केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में सबसे अधिक नक्सल हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में 4000 से अधिक सैन्यबल तैनात करने जा रहा है। केंद्र सरकार की कोशिश है कि 31 मार्च 2026 तक इस क्षेत्र को पूरी तरह नक्सलवाद से मुक्त कर दिया जाए। इतनी बड़ी संख्या में सैन्यबलों की अज्ञात क्षेत्र में पहुँच का मतलब है कि अब इस उग्रवाद से अंतिम लड़ाई होने वाली है। मजबूत और कठोर कार्य योजना को अमल में लाने का ही नतीजा है कि इस साल सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में 2024 में 153 नक्सली मारे जा चुके हैं। षह का कहना है कि 2004.14 की तुलना में 2014 से 2024 के दौरान देश में नक्सली हिंसा की घटनाओं में 53 प्रतिशत की कमी आई है। 2004 से 2014 के बीच नक्सली हिंसा की 16,274 वारदातें दर्ज की गई थीं, जबकि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 10 सालों में इन घटनाओं की संख्या घटकर 7,696 रह गई। इसी अनुपात में देश में माओवादी हिंसा के कारण होने वाली मौतों की संख्या 2004 से 2014 में 6,568 थीं, जो पिछले दस साल में घटकर 1990 रह गई है और अब सरकार ने जो नया संकल्प लिया है, उससे तय है कि जल्द ही इस समस्या को निर्मूल कर दिया जाएगा। जिस तरह से नरेंद्र मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से आतंक और अलगाववाद खत्म करने की निर्णायक लड़ाई लड़ी थी, वैसी ही स्थिति अब छत्तीसगढ़ में अनुभव होने लगी है।  

    इसमें कोई दो राय नहीं कि छत्तीसगढ़ में नक्सली तंत्र कमजोर हुआ है; लेकिन उसकी शक्ति अभी शेष है। अब तक पुलिस व गुप्तचर एजेंसियाँ इनका सुराग लगाने में नाकाम होती रही थीं, लेकिन नक्सलियों पर शिकंजा कसने के बाद से इनको भी सूचनाएँ मिलने लगी हैं। इसी का नतीजा है कि सैन्यबल इन्हें निशाना बनाने में लगातार कामयाब हो रहे हैं। छत्तीसगढ़ के ज्यादातर नक्सली आदिवासी हैं। इनका कार्यक्षेत्र वह आदिवासी बहुल इलाके हैं, जिनमें ये खुद आकर नक्सली बने हैं। इसलिए इनका सुराग सुरक्षाबलों को लगा पाना मुश्किल होता है लेकिन ये इसी आदिवासी तंत्र से बने मुखबिरों से सूचनाएँ आसानी से हासिल कर लेते हैं। दुर्गम जंगली क्षेत्रों के मार्गों में छिपने के स्थलों और जल स्रोतों से भी ये खूब परिचित हैं;  इसलिए ये और इनकी शक्ति लंबे समय से यहीं के खाद-पानी से पोषित होती रही है। हालाँकि अब इनके हमलों में कमी आई है। दरअसल इन वनवासियों में अर्बन माओवादी नक्सलियों ने यह भ्रम फैला दिया था कि सरकार उनके जंगल, जमीन और जल-स्रोत उद्योगपतियों को सौंपकर उन्हें बेदखल करने में लगी है; इसलिए यह सिलसिला जब तक थमता नहीं है, विरोध की मुहिम जारी रहनी चाहिए। सरकारें इस समस्या के निदान के लिए बातचीत के लिए भी आगे आईं; लेकिन कामयाबी नहीं मिली। इन्हें बंदूक के जरिए भी काबू में लेने की कोशिशें हुई हैं; लेकिन नतीजे पूरी तरह अनुकूल नहीं रहे। एक उपाय यह भी हुआ कि जो नक्सली आदिवासी समर्पण कर मुख्यधारा में आ गए थे, उन्हें बंदूकें देकर नक्सलियों के विरुद्ध खड़ा करने की रणनीति भी अपनाई गई। इस उपाय में खून-खराबा तो बहुत हुआ; लेकिन समस्या बनी रही। गोया, आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने से लेकर विकास योजनाएँ भी इस क्षेत्र को नक्सल मुक्त करने में अब तक सफल नहीं हो पाई हैं।

       इस मुठभेड़ में मारे गए हिड़मा का बस्तर के इस जंगली क्षेत्र में बोलबाला रहा है। वह सरकार और सुरक्षाबलों को लगातार चुनौती दे रहा था, जबकि राज्य एवं केंद्र सरकार के पास मोदी सरकार से पहले रणनीति और दृढ़ इच्छा शक्ति की हमेशा कमी रही थी। तथाकथित शहरी माओवादी बौद्धिकों के दबाव में भी मनमोहन सिंह सरकार रही। इस कारण भी इस समस्या का हल दूर की कौड़ी बना रहा। यही वजह थी कि नक्सली क्षेत्र में जब भी कोई विकास कार्य या चुनाव प्रक्रिया संपन्न होती थी, तो नक्सली उसमें रोड़ा अटका देते थे। अब हिड़मा के मारे जाने के बाद नक्सली समस्या का हल की गुंजाइश बढ़ गई है। 

  कांग्रेस की पूर्व केंद्र तथा छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार नक्सली समस्या से निपटने के लिए दावा कर करती रही हैं कि विकास इस समस्या का निदान है। यदि तत्कालीन छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार के विकास संबंधी विज्ञापनों में दिए जा रहे आँकड़ों पर भरोसा करें; तो छत्तीसगढ़ की तस्वीर विकास के मानदण्डों को छूती दिख रही है, लेकिन इस अनुपात में यह दावा बेमानी है कि समस्या पर अंकुश विकास की धारा से लग रहा है, क्योंकि इसी दौरान बड़ी संख्या में महिलाओं को नक्सली बनाए जाने के प्रमाण भी मिले थे। बावजूद कांग्रेस के इन्हीं नक्सली क्षेत्रों से ज्यादा विधायक जीतकर आते रहे थे। हालाँकि नक्सलियों ने कांग्रेस पर 2013 में बड़ा हमला बोलकर लगभग उसका सफाया कर दिया था। कांग्रेस नेता महेन्द्र कर्मा ने नक्सलियों के विरुद्ध सलवा जुडूम को 2005 में खड़ा किया था। सबसे पहले बीजापुर जिले के ही कुर्तु विकासखण्ड के आदिवासी ग्राम अंबेली के लोग नक्सलियों के खिलाफ खड़े होने लगे थे। नतीजतन नक्सलियों की महेंद्र कर्मा से दुश्मनी ठन गई थी। इस हमले में महेंद्र कर्मा के साथ पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और हरिप्रसाद समेत एक दर्जन नेता मारे गए थे ; लेकिन कांग्रेस ने 2018 के विधानसभा चुनाव में अपनी खोई शक्ति फिर से हासिल कर ली थी, बावजूद नक्सलियों पर पूरी तरह लगाम नहीं लग पाई थी। 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को अपदस्थ कर भाजपा फिर सत्ता में आई, उसके बाद से ही नक्सलियों के सफाए का सिलसिला चल रहा है।         

दरअसल, देश में अब तक तथाकथित शहरी बुद्धिजीवियों का एक तबका ऐसा भी रहा, जो माओवादी हिंसा को सही ठहराकर संवैधानिक लोकतंत्र को मुखर चुनौती देकर नक्सलियों का हिमायती बना हुआ था। यह न केवल उनको वैचारिक खुराक देकर उन्हें उकसाने का काम करता था; बल्कि उनके लिए धन और हथियार जुटाने के माध्यम भी खोला था। बावजूद इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जब ये राष्ट्रघाती बुद्धिजीवी पुख्ता सबूतों के आधार पर गिरफ्तार किए गए, तो बौद्धिकों और वकीलों के एक गुट ने देश के सर्वोच्च न्यायालय को भी प्रभाव में लेने की कोशिश की थी और गिरफ्तारियों को गलत ठहराया था। माओवादी किसी भी प्रकार की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पसंद नहीं करते हैं; इसलिए जो भी उनके खिलाफ जाता है, उसकी बोलती बंद कर दी जाती हैं; लेकिन अब इस चरमपंथ पर पूर्ण अंकुश लगने जा रहा है।

सम्पर्कः शब्दार्थ 49 ए श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म. प्र.