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Sep 1, 2023

उदंती. com, सितम्बर - 2023

वर्ष - 16, अंक - 2

 अनकहीः हिन्दी कब बनेगी हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा? - डॉ. रत्ना वर्मा

आलेखः बोलियों में निहित हिन्दी की शक्ति  - डॉ. सुरंगमा यादव

 दोहाः  निज भाषा उन्नति अहै... -भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

 हिन्दी दिवसः हिन्दी से जुड़ी कुछ मुख्य बातें

 आलेखः भारत का अभिन्न अंग है जम्मू- कश्मीर - प्रमोद भार्गव

 आलेखः विभिन्न भाषाओं के बीच सेतु है हिन्दी - डॉ. रमाकांत गुप्ता

 दो कविताएँः मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

 इतिहासः राजा भोज- कुछ अनछुए पहलू  - विजय जोशी

 स्मरणः आलोचना की अनूठी भंगिमा - डॉ.राजेन्द्र मिश्र - विनोद साव

 कविताः मरुस्थल सरीखी आँखों में  - अनीता सैनी ‘दीप्ति’

 व्यंग्यः ऐसी बानी बोलिए, जमकर झगड़ा होय  - बी. एल. आच्छा

 कहानीः मेरी बगिया  - निर्देश निधि

 लघुकथाः 1. मेट्रो लाइफ, 2. प्रॉमिस, 3. आईना  - अर्चना राय

 लेखकों की अजब गज़ब दुनियाः उम्रदराज वाले लेखक - सूरज प्रकाश

 किताबेंः प्रकृति के विविध रंगों में डूबी कविताएँ  - डॉ.  उपमा शर्मा

 प्रेरकः चाय के कप  - निशांत

. अनकहीः हिन्दी कब बनेगी हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा?

  - डॉ. रत्ना वर्मा
जब संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा का परिणाम आया, तो मीडिया में तहलका मच गया । परिणाम आने पर पास होने वालों की सूची तो प्रतिवर्ष प्रकाशित और प्रसारित होती है; पर इस बार मामला कुछ दूसरा ही था– कारण 45 उम्मीदवारों ने हिन्दी माध्यम से यह परीक्षा पास करके उस धारणा को तोड़ा है कि आईपीएस और आईएएस बनने के लिए अंग्रेजी भाषा का जानना आवश्यक है।  ज्ञात हो कि इस बार हिन्दी माध्यम के से जिन 45 विद्यार्थियों ने परीक्षा दी थी, उनमें से 29 उम्मीदवारों ने वैकल्पिक विषय के रूप में हिंदी साहित्य लेकर यह कामयाबी हासिल की है। 

यह खुशी की बात है कि अब कुछ धारणाएँ टूट रही हैं और लोग अपना देश अपनी भाषा के महत्त्व  को समझने लगे हैं; पर दु:खद पहलू यह भी है कि हम हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने को लेकर एकमत नहीं हो पाए हैं और यही वजह है कि दुनिया भर में आज भी हम अपनी बात अंग्रेजी में ही व्यक्त करते हैं। हिन्दी जानते हुए भी लोग हिन्दी में बोलने, पढ़ने या काम करने में हिचकते हैं, जबकि अन्य देशों के नागरिक अपनी मातृभाषा में बोलना गर्व की बात मानते हैं 

यही नहीं, ज्ञानवान् और बुद्धिमान् होने का मतलब भी अंग्रेजी जानने से लगाया जाता है, यानी जो अंग्रेजी बोल और लिख लेता है, वही पढ़ा- लिखा और काबिल माना जाता हैं। तभी तो विभिन्न परीक्षाएँ भी अंग्रेजी में ही ली जाती हैं और पढ़ने वाले बच्चे भी यही सोचते हैं कि यदि हमें अंग्रेजी नहीं आएगी, तो हम अच्छी नौकरी, ऊँचे पद पर नहीं पहुँच पाएँगे। दरअसल शिक्षा के क्षेत्र में हिन्दी को प्राथमिकता न दिए जाने के पीछे एक अहम कारण है- उच्च शिक्षा में हिन्दी की अच्छी पुस्तकों का अभाव। विज्ञान, चिकित्सा, कानून और अन्य तकनीकी शिक्षा में जितनी भी पाठ्यक्रम की किताबें हैं, सब अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध हैं।  इसका कारण है, हिन्दी को माध्यम न बनाना। हिन्दी अगर शिक्षण का माध्यम नहीं है, तो कोई लेखक हिन्दी में पुस्तक किसके लिए लिखेगा, प्रकाशक किसके लिए छापेगा? इसके लिए ज़रूरी है कि हिन्दी को भी शिक्षण और परीक्षा का माध्यम बनाया जाए। जिस दिन माध्यम बना देंगे, एक महीने से भी कम समय में पुस्तकें बाज़ार में आ जाएँगी।

इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे कि भारतीय संविधान में किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिला है। हिन्दी एक राजभाषा है, राज्य के कामकाज में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने को लेकर 1946 से 1949 तक संविधान को बनाने की तैयारियाँ शुरू कर दी गईं थीं। सबसे ज्यादा विवादित मुद्दा रहा कि संविधान को किस भाषा में लिखा जाना है, किस भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा देना है; परंतु सभा में दक्षिण के प्रतिनिधि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने को लेकर अपना विरोध प्रकट कर रहे थे। फलस्वरूप हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई, जबकि साल 1918 में महात्मा गांधी ने एक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दौरान हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात कही थी। 

 

मुश्किल आज भी वही है सर्वधर्म समभाव वाले भारत देश में पूर्व से लेकर पश्चिम तक, उत्तर से लेकर दक्षिण तक अनेक बोलियाँ और अनेक भाषाएँ बोलने वाले लोग हैं और सबको अपनी बोली अपनी भाषा से प्यार है; परंतु देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए किसी एक भाषा पर तो सहमति बनानी होगी ना? आखिर कब तक हम दूसरी भाषा की बैसाखी के सहाने अपनी बात दुनिया के सामने रखते रहेंगे। 

केन्द्रीय मंत्री अमित शाह ने गत वर्ष हिन्दी दिवस के अवसर पर जब अपनी मातृभाषा के अलावा दूसरी भाषा के तौर पर हिन्दी सीखने की बात कही थी, तब फिर से एक बार देशभर में हिन्दी को लेकर बहस छिड़ गई थी। तब अमित शाह ने अपने बयान पर सफाई पेश करते हुए कहा था कि उन्होंने हिन्दी को क्षेत्रीय भाषाओं पर थोपने की बात कभी भी नहीं कही, उन्होंने अपनी मातृभाषा के अलावा दूसरी भाषा के तौर पर हिन्दी सीखने की बात कही थी, और वे खुद एक गैर हिन्दी भाषी राज्य गुजरात से आते हैं; पर मुद्दा उठाने वाले और विरोध करने वाले रुकते कहाँ है। किसी को भी अपनी बोली अपनी भाषा को त्यागने नहीं कहा जा रहा, बस दुनिया में अपना परचम अपने देश की भाषा में लहराया जाए, तो बात ही कुछ और होती है। जिस प्रकार जब देश की सुरक्षा की बात आती है, तो पूरा देश एकजुट होकर आगे आता है, तब न राजनैतिक भेदभाव दिखाई देता, न धर्म और न जात-पाँत। यही भाव हमें हिन्दी को लेकर दिखाना होगा; क्योंकि यह मामला भी देशभक्ति और देशप्रेम से ही जुड़ा हुआ है। पूरा देश एक स्वर में जब बोलेगा, तो उसकी आवाज दूर तक सुनाई देगी। इस बात को देश के कर्णधारों को समझना होगा। 

हमारे देश में हिन्दी दिवस एक बार नहीं बल्कि साल में दो बार मनाया जाता है। 14 सितंबर 1949 में देवनागरी लिपि में हिन्दी को भारत की आधिकारिक भाषा घोषित किया गया था।  इसके बाद 1953 से हर साल देशभर में 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाया जाने लगा।  इसके अलावा एक अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में  हिन्दी का प्रचार प्रसार पुरी दुनिया में हो, इसके लिए 10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस भी मनाया जाता है । यह तो सभी जानते हैं कि हिन्दी देश की पहली और विश्व की तीसरी ऐसी भाषा है, जो सबसे अधिक ज्यादा बोली जाती है। भारत में 70 प्रतिशत से भी ज्यादा लोग हिन्दी बोलते हैं। दुनिया भर में लगभग 120 मिलियन लोग दूसरी भाषा के रूप में हिन्दी बोलते हैं, और 420 मिलियन से अधिक लोग इसे अपनी मातृभाषा के रूप में बोलते हैं। विदेशों के पाँच प्रमुख विश्वविद्यालय में हिन्दी के विभिन्न पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं; लेकिन इन सबके बाद भी हमारी हिन्दी आज भी राष्ट्रभाषा बनाए जाने की प्रतीक्षा में है।


आलेखः बोलियों में निहित हिन्दी की शक्ति

  - डॉ. सुरंगमा यादव

    शाब्दिक दृष्टि से ‘हिन्दी’ शब्द का अभिप्राय हिन्द या भारतवर्ष में प्रयुक्त किसी भी भाषा के लिए हो सकता है; लेकिन आज सामान्य अर्थ में इसका व्यवहार उत्तर भारत के मध्य देश की उस भाषा के अर्थ में किया जाता है जिसका विस्तार पश्चिम में जैसलमेर, उत्तर-पश्चिम में अम्बाला, उत्तर में शिमला से लेकर नेपाल की तराई, पूर्व में भागलपुर, दक्षिण-पूर्व में रायपुर तथा दक्षिण-पश्चिम में खंडवा तक फैला हुआ है। इसे हिन्दी-भाषी क्षेत्र भी कहा जाता है। इस भू-भाग के आधुनिक साहित्य, पत्र-पत्रिकाओं, शिष्ट वार्तालाप तथा शिक्षा का माध्यम मानकीकृत खड़ी बोली हिन्दी है। सामान्यतया हिन्दी शब्द का प्रयोग जन साधारण इसी अर्थ में करता है। भौगोलिक विस्तार के कारण आम बोलचाल में एक क्षेत्र की हिन्दी दूसरे क्षेत्र की हिन्दी से पर्याप्त भिन्नता रखती है। इस भिन्नता का कारण क्षेत्रीय बोलियाँ हैं। वास्तव में हिन्दी-भाषा है क्या? इस पर विचार करना आवश्यक है। हिन्दी-भाषा विभिन्न उपभाषाओं और बोलियों का समुच्चय व संश्लिष्ट रूप है। इसके अन्तर्गत पाँच उपभाषाएँ तथा कुछ समय पूर्व तक 18 बोलियाँ समाहित थीं, जिनकी संख्या आज 17 रह गई है। मैथिली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करके अलग भाषा का दर्जा दे दिया गया है। ये पाँच उपभाषाएँ और उनकी बोलियाँ इस प्रकार हैं- 1-पश्चिमी हिन्दी - खड़ी बोली, ब्रजभाषा, हरियाणवी, बुन्देली, कन्नौजी, 2-पूर्वी हिन्दी-अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी, 3-राजस्थानी- मारवाड़ी, जयपुरी, मेवाती, मालवी, 4-पहाड़ी- नेपाली, गढ़वाली, कुमाऊँनी, 5-बिहारी- भोजपुरी, मगही। हिन्दी कोई अलग भाषा नहीं है बल्कि इन्हीं उपभाषाओं और बोलियों का समन्वित रूप है या इनके समूह का नाम हिन्दी है। हिन्दी की इन्हीं बोलियों में से एक खड़ी बोली को मानकीकृत कर राजभाषा हिन्दी का दर्जा दिया गया है या दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि बोलियों के इस समूह का मुखिया खड़ी बोली को बनाया गया है;  लेकिन ऐसा होने से न हिन्दी अपनी बोलियों से पृथक हो जाती है और न ही बोलियों का महत्त्व कम हो जाता है। वास्तव में बोलियाँ ही तो हिन्दी की शक्ति हैं। उनके बोलने वालों की संख्या और उनके साहित्य के दम पर ही तो हिन्दी बहुसंख्यक जन की समृद्ध भाषा के रूप में गौरवान्वित है। हिन्दी और उसकी बोलियाँ एक सूत्र में बंधें हुए लकड़ी के उस गट्ठर के समान हैं जो एक-दूसरे को बल प्रदान करती हैं। जब-जब उसमें से कोई लकड़ी खींची जाएगी,  तब-तब पकड़ भी ढीली होगी और शक्ति भी क्षीण होती जाएगी। गट्ठर की भी और पृथक् की गई लकड़ी की भी। इधर संविधान की आठवीं अनुसूची में हिन्दी की बोलियों को शामिल कराने की होड़- सी चल पड़ी है। पहले मैथिली हिन्दी परिवार से पृथक् हुई और अब भोजपुरी और राजस्थानी को भी अलग करने का प्रयास हो रहा है। ये या तो कोई षड्यंत्र है या फिर इसके दूरगामी परिणामों पर विचार नहीं किया जा रहा है। आज अपने संकीर्ण राजनैतिक, साहित्यिक तथा क्षेत्रीय स्वार्थ पूर्ति के लिए उस हिन्दी को कमजोर बनाया जा रहा है, जो देश की एकता की प्रतीक है। अपने एक हजार वर्ष के इतिहास में जिन विविध भाषा रूपों के सम्मिश्रण से हिन्दी एक मानक भाषा के रूप में विकसित हुई थी, उसमें बिखराव प्रारम्भ हो गया है। आज जो माँग हिन्दी की इन बोलियों के लिए उठ रही है, कल अन्य बोलियों के लिए भी उठने लगेगी। जिसका परिणाम ये होगा कि जनगणना के समय इन भाषाओं को बोलने वालों की गणना हिन्दी से पृथक् की जाएगी और आँकड़ों में हिन्दी बोलने वालों की संख्या घटती जायेगी। प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित के अनुसार - “यदि इसी तरह हिन्दी की भाषाएँ/बोलियाँ अलग होती चली गईं, तो हिन्दी बोलनेवालों की संख्या 72करोड़ से घटकर 7 करोड़ रह जाएगी और तब हिन्दी केवल खड़ी बोली रह जाएगी।’’ हिन्दी का विस्तृत क्षेत्र और साहित्य संकुचित हो जाएगा। हिन्दी की विशाल साहित्यिक परम्परा लगभग डेढ़ सौ वर्षों में सिमटकर रह जायेगी। हिन्दी में विद्यापति, चन्दरवरदाई, कबीर, रहीम, जायसी, मीरा, सूर, तुलसी, बिहारी, भूषण आदि भी अलग-अलग क्षेत्रों में बँट जाएँगे। हिन्दी की विभिन्न बोलियों के साहित्य में हमारे देश के अलग-अलग स्थानों की आंचलिक संस्कृति, रीति-रिवाज व आचार-विचार समाहित हैं। हिन्दी साहित्य नई पीढ़ी को विविधवर्णी संस्कृति का ज्ञान कराकर राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने का कार्य करता है।

आज जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में हिन्दी बोलनेवालों की संख्या दूसरे स्थान पर है। इसी आधार पर हम संयुक्त राष्ट्र संघ में आधिकारिक भाषा के रूप में हिन्दी को सम्मिलित करने की माँग कर रहे हैं। जब हमारे पास संख्या बल ही नहीं होगा, तो हमारी माँग में क्या दम रह जाएगा। हिन्दी की बोलियों का विकास अवश्य होना चाहिए;  किन्तु भाषा के विघटन के रूप में न होकर भाषा के संवर्द्धन के रूप में। बोलियों को अपने विकास के लिए अधिकाधिक अवसर मिलने चाहिए। इनकी अकादमी स्थापित हों, पाठ्यक्रम में विभिन्न स्तरों पर इनका साहित्य सम्मिलित किया जाए, जैसे हिन्दी में कुछ बोलियों का साहित्य सम्मिलित है। इसी प्रकार अन्य बोलियों का साहित्य भी जोड़ा जाना चाहिए। उनका मानकीकरण हो, उत्कृष्ट कोटि का साहित्य सृजन हो, पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हो तथा फिल्म निर्माण हो,  ताकि वे समृद्ध हो सकें। इन बोलियों के भाषाशास्त्रियों, साहित्यकारों तथा विद्वानों के लिए सम्मान-पुरस्कार आदि की व्यवस्था हो। जो हिन्दी के अन्तर्गत ही बोलियों के लिए पृथक् से दिये जाएँ। भाषा और बोली के वैमनस्य को खत्म करने के लिए हमें संकुचित मानसिकता से ऊपर उठकर सोचना होगा। भारत विभाजन का दंश हम झेल ही रहे हैं। यदि हम नहीं चेते, तो भाषा विभाजन की पीड़ा भी हमें क्षेत्रीय, प्रादेशिक, राष्ट्रीय और वैश्विक कई स्तरों पर कई रूपों में झेलनी होगी। आज हिन्दी पूरे देश में सम्पर्क भाषा के रूप में बोली व समझी जा रही है। हम देश के किसी भी कोने में चले जाएँ, हिन्दी बोलकर अपना काम चला सकते हैं। हिन्दी हमें एकता के सूत्र में बाँधने की अद्भुत सामर्थ्य रखती है। अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में कितनी ही संस्थाएँ और समितियाँ हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य कर रही हैं और हम हिन्दी भाषी क्षेत्र के होते हुए भी अपनी ही देशव्यापी और विश्वव्यापी हिन्दी को संकुचित कर रहे हैं। हिन्दी हिन्दुस्तान की पहचान है। हिन्दुस्तान का नाम लेते ही यहाँ की भाषा के रूप में हिन्दी ही जेहन में आती है। प्रत्येक देश की एक घोषित राष्ट्रभाषा होती है, हमारे यहाँ वह भी नहीं है। कितनी बड़ी विडम्बना है कि एक विदेशी भाषा के कारण इतने विशाल और गौरवशाली देश में राष्ट्रभाषा के पद पर कोई भाषा प्रतिष्ठित नहीं है और हम सबसे प्रबल दावेदार को ही कमजोर बना रहे हैं। सर्वप्रथम हिन्दी को  ‘राष्ट्रभाषा’ का गौरव संवैधानिक रूप से प्रदान किया जाये तत्पश्चात् इस सूची में कितनी ही क्षेत्रीय भाषाएँ और बोलियाँ सम्मिलित हों देश के हिन्दी प्रेमियों को इसमें कोई आपत्ति नहीं होगी। हिन्दी को राष्ट्रभाषा और पूरे देश की राजभाषा बनाये जाने के लिए सभी राज्यों का सहमत होना आवश्यक है। स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद भी ये सहमति न बनी है और न इसकी कोई संभावना है। अतएव इस व्यवस्था पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। भारत में लोकतान्त्रिक व्यवस्था है। लोकतन्त्र में बहुमत निर्णायक होता है। शत-प्रतिशत सहमति आवश्यक नहीं है। भाषायी संकीर्णताओं से निकलकर सर्वप्रथम हमें हिन्दी को राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन कराने के लिए एकजुट प्रयास करना चाहिए। अन्यथा हम नूर लखनवी के शब्दों में, ‘‘इतने हिस्सों में बँट गया हूँ मैं, मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं।’’ कहकर हाथ मलते रह जायेंगे।

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सम्पर्कः महामाया राजकीय महाविद्यालय, महोना, लखनऊ (उ. प्र.)


दोहाः निज भाषा उन्नति अहै...

 -भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,

बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।


अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन,

पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ।


उन्नति पूरी है तबहिं, जब घर उन्नति होय,

निज शरीर उन्नति किए, रहत मूढ़ सब कोय ।


निज भाषा उन्नति बिना, कबहुँ न ह्यैहैं सोय,

लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय ।


इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग,

तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग ।


और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात,

निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात ।


तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय,

यह गुन भाषा और मह कबहूं नाहीं होय । 


विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार,

सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।


भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात,

विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात ।


सब मिल तासों छाँड़ि कै, दूजे और उपाय,

उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय ।


हिन्दी दिवसः हिन्दी से जुड़ी कुछ मुख्य बातें


 हिन्दी
फ़ारसी भाषा का शब्द है। हिन्दी शब्द की उत्पत्ति सिन्धु (सिन्ध) से हुई है क्योंकि ईरानी भाषा में 'स' को 'ह' बोला जाता है। हिन्दी शब्द सिन्धु शब्द का प्रतिरूप है। आज हम जिस भाषा को हिन्दी के रूप में जानते है, वह आधुनिक आर्य भाषाओं में से एक है। हिन्दी सबसे आसान भाषा में से एक है। जिसे एकदम वैसा ही पढ़ा जा सकता है जैसे वह लिखी गई है।

- देश की प्रथम 10 भाषाओं में हिन्दी बोलने वालों की संख्या में वृद्धि हुई है।

- पिछले 4 दशक में हिन्दी बोलने वालों की संख्या में 19 फीसदी बढ़ोतरी हुई है।

- पिछले 10 सालों में प्रमुख 9 भाषाओं को बोलनेवालों की संख्या में गिरावट आई है जबकि हिन्दी बोलने वाले 10 करोड़ बढ़े हैं।

- मलयालम बोलने वालों की संख्या में 28 फीसदी गिरावट आई है।

- हिन्दी निदेशालय के सरकारी हिन्दी शब्दकोश में बीते 20 साल में शब्दों की संख्या में साढ़े सात गुना बढ़ोतरी हुई है।

- हिन्दी शब्दकोश में अब शब्दों की संख्या 20 हजार से बढ़कर 1.5 लाख हो गई है। 

- अंग्रेजी के ऑक्सफोर्ड शब्दकोश में पिछले 30 सालों में केवल 9500 शब्द ही जुड़े हैं।

- बीते 5 साल में दक्षिण में हिन्दी सीखने वालों की संख्या में 22 फीसदी बढ़ोतरी हुई।

- हिन्दी 25 लाख लोगों द्वारा मूल भाषा के रूप में बोली जाती है और इसे दुनिया की चौथी सबसे बड़ी भाषा का दर्जा प्राप्त है।

- इसके अलावा हिन्दी भारत के करीब 18 करोड़ लोगों की मातृ भाषा है। करीब 30 करोड़ लोग ऐसे हैं जो हिन्दी का इस्तेमाल अपनी दूसरी भाषा के रूप में करते हैं।

- दुनिया में करीब 150 देश ऐसे हैं जहाँ हिन्दीभाषी लोग मौजूद हैं। 

हिन्दी की जड़ें लगभग 5,000 ईसा पूर्व से बोली जानी वाली संस्कृत भाषा के साथ जुड़ी हुई हैं।

- वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम द्वारा तैयार पावर लैंग्वेज इंडेक्स के मुताबिक वर्ष 2050 तक हिन्दी दुनिया की ताकतवर भाषाओं में से एक होगी।

- एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय युवाओं के स्मार्टफोन में औसतन 32 एप में 8 से 9 हिन्दी के हैं। भारतीय युवा यू-ट्यूब पर 93 प्रतिशत हिन्दी वीडियो देखते हैं।

डिजिटल मीडिया में हिन्दी कंटेंट की मांग करीब 94 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। जबकि अंग्रेजी कंटेंट की मांग इससे काफी कम है।

राज्य स्तर की बात करें तो, हिन्दी बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों की आधिकारिक भाषा है।

वर्ष 1918 में महात्मा गांधी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने को कहा था। हिन्दी को गांधी जी ने जनमानस की भाषा भी कहा था।

आलेखः भारत का अभिन्न अंग है जम्मू- कश्मीर

 - प्रमोद भार्गव

केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक उम्मीद से भरा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि ‘गुलाम जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, इस पर पाकिस्तान का कोई अधिकार नहीं है। यहाँ के लोग पाकिस्तान से तंग हैं, अतएव वे स्वयं ही ऐसा कुछ करेंगे कि भारत का हिस्सा बन जाएँ।’ किसी नेता ने ऐसा बयान शायद पहली बार दिया है कि गुलाम कश्मीर के लोग स्वयं ही भारत में विलय हो जाएँ। संभव है भारत की यह ऐसी किसी रणनीति का हिस्सा हो, जिसकी निकट भविष्य में फलीभूत होने की संभावना हो ? इसी का संकेत सिंह ने संकेत दिया हो। उन्होंने ये बात जम्मू-कश्मीर प्रदेश भाजपा की ओर से आयोजित ‘सुशासन भी, सुरक्षा भी’ विषय पर बोलते हुए कही है। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि बंटवारे के समय के हस्ताक्षरित दस्तावेजों के अनुसार संपूर्ण पाक अधिकृत कश्मीर भारत का हिस्सा है। पाकिस्तान ने उस पर अवैध कब्जा किया हुआ है।  

इस विलय के संबंध में सर्वसम्मति से संसद में प्रस्ताव भी पारित होते रहे हैं। 1994 में पीवी नरसिंह राव की सरकार में भी इस बाबत एक प्रस्ताव पारित हुआ था। चूंकि पीओके भारत का हिस्सा है। इसलिए जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पीओके क्षेत्र की बनाई गईं  चौबीस सीटे फिलहाल खाली रखनी पड़ती हैं। दरअसल भारत कश्मीर मुद्दे पर अब तक नाकाम इसलिए रहा, क्योंकि उसने आक्रामकता दिखाने की बजाय रक्षात्मक रवैया अपनाया हुआ था। इससे लाखों पंडितों को विस्थापन का दंश तो झेलना पड़ा ही यह पूरा इलाका आतंक व अलगाव की चपेट में भी आ गया। नतीजतन अब तक 42000 से भी ज्यादा लोगों को मौत के मुँह में जाना पड़ा।  

विभाजन की जिस अव्यावहारिक व अप्राकृतिक मांग के आगे जवाहरलाल नेहरू समेत हमारे तत्कालीन नेता नतमस्तक होते चले गए थे, उससे न केवल जम्मू-कश्मीर, बल्कि पीओके, भारत, पाकिस्तान और बंग्लादेश को भी विभाजन का दर्द झेलना पड़ा है। जबकि विभाजन के समय ही यह साफ लगने लगा था कि यह अखंड भारत की विरासत को खंडित करने की अंग्रेजी हुकूमत की कुटिल चाल है। बावजूद कांग्रेस नेता यह नहीं समझ पाए कि जो शेख अब्दुल्ला ‘मुस्लिम कांफ्रेंस’ का गठन कर कश्मीर की सामंती सत्ता से मुठभेड़ कर रहा है, उसे शह मिलती रही तो वह भस्मासुर भी बन सकता है ? 1931-32 में शेख की मुलाकात जवाहरलाल नेहरू तथा खान अब्दुल्ल गफ्फार खान से हुई। इन्हें सीमांत गांधी भी कहा जाता है। इस गुफ्तगू से शेख को इतनी ताकत और दृष्टि मिली कि शेख ने अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए ‘मुस्लिम कांफ्रेंस’ से मुस्लिम शब्द हटा दिया और ‘नेशनल’ जोड़ दिया। जिससे राष्ट्रीयता का भ्रम हो। इसी समय जिन्ना ने पृथकतावादी अभियान चला दिया। फिरंगी शासक तो चाहते भी यही थे कि भारत को आजादी धर्म के आधार पर बँटवारे की परिणति में मिले। आमतौर से ऐसा माना जाता है कि कश्मीर समस्या 1947 के बाद पनपी व विकसित हुई। जबकि वास्तव में इसकी शुरुआत जम्मू-कश्मीर के महाराजा गुलाब सिंह के दरबार में ‘अंग्रेज रेजिमेंट’ की नियुक्ति के साथ ही हो गई थी। किंतु अंग्रेज नाकाम रहे। इसी समय दुर्भाग्य से कश्मीर के गिलगिट क्षेत्र के राजा रणवीर सिंह का देहांत हो गया। अंग्रेजों ने शोक में डूबे राज-परिवार की इस कमजोरी को एक अवसर माना और सक्रियता बढ़ा दी।

दरअसल अंग्रेजों ने 1885 में ही यह योजना बना ली थी कि किसी भी तरह जम्मू-कश्मीर के दुर्गम व सुरक्षित क्षेत्र गिलगिट व बाल्टिस्तान पर कब्जा करना है। जिससे अमेरिका की सैन्य गतिविधियों के लिए एक सुरक्षित स्थान मिल सके। अमेरिका इसे सोवियत संघ पर शिकंजा कसने की दृष्टि से उपयुक्त क्षेत्र मान रहा था। लिहाजा अंग्रेजों ने षड्यंत्र पूर्वक इस क्षेत्र को ‘गिलगिट एजेंसी’ नाम देकर 1889 में अपने कब्जे में ले लिया। इसके अधीनता में आते ही सिंधु नदी के पूर्व और रावी नदी के पश्चिमी तट तक समूचे पर्वतीय भू-भाग पर अंग्रेजों का नियंत्रण हो गया। इस समय गिलगिट में प्रताप सिंह, राजा रणवीर सिंह के उत्तराधिकारी के रूप में शासक थे। प्रतापसिंह अंग्रेजों की साजिश का शिकार हो गए। गुलाब सिंह की मृत्यु के बाद हरिसिंह जब राजा बने, तो 1925 में उनकी आँखें खुलीं और गिलगिट की साजिश को समझा। तब हरिसिंह ने हिम्मत व सख्ती से काम लेते हुए अपनी सेना गिलगिट भेजकर अंग्रेजी सेना को गिलगिट छोड़ने को विवश कर दिया और यूनियन जैक उतारकर कश्मीरी झंडा किले पर फहरा दिया। यह अप्रत्याशित घटनाक्रम अंग्रेजों को एक शूल की तरह चुभता रहा। 

 1930 में जब स्वतंत्रता आंदोलन एक प्रखर राष्ट्रवाद के रूप में देशव्यापी हो गया तो इस राजनीतिक समस्या के हल के बहाने लंदन में गोलमेज सम्मेलन आहूत किया गया। भारतीय राजाओं के अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में हरिसिंह ने इसमें हिस्सा लिया। यहाँ हरिसिंह ने गिलगिट बाल्टिस्तान समेत, सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर को ‘संघीय राज्य’ बना देने की पुरजोर पैरवी की। किंतु यह माँग अंग्रेजों की मंशा के अनुकूल नहीं थी, इसलिए सिरे से खारिज कर दी। यहाँ अंग्रेजों ने गिलगिट क्षेत्र से हरिसिंह द्वारा अंग्रेज सेना की बेदखली की गई थी, उसके प्रतिकार स्वरूप साजिश तो रची ही, औपनिवेशिक कूटनीति व भारत को विभाजित करने की मंशा को फलीभूत देखने के नजरिए से शेख अब्दुल्ला को शह देकर उसे कश्मीरी शासक के विरुद्ध उकसाना शुरू कर दिया। नतीजतन शेख ने अलगाववादी संगठन ‘मुस्लिम कांफ्रेंस’ की नींव डाल दी। इसी दौरान शेख की मुलाकात जवाहरलाल नेहरू से हुई, जो मित्रता में बदल गई।  1932 से ही शेख ने कश्मीर पर नाजायज कब्जे के लिए जंग छेड़ दी।

 इसके बाद से लेकर 1947 तक के कालखंड में 1942 की अगस्त क्रांति तथा आजाद हिंद फौज के अभियान और दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जब फिरंगी हुकूमत के खिलाफ जबरदस्त असंतोष और सशस्त्र संघर्ष की घटनाएँ आम हो गईं तो अंग्रेजों ने अनुभव किया कि अब भारत पर नियंत्रण संभव नहीं है, तब उन्होंने भारतीय रियासतों के विलीनीकरण के लिए धार्मिक व क्षेत्रीय उपराष्ट्रीयताओं को भी उकसाना शुरू कर दिया। फलतः शेख समेत अनेक हिंदू व मुस्लिम नरेशों में एक नए स्वतंत्र देश पर राज करने की मनोकामना अँगड़ाई लेने लगी। जबकि रियासतों का विलय भारतीय राष्ट्र को अखंड भारत का रूप देकर एक सशक्त व एकीकृत संविधान द्वारा संचालित राजनीतिक इकाई का निर्माण करना था। इसी समय शेख ने स्वतंत्र कश्मीर का सुल्तान बनने का सपना देखना शुरू कर दिया। मुस्लिम लीग तो जिन्ना के नेतृत्व में पहले से ही मुसलमानों के लिए पृथक मुस्लिम देश बनाने की माँग कर रही थी। 

1946 में शेख ने हरिसिंह के विरुद्ध ‘महाराजा कश्मीर छोड़ों आंदोलन’ छेड़ दिया। 20 मई 1946 को शेख ने श्रीनगर की मस्जिदों का दुरुपयोग करते हुए सांप्रदायिक उन्माद फैलाने के ऐलान कराए। नतीजतन शेख की गिरफ्तारी हुई और उन्हें तीन साल की सजा सुनाई गई। इस गिरफ्तारी के बाद कश्मीर की स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में थी। किंतु यह गिरफ्तारी जवाहरलाल नेहरू को रास नहीं आई। नेहरू ने शेख की गिरफ्तारी को गलत ठहराते हुए दिल्ली के राजनीतिक हलकों में हरिसिंह को दोषी ठहराना शुरू कर दिया। नेहरू शेख को छुड़ाने के लिए इतने उतावले हो गए कि जब देश स्वतंत्रता संग्राम की निर्णायक लड़ाई लड़ रहा था, तब 19 जून 1946 को नेशनल ऐयरवेज के हवाई जहाज से लाहौर होकर रावलपिंडी पहुँचे और फिर रावलपिंडी से जीप द्वारा श्रीनगर पहुँच गए। यहाँ के कश्मीरी पंडितों ने नेहरू को समझश दी कि आपको गुमराह किया जा रहा है, महाराजा अपनी जगह सही हैं। किंतु नेहरू को ये शब्द कानों में पिघले सीसे की तरह लगे।  हरिसिंह ने नेहरू का कहना नहीं माना तो ‘सत्याग्रह’ की घोषणा कर दी। मित्रता के भुलावे में नेहरू द्वारा की गई यह भूल और शेख को छुड़ाने की जिद व जुनून कालांतर में ऐतिहासिक भूल साबित हुए। हरिसिंह ने कठोरता बरतते हुए नेहरू के हठ को सर्वथा नकार दिया और उन्हें हिरासत में लेकर कश्मीर की सीमा से बाहर का रास्ता दिखाकर रिहा कर दिया। 

 नेहरू ने इस आचरण को नितांत अव्यावहारिक माना और हरिसिंह से बदला लेने का संकल्प ले लिया। इसलिए देश की 562 रियासतों को विलय करने का जो दायित्व पटेल बड़ी चतुराई सँभाल रहे थे, उसमें एक जम्मू-कश्मीर का दायित्व नेहरू ने जबरदस्ती अपने हाथ ले लिया। इसी कालखंड में 24 अगस्त 1946 को नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बना दी गई। यह वह दौर था, जब पूरे भारत में सांप्रदायिक दंगों के साथ अनिश्चय, अविश्वास एवं अराजक वातावरण छाया हुआ था। इसी समय 20 फरवरी 1947 को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने ऐतिहासिक घोषणा की, कि जून 1948 तक भारत को स्वतंत्र कर दिया जाएगा। इस घोषणा के परिणाम की जिम्मेवारी एडमिरल लुईस माउंटबेटन को सौंपी गई। 24 मार्च 1947 को वायसराय के रूप में माउंटबेटन ने भारत के प्रशासनिक दायित्व अपने हाथ में ले लिए। माउंटबेटन ने अलग-अलग गोपनीय मुलाकातें लीगी व कांग्रेसी नेताओं से करके भारत विभाजन का संकल्प गांधी के विरोध के बावजूद ले लिया। अंततोगत्वा 4 जुलाई 1947 को ब्रिटेन की संसद के दोनों सदनों में ‘भारतीय स्वतंत्रता विधेयक-1947’ पेश कर दिया, जो मत-विभाजन से पारित हो गया। 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश हुकूमत ने अनुमोदन भी कर दिया। इसी विधेयक के तहत भारत को धर्म के आधार पर दो स्वतंत्र औपनिवेशिक राज्यों में बांट दिया गया।

  जम्मू-कश्मीर रियासत का विलय जवाहरलाल नेहरू के हाथ में होने के कारण असमंजस में रहा। डोगरा राजा हरिसिंह जहाँ कश्मीर की स्वतंत्र राज्य की परिकल्पना कर रहे थे, वहीं उनके प्रधानमंत्री रामचंद्र काक पाकिस्तान के साथ विलय पर विचार कर रहे थे, क्योंकि उनकी पत्नी यूरोपियन थीं, इसलिए उनकी आँखें मुंद गईं थीं। इसी अनिश्चितता के दौर में 22 अक्टूबर 1947 को शेख की शह पर पाक फौज जीपों व ट्रकों पर सवार होकर कश्मीर में चढ़ी चली आई। इस संकट से मुक्ति के लिए हरिसिंह विवश हुए और उन्होंने 26 अक्टूबर 1947 को विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके बाद 27 अक्टूबर 1947 को कबिलाइयों को बेदखल करने के लिए हवाईजहाज से सेना भेज दी गई। भारतीय सैनिकों ने कबिलाईयों को खदेड़ दिया, किंतु दुर्गम क्षेत्र होने के कारण मुजफ्फराबाद का पीओके, गिलगिट व बाल्टिस्तान क्षेत्र पाक के कब्जे में बना रहा। इस परिप्रेक्ष्य में नेहरू जल्दबाजी में संयुक्त राष्ट्र संघ चले गए। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् ने इसे विवादित क्षेत्र घोषित कर दिया। परिणामस्वरूप युद्धविराम तो हो गया, लेकिन कश्मीर की शासन व्यवस्था को लेकर नेहरू, हरिसिंह और शेख के बीच ‘दिल्ली समझौता’ हुआ। इस समझौते के आधार पर ही नेहरू ने शेख के सुपुर्द जम्मू-कश्मीर की कमान सौंप दी। इसके बाद कश्मीर को विशेष दर्जा देने के लिए 370 का अनुच्छेद पटेल और अंबेडकर के विरोध के बावजूद जोड़ दिए गए। हालाँकि अब इस अनुच्छेद को हटा दिया गया है। लिहाजा अब अवसर है कि गुलाम कश्मीर माने जाने वाले पीओके, गिलगिट व बाल्टिस्तान को पाक के शिकंजे से मुक्त करके भारत में विलय कर लिया जाए।   ■■

सम्पर्कः  शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी , (म.प्र.), मो. 09425488224, 9981061100


आलेखः विभिन्न भाषाओं के बीच सेतु है हिन्दी

 - डॉ. रमाकांत गुप्ता

सम्पर्क भाषा के लिए अंग्रेजी में कई शब्दों का प्रयोग होता है, यथा lingua franca, bridge language, common language, trade language, auxiliary language, vehicular language और link language. एक तरह से देखें तो हिन्दी की सम्पर्क भाषा नामक शब्दावली अंग्रेजी के link language का ही अनुवाद है। राजभाषा के रूप में हिन्दी की सफलता बहुत कुछ अखिल भारतीय स्तर पर सम्पर्क भाषा के रूप में उसकी सफलता पर निर्भर है। 

1.सम्पर्क भाषा से तात्पर्य

सम्पर्क भाषा की परिभाषा निम्नलिखित रूप में दी गई है– 

A language that is adopted as a common language between speakers whose native languages are different.’Oxford English

अर्थात् “सम्पर्क भाषा उस भाषा को कहते हैं जिसका प्रयोग दो अलग-अलग भाषा बोलने वाले लोग आपसी सम्पर्क के लिए एक सामान्य भाषा के रूप में करते हैं।’ एक दूसरे की भाषा न जानते हुए भी परस्पर बातचीत करना व्यापारिक, धार्मिक आदि कई कारणों से ज़रूरी हो जाता है। हमें अपना व्यवसाय चलाना है या अपने धर्म का प्रचार करना है तो हमें उन लोगों की भाषा सीखनी ही होगी, जिनसे हमें व्यापार करना है या जिनके बीच हमें अपने धर्म या संस्कृति का प्रचार करना है।  

2. देशी भाषा और सम्पर्क भाषा में अंतर

जहाँ एक देशी भाषा विशेष भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित रहती है, वहीं सम्पर्क भाषा व्यापारिक, धार्मिक, राजनीतिक या शैक्षणिक आदि कई कारणों से मूल भाषा-भाषियों की सीमा से काफी बाहर तक अपना विस्तार कर लेती है। उदाहरण के लिए, अंग्रेज़ी वैसे तो सिर्फ यूनाइटेड किंगडम की देशी भाषा है परंतु विश्व के अधिकांश देशों में इसका इस्तेमाल सम्पर्क भाषा के रूप में किया जाता है। 

3. विश्व की सम्पर्क भाषाएँ

अब आइए विश्व की कुछ प्रमुख भाषाओं की चर्चा करें जो उन भाषाओं को बोलने वालों की भौगोलिक सीमा के काफी बाहर जाकर अलग-अलग भाषा-भाषियों के बीच सम्पर्क भाषा की भूमिका निभा रही हैं। राजनीतिक कारणों से अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पैनिश और पुर्तगीज उन देशों की सम्पर्क भाषा बन गई जो देश कभी ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन और पुतगाल के उपनिवेश हुआ करते थे। इसी तरह से धार्मिक कारणों से विश्व के काफी मुस्लिम लोग आपसी सम्पर्क के लिए अरबी का प्रयोग करते हैं।

4. कोई भाषा सम्पर्क भाषा कैसे बनती है?

हिन्दी को सम्पर्क भाषा कैसे बनाएँ, इसकी चर्चा करने के पहले आइए यह जानें कि किन कारणों से कोई भाषा सम्पर्क भाषा बनती है? सम्पर्क भाषा के रूप में किसी भाषा का विस्तार व्यापारिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक और प्रशासनिक कारणों से होती है। 

5. हिन्दी को सम्पर्क भाषा कैसे बनाया जा सकता है?

आइए जानें कि हिन्दी भाषा को समूचे देश की सम्पर्क भाषा के रूप में कैसे विकसित किया जा सकता है। 

 -हिन्दी उत्तर और पश्चिम भारत की सम्पर्क भाषा के रूप में 

सबसे पहले बात करते हैं उत्तर भारत की। उत्तर भारत की सभी भाषाएँ वैसे भी व्याकरणिक ढाँचे और शब्द संपदा के रूप में हिन्दी से काफी मिलती-जुलती हैं। हिन्दी और उर्दू में तो सिर्फ लिपि और शब्दावली का ही अंतर है। व्यापारिक, सांस्कृतिक और धार्मिक कारणों से समूचे उत्तर भारत में किसी भी प्रदेश में किसी से भी हिन्दी भाषा में आपसी बातचीत की जा सकती है और इस तरह हिन्दी समूचे उत्तर भारत – पंजाब से लेकर उत्तर-पूर्व तक  के लोगों की सम्पर्क भाषा पहले से ही बन चुकी है।    

पर जहाँ तक पश्चिमी भारत के राज्यों की बात है, भक्तिकाल में हिन्दी भाषी प्रदेशों और इन राज्यों के संत आपस में मिला करते थे और इस तरह हिन्दी भाषा का काफी प्रचार इन क्षेत्रों में पहले से ही हो चुका था। मीराबाई की कविताएँ तो आज भी उसी रूप में गुजराती में पढ़ाई जाती हैं। मराठी भाषा ने देवनागरी लिपि को अपनाकर स्वयं को लिपि के स्तर पर हिन्दी के और भी नज़दीक ला दिया है। महाराष्ट्र के दूरदराज के कुछ लोगों को छोड़ दें तो सभी आपसी बातचीत हिन्दी में कर लेते हैं। जो लोग हिन्दी बोल नहीं सकते उनके बीच बोलचाल की हिन्दी को लोकप्रिय बनाने की थोड़ी ज़रूरत है और इस दिशा में सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर प्रयास किए जाने की ज़रूरत है। 

- तमिलनाडु से इतर दक्षिणी भारत की सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी 

अब बात करते हैं तमिलनाडु को छोड़कर शेष दक्षिण भारत की। मुहम्मद-बिन-तुगलक ने जब देवगिरि को अपनी राजधानी बनाई तो उनके साथ दिल्ली से काफ़ी संख्या में लोग गए, जिसकी वजह से दक्खिनी नामक हिन्दी की एक अलग बोली बनी। 15वीं से 18वीं सदी तक बहमनी वंश के तथा अन्य राजाओं ने दक्खिनी हिन्दी को आश्रय दिया। बहमनी वंश के महामंत्री गंगू ब्राह्मण ने दक्खिनी हिन्दी को राजभाषा बनाया। दक्खिनी की केवल लिपि फ़ारसी थी, भाषा के रूप में तो वह हिन्दी ही थी। इस तरह से राजनीतिक कारण से हिन्दी दक्षिण तक गई और वहाँ के सभी लोगों की सम्पर्क भाषा बन गई। आज भी जब हम हैदराबाद जाते हैं तो लगता ही नहीं है कि हम दक्षिण भारत में आए हुए हैं। राजनीतिक और धार्मिक कारणों से हिन्दी न केवल आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में अपितु कर्नाटक और केरल में भी दूसरी भाषा के रूप में अच्छी तरह से बोली और समझी जाने लगी है। एक बार जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी ने कर्नाटक राज्य के धारवाड़ शहर में अंग्रेज़ी में बोलना शुरू किया तो वहाँ की जनता ने हिन्दी-हिन्दी कहना शुरू कर दिया और उन्हें हिन्दी में भाषण देने के लिए विवश कर दिया। इसी से आप समझ सकते हैं कि तमिलनाडु से इतर दक्षिण भारत के राज्यों में लोग अंग्रेज़ी भले ही न समझें, हिन्दी समझते हैं और इस तरह से हिन्दी इस इलाके की भी सम्पर्क भाषा बनती जा रही है। 

राजनीतिक और धार्मिक कारणों के अलावा व्यावसायिक और व्यापारिक कारणों से भी दक्षिण के लोग हिन्दी सीख रहे हैं और यहाँ के मूल निवासियों और हिन्दी क्षेत्र से यहाँ आए लोगों की यह सम्पर्क भाषा बनती जा रही है। इसमें मारवाड़ी और गुजराती व्यवसायियों का बहुत अधिक योगदान है। जैसे-जैसे केंद्र सरकार और दक्षिण भारत की राज्य सरकारें इन राज्यों में रोजगार करना आसान बनाती जाएँगी, सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी का और विकास होता जाएगा। 

- तमिलनाडु की सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी 

आइए अब बात करते हैं तमिलनाडु की, जहाँ आज भी तमिल और अंग्रेज़ी का ही बोलबाला है। इसे स्वीकार करने में कोई हर्ज़ नहीं है कि आज भी हिन्दी इस राज्य की सम्पर्क भाषा नहीं बन पाई है। एक बार मैं चेन्नै में एक सरकारी बैंक के एक शाखा प्रबंधक से मिला जो गुजराती थे – उनका कहना था कि वे गुजरात में सारा काम हिन्दी में ही करते थे पर यहाँ आकर समझ में आया कि आज भी अंग्रेज़ी के बिना गुज़ारा नहीं है। उनका कहना था कि यदि वे अंग्रेज़ी नहीं जानते तो यहाँ के ग्राहकों के साथ सम्पर्क करना नामुमकिन था। सात साल चेन्नै में रहने के बाद मैंने भी कुछ ऐसा ही महसूस किया। 

पर उसी तमिलनाडु के कुछ क्षेत्रों में स्थितियाँ काफी अलग हैं। विशेषकर उन शहरों में जो हिंदू धर्म के केंद्र हैं - यथा मदुरै, कन्याकुमारी, रामेश्वरम आदि – लोग आराम से हिन्दी समझते भी हैं और बोलते भी हैं। कारण स्पष्ट है उत्तर भारत से आए दर्शनार्थियों के साथ सम्पर्क करना। लगभग तीस साल पहले जब मैं मीनाक्षी मंदिर का दर्शन करने के लिए मदुरै गया था तो मैंने वहाँ के एक पुलिसकर्मी से अंग्रेज़ी में रास्ता पूछा और जब उसने हिन्दी में जवाब दिया तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। दक्षिण के अन्य राज्यों की ही तरह धार्मिक, व्यावसायिक और व्यापारिक कारणों से यहाँ भी लोग हिन्दी सीखने लगे हैं। चेन्नै में पहले हिन्दी काशीचट्टी तक सीमित हुआ करती थी पर अब उसका विस्तार चेन्नै के हर बाज़ार तक हो गया है। हर व्यापारी आराम से हिन्दी में बात करने लगा है क्योंकि ऐसा न करने पर नुकसान उनका ही होगा। 

तमिलनाडु में दक्खिनी का प्रसार नहीं हुआ जिसका कारण यह था कि उत्तर भारत के शासक यहां तक अपना पैर नहीं पसार सके। यहां तो स्थानीय चेर, चोल और पांड्य शासकों का शासन रहा जिन्होंने तमिल भाषा को आश्रय दिया। इन शासकों का संबंध उत्तर भारत से कम और दक्षिण-पूर्व एशिया के शासकों से अधिक था। इनकी वज़ह से मलेशिया, सिंगापुर आदि देशों तक तमिल भाषा का प्रसार हुआ। 

अठारहवीं सदी में अंग्रेज़ों ने यहाँ अपना पैर जमाया और मद्रास प्रेसिडेंसी बनाया और उनकी वज़ह से यहां तमिल के अलावा अंग्रेज़ी का भी प्रसार हुआ। हमें स्वीकार करना होगा कि उक्त कारणों से यहां की दूसरी भाषा अंग्रेज़ी है, हिन्दी नहीं। हिन्दी को एक तरह से तीसरी भाषा कह सकते हैं। पर केन्द्रीय विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे हिन्दी सीख रहे हैं। भारत सरकार को भी चाहिए कि वह ऐसे केन्द्रीय विद्यालयों की संख्या बढ़ाए जिसमें बच्चे हिन्दी भी सीखें, फीस भी कम देनी पड़े और पढ़ाई का स्तर भी बेहतरीन हो। हिन्दी को यदि यहाँ की सम्पर्क भाषा बनानी है तो यही एकमात्र विकल्प है – केंद्र सरकार को इस दिशा में शीघ्र पहल करनी चाहिए। यहाँ हिन्दी का प्रसार शैक्षणिक, धार्मिक और व्यावसायिक कारणों से ही हो सकेगा पर शैक्षणिक कारण अधिक असरदार साबित होंगे।  

- हिन्दी विश्व की सम्पर्क भाषा के रूप में

प्रवासी भारतीयों के कारण बीस से अधिक देशों में काफी संख्या में लोग हिन्दी बोलने लगे हैं – यथा यूएसए, मारिशस, दक्षिण अफ्रीका, यमन, उगांडा, सिंगापुर, पाकिस्तान, नेपाल, न्यूजीलैंड,  फिज़ी, सुरीनाम, गुयाना, ट्रिनिडाड और टोबैगो आदि। कहने का तात्पर्य यही है कि जैसे-जैसे भारत आर्थिक रूप से सशक्त बनेगा और विश्व व्यापार में भारत की भागीदारी बढ़ेगी, वैसे-वैसे दूसरे देश के लोग स्वत: हिन्दी सीखेंगे और भारत की ही तरह विश्व मंच पर भी हिन्दी एक सशक्त सम्पर्क भाषा के रूप में उभरेगी। 

6. निष्कर्ष

इसमें कोई शक नहीं कि जब से हिन्दी ने हिंदुस्तानी का रूप ले लिया, सम्पर्क भाषा के रूप में इसका विस्तार होता गया। मुगल शासकों ने दक्षिण भारत तक हिन्दी का प्रसार करने में अहम भूमिका निभाई। आज़ादी के बाद इसे केंद्र सरकार की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया जिसके फलस्वरूप देश में ही नहीं विदेशों में स्थित केंद्र सरकार के कार्यालयों में भी लोग हिन्दी सीखने लगे। शिक्षा के स्तर पर त्रिभाषा सूत्र ने भी सम्पर्क भाषा के रूप में इसका प्रसार करने में योगदान दिया। 

जब बात सम्पर्क भाषा की आती है तो हमें हिन्दी और उर्दू को एक भाषा मानकर चलना चाहिए। इन दोनों भाषाओं ने न केवल पूरे भारत में अपितु विदेशों में भी अपना सिक्का जमा लिया है। आज हिन्दी विभिन्न कारणों से समूचे देश की सम्पर्क भाषा बन चुकी है। जैसे-जैसे भारत एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरता जाएगा, विश्व में हिन्दी सीखने वाले बढ़ते जाएँगे और वह दिन दूर नहीं जब विदेशी लोग भारत आकर यहाँ की जनता के साथ सम्पर्क करने के लिए सम्पर्क भाषा के रूप में अंग्रेज़ी के बाजाए हिन्दी को पसंद करेंगे।  ■■

 निवास स्थान : बेंगलूरु, : मो. 9820414276,, ईमेल drramakant2000@gmail.com


दो कविताएँः



1. इक्कीस कोटि-जन-पूजिता हिन्दी 

पड़ने लगती है पीयूष की शिर पर धारा

हो जाता है रुचिर ज्योति मय लोचन-तारा

बर बिनोद की लहर हृदय में है लहराती

कुछ बिजली सी दौड़ सब नसों में है जाती

आते ही मुख पर अति सुखद जिसका पावन नाम ही

इक्कीस कोटि-जन-पूजिता हिन्दी भाषा है वही


जिसने जग में जन्म दिया औ पोसा, पाला

जिसने यक- यक लहू बूँद में जीवन डाला

उस माता के शुचि मुख से जो भाषा सीखी

उसके उर से लग जिसकी मधुराई चीखी

जिसके तुतलाकर कथन से सुधाधार घर में बही

क्या उस भाषा का मोह कुछ हम लोगों को है नहीं

              - अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

2. मेरी माता है

मेरी भाषा में तोते भी राम राम जब कहते हैं,

मेरे रोम-रोम में मानो सुधा-स्रोत तब बहते हैं ।

सब कुछ छूट जाय मैं अपनी भाषा कभी न छोडूँगा,

वह मेरी माता है उससे नाता कैसे तोड़ूँगा ।।

                                     -मैथिलीशरण गुप्त


इतिहासः राजा भोज- कुछ अनछुए पहलू

 - विजय जोशी, पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल     

जानते हैं हमारे दौर की सबसे बड़ी त्रासदी क्या है। वह यह कि युगों- युगों तक अमर व प्रासंगिक रहे अपने महापुरुषों का भी हमने धार्मिक, सांप्रदायिक और क्षुद्र राजनैतिक लाभ के अंतर्गत किसी हद तक ध्रुवीकरण कर दिया है। सामाजिक व राजनैतिक जीवन में भी अब सहिष्णुता, समझ और सद्भावना के युग का संभवतया अंत हो गया है। इससे बड़ी विडंबना भला क्या हो सकती है कि अपने अतीत की गलतियों से सीख लेकर आगे बढ़ने के बजाय हम उन्हें और अधिक मजबूत करने का प्रयास में प्रयत्नरत हैं।

   मालव प्रदेश के केंद्र बिंदु पर स्थित धारा नगरी एक दौर में अपने वैभव व संपन्‍नता के कारण सदैव शत्रुओं के निशाने पर रही। शायद तलवार की धार पर चलने जैसे निर्मित वातावरण के कारण ही इसे धारा नगरी नाम से विभूषित किया गया। मुगलकाल में धार को पीरों का धार नाम से भी पुकारा गया, क्‍योंकि यहाँ पर अनेक पीर बसते हैं, जिनकी मजारें आज भी यहाँ विद्यमान हैं। परमारवंशी राजा भोज ने इस नगरी को प्रगति एवं प्रतिष्‍ठा से जोड़कर नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

परमार वंश :

  परमार वंश की उत्‍पत्ति की गाथा भी बड़ी रोचक है। ऋषि वशिष्ठ  तथा विश्‍वामित्र की शत्रुता की कई कहानियाँ जग जाहिर हैं। एक बार विश्‍वामित्र के अनुयाइयों ने वशिष्‍ठ आश्रम पर आक्रमण कर सारा गोधन लूट लिया। इस बात पर वशिष्‍ठ को बहुत क्रोध आया, उन्‍होंने यज्ञ आयोजित कर वीर पुरुषों का आह्वान किया। तब उनके पुण्‍य प्रताप से जो वीर पुरुष अवतरित हुए, उन्‍होंने विश्‍वामित्र से युद्ध करके गोधन पुन: लौटा लाने के प्रयोजन को मूर्त रूप दिया। न्‍याय स्‍थापना हेतु पर यानी शत्रु को मार (पर+मार) के अपने गुणों के कारण वे कालांतर में परमार कहलाए गए।

राजा भोज :

 संस्‍कारों की ऐसी थाती के साथ राजा सिहंदेव के यहाँ पुत्र भोज का जन्‍म हुआ।  शैशव काल में ही पिता के निधन के कारण भोज के वयस्‍क होने तक सिंहदेव के छोटे भाई मुंज राज्‍य सिंहासन पर बैठे।  एक बार नगर भ्रमण पर आए एक ज्‍योतिष ने भोज की हस्‍तरेखा देखकर कहा :  

      पंचाशत्‍पंच वर्षाणि सप्‍तमासमं दिन त्रयं

       भोज राजेन भोक्‍तव्‍यः सगौड़ो दक्षिणापथ: 

( अर्थात राजा भोज 55 वर्ष, 7 माह और 3 दिन राज्य करेंगे) 

 यह सुनते ही राजा मुंज के मन में असुरक्षा की भावना गहरा गई कि एक दिन उन्‍हें भी यह सब वैभव व राज पाठ छोड़ना पड़ेगा। बस इसी कुविचार के तहत उन्‍होंने अपने विश्‍वस्त सहयो‍गी वत्सराज  को बुलाकर आदेश दिया कि बालक भोज को वन में ले जाकर उनका वध कर दिया जाए। सहयोगी अवाक रह गया पर कोई और उपाय न देख वह बालक भोज को जंगल में ले तो गया पर सारा सत्‍य उनके सामने व्‍यक्‍त कर दिया तथा देश परित्‍याग का निवेदन किया।

मांधाता संदेश :

  भोज बालपन से ही कुशाग्र, चतुर और समझदार थे। उन्‍होंने प्रमाणस्‍वरूप अपने अंग वस्‍त्र सेवक सौंपते हुए एक श्लोक लिखा एवं उसे अपने काका मुंज को सौंपने हेतु दिया। वत्‍सराज  बालक भोज को अपने घर में छुपाकर मुंज के पास पहुँचे। मुंज ने पूछा कि मरते समय भोज ने क्‍या कहा। सेवक ने रक्‍त से लिखा वह श्‍लोक प्रस्‍तुत कर दिया:

 मांधाता स महिपति:  कृत युगालंकार भूतो गत:

  सेतुर्येन महोदधौ विरचित: वासौदशास्‍यांतक:

अन्‍येचापि युधिष्ठिर प्रभुतयो याता दिवं भूपते

नैकेनापि सम गता वसुमती मान्‍ये त्वया यास्यति

 (हे राजा: सतयुग को सुशोभित करने वाला मांधाता भी इस संसार से चला गया और त्रेता युग में जिन राजा राम ने रावण का वध किया, वे भी आज नहीं है। इसी प्रकार द्वापर में युधिष्ठिर आदि दूसरे राजाओं को भी इस संसार से कूच करना ही पड़ा। किसी के भी साथ यह पृथ्‍वी ना जा सकी, पर संभव है कलियुग में यह आपके साथ अवश्य जाए)

 आगे की बात बहुत संक्षिप्त है। श्‍लोक पढ़ते ही राजा मुंज शोक मग्न हो गए। तब वत्सराज ने जीवित बालक भोज को उनके सामने उपस्थित कर दिया। राजा ने भोज को छाती से लगाते हुए उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

राजा भोज काल :

  ग्‍यारहवीं सदी के प्रारंभ में (1010 ईसवी) में भोज राज्‍य सिंहासन पर बैठे तथा 45 वर्षो तक निर्बाध सुशासन किया। वे शिवभक्त थे। उनके द्वारा स्‍थापित धारेश्‍वर महा‍देव मंदिर का निर्माण किया गया, जो आज भी नगर में विद्यमान है। भोग विलास में न डूबते हुए उन्होंने अपना सारा जीवन प्रजा की भलाई और विद्या के प्रसार में लगाया। उनके दौर में स्थापित भोजशाला विद्या अध्ययन का एक महत्वपूर्ण केंद्र थी।

भोज का साम्राज्य विस्तृत था। वे जल विज्ञा‍नी भी गजब के थे। इसी कारण धार तालाबों की नगरी के रूप में भी विख्‍यात हुआ। भोजपुर स्थित का तत्‍कालीन कृत्रिम झील के प्रमाण आज भी उपलब्‍ध हैं। इसके लिये गोलाकार में खड़ी पहाड़ियों को बड़े बड़े बांधों से बांधा गया। यह झील और तत्कालीन शिव मंदिर भोजकालीन शिल्पीयों की दक्षता का श्रेष्ठ उदाहरण है।

अकबरे आईनी :

   मुगल सम्राट अकबर के मंत्री अबुल फज़ल ने भी अकबरे आईनी ने भी लिखा है कि – भोज ने कई मुल्क फतह किए। अपने इंसाफ और सखावत से जमाने को आबाद रखा और अक्लमंदी के पाये को बढ़ाया। उनकी वीरता को समर्पित उक्ति “कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली” आज तक मशहूर है।

भोज परंपरा :

 वे बड़े दयालु, विद्यानुरागी व दानशील थे। विद्वानों का विशेष ध्‍यान रखते हुए समुचित दान देते थे। उनकी इस उदारता पर एक बार उनके मंत्री को बड़ी चिंता हुई कि इस तरह तो राजकोष खाली हो जाएगा और आर्थिक संकट का सामना करना पड़ेगा। अतः राजा के हाथों को रोका जाना आवश्‍यक है, लेकिन स्‍पष्‍ट रूप से कुछ न कह पाने के अभाव में उसने राजसभा के प्रवेश द्वार पर लिख दिया-

- “आपदर्थे धने रक्षेत” अर्थात - मुसीबत के समय के लिये धन बचाकर रखना चाहिए। 

- सभा में प्रवेश करते समय जब राजा भोज की दृष्टि इस वाक्‍य पर पड़ी। उन्‍होंने उसके नीचे दूसरा वाक्‍य लिख दिया - “भाग्‍य भाजः क्‍वचा पदः” अर्थात् - भाग्‍यवानों को मुसीबत कैसी। 

- मंत्री ने उस वाक्‍य को पढ़ा और चुपचाप उसके नीचे फिर तीसरा वाक्‍य लिख दिया – “देवंहे कुप्‍यते क्‍वापि” अर्थात -कभी- कभी भाग्‍य भी अप्रसन्‍न हो जाता है।

- राजा भोज ने दूसरे दिन सभा में प्रवेश के दौरान इसे भी पढ़ा और एक वाक्‍य फिर से लिख दिया - संचि तोपि विनश्‍यति अर्थात  भाग्‍य के अप्रसन्‍न होने पर संग्रह किया हुआ धन भी नष्‍ट हो जाता है।

रोचक प्रसंग (1) :

  भोज निर्धन विद्वानों को बहुत दान देकर उनकी दरिद्रता दूर करते थे। एक बार वे जाड़े की रात में वेश बदलकर नगर में घूम रहे थे। एक जगह उन्‍होंने देखा कि एक गरीब व्‍यक्ति स्‍वयं की दयनीय दशा पर एक कविता बोल रहा था–

 “मैं बड़ी कठिनाई से जाड़ा सह पा रहा हूँ। माघ मास के ठंड जल की भांति चिंतारूपी समुद्र में मैं डूबा हुआ हूँ। बुझी आग को भी फूंकते समय मेरे होंठ थर थर कांप रहे हैं। भूख से पेट सूख गया है। अपमानित पत्‍नी के तरह नींद मुझसे रूठ कर दूर जा चुकी है। किसी सुपात्र को दिये धन की भांति यह ठंडी रात कभी समाप्‍त होना नहीं चाहती”।

भोज ने चुपचाप उसकी करुणा कहानी सुनी और प्रातः काल उसे दरबार में बुलावा भेजा तथा ब्राम्हण के आने पर उससे पूछा कि जाड़े की रात में तुमने समय कैसे काटा।

ब्राह्मण ने कविता में ही उत्‍तर दिया कि - महाराज जानु, भानु और कृशानु की सहायता से मैंने समय काटा अर्थात - रात को जानु यानी घुटनों को छाती से सटाकर, दिन को भानु यानी सूर्य की धूप में बैठकर और सुबह शाम कृशानु अर्थात आग तापकर।

कहना न होगा राजा ने उसे उसी समय राज्‍या‍श्रय प्रदान कर दिया। 

रोचक प्रसंग (2) :

 राजा भोज की सभा में मंत्री, विद्वान, लेखक इतने अधिक ठहरते थे कि नये व्‍यक्ति का सभा प्रवेश कठिन था। कहते हैं उनकी दानशीलता की कहानी सुनकर प्रसिद्ध कवि शेखर भी धार पधारे, लेकिन प्रवेश पाने की असफल रहे।

  सो एक दिन जब भोज हाथी पर बैठकर नगर भ्रमण पर थे। उन्‍हें देखते ही शेखर ने जमीन पर पड़े अनाज के दानों को चुनना आरंभ कर दिया। भोज ने उसे भिखारी समझते हुए तिरस्‍कार भरे स्‍वर में कहा- जो आदमी अपना पेट नहीं भर सकता, उसका पृथ्‍वी पर जन्‍म लेने से क्‍या लाभ।

राजा के इस तीखे व्‍यंग्य को सुनकर शेखर ने कहा- पृथ्‍वी माता तू भीख माँगकर पेट भरने वाले पुत्र को उत्‍पन्‍न ही न कर।

  अब राजा को यह समझते देर न लगी कि यह दरिद्र भिखमंगा वास्‍तव में वैसा नहीं है और तब उन्‍होंने उससे परिचय पूछा। भिखम‌ंगे ने उत्‍तर दिया –महाराजा मैं कवि शेखर हूँ। आपके दर्शनार्थ धार नगरी आया था, किन्‍तु दरबारीजन के कारण मेरा प्रवेश नहीं हो पाया; इसलिए मुझे यह रास्‍ता अपनाना पड़ा।

 राजा ने प्रसन्‍न होकर शेखर को सभासद बनाकर सभा में स्‍थायी रूप से रख लिया।

रोचक प्रसंग (3) :

उस दौर में आखेट या शिकार की परंपरा थी। उनके दरबार में धनपाल नामक जैन कवि बड़ा ही हाजिर जवाब एवं बुद्धिमान था। वह राजा को अहिंसा के पथ पर ले जाना चाहता था। एक बार भोज शिकार के लिये वन में गए। धनपाल भी साथ था।

भोज ने उससे अचानक पूछ लिया- धनपाल क्‍या कारण है कि हिरण तो आसमान की ओर कूदते हैं और सूअर जमीन खोदते हैं।

धनपाल ने चतुराई से उत्तर दिया -महाराज आपके तीर से घबराकर हिरण तो चंद्रमा की गोद में बैठे अपने जाति के मृग की शरण में जाते हैं और सूअर जाना चाहते हैं पृथ्‍वी को उठानेवाले बराह रूप धारी विष्‍णु की शरण में।

 फिर भी राजा पर कोई असर नहीं हुआ। उसने हिरण पर एक तीर चलाया। हिरण घायल होकर तड़पने लगा। राजा ने उस दृश्‍य का वर्णन करने के लिए धनपाल से कहा।

धनपाल ने तुरंत ही श्‍लोक बोला, जिसका अर्थ था – सर्वनाश हो तुम्‍हारी इस वीरता का, जिसमें जरा भी दया नहीं। यह अन्‍याय है। दुःख की बात है कि कोई किसी को पूछने वाला नहीं। इसी से बलवान दुर्बलों को मारते हैं।

 कहा जाता है इस पर भोज को बहुत क्रोध आया और उन्‍होंने धनपाल की ओर देखा। इस पर धनपाल ने फिर कहा- महाराज मरता हुआ मनुष्य भी मुख में तिनका अर्थात घास रख ले, तो उसे छोड़ दिया जाता है; मगर  पशु तो हमेशा तिनका ही खाते हैं। फिर भी मारे जाते हैं।

 इस बात का राजा भोज पर गहन प्रभाव हुआ। उन्‍होंने उसी क्षण से शिकार करना छोड़ दिया।

 ऐसे अनेक कथानकों से भोज की जीवनगाथा भरी पड़ी है। राजसत्ता के लिये वे आदर्श थे। मूर्ति लगाकर हमने उनके भौतिक स्‍वरूप को जीवंत किया है, लेकिन उससे अधिक आवश्‍यकता इस बात कि है कि उनके विचार व आचरण का अनुपालन करते हुए हमारे आज के जन नेता सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के प्रयोजन में पूरे मन, वचन और कर्म से सम्मिलित हों। ■■

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,
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स्मरणः आलोचना की अनूठी भंगिमा - डॉ.राजेन्द्र मिश्र

- विनोद साव

एक वृहद् व्यक्तित्व 

राजेन्द्र मिश्र का जन्म 17 सितंबर 1937 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के अर्जुंदा में हुआ था। आपने नागपुर विश्वविद्यालय के मॉरेस कॉलेज से स्नातकोत्तर और सागर विश्वविद्यालय से पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की थी। यह वह दौर था जब रायपुर के लोग उच्च शिक्षा के लिए नागपुर या सागर जाया करते थे। मिश्र दोनों ही जगह गए। विद्यार्थी जीवन में ही मिश्र की रुचि साहित्यिक आलोचना के क्षेत्र में हो गई थी। आप लगभग चालीस साल तक हिन्दी के प्राध्यापक रहे।  साहित्य की अपनी गहरी समझ से उन्होंने अपने विद्यार्थियों में भी वही साहित्यिक संस्कार गढ़ा। 1997 में स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वे मध्यप्रदेश शासन द्वारा पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर में स्थापित पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी शोधपीठ के पहले अध्यक्ष बनाए गए। इस विश्वविद्यालय में हिन्दी अध्ययन शाला की शुरुआत भी उन्होंने ही की थी। प्रो. मिश्र ने 'एकत्र' नामक एक संस्था भी बनाई थी, जिनमें समय-समय पर वे हिन्दी के मूर्धन्य विद्वानों को व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया करते थे।

आलोचना के क्षेत्र में उन्होंने अनेक किताबें लिखीं और संपादित की, तो कुछ का संचयन भी किया, जिनमें 'श्रीकांत वर्मा का रचना संसार', 'नई कविता की पहचान', 'छत्तीसगढ़ में मुक्तिबोध', 'केवल एक लालटेन के सहारे' (मुक्तिबोध: एक अन्तर्कथा', 'आधुनिक हिन्दी काव्य', 'गांधी अंग्रेज़ी भूल गया है', 'समकालीन कविताः सार्थकता और समझ' और 'हद बेहद के बीच', 'नई कविता की पहचान', 'श्यामा-स्वप्न', 'श्रीकांत वर्मा-चयनिका', 'अभिज्ञा- तिमिर में झरता समय' आदि उल्लेखनीय हैं। वे अक्षर-पर्व रचना वार्षिकी के तीन अंकों के अतिथि संपादक भी रहे। वे अज्ञेय, निर्मल वर्मा, और विनोद कुमार शुक्ल जैसे रचनाकारों के आत्मीय थे। उन्हें मुक्तिबोध सम्मान, बख्शी सम्मान, महाकौशल कला परिषद सम्मान से भी नवाजा गया था। 

सोरिद नगर, धमतरी में व्यंग्यकार त्रिभुवन पाण्डेय से मिलने गया तब वे अपने शासकीय महाविद्यालय में थे। पाण्डेय जी कहते हैं कि ‘चलो हमारे प्राचार्य महोदय से मिलते हैं।’  कक्ष के बाहर नाम की तख्ती थी ‘डॉ.राजेन्द्र मिश्र, प्राचार्य’।  भीतर क्रीम कोट में गरिमामय व्यक्तित्व दिखे। त्रिभुवन जी जैसी कि उनकी  खास अदा थी जिसमें वे झुककर भद्रता के साथ परिचय कराते थे ‘सर, ये हमारे युवा व्यंग्यकार मित्र हैं, दुर्ग से आए हैं।’ तब मिश्र जी ने मुझे अनजानेपन से देखा और मैंने भी। हम एक ठण्डेपन के साथ बाहर हुए, तो फिर एक युवा व्याख्याता से परिचय करवाया गया। वे जयप्रकाश थे। तब से लेकर आज पर्यंत डॉ. राजेन्द्र मिश्र और जयप्रकाश अंतरंग रहे हैं। मिश्र जी जयप्रकाश की गंभीर आलोचना दृष्टि से प्रभावित रहे।

 तब मैं, युवा और वरिष्ठ इन दोनों आलोचकों से इसलिए अभिज्ञ नहीं था कि १९९३ में मेरा फकत एक व्यंग्य संग्रह आया था। और तत्कालीन आलोचना व आलोचकों की कोई भनक मुझे नहीं थी। तब से आज तक मिश्र जी से कई मुलाकातें होती रहीं। मैं उनकी भंगिमाओं से प्रभावित भी हुआ; पर यह कभी नहीं लगा कि समकालीन हिन्दी साहित्य में व्यंग्य को लेकर उनकी कोई धारणा रही होगी। जयप्रकाश प्रगतिशील आलोचक हैं; इसलिए परसाई की परम्परा के पैरोकार रहे और व्यंग्य के पक्षधर तो शायद नहीं हैं; पर व्यंग्य पर अधिकारपूर्वक बातें वे कर लेते हैं। अब वे हमारे दुर्ग के शासकीय महाविद्यालय में आ गए हैं।

 मिश्र जी से मिलने से लगता था कि वे अज्ञेय की परंपरा के कायल हैं। एक बार रायपुर एक मित्र की बेटी के वैवाहिक कार्यक्रम में जाते हुए उनके घर के पास से निकला, तब उनसे मिलने का सुयोग बना था। वे आत्मीयता से मिले और उन्होंने मुझे खजूर के गुड़ से पागे गए नारियल के लड्डू खिलाए, जो उनके कलकत्ता के किसी प्रेमीजन ने भिजवाए थे। मिश्र जी का एक आलेख ‘कलकत्ता का अनुवाद नहीं हो सकता’ शीर्षक से भी है जिसमें उन्होंने कलकत्ता की सेंट्रल लाइब्रेरी में जाकर कलकत्ता के पठन- पाठन व पुस्तक संस्कृति को सिलसिलेवार ढंग से स्मरण किया था। एक बार रायपुर साहित्य महोत्सव में भोजन के समय उनके मित्रों के साथ हम सब साथ थे। जिसमें निरंजन महावर, विनोदकुमार शुक्ल, डॉ. राजेन्द्र मिश्र के साथ मैं और अशोक सिंघई भी बैठे हुए थे।

 घर में डॉ. मिश्र धीमे- धीमे अज्ञेय और उनकी यायावरी और उनकी स्मृति परंपरा पर विस्तार से बातें करते रहे। मैंने उन्हें बताया कि अज्ञेय के पत्रों का एक संकलन है, जिसमें उनका लिखा एक पत्र आपके नाम भी है। यह सुनकर उन्हें अच्छा लगा। कनक तिवारी ने अपने राजनीतिक कार्यकाल में जिन दो सृजन पीठों की स्थापना करवाई थी, उनमें से एक भिलाई में बख्शी सृजन पीठ में प्रमोद वर्मा अध्यक्ष हुए थे और बख्शी शोध पीठ में डॉ. राजेन्द्र मिश्र अध्यक्ष मनोनीत हुए थे। प्रमोदजी को आलोचना जगत में मार्क्सवादी आलोचक भी माना जाता है। वे मुक्तिबोध और परसाई के मित्र रहे हैं। राजेंद्र जी ने अज्ञेय और विनोदकुमार शुक्ल का सान्निध्य ज्यादा पसंद किया। इन दोनों अध्यक्षों की आलोचना दृष्टि में भेद होने के बावजूद बौद्धिक धरातल पर ये दोनों अज्ञेय को गुरु मानते रहे हैं।

 यह अज्ञेय का ही प्रभाव रहा कि राजेन्द्र मिश्र की मित्र मंडली में निर्मल वर्मा, अशोक वाजपेयी और विनोद कुमार शुक्ल रहे। निर्मल वर्मा को अज्ञेय के बाद स्मृति परम्परा का महत्त्वपूर्ण लेखक माना जाता है। अशोक वाजपेयी तो अज्ञेय पर मुग्ध रहे ही रहे। यह यदा कदा उनके वक्तव्यों से प्रमाणित होता रहा है। एक बार मिश्र जी ने दबे स्वर में यह भी कहा दिया था कि ‘गद्य और पद्य दोनों में एक साथ विपुल लेखन में अज्ञेय के बाद दूसरा नाम विनोद कुमार शुक्ल का है।’

 बख्शी शोध पीठ के आयोजन में उन्होंने निर्मल वर्मा को बुलाकर बहुत उम्दा व्याख्यान करवाया था। तब अपने अंतिम समय से कुछ पहले रायपुर पहुँचे यायावर कथाकार निर्मल वर्मा ने अपनी स्वप्निल आँखों से झरते उद्बोधन में कहा था कि “जब धर्म और राजनीति अपने रचनात्मक अभिप्राय से चूक जाते हैं तब साहित्य की अकेली आवाज होती है।” उनका आशय था कि यह साहित्य ही है जो मनुष्य को जोड़ने और देश के हर अलगाव वाद के खिलाफ आवाज उठाने में निरन्तर जुटा हुआ है।

 निर्मल वर्मा के इस भावप्रवण व्याख्यान के बाद प्रश्नोत्तर सत्र में पहला प्रश्न मैंने पूछा जिसका निर्मल जी ने जवाब दिया था। घर में जब मिश्र जी ने अपने द्वारा सम्पादित ‘एकत्र’ का अंक दिया तब वह निर्मल वर्मा पर विशेष अंक था जिसमें मेरा प्रश्न और निर्मल जी के जवाब दोनों शामिल थे। मुझे दी गई एक पुस्तिका के मुखपृष्ठ पर निर्मल वर्मा की एक पंक्ति है “मैं पहले भी यहाँ आया हूँ।” रायपुर में निर्मल जी का यह दूसरा छत्तीसगढ़ प्रवास था। इसके पहले वे बस्तर आए हुए थे।

 एक बार ‘अक्षरपर्व’ में प्रकाशित मेरे यात्रावृत्तांत ‘नहाती, नहलाती, सह्याद्र’ को पढ़कर राजेन्द्र मिश्र जी का सवेरे-सवेरे ही फोन आ गया था। संभवतः उस रचना को पढ़कर या उसके शीर्षक में भी अज्ञेय की यायावरी जैसी कोई गूँज उन्हें सुनाई दी होगी। पर मैं जानता हूँ कि मुझमें अज्ञेय की किसी भी परंपरा का तनिक भी अनुशीलन नहीं है। बल्कि असहमतियों के पुंज अज्ञेय को लेकर पीढ़ी का अंतराल होते हुए भी अनेक लोगों के बीच उनसे मेरी भी असहमतियाँ रही हैं और मेरे संग्रह का पहला लम्बा 

आलोचनात्मक आलेख उन पर केन्द्रित है जिसका शीर्षक है ‘साहित्य के हैंगिंग गार्डन में टैगोर, जैनेन्द्र, अज्ञेय और अशोक वाजपेयी।’

 आलोचना के एक वृहद् व्यक्तिव डॉ. राजेंद्र मिश्र का गत वर्ष चले जाना हिन्दी आलोचना की एक भंगिमा विशेष का जाना है। उनका यह अवसान हमारे आसपास आलोचना जगत में वैसी ही बड़ी क्षति है जैसी क्षति प्रमोद वर्मा के अवसान पर हुई थी।

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सम्पर्कः मुक्तनगर, दुर्ग छत्तीसगढ़ 491001,  ई-मेल: vinod.sao1955@gmail.com, मो. 9009884014


कविताः मरुस्थल सरीखी आँखों में

 - अनीता सैनी ‘दीप्ति’

उसने कहा-

मरुस्थल सरीखी आँखों में

मृगमरीचिका-सा भ्रमजाल होता है,

क्योंकि बहुत पहले

मरुस्थल, मरुस्थल नहीं थे,

वहाँ भी पानी के दरिया,

जंगल हुआ करते थे

गिलहरियाँ ही नहीं उसमें

गौरैया के भी नीड़ हुआ करते थे

हवा के रुख़ ने

मरुस्थल बना दिया


अब

कुछ पल टहलने आए बादल

कुलाँचें भरते हैं

अबोध छौने की तरह

पढ़ते हैं मरुस्थल को

बादलों को पढ़ना आता है

जैसे विरहिणी पढ़ती है

उम्रभर एक ही प्रेम-पत्र बार-बार


वैसे ही

पढ़ा जाता है मरुस्थल को

मरुस्थल होना

नदी होने जितना सरल नहीं होता

सहज नहीं होता इंतज़ार में आँखें टाँकना

इच्छाओं के

एक-एक पत्ते को झरते देखना;

बंजरपन किसी को नहीं सुहाता

मरुस्थल को भी नहीं

वहाँ दरारें होती हैं

एक नदी के विलुप्त होने की।


व्यंग्यः ऐसी बानी बोलिए, जमकर झगड़ा होय

  - बी. एल. आच्छा

चुनावी सभा में खाली कुर्सियाँ देखकर उम्मीदवार जी दुखी हो गये। हथेली में दूसरे हाथ की मुट्ठी ठोकते हुए कहे जा रहे थे-"क्या करूँ ? कैसे भीड़ बटोरूँ?" उदास चेहरे और एकान्त को देखकर पेड़ से लटका बेताल उनकी लोकतंत्रिया पीठ पर आकर चिपक गया। उम्मीदवार जी भौंचक । मुस्कुराते  हुए बेताल बोला -"तुम्हारे उदास चेहरे को देखकर मन भर आया। मैं तुमसे न सवाल पूछूँगा, न सिर काटने की शर्त । इस बार सवाल तुम करो, उत्तर मै दूँगा।"     

 उम्मीदवार ने पूछा - "ऐसा क्या बोलूं कि वोटर मेरा कायल हो जाए !" बेताल ने कहा-" अरे यह तो पहले से ही कहा हुआ है- ऐसी बिनी बोलिए मन का आपा खोय, औरन को सीतल करे आपहुँ सीतल होय।"

 उम्मीदवार जी को खुन्नाट हुई। बोले-  इतनी ठंडी बानी से तो वोटर की उँगली पर बर्फ ही जम जाएगी। ठंडी फिल्म, ठंडे बोल । बॉक्स ऑफिस और बेलट बॉक्स दोनों जम जाएँगे। अगरचे वोटर शीतल हुआ तो अपुन तो माइनस टेंपरेचर में।" बेताल ने कहा-" समझदार हो गये हो। जमाने की रंगत में पगे हुए। इस जमाने के शब्दों की टकसाल में उल्टा-पुल्टा, गड्डमगड्डा लट्ठमलठ्ठा ही बजते हैं। तो सुनो, इस शीतल वाणी को  प्रेशर कूकर या माइक्रोवेव डाल दो - " ऐसी बानी बोलिए जमकर झगड़ा होय ।"

 उम्मीदवार की बाँछें खिल गयी । बोला 'मन तो मेरा भी होता है कि अपनी जबान निकालकर सिर पर लगा दूँ।" बेताल ने कहा-'अरे तुम तो शब्दों को ऐसा फेंको जैसे भाड़ में सिककर चना फटकर उछल जाता है। फिर  बोलकर चुप कर जाओ । काँव -काँव  चलती रहेगी। चल छैंया छैंया की तरह चल चैन लिया- चैन लिया फर्राटे भरते हुए। अखबार- अखबार सुर्ख़ियाँ बन जाएँगी। "

"मगर कभी ये आड़े- तिरछे शब्द पत्थर की तरह मुझ पर आने लगे, तो  नोटिस आने लगे तो ?" उम्मीदवार ने कहा। बेताल बोला- औरों को गर्माते अपने को गर्म करो।  अभिव्यक्ति की आजादी में अपने रंग भरो ।फिर भी कुछ रह जाए तो माफी दर्ज करो।" उम्मीदवार ने कहा "वाह बेताल ! कितनी माकूल सलाह । इन दिनों विडियो, ऑडियो, म्यूजिक और नारे भी जबरदस्त-चलन में हैं। क्या करूँ ?" बेताल बोला- हाँ, जमाने को समझो। तुम्हारी जबान से बड़ी ऑनलाइन जबान है। एक बार जबान हिला दो, फिर वह लॉरी में लगे माइक ही तरह बोलती- दिखती रहेगी। तुम भी गाने बनवाओ-" का.. बा.. ।" उत्तर में " का.. का... बा"। दर्जनों विडियो चलवाओ। फिर भी न बने तो राग मुफ्तिया को सप्तम सुर में बजवाओ।"

  उम्मीदवार ने पूछा-"ये राग मुफ्तिया क्या है?" बेताल हँस पड़ा।बोला- "एजेण्डा बनाओ, जो मुफ्त में दिया जा सकता है। फिर देखो, मुफ्त लाइनिया होइ। अब उनको  मिसाइल- सुपर मिसाइल मत गिनाओ। न गलवान घाटी।  शब्दोस मिसाइल से ही इतना धुआँ फैल जाए कि सामने वाला धुआँ- धुआँ हो जाए। शब्दवेधी बाण तन्नाट।गीतों की कजरिया वोट की लय साधने लगे।नारे खनकने लगें।तुम तो पूँछ पर पैर रख दो। बैठे हुए जबानी घोड़े दौड़ने लगेंगे। छुकछुकिया जबानों की बकरोली खुदबखुद पस्त हो जाएगी।" बेताल ने फिर कहा-"अभी इतना ही। लोकतंत्र का नया चेहरा आएगा,तो नए पाठ समझने आ जाना।" और बेताल फिर डाल पर लटक गया।

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सम्पर्कः नॉर्थटाऊन अपार्टमेंट, फ्लैटनं- 701 टॉवर- 27, स्टीफेंशन रोड (बिन्नी मिल्स), पेरंबूर, चेन्नई (तमिलनाडु) पिन-600012


कहानीः मेरी बगिया

  - निर्देश निधि

आज बड़े ही दिनो बाद तुम्हें पत्र लिख रही हूँ आली,  शायद पिछले बरस इन्हीं दिनों लिखा होगा तब जब देहरी पर बसंत की दस्तक हुई होगी, इस कोकिला का गाना शुरू हुआ होगा और इसने समय से पूर्व ही मुझे जगा दिया होगा। और तुम बरबस मुझे याद आ गए होगे । कैसा विचित्र है तुमसे ये रिश्ता मैं समझ पाने में सर्वथा असमर्थ ही रहूँगी । मेरा कोई सुख तुमसे बताए बगैर पूर्णता नहीं ले पाता और  मेरा कोई दुःख तुम तक पहुंचे बगैर हल्का नहीं हो पाता आली । और तुम कैसे मेरे सारे  सुखों - दुखों को अपना सा अनुभव कर मुझे अपनेपन की अबूझ डोर से बाँध लेते हो। बताओ न आली तुम ऐसा कैसे कर पाते हो ? कहते हैं किसी स्त्री का साथ देने में पुरुष के कुछ विशेष स्वार्थ होते हैं । मैं तुम्हारा कौन सा स्वार्थ पूर्ण कर सकती हूँ आली तब जबकि मैं और तुम उस एक बार के बाद कभी मिले ही नहीं । याद तो तुम्हें भी ज़रूर ही होगी वो मुलाक़ात जब मैं  पहली बार तीव्रगामी शताब्दी से सफर करने निकली थी लखनऊ, अपनी पहली पोस्टिंग जॉइन करने के लिए और मुझे अपना कोच, अपनी सीट कुछ भी तो खोजना नहीं आता था । तुमने बिना मांगे ही मेरी मदद की थी । तुम जैसे मेरे  एक कस्बे की लड़की होने और मेरे घबराहट भरे हाव-भाव को पूरी तरह पढ़ गए थे । कैसा आत्मीय चेहरा लगा  था मुझे तुम्हारा कि इस समाज की भयानक चालबाजियों से पूर्णतः परिचित होने के बावजूद  बिना किसी संशय के तुम्हारे पीछे चल पड़ी थी मैं । और तुमने मुझे मेरी सीट तक लाकर छोड़ ही नहीं दिया था बल्कि मेरे साथ वाली सीट के यात्री से विनती कर अपनी सीट भी बदलकर मेरे पास वाली सीट ले ली थी । और तुम्हारे पूछे बगैर ही कैसे बताना शुरू कर दिया था मैंने कि भैया का अपना इंटरव्यू आन पड़ा था दिल्ली में ऐन उसी दिन जिस दिन मुझे जॉइन करना था लखनऊ में, जिस वजह से मुझे अकेले आना पड़ा, बचपन में पापा की पोस्टिंग कहाँ - कहाँ रही और हमारी पढ़ाई उनके आए दिन होने वाले स्थानांतरण से कैसे – कैसे प्रभावित हुई और  माँ हमें लेकर हमारे छोटे से कस्बे में रहने लगीं , कैसे छोटे भैया से बात - बात में मेरी टशल चलती, बड़ी जीजी को कॉलेज जाने की आज़ादी नहीं मिली, जब मैं देर रात तक जाग – जाग कर पढ़ती तो माँ कैसे सुबह मेरे  देर तक सोने के जतन करतीं  और भी न जाने क्या – क्या बता डाला था मैंने उन चार पाँच घंटों में ही तुम्हें और तुम ऐसे सुनने लगे थे जैसे उस वक्त सबसे ज़रूरी तुम्हारे लिए वही सुनना था । उसी दिन से शुरू हुआ था सिलसिला मेरे सुखों और दुखों का तुम तक पहुँचने का । पर आली आज मैं न तो तुम्हें अपने किसी सुख- सपन में ले जा रही हूँ और न कोई दुःख सुनाकर तुम्हारी उदारता को उदासी में डुबो रही हूँ । आज न तुम सुनो, मेरी बगिया का मेरे घर के लोगों के व्यवहार में विलय ।

देखो ना आली आज फिर इस कोकिला की बच्ची ने मुझे सुबह – सुबह  पाँच बजने से भी पहले ही जगा दिया है और हमेशा की तरह सुबह उठकर मुझे तुम याद आ गए । पता है आली ये कोकिला ना माँ के बिल्कुल उलट है । जब मैं पढ़ाई कर, थक कर देर से सोती माँ दिन निकलने से पहले ही मेरे कमरे में दबे पाँव आतीं और धीरे से पर्दे सरकातीं कि कहीं से भी उसूल का पक्का और निर्दयता तक समय का पाबंद सूरज अपनी कोई मरियल सी किरण भी ना फेंक पाये मुझ तक । पर ये कोकिला है ना आली  हमेशा जामुन के पेड़ के घने छत्ते में दुबक कर बैठती है और कुहु - कुहु - कुहु - कुहु । एक ही बात कहते - कहते थकती भी तो नहीं, मैं कितनी भी देर से क्यों न सोई होऊँ उसकी इस मीठी मनुहार पर बिस्तर छोड़कर लॉन में आए बगैर रह ही नहीं पाती । इसे नहीं पता आली अगर माँ यहाँ होतीं तो शायद इसे भी उड़ा देने की कोशिश किया करतीं, मेरी नींद पूरी होने देने के लिए । अब भी कुहु - कुहु ? अरे अब तो चुप हो जा अब तो मैं आ गई । पर नहीं, शायद अब वो सूरज को बुला रही है। और देखो न आली वह भी उसका आज्ञाकारी सा आसमान के पूर्वी कोने में गुलाबी रंग लुढ़काकर अपने आगमन की सूचना देने लगा, मान गई मैं तो इसे। इसके लिए क्या सूरज क्या और क्या बसंत जिसे चाहे उसे कान पकड़ कर अपने साथ ले आती है । इस बसंत के झूमते यौवन को देख तो जैसे मदन सब प्राणियों को बोरा देने पर तुल आया हो । शिव मंदिर के घंटों की ध्वनि दूर से आकर कानों से टकरा रही है जैसे बता रही हों कि महादेव हैं न इस कलियुग के बेलगाम बसंत की मादकता पर नकेल कसने के लिए । बसंत के दिनों में तो जब तक ख़ासी धूप न चढ़ आए, तब तक अंदर जाने का तो मन ही नहीं होता ।

मैं डॉक्टर साहब से हमेशा यही कहती हूँ कि बाबू जी कितने दूरदर्शी रहे होंगे ना जो इतने बरसों पहले ही गाँव से आकर शहर में बस गए । उस समय कौड़ियों में उनके द्वारा खरीदी जमीन आज करोड़ों की हो गई है, कितना अच्छा किया था न उन्होंने तुम सब भाइयों के लिए । इतनी बड़ी जगह के कारण ही तो हम इतना लंबा ट्रेक बनवा सके जॉगिंग और वॉकिंग के लिए । ये पेड़ पौधों की घनी कतारें कहाँ हाथ आती हैं आम आदमी के जो हमारे परिसर में हैं ।

घर से निकलते ही जिस जामुन के दर्शन होते हैं उसे बाबूजी ने अपने हाथों से रोपा था । मैंने बाबूजी को कभी देखा तो नहीं, पर सच कहूँ तो इस जामुन के माध्यम से हजारों बार साक्षात्कार हो चुका है उनसे और अब मैं भी उतनी ही परिचित हूँ उनसे जितने उनके बेटे और बेटियाँ। सुबह जल्दी जागने वाले बाबूजी जैसे रोज कहते हैं- सिद्धु बिटिया तू बड़ी रानी है । सब सो रहे हैं बस एक  तू ही जग रही है मेरी सेवा में। इस जामुन के रूप में इतने डेने पसार लिए हैं उन्होने, जैसे कह रहे हों बच्चों मैं हूँ तुम्हारे सिर पर साया आज भी, तुम जियो निश्चिंत होकर । ये जामुन साया ही नहीं फल भी मीठे और बेशुमार देती है। माँ बताती थीं कि  ये अगेती जामुन है जब तक दूसरी जामुनों पर फल आने शुरू ही होते हैं ये उन्हें पकाकर टपाटप बरसाना भी शुरू कर देती है, जैसे बाबूजी अपने बच्चों को सबसे पहले बाँट देना चाहते हैं मीठे – मीठे, मधुर फल । तुम मानते नहीं हो आली पर सच मानना, एक बार बोगनवीलिया इसकी जड़ों से होकर फुनगियों तक जोंक की तरह चिपक गई थी । गुलाबी फूलों की दमक से अलग काँटों की कसक से लहूलुहान हो गई थी जामुन की काया । तभी एक दिन बाबूजी मेरे स्वप्न में आए और कहने लगे सिद्धू बिटिया मुझे दूसरे कपड़े ला दे मेरे पूरे शरीर में कांटे से चुभ रहे हैं, मैं सो नहीं पा रहा हूँ बच्ची । सुबह उठकर न जाने क्यों सबसे पहले मैं जामुन की तरफ ही तो भागी थी । ध्यान से देखा तो उसके कांतिहीन पात त्राहि - त्राहि कर मेरी ओर देख रहे थे जैसे बाबूजी काँटों में लिपटे खड़े थे । मैंने उसी दिन अपने माली चन्दन को बुलाकर जामुन को उन भयानक काँटों से निजात दिलाने की प्रक्रिया आरंभ कर दी थी । कई दिन लगे कई लड़कों ने मिलकर हटाया था बोगनवीलिया को । लड़के भी सारे छिल गए थे पर कितने फल आए थे उस बरस। लॉन की घास भी उनके लगातार टपकने से पीली पड़ गई थी । उसी बरस तो हुआ था शिशु का सलेक्शन भी आई आई टी में। जैसे बाबूजी ने अँजुरियाँ भर- भर निरंतर आशीर्वाद बरसाया था घर पर । तब से तो इस जामुन के सामने से गुजरते समय मेरी ओढ़नी रोज खुद - बख़ुद सिर पर जाने लगी थी ।   

पिछले बरस माँ भी कूच कर गईं बाबू जी का साथ देने के लिए और जामुन की ही तरह अब माँ के रोपे नीम से भी मैं माँगने लगी हूँ आशीर्वाद । और सच कहूँ तो माँ भी जरा कंजूसी नहीं करतीं उसे देने में । कितनी समानता है माँ और नीम में जैसे नीम की कड़वी - कड़वी पत्तियाँ और उसके कड़वे फल, पर कोई खाए तो उसके शरीर के सब विकार खत्म । ऐसी ही थीं माँ की बातें भी कड़वी लगने वाली, पर मीठा फल देने वाली । उनकी बातों का भी कोई मर्म समझ जाए तो जीवन सुधर जाये । मैं बच्चों और डॉक्टर साहब से रोज यही कहती हूँ । वे बताते हैं कि बाबूजी अपने पेड़ पौधों को रोज संगीत सुनवाते थे । सुबह ही हाथ में ट्रांज़िस्टर लेते और पहुँच जाते लॉन में और गर्मियों की छुट्टियों में सारे बच्चों को भी बुला लेते, घास निकलवाते, निराई करवाते उसके बदले सबको चवन्नी देते । वे भी पेशे से डॉक्टर थे। कई बार तो माली की अनुपस्थिति में तहमद ऊपर पलटकर क्यारियों में इस तरह जुटे रहते कि रोगी उन्हीं से पूछ बैठता, “माली भैया डॉक्टर साब हैं क्या ?” बाबूजी हल्का सा मुसकुराते और थोड़ी देर प्रतीक्षा करने के लिए कहते फिर हाथ मुँह धोकर कपड़े बदलते और दवाखाने आ जाते, न रोगी उनपर माली होने का शक कर पाता, ना वो खुद कुछ बताते।

जेठ जी भारतीय सेना में थे, उन्हें भी तो मैंने कभी नहीं देखा, हाँ इतना जरूर पता है की वो थे बेहद सज्जन, सुंदर, हट्टे – कट्टे, उदारमना और अपने छोटे बहन - भाइयों के साथ - साथ अपने परिवार सहित अपने समाज और अपने देश तक को बेहद प्यार करने वाले। कहते हैं कि उनकी मृत्यु के लगभग छह माह पूर्व से उनके  लगाए दो पाम में से एक सूखना शुरू हो गया था तब किसी ने नहीं सोचा था क्या अनहोनी होने जा रही थी । नहीं पता था कि बार्डर पर पड़ोसी सेना इस तरह घुसपैठ करेगी कि अकस्मात हमारा घर अपनी सबसे बड़ी संतान खो बैठेगा, कहते हैं कि वो हारे नहीं थे उन्होंने दुश्मन की पूरी चौकी उड़ा दी थी । पर हाँ एक पाम पूरी तरह सूख गया था, फिर भी ये बचा हुआ पाम उनकी याद दिलाने के लिए पर्याप्त है । सुबह - सुबह इसके पास से गुजरना हेंडसम जेठ जी का आशीर्वाद लेने से कम तो नहीं । जैसे सतर खड़े हों वो अद्यतन देश की सीमा पर मुस्तैद और हम नगर बाशिंदों को कोई डर पालने की जरूरत ही न हो । इस लंबे - तड़ंगे पाम की काया पर बने घेरे जैसे जेठ जी को वीरता के लिए मिले अनेक तमगे हो । शायद जानते थे जल्दी जाना है इसी लिए विवाह में इतनी आनाकानी करते रहे । उस बार बाबूजी ने लगभग तय ही कर दिया था पर, उस बार तो आनाकानी करने के लिए भी जीते - जागते वापस नहीं लौटे । कहते थे कि मैं अपने भाइयों के लिए काजू बादाम कि बोरियाँ डलवा दिया करूँगा माँ, तुम देखना तो । कैसी मन से इच्छा की कि समय से पहले ही मरकर भी तमाम मुआवजे दिला गए घर को । माँ ने किसी से बिना पूछे कहे डॉक्टर साहब और देवर जी के लिए तमाम सारे मेवे मँगा दिए थे और जीवित बचे पाम की बड़ी- बड़ी पत्तियों का रंग कुछ गहरा सा गया था । उस बार नई पत्तियाँ समय से कुछ पहले ही फूट पड़ीं थीं उस पर । आज तक भी जेठ जी के बारे में जो भी बात करता है बस उनकी प्रशंसा ही करता रह जाता है । यहाँ तक कि रिश्ते नाते वाले, आस पड़ोसी, रिक्शे वाले, जूते वाले सब । पिछले बरस तब जबकि उन्हें शहीद हुए कम से कम अड़तीस बरस हो गए मैं जूते खरीदने गई तो दुकानदार भाई साहब का जिक्र करके आँखों में आँसू ले आया । छोटे शहर की वजह से सब आपस में एक - दूसरे को जानते हैं और अभी तो महानगरों की एक - दूसरे को ना पहचानने वाली महामारी से थोड़े - बहुत बचे रह गए हैं। उस दिन मैं भाई साहब के व्यक्तित्व की जादूगरी मान गई थी । सेना में देर से गए थे न; इसलिए अपने शहर के लोगों के दिलों में भी खूब रच बस कर गए। कहते हैं आत्मा कभी मरती नहीं सिर्फ शरीर बदलती है । हो न हो भाई साहब ने इस पाम को ही अपना नया शरीर चुना हो।

डॉक्टर साहब भी पेड़ों के घने शौकीन हैं, किसी बच्चे का जन्मदिन हो या मेरा, पौधों का उपहार देना कभी नहीं भूलते । मेरे तीस बसंत पार कर लेने पर तीसा खीसा की निर्मम कहावत को सिरे से खारिज कर देने के लिए इन्होंने मेरा वह जन्मदिन कुछ विशेष ही रोमांटिक होकर मुझे हरसिंगार भेंट करके उत्सव की तरह मनाया था, मेरा सुगंधियों से प्रेम अच्छी तरह जानते हैं ना । अब इस हारसिंगार की छतरी घनी पत्तियों और उनसे भी अधिक लदे और महकते फूलों से ऐसी झूमती है कि ये तो इसे देखकर फूले नहीं समाते हैं। खुद की तरह ही है ना, दिन भर काम में मशगूल अपने मरीजों की सेवा में जुटे जैसे घर में किसी को जानते ही ना हो, कोई अपनी महक ही न हो परंतु रात के आते ही काम से अवकाश और सुबह तक का सारा समय पूरी हंसी - खुशी के साथ परिवार का। ऐसा ही ये हरसिंगार है, दिन भर खड़ा रहेगा चुपचाप एक - एक कली को बंद कर खरखरे पत्तों में समेटे, साँझ होते ही ऐसी सुगंधियाँ बिखेरगा की सँभालो खुद को मदहोश होने से । और कहीं इसके नीचे खड़े हो गए तो प्रेमी बन ऐसी झड़ी लगाएगा जोगिया डंडी वाले सफ़ेद फूलों की कि मन मोहित हुए बगैर रह ही ना पाए । डंडी भी जोगिया यूँ रख ली होंगी कि कहीं खड़े होने वाला अपनी पूरी सुधबुध ही ना खो दे । खूब सोच समझ कर दिया था इन्होंने मुझे उस समय ये उपहार, हरसिंगार की ख़ुशबुओं में लिपटी मैं और मुझसे समाया इनका अनंत प्रेम, सचमुच ही बेजोड़ ।

और मेरे स्टाइलिश देवर जी का रोपा हुआ ये खूबसूरत अरिकेरिया लॉन के सारे पौधों मे न्यारा ही दिखाई देता है जैसे उनके करीने से काढ़े हुए बाल और सजा - संवारा व्यक्तित्व । चारों तरफ फैली उसकी शाखाएँ, उन पर नन्ही - नन्ही कुछ नरम से काँटों वाली एक - एक पत्ती सजी – सँवरी जैसे अपनी राजसी शान के साथ खड़े हों स्वयं देवर जी । और ननद जी का रोपा हुआ ये लाल गुलाब , वाह इसके तो क्या कहने जैसे वो खुद लिपटी रहतीं सुगंधियों में वैसा ही है उनका ये गुलाब । खुद तो ससुराल चली गईं परंतु अपना प्रतिनिधि छोड़ गईं, इसके रूप में । जैसे खुद मेरी साड़ी का पल्लू पकड़ कर खींच लेती थीं न ठीक ऐसा ही बिगड़ैल है ये भी, जरा सा इसके पास आँचल लहराया नहीं  कि बस उलझा लेगा अपने काँटों में पर न जाने क्यों इसके कांटे भी मुझे काँटे नहीं लगते बल्कि ननद जी का अपने मुलायम हाथों से मेरा आँचल थाम लेना सा लगता है। 

पता है आली मेरे बच्चों ने क्या रोपा है । वे दोनों तो चमन के साथ नर्सरी जाते हैं और जिस पौधे पर फूलों के खिलने का सीजन होता है न उसी को लाकर रोप देते हैं हर बार । प्रतीक्षा का समय ही कहाँ है इन बुलेट ट्रेन से भागते बच्चों के पास । पर ये संतोष का विषय है कि कम से कम रोपते तो हैं । ये नहीं पूछोगे आली कि मैंने वहाँ क्या रोपा ? मैंने लॉन में तो कुछ नहीं रोपा, पर घर के पिछले हिस्से में बीचो - बीच एक गुलमोहर और दोनों बाहरी सिरों पर दो शीशम रोपी हैं। जब - जब गुलमोहर पर बहार आएगी वो नयनाभिराम सौंदर्य से लदा रहेगा ही अन्यथा उसकी घनी छाँव तो घर पर हमेशा बनी ही रहेगी और शीशम उनको तो मैंने धरती माँ को समर्पित किया है उसके स्वास्थ्य का ध्यान रखेंगी वो दोनों ।

तुम्हें याद है आली या तुम भूल गए कि तुम भी तो मुझे कोई पौधा देने वाले थे, वादा किया था तुमने बरसों पहले । बताओ न कब दोगे ? मेरे लॉन में तुम्हारे वाले पौधे की जगह अभी तक रिक्त है आली.........       

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