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Sep 5, 2026

उदंती.com, सितम्बर - 2026

चित्रः डॉ. सुनीता वर्मा
 भिलाई, छत्तीसगढ़
 वर्ष -19, अंक - 2

"प्रकृति का अध्ययन करो,

 प्रकृति से प्रेम करो, 

प्रकृति के करीब रहो। 

प्रकृति तुम्हें कभी निराश नहीं करेगी।"  

- फ्रैंक लॉयड राइट

अनकहीः नेपाल आपदाः प्रकृति का कहर या... – डॉ. रत्ना वर्मा

पर्यावरणः जलवायु परिवर्तन  और लुप्त होता अमरनाथ शिवलिंग  - पंकज चतुर्वेदी

आलेखः अ द् भु त योगदान देने वाली, भारतीय महिला वैज्ञानिक - निर्देश निधि

हाइकुः  किसान की कथाएँ - भीकम सिंह

प्रदूषणः ई-कचरे के समाधान की दिशा में बड़ी उपलब्धि - प्रमोद भार्गव

लघुकथाः सबक – छवि निगम

विज्ञानः झगड़े से बचना हो तो गले मिलें 

बाल कहानीः सिया का सपना - डॉ. वंदना शर्मा

लघुकथाः प्रार्थनाएँ - अनिता मण्डा

कविताः मृत्यु, तू जब भी आना... - डॉ. पूनम चौधरी

संस्मरणः भाऊ जी - सुदर्शन रत्नाकर      

जागरूकताः प्राथमिक आवश्यकता- न फैशन न दिखावा  - लिली मित्रा

कहानीः बड़ी जिज्जी - डॉ. रंजना जायसवाल

व्यंग्यः भेंट एक लेखक से - गिरिराजशरण अग्रवाल

तीन कविताएँः शांति की प्रतीक्षा, लांछन, रूका वक्त - रेखा शाह आरबी

किताबेंः पर्यावरण संकट का जीवंत दस्तावेज - रोहित कौशिक

अनकहीः नेपाल आपदाः प्रकृति का कहर या...

- डॉ.  रत्ना वर्मा

 नेपाल में हाल की भयावह प्राकृतिक आपदा ने एक बार फिर पूरी दुनिया को यह सोचने के लिए विवश कर दिया है कि आखिर हम ऐसी त्रासदियों को किस नजरिये से देखें। पहाड़ों के बीच अचानक उमड़ा पानी, मलबे के साथ बहती नदियाँ, देखते ही देखते उजड़ते घर, टूटते पुल और सड़कें तथा अपनों को खोजते असहाय लोग- यह दृश्य केवल नेपाल की पीड़ा नहीं है; बल्कि उस संकट की तस्वीर है जो बदलते पर्यावरण और जलवायु के साथ पूरी मानव सभ्यता के सामने खड़ी हो गई है। प्रकृति के इस भयावह मंजर के पीछे कई प्रश्न जुड़े हुए हैं, जिसके समाधान तलाशने होंगे। 

नेपाल की भयावहता को सामान्य मौसमी बाढ़ भर नहीं कहा जा सकता। बर्फ और चट्टानों के अचानक खिसकने तथा उसके बाद आई तेज जलधारा ने कुछ ही समय जो रौद्र रूप दिखाया उसे वैज्ञानिक, भूकंपीय गतिविधि, अत्यधिक वर्षा, हिमस्खलन, हिमालय का तेजी से गर्म होना, ग्लेशियरों का पीछे हटना और पर्वतीय भूभाग की अस्थिरता आदि ऐसे अनेक कारणों से जोड़ कर देख  रहे हैं। इस आपदा ने यह भी दिखा दिया कि पहाड़ों में घटित कोई घटना केवल उसी स्थान तक सीमित नहीं रहती। उसका प्रभाव नदी के साथ दूर-दूर तक बसे समुदायों, बस्तियों, परिवहन, ऊर्जा परियोजनाओं और आजीविका पर लम्बें समय तक पड़ता है, जिससे उबरना आसान नहीं होता। 

 किसी भी आपदा के पीछे कई प्राकृतिक और मानवीय कारण भी एक साथ काम करते हैं। जैसे- अनियोजित निर्माण, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र में अतिक्रमण, जंगलों का क्षरण, कमजोर बुनियादी ढाँचा और जोखिम वाले क्षेत्रों में बस्तियों का विस्तार आदि ऐसी आपदा के प्रभाव को कई गुना बढ़ा सकते हैं। इसलिए हमें प्रकृति को दोष देने के बजाय अपने विकास के तरीके और अपनी तैयारियों पर भी सवाल उठाने होंगे।

सामाजिक दृष्टि से किसी आपदा का सबसे बड़ा प्रभाव केवल जान-माल की क्षति नहीं होता। आपदा सामाजिक ताने-बाने को भी प्रभावित करती है। घर खोने वाला व्यक्ति केवल एक मकान नहीं खोता, वह अपनी स्मृतियाँ, सामाजिक सुरक्षा, आजीविका और भविष्य का भरोसा भी खो देता है। बच्चों की पढ़ाई रुकती है, परिवार बिखरते हैं, रोजगार समाप्त होते हैं और मानसिक आघात लम्बे समय तक बना रहता है। इस समय नेपाल में स्वास्थ्य सेवाओं, घरों, बाजारों, सड़कों, पुलों और आवश्यक सुविधाओं के प्रभावित होने से हजारों परिवारों के सामने तत्काल राहत के साथ-साथ लंबी पुनर्वास प्रक्रिया की बड़ी चुनौती है। राहत का अर्थ केवल भोजन, कपड़े और अस्थायी आश्रय उपलब्ध कराना नहीं होना चाहिए; राहत के साथ सम्मान, सुरक्षा, मानसिक सहारा और भविष्य की पुनः स्थापना भी जुड़ी होनी चाहिए।

पर्यावरण विशेषज्ञों के नजरिए से देखें तो इस तरह की आपदाओं से हमें सबक लेना होगा कि विकास और प्रकृति के बीच संघर्ष का रास्ता हमें कहीं नहीं ले जाएगा। पहाड़ों में सड़कें बनें, बिजली परियोजनाएँ बनें, पर्यटन बढ़े और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार पैदा हों- यह विकास आवश्यक है, लेकिन प्रश्न यह है कि  यह विकास कितना सुरक्षित और पर्यावरण-सम्मत है। किसी नदी, पहाड़ या जंगल को केवल निर्माण की जगह मान लेना अंततः मनुष्य के लिए  जोखिम ही पैदा करता है। 

नेपाल की इसी आपदा में एक स्कूल को अचानक आई सूचना के आधार पर समय रहते खाली कराया गया और सैकड़ों विद्यार्थियों की जान बची। यह घटना बताती है कि कई बार कुछ मिनटों की सूचना भी सैकड़ों जिंदगियाँ बचा सकती है; इसलिए आधुनिक तकनीक, उपग्रह निगरानी, मौसम पूर्वानुमान, नदी जलस्तर की निगरानी, ग्लेशियरों और हिमानी झीलों की लगातार निगरानी तथा स्थानीय स्तर पर त्वरित सूचना-तंत्र को प्राथमिकता देनी होगी।

साथ ही, आपदा-प्रबंधन केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं हो सकता। स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षित करना होगा। स्कूलों में आपदा से बचाव के अभ्यास होने चाहिए। ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में लोगों को यह जानकारी होनी चाहिए कि अचानक बाढ़ या भूस्खलन की स्थिति में किस दिशा में जाना है, किससे संपर्क करना है और किन स्थानों को सुरक्षित माना जा सकता है। सामाजिक संगठनों, स्वयंसेवी संस्थाओं, स्थानीय प्रशासन और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच समन्वय भी उतना ही आवश्यक है। आपदा के समय जिस समाज में लोग एक-दूसरे के लिए खड़े होते हैं, वहाँ पुनर्वास की संभावना भी अधिक मजबूत होती है।

और सबसे महत्त्वपूर्ण है सीमाओं से ऊपर उठकर मानवीय सहयोग। हिमालय किसी एक देश की संपत्ति नहीं है और न ही उसकी नदियाँ राजनीतिक सीमाओं को पहचानती हैं। आपदा के समय राहत और बचाव में क्षेत्रीय सहयोग को राजनीति से ऊपर रखना होगा। नेपाल की त्रासदी में अलग-अलग देशों और संस्थाओं की सहायता तथा बचाव प्रयासों ने यह दिखाया भी है कि संकट के समय मानवता की साझी शक्ति सीमाओं से कहीं बड़ी होती है। 

आज आवश्यकता इस बात की है कि नेपाल के उजड़े हुए परिवारों को केवल संवेदना देकर हम अपने दायित्व से मुक्त न हो जाएँ। जिन्हें अपना घर, परिवार और आजीविका खोनी पड़ी है, उनके साथ खड़ा होना हमारी मानवीय जिम्मेदारी है। राहत सामग्री, चिकित्सा सहायता, पुनर्वास, बच्चों की शिक्षा और आजीविका की पुनः स्थापना के लिए सरकारों, संस्थाओं और समाज को मिलकर आगे आना होगा; लेकिन इसके साथ ही हमें भविष्य के लिए भी तैयारी करनी होगी। इसलिए समय आ गया है कि विकास की दौड़ में हम यह न भूलें कि धरती केवल संसाधन नहीं, जीवन का आधार है। आज नेपाल के लिए हाथ बढ़ाना केवल नेपाल की मदद करना नहीं है; यह उन समस्त मानवता के लिए हाथ बढ़ाना है, जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी हम सभी की है। ■

आलेखः अ द् भु त योगदान देने वाली भारतीय महिला वैज्ञानिक

 - निर्देश निधि 

उन महिलाओं के योगदान से जुड़ी बातें करें जिन्हें हम अक्सर भुलाए रखते हैं ।  हम जब भी समाज में महिलाओं के योगदान की बात करते हैं तो उद्यमियों , शिक्षाविदों , साहित्यकारों,  विभिन्न कलाकारों या सिनेमा से जुड़ी स्त्रियों की बात करते हैं । सिनेमा से जुड़ी हस्तियों के विषय में तो हम सब, कुछ अधिक ही जानते हैं । उन्हें ही नहीं उनके परिवारों तक को पहचानते हैं । परंतु क्या हम अपनी महिला वैज्ञानिकों के विषय में जानते हैं ? उनमें से किसी एक का चेहरा पहचानते हैं ?  हम भूल जाते हैं भारत को विज्ञान के क्षेत्र में अद् भुत योगदान देने वाली अपनी महिला वैज्ञानिकों को । 

हमारे देश ही नहीं संसार भर में महिला वैज्ञानिक, पुरुषों के अनुपात में बहुत कम हैं । संसार भर में मात्र अट्ठाईस से तीस प्रतिशत ही वैज्ञानिक शोधों में महिला दिखाई देती हैं । भारत की स्थिति तो मात्र बारह - तेरह प्रतिशत के साथ और भी बदतर है । जब भी हम कक्षा दस या बारह के परीक्षा परिणाम देखते हैं, तो विज्ञान हो या कला, हर बार छात्राएँ, छात्रों से बाज़ी मार लेती हैं । फिर ऐसा क्या हो जाता है कि बड़ी कक्षाओं तक आते - आते विज्ञान तो विज्ञान, लड़कियाँ शिक्षा में ही पिछड़ जाती हैं । क्या उम्र के साथ उनकी बुद्धि कम हो जाती है ? हर्गिज़ नहीं । इस असामानता के कई कारण हो सकते हैं । सबसे पहला तो कह सकते हैं कि जब लैंगिक अनुपात ही हम ठीक - ठाक स्थिति में नहीं ला पाए हैं अभी तक, तो शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में समानता की बात करना बेमाने है । हम अपने समाज में, महिला वैज्ञानिकों को रोल मॉडल के रूप में प्रस्तुत नहीं करते, यद्यपि हमारी अनेक महिला वैज्ञानिक इस योग्यता पर खरी उतरती हैं । पितृसत्तात्मक समाज भी महिलाओं के मस्तिष्क में वैज्ञानिक सोच को उभरने न देने का दोषी ज़रूर ही है । यदि किसी परिवार में दो में से एक बच्चे की शिक्षा का खर्च उठाने की क्षमता होती है, तो वह निश्चित रूप से अपने पुत्र को ही शिक्षित करता है । पुत्री को विज्ञान की शिक्षा न देकर उसे  प्राइवेट  रूप से ही शिक्षा दिला देता है । कई बार स्त्री की क्षमता को भी सही तरीक़े से आँका नहीं जाता । यह समझ लिया जाता है कि यह तो लड़की है विज्ञान इसके बस का नहीं । महिला वैज्ञानिकों के साथ भी कम भेद भाव नहीं होता । 1930 में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले भारतीय वैज्ञानिक सी वी रमन को सब जानते हैं; परंतु उन्हीं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर चुकी वैज्ञानिक अन्ना मणि को मुट्ठी भर लोग भी शायद ही जानते हों। भेदभाव आज भी है। इस आधुनिक समय में भी समान कार्य के लिए महिलाओं को समान वेतन तक नहीं दिया जाता, पहचान की बात तो दूर है । वैज्ञानिक शोध अधिक समय और दायित्व की माँग करते हैं । कोई स्त्री वैज्ञानिक बनने की राह पर चल भी पड़ी हो, तो भी, जब उस पर पारिवारिक दायित्व का बोझ आता है, तो घर वाले उसका सहयोग नहीं करते और उसे अपना शोध त्यागना पड़ता है। कई बार देखा गया है कि पति की आय अगर ठीक - ठाक हो जाए, तो भारतीय परिवारों में स्त्री को नौकरी छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया जाता है या वह स्वेच्छा से ही नौकरी छोड़ देती है। हमारी पारिवारिक व्यवस्था आज भी काफ़ी कुछ ऐसी ही है । महिलाओं का रोज़गार में न होना देश के लिए बहुत हानिकारक है । यह भी एक जाना - माना सत्य है कि रोज़गार में महिलाओं की भागीदारी से भारत की जी डी पी का बेहतर हो जाना तय है । सरकार द्वारा कई उपाय किए हैं, ताकि हमारे देश में महिला वैज्ञानिकों की संख्या में वृद्धि हो सके । जैसे उन संस्थाओं को अच्छी रैंकिंग देना, जिनमें महिला वैज्ञानिक अधिक हों । अगर किसी महिला वैज्ञानिक के पास कोई डिग्री है और वह कोई कार्य नहीं कर रही है, वह सत्ताईस से सत्तावन वर्ष की आयु तक किसी भी संस्था से जुड़कर क्षमतानुसार कार्य आरम्भ कर सकती है । सरकार की ओर से महिला वैज्ञानिकों की अधूरी रिसर्च को पूरी करने में सहयोग भी दिया जा रहा है । आर्थिक मदद और तत्संबंधी फ़ेलोशिप भी दी जा रही है। ‘भारतीय विज्ञान कांग्रेस’ की तर्ज़ पर हर बरस ‘महिला विज्ञान कांग्रेस’ का आयोजन भी किया जाता है । महिलाओं को विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी बनाने के लिए ‘भारतीय महिला वैज्ञानिक संघ’ की भी स्थापना की गई है । पूरे भारत में दस शाखाओं वाली इस संस्था का मुख्यालय, वाशी नवी मुंबी में है । महिला वैज्ञानिकों के लिए अनेक पॉर्टल्ज़ बनाए जा रहे हैं । इसके अतिरिक्त अपने क्षेत्र में विशिष्ट रही ग्यारह महिला वैज्ञानिकों के नाम पर  सरकार पीठों की स्थापना कर रही है;  ताकि इन वैज्ञानिकों के नामों से युवा छात्राओं को प्रेरणा मिल सके और विज्ञान के क्षेत्र में वे अपने रोल मॉडल पा सकें । इन पीठों के लिए अलग - अलग क्षेत्र से जुड़ी संस्थाओं को चुना गया है, जिनमें कृषि, बायोटेक्नोलॉजी, इम्यूनोलॉजी, फाइटोमेडिसिन, बायोकैमिस्ट्री, चिकित्सा, सामाजिक विज्ञान, पृथ्वी विज्ञान, मौसम विज्ञान, इंजीनियरिंग, गणित, भौंतिकी, और फंडामेंटल रिसर्च। इनमें कुछ वैज्ञानिकों के नाम यहाँ लेने प्रासंगिक होंगे । 


1932 में जन्मी डॉ. अर्चना शर्मा एक जानी - मानी साइटोजेनेटिक्स या कोशिकानुवांशिकी की शोधकर्ता थीं । वे साइटोलॉजी के अंतर्राष्ट्रीय जर्नल, ‘न्यूक्लियस’ की संस्थापक सदस्य थीं । उन्होंने क्रोमोज़ोम के अध्ययन की नई तकनीक का विकास किया था। वे पद्मभूषण से सम्मानित हुईं। जानकी अम्माल अग्रणी बॉटेनिस्ट थीं । गन्ने की नई मीठी प्रजाति और चीनी की मिठास के लिए उन्हें ही श्रेय जाता है। क्रास ब्रीडिंग के शोध के लिए उन्हें संसार भर में मान्यता मिली । जानकी अम्माल को पंडित नेहरू ने मिशिगन से वापस बुला लिया था; ताकि उनके शोध का लाभ भारतीय किसान उठा सकें । 1861 में जन्मी डॉ कादम्बिनी गांगुली चिकित्सक बनने वाली पहली दो महिलाओं में से एक थीं।1941 में जन्मी दर्शन रंगनाथन ऑर्गेनिक कैमिस्ट थीं। उन्हें प्राकृतिक बायोकैमिकल प्रक्रियाओं को करने के लिए जाना जाता है। 1917 में जन्मी डॉ. आसिमा चटर्जी ने ऑर्गेनिक कैमिस्ट्री और फाइटोमेडिसिन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया। मिर्गी के लिए दवाई और मलेरिया की रोकथाम के लिए उनकी बनाई हुई औषधियाँ आज भी काम आती हैं। डॉ इरावती कर्वे को रक्त सम्बन्धों की व्यवस्था पर अध्ययन के लिए क्रन्तिकारी माना जाता है। अन्ना मणि  एक मौसम विज्ञानी थीं, उन्होंने सौर विकिरण, वायु ऊर्जा और ओज़ोन पर उल्लेखनीय कार्य किया । उन्हीं के  मार्गदर्शन में वह कार्यक्रम बन पाया जिसके कारण भारत मौसम विज्ञान के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो पाया। 1922 में जन्मी डॉ. राजेश्वरी चटर्जी पहली महिला इंजीनियर थीं । उन्हें माइक्रोवेव और ऐंटिना इंजीनियरिंग के लिए जाना जाता है। उन्होंने  महिलाओं को इस क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित किया। रमन परिमला की  अलजेब्रा सम्बन्धी उपलब्धियों ने विशेषज्ञों तक को चकित कर दिया था। बिभा चौधुरी भौंतिक विज्ञानी थीं । वे पहली भारतीय महिला शोधकर्ता थीं जिन्हें भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक होमी भाभा द्वारा टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च के लिए चुना गया । उन्होंने 1940 के दशक में, एक सब एटॉमिक पार्टिकल की खोज की थी। 1917  में जन्मी कमल रणदीव एक बायोकैमिकल रिसर्चर थीं । इन्हें कैंसर पर शोध के लिए जाना जाता है। वे ‘भारतीय महिला  वैज्ञानिक संगठन’ के संस्थापक सदस्यों में से एक थीं । 

मिसाइल महिला टेसी थौमस
इनके अतिरिक्त समकालीन युग में भी अनेक महिला वैज्ञानिक हैं जिन्होंने भारतीय विज्ञान की दिशा और दशा दोनों को बदल कर रख दिया। इनमें राकेट वूमन जानी जाने वाली रितु करिघल, चन्द्रयान मिशन २ की निदेशक मुथैया वनिता, मंगल मिशन में मुख्य भूमिका निभाने वाली,जी सैट 10 और 12 की निदेशक रहने वाली अनुराधा टी के, मंगलयान की सफलता गढ़ने वाली मीनल सम्पत, मिसाइल महिला और अग्निपुत्री के नाम से विख्यात टेसी थॉमस। आज उनके सहयोग से बनी मिसाइल भारतीय सीमाओं की रक्षक हैं । इस तरह से उन्होंने भारतीय रक्षा प्रणाली को सुदृढ़ किया । 2022 में गगनयान लॉंच करने जा रही लतांबिका ए आर, एडवांस लॉंचर टेक्नोलोजी की विशेषज्ञ हैं । किरण मजूमदार शॉ एक महत्त्वपूर्ण नाम हैं जिन्होंने जैवप्रौद्यौगिकी में विशिष्ट योगदान किया, कैंसर और मधुमेह आदि पर इन्होंने कई शोध किए । इन्हें टाईम मैगज़ीन द्वारा दुनिया भर के सौ प्रभावशाली लोगों में गिना गया और फ़ॉर्चून पत्रिका में एशिया पैसिफ़िक की सबसे प्रभावशाली महिला माना गया । इनके साथ ही इंदिरा हिंदुजा को कौन भुला सकता है, जिन्होंने भारत में पहली बार टेस्ट ट्यूब बेबी सम्भव करके ना जाने कितने संतानहीनों को संतान सौंपी । अदिति पंत एक समुद्र विज्ञानी रहीं। उनके शोध के कारण ही अंटार्कटिका पर दक्षिण गंगोत्री स्टेशन की स्थापना हो सकी। यही नहीं, कल्पना चावला, भारतीय मूल की सुनीता विलियम्स आदि हमारी कई भारतीय महिला वैज्ञानिकों ने नासा तक पहुँच बनाई है।  

इंदिरा हिंदुजा
यद्यपि सन 2016 से, हर वर्ष ग्यारह फ़रवरी को, संयुक्त राष्ट्र संघ और यूनेस्को द्वारा संयुक्त रूप से ‘महिलाओं और बालिकाओं के लिए विज्ञान दिवस’ मनाया जाता है; परंतु यह दिवस अभी ‘महिला दिवस’ की तरह ख्याति प्राप्त नहीं है । 

पितृसत्तात्मक समाज की क्रूरता की सीमा कहाँ ठहरती है, कहना मुश्किल है । देश के वैज्ञानिक अनुसंधानों में जी - जान लगाने वाली जानकी अम्माल सहित इन महान महिला वैज्ञानिकों में से कई को सामाजिक उत्पीड़न से भी गुजरना पड़ा । कादम्बिनी गांगुली को तो  बंगाल की एक पत्रिका ने ‘वेश्या’ तक कह दिया था । परंतु स्त्रियों की स्थिति में सुधार करने के लिए कार्यरत उनके पति ने उनके इस घोर अपमान पर कोर्ट में केस दायर किया और सम्पादक महेश पाल को छह महीने की सजा दिलाई । महिलाओं के लिए बना दी गई  यह धारणा कि वे विज्ञान या गणित में पिछड़ी हुई होती हैं, जानबूझकर फैलाया हुआ एक भ्रम ही है  । मनुष्य का मस्तिष्क जिस कार्य का निरंतर अभ्यास करता है वह उसी में दक्ष हो जाता है । पिछली अनेक सदियों से स्त्री को अशिक्षित रख़कर घर का कार्य सौंप दिया गया, तो उसका मस्तिष्क उसी में पारंगत हुआ । पुरुष को शिक्षा, जिसमें गणित और विज्ञान से लेकर विभिन्न विषय थे, वे सौंपे गए तो वह उनमें पारंगत हुआ । परंतु समान अवसर पाया तो पौराणिक समय की आपाला, घोषा, लोपामुद्रा,गार्गी आदि से लेकर पिछली सदियों से समकालीन समय तक विज्ञान के क्षेत्र में वे अग्रणी रहीं । समान अवसर पाकर भारतीय महिलाएँ किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं । आज के समय में वे हर क्षेत्र में अपनी कार्यकुशलता से अपने विरुद्ध  बनाई गई हर धारणा को ध्वस्त कर रही हैं । वे आज घरेलू कार्यों से लेकर व्यापार, राजनीति,शिक्षा, साहित्य , खेल, चिकित्सा, विज्ञान आदि से लेकर देश की रक्षा पंक्तियों तक में उपस्थित हैं । परंतु स्त्रियों के लिए मुश्किलें अभी और भी हैं । अभी तो देश में एक नारा निरंतर गूँज रहा है, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभी तो हमें बेटी को बचाने की ही दुहाई देनी पड़ रही है, जिस दिन इससे छुटकारा मिलेगा, उस दिन दृश्य शीघ्रता से बदलना आरम्भ हो जाएगा । ■

nirdesh.nidhi@gmail.com

बाल कहानीः सिया का सपना


- डॉ. वंदना शर्मा 

सिया स्कूल जाने के लिए घर से निकली ही थी कि अचानक जोर की बारिश शुरू हो गई। बादल ऐसे गरज रहे थे जैसे आसमान भी आज स्कूल जाने से मना कर रहा हो। सिया ने सोचा, "वापस घर चली जाऊँ?" पर फिर मन में आया, "एक दिन भीग जाने से क्या हो जाएगा।" 

वो छाता लिए बिना ही भागती हुई स्कूल पहुँची। पूरी तरह भीग चुकी थी। गेट पर ही अंग्रेजी वाली मैडम मिल गईं। उन्हें गुस्सा आ गया। 

"घर नहीं बैठ सकती थी? स्कूल आना इतना जरूरी था? जाओ क्लास में बैठो। बारिश रुक जाए, तो घर चले जाना। तुम्हें अकेले क्या पढ़ाना है!"

सिया चुपचाप सिर झुकाकर क्लास में चली गई। आज कोई बच्चा नहीं आया था। पूरी क्लास खाली थी। सिया को बुरा तो लगा, पर उसने हार नहीं मानी। 

उसने ब्लैकबोर्ड पर रंग-बिरंगी ड्राइंग बनानी शुरू की। फिर अपनी कॉपी के पन्ने फाड़े, उन पर सुंदर चित्र बनाए, छोटी-छोटी कविताएँ लिखीं और पूरी क्लास की दीवारों पर चिपका दीं। खाली क्लास को उसने अपने रंगों से सजा दिया।

थोड़ी देर बाद मैडम क्लास में आईं। खाली और उदास क्लास को इस तरह सजा देखकर उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने सिया को गले लगा लिया। 

"शाबाश बेटा! चलो मेरे साथ।"

मैडम सिया को स्कूल की लाइब्रेरी ले गई-। "इनमें से जो किताब अच्छी लगे ले लो और यहीं बैठकर पढ़ो।"

सिया ने दो कहानी की किताबें निकालीं और मासूमियत से पूछा, "मैम, क्या मैं इन्हें घर ले जाकर पढ़ सकती हूँ?"

मैडम मुस्कुराईं, "हाँ बेटा, ले जाओ।"

सिया खुशी-खुशी किताबें बैग में रखकर घर के लिए निकली। रास्ते में उसे एक छोटी सी बिल्ली मिली। ठंड से ठिठुर रही थी, भीग रही थी। सिया का दिल पिघल गया। उसने अपने दुपट्टे से बिल्ली को पोंछा, गोद में उठाया और घर ले आई। 

घर आकर उसने बिल्ली को तौलिए से सुखाया, गर्म कपड़े में लपेटा, उसे दूध पिलाया और खुद भी खाना खाकर सो गई। दिनभर की थकान और बारिश के बाद उसे गहरी नींद आ गई।

नींद में सिया ने एक सपना देखा। 

उसकी वही बिल्ली अब एक सुंदर परी बन गई थी। उसकी पोशाक चमक रही थी। परी ने प्यार से सिया का हाथ पकड़ा और कहा, "सिया तुमने मेरी मदद की है। आज मैं तुम्हारी मदद करना चाहती हूँ। बोलो, तुम्हें क्या चाहिए?"

सिया का बालमन खुशी से उछल पड़ा। उसने कहा, "परी दीदी, मेरे लिए एक बड़ा- सा घर बना दो। उसमें एक सुंदर झूला लगा दो। मेरा सारा होमवर्क भी कर दो। और... और मुझे बहुत भूख लगी है, कुछ खाने को भी दे दो।"

परी ने ताली बजाई और एक पल में सब कुछ हो गया। बड़ा- सा घर, उसमें झूला, मेज पर गरमा-गरम खाना और सिया की कॉपी में अपने आप होमवर्क लिखा जा रहा था। 

सिया खुशी से चिल्लाई, "मम्मी! मम्मी! देखो हमारा नया घर!"

तभी एक प्यारी सी चपत उसके गाल पर पड़ी। 

"सिया उठो! खाना खा लो। कितना सोएगी?"

सिया हड़बड़ाकर उठी। देखा, तो वह अपने पुराने वाले कमरे में थी। न कोई बड़ा घर था, न झूला। बिल्ली भी वहाँ नहीं थी। 

सिया ने मायूस होकर पूछा, "मम्मी, वो बिल्ली मौसी कहाँ गई?"

मम्मी हँसकर बोलीं, "वह तो थोड़ी देर में ही खाकर चली गई अपने घर।"

सिया ने अपना माथा पकड़ा और धीरे से बोली, "काश... काश ये सपना सच होता।"

मम्मी ने सिया का सिर सहलाया और पूछा क्या सपना देखा हमारी सिया ने। सिया ने सारा किस्सा सुना। दोनों खूब हँसे। 

मम्मी ने कहा, "बेटा, सपने सच करने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। तुमने आज क्लास सजाई, किताबें पढ़ीं, एक जानवर की मदद की। तुम आगे बढ़ोगी, तो एक दिन तुम्हारा अपना बड़ा घर भी होगा और झूला भी।"

सिया समझ गई। उसने मुस्कुराकर कहा, "ठीक है मम्मी। मैं मेहनत करूँगी।"

उस रात सिया फिर सोई, पर इस बार बिना किसी सपने के। क्योंकि उसे पता था, अपने सपने उसे खुद सच करने हैं। ■ 

सम्पर्कः नई दिल्ली, vandna.reporter@gmail.com

लघुकथाः सबक

  - छवि निगम

ऋचा के कमरे से बाहर आते ही नीरव दाँत पीसते हुए बुदबुदाया, "ये अंदर मैथ्स की ट्यूशन ले रही थीं या इन हाईस्कूल के स्टूडेंट्स का दिमाग खराब कर रही थीं, हैं!"

ऋचा की आवाज शांत थी, "क्लास खत्म करके पाँच मिनट तो मैं बच्चों से रोज बात करती ही हूँ; लेकिन आज अचानक आकर आपने ऐसा क्या सुन लिया?"

नीरव और झल्ला गया, "अरे उनको ये सब खबरें-वबरें बाँचना... और क्या! और ये सब वाहियात उलटी-सीधी सुर्खियाँ.. ये सब डिटेल उन्हें बताने की जरूरत ही क्या है? जरा ये तो सोचो तुम हमारे राहुल और पीयूष को भी तो साथ पढ़ाती हो। क्या असर पड़ेगा उन पर?"

ऋचा ने उसकी आँखों में आँखें डालते हुए कहा, "असर ये पड़ेगा कि मेरे सारे विद्यार्थियों की तरह वे भी संवेदनशील बनेंगे। कल ये सब खौफनाक सुर्खियाँ ही गायब हो जाएँ, इसके लिए मैं आज को सुधार रही हूँ। मैं उन्हें लड़कियों की इज्जत करना, उनकी तकलीफ महसूस करना सिखा रही हूँ, बस।"

नीरव के पंजे का दबाव उसकी बाँहों पर बढ़ता चला जा रहा था- “बंद करो ये सब बकवास..." आगे कुछ कहते हुए अचानक वह खड़ा का खड़ा रह गया। उसका हाथ नीचे गिर गया। सामने बैग टाँगे हुए उसका बेटा राहुल खड़ा उसे एकटक देख रहा था और नीरव पहली बार उससे नजरें नहीं मिला पा रहा था। ■

विज्ञानः झगड़े से बचना हो तो गले मिलें

 
किसी ने खुलकर गले लगाया हो, ज़ोरदार झप्पी दी हो, तो उसके बाद उस पर बरस पड़ना या उससे जमकर झगड़ना मुश्किल होता है। हमारा यह अनुभव रहा है कि सकारात्मक स्पर्श – हाथ थामना, थपथपाना, सहलाना, आलिंगन वगैरह आपसी रिश्तों को मज़बूत करते हैं। 

और अब, ऐसा वानरों में भी देखा गया है। देखा गया है कि तनाव की स्थिति में रिश्ते बनाए रखने के लिए, तनाव टालने के लिए बोनोबो और चिम्पैंज़ी गले मिलते हैं, हाथ पकड़ते हैं। इस बात का पता लगा है दो अभयारण्यों में रह रहे बोनोबो और चिम्पैंज़ी समूहों के अवलोकन से। 

डरहम युनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों के एक दल ने डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और ज़ाम्बिया के अभयारण्यों में रह रहे बोनोबो और चिम्पैंज़ियों के पांच समूह का अध्ययन किया। शोधकर्ता वानरों के बाड़े की बागड़ पास जाकर समय-समय वानरों को पुकारते थे। वानर बाड़े के किनारे आ जाते थे और भोजन का इंतज़ार करते थे। कुछ समय बाद, शोधकर्ता मूँगफली से भरा एक बर्तन बाड़े में रख देते थे, जिसमें अपर्याप्त मात्रा में मूँगफली होती थी। कम मात्रा में मूँगफली होने के कारण वानरों में उन्हें लेने के लिए होड़ मच जाती थी। ऐसा करते समय शोधकर्ताओं ने मूँगफली मिलने से पहले, मूँगफली लेते और खाते समय, और खाने के बाद वानरों के आपसी व्यवहार का अवलोकन किया।

प्रोसीडिंग्स ऑफ दी रॉयल सोसाइटी बी में शोधकर्ताओं ने बताया है कि जो वानर मूँगफली मिलने से कुछ देर पहले एक-दूसरे को गर्मजोशी (हाथ पकड़ना, थपथपाना, सहलाना, आलिंगन आदि) से स्पर्श करते थे, वे आपस में मूँगफली के लिए लड़ने की बजाय उसे मिल-बाँटकर खाते थे। ऐसा स्वभाव अधिकतर शांतिप्रिय समूहों में देखा गया। यह दर्शाता है कि दोस्ताना स्पर्श सामाजिक रिश्तों को मज़बूत करता है और होड़ कम करता है। और तो और, यह तक देखा गया कि कुछ नर चिम्पैंज़ी एक-दूसरे के मुँह में अपनी उँगलियाँ दे रहे थे। गौरतलब है कि वानर समूहों में मुँह में उँगली देना तनाव या झगड़े की स्थिति में खतरे से खाली नहीं होता - लड़ाई-झगड़े की स्थिति में वानर प्रतिद्वंद्वी की उँगली बुरी तरह काटकर उसे चोटिल कर सकते हैं। लेकिन अपर्याप्त भोजन होने की स्थिति में भी वानरों का मुँह में उँगली डालकर जोखिम उठाना उनके भरोसे और मज़बूत रिश्ते का द्योतक था।

बोनोबो और चिंपैंज़ी हमारे करीबी रिश्तेदार हैं; इस साझा व्यवहार से लगता है कि गर्मजोशी जताकर शांति बनाए रखने का व्यवहार हमारे साझा पूर्वजों की देन है। (स्रोत फीचर्स)■

लघुकथाः प्रा र्थ ना एँ

  - अनिता मण्डा 

रसोईघर की खिड़की के बाहर छज्जे पर पौधों की टोकरियाँ लटकी हुई हैं। कइयों में मौसमी फूलों के पौधे हैं, कुछ में स्पाइडर प्लांट ख़ूब हरे-भरे लगे हुए हैं। कुछ दिनों से एक चिड़िया का जोड़ा इन पर खेल रहा था। 

जोड़े ने अभी पाँच-सात दिन से कुछ सामान; तिनके, नर्म पंख, धागे इत्यादि लाकर जमा करना शुरू कर दिया है। स्पाइडर प्लांट के बेबी पफ़ निकले हुए हैं, जिन पर कई बेबी प्लांट रहते हैं। उसी बेबी पफ़ वाली टहनी के सहारे यह जोड़ा अपना घर बना रहा है। रोज़ पचासों बार उड़ना, कुछ न कुछ लाना लगा हुआ है। ये सारी गतिविधियाँ देखकर मन बहुत ख़ुश है। 

डर भी है कि एक टहनी के सहारे बना घरौंदा किसी अनहोनी की भेंट न चढ़ जाए। दिन में कई-कई बार देखती हूँ, इस बात पर घर वाले अक्सर मेरा मज़ाक भी उड़ाते हैं।

चिड़े-चिड़ी को देखकर लगता है कि शीघ्र ही नए मेहमानों की आमद होने वाली है। यानी कि जचकी होने वाली है। दादी से बहुत पहले सुना था कि जब कभी घर में गाय, बकरी की जचकी होती थी; दादी की माँ उस दिन जचकी होने के पहले भोजन नहीं करती थी। कहती- "घर में कोई कष्टी है, तो निवाला गले से कैसे उतरे।"  शायद  यही कारण है कि इन दिनों मुझे भी ठीक से भूख नहीं लग रही है। 

नन्हे-नन्हे पंख खुलेंगे, सारा दिन चहचहाना गूँजेगा। सोचकर ही मीठी -सी गुदगुदी हो रही है।

प्रार्थना करती हूँ- “हे ईश्वर इनकी ख़ुशी सलामत रखना!’’■

हाइकुः किसान की कथाएँ

  - भीकम सिंह

1

दूर है कंत 

रुआँसे लौट रहे 

सारे बसंत।

2

उपेक्षित हैं 

किसान की कथाएँ 

खेत क्या गाएँ।

3

मेघों के स्वर 

बगावत के हैं तो?

क्या करें घर।

4

ढूँढते पाँव 

सुबह और शाम 

खेतों में गाँव।

5

सैंकड़ों बार 

स्मृतियों ने बाँधे हैं 

बन्दनवार 

6

चुप ही रहूँ

अँधेरों के खिलाफ 

क्या सच कहूँ ?

7

जगते दीये 

अँधियारा बैठा है 

होठों को सिये।

8

दरो-दीवारें 

आँगन के भी तारे 

माँ ही क्यूँ हारे।

9

बीड़ी फूँकता 

खेतों में बैठकर 

गाँव का डर।

10

नभ को हारे 

चाँद जस का तस 

दिखाता तारे।


प्रदूषणः ई-कचरे के समाधान की दिशा में बड़ी उपलब्धि

 - प्रमोद भार्गव

भारत ही नहीं दुनिया ई-कचरे के निस्तारण की समस्या से जूझ रही है। ऐसे में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास के शोधकर्ताओं ने मेक इन इंडिया के अंतर्गत एक स्वदेशी प्रायोगिक संयंत्र विकसित किया है। यह प्रतिवर्ष 100 टन इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट का प्रसंस्करण करने की क्षमता रखता है। यह प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (पीसीबी) के उपचार के लिए डिजाइन किया गया है। इसे भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) के तिरुचिरापल्ली में स्थित परिसर में स्थापित किया गया है। पीसीबी इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट सबसे अधिक खतरनाक और धातुओं से भरपूर घटकों में से एक हैं। इनमें तांबा, सीसा और टिन जैसी धातुएँ पर्याप्त मात्रा में होती हैं। यदि इस कचरे का उचित प्रबंधन नहीं किया जाए तो ये धातुएँ मिट्टी और भू-जल में रिसकर लंबे समय तक पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकती है। ऐसे समय में जब भारत हर वर्ष लगभग 50 लाख मीट्रिक टन ई-कचरा पैदा कर रहा हो, तब आईआईटी मद्रास के शोधार्थियों की यह उपलब्धि बहुत बड़ी है। क्योंकि यह अनुपयोगी हुए ई-उपकरणों से मिट्टी पानी या वायु को प्रदूषित किए बिना मूल्यवान धातुएँ निकाल कर उन्हें पुनः उपयोग के लायक बना देता है। 

आआईटी मद्रास के रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग के प्राध्यापक एस पुष्पावनम और वाईबीजी वर्मा का कहना है कि भारत में ई-कचरे की चुनौती बढ़ने के साथ यह संयंत्र साफ-सुथरे तरीके से धातु निकालने के लिए एक ऐसा मॉडल है, जिसे आसानी से बड़े पैमाने पर लागू किया जा सकता है। यह काम मेक इन इंडिया सर्कुलर इकोनॉमी और जरूरी खनिजों की सुरक्षा के लक्ष्यों के अनुरूप है। यह अकादमिक अनुसंधान को प्रौद्योगिकी विकास में बदलने का दुर्लभ उदाहरण है। इस प्रक्रिया को एकमात्र अम्ल के प्रयोग से संपन्न कर लिया जाता है। इसमें उच्च स्तरीय सुरक्षा के स्वचालित उपाय किए गए हैं। यह संयंत्र पूरी तरह भारतीय कंपनियों द्वारा निर्मित है। यह संयंत्र भारत और एशियाई देशों के लिए इसलिए बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि पर्यावरण पर वैश्विक निगरानी रखने वाली सिएटल स्थित संस्था बासेल एक्षन नेटवर्क (बीएएन) की रिपोर्ट में जानकारी दी है कि अमेरिका से लाखों टन खराब इलेक्ट्रॉनिक सामग्री कई देशों में ठिकाने लगाने की दृष्टि से भेजी जा रही है। जिनमें से अधिकांश दक्षिण-पूर्व एशिया के विकासशील देश हैं। इन देशों में इस खतरनाक कचरे का सुरक्षित रूप से नष्ट करने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए वे इसे लेने को तैयार नहीं हैं। बावजूद दस अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ प्रयोग की उम्र समाप्त कर चुके इलेक्ट्रॉनिक कचरे को एशिया और पश्चिमी एशिया के निर्धन देशों में ठिकाने लगा रही है। इसे ई-कचरे की छिपी हुई सुनामी माना जा रहा है। 

रपट के अनुसार यह ई-कचरे की अदृश्य सुनामी है, क्योंकि ये गरीब देश इस कचरे का पुनर्चक्रण करने में समर्थ नहीं हैं। फिर भी ताकतवर पूँजीपति देश इन देशों को अपने कचरे का ठिकाना बनाने में लगे हुए हैं। अतएव पर्यावरण को हानि पहुँचाने वाली संस्थाओं को यह आकलन करना कठिन हो रहा है कि घातक कचरा जिन देशों में फेंका जा रहा है, वहाँ का वायुमंडल किस हद तक प्रभावित एवं प्रदूषित होगा। वहाँ के लोगों के स्वास्थ पर कितना असर पड़ेगा, यह अंदाजा कोई नहीं लगा पा रहा है। इस कचरे में कंप्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट, मोबाइल और अन्य आईटी उपकरण शामिल हैं। इनमें सीसा, कैडमियम और पारा जैसी सामग्रियाँ हैं, जो मूल्यावन होने के साथ विषाक्त हैं। जैसे-जैसे गैजेट्स नए मॉडल के साथ तेजी से बदले जा रहे हैं, वैसे-वैसे पुनर्चक्रित नहीं किए जाने वाला कचरा पाँच गुना बढ़ता जा रहा है। इस नजरिये से भारत में निर्मित यह संयंत्र अत्यंत उपयोगी है। भविष्य में इसके निर्यात से भारत विदेशी पूँजी भी कमाएगा। 

संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ और अनुसंधान शाखा (यूएनआईटीएआर) के अनुसार एकत्रित आँकड़े बताते है कि वैश्विक स्तर पर 2022 में 6.2 करोड़ मीट्रिक टन ई-कबाड़ उत्पन किया गया। 2030 तक इसके उत्पादन की मात्रा 8.2 करोड़ मीट्रिक टन हो जाने का अनुमान है। रपट के अनुसार हर महीने लगभग 2000 कंटेनरों में लगभग 33,000 मीट्रिक टन अमेरिका में इस्तेमाल किया गया ई-कचरा अमेरिकी बंदरगाहों से बाहर भेजा जाता है। इन कंटेनरों की खेपों की आपूर्ति करने वाली कंपनियों को ई-कचरा ब्रॉकर कहा जाता है। ये आमतौर पर स्वयं कचरे का पुनर्चक्रण करने की बजाय इसे लाचार गरीब देशों के बंदरगाहों पर उतार देती हैं। यह कचरा लगातार एशियाई देशों में कचरे के बोझ को बढ़ाकर कई तरह के पर्यावरणीय संकट पैदा कर जल, वायु और पृथ्वी को प्रदूषित कर रहा है। इस कचरे से घातक लैंडफिल गैसों का भी उत्सर्जन कुछ सालों के बाद होने लगता है। इनसे उत्पन्न जहरीला रसायन जल और मिट्टी को दूषित करता है। इस कचरे का बहुत बड़ा हिस्सा गरीब लोग अपनी आजीविका चलाने के लिए कबाड़खानों में पहुँचा देते हैं। यहां काम करने वाले मजदूर अकसर बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के उन्हें हाथों से जला एवं पिंघलाकर अलग कर खोलते हैं। इस प्रक्रिया से विषाक्त धुआँ निकलता है, जो अत्यंत हानिकारक होता है। बासेल एक्शन नेटवर्क की संधि के मुताबिक इस्तेमाल किए गए ई-कचरे को एक देश से दूसरे देश भेजने की अनुमति केवल ऐसे कचरे को है जिसे पुनर्चक्रित करके पुनः इस्तेमाल किया जा सके और जो पर्यावरण को प्रदूषित नहीं करने वाला हो; लेकिन ये कंपनियाँ ऐसी किसी शर्त का पालन नहीं कर रही हैं। यही कारण है कि दुनिया में पुनर्चक्रण की तुलना में ई-कबाड़ में पाँच गुना वृद्धि हो रही है। 

      आज ई-कचरा,जिसमें बड़ी मात्रा में प्लास्टिक के उपकरण भी शामिल हैं, नष्ट करना भारत समेत दुनिया के देशों के लिए मुश्किल हो रहा है। इसे नष्ट करने के जैविक उपाय तलाशे जा रहे हैं। जापान के क्योटो विश्वविद्यालय ने एक ऐसे जीवाणु के अनुसंधान का दावा किया है,जो जैविक रूप से प्लास्टिक नष्ट कर सकता है; हालांकि भारत में यही काम औद्योगिक एवं प्रौद्योगिकी कचरे को नष्ट करने के लिए केंचुओं से कराया जा रहा है। औसतन एक टन ई-कचरे के टुकड़े करके उसे यांत्रिक तरीके से पुनर्चक्रित किया जाए तो लगभग 40 किलो धूल या राख जैसा पदार्थ तैयार होता है। इसमें अनेक कीमती धातुएँ समाहित रहती हैं। इन धातुओं को अलग करने की प्रक्रिया में हाथों से छंटाई, चुंबक शक्ति से विलगीकरण, विद्युत-विच्छेदन, सेंट्रीफ्यूजन और उलट ऑस्मोसिस जैसी तकनीक शामिल हैं। लेकिन ये तरीके मानव शरीर और पर्यावरण को हानि पहुँचाने वाले हैं; इसलिए इस हेतु बायो-हाइड्रो मेटलर्जिकल तकनीक कहीं ज्यादा बेहतर मानी जा रही है। इस तकनीक को अमल लाते वक्त सबसे पहले बैक्टीरियल लिंचिंग प्रोसेस; बायो लिंचिंग  का प्रयोग करते हैं। इसके लिए ई-कचरे को बारीक पीसकर उसे जीवाणुओं के साथ रखा जाता है। बैक्टीरिया में मौजूद एंजाइम कचरे में उपस्थित धातुओं को ऐसे यौगिकों में बदल देते हैं कि उनमें गतिशीलता पैदा हो जाती है। बायो-लिंचिंग की विधि में जीवाणु कुछ विशेष धातुओं को अलग करने में मदद करते हैं। हालाँकि कई प्रकार के जीवाणुओं और फफूंद का उपयोग प्रिंटेड सर्किट बोर्ड से सीसा, तांबा और टिन को अलग करने के लिए किया जाता रहा है। इस हेतु जीवाणुओं की बेसिलस प्रजातियाँ मसलन सेक्रोमाइसिस सेरेविसी, यारोविया लिपॉलिटिका प्रयोग में लाई जाती हैं। 

इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के विशेषज्ञों का मानना है कि औसतन एक स्मार्टफोन में 30 मिलीग्राम सोना होता है। यह फोन के सर्किट बोर्ड और इंटरनल कंपोनेंट्स में होता है। एपल ऐसे लाखों आईफोन और कंप्यूटर की रीसाइक्लिंग करता है,जिनमें सोना होता है। एपल अपने निगरानी एडिशन को पुनर्चक्रित भी करता है। इनमें 18 कैरेट की गुणवत्ता वाले तकरीबन 50 ग्राम सोने का इस्तेमाल होता है। साफ है, समस्या बने ई-कचरे को यदि पुनर्चक्रित करने के संयंत्र बड़ी संख्या में लगाए जाते हैं तो बड़े पैमाने पर युवा तकनीकियों को रोजगार तो मिलेगा ही, विकासशील और गरीब देश बड़े स्तर पर इस कचरे को नष्ट करने के झंझट से भी मुक्त हो जाएँगे। इसलिए इस कचरे को जो कंपनियाँ जिन देशों में ठिकाने लगा रही हैं, वहां इस कचरे के निस्तारण के लिए आईआईटी मद्रास द्वारा निर्मित संयंत्रों को निर्यात भी करने का रास्ता भविष्य में भी खुल जाएगा। ■

सम्पर्कः शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224, 9981061100


पर्यावरणः जलवायु परिवर्तन और लुप्त होता अमरनाथ शिवलिंग

  - पंकज चतुर्वेदी

करोड़ों हिंदुओं की गहरी आस्था का केंद्र अमरनाथ यात्रा को चलना तो 57 दिन हैं । तीन  जुलाई 2026 को यात्रा शुरू होने के बाद पाँचवें दिन के अंत तक दर्शनार्थियों की  संख्या बढ़कर 1,13,800 तक  पहुँच चुकी थी; लेकिन  इसी दिन से शिविलिंग लगभग 90 फीसदी पिघल गया । समझना होगा कि  यह आस्था के साथ-साथ स्थानीय लोगों के रोजगार का सवाल तो है ही, बल्कि यह हमारे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य का एक बड़ा पैमाना भी है। लेकिन इस वर्ष 2026 की यात्रा ने एक ऐसा सच सामने रखा है, जो न केवल हैरान करने वाला है, बल्कि पर्यावरण के प्रति हमारे लापरवाह रवैये पर कड़े सवाल भी खड़े करता है। अमरनाथ गुफा में जो पवित्र हिम-शिवलिंग प्राकृतिक रूप से बनता है, वह इस बार यात्रा के महज 5-6 दिनों में ही 90 प्रतिशत तक पिघल गया और उसकी ऊँचाई सिमटकर मात्र एक फुट रह गई ।  यह स्थिति किसी आपदा से कम नहीं है और यह हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव को रेखांकित करती है।

यात्रा के लिए निर्धारित 57 दिनों की अवधि के बीच में ही शिवलिंग का इस तरह विलीन हो जाना यह दर्शाता है कि हम प्रकृति के साथ किस हद तक खिलवाड़ कर रहे हैं।  वैज्ञानिक और स्थानीय जानकारों का मानना है कि इसके पीछे कई ठोस कारण हैं। इस साल कश्मीर घाटी में तापमान ने कई पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। मई और जून के महीनों में पड़ी तेज धूप और गर्म हवाओं ने गुफा के आसपास के वातावरण को बुरी तरह प्रभावित किया।  इसके अलावा, पिछली सर्दियों में कम बर्फबारी हुई, जिससे गुफा के पास वह प्राकृतिक ठंडक नहीं बन पाई जो हिमलिंग को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए जरूरी होती है।

पिछले वर्षों के रुझानों को देखें तो यह स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई है। वर्ष 2024 में कश्मीर घाटी में जून-जुलाई के दौरान भीषण गर्मी की लहर देखी गई थी, जिसे हिमलिंग के जल्दी पिघलने का प्रमुख कारण माना गया।  इसी तरह, वर्ष 2025 में भी मौसमी अस्थिरता साफ दिखाई दी, जहाँ बर्फबारी के बाद न्यूनतम तापमान में 6 डिग्री तक का उछाल दर्ज किया गया, जो इस बात का संकेत है कि हिमालय में मौसमी पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं।  ये आँकड़े बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के मामले में दुनिया के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक है।

इस विषय पर एक बड़ी चुनौती सही डेटा के अभाव की भी है। अमरनाथ गुफा एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है, लेकिन वहाँ स्थायी रूप से काम करने वाले ऑटोमेटेड वेदर स्टेशनों का सार्वजनिक डेटा सीमित है।  भारतीय मौसम विभाग मुख्य रूप से 5 से 7 दिनों का पूर्वानुमान और जिला-स्तर के अपडेट देता है, न कि दशकों पुरानी क्लाइमेटोलॉजिकल सीरीज़।  इसी कारण शोधकर्ता और मीडिया अक्सर श्रीनगर, पहलगाम या अनंतनाग जैसे निकटवर्ती स्टेशनों के डेटा को आधार मानकर गुफा-स्तर के स्थानीय अवलोकनों—जैसे हवा, नमी और बर्फबारी—को जोड़ते हुए स्थिति का आकलन करते हैं।

सबसे गंभीर पहलू मानवीय हस्तक्षेप का है। अमरनाथ गुफा का तापमान वहाँ मौजूद ‘माइक्रोक्लाइमेट’ पर निर्भर करता है।  एक अध्ययन के अनुसार, गुफा के भीतर जाने वाला हर श्रद्धालु लगभग 100 वाट ऊष्मा उत्सर्जित करता है।  जब लाखों लोग वहाँ पहुँचते हैं, तो गुफा के अंदर की गर्मी और नमी खतरनाक स्तर तक बढ़ जाती है, जिससे बर्फ का शिवलिंग तेजी से पिघलने लगता है।  इसके ऊपर गुफा के आसपास होने वाली मशीनी गतिविधियाँ और शोर-शराबा भी वहाँ के तापमान को प्रभावित करते हैं, जिसका सीधा असर शिवलिंग के अस्तित्व पर पड़ता है। बढ़ती यात्रियों की संख्या के लिए सुविधाएँ जुटाने, वाहनों की अनुमति , पक्के निर्माण जैसे की कारण है जिसके चलते  अमरनाथ शिवलिंग समय से बहुत पहले सिमट गया ।

पर्यावरण विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी दे रहे हैं कि ग्लेशियरों का सिकुड़ना और बर्फबारी के बदले हुए पैटर्न इस बात के स्पष्ट सबूत हैं कि हम जलवायु संकट के बीच में खड़े हैं।  पवित्र हिमलिंग का निर्माण एक अत्यंत सूक्ष्म प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें छत से टपकने वाली जल-बूँदें जमाव बिंदु के नीचे के तापमान में शिवलिंग का आकार लेती हैं।  जब हम उस स्थान के स्थानीय तापमान में मानवीय गतिविधियों या अत्यधिक भीड़ के जरिए बदलाव लाते हैं, तो यह कुदरती प्रक्रिया ठप हो जाती है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या हम अपनी आस्था के प्रतीक को बचाने के लिए कुछ बदलाव के लिए तैयार हैं? हमें यह समझना होगा कि तीर्थयात्रा का अर्थ केवल वहाँ तक पहुँचना नहीं है; बल्कि उस स्थान के प्रति सम्मान और संतुलन बनाए रखना भी है। इसके लिए विशेषज्ञों के सुझावों पर अमल करना अनिवार्य हो गया है।  हमें यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की दैनिक संख्या को नियंत्रित करना होगा; ताकि गुफा के भीतर का तापमान स्थिर रहे।  गुफा के आसपास मशीनों और अन्य यांत्रिक साधनों के उपयोग पर पूरी तरह रोक लगानी होगी।  साथ ही, हिमालयी क्षेत्र की विशिष्ट जलवायु को देखते हुए हमें अपनी विकासवादी सोच में बदलाव लाना होगा और जलवायु अनुकूलन पर जोर देना होगा।

आस्था और प्रकृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं होने चाहिए। अगर हम आने वाली पीढ़ियों के लिए इस पवित्र धरोहर को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो हमें विकास और दर्शन के नए और सतत तरीके खोजने होंगे। यह समय चेतने का है; क्योंकि प्रकृति के साथ खिलवाड़ की कीमत अक्सर बहुत बड़ी चुकानी पड़ती है। क्या हम प्रकृति के इस नाजुक संतुलन को बनाए रखने के लिए अपनी जीवनशैली और यात्रा के तरीकों में बदलाव करने को तैयार हैं? हिमालय की गोद में बसी यह गुफा हमें बार-बार यह याद दिलाती है कि हम धरती के मालिक नहीं; बल्कि इसके संरक्षक हैं। आने वाले वर्षों में हमारी रणनीति केवल तीर्थयात्रा के प्रबंधन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; बल्कि यह जलवायु सुरक्षा का एक बड़ा अभियान होनी चाहिए, ताकि हिमलिंग का यह पवित्र रूप भविष्य में भी श्रद्धालुओं को दर्शन देता रहे। ■ (indiaclimatechange.com से साभार)


Sep 4, 2026

कविताः मृत्यु, तू जब भी आना...

  - डॉ. पूनम चौधरी

मृत्यु,

तू जब भी आना, दबे पाँव आना।

इतना धीरे

कि न टूटे

मेरे घर की हवा का संतुलन।

न काँपे तेरी आहट से

तुलसी की पत्तियों पर ठहरी ओस।

घर के कोनों में न भर देना

अचानक से खालीपन।

बस मेरे  स्पंदन को

बन जाने देना स्मृति।


मैं केवल एक देह,

एक नाम,

एक स्त्री नहीं हूँ।

मैं फैली हूँ—

उस दाम्पत्य में

जो शब्दों से नहीं,

साथ बिताए समय के 

अवक्षेप से बना है;

जहाँ एक के अंतर्मन में उठा

अल्पतम कंपन भी

दूसरे तक

बिना किसी उच्चारण के 

पहुँच जाता है।

 

उन अदृश्य आश्रयों में,

जहाँ मेरे बच्चे

अपनी पराजय,

अपने भय

और अपने अनकहे दुःख

मेरी हथेलियों पर रखकर

निश्चिंत हो जाते हैं।

 

अपनी माँ की प्रार्थनाओं में,

जहाँ मैं आज भी

उनकी चिंता का 

सबसे कोमल कारण हूँ।

 

अपने विद्यार्थियों की

उत्सुक आँखों में,

जो अपने

नन्हे हाथों से

वर्णमाला का 

पहला स्वर साध रहे हैं।

 

आँगन का हरसिंगार,

खिड़की की गौरैया,

दरवाज़े पर बैठा वह बूढ़ा कुत्ता—

ये सब मेरे जीवन के बाहर नहीं,

मेरे जीवन के विस्तार हैं,

जो मेरे होने को

किसी परिचय के बिना 

पहचान लेते हैं।

 

इसलिए, मृत्यु,

तू जब भी आना,

दबे पाँव आना।

 

मुझे पता है,

मेरा जाना भी

इस व्यवस्था का स्वाभाविक क्रम है

 

किन्तु

हर प्रस्थान का होता है 

एक ऋतु-विज्ञान,

हर विदाई की होती है एक गरिमा।

 

बस तब आना,

जब मेरे हिस्से का प्रेम

पहुँच चुका हो

अपने समस्त आश्रयों तक।

 

जब मेरी उपस्थिति से बड़ा हो गया हो

मेरे होने का अर्थ। 

जब आना,

तो किसी वज्रपात की तरह मत आना।

 

आना

जैसे पका हुआ फल

शाख से अलग होता है।

 

आना

जैसे नदी

बिना किसी शोर के

सागर में

अपना नाम विसर्जित कर देती है।

 

आना

जैसे दीप

अपने होने को 

प्रकाश में बदल 

फिर स्वयं

निस्पंद हो जाता है।

 

वैसे ही 

मेरे जाने के बाद

मेरे हिस्से की करुणा,

मेरे हिस्से की ऊष्मा,

मेरे हिस्से का विश्वास

उनके जीवन में बना रहे।

 

और जब कभी

मेरी अनुपस्थिति उन्हें छुए,

तो वह दुःख नहीं,

साहस में बदल जाए।

 

बस तब

ले चलना—

जब मन में

कुछ भी अवशेष न हो।

 

न कोई ऋण,

न कोई अनुताप,

न कोई मोह,

न कोई आकुल पुकार।

 

केवल यह संतोष हो

कि जीवन ने जो मेरे हाथों में सौंपा था,

उसे थोड़ा और सार्थक बनाकर

लौटा दिया। ■

संस्मरणः भाऊ जी

  - सुदर्शन रत्नाकर     

नाम तो उनका दरिया दित्ता था, हम सब उन्हें भाऊ जी कहा करते थे। मझोला कद, गेहुँआ रंग लिए गठीला बदन, मुंडा सिर। खादी की सफेद धोती, हल्के भूरे रंग का कुर्ता। पाँवों में खड़ाऊँ। सर्दी -गर्मी हमेशा यही वेशभूषा। अधिक सर्दी होने पर सुबह और रात्रि में सफेद लोई ओढ़ लेते। दिन के समय धूप में बैठ जाते। वह प्रभात बेला में उठकर नहा लेते और साथ में  अपने कपड़े भी धो लेते थे। बचपन में हमें लगता था कि वह कभी नहाते ही नहीं। उनके निवास स्थान के सामने ही सार्वजनिक नल लगा हुआ था। सुबह होते ही पानी लेने वालो का ताँता लग जाता। गुसलखाना न होने के कारण उन्हें नल के नीचे ही नहाना पड़ता था; इसलिए वह लोगों के आने से पहले ही सारे काम निपटा लेते। जब तक सूर्य निकलता वह चाय पीकर अपना काम शुरू कर देते थे। पीले रंग के काग़ज़ों पर काली स्याही से उर्दू में लिखते। उनकी लिखाई मोतियों के समान थी। जैसे छपी हुई हो। वह किसी उर्दू पत्रिका के लिए लिखा करते थे। यही उनकी जीविका का साधन था। 

भारत विभाजन के बाद पानीपत में विस्थापितों के लिए मॉडल टाउन का निर्माण किया गया था। अन्य परिवारों की तरह उनका परिवार भी वहाँ आकर बस गया। माता-पिता बहनें सब थे, पर वे ठहरे संवेदनशील और स्वाभिमानी। उनकी सौतेली  माँ का व्यवहार उनकी बड़ी बहन और उनके साथ अच्छा नहीं था। बहन की शादी हो चुकी थी। एक दिन माँ की कोई बात उनके मन को भीतर तक छीज गई। पिता ने भी उनका साथ नहीं दिया। बस रूठकर बहन के पास चले गए।नकुछ समय वहाँ रहे फिर पिता उन्हें मनाकर ले आए; लेकिन वह परिवार के साथ नहीं रहे। घर में बाहर के कमरे में वह अकेले रहने लगे। कमरे में बिछी दरी, कोने में रखा बिस्तर और गिनती के सात बर्तन। बस यही थी उनकी गृहस्थी। जब वे वहाँ आए थे, पैंतीस के आसपास वसंत देख देख चुके थे। विवाह उन्होंने जीवन पर्यंत नहीं किया।

भाऊजी की छोटी सौतेली बहन मुझसे एकाध वर्ष छोटी रही होगी। मोहल्ले की सारी लड़कियाँ मिलकर खेला करती थीं। सब घरों के आँगन साझा थे।घरों में कोई दीवार नहीं, कोई बाड़ नहीं। सबके घर से रास्ता निकलता था। भाऊजी की इस बहन से उनकी थोड़ी बातचीत हो जाती थी। सबसे छोटी थी, वह भी उनसे स्नेह करती थी। एक दिन खेलते-खेलते भाऊजी से सामना हो गया। बस उनकी पकड़ में आ गईं।

 “सारा दिन खेलती हो, कुछ पढ़ भी लिया करो। कल से स्कूल से आने के बाद मेरे पास पढ़ने आ जाना।” उन्होंने समझाते हुए कहा।

तब शायद पाँचवीं या  छठी में रही हूँगी। उस समय  स्कूल में जो पढ़कर आते थे, बस वही पढ़ाई होती थी। शेष दिन खेलकूद में निकल जाता। वैसे पढ़ने -लिखने का शौक  था;  इसलिए अगले दिन स्कूल से आकर खाना खाया और बस्ता उठाकर पहुँच गई उनके पास। सारा बस्ता खोलकर सामने रख दिया। उन्होंने ने कहा, जो कुछ स्कूल में पढ़कर आई हो, पहले उसे पढ़ो। सारे विषय पढ़ लिये और जब मैथ्स की बारी आई तो  भाऊजी ने कहा, पहले टेस्ट होगा। पाँच सवाल दिए, जिसमें अच्छी तरह से तो याद नहीं पर शायद एक या दो ग़लत हो गए। उन्होंने बड़े प्यार से दोनों सवाल समझा दिए। बस फिर तो ऐसा सिलसिला चला कि उसके बाद मैथ्स में सबसे अधिक रुचि हो गई। बाक़ी के विषय एक बार पढ़ने से कंठस्थ हो जाते थे। अंग्रेज़ी बड़े भैया पढ़ाते और बाक़ी का समय भाऊ जी के पास मैथ्स करने में ही निकल जाता। उन दिनों गर्मी की छुट्टियाँ जुलाई से सितंबर तक हुआ करती थीं। पूरे अढ़ाई महीने की। बस छुट्टियाँ होते ही भाऊ जी एक मोटी कॉपी मँगवाते और हमारी क्लास शुरू हो जाती। बड़ी क्लास में पाठ्यक्रम की पुस्तक में हर तरीक़े के सवालों में हल करने के लिए दो चार उदाहरण होते थे पर पीताम्बर लाल की मैथ्स की बुक में  पचास -साठ सवाल होते थे। सारी छुट्टियों में उस किताब के सारे सवाल उस कॉपी में हल कर लिये जाते। यानी सारा स्लेबस खत्म। बात यहीं ख़त्म नहीं होती थी। प्रत्येक सप्ताह टेस्ट होता और स्कूल खुलने के बाद सारे सवालों की पुनरावृत्ति। भाऊ जी की इतनी कड़ी मेहनत का परिणाम यह रहता कि हर परीक्षा में मैथ्स में पूरे अंक आते और टीचर से शाबाशी।

धीरे-धीरे उनके पास और लड़कियाँ भी पढ़ने के लिए आने लगीं। लड़कों को कम पढ़ाते थे, उन्हें लगता था कि लड़के शरारतें अधिक करते हैं, पढ़ते कम हैं। डाँट भी नहीं सहते। भाऊ जी पहले तो प्यार से सवाल समझाते थे; लेकिन पुनरावृत्ति के बाद सवाल हल करने में गलती हो जाए, तो डाँटते भी बहुत थे और डाँटने के बाद प्यार से मीठी गोलियाँ भी खाने को देते थे। उनके घर में आम और अमरूद का पेड़ लगा हुआ था। अमरूद के पेड़ के कच्चे अमरूद तोड़कर ख़ूब खाती थी। कुछ टहनियाँ इस तरह से उलझी हुई थीं कि वहाँ बैठने की जगह बन जाती, बस उस पर बैठकर पढ़ती भी और अमरूद भी खाती। आम के पेड़ का तना बहुत मोटा और ऊँचा था। बार- बार उस पर चढ़ने की कोशिश करती पर नाकामयाब रहती। एक दो बार गिर भी गयी। फिर  प्रयास करना छोड़ दिया।

भाऊ जी आम तोड़कर अख़बार में लपेटकर रख लेते और जब हम पढ़ने के लिए जाते तो खाने को दे देते।

वह पढ़े लिखे तो कम थे; लेकिन मैथ्स का उनका ज्ञान अपरिमित था। यह ज्ञान उन्होंने अपने तक सीमित नहीं रखा, हम बच्चों में फ़्री में दिल खोलकर बाँटते थे। मैं तब नौवीं कक्षा में थी। एक बार हमारी मैथ्स की टीचर मिस ठाकुर से एक सवाल हल नहीं हुआ। उन्होंने ईमानदारी से कहा कि वह इसका हल बाद में बताएँगी। भाऊजी ने मुझे वह सवाल पीताम्बर लाल की पुस्तक से  करवा रखा था। मैंने डरते-डरते उनसे कहा कि मैं इस सवाल को कर सकती हूँ, उन्हें बुरा नहीं लगा। मैंने उनकी आज्ञा से वह सवाल ब्लैक बोर्ड पर हल कर दिया। उनके पूछने पर मैंने बता दिया कि हमारे भाऊजी ने यह सवाल करवा रखा है। धीरे-धीरे वह चर्चित होने लगे। कुछ और लड़कियाँ भी आने लगीं। शाम को समय कम रहता था; इसलिए मुझे और एक और लड़की को सर्दी के मौसम में सुबह चार बजे बुलाने लगे। दिसम्बर-जनवरी का महीना और सुबह चार बजे उठकर जाना किसी सज़ा से कम नहीं था, उसपर तुर्रा यह कि ज़र्रा -सी देर हुई नहीं कि डाँट पड़ जाती। मुझे तो सिर्फ़ सड़क पार करनी होती थी। पिताजी उठा देते और मैं भागकर चली जाती। दूसरी लड़की प्रमिला का घर पीछे की गली में था, उसे उसके दादा जी छोड़ने आते। एक दिन मैंने नाराज़ होकर कहा कि आप हमें ही क्यों सुबह बुलाते हैं। उनका उत्तर सुनकर मेरी नाराज़गी दूर हो गयी। बोले, “तुम घर के सामने रहती हो और हक़ से कह भी सकता हूँ। तुम्हारे रहने से बाक़ी के बच्चे भी आ जाते हैं, उन्हें कोई संकोच नहीं होता।” उन्होंने मुझे सदैव छोटी बहन -सा प्यार दिया।

वह किसी से फ़ीस नहीं लेते थे और न ही किसी के घर जाकर पढ़ाते थे। पर एक बार उन्हें जाना पड़ा। हमारे मोहल्ले में एक वकील रहा करते थे, जो मोहन लाल वकील के नाम से जाने जाते थे। उन्होंने उनके पास आकर हाथ जोड़कर बड़े आग्रह से कहा कि उनकी बेटी रमन के दो महीने में दसवीं के पेपर हैं और इस समय उसे आपके सहयोग की अत्यंत आवश्यकता है। उनके इस आग्रह के आगे उन्होंने अपने नियम को तोड़ दिया। दो महीने बड़ी मेहनत से उसे पढ़ाया,  पेपर अच्छे हो गए। परीक्षा फल के दिन उन्हें भी प्रतीक्षा थी; क्योंकि यह पहली बार था कि उनकी पढ़ाई किसी लड़की ने बोर्ड की परीक्षा दी थी। सारा दिन निकल गया, उन्होंने कोई सूचना नहीं दी कि परीक्षा फल कैसा रहा है। उनसे रहा नहीं गया, तो वह शाम के समय उनके घर चले गए। उन्होंने देखा वहाँ दो और अध्यापक बैठे थे, जो रमन को विज्ञान और अंग्रेज़ी पढ़ाते थे। वे लोग उन दोनों की ख़ूब आवभगत कर रहे थे। भाऊ जी को उन्होंने पूछा ही नहीं। बस नम्बर बता दिए। वह वहीं से खड़े-खड़े ही आ गए। उनके इस व्यवहार से उनका दिल टूट गया। संवेदनशील तो थे ही। मन को बात चुभ गई कि  जिन्होंने पैसे लेकर पढ़ाया है, उनकी इतनी आवभगत और फ़्री पढ़ाने वाले का तिरस्कार। पहले तो उन्होंने सोचा वह पढ़ाना ही छोड़ देंगे; लेकिन उनके सेवा भाव के जज़्बे ने उनको आज्ञा नहीं दी। यदि लोग समझते हैं कि फ़ीस लेकर पढ़ाने वाले टीचर्स का ही सम्मान होता है, तो यही सही।

बस उन्होंने न चाहते हुए भी बच्चों से ट्यूशन फ़ीस लेनी शुरू कर दी। पर मुझसे फिर भी नहीं ली। फ़ीस भी क्या थी केवल दो रुपये हर मास। सस्ते ज़माने में भी दो रुपये बहुत कम थे। पर उन्होंने इससे अधिक फ़ीस कभी नहीं ली और न ही किसी के घर में जाकर पढ़ाया, चाहे कितना भी पैसे का लालच दिया हो। पैसे से अधिक उनके आत्मसम्मान की बात थी। जिसको बनाए रखने के लिए वह सदा सतर्क रहते थे। पूरी ज़िंदगी उनके चरित्र पर उँगली उठाने का साहस किसी ने नहीं किया।

अगले वर्ष मेरी बोर्ड की परीक्षा थी। भाऊजी ने ख़ूब मेहनत करवाई। उस समय हमारे मैथ्स विषय के साथ हाउस होल्ड भी होता था, जिसमें सौ में से सत्तर अंक का मैथ्स रहता था और मैंने दोनों में शत प्रतिशत अंक लेकर गुरु दक्षिणा के रूप में उन्हें खुश होने और गर्व करने का अवसर दिया था।

कॉलेज में दाख़िला लिया। बचपना वैसा ही बरक़रार था। विषय बदल गए; पर भाऊ जी के पास जाना नहीं छोड़ा। उनके साथ -साथ मैं भी कभी-कभी बच्चों को पढ़ा देती थी। धीरे-धीरे पढ़ाई की व्यस्तताएँ बढ़ती गईं। स्कूल में नौकरी करते समय  मुझे नौवीं और दसवीं कक्षा को पढ़ाने के लिए मैथ्स विषय दिया गया, जबकि मेरे विषय अलग थे। प्राचार्या मेरे बारे में जानती थीं और मैंने भी भाऊ जी की दी शिक्षा के बल पर उन्हें निराश नहीं किया।

विवाहोपरांत स्थान, परिस्थितियाँ सभी कुछ बदल गया। पिताजी के पास जाने पर उनसे ज़रूर मिलतीं। वह ख़ुश हो  जाते। बाद में पता चला- स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण वह बड़ी बहन के पास चले गए हैं। 

   भाऊजी दिल से गए तो कभी नहीं, पर गृहस्थी, नौकरी, बच्चों की परवरिश के उत्तरदायित्व के बोझ के नीचे यादें धुँधली ज़रूर पड़ गईं । बरसों बाद वह लौटकर आए थे। सौभाग्य से भतीजी की शादी के कारण मैं भी वहीं थी। मिलने आए तो लगा बचपन लौट आया है। बहुत सारी बातें साझा की पर  मैं उन्हें विवाह का निमंत्रण देना ही भूल गई। भूल भी ऐसी कि बरसों के बाद भी उसकी किरचें आज भी चुभती हैं। अकस्मात् वह उसी रात चल बसे। भूल सुधारने का मौक़ा ही नहीं मिला। बस यह शब्दांजलि ही अर्पित कर सकती हूँ।

ज़हन में उठते सवालों के हल में भाऊ जी आज भी मेरी स्मृतियों में जीवित हैं, जिनसे मैंने ज्ञान के साथ अनुशासित, संयमित और स्वाभिमान से जीने  का पाठ सीखा था। ■

सम्पर्कः ई 29, नेहरु ग्राउंड, फरीदाबाद 121001

जागरूकताः प्राथमिक आवश्यकता- न फैशन न दिखावा

 - लिली मित्रा

एक अच्छी आदत शुरू न कर पाने के कितने बहाने हम दे पाते हैं, हैरत होती है ! जितने बहाने हम सोचते हैं उतनी देर में शायद वो अच्छी आदत शुरू की जा सकती है... नहीं? मैने ये विचार कई बार किया है। फिर वो चाहे अपने स्वास्थ्य के प्रति अपना कर्तव्य हो या धरती माँ के बिगड़ते स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होने का धर्म हो। और आप यदि बारीकी से सोचें तो पाएँगे कि - अधिकतर लोग इन दोनों ही मामलों में बहुत ढिलाई बरतते हैं।

ऐसा ही एक विषय है जो पृथ्वी की पारिस्थितिकी को बहुत तेजी से विषाक्त बना रहा है - प्लास्टिक कचरा।

      मुझमे ये जागरूकता आई तो चार - पाँच साल पहले पर इसे कार्यरूप में परिणीति मैं इस वर्ष दे पाई। वही बात कि - अच्छी आदतें शुरू न करने के सौ बहाने होते हैं हमारे पास। खैर मेरे इस संकल्प की परिणिति थोड़ी परिश्रमजन्य रही परन्तु परिणाम आत्मिक संतोष से परिपूर्ण है।

    करीब दो साल से मैने रसोई के गीले कचरे जैसे सब्ज़ी के छिलकों, चाय-कॉफी, अंडे के छिलकों आदि से जैविक खाद बनाना शुरू किया अब मुझे अपनी छोटी सी ही सही पर हरी -भरी  बगिया के लिए खाद मिल जाती है।

  इसी तरह अब  प्लास्टिक की पन्नियों, दूध - दही, तेल  की थैलियों, दंत -मंजन, कॉस्मेटिक वाले प्लास्टिक से बने हर तरह के कचरे को धोकर सहेज कर रखने की आदत हो गई है। फिर मैने सोशल मीडिया पर इनके उचित निस्तारण के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं का पता लगाया, और अब... मुझे बहुत अच्छा अनुभव हो रहा है...ये सोचकर कि मैं पृथ्वी की पारिस्थितिकी को और बुरी हालत में न जाने देने के लिए अपना अंशदान करने लगी हूँ, देर से ही सही ।

अपनी सोसाइटी में भी मैं इस आवश्यक जागरूकता को लाने का प्रयास करना शुरू किया है पर फिर वही बात... अच्छी आदतें न शुरू कर पाने के सौ बहाने। पर लोगों को ये समझना होगा कि इस विषय पर भाषणबाजी, लेखनबाजी करने का हक़ अब उसी का हो जिसकी दिनचर्या का हिस्सा धरती माँ के खस्ता स्वास्थ्य की तीमारदारी करना हो।

   इस लेख में स्व का उदाहरण सिर्फ इसलिए लिखा; क्योंकि  मेरे लिए अब ये दिन के तमाम कामों की तरह एक जरूरी काम है। ये विषय अब फ़ैशन या दिखावा नहीं, मेरी आपकी और हर एक इंसान की जिम्मेदारी नहीं धर्म है। इसे पूजा - पाठ और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों की तरह पालन किया जाना अनिवार्य है। ■

सम्पर्कः फरीदाबाद, हरियाणा

कहानीः बड़ी जिज्जी

  - डॉ. रंजना जायसवाल

मॉल से बाहर निकलते वक्त एक व्यक्ति को देख निधि के पैर ठिठक गए। अतुल जीजा जी! हाँ ये तो अतुल जीजा ही थे पर उन्होंने तो बड़ी जिज्जी के इस दुनिया के जाने के बाद यह शहर छोड़ दिया था। छोड़ दिया था या छोड़ना पड़ा। निधि की अंतरात्मा ने उसे धिक्कारा…उसके परिवार ने एक शरीफ इंसान को शहर में रहने लायक छोड़ा ही कहाँ था। वो शहर छोड़कर जाता नहीं तो क्या करता! यादों की किरचों ने उसके दिल को लहूलुहान कर दिया।

अतुल जीजा जी अर्थात अतुल प्रभाकर, ऊँचा कद, गेहुँवा रंग और सधा हुआ चेहरा कुल मिलाकर एक नज़र में किसी को भी आकर्षित कर लेना वाला व्यक्तित्व। अतुल जीजा जी जब पहली बार जिज्जी को देखने आए तो सबने एक स्वर में कहा था।

”नीतू सोने की कलम से भाग्य लिखवाकर आई है। भाग्य खुल गए उसके तो…”

तो किसी ने कहा-“नीतू! नीतू जैसी को भी इतना सुंदर लड़का मिल सकता है।”

“जैसी!”

नीतू जिज्जी अतुल जीजा से ज़रा भी कम नहीं थी। एकदम बराबर की जोड़ी… अतुल जीजा ने जिज्जी को किसी शादी में देखा था और वह उसके रंग-रूप पर फिदा हो गए थे। नीतू जिज्जी तीन बहनों में सबसे बड़ी थी।

 “नीतू को एक कपड़े में ही विदा कर दीजिए मुझे दहेज में कुछ नहीं चाहिए।”

अतुल जीजा जी की बात सुन पापा निहाल हो गए थे। तिलक में शगुन में चढ़ाए गए इक्यावन हज़ार रुपये को वापस कर उन्होंने कहा था।

“आपका आशीर्वाद ही काफ़ी है।”

“पर बेटा ये तो समाज की रीत है। इसमे अनोखा क्या है? हमारे पूर्वज भी करते थे, मैं भी कर रहा हूँ। आखिर मरने के बाद क्या मुँह दिखाऊॅंगा मैं अपने पुरखों  को…”

जीजा जी ने नोटों की गड्डी से एक रुपया निकाला और माथे लगा स्वीकार कर लिया। उन्होंने पापा की बात मान भी रख लिया और अपना सम्मान भी बचा लिया। जीजा जी के व्यवहार ने पापा का दिल जीत लिया। जिस समाज में लड़कियाँ दहेज के लिए रोज मार दी जाती है, वहाँ अतुल जीजा ने शगुन का एक रुपया लेकर नाते-रिश्तेदारों का दिल जीत लिया था। ना जाने कितनी रिश्तेदारों के सीने पर साँप लोट गए थे। नीतू जैसी लड़की को इतना समझदार लड़के का मिलना किसी को भी पच नहीं पा रहा था पर कहते हैं ना खुशियाँ दबे पाँव आती हैं और दबे पाँव चली भी जाती हैं।


शायद पापा से यहीं गलती हो गई थी। कहते हैं चाँद में भी दाग है। नीतू जिज्जी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर एक ऐसा दाग था, जो चाह कर भी छुड़ाया नहीं जा सकता था। नीतू जिज्जी को मिर्गी के दौरे पड़ते थे। पापा ने न जाने कहाँ-कहाँ  इलाज़ कराया; पर कोई फायदा नहीं हुआ। एक दिन निधि ने कहा भी था।

“पापा, जीजा जी को जिज्जी की बीमारी के बारे में बता दीजिए। कल को ये न हो कि हमारे ऊपर, हमने इतनी बड़ी बात छुपाकर शादी की का इल्जाम लग जाए।”

“चुप रहो तुम…क्या सही है और क्या ग़लत, ये बात अब तुम मुझे समझाओगी।”

निधि पापा के इस व्यवहार से रुआँसी हो गई। कभी-कभी वह सोचती कि आखिर क्या गलत कहा था उसने…पर उम्र के साथ निधि पापा की मजबूरी समझ गई थी। तीन जवान बेटियों के पिता के ऊपर अपने बेटियों को अच्छे घर ब्याहने का कितना दबाव होता है, यह बात वही समझ सकते थे। पापा कितनी भी कोशिश करते पर जीजा जी जैसा लड़का नहीं ढूँढ पाते। वैसे भी वह खुद चलकर आए रिश्ते को यूँ अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे।

सच ही कहते थे लोग जिज्जी सोने की कलम से अपना भाग्य लिखवाकर लाई थी। शादी के एक महीने ही हुए थे। जिज्जी वैसे भी बहुत  सुंदर थी, उनके तन पर अतुल जीजा के प्रेम का रंग ऐसा चढ़ा थी कि वह शादी के बाद और निखर गई। उस दिन ऑफिस से लौटने के बाद अतुल जीजा ने अपनी नव- विवाहिता पत्नी को गर्म-गर्म समोसे का पैकेट पकड़ाते हुए कहा था- “नीतू, ये लो समोसे…इसी बात पर एक बढ़िया सी चाय पिलाओ, चाय के साथ समोसा… मजा आ जाएगा,” अपनी नवोढ़ा की आँखों में आँखें डालकर उन्होंने कहा 

“आप हाथ-पैर धो लीजिए। मैं अभी आपके लिए तुलसी-अदरक वाली चाय बना कर लाती हूँ।”

जीजा जी कपड़े बदलने के लिए बाथरुम में घुस गए और जिज्जी चाय बनाने के लिए रसोई घर में… तभी किसी बर्तन के गिरने की जोर से आवाज आई। जीजा जी रसोई घर की तरफ दौड़े। जिज्जी जमीन पर गिरी पड़ी हुई थी। चूल्हा जल रहा था और चाय का पानी भगोने सहित जमीन पर बिखरा हुआ था।

“क्या हुआ? तुम जमीन पर कैसे गिर गई!”

अतुल जीजा जी ने नीतू जिज्जी से पूछा, नीतू जिज्जी का शरीर बुरी तरह से ऐंठ रहा था, आँखें पलट गई थी और उनकी आँखों के कोर से लगातार आँसू बह रहे थे। ये आँसू शारीरिक तकलीफ़ और अक्षमता की वजह से कम, अपने पति के सामने अपनी बीमारी के इस तरह उजागर होने से ज़्यादा थे।

सुहाग की चूड़ियाँ जमीन से टकराकर चूर हो गई थी और उसकी किरचें तन के साथ मन को भी लहूलुहान कर गईं थी। जिज्जी अपने आप को असहाय महसूस कर रहीं थीं। उनका तन इस वक्त उनका साथ नहीं दे पा रहा था; पर मस्तिष्क एक अजीब से उहापोह में पड़ा हुआ था अब क्या होगा? जीजा जी समझ नहीं पा रहे थे कि उन्हें क्या हुआ है? अपनी नव विवाहिता का यह रूप देखकर एक पल को वह भी स्तब्ध रह गए थे। उन्होंने जल्दी से उनके हाथ-पैर रगड़ना शुरू किया। थोड़ी देर में जिज्जी ठीक होती चली गई। जिज्जी, जीजा जी से नज़र नहीं मिला पा रही थी। आखिर उनका इतना बड़ा अवगुण जीजा के सामने आ गया था।

समाज के लिए उनकी  यह बीमारी उनका अवगुण ही थी शायद; इसीलिए लोग कहते थे नीतू जैसी लड़की को इतना सुंदर लड़का भला कैसे मिल गया! कुछ लोगों ने यह भी कयास लगाए थे।

“जरूर लव मैरिज होगी या शायद लड़के में ही खोट होगा; पर सामने से तो ऐसा नहीं लगता था।”

आजकल के जमाने में लोगों की अच्छाई भी किसी को रास नहीं आती। अतुल जीजा जी समझदार थे। जिज्जी की बीमारी के बारे में उन्हें पता चल चुका था। उन्होंने उनके इस रूप के साथ स्वीकार कर लिया।

जिज्जी ने इस घटना की जानकारी हम सब को दी। पापा दौड़े-दौड़े चले आए थे। वे हाथ जोड़े सर झुकाए जीजा जी के सामने एक अपराधी की तरह खड़े थे। वह एक ऐसे अपराध के लिए अपने दामाद से क्षमा माँग रहे थे, जो उन्होंने किया भी नहीं था; पर हाँ वह अपराधी थे। उन्होंने एक मासूम और शरीफ़ आदमी से अपनी बेटी के जीवन का इतना बड़ा सच छुपाया था। अतुल जीजा जी ने पापा के हाथ को पकड़कर कहा था- “पापा जी आप मुझे शर्मिंदा न करें। यह बीमारी शादी के बाद होती तब मैं क्या करता!”

रिश्तेदारों ने कहा- “अतुल जीजा करते भी तो क्या। जिज्जी अब उनकी पत्नी थी।” 

पर क्या सचमुच! एक वक्त था जब इस देश में लड़कियाँ रंग-रूप, चश्मा लगाने और छोटे बालों की वजह से नकार दी जाती थी। जिज्जी की बीमारी की बात छिपाकर शादी करना एक बहुत बड़ा मुद्दा हो सकता था।

वे चाहते तो उसी वक्त दीदी को वापस भेज सकते थे; पर सात जन्मों तक साथ निभाने का वायदा की कसम खाने वाले जीजा जी ने उस कसम की सचमुच लाज रखी थी।

जिज्जी आत्मग्लानि से भरती चली गई। जीजा जी का मासूम चेहरा देखकर वह हमेशा सोचती, अतुल उनके बारे में क्या सोचते होंगे! उन दोनों के रिश्तों की मिठास न जाने धीरे-धीरे कहाँ खोती चली गई। जिज्जी के भाग्य से ईर्ष्या करने वाले लोगों की नजर ऐसी लगी कि जिज्जी  की खुशियाँ भाप बनकर उड़ गई।

जिज्जी के शादी के सात साल हो गए थे पर जिज्जी की कोख अभी तक नहीं भरी थी। वह एक मानसिक दबाव से गुजर रही थी। मानसिक दबाव के चलते मिर्गी के दौरे जल्दी-जल्दी पड़ने लगे। एक तरफ माँ न बनने का दुख  और दूसरी तरफ़ सामाजिक दबाव ने दीदी को चारों तरफ से घेर लिया था। वह समझ नहीं पा रही थी कि उनके साथ क्या हो रहा है!

एक तरफ उनके अंदर इस बात का दर्द था कि वह माँ नहीं बन सकती दूसरी तरफ इस बात का भी डर था कि अगर वह माँ बनी भी, तो उनका होने वाला बच्चा भी उन्हीं की तरह पैदा ना हो जाए। जीजा जी के लाख समझाने के बाद भी की ऐसा कुछ भी नहीं होगा, जिज्जी इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रही थी। उनकी हालत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी।

कोई उन्हें समझाने का प्रयास करता तो वह गुस्से से पागल हो जाती थी। जिज्जी घंटों अपने आप को कमरे में बंद कर लेती। जीजा जी की स्थिति अजीब थी। पति-पत्नी के बीच का रिश्ता प्रेम और विश्वास के ताने-बाने से बुना हुआ होता है; पर उन दोनों के बीच का प्रेम और विश्वास कहीं दूर कराह रहा था।

जिज्जी दिन पर दिन शक्की होती जा रही थी उन्हें लगने लगा था कि अगर वह माँ नहीं बन पाई, तो जीजा जी उन्हें छोड़कर दूसरा विवाह कर लेंगे। जीजा जी उन्हें कई बार समझा चुके थे। उन्होंने उनसे वादा किया था कि कुछ भी हो जाए, वह किसी से कभी शादी नहीं करेंगे। जिज्जी की खुशी के लिए वह अनाथ आश्रम से बच्चा भी गोद लेने को तैयार हो गए; पर जिज्जी को अपने खून, अपने बच्चे की धुन सवार थी।

 जिज्जी घण्टों पूजा करने लगी। कोई मंदिर कोई दरगाह ऐसी न थी जहाँ पर दीदी ने हाथ न जोड़े हों, नाक ना रगड़ी हो पर ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। उनका शरीर नमक की तरह घुलता जा रहा था।

उसे आज भी वह दिन याद है।

“मैं दो दिन के लिए ऑफिस के काम से शहर के बाहर जा रहा हूँ। निधि तुम अपनी जिज्जी के पास आकर रह लो। आजकल उसकी तबीयत ठीक नहीं रहती।”

“जीजा जी, आने को तो मैं आ जाती पर जीजी ने ही मना कर दिया है, मैं अकेले रह लूँगी।”

काश उस दिन निधि ने जीजा जी की बात मान ली होती, तो जिज्जी हम सबके बीच होती। काश वह दीदी के पास चली गई होती। काश! काश,यह काश भी बहुत अजीब होता है। इस काश ने उम्र भर का उसे दर्द दे दिया था। जीजा जी को गए हुए एक दिन ही हुआ था। 

सुबह-सुबह दूध वाले ने घंटी बजाई, तो अंदर से कोई जवाब नहीं आया। दूध वाला वापस चला गया। बर्तन और झाड़ू पोछा करने वाली सुनीता आंटी आश्चर्य में थी। रोज सुबह दरवाजा खोल देने वाली नीतू जिज्जी आज दस बजे तक दरवाजा बंद करक बैठी हुई थी। सुनीता आंटी को कुछ शक हुआ। उन्होंने पड़ोसियों से आग्रह किया कि वे अपनी छत से कूदकर, झाँककर देखें ।

नीतू जिज्जी ने पंखे से लटकर अपनी जान दे दी थी। यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई। किसी भले मानुस ने अतुल जीजा को खबर दी, घर में कोहराम बच गया। पापा और घर के सभी लोग जिज्जी की मृत्यु का कारण जानते थे; पर पापा ने सब जानते हुए भी अतुल जीजा जी को दीदी की मृत्यु का कारण बताया और उन पर केस ठोक दिया। 

जमाता के पैर छूकर अपनी बेटी का कन्यादान करने वाले पापा जीजा जी के जान के दुश्मन बन गए। जिस जमाता के गुण गाते हुए पापा की ज़ुबान नहीं थकती थी, आज वही जमाता उन्हें फूटी आँख नहीं सुहा रहा था । जिज्जी इस दुनिया से अकेले नहीं गई थी। वह अपने साथ अतुल जीजा जी के जीवन की हिस्से की खुशियाँ भी लेकर चली गई थी।

जीजा जी का जीवन कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते बीतने लगा। पापा ने उन पर तरह-तरह की धाराएँ लगवाई थीं। अपनी बेटी के खोने के दर्द का बदला वह कुछ इस तरह से ले रहे थे। निधि ने एक बार हिम्मत करके पापा से पूछा भी था - “पापा जीजा जी की क्या गलती है? आप और हम सभी यह बात अच्छी तरह जानते थे कि दीदी किस मनःस्थिति से गुजर रही थी, क्या आपको भी लगता है कि जीजा जी जिज्जी की मौत के जिम्मेदार हैं?”

पापा ने उसे डाँटकर चुप कर दिया था।


“अभी तुम इतनी बड़ी नहीं हुई कि तुम मुझे सलाह दो। मेरे मामले में दखल देने की कोई जरूरत नहीं…”

 वह छटपटाकर रह गई थी। जिस चेहरे को देख रिश्तेदारों के सीने पर साँप लोट जाते थे, माँ बलाए लेती नहीं चूकती थी, आज उस चेहरे की रौनक न जाने कहाँ गुम हो गई थी।

“कैसे हैं जीsss…!”

शब्द उसके गले में अटककर रह गए जिस व्यक्ति के साथ यह रिश्ता जुड़ा था, वह अपनी मौत के साथ यह रिश्ता भी ले गया था। जिज्जी की मृत्यु के बाद जीजा जी के साथ जो कुछ भी उन पर बीता, उसने उन्हें जीजा कहने का हक भी खो दिया था। 

“कैसी हो निधि, तुम्हारी शादी हो गई!” माथे पर बिंदी और लाल सिंदूर से भरी हुए माँग को देखकर जीजा जी ने पूछा।

“जी! दो साल हो गए।”

जीजा जी ने अपना हाथ उसके सिर पर आशीर्वाद की मुद्रा में रख दिया।

“नीतू निधि का  कन्यादान हम ही करेंगे।” 

जीजा जी की कही हुई बात उसके कानों में गूँज रही थी। वक्त भी कितना बेरहम होता है वह सोच रही थी।

“आप यहाँ…!”

“तेरी दीदी को गए पाँच साल हो गए। मैं उसकी पुण्यतिथि पर उस घर से मिलने जाता हूँ ,जिसमें हमने अपनी दुनिया बसाई थी। तेरी जिज्जी तो निर्मोही निकली। सात जन्मों तक साथ निभाने का वायदा करके हाथ छुड़ाकर चली गई।”

निधि के भीतर गहरे कुछ दरक गया। 

“अतीत में जो बीत गया उसे भुला दीजिए।” 

“भूल जाऊँ! भूलना तो मैं भी चाहता हूँ, पर अतीत मुझे भूलने नहीं देता।”

जीजा जी की आवाज में निराशा थी

“आपने शादी sss…!”

वह चाहकर भी वाक्य पूरा नहीं कर पाई। जीजा जी हौले से मुस्कुरा दिए, उनकी मुस्कान में एक दर्द था।

“तेरी जिज्जी से वायदा किया था, कभी किसी से शादी नहीं करूँगा।”

वह जीजा जी को देखते रह गई। जीजा जी के प्रेम में कोई कमी नहीं थी पर दीदी ही सात जन्मों का वायदा करके उन्हें धोखा देके चली गई थी।

“चलता हूँ मेरी ट्रेन का समय हो गया है। अपना ध्यान रखना।”

निधि ने अपना मोबाइल निकाला।

“अपना फोन नंबर तो शेयर कीजिए।”

जीजा जी के चेहरे पर एक मुस्कान पसर गई। वह उस मुस्कान का मतलब समझने का प्रयास कर रही थी।

जीजा जी बिना नम्बर दिए सीढ़ियों से नीचे उतर गए। वह उन्हें जाता हुआ देख रही थी। जिसकी वजह से यह रिश्ता जुड़ा हुआ था, जब वह रिश्ता ही नहीं रहा फिर जुड़ने का क्या ही मतलब था। निधि ने आसमान की तरफ देखा और मन ही मन कहा- “जिज्जी तुमने अच्छा नहीं किया।”■

सम्पर्कः लाल बाग कॉलोनी, छोटी बसही, मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश, पिन कोड 231001. मोबाइल नं. 9415479796, Email address- ranjana1mzp@gmail.com


व्यंग्यः भेंट, एक लेखक से

  - गिरिराजशरण अग्रवाल

नित नए लोगों से भेंट करना और भेंट के दौरान उनकी छठी तक के दूध का हिसाब-किताब मालूम करना हम भारतवासियों की राष्ट्रीय हॉबी है। बिल्कुल इसी तरह जैसे दरिद्रता हमारा राष्ट्रीय गुण है और इस राष्ट्रीय गुण को स्थायी बनाए रखने के लिए विदेशी वित्तीय संस्थाओं से ऋण लेना हमारे वित्तमंत्रियों की हॉबी है।

सो, उस दिन एक साहब से मुलाक़ात हुई. हमने आदत के अनुसार उनका नाम पूछा। नाम था पं. श्यामबिहारी लाल शर्मा। बताया गया ‘लेखक हैं।’ सच मानो, सुनकर बड़ी निराशा हुई. अगले सारे सवाल जैसे ‘वेतन कितना मिलता है?’ या ‘ऊपर की आमदनी कितनी हो जाती है?’ आदि मन-ही-मन में घुटकर रह गए. दरअसल, हम भारतीय पहली भेंटवार्ता में ही व्यक्ति के स्टेंडर्ड का पता लगा लेते हैं और क्षण-भर में यह निर्णय भी कर लेते हैं कि नवपरिचित सम्बंध बनाए रखने के योग्य है या नहीं! वैसे हम जानते हैं कि संपन्न व्यक्ति भी समय पड़ने पर चावल के चार दाने उधार देने से कतरा जाता है, पर आदमी को यह गर्व तो रहता ही है कि उसकी मित्रमंडली में नंगे-बूचे लोग ही नहीं हैं, खाते-पीते संपन्न लोग भी हैं। पराए पैसे पर इतराना हमारी दूसरी राष्ट्रीय हॉबी है।

‘लेखक हैं।’ यह सुनना था कि हम भुन-से गए।  क्रोध हमें इस बात पर था कि होश सँभालते ही लेखकों की जिस भीड़ ने हमारा घेराव शुरू किया था, उसका सिलसिला आज तक जारी है। प्राइमरी स्कूल से लेकर एम.ए. की पढ़ाई पूरी करने तक ये लेखक लोग हमारी छाती पर कुछ इस तरह सवार रहे, जैसे वह हमारी छाती न हो, उनका अपना बैडरूम हो। वैसे हमें शक है कि लेखकों के घर में बैडरूम नाम की कोई चीज़ होती होगी।

तो साहब, होश सँभालते ही हम विद्यार्थी बन गए या यूँ कहिए कि बना दिए गए. रात-रात भर लेखकों की जीवनियाँ रटते। कब पैदा हुए, कब वीरगति को प्राप्त हुए, कौन-कौनसी पुस्तकें लिखीं और क्या-क्या तीर मारे? उनकी रचनाओं का अर्थ याद करते। लेकिन सुबह होते ही लगता कि दिमाग़ का मैदान जो है, वह सारा साफ़ है। बहुत सोचते और बहुत देर तक सोचते लेकिन दिमाग़ में कुछ होता, तभी तो सामने आता। आख़िर सब्र करना हम भारतीयों की तीसरी हॉबी है।

परीक्षा होती तो प्रश्न-पत्र देखकर हमारा ख़ून खौल जाता। लिखा होता-नीचे लिखे गद्यांश का संदर्भ-सहित अर्थ लिखो और यह भी लिखो (या बताओ) कि लेखक द्वारा लिखी गई इन पंक्तियों से तुम्हें क्या शिक्षा मिलती है? अथवा निम्नलिखित पद्यांश का अर्थ अपने शब्दों में विस्तार से लिखो और यह भी बताओ कि इसका लेखक कौन है और यह अंश उसकी किस पुस्तक से लिया गया है? अथवा प्रेमचंद की जीवनी कम-से-कम एक हज़ार शब्दों में लिखो।

हद हो गई हमारा क्या लेना-देना इन व्यर्थ के सवालों से? यहाँ तो ‘करे कोई और भरे कोई’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। यानी ‘करनेवाला कवि और भरनेवाला रवि’।

मरता क्या न करता! हम भी एक ही काइयाँ थे। लेखकों के चंगुल से बच निकलने का रास्ता ढूँढ़ ही निकाला। वह नक़ल मारनी शुरू की कि बस इस कला में पूरे दक्ष हो गए।  छोटी-छोटी पर्चियाँ जेब में रखकर परीक्षा-कक्ष में जाते। यह अमुक लेखक की जीवनी है, यह अमुक की। यह अमुक पद्यांश का भावार्थ है, यह अमुक का। अब यह बात अलग है कि अक्सर एक लेखक की जीवनी दूसरे के और दूसरे की तीसरे के नाम लिखी जाती और सारा गुड़ गोबर हो जाता। वैसे गोबर करना भी तो हमारी राष्ट्रीय हॉबी है। है कि नहीं?

हाँ, तो हम बता रहे थे कि लेखकों ने बचपन से ही जो हमारी गुद्दी ऐंठनी शुरू की सो अब तक ऐंठ रहे हैं। परीक्षा-कक्ष में यह सोचकर ग़ुस्सा आता था कि अमुक लेखक की जीवनी लिखें और कम-से-कम एक हज़ार शब्दों में लिखें। क्या धाँधली है? यानी हम आम भी आपको खाने को दें और गुठलियाँ भी गिनें। सो, हम जब तक विद्यालय में रहे, आम भी खिलाते रहे और गुठलियाँ भी गिनते रहे।

विद्यालय-जीवन से निकलकर जब यथार्थ के जीवन में आए, तब भी क्रम टूटा नहीं, क्योंकि कान पकडक़र बैठकें लगाने के अलावा जीवन का और कोई अर्थ हमारे लिए है ही नहीं। लेकिन इस त्रासदी के पीछे भी हाथ भाँति-भाँति के लेखकों का ही है। न हम इनकी जीवनियाँ रटते, न मेहनत से काम करके खाने की आदत डालते और न इस हालत में पहुँचते। सीधे-सीधे हाज़ी मस्तान बनकर मौज़ उड़ाते। नोट कीजिए कि जनाब हाज़ी मस्तान को किसी भी छोटे-बड़े लेखक की जीवनी याद नहीं है, यह अलग बात है कि वह जीवित लेखकों के अब तक एक सौ एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों की अध्यक्षता कर चुके हैं। हाज़ी साहब इस रहस्य से परिचित हैं कि लेखक बनने से ज़्यादा लेखकों के सम्मेलन की अध्यक्षता करना सम्मानजनक होता है।


बात काफी दूर निकल गई।  हम पं. श्यामबिहारीलाल शर्मा की बात कर रहे थे। हमने उन्हें सिर से पाँव तक घूरकर देखा। कहीं-से-कहीं तक कोई निशानी ऐसी नहीं मिली, जिससे प्रमाणित होता कि वे लेखक हैं। सूटेड-बूटेड, मोटे-ताज़े, हँसते-खेलते। न तो उलझे हुए लंबे बाल, न बढ़ी हुई लंबी दाढ़ी। लेखक तो बेचारा समाज में इंकलाब लाने के लिए जीवन-भर क़लम घसीटता है, पर इंकलाब तो आता नहीं, लेखक का ‘जिंदाबाद’ अवश्य हो जाता है। लगता है, यह लेखक-वेखक कुछ नहीं है। यदि है तो डुप्लीकेट। लेखक तो मंटो था, घंटों उकडू बैठकर क़लम घिसता रहता था और जो समय बाकी रहता था उसमें एडि़याँ रगड़ता था, कभी फ़र्श पर तो कभी खाट पर। तब कहीं जाकर एक कहानी पूरी होती थी। कहानी पूरी होते ही मंटो भागता बाज़ार की ओर, जहाँ किसी प्रकाशक के हाथ घास के भाव कहानी बेचता और मंटो से एकदम ‘मंटो साहब’ हो जाता।

लेखक तो मुंशी प्रेमचंद थे। समाज उन्हें उस वक़्त तक यह याद दिलाता रहा, जब तक वे जीवित रहे कि लेखक होने की तुलना में मुंशी होना अधिक सम्मानसूचक है। इसलिए जीते-जी ही नहीं, वरन् मरने के बाद भी ‘मुंशी’ का शब्द उनके नाम का दुमछल्ला बना रहा। मरने के बाद सचमुच बहुत शोधकार्य हुआ मुंशी प्रेमचंद पर, पर शोध इस बात पर भी होनी चाहिए थी कि प्रेमचंद के व्यक्तित्व में लेखक अधिक था या मुंशी और यदि उनमें लेखक अधिक था तो मुंशी उपाधि उन्हें किस कारण दी गई?

गिनती के क्षणों में दर्जनों लेखकों के चेहरे हमारे मन-मस्तिष्क पर उभरे और ग़ायब हो गए, किंतु पं. श्यामबिहारी लाल शर्मा जैसे साफ़-सुथरा, चमकदार, ख़ुशहाल चेहरा उनमें से किसी का नहीं था। सारे के सारे फक्कड़, सारे घनचक्कर, सबके सब खल्लास। संदेह हुआ कि हम भारत में हैं या किसी और देश में। क्या सचमुच हमारे देश में लेखकों की कायापलट हो गई है? लेकिन विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि कल तक तो हमने अपने ही शहर में कई लेखकों को जूतियाँ चटखाते और सड़क नापते देखा था। हमने एक बार फिर अपनी पैनी दृष्टि उन पर डाली। फिर पूछा-’कितना कमा लेते हो भाई, लेखन-कार्य से?’

तुरंत उत्तर मिला- ‘कभी हज़ार, कभी पाँच सौ रुपये प्रतिदिन।’

प्रतिदिन शब्द आश्चर्य भरी चीख़ बनकर हमारे होंठों से फूट पड़ा। मन ही मन दुहराया-’हज़ार रुपये प्रतिदिन। यानी कि तीस हज़ार रुपये महीना। बाप रे बाप! दाता दे और बंदा ले। काश, हम भी लेखक होते और इसी टाइप के होते।’ मन-ही-मन सोचा कि ये या तो फिल्मी-जगत के लेखक हैं अथवा कवि-सम्मेलनों के चुटकुलेबाज़ कवि। वैसे लेखक तो हरगिज नहीं हो सकते, जैसे मुंशी प्रेमचंद जी थे, निराला जी थे या जैसे। हमने नामों की सूची आगे नहीं बढ़ाई. क्योंकि हमें ख़तरा था कि किसी एक नाम पर पहुँचते-पहुँचते हमारा हार्ट फेल हो जाने की नौबत आ सकती थी। हम स्वयं तो फेल हो जाने को हँसी-ख़ुशी सहन करने के आदी थे, किंतु हार्ट फ़ेल हो जाने की बात तो सोच भी नहीं सकते थे। असमंजस के गहरे सागर से अपना सिर उभारते हुए हमने पूछा-'क्यों लेखक जी, यह तो बताओ कि आप लिखते क्या हैं? प् ल्मिी कहानियाँ लिखते हैं आप? (यह बात नोट करने की है, हम उन्हें श्यामबिहारी लाल कहते-कहते एकदम ’लेखक जी’ कहने पर उतर आए थे। क्योंकि अच्छे पैसे वाला या अच्छे पैसे कमानेवाला हो तो हम जैसे टटपूँजिए पर उसका रुआब तो पड़ता ही है। सम्मान भी वह अपना हम जैसे लोगों से करवा ही लेता है।) लेखक साहब ने हमारा सवाल सुना तो तिरस्कार-भरे भाव से बोले- ‘नहीं साहब। फिल्मी-इल्मी कहानियों से क्या लेना-देना है हमें? हम कोई उल्लू या उसके पट्ठे नहीं है, जो रात-रात भर जाग कर फिल्मी कहानियाँ लिखें और बॉक्स ऑफिस पर उनके फ़्लाप होने का तमाशा भी देखें।’

भाई श्यामबिहारीलाल ने फिल्मी-लेखकों पर इतना लंबा लेक्चर दिया कि हम अपनी सुध-बुध भूल गए. हमें विश्वास
हो गया कि फिल्मी लेखकों से अधिक अस्वीकार्य प्राणी शायद ही दुनिया में हो। हमने साहस जुटाकर पूछा- ‘तो आप क्या गीतकार हैं?’

लेखक जी बोले- ‘नहीं जी’ और ‘जी’ पर उन्होंने इतनी दूर तक साँस खींची कि उनकी ‘जी’ हमारे जी का जंजाल बन गई. हमने फिर पूछा- ‘तो क्या आप कहानीकार हैं?’

इस बार उनकी त्योरी पर बल पड़ गए. झुँझलाकर बोले- ‘अरे साहब, कह तो दिया कि हम कहानीकार नहीं हैं और गीतकार भी नहीं हैं।’

‘हो न हो, आप अवश्य ही व्यंग्यकार होंगे।’ लेकिन लेखक जी ने इस 'कार' को भी अस्वीकार कर दिया और हम बेकार के संकट में पड़ गए. सोच रहे थे कि ये कैसे लेखक हैं, कहानी यह लिखते नहीं, कविता यह करते नहीं, व्यंग्य यह सुनते नहीं। तो क्या कोई और विधा प्रचलित हो गई है इन दिनों साहित्य के क्षेत्र में, जो हज़ार-पाँच सौ रुपये रोज़ ही रायल्टी दिला देती है। इच्छा हुई कि पूछें, ‘वह कौनसी विधा है, जिसमें आप लिखते हैं और इतनी मोटी रक़म लेते हैं।’

कुछ पल दोनों के बीच चुप का परदा तना रहा। हमारे मन में जिज्ञासा बिजली की तेज़ी से दौड़ रही थी और हम सोच रहे थे कि इस नई विधा का पता चले तो इस पर पुस्तक ही संपादित कर दें।

साहस करके पूछा-'भाई साहब, यह तो बताइए कि आप लिखते क्या हैं?'

लेखक साहब ने झट उत्तर दिया- ‘दस्तावेज़।’

सारी बात समझ में आ गई. रजिस्ट्री कार्यालय का नक़्शा आँखों में घूम गया। ज़मीन, मकानों के बयनामे कल्पना में उलट-पुलट होने लगे, ‘अमुक पुत्र, अमुक निवासी, अमुक स्थान का हूँ।’

जी चाहा, हास्य-व्यंग्य का यह पुलिंदा बगल में दबाए फिरने की जगह और कलम जेब में अटकाकर गली-गली घटनाओं की खोज में भटकने की बजाय काश हम ऐसे ही एक दस्तावेज़-लेखक होते और हज़ार पाँच सौ रुपये रोज़ ऐंठकर मौज़ की वंशी बजा रहे होते। हमारे मुँह से निकला-‘भारत का एक महान् लेखक श्यामबिहारी लाल दस्तावेज़ लेखक।’■