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Oct 3, 2018

आज भी...

आज भी...
-अनुपमा त्रिपाठी  ‘सुकृति’
आज भी सूर्यांश की ऊष्मा  ने
अभिनव मन के कपाट खोले  ,
देकर ओजस्विता
भानु किरण चहुँ दिस  ,
रस अमृत घोले ..!!
आज भी चढ़ती धूप सुनहरी ,
भेद जिया के खोले ,
नीम की डार पर आज भी
गौरैया की चहकन
चहक चहक बोले ,
आज भी साँझ की पतियाँ
लाई है संदेसा
पिया आवन का ,
आज भी
खिलखिलाती है ज़िन्दगी
गुनकर जो रंग ,
बुनकर- सा हृदय आज भी
बुन लेता है
अभिराम शब्दों से
मंजु अभिधा में ऐसे ,
जैसे तुम्हारी कविता
मेरे हृदय में विस्थापित होती है ,
अनुश्रुति -सी, अपने
अथक प्रयत्न के उपरान्त !!
हाँ...आज भी..!!

Jul 18, 2016

तीन कविताएँ


 - अनुपमा त्रिपाठी
1 छाया है अब बसंत


मन ने उमंग भरी, तूलिका ने भरे रंग,
कोयलिया कूक रही, बाजे है मन मृदंग !!




फूलों की चिटकन है, रंगों की छिटकन है,
भँवरे की गुंजन है, छाया जो रंजन है !!

धूप में निखार आया रंग की बहार छाई ,
अमुआ की मंजरिया देखो कैसी बौराई !!
 
पीत वसना धरती है, धारती जो पीत वसन ,
धरती से अम्बर तक आया है अब बसंत !!

कंचन -सी धूप खिली छाया है अब बसंत !!
सतरंगी चूनर, लहराया है अब बसंत

 राग है बहार संग मनवा है यूँ मगन !
छेड़ो अब तान कोई ,लागी कैसी लगन,

प्रकृति में बिखरा चहुँ ओर उन्माद है ,
हरस रही सरसों है प्रीति का आह्लाद है,

रंग है बहार है रूप का शृंगार है ,
खिलती हुई कलियों पर आया जो निखार है...!!

सतरंगी...पुष्पों  पर छाया है अब बसंत
मदमाती सुरभि लहराया  है अब बसंत...!!

रोम रोम पुलकित, मदमाया है अब बसंत
छाया है अब बसंत!! छाया है अब बसंत...!!

2 मणि -सी कविता ...!!

किसलय का डोलता अंचल ,
नदी पर गहरी स्थिर लहरें चंचल
झींगुर का रुनक- झुनक- सा नाद ...
करता  हैं कैसा संवाद
पग  धरती विभावरी ,
धरती श्यामल आशा -भरी,
कोलाहल से दूर का कलरव ,
मन शांत प्रशांत नीरव
अनृत से प्रस्थान करते ,
नीड़ की ओर उड़ते पखेरू ,
मणिकार की मणि- सा ...
स्निग्द्ध धवल मार्ग दर्शाता विधु
शब्द बुनते भाव इस तरह
फिर लरजती लाजवन्ती ज्यों ,
उतरती है मन में.
जैसे...,
कोई मणि -सी कविता ...!!
3 अभिनन्दन
नीलम नभ से ,
किरणों की पावस सरिता  ,
दिक् उज्ज्वल,
विचरण करती
अम्बर से धरणी तक,
नव छंदों में,
झर झर झर झर
स्वर्णिम अनिमेष अनश्वर
अंजुरी से शब्दों की ,
अभिनव,
चपल दिवस का नंदन ,
नव संवत्सर अभिनन्दन ,
मैं करती
नूतन भावों से
निज चेतन संवेदन ...!! 

mo. 09350210808, tripathi_anupama@yahoo.com

Jul 18, 2013

धरा पर रंग


धरा पर रंग
- अनुपमा त्रिपाठी
1
 उर-पटल

हैं स्मृति की  रेखाएँ
मिट न पाएँ।
2
पलकों में है 
मोती-से अनमोल
छुपे रतन।
3
सजल नैन
भरी जीवन-पीर,
डबडबाएँ।
4
मन-सागर
है वेदना असीम
सूखे नयन।
5
सूरज डूबे
ढेरों रश्मियाँ लिये
डूबती आशा।
6
बर्फ-सी ठंडी
संवेदनाएँ हुई
शिथिल  मन।
7
अथाह पीड़ा
बस मौन ही रहूँ
किससे  कहूँ ....?
8
ज्यों टूटकर
गिरते पीले पात 
बीते हैं लम्हें ।
9
कुछ तो कहो
ऐसे चुप न रहो
नदी-से बहो।
10
ठिठक गई
मूक-सी हुई जब
संवेदनाएँ।
11
मानवता ही
परम दया धर्म
एक मुस्कान।
12
सृजन खिला
संवेदनशील हो
तरंग बना।
13
रंग-बिरंगे 
हैं धरा पर रंग
पुष्प बिखरे।
14
बीन-बटोर
शब्द-शब्द सुमन
गूँथी है माला ।
15
अर्पण करूँ
प्रभु तुमरे द्वार
शब्द-संसार।
16
शब्दों से तुम
सजाते मेरा मन
कविता खिले।
17
शब्द की कथा
कहे मन की व्यथा
भावना बहे।
18
कैसे रचाऊँ ?
नित नया सृजन
ये शब्द पूछें ...!
19
पंख पसार
उड़ जा उस पार
संदेसा ले जा।
20
उड़े बयार
शब्द उड़ा ले जाएँ 
कुछ न सूझे।
21
हुए हैं एक
मिल धरा-गगन
सृष्टि मगन।
22
पसरा मौन
बिखरे हैं सुमन
आया है कौन ...?
23
खिली लालिमा
देती अब सन्देश
मिटी कालिमा।
24
छूकर तुम्हें
आई है मेरे द्वार
चंचल हवा।          
लेखिका के  बारे में: जन्म- 13-05-63  शिक्षा- एम.ए(अर्थशास्त्र)1984 में रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय(जबलपुर)। संगीत विशारद (संगीत)  2006 में प्रथम श्रेणी में। वर्तमान में संगीत अलंकार कर रहीं हैं। व्यावसायिक अनुभव अर्थशास्त्र की व्याख्याता 1984-85 जबलपुर में। 2010 में क्वालालंपुर मलेशिया में TEMPLE OF FINE ARTS में हिन्दुस्तानी  शास्त्रीय संगीत पढ़ाया। संगीत के कई कार्यक्रमों में गाया और 'यादें’ नामक सी.डी में भी गाकर अपना योगदान दिया। ब्लॉग http://anupamassukrity.blogspot.com/ पर कविताएँ और लेख। http://swarojsurmandir.blogspot.com/ पर संगीत के विषय में जानकारी। Email- tripathi_anupama@yahoo.com