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Aug 15, 2014

आधुनिक आइसक्रीम का रसायन शास्त्र

आधुनिक आइसक्रीम का रसायन शास्त्र

- डॉ. ओ.पी वर्मा



आइसक्रीम शब्द सुनते ही सबके मुँह में पानी आ जाता है। पल भर में विद्युत धारा की तरह एक ठंडा मीठी तरंग पूरे शरीर में प्रवाहित हो जाती है और मन प्रसन्न हो जाता है। शादी हो या जन्मदिन का समारोह हो, आइसक्रीम के बिना सब कुछ अधूरा ही माना जाता है। ऐसे रिसेप्शन्स में सबसे ज्यादा भीड़ आइसक्रीम की स्टॉल्स पर ही दिखाई देती है। आइसक्रीम विटामिन व कैल्शियम से भरपूर सबका पसंदीदा, शीतल और स्वास्थ्यप्रद व्यंजन है जो ताजा दूध, मक्खन, अंडे, फलों और सूखे मेवों तैयार किया जाता है।  आइसक्रीम बनाने वाले बड़े बड़े संस्थान भिन्न-भिन्न रंगों और फ्लेवर में अनेक प्रकार की आइसक्रीम बनाते हैं और लुभावनी पैकिंग में बेचते हैं। विज्ञापनों पर खूब पैसा बहाते हैं; परंतु क्या ये लोग सचमुच ताज़ा दूध, मक्खन, फलोंआदि से ही आइसक्रीम बनाते हैंयथार्थ कुछ और ही है जिसे आप सुन नहीं पाएँगे। सचमुच आज बहुराष्ट्रीय संस्थानों का उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना ही है। आपके स्वास्थ्य से उन्हें कोई सरोकार नहीं।
मिल्क पाउडर
एक समस्या तो यह है कि आइसक्रीम बनाने के लिए जिन गायों के दूध से मिल्क पाउडर बनाया जाता है, उन्हें प्राय: सिंथेटिक इस्ट्रोजन हार्मोन के इंजेक्शन दिये जाते हैं; ताकि गायों का विकास तेजी से हो और ये दूध ज्यादा देने लगे। लेकिन क्या इसका असर हमारी नन्हीं लड़कियों के स्वास्थ्य पर नहीं पड़ेगा। हम देख रहे हैं कि आजकल आठ दस साल उम्र में ही लड़कियों के हिप्स और ब्रेस्ट डवलप हो रहे हैं और कैंसर का खतरा भी बढ़ रहा है। यह सब इन्हीं हार्मोन्स और रसायनों की नतीजा है।
शुगर
आइसक्रीम को मिठास देने के लिए चीनी के अलावा कई सस्ती आर्टिफीशियल शुगर्स जैंसे एसेपार्टेम, जाइलिटोल, सेक्रीन आदि भी मिलाई जाती है, जो आपकी सेहत को बहुत खराब करती हैं और इनसे आपको कैंसर भी हो सकता है। सभी बड़े ब्रांड्स आइसक्रीम बनाने के लिए शरीर के लिए घातक ट्रांसफैट युक्त हाइड्रोजिनेटेड वनस्पति घी, स्किम्ड मिल्क पाउडर, हाई फ्रक्टोज कोर्न सिरप, कृत्रिम मिठास या एस्पार्टेम और विषैले एडीटिव्ज जैसे कार्बोक्सिमिथाइल सेल्यूलोज, ब्यूटिरेल्डीहाइड, एमाइल एसीटेट आदि का इस्तेमाल करते हैं। अंडे की जगह सस्ता रसायन डाईइथाइल ग्लाइकोल प्रयोग किया जाता है, जिसका प्रमुख उपयोग रंग रोगन साफ करना हैं। आइसक्रीम का आकार बड़ा करने और ज्यादा मुनाफा कमाने हेतु इसमें हवा भी मिला दी जाती है, हालाँकि यह हवा हमारे शरीर को नुकसान नहीं पहुँचाती है।
जहरीले आर्टिफीशियल फ्लेवर्स
चैरी आइसक्रीम बनाने के लिए एल्डीहाइड सी-17 नामक खतरनाक विष का इस्तेमाल किया जाता है, जो एक ज्वलनशील रसायन है और रंग रोगन, प्लास्टिक तथा रबड़ बनाने के काम में आता है। आपकी सबसे पसंदीदा वनीला आइसक्रीम पिपरोनाल नामक जुएँ मारने की दवा से तैयार होती है। ड्राइ फ़्रूट्स के फ्लेवर के लिए बुटीरेल्डीहाइड नामक रसायन मिलाया जाता है। इसका प्रयोग रबर बनाने के लिए होता है।
चमड़ा और कपड़ा साफ करने का रसायन इथाइल एसीटेट आपकी आइसक्रीम को अनानास का फ्लेवर देता है। इथाइल एसीटेट हृदय, यकृत और फेफड़े के लिए बहुत हानिकारक है।  बनाना आइसक्रीम ऐमाइल एसीटेट से तैयार होती है, जो ऑयल पेंट बनाने के काम में आता है।
आपकी आइसक्रीम में मोनो और डाइग्लीसराइड्स, डाइसोडियम फोस्फेट, बैंजाइल ऐसीटेट, मोनो स्टिरेट, प्रोपाइलीन ग्लाइकोल, सोडियम बेंजोएट, पोलीसोर्बेट 80, पोटेशियम सोर्बेट, मोडीफाइड कोर्न सिरप और सोय लेसीथिन भी मिलाए जाते हैं। हालांकि एफ.डी.ए. ने इन रसायनों को  GRAS (generally recognized as safe)लिस्ट में रखा है; लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इन्हें आइसक्रीम में मिलाना जरूरी है। क्या इन्हें मिलाए बिना आइसक्रीम नहीं बन सकती। यह भी विदित रहे कि एफ.डी.ए. के नियमों के अनुसार आइसक्रीम निर्माता को हर चीज लेबल पर लिखने की जरूरत नहीं है।
यह सब जानने के बाद क्या आप विभिन्न खतरनाक रसायनों से तैयार हुए इस व्यंजन को आइसक्रीम कहेंगे? इसे तो केमिकल ट्रीट, केमिकल शॉप, आइसकेम, आइसस्केम या केमिकल बम कहना ही उचित होगा। गृहणियों क्या यह सब जानने के बाद भी पति और बच्चों को  बाजार की आइसक्रीम खिलाना पसंद करोगी?    कभी नहीं ना। क्या इसका कोई समाधान है? जी हाँ बिलकुल है और वह है कि पूरा भारत बाजार की इस केमिकल आइसक्रीम का पुरजोर तरीके से बहिष्कार करे। आप अच्छी और स्वास्थ्यप्रद आइसक्रीम घर पर बना सकते हैं। देखिगा आपके बच्चे और पतिदेव भी आइसक्रीम बनाने में आपकी मदद करेंगे। मेरा दावा है यह इतनी स्वादिष्ट बनेगी कि आप बाहर की आइसक्रीम हमेशा के लिए भूल जाएँगे।
तो आइये कुछ आइसक्रीम घर पर बनाइये। आपके बच्चों तथा पति को घर पर बनी स्वास्थ्यप्रद और स्वादिष्ट आइसक्रीम खिलाइए-
केदार हिम
सामग्री
1. कंडेंस्ड मिल्क एक टिन 400 ग्राम ,2. बारीक पिसी ताजा अलसी 100 ग्राम, 3. दूध 1 लीटर
4. किशमिश चौथाई कप, 5. बारीक कटी बादाम 25 ग्राम, 6. नेचुरल वनीला एक छोटी चम्मच, 7. चीनी स्वाद के अनुसार, 8. कोको पावडर 50 ग्राम
बनाने की विधि
सबसे पहले दूध गर्म कीजिए। थोड़े से दूध लगभग (100-150 ग्राम) में अलसी के पावडर को अच्छी तरह मिला कर एक तरफ रख दें।  फिर दूध को धीमी-धीमी आँच पर 15-20 मिनट तक उबाल कर ठंडा होने के लिए रख दें। ठंडा होने पर दूध, चीनी, कंडेंस्ड मिल्क और अलसी के मिश्रण को हैंड ब्लेंडर से अच्छी तरह फेंटे। मेवे, वनीला मिला कर फ्रीजिंग ट्रे में रख कर जमने के लिए डीप फ्रीजर में रख दें। चाहें तो आधी जमने पर फ्रीजिंग ट्रे को बाहर निकाल कर एक बार और अच्छी तरह फेंट कर डीप फ्रीजर रख दें। अगले दिन सुबह आपकी स्वास्थ्यप्रद, प्रिजर्वेटिव, रंगों व घातक रसायन मुक्त केदार हिम तैयार है।
कंचन हिम
सामग्री
1. दूध  600  एम.एल.  2. कोडप्रेस्ड वर्जिन अलसी का तेल 60 एम.एल.3. उबाल कर ठंडा किया हुआ गाढ़ा दूध 100 एम.एल.4. प्राकृतिक शहद या चीनी स्वादानुसार 5. बारीक कटे मेवे 25 ग्राम   6. मध्यम आकार का एक आम (लगभग 350-400 ग्राम)  7. नीबू का रस एक चम्मच 
बनाने की विधि
सबसे पहले पनीर बनाइए। इसके लिए स्टील की पतीली में दूध गर्म की कीजि। उबाल आने पर उसमें नीबू का रस डालिये। नीबू डालते ही दूध फट जायेगा। अब फटे दूध को एक चलनी में डाल दें, ताकि उसका पानी निकल जाये। सिर्फ 4-5 मिनट बाद ही पनीर और गाढ़े दूध को एक बर्तन में लेकर बिजली से चलने वाले हैन्ड ब्लेंडर से अच्छी तरह फैंट लें और कॉटेज चीज़ बना लें। अब आम को छील कर छोटे-छोटे टुकड़े कर लीजिए । इसके बाद पनीर और दूध के मिश्रण में आम के टुकड़े, अलसी का तेल और शहद या चीनी मिला कर एक बार फिर अच्छी तरह फैंट लें और मिश्रण में कटे मेवे मिला कर फ्रीजर में जमने के लिए रख दें।
अगले दिन स्वास्थ्यवर्धक, ऊर्जावान और स्वादिष्ट कंचन हिम जम कर तैयार हो जाएगा। अपने परिवार के साथ इस कंचन हिम पर थोड़ा सा शहद डाल कर आनन्द लीजिए। 
नोट- अलसी का कोल्डप्रेस्ड तेल आप इस नंबर 9929744434 से मंगवा सकते हैं।

संपर्क: वैभव हास्पिटल और रिसर्च इंस्टिट्यूट, 7 बी- 43, महावीर नगर तृतीय, कोटा- राजस्थान, मो. 9460816360, Email- dropvermaji@gmail.com, http://flaxindia.blogspot.in

Dec 14, 2013

केला- अनूठा फल निराला स्वाद

      केला-

      अनूठा फल निराला स्वाद

           - डॉ. ओ. पी. वर्मा

केला सर्वसुलभ, सदाबहार, सस्ता, स्वास्थ्यवर्धक और स्वादिष्ट फल है। केले का वानस्पतिक नाम मूसा सेपियेंटा है जिसका मतलब बुद्धिमान व्यक्ति का फल होता है। केला दुनिया के सबसे पुराने और लोकप्रिय फलों में से एक है। केले की गिनती हमारे देश के उत्तम फलों में होती है और हमारे मांगलिक कार्यों में भी विशेष स्थान दिया गया है। केले को असमिया में कोल, बंगला में काला, गुजराती में केला, कन्नड़ में बाले गिड़ाया बालेहन्नु, कोंकणी में केल, मलयालम में वझा, मराठी में कदलीद्व या केल, उडिय़ा में कोडोली या रोम्भा, तमिल में वझाई, तेलुगु में आसी, अंग्रेजी में बनाना (Banana) नाम से पुकारा जाता है। प्लेण्टेन(Plantain) प्रजाति का केला मीठा नहीं होता है और सब्जी के रूप में खाया जाता है।
निसंदेह सेब बहुत अच्छा और स्वास्थ्यप्रद फल माना जाता है इसीलिए An apple a day keeps doctor away कहावत बड़ी मशहूर रही है। लेकिन ताजा शोध यह बताती है कि आपको डॉक्टर से दूर रखने में केला सेब से भी आगे निकल गया है। क्योंकि केले में सेब से दुगुने कार्बोहाइड्रेटव खनिज तत्त्व, तिगुना फोस्फोरस, चार गुना प्रोटीन और पांच गुना विटामिन-ए व आयरन होता है। इसलिए सोच बदलिए, डॉक्टर को अकेला छोडिय़े, रोज केला खाकर स्वस्थ बने रहिये।
केला बुद्धिमान एवं विवेकी व्यक्तियों का प्रिय आहार है। केले का सम्बन्ध विद्या एवं बुद्धि से है, क्योंकि हमारे शास्त्रीय मतों के अनुसार विद्या बुद्धि के स्वामी भगवान बृहस्पति जी का वास केले पर होता है, इसीलिए हिन्दू धर्मावलम्बियो के अनुसार केले के पेड़ की पूजा बृहस्पतिवार के दिन करने का विधान है। हिन्दू पूजा पाठ में भी केले, उसके पत्ते एवं वृक्ष को भी अति पावन स्थान प्राप्त है।

केले का इतिहास
केले की उत्पत्ति लगभग 4000 वर्ष पूर्व मलेशिया में हुई। यहाँ से केला फिलिपीन्स और भारत पहुँचा। क्राइस्ट से 327 वर्ष पहले सिकंदर हिन्दुस्तान के केलों को यूरोप लेकर गया। फिर अरब के सौदागरों ने केलों को अफ्रीका में बेचना शुरू किया। सन् 1482 में पुर्तगालियों ने  अमेरिकी महाद्वीप को निर्यात करना शुरू किया। लेकिन यू.एस.ए. के लोग केले का स्वाद 19 वीं शताब्दी के आखिरी सालों में ही चख पाये। उसके बाद तो केला पूरी दुनिया का चहेता फल बन गया। आज सभी उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय देशों जैसे भारत, चीन, फिलिपीन्स, इक्वाडोर, ब्राजील, इंडोनेशिया, तंजानिया, एंगोलाऔर मेक्सिको में खूब केला पैदा होता है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा केला उत्पादक देश है और अब दुनिया भर के बाजारों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए तैयार है। इसलिए निकट भविष्य में केला महँगा हो सकता है। हमारे यहाँ केले का सालाना उत्पादन 29.6 बिलियन किलो (220,000,000,000 केला) होता है।

पोषक तत्त्व
केले में पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नेशियम, मैगनीज, कापर, आयरन, फास्फोरस,सल्फर, आयोडीन,अल्युमीनियम, जिंक, कोबाल्ट, साइट्रिक एसिड, मैलिक एसिड,आक्जेलिक एसिड आदि तत्त्व होते हैं। 
केले के बारे में कुछ रोचक और निराले तथ्य
-केले को कभी भी रेफ्रिजरेटर में नहीं रखना चाहिए।
-मच्छर काटने पर केले का छिलका रगडऩे से आराम मिलता है।
-केला मन और शरीर को ठंडक प्रदान करता है। इसलिए थाईलैंड में गर्भवती नारियाँ केला खाना पसंद करती हैं, ताकि उनका शिशु शांत प्रकृति का पैदा हो।
-केले की 500 प्रजातियाँ होती हैं। आस्ट्रेलिया की एक प्रजाति के केले लाल होते हैं और पकने पर स्वाद में स्ट्रॉबेरी की तरह लगते हैं।
-केला क्षारीय माना जाता है। 
-अधिकतर फलों के विपरीत केला पेड़ पर नहीं बल्कि एक सदाबहार पौधे पर पैदा होता है। इसका तना कई पत्तियों के जुडऩे और चिपकने से बनता है। केले के गुच्छे को हैंड और एक केले को फिंगर कहते हैं। 
-केले का छिलका भी बहुत उपयोगी है। इसके अंदर के हिस्से को मुहाँसे या मस्से पर रगडऩे से वे सूख जाते हैं। इसे चमड़े के जूतों पर रगडऩे से  वे चमक उठते हैं। केले का छिलका गुलाब के लिए बढिय़ा खाद का काम करता है।
स्फूर्ति और शक्तिदायक केला
केले में सुक्रोज, फ्रुक्टोज और ग्लुकोज नाम की तीन प्राकृतिक शर्कराएँ होती हैं। इसलिए केला तुरंत शक्ति देता है। शोधकर्ता बतलाते हैं कि सिर्फ दो केले खाने से 90 मिनट तक वर्कआउट करने की ऊर्जा मिल जाती है। इसलिए केला अधिकतर खिलाड़ी और पहलवानों का पसंदीदा फल है। लेकिन पर्याप्त फाइबर होने की वजह से कच्चे केले का ग्लायसीमिक इंडेक्स 30 और पके केले का 60 होता है। इसका मतलब इसका सेवन करने से ब्लड शुगर झटके से उछाल नहीं मारती बल्कि आहिस्ता से बढ़ती है, अत: इसे डायबिटीज में खाया जा सकता है। केले में आयरन भी पर्याप्त होता है, इसलिए यह खून की कमी भी दूर करता है।

बुद्धिमान और खुशहाल बनाए केला
बच्चों के बुद्धिमान बनाना है, तो उन्हें केला जरूर खिलाइए। केला खिलाने से विद्यार्थी ऊर्जावान्, सक्रिय और सतर्क हो जाते हैं। केले में ट्रिप्टोफेन, सीरोटोनिन और इपिनेफ्रीन होते हैं जो हमें खुश और तनावमुक्त रखते हैं और डिप्रेशन दूर करते हैं। केले में कॉपर, मेग्नीशियम और मेंगनीज भी होता है। साथ ही इसमें भरपूर विटामिन बी-6 होता है जो जो मस्तिष्क और नाडिय़ों के लिए बहुत जरूरी माना जाता है और यह अनिद्रा, व्याकुलता दूर करता है तथा मूड सही रखता है।  
हृदयरोग
केला पोटेशियम का बहुत बड़ा स्रोत है। जी हाँ, एक केले में भरपूर 467 मिलिग्राम पोटेशियम होता है जबकि सोडियम मात्र 1 मिलिग्राम होता है। इसलिए रोज एक या दो केला खाने से आपको रक्तचाप और ऐथेरोस्क्लिरोसिस होने का खतरा नहीं होगा। पोटेशियम हृदय गति को नियंत्रित रखता है और शरीर में जल के स्तर को सामान्य बनाये रखता है। शोधकर्ताओं ने सिद्ध किया है कि जो लोग अपने आहार में पोटेशियम, मेग्नीशियम और फाइबर अधिक लेते हैं उन्हें स्ट्रोक होने का जोखिम भी बहुत कम रहता है।

आहार तंत्र
केला आमाशय में होने वाले गेस्ट्राइटिस और अल्सर से सुरक्षा प्रदान करता है। केला दो तरह से आमाशय की रक्षा करता है। एक तो केला आमाशय की आंतरिक सतह की कोशिकाओं को प्रोत्साहित करता है ,जिससे वे श्लेष्मा (म्युकस) की मोटी सुरक्षात्मक परत बनाती हैं जो अम्ल से होने वाली क्षति से आमाशय की रक्षा करती है। दूसरा केले में प्रोटिएज इन्हिबीटर्स नाम के तत्त्व होते हैं जो अल्सर बनाने वाले एच. पाइलोराई और अन्य जीवाणुओं का सफाया करते हैं। केला बहुत जल्दी पचता है इसलिए छोटे बच्चों के लिए यह अच्छा भोजन है।
केला आहार पथ को गतिशील और स्वस्थ रखता है। दस्त लगने पर इलेक्ट्रोलाइट्स की एकदम कमी हो जाती है। ऐसे में केला खाने से हमें तुरंत पोटेशियम मिल जाता है जो हृदय की कार्य-प्रणाली को नियमित करता है और तरल की स्थिति संतुलित करता है।
केले में पेक्टिन नामक घुलनशील फाइबर (जिसे हाइड्रोकोलॉयड भी कहते हैं) होता है जो आहार पथ को गतिशील रखता है और कब्ज में राहत देता है। केले में कुछ जटिल स्टार्च भी होते हैं जो आँतो का शोधन करते हैं और सुकून देते हैं। 

आँख की ज्योति बढ़ाता है
आहारशास्त्री कहते हैं कि एंटीऑक्सीडेंट विटामिन ए, सी और ई और केरोटिनॉयड्स से भरपूर केला और अन्य फलों का सेवन करने से ऐज रिलेटेड मेक्यूलर डिजनरेशन (ARMD) का जोखिम कम होता है। यह रोग वृद्धावस्था में दृष्टि दोष का बड़ा कारण माना जाता है।

हड्डियों को मजबूत बनाता है केला
केला खाने से हड्डियाँ मजबूत होती हैं। केला कैल्शियम के अवशोषण और चयापचय को कई तरह से उत्साहित करता है। पहले तो केला फ्रुक्टोऑलिगोसेकेरॉयड नामक प्रिबायोटिक का बहुत अच्छा स्रोत है जो हमारी बड़ी आँत में हितकारी जीवाणुओं का पोषण करते हैं। ये हितकारी जीवाणु विटामिन्स और पाचक एंजाइम्स बनाते हैं जो कैल्शियम समेत कई पोषक तत्त्वों का अवशोषण और हानिकारक जीवाणुओं से रक्षा करने वाले यौगिकों का निर्माण बढ़ाते हैं। जब आँत के हितैषी जीवाणु फ्रुक्टोऑलिगोसेकेरॉयड को फर्मेंट करते हैं तो प्रोबायोटिक्स की सेना बढ़ती है, कैल्शियम का अवशोषण प्रोत्साहित होता है और आँते गतिशील रहती हैं।

किडनी कैंसर में कारगर है केला
इंटरनेशनल जरनल ऑफ कैंसर में प्रकाशित शोध के अनुसार रोजाना सब्जियों और फलों की औसत 2.5 सर्विंग लेने वाली स्त्रियों में किडनी के कैंसर की दर में 40ऽ कमी देखी गई। इनमें केला सबसे कारगर साबित हुआ।

एच.आइ.वी.
केले में बेनलेक नाम का लेक्टिन प्रोटीन होता है जो शर्करा से मिल कर एच.आइ.वी. संक्रमित कोशिका के चारो तरफ एक चक्रव्यूह की रचना कर डालता है, जिससे एच.आइ.वी. वायरस का विकास और प्रसार बुरी तरह प्रभावित होता है। इसलिए एच.आई.वी. रोग में केला कल्याणकारी माना गया है।

आयुर्वेद में केले के प्रयोग
केला खाए ताकतवर हो जाये - केला रोचक, मधुर, शक्तिशाली, वीर्यवर्धक, शुक्रवर्धक, मांस बढ़ाने वाला और नेत्रदोष में हितकारी है। पके केले के नियमित सेवन से शरीर पुष्ट होता है। यह कफ, रक्तपित, वात और प्रदर के विकारों को नष्ट करता है।
पेचिश रोग- में थोड़े-से दही में केला मिलाकर सेवन से फायदा होता है। पेट में जलन होने पर दही में चीनी और पका केला मिलाकर खाए। इससे पेट सम्बन्धी अन्य रोग भी दूर होते हैं। अल्सर के रोगियों के लिए कच्चे केले का सेवन रामबाण औषधि है।
खाँसी- एक पके केले में आठ साबुत काली मिर्च भर दें, वापस छिलका लगाकर खुले स्थान पर रख दें। शौच जाने के पूर्व प्रात: काली मिर्च निकालकर खा जाएँ, फिर ऊपर से केला भी खा जाएँ। इस प्रकार कुछ दिन करने से हर तरह की खाँसी ठीक हो जाती है। अगर किसी को काली खाँसी हो गयी है तो केले के तने को सुखाकर फिर जलाकर जो राख बचती है वह दो-तीन चुटकी लीजिए और शहद मिला कर चटा दीजिए। काली खाँसी जड़ से खत्म हो जाएगी।

जलने के घाव- आग से शरीर का कोई हिस्सा जल गया हो तो वहाँ केले को मसल कर रख दीजिये और ऊपर से पट्टी बाँध दीजिए। जलन भी कम होगी और घाव भी ठीक होगा।
मूत्राशय की पथरी- केले के तने की भस्म को पानी में घोल कर पीने से मूत्राशय की पथरी गल कर निकल जाती है। केले का रस पीने से खुल कर पेशाब आता है और मूत्राशय साफ़ हो जाता है। जिससे देह में संचित रोग के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं।  केला अगर एक निश्चित मात्रा में रोज खाया जाए तो ये किडनी को मजबूत बनाता है।
संग्रहणी- किसी को संग्रहणी की शिकायत हो तो वह पके केले के साथ इमली और नमक खाए, यह मिश्रण संग्रहणी दूर कर देता है। हैजे से ग्रसित रोगी को सुबह शाम एक एक पका केला जरूर खिलाना चाहिए।
साँस की बीमारी- साँस से सम्बन्धित कोई भी बीमारी हो तो एक केला लीजिए,उसमे बीच में चीरा लगाकर काली मिर्च का 3-4 ग्राम पावडर भर के रात भर रख दीजिए। सवेरे इस केले को तवे पर ज़रा सा देशी घी डाल कर सेंक कर खा लीजिए। 3 दिन लगातार इस्तेमाल करे। सांस की बीमारी ख़त्म हो जाएगी।
बबासीर- एक केले को बीच से चीरा लगाकर चना बराबर कपूर बीच में रख दे फिर इसे खाए इससे बबासीर एकदम ठीक हो जाती है।
मधुमेह- केले के फूलों का सत मिल जाए तो इसे ब्लड सुगर को कंट्रोल करने के लिए रोजाना एक चुटकी खा लीजिये। यह बहुत अचूक दवा है।
दोस्तों, एक बुरी खबर है आज पूरे विश्व में केले की जितनी भी प्रजातियाँ उपलब्ध हैं वे सभी पीले रंग की केवेंडिश प्रजाति से ही विकसित की गई हैं। हो सकता है बीमारी के कारण निकट भविष्य में यह प्रजाति पूरी तरह लुप्त हो जाये। अनुसंधानकर्ता यह मानते हैं कि अगले 20 वर्षों में ऐसा हो सकता है।
पहले भी एक बार ऐसा हो चुका है। पुराने जमाने में  ग्रोस मिशेल प्रजाति का केला प्रचलित था जो बहुत स्वादिष्ट था, शैल्फ लाइफ भी ज्यादा थी और बड़ा भी होता था। पिछली सदी के आरंभ में यह प्रजाति एक बीमारी के कारण एकदम लुप्त हो गई। इसीलिए कृषि वैज्ञानिक केले की ऐसी प्रजाति विकसित करने कोशिश कर रहे हैं जिसे बीमारी नष्ट नहीं कर सके। इसलिए मजे ले लेकर खूब केले खाइए, ताकि आप अपनी औलादों को बतला तो सकें कि केवेंडिश केला कितना स्वादिष्ट लगता था।

सम्पर्क:वैभव हॉस्पीटल और रिसर्च इन्स्टिट्यूट, 7-बी-43, महावीर नगर तृतीय, कोटा राजस्थान मो.9860816360 Email-dropvermaji@gmail.com

May 22, 2013

बडविग प्रोटोकोल

कैंसर रोधी आहार-विहारः अलसी तेल का जादुई असर
-डॉ. ओ. पी. वर्मा
डॉ. योहाना बडविग (जन्म 30 सितम्बर, 1908 -मृत्यु 19 मई 2003) विश्व विख्यात जर्मन जीव रसायन विशेषज्ञ और चिकित्सक थी। उन्होंने भौतिक, जीवरसायन तथा भेषज विज्ञान में मास्टर की डिग्री हासिल की थी और प्राकृतिक-चिकित्सा विज्ञान में पी.एच.डी. भी की थी। वे जर्मन सरकार के खाद्य और भेषज विभाग में सर्वोच्च पद पर कार्यरत  थीं। उन्होंने वसा, तेल तथा कैंसर के उपचार के लिए बहुत शोध किये थे। वे आजीवन शाकाहारी रहीं। जीवन के अंतिम दिनों में भी वे सुंदर, स्वस्थ और युवा दिखती थीं।
1923 में डॉ. ओटो वारबर्ग ने कैंसर के मुख्य कारण की खोज कर ली थी, जिसके लिये उन्हें 1931 में नोबल पुरस्कार दिया गया था। उन्होंने पता लगाया था कि कैंसर का मुख्य कारण कोशिकाओं में होने वाली श्वसन क्रिया का बाधित होना है और कैंसर कोशिकाऐं ऑक्सीजन के अभाव और अम्लीय माध्यम में ही फलती-फूलती है। कैंसर कोशिकायें ऑक्सीजन द्वारा श्वसन क्रिया नहीं करती हैं और वे ग्लूकोज को फर्मेंट करके ऊर्जा प्राप्त करती है, जिसमें लेक्टिक एसिड बनता है और शरीर में अम्लता बढ़ती है। यदि कोशिकाओं को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती रहे तो कैंसर का अस्तित्व संभव ही नहीं है। वारबर्ग ने कैंसर कोशिकाओं में ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाने के लिए कुछ परीक्षण किये थे परन्तु वे असफल रहे।
डॉ. योहाना ने वारबर्ग के शोध को जारी रखा। वर्षों तक शोध करके पता लगाया कि इलेक्ट्रोन युक्त, अत्यन्त असंतृप्त ओमेगा-3 वसा से भरपूर अलसी, जिसे अंग्रेजी में Linseed या Flaxseed कहते हैं, का तेल कोशिकाओं में नई ऊर्जा भरता है, उनकी स्वस्थ भित्तियों का निर्माण करता है और कोशिकाओं में ऑक्सीजन को आकर्षित करता है। परंतु इनके सामने मुख्य समस्या यह थी की अलसी के तेल, जो रक्त में नहीं घुलता है, को कोशिकाओं तक कैसे पहुँचाया जाये? वर्षो तक कई परीक्षण करने के बाद डॉ. योहाना ने पाया कि अलसी के तेल को सल्फर युक्त प्रोटीन जैसे पनीर के साथ मिलाने पर अलसी का तेल पानी में घुलनशील बन जाता है और तेल को सीधा कोशिकाओं तक पहुँचाता है। इसलिए उन्होंने सीधे बीमार लोगों के रक्त के परीक्षण किये और उनको अलसी का तेल तथा पनीर मिला कर देना शुरू कर दिया। तीन महीने बाद फिर उनके रक्त के नमूने लिये गये। नतीजे चौंका देने वाले थे। उन्होंने अलसी के तेल और पनीर के जादुई और आश्चर्यजनक प्रभाव दुनिया के सामने सिद्ध कर दिये थे। 
इस तरह 1952 में डॉ. योहाना ने अलसी के तेल और पनीर के मिश्रण तथा कैंसर रोधी फलों व सब्जियों के साथ कैंसर के उपचार का तरीका विकसित किया था,जो बडविग प्रोटोकोल के नाम से विख्यात हुआ। वे 1952 से 2002 तक कैंसर के हजारों रोगियों का उपचार करती रहीं। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखी थी जिनमें 'फैट सिंड्रोम’, 'डैथ आफ ए ट्यूमर’, 'फ्लेक्स आयल- ए ट्रू एड अगेन्स्ट आर्थाइटिस, हार्ट इन्फार्कशन, कैंसर एण्ड अदर डिजीज़ेज’, 'आयल प्रोटीन कुक बुक’, 'कैंसर- द प्रोबलम एण्ड सोल्यूशनआदि मुख्य हैं। उन्होंने अपनी आखिरी पुस्तक 2002 में लिखी थी।
कैंसर रोधी योहाना बडविग आहार विहार
डॉ. बडविग आहार में प्रयुक्त खाद्य पदार्थ ताजा, इलेक्ट्रोन युक्त और जैविक होने चाहिए। इस आहार में अधिकांश खाद्य पदार्थ सलाद और रसों के रूप में लिये जाते है, जिन्हें ताजा तैयार किया जाना चाहिए ताकि रोगी को भरपूर इलेक्ट्रोन्स मिले। डॉ. बडविग ने इलेक्ट्रोन्स पर बहुत जोर दिया है।
अंतरिम या ट्रांजीशन आहार
कई रोगी विशेष तौर पर जिन्हें यकृत और अग्न्याशय का कैंसर होता हैशुरू में सम्पूर्ण बडविग आहार पचा नहीं पाते हैं। ऐसी स्थिति में डॉ. बडविग कुछ दिनों तक रोगियों को अंतरिम या ट्रांजीशन आहार लेने की सलाह देती थी। अंतरिम आहार में रोज 250 ग्राम अलसी दी जाती है। कुछ दिनों तक रोगी को ओटमील के सूप में ताजा पिसी हुई अलसी मिला कर दिन में कई बार दी जाती है। इस सूप को बनाने के लिए एक पतीली में 250 एम एल पानी लें और तीन बड़ी चम्मच ओटमीन डाल कर पकायें। ओट पक जाने पर उसमें बड़ी तीन चम्मच ताजा पिसी अलसी मिलायें और एक उबाल आने दें। फिर गैस बंद कर दे और दस मिनट तक ढक कर रख दें।  अलसी मिले इस सूप को खूब चबा-चबा कर लार में अच्छी तरह मिला कर खाना चाहिये क्योंकि पाचन क्रिया मुँह में ही शुरू हो जाती है। इस सूप में दूध या संतरा, चेरी, अंगूर, ब्लूबेरी आदि फलों के रस भी मिलाये जा सकते हैं, जो पाचन- शक्ति बढ़ाते हैं। इसके डेढ़- दो घंटे बाद पपीते का रस, दिन में तीन बार हरी या हर्बल चाय और अन्य फलों के रस दिये जाते हैं। अंतरिम आहार में पपीता खूब खिलाना चाहिये। जैसे ही रोगी की पाचन शक्ति ठीक होने लगती है उसे अलसी के तेल और पनीर से बने ओम-खण्ड की कम मात्रा देना शुरू करते हैं। और धीरे-धीरे सम्पूर्ण बडविग आहार शुरू कर दिया जाता है।  
 प्रात:
इस उपचार में सुबह सबसे पहले एक ग्लास सॉवरक्रॉट (खमीर की हुई पत्ता गोभी) का रस लेना चाहिये। इसमें भरपूर एंजाइम्स और विटामिन-सी होते हैं। सॉवरक्रॉट हमारे देश में उपलब्ध नहीं है परन्तु इसे घर पर पत्ता गोभी को ख़मीर करके बनाया जा सकता है। हाँ इसे घर पर बनाना थोड़ा मुश्किल अवश्य है। इसलिए डॉ. बडविग ने भी लिखा है कि सॉवरक्रॉट उपलब्ध न हो तो रोगी एक ग्लास छाछ पी सकता है। छाछ भी घर पर मलाई-रहित दूध से बननी चाहिये। यह अवश्य ध्यान में रखें कि छाछ सॉवरक्रॉट जितनी गुणकारी नहीं है। इसके थोड़ी देर बाद कुछ रोगी गेहूँ के ज्वारे का रस भी पीते हैं। 
नाश्ता:
नाश्ते से आधा घंटा पहले बिना चीनी की गर्म हर्बल या हरी चाय लें। मीठा करने के लिए एक चम्मच शहद या स्टेविया (जो डॉ. स्वीट के नाम से बाजार में उपलब्ध है) का प्रयोग कर सकते हैं। यह नाश्ते में दिये जाने वाले अलसी मिले ओम-खण्ड के फूलने हेतु गर्म और तरल माध्यम प्रदान करती है।
ओम-खण्ड
इस आहार का सबसे मुख्य व्जंजन सूर्य की अपार ऊर्जा और इलेक्ट्रोन्स से भरपूर ओम-खंड है जो अलसी के तेल और घर पर बने वसा रहित पनीर या दही से बने पनीर को मिला कर बनाया जाता है । पनीर बनाने के लिए गाय या बकरी का दूध सर्वोत्तम रहता है। इसे एकदम ताज़ा बनायें और ध्यान रखें कि बनने के 15 मिनट के भीतर रोगी खूब चबा-चबा कर आनंद लेते हुए इसका सेवन करें। ओम-खण्ड बनाने की विधि इस प्रकार है।
3 बड़ी चम्मच यानी 45 एम.एल. अलसी का तेल और 6 बड़ी चम्मच यानी लगभग 100 ग्राम पनीर को बिजली से चलने वाले हेन्ड ब्लेंडर द्वारा एक मिनट तक अच्छी तरह मिक्स करें। तेल और पनीर का मिश्रण क्रीम की तरह हो जाना चाहिये और तेल दिखाई देना नहीं चाहिये। तेल और पनीर को ब्लेंड करते समय यदि मिश्रण गाढ़ा लगे तो पतला करने के लिए 1 या 2 चम्मच दूध मिला लें। पानी या किसी फल का रस नहीं मिलायें। अब मिश्रण में 2 बड़ी चम्मच अलसी ताज़ा मोटी-मोटी पीस कर मिलायें।
इसके बाद मिश्रण में आधा या एक कप कटे हुए स्ट्रॉबेरी, रसबेरी, ब्लूबेरी, चेरी, जामुन आदि फल मिलायें। बेरों में शक्तिशाली कैंसर रोधी में एलेजिक एसिड होता है। ये फल हमारे देश में हमेशा उपलब्ध नहीं होते हैं। इस स्थिति में आप अपने शहर में मिलने वाले अन्य फलों का प्रयोग कर सकते हैं। 
इस ओम-खण्ड को आप कटे हुए मेवे जैसे खुबानी, बादाम, अखरोट, काजू, किशमिश, मुनक्के आदि सूखे मेवों से सजायें। ध्यान रहे मूंगफली वर्जित है। मेवों में सल्फर युक्त प्रोटीन, आवश्यक वसा और विटामिन होते हैं। रोगी को खुबानी के 6-8 बीज रोज खाना ही चाहिये। इसमें महान विटामिन बी-17 और बी-15 होते हैं जो कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करते हैं। स्वाद के लिए काली मिर्च, सैंधा नमक, ताजा वनीला, दाल चीनी, ताजा काकाओ, कसा नारियल, सेब का सिरका या नींबू का रस मिला सकते हैं। मसालों और फलों को बदल-बदल कर आप स्वाद में विविधता और नवीनता ला सकते हैं।
डॉ. बडविग ने चाय और ओम-खण्ड को मीठा करने के लिए प्राकृतिक और मिलावट रहित शहद को प्रयोग करने की सलाह दी है। लेकिन ध्यान रहे कि प्रोसेस्ड यानी डिब्बा बन्द शहद प्रयोग कभी नहीं करें और यह भी सुनिश्चित करलें कि बेचने वाले ने शहद में चाशनी की मिलावट तो नहीं की है। दिन भर में 5 चम्मच शहद लिया जा सकता है। ओम खण्ड को बनाने के दस मिनट के भीतर रोगी को ग्रहण कर लेना चाहिए।
सामान्यत: ओम-खण्ड लेने के बाद रोगी को कुछ और लेने की जरूरत नहीं पड़ती है। लेकिन यदि रोगी चाहे तो फल, सलाद, सूप, एक या दो मिश्रित आटे की रोटी, ओट मील या का दलिया ले सकता है।  
10 बजे
नाश्ते के एक घंटे बाद रोगी को गाजर, मूली, लौकी, मेथी, पालक, करेला, टमाटर, करेला, शलगम, चुकंदर आदि सब्जियों का रस ताजा निकाल कर पिलायें। सब्जियों को पहले साफ करें, अच्छी तरह धोयें, छीलें फिर घर पर ही अच्छे ज्यूसर से रस निकालें। गाजर और चुकंदर यकृत को ताकत देते हैं और अत्यंत कैंसर रोधी होते हैं। चुकंदर का रस हमेशा किसी दूसरे रस में मिला कर देना चाहिये। ज्यूसर खरीदते समय ध्यान रखें कि ज्यूसर चर्वण (masticating) विधि द्वारा रस निकाले न कि अपकेंद्री (Centrifugal) विधि द्वारा। 
दोपहर का खाना
नाश्ते की तरह दोपहर के खाने के आधा घंटा पहले भी एक गर्म हर्बल चाय लें। दिन भर में रोगी पांच हर्बल चाय पी सकता है। कच्ची या भाप में पकी सब्जियाँ जैसे चुकंदर, शलगम, खीरा, ककड़ी, मूली, पालक, भिंडी, बैंगन, गाजर, बंद गोभी, गोभी, मटर, शिमला मिर्च, ब्रोकोली, हाथीचाक, प्याज, टमाटर, शतावर आदि के सलाद को घर पर बनी सलाद ड्रेसिंगऑलियोलक्स या सिर्फ अलसी के तेल के साथ लें। हरा धनिया, करी पत्ता, जीरा, हरी मिर्च, दालचीनी, कलौंजी, अजवायन, तेजपत्ता, सैंधा नमक और अन्य मसाले डाले जा सकते हैं। ड्रेसिंग बनाने के लिए 2 चम्मच अलसी के तेल व 2 चम्मच पनीर के मिश्रण में एक चम्मच सेब का सिरका या नीबू के रस और मसाले डाल कर अच्छी तरह ब्लैंडर से मिलायें।  विविधता बनाये रखने के लिए आप कई तरह से ड्रेसिंग बना सकते हैं। हर बार पनीर मिलाना भी जरूरी नहीं है। दही या ठंडी विधि से निकला सूर्यमुखी का तेल भी काम में लिया जा सकता है। अलसी के तेल में अंगूर, संतरे या सेब का रस या शहद मिला कर मीठी सलाद ड्रेसिंग बनाई जा सकती है।
साथ में चटनी (हरा धनिया, पुदीना या नारियल की), भूरे चावल, दलिया, खिचड़ी, इडली, सांभर, कढ़ी, उपमा या मिश्रित आटे की रोटी ली जा सकती है। रोटी चुपडऩे के लिए ऑलियोलक्स प्रयोग करें। मसाले, सब्जियाँ और फल बदल-बदल कर प्रयोग करें। रोज एक चम्मच कलौंजी का तेल भी लें। भोजन तनाव रहित होकर खूब चबा-चबा कर करें।
ओम-खंड की दूसरी खुराक
रोगी को नाश्ते की तरह ही ओम-खण्ड की एक खुराक दिन के भोजन के साथ देना अत्यंत आवश्यक है। यदि रोगी को शुरू में अलसी के तेल की इतनी ज्यादा मात्रा पचाने में दिक्कत हो तो कम मात्रा से शुरू करें और धीरे-धीरे बढ़ा कर पूरी मात्रा देने लगें। 
दोपहर बाद
दोपहर बाद अन्नानस, संतरा, मौसम्मी, अनार, चीकू, नाशपाती, चेरी या अंगूर के ताजा निकले रस में एक या दो चम्मच अलसी को ताजा पीस कर मिलायें और रोगी को पिलायें। यदि रस ज्यादा बन जाये और रोगी उसे पीना चाहे तो पिला दें। रोगी चाहें तो आधा घंटे बाद एक गिलास रस और पी सकता है।
तीसरे पहर
पपीते के एक ग्लास रस में एक या दो चम्मच अलसी को ताजा पीस कर डालें और रोगी को पिलायें। पपीता और अन्नानास के ताजा रस में भरपूर एंज़ाइम होते हैं जो पाचन शक्ति को बढ़ाते हैं।
सायंकालीन भोजन
शाम के भोजन के आधा घन्टा पहले भी रोगी को एक कप हरी या हर्बल चाय पिलायें। सब्जियों का शोरबा या सूप, दालें, मसूर, राजमा, चावल, कूटू, मिश्रित और साबुत आटे की रोटी सायंकालीन भोजन का मुख्य आकर्षण है। सब्जियों का शोरबा, सूप, दालें, राजमा या पुलाव बिना तेल डाले बनायें। मसाले, प्याज, लहसुन, हरा धनिया, करी पत्ता आदि का प्रयोग कर सकते हैं। पकने के बाद ईस्ट फ्लेक्स और ऑलियोलक्स डाल सकते हैं। ईस्ट फ्लेक्स में विटामिन-बी होते हैं जो शरीर को ताकत देते हैं। टमाटर, गाजर, चुकंदर, प्याज, शतावर, शिमला मिर्च, पालक, पत्ता गोभी, गोभी, आलू, अरबी, ब्रोकोली आदि सभी सब्जियों का सेवन कर सकते हैं। दालें और चावल बिना पॉलिश वाले काम में लें। डॉ. बडविग ने सबसे अच्छा अन्न कूटू (buckwheat)  का माना है। इसके बाद बाजरा, रागी, भूरे चावल, गैहूँ आते हैं। मक्का खाने के लिए उन्होंने मना किया है। 
 
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