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Jan 1, 2026

किताबेंः छंद विधान एवं सृजन

 
- डॉ . कविता भट्ट 

पुस्तकः छंद विधान एवं सृजन( रचनात्मक लेखन):रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, अयन प्रकाशन, जे-19/30,राजापुरी, उत्तम नगर नई दिल्ली-110059, प्रथम संस्करण :2022 , पृष्ठ 96, मूल्य 220/-

रचनात्मक लेखन के अंतर्गत रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ कृत ‘छंद विधान एवं सृजन’ पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ। पुस्तक के शीर्षक से ही इसकी विषयवस्तु की ओर ध्यान आकृष्ट हो जाता है। आधुनिक परिदृश्य में छंद पर केन्द्रित पुस्तकों की महती आवश्यकता है। ध्यातव्य है कि काव्य विधा में रत रचनाकार आधुनिक प्रतिस्पर्धा में इतने अधिक दौड़ना चाहते हैं कि छंद पर ध्यान देने या इसे जानने में समय नहीं दे पाते। इसका एक कारण यह भी है कि जो पुस्तकें छंदों को स्पष्ट करती हैं, उनका आकार वृहद् और अध्ययन- क्लिष्ट होने से यथोचित सामग्री और समय के अभाव में रचनाकार उतना अध्ययन नहीं कर पाते। अस्तु, छंदों पर केन्द्रित ऐसी पुस्तक की आवश्यकता थी, जो सहज व बोधगम्य हो। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की उपर्युक्त पुस्तक ऐसा ही एक सफल प्रयास है।

उपर्युक्त पुस्तक में दो अनुभाग हैं- छंद-विधान (प्रवेश) और छंद-विधान (विस्तार) । पहले अनुभाग में छंद की आवश्यकता, आधार, मात्रिक छंद, वर्णिक छंद का तात्पर्य स्पष्ट करते हुए छंद- अभ्यास की आवश्यकता को भी स्पष्ट किया गया है। द्वितीय अनुभाग में कविता को मूलत: छंद रूप बताते हुए शब्द और पद, बलाघात, यति, अंतर्यति, पद-विन्यास, अर्थ-विन्यास, विशिष्ट शब्द प्रयोग, तुकांतता में सावधानी, उच्चारण और मात्रा, मात्राओं की गणना पर विचार, छंद- संरचना और छंद- अभ्यास इत्यादि को विवेचित करते हुए लेखक ने क्षणिका, प्रमुख जापानी काव्य-विधाओं यथा- हाइकु, ताँका, सेदोका और चोका को उदाहरण सहित समझाकर सभी के लिए सुग्राह्य बना दिया। सबसे अच्छी बात यह है कि पुस्तक के अंत में इन जापानी काव्य-विधाओं का अभ्यास-कार्य तथा सन्दर्भ-संकेत इत्यादि को भी प्रस्तुत किया है।

उल्लेखनीय है कि मात्रिक छंद के अन्तर्गत चौपाई, जयकरी, वीर, लावनी, विधाता, ताटंक, दिग्पाल, गीतिका, हरिगीतिका, सरसी, ललित, आँसू, दोधक, तोटक, शृंगारिणी, माधव मालती, दुतविलम्बित, रोला, कुण्डलिया, उल्लाला, छप्पय तथा बरवै छन्दों को सोदाहरण विवेचित किया गया है। वर्णिक छन्द के अन्तर्गत दुर्मिल सवैया, मदिरा सवैया, मत्तगयन्द सवैया, कवित्त, मनहरण, रूप घनाक्षरी, मनोहरण तथा देव घनाक्षरी छन्दों के साथ माहिया, जनक छन्द और त्रिवेणी को भी विवेचित किया गया है।

पुस्तक सारगर्भित, सहज, सरल और बोधगम्य है। यह नए-पुराने साहित्यकारों के साथ ही साहित्यानुरागियों हेतु भी संग्रहणीय तथा पठनीय है। लेखक के मतानुसार- काव्य के लिए सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी है- तुकबन्दी। छन्द की संरचना का ज्ञान प्राप्त करने के बाद यह पहला पड़ाव है। इसे ही रचनाकारों ने छन्दोबद्ध काव्य समझ लिया है। बड़े-बड़े छन्दशास्त्री अन्तर्जाल पर सरसों को न पेरकर खली में से तेल निकालने में लगे हैं। यद्यपि संस्कृत के प्राचीन छन्दवेत्ता से लेकर आधुनिक काल में नारायण दास (जनन्नाथ दास रत्नाकर के पौत्र) तक इसे स्थापित करने के लिए कटिबद्ध रहे हैं।

पुस्तक की भाषा सरल है। सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी इस पुस्तक को पढ़कर छन्दों का अर्थ, परिभाषा, अभिप्राय और अनुप्रयोग इत्यादि समझ सकता है। नए-पुराने रचनाकार इस पुस्तक को पढ़कर छन्दों की रचना कर सकते हैं। साथ ही अन्य को भी सिखा सकते हैं। छन्दों के लिए अनेक वृहद् पुस्तकें ग्रन्थालयों में पड़ी रहती हैं; किन्तु वे सर्वसुलभ और सर्वग्राह्य नहीं हैं। उन पुस्तकों से सीखना कठिन है। इस दृष्टिकोण से यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी और समकालीन परिदृश्य में प्रासंगिक है। प्रत्येक के लिए संग्रहणीय और उपयोगी है। इस प्रकार यह पुस्तक पुस्तकालयों तक भी पहुँचनी अपेक्षित है। साथ ही इस पुस्तक का अन्तर्जालीय संस्करण भी कुछ समय बाद प्रकाशित किया जाना उपयोगी सिद्ध होगा। ऐसी उपयोगी पुस्तक के लिए लेखक बधाई तथा साधुवाद के पात्र हैं।

Oct 1, 2025

कविताः क्या रखा है अब इन बातों में

  -डॉ. कविता भट्ट शैलपुत्री






थी अव्यक्त- सी, कुछ पीड़ाएँ
जीवन- रथ सी कुछ उपमाएँ
गत  जीवन के मौन मुखर हो
प्रायः  मुझे जगाते हैं रातों में
 
माँ! तुम मुझसे क्यों कहती हो-
क्या रखा है अब इन बातों में।
 
जो कुछ अपने थे या सपने थे
जिया विकल क्यों उन्हें पुकारे
निशा का ये जाने कौन प्रहर हो
बालू का घर न टूटे बरसातों में।
 
माँ! तुम मुझसे क्यों कहती हो
क्या रखा है अब इन बातों में।
 
प्रेम से प्रतिक्षण उसे बिठाया
प्यार से सिर भी था सहलाया
पग पखारे, टीका भोग लगाया
फिर क्रूर घड़ी क्यों आघातों में।
 
माँ! तुम मुझसे क्यों कहती हो
क्या रखा है अब इन बातों में।
 
क्यों मुझे निरंतर छेड़ रही हैं
गवाक्षों से ये कुटिल वेदनाएँ
द्वार खड़ी ये मुझे ही पुकारें
प्राण पखेरू भौंरे -से पातों में
 
माँ! तुम मुझसे क्यों कहती हो
क्या रखा है अब इन बातों में ।

Jun 1, 2025

कविताः नशे का अँधेरा भविष्य

  -  डॉ. कविता भट्ट


पहाड़ी गाँव की पगडंडी और

नगर की गली में चलते हुए देखे मैंने-

कुछ टूटी हुई शीशियाँ कुछ बोतलों के ढक्कन

 

गहन चीत्कार कर उठा मेरा मन

दृष्टि में घूम गए लड़खड़ाते हुए किसी के कदम

कुछ टूटी हुई चूड़ियाँ कुछ टूटे हुए कंगन

रक्ताश्रुओं से पूरित मुख

परदों की झलमल में छिपे अविरल दुःख

आह निकली हृदय से थम गई धड़कन

 

सब नशे में आया था घोल वह

पैसा-परिश्रम-सम्मान और अब-

कुछ टूटी हुई शीशियाँ कुछ बोतलों के ढक्कन

 

मिल गया मिट्टी में परिश्रम

रह गए पास उसकी बीवी के अब-

कुछ टूटी हुई चूड़ियाँ कुछ टूटे हुए कंगन

 

हाय रे! प्रकृति तेरा यह छल

मानव द्वारा इतना शोषण मानव का

और कटु सत्य कँटीला और यह निर्मम जीवन

एक नारी की रोती गाथा

स्वेद-छलकता झुका माथा

अथक परिश्रम और विकराल पशु-प्रताड़न

 

कुछ चिल्लाहटें शिशु-सुलभ

भाग्य-कर्म की आँख-मिचौली

रोता-बिलखता हृदय छलकते हुए नयन

 

कपोलों की एक-एक झुर्री

अस्थियों का जर्जर शरीर

दिखावे की मुस्कान जलते हुए अधरों की जलन

 

शिशुओं का एक बड़ा परिवार

भूखा-नंगा, न बिस्तर न माँ-बाप का प्यार

कुछ कूड़े से चुने खिलौने कुछ टूटे हुए बर्तन

 

कह रहे थे एक अनकही कहानी

बोझ लोगों के जीवन का उठाते किशोरों के हाथ कोमल

कुछ होटलों में अस्तित्व खोजते धोते हुए जूठन

 

मिलों में-भट्टियों में नींद से पलकें बोझिल

खानों में मुरझाता भविष्य झिलमिल

कुछ कूड़ा बीनते कुछ बेचते अखबार प्रतिदिन

क्या कहें इसे राष्ट्र का भावी गौरव

या अंधकारमय भविष्य-

कुछ टूटी हुई शीशियाँ कुछ बोतलों के ढक्कन

Feb 1, 2025

कविताः लिखती भी क्या

 - डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'









लिखती भी क्या; पीड़ा, अपमान या प्रतिमान

भाग्य, कर्म, संयोग - वियोग, सपनों का बलिदान।


वही लिखा, जो जीवन ने कहने नहीं दिया

ऐसा अनकहा, जो नैनों ने बहने नहीं दिया।

 

कभी संस्कारों ने सौगंध देकर रोका

भोजपत्र ने संबंधों के अनुबंध पर टोका।

 

रोक लिया किवाड़ के गर्वित आभास ने

हाथ बांधे गरिमा कहलाते कारावास ने।

 

उपस्थिति-अनुपस्थिति, प्रेम, भाव-अभाव

इनका नहीं अब कोई भी विशेष प्रभाव।

 

इन्हें लिखने का भी कोई नहीं अर्थ

व्यामोह, सम्मोहन, संबोधन व्यर्थ।

 

लिखती क्या; छल-प्रपंच,  अनुरक्ति, विरक्ति

साधना, प्रमाद, विषाद, प्रतिपल मुक्ति।

 

हर्ष-स्पर्श मिथ्या अब देह से चेतन मुक्त हुआ

राग-द्वेष तिरोहित मानस अब उन्मुक्त हुआ।

 

जीवन कोई युद्ध नहीं, ऐसा ज्ञान जगा होता

कला है प्रतिबंध नहीं, ऐसा भान हुआ होता।

Sep 1, 2024

कविताः अब विवश शब्द


 - डॉ. कविता भट्ट

जीवन की वर्षा में

पुष्पित-पल्लवित

भीजते, घुलते- धुलते

मेरे शब्द - होने को थे

अक्षरश: रूपांतरित

इक मधुर गीत में;

उसी क्षण आकाश में

चमकी विद्युत-तरंगें

किसी षड्यन्त्र जैसे

प्रबल मारक तंत्र जैसे

वज्रपात हुआ गीत पर

हुआ गीत परिवर्तित

दुःखांतिका कविता में

अब विवश शब्द

वर्षा में खड़े रहने का

साहस नहीं करते।

विलाप, विराग, विछोह..

क्षणभंगुर संसार में

व्याकुल रागिनियाँ

दासियों के जैसे

हाथ बाँधे खड़ी हैं -

यही सोच मानकर

संभवत: यह विधाता का

अंतिम अन्याय हो।

लेकिन अनंतिम दुःख में

कोई भी अन्याय

अंतिम कैसे हो सकता है?

यह प्रश्न पंक्तिबद्ध हो

जिज्ञासाएँ निरंतर पूछ रही हैं?

नियति समझ नहीं पा रही

कि उत्तर क्या दिया जाए?


Jun 1, 2024

कविताः उसकी चुप्पी

  -  डॉ.  कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’






उसकी चुप्पी- 

मेरे भीतर उतर आई हो 

कहीं जैसे; 

करने को आतुर हों 

अनन्त यात्रा 

मेरी आत्मा तक 

उसकी आँखें 

यों देख रही हैं 

एकटक मुझे 

भीतर से भीतर तक 

अभी तो स्पर्श भी न किया

 फिर ये कैसा जादू है।

Oct 1, 2023

कविताः घट -स्थापना

 - डॉ. कविता भट्ट






हे पिता मेरे !

करते हुए आज

घट- स्थापना

स्नेह -जल भरना

घट-भीतर

और अक्षत कुछ

मेरे नाम के

उसमें डाल देना

कुछ जौ बोना

हरियाली के लिए

तरलायित

स्नेह में भिगोकर,

फलेगी पूजा

बिन जप-पूजन

मेरे नाम से

अभिमंत्रित कर

नित्य सींचना

ओ ! मेरे सूत्रधार

गर्भ में बोया

है मुझे तुमने ही

अंकुरित हूँ

अब प्रथम बीज

हूँ शैलपुत्री

बनूँगी सिद्धिदात्री

ध्यान रखना !

नष्ट नहीं हो जाए

गर्भ में अंकुरण !!


May 1, 2023

कविताः चाँद डूब गया

 - डॉ. कविता भट्ट

मुस्काते हुए धीमे से बोला चाँद

अरे झील! तुम बहुत सुंदर हो।

मैं तुमसे अथाह प्यार करता हूँ,

तुम्हें देखना चाहता हूँ जी भर।

झील ने मुस्काते हुए उत्तर दिया-

मुझे निहारना तो सामान्य बात है;

सुनो! विशेष तो मुझमें उतरना है।

चाँद उतर गया, गहरी झील में।

वो बोली उतरना सामान्य बात है-

नितांत भिन्न तो मुझमें डूबना है।

चाँद डूब गया, उस गहरी झील में।

अब झील मंद मुस्काते हुए बोली-

मुझमें डूबने का नहीं बड़ा महत्त्व,

किंतु अति विशिष्ट है, डूबे रहना।

चाँद पूरा डूब गया मुदित झील में।

झील ने आँखें मटकाते हुए कहा-

सुनो चाँद! उबरना तो बहुत दूर;

यह अब कभी सोचना भी मत।

चाँद अब पूरा झील में खो चुका

प्रेम है...उतरना...डूबना...डूबे रहना...

सम्पर्क: सम्प्रति: फैकल्टी डेवलपमेंट सेण्टर, पी.एम.एम.एम.एन.एम.टी.टी.,प्रशासनिक भवन II, हे.न.ब.गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर (गढ़वाल), उत्तराखंड

Feb 1, 2023

कविताः गौरा का मैका



 ( जोशीमठ पर  विशेष ) 

- डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'

अहे! किसने हिम मुकुटा फेंका,

रो-सिसक रहा गौरा का मैका।

 

रोया पर्वत, चीखी जब घाटी,

स्वर्ण - रजत हुआ सब माटी।

 

नद शिखर झरने स्तब्ध खड़े हैं,

देखो बुग्याल लहूलुहान पड़े हैं।

 

वो रक्तिम सूरज उगा हिचका- सा,

मौन पहाड़ी पर चंदा ठिठका- सा।

 

संक्रान्ति हुई है ये क्रूर मकर -सी,

हर पगडंडी यमपुरी की डगर- सी।

 

पग - पग पर देखो झूली माया,

यों शंकर नगरी - रुदन है छाया।

 

नहीं क्षुधा-पिपासा शांत हुई तो,

अब अलकापुरी आक्रांत हुई वो।

 

ये आँसू खारे अब पी नहीं सकते,

आघात है गहरा- सी नहीं सकते।

 

मान बैठे स्वयं को मायापति तुम,

अरे मनुज कहाते- हे दुर्मति तुम।

 

निज भाग-विधाता कुछ तो बोलो,

ये मौन त्याग तुम मुख को खोलो।

 

निज हेतु षड्यंत्र स्वयं कर डाला,

निन्यानबे फेरी नित-नित माला।

 

अहंकार में जो दिन रात हँसे हो,

निज काले कर्मों में स्वयं फँसे हो।

 

अब भी समय है तो संभलो थोड़ा,

सरपट दौड़ रहा- काल का घोड़ा।

 

सुरसा मुख असीम इच्छाएँ फैली,

कुचल डालो तुम ये मैली - मैली ।

 

नहीं चेते तो पश्चाताप से क्या हो,

त्रासदी - आँसू संताप में क्या हो।

 

विष बुझे बाण से ये प्रश्न बड़े हैं,

उत्तर दो शिखर विकल खड़े हैं।

-0-

II S-3, B.T. HOSTEL, UNIVERSITY CAMPUS, MADHI CHAURAS,P.O.KILKILESHWAR, TEHRI, Garhwal- 249161 Uttarakhand

Nov 1, 2022

कविताः मंदिर के दिये-सा है तू

- डॉ. कविता भट्ट

विदाई में तुम्हारे चेहरे की सलवटें

मुझे सताए जैसे बेघर को गर्म लू

 

तू रो न सका, मेरे आँसू न रुके

पहाड़ी घाटी में उदास नदी- सा तू

 

छोड़ रहा था चुन्नी काँपते हाथों से

सुना था पुरुष लौह स्तम्भ हैं हूबहू

 

तेरे मन के कोने मैंने भी रौशन किए

मेरी नजर में मंदिर के दिये -सा है तू

 

चार कदम में कई जीवन जी लिये

अमरत्व को उन्मुख अब यौवन शुरू... 

सम्प्रति: फैकल्टी डेवलपमेंट सेण्टर, पी.एम.एम.एम.एन.एम.टी.टी., प्रशासनिक भवन II, हे.न.ब.गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर (गढ़वाल), उत्तराखंड

Aug 1, 2022

कविताः ओ ज़िन्दगी!

  - डॉ. कविता भट्ट 

निहार रही हूँ राह, देखूँ! तू आती है कि नहीं,

ओ ज़िन्दगी! यहाँ बैठ, मुस्काती है कि नहीं।


यह मेरे पुरखों का पुराना पठाली वाला घर है,

ताला लगा, दूब उगी, अब होने को खंडहर है।


कोदे की रोटी-झंगोरे की खीर तेरे संग खानी है,

मरती हुई माँ को दी अपनी ज़ुबान निभानी है।


आ ना! संग में गुड़ की मीठी पहाड़ी चाय पिएँगे,

पीतल के गिलास से चुस्कियाँ लेकर साथ जिएँगे।


कोने पड़ा- दादाजी का हुक्का साथ गुड़गुड़ाएँगे,

आ ज़िन्दगी! साथ में पहाड़ी मांगुल गुनगुनाएँगे।


शब्दार्थ: पठाली- स्लेटनुमा पत्थर जो पहाड़ी घरों की छत पर लगती है, कोदे( कोदा) और झंगोरे (झंगोरा)- उत्तराखंड के पारम्परिक पहाड़ी अनाज, मांगुल- विवाह आदि समारोहों में गाए जाने वाले उत्तराखंड के पारम्परिक पहाड़ी लोकगीत।

सम्प्रति: फैकल्टी डेवलपमेंट सेण्टर, पी.एम.एम.एम.एन.एम.टी.टी.,प्रशासनिक भवन II, हे.न.ब.गढ़वाल 
विश्वविद्यालय, श्रीनगर (गढ़वाल), उत्तराखंड

Mar 1, 2022

दो कविताएँ- 22 मार्च विश्व जल दिवस

  
-डॉ. कविता भट्ट

1. हाँ स्त्री समुद्र है

हाँ, स्त्री समुद्र है- उद्वेलित और प्रशान्त

मन के भाव ज्वार-भाटा के समान

विचलित और दुःखी करते हैं उसे भी

हो जाती है जीवमात्र कुछ क्षणों के लिए।

किन्तु; पुनः स्मरण करती है; कि

वह है- प्रसूता, जननी और पालनहार

पुरुष- अपने अस्तित्व के लिए भी

निर्भर है सूक्ष्म जीव सा- इसी समुद्र पर

दोहराता रहता है- भूलें-अपराध-असंवेदनाएँ

प्रायश्चित नहीं करता, किन्तु फिर भी

विश्राम चाहता है- स्त्री के वक्षस्थल में

विशाल हृदया स्त्री क्षमादान देती है

समेट लेती है- सब गुण-अवगुण

समुद्र के समान- प्रशान्त होकर

और चाहती है कि ज्वार-भाटा में

सूक्ष्म जीव का अस्तित्व बना रहे।

2. स्त्री व पानी 

कितनी समानता है- स्त्री व पानी में

दोनों तरल, नर्म और आकारहीन हैं।

ढल जाते हैं प्रत्येक निर्धारित साँचे में,

निरपेक्ष बुझाते प्यास, विकारहीन हैं।

खींचते लकीरें जब बहें प्रबल धार में।

पत्थर चीरें, लोग कहते संस्कारहीन हैं।

रस-छन्द-अलंकार-व्याकरण है इनमें

छले जाते; किन्तु दोनों व्यापारहीन हैं।


Jan 1, 2022

कविताः भोर की लालिमा में

- डॉ. कविता भट्ट

जब वो हँसता है ना;

तो लगता है जैसे -

असंख्य गुलाबी फूल

भोर की लालिमा में

स्नान कर; हो गए हों-

और भी सुकुमार !

जैसे रजनीगंधा ने

बिखेरी हो सुगन्ध

आँचल की अपने!

जैसे मोती- भरे सीप

भर लाई षोडशी लहर

किनारे पर उड़ेल गई!

या प्रेयसी ने पसारी हों

अपनी प्रतीक्षारत बाहें!

चुप से रहने वाले उस

गम्भीर प्रेमी के लिए

जिसे मुक्त पवन भी

न कर सकी हो स्पर्श।

Nov 1, 2021

लघुकथाः फिर से तैयारी

-डॉ. कविता भट्ट

अंदर से ठहाकों की गूँज के साथ चाय-पकोड़े की खुशबू भी आ रही थी; जब एक शालीन, मेहनती और लगभग अधेड़ उम्र की महिला लम्बा इंटरव्यू देकर वातानुकूलित कक्ष से बाहर निकली।

वहीं बाहर बैठी एक युवती ने पूछा, ‘क्या नाम है तुम्हारा?’ 

डिग्रियों और पुस्तकों का भारी बैग सँभालते हुए बाहर निकलने वाली महिला बोली, ‘शिक्षा।’

बाहर बैठी बनी-ठनी सी युवती बोली, ‘मैं व्यवस्था हूँ; यहीं नौकरी पाना चाहती हूँ। तुम्हारे पास तो इतना कुछ है । मेरे पास तो बस एक फोल्डर में दो-चार कागज ही हैं। देखती हूँ इस इंटरव्यू को दे आती हूँ।’

पूरे आत्मविश्वास और आँखों में चमक लेकर वह भीतर गई।

वह चंद मिनटों में ही बाहर आ गई।

दोनों घर को निकलने लगी, तो व्यवस्था बोली , ‘सुनो मैं बाज़ार में ही रहती हूँ और तुम?’

शिक्षा बोली, ‘मंदिर के पास।’

व्यवस्था अपनी महँगी कार में बैठने लगी, तो शिक्षा ने तरसी निगाहों से देखा। आँखें नचाते हुए व्यवस्था बोली, ‘आओ तुम्हें भी तुम्हारे घर छोड़ते हुए निकल जाऊँगी।’

शिक्षा बोली, ‘सॉरी बहिन, आदत नहीं महँगी कार की। पैदल ही चली जाऊँगी।’

व्यवस्था सर्र से कार से निकल गई। शिक्षा को बहुत देर बाद ऑटो मिला। हिचकोले खाते हुए घर पहुँची।

रात को शिक्षा ने मोबाइल खोला; पदों पर भर्त्ती की लिस्ट शिक्षण संस्थान की वेबसाइट पर डाल दी गई थी। व्यवस्था का नाम सबसे पहले था।

शिक्षा ने दो तीन बार चेक किया। उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था;  क्योंकि पूरा जीवन पढ़ते-लिखते हुए खपा दिया था उसने, मगर नौकरी की लिस्ट में उसका नाम कहीं नहीं था। वह चुपचाप पुरानी खाट पर बैठ गई। थोड़ी देर औंधे मुँह लेटकर वह फूट -फूटकर रोती रही।

शिक्षा भीतर से टूट चुकी थी; लेकिन थोड़ी देर बाद उसने उठकर ठंडे पानी से मुँह धोया और कॉपी-पेन लेकर फिर से तैयारी करने लगी।

Jun 5, 2021

त्राटककर्मः तनाव एवं अवसाद निवारण हेतु एक श्रेष्ठ योगाभ्यास

 - डॉ. कविता भट्ट

(हे.न.ग.विश्वविद्यालय श्रीनगर (गढ़वाल) उत्तराखण्ड)

कोविड- 19 के इस समय में सम्पूर्ण मानव समाज, न केवल शारीरिक; अपितु गम्भीर मानसिक रोगों व समस्याओं से ग्रस्त और त्रस्त हैं। आज मनुष्य अवसाद आदि जैसी मानसिक समस्याओं से घिरा है; जो विकराल होने पर अनेक मनोरोगों में बदल जाती हैं। आपदा के इस गम्भीर व चुनौतीपूर्ण समय में हमें ऐसे साधनों की आवश्यकता है, जो शरीर के साथ ही मन का भी स्वस्थ रख सकें। उल्लेखनीय है कि पाश्चात्य मनोविज्ञान मनोरोगों को सतही ढंग से अध्ययन करते हुए मनोचिकित्सा द्वारा उनका सतही निदान ही प्रस्तुत करता है। अनेक बार मनोवैज्ञानिकों की शरण में जाने पर वे अच्छी नींद के लिए नींद की एलोपैथिक दवाएँ देने लगते हैं। एलोपैथी की अपनी कुछ विशेषताएँ हैं; जिस पर विवाद नहीं होना चाहिए; किन्तु मनोरोगों के सन्दर्भ में योगाभ्यास तथा आयुर्वेद एलोपैथी से अधिक उपयोगी हैं।

अवसाद की स्थिति में मनोचिकित्सकों द्वारा जब नींद की दवाओं का लम्बे समय तक सेवन करवाया जाता है, तो व्यक्ति और भी अधिक गम्भीर मनोशारीरिक समस्याओं में घिर जाता है। यहाँ यह स्पष्ट करना है कि योग एवं आयुर्वेद आदि जैसी भारतीय विधाएँ/ पद्धतियाँ इन मनोरोगों का गूढ़ विश्लेषण करते हुए इनके स्तरीय निदान भी प्रस्तुत करती हैं। योग मनोविज्ञान भी है; जिसमें चित्तवृत्तिस्वरूप मनोविकारों का गूढ़ मनोवैज्ञानिक विश्लेषण स्तरीय व प्रायोगिक निवारण की दृष्टि से किया गया है। दैनिक योगाभ्यास शारीरिक व मानसिक अनुशासन द्वारा मनोविकार नियन्त्रण का सर्वश्रेष्ठ साधन है। इससे व्यक्तित्व का संतुलन व मनोस्वास्थ्य दोनों ही प्राप्त होंगे तथा व्यक्ति एक स्वस्थ जीवन जी सकेगा। इस आलेख में हम जनसामान्य के लिए तनाव व अवसाद जैसी मानसिक समस्याओं के यथोचित विवेचन के साथ ही इनके निदान हेतु योग के ही एक महत्त्वपूर्ण अभ्यास ‘त्राटक‘ को प्रस्तुत करेंगे। पहले मनोरोग के सम्बन्ध में भारतीय अवधारणा को संक्षेप में जानेंगे।

मनोरोग के सम्बन्ध में भारतीय अवधारणा

आधुनिक परिदृश्य में हम पूर्वयुगों से अधिक स्वास्थ्य-विघटन का सामना कर रहे हैं। स्वास्थ्य में विघटन के अनेक कारणों में से मानसिक समस्याएँ तथा मनोरोग भी प्रमुख कारण हैं। मनोरोगों के लिए दूषित समाज, रूढियाँ,  कुरीतियाँ, आर्थिक समस्याएँ, असंतुष्ट वैवाहिक जीवन तथा अनेक अन्य कारण  बाहरी रूप से उत्तरदायी हो सकते हैं; किन्तु इसके साथ ही मनोरोगों में आभ्यन्तर कारण भी प्रमुख हैं। इन कारणों में से मोह, शोक, क्रोध, हर्ष, लोभ, भय, श्रद्धा, आवेश, लज्जा, शील, शौर्य, आचार एवं ओजक्षय को प्रमुख माना गया है। ये कारण मानसिक तनाव, अवसाद, भ्रम एवं विभ्रम, मद, मूर्च्छा एवं संन्यास, उन्माद, अपस्मार, योषापस्मार, अतत्त्वाभिनिवेश, व्यसनप्रियता, मदात्यय, निद्राल्पता, स्मृतिनाश एवं तत्सम्बन्धी व्याधियों, हीनभावनाजन्य स्नायुदौर्बल्य तथा मनोदैहिक विकृतियों आदि जैसे बाह्य लक्षणों के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। यहाँ हम तनाव तथा अवसाद को समझने का प्रयास करेंगे।

तनाव

 योगदर्शन मानता है कि त्रिगुणों अर्थात् सत्त्व, रजस् एवं तमस् से ही सम्पूर्ण शरीर व मन आदि का अस्तित्व है। जब तक ये त्रिगुण यथोचित संतुलित अवस्था में रहते हैं तब तक तो सबकुछ सामान्य रूप से चलता है; किन्तु समस्या तब आरम्भ होती है जब ये असंतुलित होकर शरीर, मन व बुद्धि को असामान्य रूप से विकृत कर देते हैं। इसी मत का समर्थन करते हुए आयुर्वेद में रज एवं तम गुणों के असंतुलन को मानसिक रोगों का कारण बताया गया है। माना जाता है कि सत्त्व गुण रोगोत्पत्ति नहीं करता; इसलिए उसकी मनोदोषों में गणना नहीं की गई है। रज एवं तम विकारी होने से इनकी मनोदोष संज्ञा भी है। वस्तुतः हमारी समस्त मानसिक व्याधियों के लिए राजस या तामसिक प्रवृत्तियाँ ही उत्तरदायी हैं। राजस प्रवृत्तियों में उच्च महत्त्वाकांक्षाएँ, यश-मान की इच्छाएँ, पद-प्रतिष्ठा की अभिलाषाएँ, बनाव-शृंगार, राजसी रहन-सहन, वाद-विवाद, धन-साधन संग्रह आदि तथा तामसिक प्रवृत्तियों में दूसरे का अहित, व्यसन, काम-वासनाएँ, मोह, मद, आलस्य, अकारण द्वेष-शत्रुता आदि हैं। प्रायः प्रत्येक मानसिक तनाव में इनमें से ही कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कारण विद्यमान रहता है।

उपर्युक्त कारण तो शास्त्रीय दृष्टिकोण से मनोरोगों के आन्तरिक कारणों के रूप में बताये गए हैं; परन्तु बाह्य या व्यावहारिक दृष्टिकोण से ये कारण स्वास्थ्य, समाज, व्यवसाय, अर्थव्यवस्था, कानूनी, विवाह, प्रेम, शिक्षा, नौकरी, मृत्यु, पुत्र अथवा संतान, आवास एवं कार्यालय आदि सम्बन्धी गतिविधियों में मनोवांछित परिणाम प्राप्त न होने के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। ये सारे कारण मिलकर मानसिक तनाव को जन्म देते हैं। परिणामस्वरूप चिन्ता, निराशा, भय, उद्विग्नता, मानसिक अस्थिरता, स्मृतिनाश, चिड़चिड़ापन, आत्महत्या की प्रवृत्ति, सिरदर्द,  भूखनाश एवं महिलाओं में अनियमित मासिक चक्र के रूप में मानसिक तनाव के लक्षण प्रकट होते हैं। तनाव एक ऐसा मनोरोग है, जो व्यक्ति को मानसिक रूप से तो क्षीण करता ही है, इसके अतिरिक्त शरीर को भी अत्यंत घातक रोगों का घर बना देता है। इसके अतिरिक्त आधुनिक युग में अवसाद भी एक मुख्य मनोरोग के रूप में उभरकर आया है। अवसाद को हम निम्न प्रकार से समझ सकते हैं।

अवसाद

 आधुनिक परिप्रेक्ष्य में प्रायः मानसिक तनाव के पश्चात् सर्वाधिक रोगी अवसाद के ही हैं। इसे हम सामान्य रूप से इस प्रकार समझ सकते हैं कि जब तक व्यक्ति में संघर्ष की क्षमता रहती है, तब तक व्यक्ति मानसिक तनाव से ग्रस्त रहता है; किन्तु जब वह संघर्ष करने की स्थिति में नहीं रहता एवं उसकी कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम हो जाती है, तो वह अवसादग्रस्त हो जाता है। वास्तव में यह निराशा से उत्पन्न मनोरोग है। जब हमें हमारी क्षमताओं व परिश्रम के अनुसार कार्यफल नहीं मिलता है तो प्रायः हम निराशावादी हो जाते है, यह स्थिति गहन मानसिक स्तर पर अवस्थित होकर अवसाद का कारण बनती है। इसके अत्यंत घातक होने का कारण यह है कि यह व्यक्ति के आत्मविश्वास को समाप्त कर देता है। आत्मविश्वास की समाप्ति जीवन की संघर्ष क्षमता को समाप्तप्रायः कर देती है, जिससे व्यक्ति अनेक बार आत्महत्या भी करने को उद्यत हो जाता है।

अवसाद के लक्षण- सिर का भारीपन, सिरदर्द, निद्राल्पता, आलस्य, अनुत्साह, अंगों में पीड़ा, अंगशैथिल्य, अरुचि, अपच, बारम्बार मूत्र प्रवृत्ति, कब्ज, भयानुभूति, एकान्तप्रियता एवं महिलाओं में अनियमित मासिकधर्म आदि हैं। 

मानसिक परिवर्तन व विचलन ही तनाव तथा अवसाद आदि सभी मनोरोगों का मूल कारण हैं। मन के नियन्त्रण द्वारा ही इन पर विजय प्राप्त की जा सकती है। जो एकाग्रता, मानसिक स्वस्थता, शान्ति और प्रसन्नता के द्वारा ही सम्भव है; यह सब योगाभ्यास द्वारा ही प्राप्य है। तनाव एवं अवसाद निवृत्ति के उपरान्त मानसिक स्वस्थता में कुछ योगाभ्यास विशेष उपयोगी हैं; जिनमें से त्राटककर्म भी एक ऐसा ही अभ्यास है। आइए इस अभ्यास को संक्षेप में समझते हैं।

त्राटककर्मः तनाव एवं अवसाद निवारण हेतु एक श्रेष्ठ योगाभ्यास

यों तो प्रत्येक योगाभ्यास अपने विशिष्ट लक्ष्यों से युक्त होता है; किन्तु योग की ही एक शाखा हठयोग में अनेक ऐसे अभ्यासों का विधान है, जो अत्यंत लाभकारी होते हुए भी अपेक्षानुरूप प्रचारित नहीं किए गए। यहाँ यह जानना आवश्यक है कि पतंजलि कृत पातंजलयोगसूत्र राजयोग का ग्रन्थ है; इसमें अष्टांग योग अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि को सूत्रात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। वस्तुतः राजयोग योगाभ्यासों के प्रायोगिक तथा व्यावहारिक पक्ष को अधिक स्पष्ट नहीं कर पाता। इसके लिए हठयोग के ग्रन्थों को पढ़कर उनके अनुसार ही योगाभ्यास को प्रायोगिक रूप से सीखा और अपनाया जा सकता है। आदिनाथ भगवान शिव उपदिष्ट शिवसंहिता, घेरण्ड मुनि कृत घेरण्ड संहिता, स्वामी स्वात्माराम कृत हठप्रदीपिका तथा गोरक्षनाथ कृत गोरक्षसंहिता तथा सिद्धसिद्धान्तपद्धति आदि हठयोग के प्रमुख ग्रन्थ हैं। इनमें से घेरण्ड संहिता व हठप्रदीपिका में आसन तथा प्राणायाम आदि से पूर्व षट्कर्म का विधान है। षट्कर्म का अधिक व्यवस्थित विवेचन घेरण्ड संहिता में किया गया है। इसके प्रथम प्रकरण में षट्कर्म के रूप में छह शुद्धिकर्मों का विवेचन प्राप्त होता है। धौति, वस्ति, नेति, नौलि, त्राटक एवं कपालभाति षट्कर्म हैं। इनमें से मानसिक और वैचारिक शुद्धि के लिए त्राटक की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका है। अब संक्षेप में इसे समझने का प्रयास करेंगे।

त्राटक अर्थात् विशेष केन्द्र को एकाग्रता के साथ देखना। इसके तीन प्रकार हैं- बहिर्त्राटक, अन्तर्त्राटक तथा अधोत्राटक। तीनों प्रकार के त्राटक का क्रमवार अभ्यास किया जाता है। सर्वप्रथम एक मोमबत्ती को जलाकर इतनी ऊँची मेज अथवा तल पर लगाना चाहिए कि सीधे बैठने पर वह आँखों की ठीक सीध में रहे उससे एक या डेढ फुट की दूरी पर; अब  किसी ध्यानात्मक आसन; जैसे- वज्रासन या पद्मासन में स्थिरता पूर्वक बैठते हैं। ऐसा करने के पश्चात् आँखें बन्द करके अपने पूरे शरीर का ध्यान करते हुए व पूरे शरीर को मूर्त्तिवत् होने देना चाहिए। जब चित्त शान्त हो जाए, तो आँखें खोलकर ज्योति के बीच में जो काले रंग की लौ होती है; उसे एकटक देखना चाहिए। अन्य सभी वस्तुओं को भूलकर पूरा ध्यान इसी पर एकाग्र करना चाहिए। यदि बीच में मन विचलित हो जाए, तो उसे पुनः ज्योति पर ही स्थिर करना चाहिए। मोमबत्ती में अनेक प्रकार की लौ होती हैं, उन्हें उपेक्षित करके केवल काले रंग की बीच वाली लौ का ही ध्यान करना है। सजगता के साथ एकाग्रता बनाए रखनी आवश्यक है।

जब आँखें थक जाएँ  व अश्रु बहने लगें, तो उन्हें बन्द कर लेना चाहिए। तत्पश्चात् अन्तःत्राटक के अभ्यास हेतु पलकों को बन्द करके उसी ज्योति की प्रतिच्छाया को अपने मन के भीतर चिंतन करके देखने का प्रयास करना चाहिए। हो सकता है प्रारम्भ में अभ्यास करते हुए छाया स्पष्ट न दिखे, तो भी तनावरहित होकर अभ्यास करते रहना चाहिए। धीरे-धीरे लौ की प्रतिच्छाया दिखना आरम्भ होगा। इस प्रकार मात्र इसका ही ध्यान करना आवष्यक है। यदि कोई भी विचार मन में आ रहा हो, तो उसे उठते हुए मात्र साक्षी भाव से देखते रहना चाहिए। जब तक थकान न मिटे व ज्योति की प्रतिच्छाया दिखती रहे, आँखों को बन्द ही रखना चाहिए; जब यह धुँधली हो जाए, तब आँखें खोलकर पुनः उपर्यक्त प्रक्रिया को दोहराना चाहिए। बन्द नेत्रों के सामने अंधकार का विचार बनाए रखना आवश्यक है। 

समय, अवधि एवं सावधानियाँ - प्रातः व रात्रि का समय ही इसके लिए उपयुक्त है। इसके लिए अवधि शारीरिक लाभ हेतु पाँच मिनट पर्याप्त है; किन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से लाभान्वित होने के लिए इससे अधिक करना ध्यान के अभ्यास हेतु लाभप्रद होता है। त्राटक चश्मा लगाकर नहीं करना चाहिए। विचारों को रोकने का प्रयास नहीं करना चाहिए, मात्र साक्षी की भाँति उन्हें देखते रहना चाहिए। केवल शारीरिक लाभ प्राप्त करना हो, तो पाँच मिनट से अधिक नहीं करना चाहिए। यह दृष्टि दोष दूर करने के लिए पर्याप्त समय है।

त्राटककर्म के वैज्ञानिक आधार तथा लाभ

आँखें खोलने-बन्द करने पर मन-मस्तिष्क प्रभावित होता है। त्राटक कर्म में एक ही बिन्दु को ध्यान से देखने व उसके बाद पलकें बन्द करने पर उसी का ध्यान करने से साधक की मानसिक व्यग्रता, चिंता एवं चंचलता समाप्त होती है। शीर्ष प्रदेश की समस्त तन्त्रिकाओं में सुचारू ढंग से रक्त परिसंचरण होने से वे स्वस्थ क्रियाशील बनती हैं। आँखों पर इसका प्रभाव पड़ने से दूर एवं निकट दृष्टि दोष दूर होता है। यदि आँखें स्वस्थ हैं, तो अधिक उम्र तक भी दृष्टि सही रहेगी।       

आँखों का सीधा सम्बन्ध चित्त की स्थिरता एवं एकाग्रता से होता है। वैचारिक अन्तर्द्वन्द्व से मानसिक अस्थिरता एवं अशान्ति होती है; जिससे अनेक मानसिक रोग होते हैं। आधुनिक युग में अत्यधिक यान्त्रिक जीवन इसको और भी अधिक बढ़ा देता है। इन समस्याओं से बचने हेतु त्राटक एक अच्छा अभ्यास है। इससे आँखें एवं मस्तिष्क दोनों स्थिर एवं तनाव रहित हो जाते हैं। अनिद्रा एवं स्नायविक तनाव से ग्रस्त लोगों के लिए यह बहुत उपयोगी है। साथ ही इससे आत्मबल भी बढ़ता है। मानसिक तरंगे व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक उत्तेजना से सम्बन्ध रखती हैं। त्राटक से उनका लय होने लगता है व उनके कम्पन की आवृत्ति कम होने लगती है। इससे मस्तिष्क शान्त एवं विकाररहित होता है। हिंसा, क्रोध, चिड़चिड़ापन तथा आक्रामकता धीरे-धीरे नियन्त्रित हो जाती है। तंत्रिका तन्त्र जितना स्वस्थ व शांत होगा, अन्तःस्रावी ग्रन्थियों की क्रिया-प्रणाली भी सुचारू एवं नियमित होगी। पिनियल ग्रन्थि वृद्धिजनक (ग्रोथ), यौन विकासक हार्मोन (गोनेडट्रॉपिक), स्तनयजनक (प्रोलैक्टिन) ग्रैवकीय(थायट्रॉपिक) व अधिवृक्कीय(अॅडिनोट्रापिक) आदि को नियमित करके व्यक्तित्व को स्वस्थ करती है। त्राटककर्म द्वारा शान्त एवं एकाग्र होने से इस ग्रन्थि पर अत्यंत सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। परिणामस्वरूप अन्तःस्रावी तन्त्र के स्वस्थ होने से समस्त शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियों में तारतम्यता बनती है।

यत्नपूर्वक आँखें खुली होने से शीर्ष प्रदेश में तीव्र रक्तसंचार एवं बाद में आँखें बन्द होने पर शिथिलता होती है। इससे रक्तपरिसंचरण तन्त्र में एक लयबद्धता विकसित होती है; इसलिए उच्च एवं निम्न रक्तचाप तथा हृदयरोगों में लाभ प्राप्त होता है। शिथिलता की स्थिति में शरीर की क्रियाओें के मन्द होने के कारण श्वसन धीमा होता है; इससे श्वसनांगों को आराम मिलता है।

इसके अतिरिक्त पिनियल ग्रन्थि के सक्रिय होने के फलस्वरूप त्राटक के द्वारा पाचन सम्बन्धी ग्रन्थियों के हार्मोन्स के स्रावण में सुधार होने के कारण पाचन तन्त्र को भी लाभ प्राप्त होते हैं। हड्डियों की मजबूती आदि को भी यह ग्रन्थि हॉर्मोन्स के द्वारा प्रभावित करती है। अतः इस ग्रन्थि द्वारा स्रावित हॉर्मोन्स में सुधार आने से कंकाल, प्रजनन एवं उत्सर्जन आदि तन्त्रों को भी लाभ होता है।  त्राटक में बैठने की विशेष स्थिति के कारण रीढ़ व गर्दन की हड्डी दृढ़ एवं मजबूत होती है। इससे स्पॉन्डिलायटिस, कमर व पीठ का दर्द आदि में भी लाभ प्राप्त होता है।

Apr 5, 2021

काव्यः तस्वीर जूते नहीं उतारती

- डॉ. कविता भट्ट

वह देहरी के बीचो-बीच जूते उतार

भीतर आता था,

जूतों से सबको ठोकर मिलती

पत्नी कहती रही- कभी तो सही जगह रखो जूते

खाने के बाद धोकर हाथ-

वह पर्दे से ही पोंछता था।

बहुत से रजिस्टर भर दिए थे

लिख-लिखकर उसने

उस बड़े विद्वान् ज्योतिषी की

कोई बात झूठी नहीं हुई कभी

लोग फटे हुए से पैर छू लेते थे उसके सम्मान से

उसने न कभी दीपक जलाया

न ही कोई पुस्तक लिखी।

बिना फीस जन्मपत्रियों को बाँचता रहा।

पत्नी रोज कहती रही

कि तुमने कौन महल बना लिये?

पत्नी सन्न है, सन्नाटा पसरा है।

वह इन गुण-अवगुणों के साथ ही चला गया।

पता नहीं बच्चे खुश हैं या दुःखी

बस इतना है कि अब घर में झगड़ा नहीं होता।

दूर तक चुप्पी है, जो टूटती नहीं अब।

कोने की रैक से पुस्तकें चुपचाप झाँक रही हैं

उसकी पेन में अब कोई रिफिल नहीं डालता।

चश्मा शायद अब थकान उतार रहा है।

ज्योतिष पर उसने जो शोध किए

वे रजिस्टर में ही दम तोड़ चुके हैं।

दीवार पर टँगी हुई उसकी फोटो

मुस्कुरा रही है- लेकिन यह मुस्कुराहट

असली है या नकली पता नहीं

क्योंकि तस्वीर जूते नहीं उतारती,

हाथ नहीं पोंछती, जन्मपत्री नहीं बाँचती,

न लिखती है , न पेन चलाती है, न चश्मा पहनती है।

उससे दीपक न जलाने की शिकायत भी खत्म!

Jan 1, 2021

किताबें- प्रासंगिक और अनुभूतिपरक रचनाएँ

 प्रासंगिक और अनुभूतिपरक रचनाएँ

 ‘मौन की आहटें’

 डॉ. कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’

वरिष्ठ रचनाकार शशि पाधा को पढ़ना प्रत्येक बार एक नई अनुभूति उत्पन्न करता है। उन्होंने साहित्य -जगत् को अपनी अनेक कृतियों से समृद्ध किया है। उनके द्वारा सेना के जवानों और उनके परिवारों की पीड़ा को आधार बनाकर भी दो पुस्तकें लिखी  हैं, जो बहुत ही प्रासंगिक और अनुभूतिपरक हैं। शशि पाधा कृत काव्य-संग्रह ‘मौन की आहटें’ पढने का सुअवसर प्राप्त हुआ।   मौन जैसे गंभीर और प्रत्ययात्मक विषय को समझना और उस पर लिखना बहुत चुनौती भरा कार्य है। शशि जी ने इसे सुन्दर शब्द -विन्यास में चित्रित करके मौन को भी मुखर कर दिया। जैसे-जैसे रचनाओं को पढ़ती गई मन भाव -सागर में डूबता चला गया। काव्य के दो पक्षों भावपक्ष और कलापक्ष को सुनियोजित करके समीक्षा करना भी सहज लगा। 

भाव पक्ष की बात करें तो- व्यक्तिगत और सामाजिक विसंगतिजन्य परिस्थितियों से उभरे पीर के स्वर कविताओं के रूप में स्पष्ट रूप से मुखर हुए हैं। अनेक स्थानों पर नारी- मन के सहज भावों को शब्दचित्र में बाँधा है। इसमें वे सफल भी रहीं हैं। कहीं-कहीं पर आध्यात्मिक शब्दचित्र भी प्रस्तुत किया गए हैं। मौन को अद्भुत ढंग से चित्रित करना इस संग्रह की विशेषता है। संग्रह में अनेक स्थानों पर रहस्यात्मक प्रश्नों को उत्तरित करने का प्रयास भी किया गया। उस असीम को ढूँढने की जिज्ञासा:

लाख ओढ़ो तुम हवाएँ/ ढाँप दो सारी दिशाएँ / बादलों की नाव से /

मैं तुम्हारा नाम लूँगी/ रश्मियों की ओट से / मैं तुझे पहचान लूँगी।

कवयित्री ने समसामयिक विषयों पर भी अपनी लेखनी उठाई है । रिश्तों में वैमनस्य, दुराव की भावनाओं से वह व्यथित हो कर कहती हैं-

रिश्तों की तुरपाई बाकी / तुम कर दो या मैं करूँ /

उधड़ी कोई सिलाई बाकी / तुम कर दो या मैं करूँ ।

यह एक सुसंयोजित एवं सुन्दर काव्य- संग्रह है। आज के दौर की मनोवैज्ञानिक स्थितियों का जीवन्त चित्रण इस संग्रह में किया गया है।शशि जी ने इस बात को स्वीकार किया है कि सृष्टि में व्याप्त मौन और उसके मूक स्वर भी मुखरित हैं अभिव्यक्तियों के रूप में। उन्होंने कहा- मौन की भी आहट होती है। यह एक वैज्ञानिक एवं सार्वभौमिक सत्य है कि आकाश में, पूरे अन्तरिक्ष में एक ध्वनि सदैव विद्यमान है जिसे ‘ॐ’ माना गया है।  यह ध्वनि पूरे ब्रह्माण्ड के कण-कण में हर पल अनुनादित हो रही है। ठीक उसी प्रकार मेरे  अंतर्मन के मौन की भी एक अनहद ध्वनि है, जो  मन के आकाश की दहलीज पर  आकर दस्तक देती  रहती है और मैं उसकी आहट सुनकर मन में उमड़े भावों-अनुभावों को अभिव्यक्त करने के लिए अनायास ही लेखन की कोई विधा चुन लेती हूँ । इस बार  यह आहट कविताओं में ढलकर आई है।

मौन को शब्दों में ढालना कितना कठिन होता होगा किन्तु शशि जी कहती हैं ,--

ओढ़ ली हैं चुप्पियाँ / सी लिये अधर भी / एक से लगने लगे / घर भी, खंडहर भी ।

इसी रचना में अपने मौन से संधि करती हुई वह कहती हैं-

            बुद्ध-सा पा लिया / चैन और सुकून अब / जोगियों-सा भा गया उन्माद और जूनून अब 

            आसमाँ पे जा टिकी / सोच भी –नज़र भी ।

प्रकृति और प्रेम शशि जी की रचनाओं के केंद्र -बिंदु हैं। प्रकृति के हर क्रिया कलाप में किसी अदृश्य चित्रकार की तूलिका की बानगी उनकी ‘तारक चुनरी’ रचना में शब्दबद्ध है -

कौन जुलाहा तारक चुनरी बुनता सारी रात ?

किरणों से करता नक्काशी / बेल मोतिया टाँके , जूही चम्पा सजी पाँखुरी/

 मोल भाव न आँके / मीत जुलाहा बड़े चाव से बुनता सारी रात ।

लगता प्रीत पुरानी हो गई, ख़ामोशी की आहट,  रीत ही बदल गई, न थीं कोई ईंट दीवारें, रुक- रुकके चलने लगी ज़िन्दगी, कभी कभी, सीमाओं की होली, विदा की वेला तथा शहीदों के बच्चे इत्यादि कविताएँ बरबस ही पाठक को झकझोर कर रख देती हैं।

प्रेम के विभिन्न रंगों को कवयित्री ने अपनी विभिन्न कविताओं में चित्रित किया है । मानव का इस जगत के स्रष्टा के प्रति प्रेम के कोमल भावों को व्यक्त करती रचना -

प्रीत तेरी इस माथे की लकीर हो गई/  ऐसी पूँजी पाई कि अमीर हो गई।

इन्ही भावों को अन्य शब्दों में बाँधते हुए वह कहती हैं-

जोगन का चोला जो पहना / वैरागन -सी घूम रही ,  प्रीत तेरी की चख ली मिश्री /

 बिन घुँघरू ही घूम रही / सब कुछ तुझ पे वारा / और फ़कीर हो गई ।

कलापक्ष की बात की जाए, तो कविताओं में मौन का सौन्दर्य है, प्रवाह है और प्रासंगिकता है। पाठक रससिक्त होकर मानव जीवन के महत्त्वपूर्ण विषयों को सरल शब्दों के माध्यम से पढ़ और समझ सकता है। यह काव्य संग्रह दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और साहित्यिक समझ को स्पष्ट रूप से निरूपित व प्रतिबिंबित करता है। ‘मौन की आहटें’ पठनीय और संग्रहणीय है।

पुस्तक-  मौन की आहटे (काव्य-संग्रह ): शशि पाधा,  प्रकाशक: भावना प्रकाशन, 109- ए, पटपड़गंज, दिल्ली 110091. वर्ष :2020 पृष्ट:152,,मूल्य-350 रुपये ,ISBN:978-81-7667-378-5