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Dec 14, 2013

ककनमठ

            
            ककनमठः

       खजुराहो के कंदारिया महादेव से भी विशाल

            - लोकेन्द्र सिंह राजपूत

मंदिर, मठ या अन्य पूजा स्थल महज धार्मिक महत्त्व के स्थल नहीं होते हैं। ये अपने समय के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक व्यवस्था के गवाह होते हैं। अपने में एक इतिहास समेटकर खड़े रहते हैं। उनको समझने वाले लोगों से वे संवाद भी करते हैं। ग्वालियर से करीब 70 किलोमीटर दूर मुरैना जिले के सिहोनिया गाँव में स्थित ककनमठ मंदिर इतिहास और वर्तमान के बीच ऐसी ही एक कड़ी है। मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में कछवाह (कच्छपघात) राजा कीर्तिराज ने कराया था। उनकी रानी का नाम था ककनावती। रानी ककनावती शिवभक्त थीं। उन्होंने राजा के समक्ष एक विशाल शिव मंदिर बनवाने की इच्छा जाहिर की। विशाल परिसर में शिव मंदिर का निर्माण किया गया। चूंकि शिव मंदिर को मठ भी कहा जाता है और रानी ककनावती के कहने पर इस मंदिर का निर्माण कराया गया था, इसलिए मंदिर का नाम ककनमठ रखा गया। वरिष्ठ पत्रकार एवं शिक्षाविद् श्री जयंत तोमर बताते हैं कि सिहोनिया कभी सिंह-पानी नगर था। बाद में अपभ्रंश होकर यह सिहोनिया हो गया। यह ग्वालियर अँचल का प्राचीन और समृद्ध नगर था। यह नगर कछवाह वंश के राजाओं की राजधानी था। इसकी उन्नति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ग्वालियर अंचल के संग्रहालयों में संरक्षित अवशेष सबसे अधिक सिहोनिया से प्राप्त किए गए हैं। श्री तोमर बताते हैं कि तोमर वंश के राजा महिपाल ने ग्वालियर किले पर सहस्रबाहु मंदिर का निर्माण कराया था। सहस्रबाहु मंदिर के परिसर में लगाए गए शिलालेख में अंकित है कि सिंह-पानी नगर (अब सिहोनिया) अद्भुत है।
ककनमठ मंदिर की स्थापत्य और वास्तुकला के सम्बन्ध में जीवाजी यूनिवर्सिटी के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. रामअवतार शर्मा बताते हैं कि यह मंदिर उत्तर भारतीय शैली में बना है। उत्तर भारतीय शैली को नागर शैली के नाम से भी जाना जाता है। 8वीं से 11वीं शताब्दी के दौरान मंदिरों का निर्माण नागर शैली में ही किया जाता रहा। ककनमठ मंदिर इस शैली का उत्कृष्ट नमूना है। मंदिर के परिसर में चारों और कई अवशेष रखे हैं। ज्यादातर अवशेष मुख्य मंदिर के ही हैं। इतने लम्बे समय के दौरान कई प्राकृतिक झंझावातों का सामना मंदिर ने किया। इनसे उसे काफी क्षति पहुँची।
मंदिर का शिखर काफी विशाल था लेकिन समय के साथ वह टूटता रहा। परिसर में अन्य छोटे-छोटे मंदिर समूह भी थे। ये भी समय के साथ नष्ट हो गए। पुरातत्वविद् श्री रामअवतार शर्मा बताते हैं कि खजुराहो में सबसे बड़ा मंदिर अनश्वर कंदारिया महादेव का है। ककनमठ मंदिर समूह इससे भी विशालतम मंदिर था। वर्तमान में परिसर की जो बाउंड्रीवॉल है, यह मंदिर का वास्तविक परिसर नहीं है। मंदिर का परिसर इससे भी काफी विशाल था। बाउंड्रीवॉल के बाहर भी मंदिर समूह के अवशेष मिले हैं। श्री शर्मा बताते हैं कि भूकंप आदि प्राकृतिक आपदाओं के दौरान शिखर की ओर से गिरने वाली विशाल चट्टानों के कारण मंदिर पर उकेरी गईं प्रतिमाओं को काफी नुकसान पहुँचा है।
ककनमठ मंदिर की दीवारों पर शिव-पार्वती, विष्णु और शिव के गणों की प्रतिमाएँ बनी हुई हैं। प्रतिमाएँ इतने करीने से पत्थर पर उकेरी गईं हैं कि सजीव प्रतीत होती हैं। हालांकि ज्यादातर प्रतिमाएँ खण्डित हैं। लेकिन, अपने कला वैभव को बखूबी बयाँ करती दिखाई देती हैं।
19 अक्टूबर 2013 को ग्वालियर से अपने दोस्तों के साथ इस ऐतिहासिक महत्त्व के मंदिर का अवलोकन करने का अवसर मिला। नईदुनिया के वरिष्ठ पत्रकार हरेकृष्ण दुबोलिया, गिरीश पाल और महेश यादव के साथ हम यहाँ पहुँचे थे। साथ में गिरीश पाल के पिताजी भी थे। पथ प्रदर्शक के रूप में उनका बड़ा अच्छा साथ हमें मिला। इसके अलावा रास्ते में वे ककनमठ मंदिर से जुड़ी किंवदंतियाँ हमें सुनाते रहे। मुरैना से उत्तर-पूर्व दिशा में करीब 30 किलोमीटर दूर सिहोनिया गाँव में ककनमठ मंदिर स्थित है। 11वीं शताब्दी में चूना-सीमेंट का इस्तेमाल किए बिना पत्थरों को एक के ऊपर एक रखकर बनाया गया यह विशाल मंदिर आज भी मजबूती के साथ खड़ा है। यह देखकर प्राचीन भारतीय स्थापत्य और वास्तुकला कला पर गर्व महसूस हुआ। मंदिर के शिखर की तरह अपना सिर भी आसमान की तरफ जरा-सा तन गया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने मंदिर को संरक्षित करने का प्रयास किया है। फिर भी लम्बे समय तक अनदेखी के कारण मंदिर को काफी नुकसान पहुँच चुका है। मुख्य मंदिर एक विशाल चबूतरे पर बना है। मण्डप पत्थर के बड़े पिलरों पर खड़ा है। मंदिर में शिवलिंग स्थापित है। मंदिर को कोई नुकसान नहीं पहुँचाए, इसके लिए एएसआई की ओर से दो कर्मचारियों की नियुक्ति यहाँ की गई है। केयर टेकर सुरेश शर्मा बताते हैं कि मंदिर की भव्यता और इसके स्थापत्य को निहारने के लिए कई विदेशी पर्यटक भी यहाँ आते रहते हैं। हालांकि यह संख्या अभी बहुत ज्यादा नहीं है।
ग्वालियर और मुरैना से यहाँ तक पहुँच मार्ग करीब-करीब ठीक है। बीच में कुछ जगह सड़क खराब है। ककनमठ मंदिर को पर्यटन के नक्शे पर जो स्थान मिलना चाहिए, अभी वैसा नहीं है। मध्यप्रदेश सरकार इस दिशा में कुछ पहल कर सकती है। आगरा से ग्वालियर किला घूमने आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों को ककनमठ मंदिर आने के लिए भी आकर्षित किया जा सकता है। पास में ही मितावली, पड़ावली, नूराबाद, बटेश्वर और शनिचरा जैसे महत्वपूर्ण स्थल हैं। ऐतिहासिक रूप से समृद्ध होने के कारण अंचल में पर्यटकों को बुलाना बहुत मुश्किल काम नहीं है। बस इस दिशा में एक ठोस प्रयास की जरूरत है। निश्चित ही घुमक्कड़ स्वभाव के और पुराने सौंदर्य को देखकर आनंदित होने वाले लोग यहाँ आकर निराश नहीं होंगे। इसके साथ ही सिहोनिया में प्राचीन जैन मूर्तियाँ भी दर्शनीय हैं। सिहोनिया जैन सम्प्रदाय के लिए ऐतिहासिक और पवित्र स्थलों में से एक है। यहाँ 11वीं शताब्दी के कई जैन मंदिरों और मूर्तियों के अवशेष देखे जा सकते हैं। इन मंदिरों में शांतिनाथ, आदिनाथ और पाश्र्वनाथ सहित अन्य तीर्थंकरों की विशाल और प्राचीन प्रतिमाएँ देखी जा सकती हैं।

सम्पर्क: गली नम्बर-1,किरार कॉलोनी,एसएएफ रोड,
कम्पू,लश्कर,ग्वालियर(मप्र)474001, मो.09893072930 
Email-lokendra777@gmail.com

Aug 25, 2012

संस्कृत दिवस

भारतीय मानस में रची- बसी संस्कृत

-  लोकेन्द्र सिंह राजपूत

श्रावण मास की पूर्णिमा को 1969 से संस्कृत दिवस की शुरुआत हुई। संस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति की परिचायक है। सभी भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत संस्कृति का समानार्थी शब्द कहा जा सकता है। इसी भाषा में भारतीय संस्कृति के सभी नियम, जन्म से लेकर मृत्यु तक सारे संस्कार और जीवन को गति प्रदान करने वाले संदेश मिलते हैं। अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए इस भाषा को सहेजना भी जरूरी है, इसीलिए हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने के बाद हिंदी दिवस मनाने की प्रथा शुरु होते ही संस्कृत दिवस की मांग की जाने लगी। काफी समय पश्चात श्रावण मास की पूर्णिमा को संस्कृत दिवस घोषित किया गया।

भारत में उसकी मूल और सबसे पुरानी भाषा संस्कृत तुच्छ राजनीति की भेंट चढ़ गई। भाषाई राजनीति के घटिया खेल ने उसे अभिजात्य वर्ग की भाषा करार देकर सामान्य वर्ग को उससे दूर कर दिया। अंग्रेजी की महिमा गाकर संस्कृत की उपयोगिता पर सवाल खड़े कर दिए। सरल, सरस और समृद्ध संस्कृत को कठिन भाषा बताकर उसके अध्ययन को कर्मकाण्डी ब्राह्मणों तक सीमित कर दिया। सुनियोजित षड्यंत्र के तहत संस्कृत को स्कूली अध्ययन से बाहर कर दिया। लेकिन सूरज पर कितना भी मैला फेंका जाए वह गंदला नहीं होता। एक ओर जब संस्कृत के खिलाफ षड्यंत्र रचे जा रहे हैं दूसरी ओर उसे लोकप्रिय बनाने के लिए 'संस्कृत भारती' जी- जान से जुटी है। संस्था के प्रयासों से भारत की संस्कृति की आधार भाषा संस्कृत की चमक देश की भौगोलिक सीमाओं से भी बाहर पहुंच गई।
शिक्षा के व्यवसायीकरण के बाद से भारत में जहां अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ रहा है, वहीं विदेश में संस्कृत का झंडा बुलंद हो रहा है। देश- विदेश में समय- समय पर हुए तमाम शोधों ने भी स्पष्ट किया कि संस्कृत वैज्ञानिक सम्मत भाषा है। रिसर्च के बाद सिद्ध हुआ है कि कम्प्यूटर के लिए सबसे उपयुक्त भाषा भी संस्कृत ही है। विश्व की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्था नासा भी लंबे समय से संस्कृत को लेकर रिसर्च कर रही है। दुनिया के कई देशों में संस्कृत का अध्ययन कराया जा रहा है।
इसके अलावा कई विदेशी संस्कृत सीखने के लिए भारत का रुख कर रहे हैं। इन्हीं में से एक हैं पोलैंड की अन्ना रुचींस्की, जिनका पूरा परिवार ही अब संस्कृतमय हो गया है। रुचींस्की के परिवार में आपस में बातचीत भी संस्कृत में की जाती है। संस्कृत में रुचींस्की की रुचि 20 साल पहले जगी थी। अन्ना रुचींस्की अपने पति तामष रुचींस्की के साथ घूमने के लिए भारत आईं थीं। वे बनारस के घाट पहुंचीं। यहां गूंज रहे वेदमंत्रों से प्रभावित होकर वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय पहुंचीं। विश्वविद्यालय में रुचींस्की ने संस्कृत भाषा और भारत की संस्कृति को पहली बार करीब से जाना। अंतत: देवभाषा से प्रेरित होकर अन्ना ने संस्कृत विश्वविद्यालय से डॉ. पुरुषोत्तम प्रसाद पाठक के निर्देशन में वर्ष 2006 में पीएच-डी किया। इसके पूर्व वे पोलैंड में भारतीय विज्ञान से एमए कर चुकी थीं।
इसी बीच उनके सबसे छोटे पुत्र स्कर्बीमीर रुचींस्की (योगानंद शास्त्री) के मन में भी संस्कृत के प्रति अलख जगी और वह वाराणसी आ गए। उन्होंने संस्कृत विश्वविद्यालय से विदेशी छात्रों के लिए चलाए जा रहे संस्कृत के प्रमाणपत्रीय पाठ्यक्रम में वर्ष 1999 में दाखिला लिया और द्वितीय श्रेणी से उत्तीर्ण हुए। 2004 में शास्त्री (स्नातक) और 2006 में आचार्य (स्नातकोत्तर) की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद योगानंद ने वर्ष 2010 में योगतंत्रागम विभाग में उपाचार्य डॉ. शीतला प्रसाद उपाध्याय के निर्देशन में 'मंत्रदेव प्रकाशिका तंत्र ग्रंथस्य समालोचनात्मक' विषय पर पीएच-डी के लिए पंजीयन कराया। उनकी शोध साधना अभी जारी है। उन्होंने बताया कि उनके पिता ने पोलैंड में ही भारतीय दर्शन पर पीएच-डी की है। ऐसे और भी कई उदाहरण हैं जो संस्कृत के प्रति विदेशियों के मन में जगे प्रेम को प्रकट करते हैं।
'संस्कृत भारती' ने संस्कृत को बोलचाल की भाषा बनाने का अभियान 25 साल पहले शुरू किया था। संस्था की ओर से देश- विदेश में संस्कृत सिखाने के लिए दस- दस दिन के शिविरों से लेकर कुछ सर्टीफिकेट कोर्स भी कराए जाते हैं। संस्था के प्रयासों की बदौलत देश में कई क्षेत्र संस्कृतमय हो गए हैं। कर्नाटक में 200 परिवारों का गांव मत्तूर वैदिक काल का गांव लगता है। यहां घरों की दीवारों पर संस्कृत में मंत्र लिखे हैं। सुबह- शाम मत्तूर मंत्रोच्चार से गूंजता है। यहां सब आपस में संस्कृत में ही बातचीत करते हैं। वर्तमान पीढ़ी से आगामी पीढ़ी की ओर संस्कृत ज्ञान की गंगा बहती रहे, इसकी व्यवस्था भी है। मत्तूर में गुरुकुल परंपरा का पालन भी किया जा रहा है। भारतीय विद्या भवन के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय पद्यश्री डॉ. मत्तूर कृष्णमूर्ति का संबंध इसी गांव से है। मत्तूर का लगभग हर व्यक्ति संस्कृत का प्रकांड विद्वान है। इतना ही नहीं इनकी ख्याति दूर- दूर तक फैली है। इनमें से कई विद्वान तो हिन्दू संस्कृति के प्रचार- प्रसार में भी लगे हुए हैं।
मध्यप्रदेश में झिरी गांव भी मत्तूर की तरह संस्कृतनिष्ठ गांव है। संस्कृत भारती के अथक प्रयासों से यहां भी बच्चों से लेकर बड़े- बूढ़े संस्कृत की अच्छी समझ रखते हैं। यहां आप पहुंचेंगे तो संस्कृत अभिवादन से ही आपका स्वागत होगा। खास बात यह है कि यहां इससे पहले संस्कृत का कोई माहौल नहीं था। यहां पहुंचने पर प्रतीत होता है कि यह कोई रामायण काल का गांव है। संभवत: ये लोग दुनिया की नजर से बचे रह गए होंगे। लेकिन, यह सच नहीं। सब आधुनिक सुविधाओं के बीच भी गांव में संस्कृत का प्रचलन है। उन्हें अपनी भाषा पर गर्व है।
संस्कृत विश्व की ज्ञात भाषाओं में सबसे पुरानी भाषा है। लैटिन और ग्रीक सहित अन्य भाषाओं की तरह समय के साथ इसकी मृत्यु नहीं हुई। कारण भारत का वैभव तो संस्कृत में ही रचा बसा है। भारत की अन्य भाषाओं हिन्दी, तेलगू, मराठी, सिन्धी, पंजाबी, बंगला, उडिय़ा आदि का जन्म संस्कृत की कोख से ही हुआ है। हिन्दू धर्म के लगभग सभी ग्रंथ संस्कृत में ही लिखे गए हैं। बौद्ध व जैन संप्रदाय के प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत में ही हैं। हिन्दुओं, बौद्धों और जैनियों के नाम भी संस्कृत भाषा पर आधारित होते हैं। अब तो संस्कृत नाम रखने का फैशन भी चल पड़ा है। प्राचीनकाल से अब तक भारत में यज्ञ और देव पूजा संस्कृत भाषा में ही होते हैं। यही कारण रहा कि तमाम षड्यंत्रों के बाद भी संस्कृत को भारत से दूर नहीं किया जा सका। यह दैनिक जीवन में नित्य उपयोग होती रही, भले ही कुछ समय के लिए पूजा- पाठ तक सिमटकर रह गई थी। लेकिन, समय के साथ अब फिर इसकी स्वीकार्यता बढ़ रही है।
आज भी पूरे भारत में संस्कृत के अध्ययन- अध्यापन से भारतीय एकता को सुदृढ़ किया जा सकता है। इसके लिए क्षेत्रीयता और वोट बैंक की कुटिल राजनीति छोड़कर आगे आना होगा। सार्थक प्रयासों से संस्कृत को फिर से जन- जन की भाषा बनाया जा सकता है।
संपर्क-  गली नंबर-1 किरार कालोनी, एस.ए.एफ. रोड, 
कम्पू, लश्कर, ग्वालियर (म.प्र.) 474001 मो. 9893072930
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May 30, 2012

क्या यही है सुन्दरता का अर्थ

- लोकेन्द्र सिंह राजपूत
भारत में स्त्री को सौंदर्य की प्रतिमा माना गया। उसे 'देवी' कहकर संबोधित किया गया। सुंदरी पुकारा गया। रूपमति कहा गया। हिरण जैसी खूबसूरत आंखों वाली स्त्री को कवि ने मृगनयनी कहा। उसकी दैहिक नाजुकता और कोमलता का निरुपण फूलों से तुलना कर किया गया। पद्मिनी कहा गया।  मनीषियों ने उसे दिव्य प्रकाश के समकक्ष रखकर उज्जवला कहा।
स्त्री सृष्टि की अद्वितीय कृति है। वह सौंदर्य का पर्याय है। मेरा सदैव मत रहता है- दुनिया में कोई भी स्त्री असुंदर नहीं। अंतर मात्र इतना है कि कोई कम सुंदर है और कोई अधिक सुंदर। भारतीय संस्कृति में स्त्री के चित्र सदैव सुरूप दिखाए गए। उसे नग्न करने की जब- जब कोशिश हुई, समाज ने तीव्र विरोध जताया। तथाकथित महान चित्रकार एमएफ हुसैन 'स्त्री को नग्न' दिखाने की मानसिकता के चलते ही देश छोडऩे पर मजबूर हुए। वे अपनी गलती स्वीकार कर बदलने को तैयार नहीं थे और देश उन्हें झेलने को तैयार नहीं था। भारत में स्त्री को सौंदर्य की प्रतिमा माना गया। उसे 'देवी' कहकर संबोधित किया गया। सुंदरी पुकारा गया। रूपमति कहा गया। हिरण जैसी खूबसूरत आंखों वाली स्त्री को कवि ने मृगनयनी कहा। उसकी दैहिक नाजुकता और कोमलता का निरुपण फूलों से तुलना कर किया गया। पद्मिनी कहा गया। मनीषियों ने उसे दिव्य प्रकाश के समकक्ष रखकर उज्जवला कहा। अच्छी देह की स्वामिनी स्त्री का सुघड़ा कहा। सब उत्तम कोटि के शब्द हैं। कोई शब्द ओछा नहीं, जो स्त्री के सम्मान में गुस्ताखी की जुर्रत कर सके। कोई भी शब्द उसके शरीर को नहीं उघाड़ता। एक भी शब्द स्त्री को यौन प्रतीक नहीं बनाता। भारत में सुन्दरता के संदर्भ में कभी भी स्त्री को 'सेक्सी' कहकर संबोधित नहीं किया गया। 'सेक्सी' शब्द का यौनिक अभिव्यक्ति के लिए जरूर उपयोग किया जाता रहा है। अंग्रेजी शब्दकोश में भी 'सेक्सी' का अर्थ काम भावना से संबंधित लिखा है। वहीं सुन्दरता के लिए तमाम शब्द है- लवली, ब्यूटीफुल, प्रिटी, स्वीट, डिवाइन, फेयरी, ग्रेसफुल, फाइन इत्यादि। सुन्दर का पर्याय सेक्सी नहीं है। वहीं हिन्दी के शब्दकोश में भी सुन्दर के लिए कई मनोहारी शब्द हैं- शोभन, अच्छा, भला, खूबसूरत, प्यारा, दिव्य, उत्कृष्ट, मधुर इत्यादि। सुन्दर का मतलब सेक्सी कहीं नहीं मिला।
स्त्री को भोग वस्तु मानने वालों को, स्त्री को वासना की दृष्टि से देखने वालों को और उससे अशोभनीय भाषा में बात करने वालों को भारतीय समाज लंपट कहता है। भारत में स्त्री के लिए सेक्सी शब्द सुन्दरता का पर्याय नहीं। लेकिन, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा ने लड़कियों को सलाह दी है कि वे लड़कों के द्वारा बोले जाने वाले सेक्सी शब्द को नकारात्मक ढंग से न लें और बुरा न मानें। इतका मतलब सुन्दरता होता है। मोहतरमा ने यह बात महिला सशक्तिकरण और महिलाओं के सुनहरे भविष्य को लेकर आयोजित सेमिनार में कही। सुन्दरता की इस परिभाषा पर बिना देर किए हंगामा बरपा। पुरुषवादी और महिलावादी संगठनों ने महिला आयोग की अध्यक्ष के बयान का तीव्र विरोध जताया। भौंह तानी। तमाम स्वतंत्र विचारकों, समाजसेवियों और संगठनों ने महिला आयोग की अध्यक्ष के इस बयान को 'स्त्रियों से छेड़छाड़Ó को बढ़ावा देने वाला माना। आंशिकतौर पर यह सच भी है। मनचले, सड़कछाप मजनू और आवारगी करते लड़के 'हे, सेक्सी' कहकर लड़कियों को सरेराह छेड़ेंगे। लड़की आंख तरेरेगी तो कह भी सकेंगे- तुम्हारे अधिकारों के संरक्षण के लिए बैठी महिला ने कहा है कि सेक्सी का मतलब सुन्दरता है। तुम कोई और अर्थ न लगाओ।
एक सवाल मेरी तरफ से महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा से है- वे लड़कों की मनोवृत्ति को कितना समझती हैं, जो वे इस निष्कर्ष पर पहुंच गईं कि लड़के किसी लड़की की सुन्दरता की तारीफ में 'सेक्सी' बोलते हैं? भारत में 99 फीसदी लड़के या पुरुष सुन्दरता की तारीफ में लड़की को सेक्सी नहीं कहते। बेहद खूबसूरत लड़कियों को वे अप्सरा या परी बुलाते हैं। किसी लड़की को सेक्सी कहकर संबोधित करने के पीछे उनकी लंपटता और कामुकता होती है। शरारती मंशा होती है। सेक्सी यौनांग से जुड़ा शब्द है। इसलिए सेक्सी यौन अभिव्यक्ति ही है। यौनांग से जुड़े शब्दों से भारत में कभी भी स्त्री को सम्मान नहीं दिया गया बल्कि उसे अपमानित जरूर किया गया है। यही कारण है कि भारत में आम स्त्री सार्वजनिक स्थल पर सेक्सी संबोधन को अपमान, गाली और छेड़छाड़ के रूप में ही लेती है। मैंने कुछेक स्त्रियों और पुरुषों से इस संबंध में बातचीत की। स्त्रियों से पूछा- बेटा आपको सेक्सी कहकर बुलाएगा तो क्या करोगी? उनका सीधा-सपाट जवाब था- ऐसे संस्कार हमने अपने बच्चों को नहीं दिए हैं। यदि बाहर से इस तरह की बातें वे सीखकर आएंगे तो उन्हें सीख दी जाएगी। वहीं, पुरुषों से मैंने पूछा - क्या तुम अपनी बेटी को कह सकते हो कि बेटी आज तू बहुत सेक्सी लग रही है? यहां भी वही जवाब मिलें। यह हमारी संस्कृति नहीं। सच है, हमारे यहां सुन्दरता के मायने सेक्सी लगना नहीं है। सुन्दरता को बहुत ऊंचा स्थान हमने दिया है। हालांकि एकाध फीसदी ऐसे लागों की जमात भारत में जमा हो चुकी है। जहां मां अपने बेटे से 'सेक्सी मॉम' सुनकर फूलकर कुप्पा हो जाए और बाप बेधड़क अपनी बेटी को सेक्सी कह दे। संभवत: महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा ऐसी ही किसी जमात से आती हैं। लेकिन, उन्हें समझना होगा- भारत अभी उतना विकृत नहीं हुआ है। बाजारवाद के तमाम षड्यंत्रों के बाद भी भारत में आज भी स्त्री महज सेक्स सिंबल नहीं है। भारत में अब भी स्त्री त्याग का प्रतीक है, शक्ति का पुंज है, पवित्रता की मूरत है।
संपर्क- गली नंबर-1 किरार कालोनी, एस.ए.एफ. रोड,कम्पू, लश्कर, ग्वालियर (म.प्र.) 474001 मो. 9893072930 Email- lokendra777@gmail.com

Dec 28, 2011

ऑनलाइन जुबान पर ताला

- लोकेन्द्र सिंह राजपूत

आईटी एक्ट में कुछ ऐसे नियम जोड़ दिए हैं, जिनके बाद देश में इलेक्ट्रोनिक, मोबाइल और इंटरनेट समेत संचार साधनों पर सरकारी निगरानी हद से ज्यादा बढ़ गई है। यानी सरकार ने तो इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले करीब 10 करोड़ हिन्दुस्तानियों की ऑनलाइन जुबान पर पहले ही ताला लगाने की व्यवस्था कर ली थी।
केन्द्रीय संचार एवं सूचना मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि सरकार इंटरनेट और सोशल वेबसाइट्स पर प्रकाशित होने वाली आपत्तिजनक सामग्री को नियंत्रित करने के लिए जरूरी दिशा- निर्देश तैयार करेगी। मंत्री महोदय या तो चालकी से झूठ बोल गए या फिर बोलने की आजादी पर लगाम लगाने की उनकी मंशा अभी पूरी नहीं हो सकी है। वे हिन्दुस्तानियों को पूरी तरह गूंगा करना चाहते हैं। दरअसल, 11 अप्रैल 2011 को भारत सरकार के सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने गुपचुप तरीके से सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधित) कानून- 2008 में कांग्रेस की मंशानुरूप फेरबदल कर दिए हैं। विभाग ने आईटी एक्ट में कुछ ऐसे नियम जोड़ दिए हैं, जिनके बाद देश में इलेक्ट्रोनिक, मोबाइल और इंटरनेट समेत संचार साधनों पर सरकारी निगरानी हद से ज्यादा बढ़ गई है। यानी सरकार ने तो इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले करीब 10 करोड़ हिन्दुस्तानियों की ऑनलाइन जुबान पर पहले ही ताला लगाने की व्यवस्था कर ली थी। सिब्बल साहब अब बता रहे हैं या कह सकते हैं वे ऑनलाइन अभिव्यक्ति की आजादी पर और मजबूत ताला लगाना चाहते हैं क्योंकि गूगल, फेसबुक और अन्य वेबसाइट्स ने सरकार के आदेश को पूरी तरह मामने से इनकार कर दिया है। वेबसाइट्स ने कहा कि सिर्फ विवादित होने पर वे किसी भी सामग्री को नहीं हटाएंगे। हालांकि आईटी एक्ट (संशोधित)-2008 के नए नियम 43-ए और 79 के मुताबिक सरकार किसी भी कंपनी के पास एकत्रित किसी भी व्यक्ति का डाटा हासिल कर सकती है। इसके लिए उसे किसी से इजाजत लेने की जरूरत नहीं होगी। साथ ही सरकार कथित आपत्तिजनक सामग्री प्रसारित करने पर किसी भी वेबसाइट, होस्ट वेबसाइट, सर्च इंजन और सोशल साइट को ब्लॉक कर सकती है। यह दीगर बात है कि अब तक गूगल और अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट ने सरकार के निर्देशों का सौ फीसदी पालन नहीं किया।
अब तक आप अपने ब्लॉग, फेसबुक पेज, वेबसाइट या अन्य सोशल साइट पर तर्कों और सबूतों के आधार पर सरकार की नीतियों की आलोचना कर सकते थे। सरकार के खिलाफ आंदोलन को समर्थन दे सकते थे। भ्रष्ट मंत्रियों या अफसरों के खिलाफ लिख सकते थे। मंत्रियों- नेताओं के भड़काऊ बयानों के खिलाफ प्रतिक्रिया जाहिर कर सकते थे। लेकिन, अब यह उतना आसान नहीं रहेगा। खासकर 'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण अधिनियम-2011Ó तैयार करने वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद और कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और इस्लाम की गलत नीतियों का विरोध नहीं किया जा सकता। मंत्री कपिल सिब्बल ने सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और पैगंबर के खिलाफ इंटरनेट परप्रसारित सामग्री को ही आपत्तिजनक माना है। इसीलिए सरकार ने गूगल, फेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट और याहू के अधिकारियों से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पैगंबर से जुड़ी कथित अपमानजनक सामग्री को हटाने को कहा था। बाकि किसी के बारे में कोई कुछ भी लिखे- छापे वह आपत्तिजनक नहीं। कांग्रेस के नेता- कार्यकर्ता हिन्दुत्व को गरियाएं, आतंकवादियों को 'आप' और 'जी' लगाकर संबोधित करें। मैडम सोनिया गांधी गुजरात के मुख्यमंत्री को 'मौत का सौदागर' कहे। कथित कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना आतंकवादी संगठन सिमीÓ से करें। नई-नई राजनीति सीखे कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी समाजसेवी अन्ना हजारे के चरित्र पर कीचड़ उछाले। यह सब आपत्तिजनक नहीं है। मंत्री महोदय ने हिन्दुओं के खिलाफ प्रसारित सामग्री और हिन्दुओं के देवी- देवताओं के अभद्र चित्रों को भी आपत्तिजनक सामग्री नहीं माना है। ठीक वही मामला है मकबूल फिदा हुसैन हिन्दू देवताओं के नग्न चित्र बनाए तो यह अभिव्यक्ति की आजादी है। कलाकार की मौलिकता है। वहीं पैगंबर का कार्टून बनाने पर भी बावेला मचा दिया जाता है। रामायण के पात्रों के बारे में ऊल- जलूल विश्वविद्यालय में पढ़ाने पर भी कोई हल्ला नहीं। हल्ला मचाया भी जाता है इस तरह के विवादित पाठ को कोर्स से हटाने पर। कांग्रेस को चाहिए पहले अपने आंगन की सफाई करें फिर आवाम से बात करे। इस देश की जनता ने कांग्रेस को सत्ता की चाबी इसलिए नहीं दी कि उसकी मर्जी जो आए करे। लेकिन, सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने यही किया। इससे जनता में आक्रोश है। उसकी नीतियों को लेकर, उसके नेताओं के आचरण को लेकर और यह आक्रोश बाहर निकलता है इंटरनेट और सोशल वेबसाइट पर। वेब मीडिया एक ऐसा साधन है जो जनता को अपनी बात कहने की पूरी आजादी देता है। इतना ही नहीं यहां से उसकी आवाज दूर तक भी जाती है। माहौल भी बनता है। यह हम बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान देख चुके हैं। दरअसल, देखा जाए तो कांग्रेस और उसके नेताओं के खिलाफ ही इंटरनेट और सोशल साइट पर लिखा जा रहा है। संभवत: कांग्रेस इसी बात से डरी हुई है। इसलिए वह संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी को लगातार कुचलने के प्रयास करती दिखती है। कांग्रेसनीत यूपीए सरकार का बस चले तो वह पैदा होते ही हिन्दुस्तानियों के हलक में हाथ डालकर उनकी जुबान खींच ले।
आईटी एक्ट (संशोधित)-2008 के नए नियमों के मुताबिक अगर इंटरनेट पर किसी टिप्पणी, लेख या खबर पर सरकार को आपत्ति है तो उसे 36 घंटे के भीतर हटाना होगा। अन्यथा सरकार बिना नोटिस दिए संबंधित वेबसाइट के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है। इंटरनेट पर प्रसारित जनभावनाओं से डरी कांग्रेसनीत यूपीए सरकार अभी तक 11 वेबसाइट को बिना कारण बताए ब्लॉक करवा चुकी है। आईटी एक्ट में संशोधन से पहले जनवरी 2010 से दिसंबर 2010 तक विभिन्न वेबसाइट्स को हटाने के लिए सरकार ने गूगल को 30 आवेदन भेजे, इनमें से 53 फीसदी साइट्स बंद कर दी गईं या उनसे कथित आपत्तिजनक सामग्री हटा दी गई। वहीं साल 2009 में गूगल को सरकार ने 142 आवेदन भेजे इनमें से 78 फीसदी वेबसाइट्स को ब्लॉक कर दिया गया या कथित आपत्तिजनक सामग्री हटा दी गई।
फासीवादी नक्शे कदम पर कांग्रेस: कांग्रेस के इस कदम से लोगों में काफी रोष है। कई राजनीतिक विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं कि कांग्रेसनीत यूपीए सरकार की नीतियों को देखकर तो यही लगता है कि यह फासीवादी, तालीबानी और साम्यवादी नक्शेकदम पर चल रही है। मंत्री महोदय हमारा देश चीन, म्यांमार, थाइलैंड, पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान, उज्बेकिस्तान, वियतनाम और सउदी अरब नहीं है। भारत में लोकतंत्र है यहां सबको अपनी बात कहने की आजादी है। यह अधिकार उन्हें संविधान ने दिया है। कृपाकर उसे छीनने का प्रयास न कीजिए।

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Oct 29, 2011

क्या यही है जादुई छड़ी?

- लोकेन्द्र सिंह राजपूत
यह रिपोर्ट जादुई है। जिसने भारत से कागजों में गरीबी दूर करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है। योजना आयोग के अध्यक्ष और भारत के प्रधानमंत्री की जादुई छड़ी शायद यही रिपोर्ट है जिसे वो इतने दिन से ढूंढ़ रहे थे।
योजना आयोग ने भारतीय गरीबी का जिस तरह मजाक बनाया है। उस पर हो-हल्ला होना लाजमी है। योजना आयोग की ओर से गढ़ी गई गरीबी की नई परिभाषा से भला कौन, क्यों और कैसे सहमत हो सकता है। 20 सितंबर 2011 मंगलवार को आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में कहा है कि खानपान पर शहरों में 965 रुपए और गांवों में 781 रुपए प्रति माह खर्च करने वाले व्यक्ति को गरीब नहीं माना जा सकता। यानी शहर में 32 रुपए और गांव में 26 रुपए रोज खर्च करने वाले व्यक्ति बीपीएल (गरीबी रेखा के नीचे) के तहत मिलने वाली कल्याणकारी सुविधाओं का लाभ नहीं उठा सकता। गरीबी की इस परिभाषा के अनुसार तो निश्चित ही रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर दिखाई देने वाली भिखारियों की भीड़ भी अमीर हो गई। धन्य है योजना आयोग, जिसने कितने करोड़ भारतीयों की किस्मत छूमंतर कह कर बदल दी। अभिशप्त गरीबी झेलने को मजबूर करोड़ों लोगों को अमीर कर दिया। जय हो उनकी जिन्होंने इस रिपोर्ट के मार्फत एक ही झटके में भयानक महंगाई (डायन) के दौर में गरीबों के आंसू पौंछ दिए।
इस रिपोर्ट पर माननीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के हस्ताक्षर हैं। अर्थात उन्होंने इसका ठीक ढंग से अवलोकन किया होगा। वैसे भी देश से महंगाई और गरीबी दूर करने के लिए लम्बे समय से प्रधानमंत्रीजी एक जादू की छड़ी ढूंढ़ रहे थे। शायद यह रिपोर्ट उन्हें वही जादू की छड़ी लगी और उन्होंने इस पर तपाक से अपने हस्ताक्षर ठोंक दिए। ताकि अगली बार जनता से कह सकें देखो मेरे प्यारे देशवासियों मैंने जादू की छड़ी घुमाकर देश से काफी हद तक गरीबी दूर कर दी। गौरतलब है कि योजना आयोग का अध्यक्ष देश का प्रधानमंत्री होता है। योजना आयोग का उद्देश्य आर्थिक संवृद्धि, आर्थिक व सामाजिक असमानता को दूर करना, गरीबी का निवारण और रोजगार के अवसरों में वृद्धि के लिए काम करना और योजनाएं बनाना है। इसके लिए उपलब्ध आर्थिक संसाधनों का ही बेहतर उपयोग करना है। वैसे भारत में आर्थिक आयोजन संबंधी प्रस्ताव सर्वप्रथम सन् 1934 में 'विश्वेश्वरैयाÓ की पुस्तक 'प्लांड इकोनोमी फॉर इंडियाÓ में आया था। इसके बाद सन् 1938 में अखिल भारतीय कांग्रेस ने ऐसी ही मांग की थी। सन् 1944 में कुछ उद्योगपतियों द्वारा 'बंबई योजनाÓ के तहत ऐसे प्रयास किए गए। सरकारी स्तर पर स्वतंत्रता के बाद सन् 1947 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में आर्थिक नियोजन समिति गठित हुई। बाद में इसी समिति की सिफारिश पर 15 मार्च 1950 को योजना आयोग का गठन असंवैधानिक और परामर्शदात्री निकाय के रूप में किया गया। भारत के प्रधानमंत्री को इसका अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद योजना आयोग ने भारत के उक्त उद्देश्यों को ध्यान में रखकर कार्य करना शुरू किया था।
कांग्रेसनीत यूपीए सरकार ने अपने दोनों चुनाव (2004 और 2009) महंगाई को नियंत्रित करने और आम आदमी की दशा को सुधारने के नारे के साथ लड़े। जनता ने उसे इसी भरोसे दोनों बार संसद पहुंचाया। लेकिन, दोनों बार इस सरकार ने आम जनता के विश्वास को छला है। यूपीए के दूसरे कार्यकाल ने तो साफ- साफ बता ही दिया कि वह आम आदमी की कितनी हमदर्द है। लगातार पेट्रो उत्पाद के महंगे कर ने जनता की कमर तोड़कर कर रख दी। उसे इस पर भी चैन नहीं मिली कि वह फिर से पेट्रोल के दाम बढ़ाने की तैयारी करने लगी है। एलपीजी सिलेंडर से सब्सिडी खत्म कर उसे भी महंगा करने की जुगत सरकार के कारिंदे भिड़ा रहे हैं। इस सब में बेचारे आम आदमी का जीना मुश्किल है। इधर, योजना आयोग को भी पता नहीं क्या मजाक सूझी की उसने गरीबी की यह परिभाषा गढ़ दी। योजना आयोग के इस हलफनामे और तर्कों पर सब ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आ रही है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इसे तुरंत वापस लेने की मांग की है। वहीं सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त खाद्य आयुक्त ने इसे असंवेदनशील बताया है। उन्होंने कहा है कि यह पैमाना तो उन परिवारों के लिए सही है जो भुखमरी के कगार पर हैं, गरीबों के लिए नहीं।
योजना आयोग गरीबी पर नया क्राइटीरिया सुझाते हुए कहता है कि दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू, और चेन्नई जैसे महानगरों में चार सदस्यों वाला परिवार यदि महीने में 3860 रुपए खर्च करता है तो उसे गरीब नहीं कहा जा सकता। अब भला इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले साहब लोगों को कौन बताए कि इतने रुपए में इन महानगरों में सिर छुपाने को ठिकाना भी मुश्किल है। इतना ही नहीं आयोग कहता है कि 5.50 रुपए दाल पर, 1.02 रुपए चावल व रोटी पर, 2.33 रुपए दूध पर, 1.55 रुपए तेल पर, 1.95 पैसे साग-सब्जी पर, 44 पैसे फल पर, 70 पैसे चीनी पर, 78 पैसे नमक व मसालों पर, 3.75 पैसे ईंधन पर खर्च करें तो एक व्यक्ति स्वस्थ्य जीवनयापन कर सकता है। इतना ही नहीं योजना आयोग कहता है कि यदि आप 99 पैसा प्रतिदिन शिक्षा पर खर्च करते हैं तो आपको शिक्षा के संबंध में कतई गरीब नहीं माना जा सकता। ऐसे में तो गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों के लिए बनी तमाम कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने से लाखों- करोड़ों लोग वंचित हो जाएंगे। सरकार का भारी भरकम बजट जो इन योजनाओं पर खर्च हो रहा है जरूर बच जाएगा। लेकिन, गरीबी में जी रहे लोगों को जीने के लाले पड़ जाएंगे।
इन आंकड़ों के हिसाब से मुझे तो नहीं लगता कि देश में भुखमरी से पीडि़त को छोड़कर कोई गरीब मिलेगा। इस तरह देखें तो वाकई यह रिपोर्ट जादुई है। जिसने भारत से कागजों में गरीबी दूर करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है। योजना आयोग के अध्यक्ष और भारत के प्रधानमंत्री की जादुई छड़ी शायद यही रिपोर्ट है जिसे वो इतने दिन से ढूंढ़ रहे थे।
संपर्क- गली नंबर-1 किरार कालोनी, एस.ए.एफ. रोड, कम्पू, लश्कर,
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May 10, 2011

प्रकृति की गोद में बसा 'मिनी कश्मीर'

- लोकेन्द्र सिंह राजपूत
नरसिंहगढ़ मध्यप्रदेश का मिनी कश्मीर कहलाता है। इस उपमा ने मेरे मन में नरसिंहगढ़ के लिए खास आकर्षण बनाए रखा। 2006 में मैंने पहली बार नरसिंहगढ़ के सौंदर्य के बारे सुना था। तभी से वहां जाकर उसे करीब से देखने का लोभ मन में था। मेरी इच्छा इस वर्ष मार्च माह में पूरी हो सकी। जिस सुकून की आस में मैं नरसिंहगढ़ पहुंचा था, उसे उससे कहीं अधिक बढ़कर पाया। वैसे कहते हैं कि नरसिंहगढ़ बरसात के मौसम में अलौकिक रूप धर लेता है। यहां के पहाड़ हरी चुनरी ओढ़ लेते हैं। धरती तो फूली नहीं समाती है। नरसिंहगढ़ का अप्रतिम सौंदर्य देखकर बादलों से भी नहीं रहा जाता, वे भी उसे करीब से देखने के मोह में बहुत नीचे चले आते हैं। सावन में वह कैसा रूप धरता होगा, मैं इसकी सहज कल्पना कर सकता हूं। क्योंकि मार्च में भी वह अद्वितीय लग रहा था।
शाम के वक्त मैं और मेरे दो दोस्त किले पर थे। किले से कस्बे के बीच तालाब में स्थित मंदिर बहुत ही खूबसूरत लग रहा था। इस तालाब की वजह से निश्चित ही कभी नरसिंहगढ़ में भू-जलस्तर नीचे जाने की समस्या नहीं होती होगी। तालाब की खूबसूरती के लिए स्थानीय शासन- प्रशासन के प्रयास जारी हैं। एक बात का क्षोभ हुआ कि खूबसूरत किले को बचाने का प्रयास होता कहीं नहीं दिखा।
नरसिंहगढ़ का किला बेहद खूबसूरत है इस किले में आधुनिक स्नानागार भी है। फिलहाल बदहाली के दिन काट रहा यह किला एक समय निश्चित ही वैभवशाली रहा होगा। तब यह आकाश की ओर सीना ताने अकड़ में रहता होगा। संभवत: उसकी वर्तमान दुर्दशा के लिए स्थानीय लोग ही जिम्मेदार रहे होंगे। आज इस किले के खिड़की, दरवाजे , चौखट सब गायब हैं। लोग पत्थर निकाल ले गए हैं। पूरे परिसर में झाड़- झंखाड़ उग आए हैं। एक बात उल्लेखनीय है कि इस पर ध्यान न देने के कारण यह अपराधियों की शरणस्थली भी बन गई है।
नरसिंहगढ़ की एक खास बात यह भी है कि यहां अधिकांश स्थापत्य दो हैं। जैसे बड़े महादेव-छोटे महादेव, बड़ा ताल-छोटा ताल, बड़ी हनुमान गढ़ी-छोटी हनुमान गढ़ी आदि। नरसिंहगढ़ के समीप ही वन्यजीव अभयारण्य है। जिसे मोर के लिए स्वर्ग कहा जाता है। सर्दियों में प्रतिवर्ष नरसिंहगढ़ महोत्सव का आयोजन किया जाता है। यह भी आकर्षण का केन्द्र है।
नरसिंहगढ़ फिलहाल पर्यटन के मानचित्र पर धुंधला है। मेरा मानना है कि नरसिंहगढ़ को पर्यटन की दृष्टि से और अधिक विकसित किया जा सकता है। इसकी काफी संभावनाएं हैं। इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर तो बढ़ेंगे ही, साथ ही मध्यप्रदेश के कोष में भी बढ़ोतरी होगी। बरसात में नरसिंहगढ़ के हुस्न का दीदार करने की इच्छा प्रबल हो उठी है। कोशिश रहेगी कि इस बारिश के मौसम में मैं पुन: मिनी कश्मीर की वादियों का लुत्फ उठा सकूंगा।
पता: गली नंबर-1 किरार कालोनी, एस.ए.एफ. रोड, कम्पू, लश्कर, ग्वालियर (म.प्र.) 474001,
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Apr 10, 2011

नरसिंहगढ़ का फुन्सुक वांगडू 'हर्ष गुप्ता'


2009 में आमीर खान की एक फिल्म आई थी 3 इडिएट्स इस फिल्म में आमिर ने परंपरागत शिक्षा पद्धति और रटंत शिक्षा का विरोध करते हुए प्रायोगिक शिक्षा की वकालत की थी साथ ही यह संदेश भी दिया था कि अपने बच्चों को वही पढऩे की इजाजत दीजिए जो वे पढऩा चाहते हैं। उन पर जबरदस्ती डॉक्टर, इंजीनियर बनने के लिए जोर मत डालिए। 3 इडिएट्स फिल्म में फुन्सुक वांगडू बने आमिर कुछ ऐसा ही करके एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। नरसिंहगढ़ के 'हर्ष गुप्ता' ने भी लीक से हट कर अपनी पसंद का काम (खेती) करते हुए एक मुकाम हासिल किया है और मिसाल कायम की है।
- लोकेन्द्र सिंह राजपूत
खूबसूरत और व्यवस्थित खेती का उदाहरण है नरसिंहगढ़ के हर्ष गुप्ता का फार्म। वह खेती के लिए अत्याधुनिक, लेकिन कम लागत की तकनीक का उपयोग करता है। जैविक खाद इस्तेमाल करता है। इसे तैयार करने की व्यवस्था उसने अपने फार्म पर ही कर रखी है। किस पौधे को किस मौसम में लगाना है। पौधों के बीच कितना अंतर होना चाहिए। किस पेड़ से कम समय में अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। किस पौधे को कितना और किस पद्धति से पानी देना है। इस तरह की हर छोटी- बड़ी, लेकिन महत्वपूर्ण जानकारी उसके दिमाग में है। जब वह पौधों के पास खड़ा होकर सारी जानकारी देता है तो लगता है कि उसने जरूर एग्रीकल्चर में पढ़ाई की होगी, लेकिन नहीं। हर्ष गुप्ता इंदौर के एक प्राइवेट कॉलेज से फस्र्ट क्लास टैक्सटाइल इंजीनियर है। उसने इंजीनियरिंग जरूर की थी, लेकिन रुझान बिल्कुल भी न था।
सन 2004 में वह पढ़ाई खत्म करके घर वापस आया। उसने फावड़ा- तसले उठाए और पहुंच गया अपने खेतों पर। यह देख स्थानीय लोग उसका उपहास उड़ाने लगे। लो भैया अब इंजीनियर भी खेती करेंगे। नौकरी नहीं मिल रही इसलिए बैल हाकेंगे। लेकिन इन सब बातों से बेफिक्र हर्ष ने अपने खेतों को व्यवस्थित करना शुरू कर दिया। इसमें उसके पिता का भरपूर सहयोग मिला। पिता के सहयोग ने हर्ष के उत्साह को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। बेटे की लगन देख पिता का जोश भी जागा। खेतीबाड़ी से संबंधित जरूरी ज्ञान इंटरनेट, पुराने किसानों और कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से जुटाया। नतीजा थोड़ी- बहुत मुश्किलों के बाद सफलता उनके सामने आया।
उसके फार्म पर आंवला, आम, करौंदा, शहतूत, गुलाब सहित शीशम, सागौन, बांस और भी विभिन्न किस्म के पेड़- पौधे 21 बीघा जमीन पर लगे हैं। हर्ष की कड़ी मेहनत ने उन सबके सुर बदल दिए जो कभी उसका उपहास उड़ाते थे। उसके फार्म को जिले में जैव विविधता संवर्धन के लिए पुरस्कार भी मिल चुका है। इतना ही नहीं कृषि पर शोध और अध्ययन कर रहे विद्यार्थियों को फार्म से सीखने के लिए संबंधित संस्थान भेजते हैं।
हर्ष का कहना है कि मेहनत तो सभी किसान करते हैं, लेकिन कई छोटी- छोटी बातों का ध्यान न रखने से उनकी मेहनत बेकार चली जाती है। मेहनत व्यवस्थित और सही दिशा में हो तो सफलता सौ फीसदी तय है। मैं इंजीनियर की अपेक्षा किसान कहलाने में अधिक गर्व महसूस करता हूं। हर्ष कहते हैं कि खेती के जिस मॉडल को मैं समाज के सामने रखना चाहता हूं उस तक पहुंचने में कुछ वक्त लगेगा.......
हर्ष गुप्ता और उसके फार्म के बारे में बात करने का मेरा उद्देश्य सिर्फ इतना सा ही है कि कामयाबी के लिए जरूरी नहीं कि अच्छी पढ़ाई कर बड़ी कंपनी में मोटी तनख्वाह पर काम करना है। लगन हो तो कामयाबी तो अवश्य ही आपके कदम चूमेगी। यह कर दिखाया छोटे- से कस्बे नरसिंहगढ़ के फुन्सुक वांगडू यानी 'हर्ष गुप्ता' ने।
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