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Aug 13, 2020

आजादी की बुनियाद रखने वाली रानी लक्ष्मीबाई ( मिसाल)

आजादी की बुनियाद रखने वाली रानी लक्ष्मीबाई
 -डॉ. नीलम महेन्द्र 
आसान नहीं होता एक महिला होने के बावजूद पुरूष प्रधान समाज में विद्रोही बनकर अमर हो जाना। आसान नहीं होता एक महिला के लिए एक साम्राज्य के खिलाफ खड़ा हो जाना।
आज हम जिस रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस पर उन्हें श्रद्धा पुष्प अर्पित कर रहे हैं वो उस वीरता शौर्य साहस और पराक्रम का नाम है जिसने अपने छोटे से जीवन काल में वो मुकाम हासिल किया जिसकी मिसाल आज भी दुर्लभ है। ऐसे तो बहुत लोग होते हैं जिनके जीवन को या फिर जिनकी उपलब्धियों को उनके जीवन काल के बाद सम्मान मिलता है लेकिन अपने जीवन काल में ही अपने चाहने वाले ही नहीं बल्कि अपने विरोधियों के दिल में भी एक सम्मानित जगह बनाने वाली विभूतियाँ बहुत कम होती हैं। रानी लक्ष्मीबाई ऐसी ही एक शख्सियत थीं जिन्होंने ना सिर्फ अपने जीवन काल में लोगों को प्रेरित किया बल्कि आज तक वो हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत हैं। 
एक महिला जो मात्र 25 वर्ष की आयु में अपने पति और पुत्र को खोने के बाद भी अंग्रेजों को युद्ध के लिए ललकारने का जज्बा रखती हो वो निसंदेह हर मानव के लिए प्रेरणास्रोत रहेगी। वो भी उस समय जब 1857 की क्रांति से घायल अंग्रेजों ने भारतीयों पर और अधिक अत्याचार करने शुरू कर दिए थे और बड़े से बड़े राजा भी अंग्रेजों के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। ऐसे समय में एक महिला की दहाड़ ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। क्योंकि रानी लक्ष्मीबाई की इस दहाड़ की गूँज झाँसी तक सीमित नहीं रही, वो पूरे देश में न सिर्फ सुनाई दीबल्कि उस दहाड़ ने देश के बच्चे बच्चे को हिम्मत से भर दियाजिसके परिणाम स्वरूप धीरे- धीरे देश भर के अलग अलग हिस्सों में होने वाले विद्रोह सामने आने लगे। दरअसल झाँसी के लिए, अपनी भूमि की स्वतंत्रता के लिए, अपनी प्रजा को अत्याचारों से मुक्त कराने के लिए रानी लक्ष्मीबाई के  दिल में जो आग  धधक रही थी वो 1858 में उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे कर पूरे भारत में फैला दी। उन्होंने अपनी स्वयं की आहुति से उस यज्ञ अग्नि को प्रज्वलित कर दिया था जिसकी पूर्ण आहुति 15 अगस्त1947 को डली। हालाँकि 18 जून 1858 को रानी लक्ष्मीबाई अकेले होने के कारण अपनी झाँसी नहीं बचा पाईं ; लेकिन देश को बचाने की बुनियाद खड़ी कर गईं एक मार्ग दिखा गईं। निडरता का पाठ पढ़ा गईंअमरत्व की राह दिखा गईं। उनके साहस और पराक्रम का अंदाजा जनरल ह्यूरोज के इस कथन से लगाया जा सकता है कि अगर भारत की एक फीसदी महिलाएँ इस लड़की की तरह आज़ादी की दीवानी हो गईं तो हम सब को यह देश छोड़कर भागना पड़ेगा।
कल्पना कीजिए एक महिला की जिसकी पीठ पर नन्हा बालक हो उसके मुँह में घोड़े की लगाम हो और उसके दोनों हाथों में  तलवार!!  शायद हाँ हमारे लिए यह कल्पना करना इतना मुश्किल भी नहीं है ;क्योंकि हमने उनकी मूर्तियाँ देखीं  हैं, उनकी ऐसी तस्वीरें देखी हैं;  लेकिन ये औरत कोई मूर्ति नही हैकोई तस्वीर नहीं है किसी वीर रस के कवि की कल्पना भी नहीं हैयह हकीकत है। शायद इसलिए वो आज भी जिंदा है और हमेशा रहेगी  हाँ वो अमर है और सदियों तक रहेगी। जानते हैं क्योंक्योंकि वो केवल इस देश के लोगों के दिलों में ही जिंदा नहीं हैवो आज भी जिंदा है अपने दुश्मनों के दिल में,  अपने विरोधियों के दिलों में, उन अंग्रेजों के दिलोदिमाग में जिनसे उन्होंने लोहा लिया था। हाँ यह सच है कि अंग्रेज रानी लक्ष्मीबाई से  जीत गए थे;  लेकिन वो जानते थे कि वो इस लड़ाई को जीत कर भी हार गए थे। वो एक महिला के उस पराक्रम से हार गए थे, जो एक ऐसे युद्ध का नेतृत्व निडरता से कर रही थी जिसका परिणाम वो जानती थी। वे एक महिला के उस जज़्बे से हार गए थे जो अपने दूध पीते बच्चे को कंधे पर लादकर रणभूमि का बिगुल बजाने का साहस रखती थी। शायद इसलिए वो उनका सम्मान भी करते थे। उस दौर के कई ब्रिटिश अफसर बेहिचक स्वीकार करते थे कि महारानी लक्ष्मीबाई बहादुरी बुद्धि  दृढ़ निश्चय और प्रशासनिक क्षमता का दुर्लभ मेल हैं और उन्हें अपना सबसे खतरनाक शत्रु मानते थे। जिस शख्शियत की तारीफ करने के लिए शत्रु भी मजबूर हो जाए, तो किरदार का अंदाज़ा खुद ब खुद लगाया जा सकता है। 
आज जब 21 वीं सदी में हम 19 वीं सदी की एक महिला की बात कर रहे हैं उन्हें याद कर रहे हैं उनके बलिदान दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं, तो मेरा मानना है कि यह सिर्फ एक रस्म अदायगी नहीं होनी चाहिए। केवल एक कार्यक्रम नहीं होना चाहिए; बल्कि एक अवसर होना चाहिए। ऐसा अवसर जिससे हम कुछ सीख सकें। तो कुछ बातें जिनकी प्रेरणा हम रानी लक्ष्मीबाई के जीवन से ले सकते हैं-
1. हर कीमत पर आत्मसम्मान स्वाभिमान की रक्षा। जब आपके पास दो विकल्प हो आत्मसमपर्ण या लड़ाई सरल शब्दों में कहें तो जीवन या स्वाभिमान में से चुनना तो उन्होंने स्वाभिमान को चुना।
2. ‘आत्मविश्वासअंग्रेजों के मुकाबले संसाधनों और सैनिकों की कमी ने उनके हौसले को डिगाने के बजाए और मजबूत कर दिया और व दहाड़ पाईं कि जीते जी अपनी झाँसी नहीं दूँगी 
3. ‘लक्ष्य के प्रति दृढ़अपनी झाँसी को बचाना ही उनका लक्ष्य था जिसके वो अपनी जान देकर अमर हो गईं।
4. ‘अपने अधिकारों के लिए लड़ना’ केवल 25 वर्ष की आयु में अपने राज्य की रक्षा के लिए ब्रिटिश साम्राज्य से विद्रोह हमें सिखाता है कि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाया जा सकता है।
5. ‘अन्याय के खिलाफ आवाज उठानाउन्होंने अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाकर न्याय के लिए लड़कर गीता का ज्ञान चरितार्थ करके दिखाया।
6. और अंत में जो सबसे महत्त्वपूर्ण और व्यवहारिक शिक्षा जो उनके जीवन से हमें मिलती है , कि शस्त्र और शास्त्र विद्या, तार्किक बुद्धि, युद्ध कौशल, और ज्ञान किसी औपचारिक शिक्षा की मोहताज नहीं है। रानी लक्ष्मीबाई ने कोई औपचारिक शिक्षा ग्रहण नहीं की थी लेकिन उनकी युद्ध क्षमता ने ब्रिटिश साम्राज्य को भी अचंभे में डाल दिया था।
शायद इसलिए व आज भी हमारे बीच जीवित हैं फिल्मों में टीवी सीरियल में किस्सों में कहानियों में लोक गीतों में कविताओं में उनके नाम पर यूनिवर्सिटी का नामकरण करके उनके पुतले बनाकर। लेकिन इतना काफी नहीं है प्रयास कीजिए उनका थोड़ा सा अंश हमारे भीतर भी जीवित हो उठे।
सम्पर्कः Jari patka no 2, Phalka Bazar, Lashkar, Gwalior, MP- 474001, Mob - 9200050232, Email - drneelammahendra@gmail.com

Jul 10, 2020

आत्मनिर्भर भारत - बिना हथियार का युद्ध

 आत्मनिर्भर भारत -  बिना हथियार का युद्ध
-डॉ. नीलम महेन्द्र 
आजकल देश में सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर चीन को बॉयकॉट करने की मुहिम चल रही है। इससे पहले कोविड 19 के परिणामस्वरूप जब देश की अर्थव्यवस्था पर वैश्वीकरण के दुष्प्रभाव सामने आने लगे थे, तो प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर भारत का मंत्र दिया था। उस समय यह मंत्र देश की अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक लाभ पहुँचाने की दृष्टि से उठाया गया एक मजबूत कदम था, जो आज  भारत चीन सीमा विवाद के चलते बॉयकॉट चायना का रूप ले चुका है; लेकिन जब तक हम आत्मनिर्भर नहीं बनेंगे, चीन के आर्थिक बहिष्कार की बातें खोखली ही सिद्ध होंगी। इसे मानव चरित्र का पाखंड कहें या उसकी मजबूरी कि एक तरफ इन्टरनेट के विभिन्न माध्यम चीनी समान के बहिष्कार के संदेशों से पटे पड़े  हैं,  तो दूसरी तरफ ई कॉमर्स साइट्स से भारत में चीनी मोबाइल की रिकॉर्ड बिक्री हो रही है। जी हाँ  16 जून को हमारे सैनिकों की शहादत से सोशल मीडिया पर चीन का बहिष्कार करने वाले संदेशो की बाढ़ ही आ गई थी। चीन के खिलाफ देशभर में गुस्सा था, तो उसके एक दिन बाद ही 18 जून को ई कॉमर्स साइट्स पर चीन अपने मोबाइल की सेल लगाता है और कुछ घंटों में ही वे बिक भी जाते हैं।
अगर भारत के मोबाइल मार्केट में चीनी हिस्सेदारी की बात करें, तो आज की तारीख में यह 72 से 75% के बीच है और यह अलग अलग कंपनी के हिसाब से साल भर में  6% से 33% की ग्रोथ रेट दर्ज करता है। लेकिन सिर्फ आम आदमी ही चीनी समान के मायाजाल में फँसा हो ऐसा नहीं है देश की बडी बड़ी कंपनियाँ भी चीन के भृम जाल में उलझी हुई हैं। क्योंकि यहाँ सिर्फ मोबाइल मार्केट की हिस्सेदारी की बात नहीं है, टीवी, अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, से लेकर गाड़ियों के मोटर पार्ट्स, चिप्स, प्लास्टिक, फार्मा या दवा कंपनियों द्वारा आयातित कच्चे माल की मार्केट भी चीन पर निर्भर है। यही कारण है कि चीन से सीमा पर विवाद बढ़ने के बाद जब भारत सरकार ने चीनी समान पर टैरिफ बढ़ाने की बात कही, तो मारुति और बजाज जैसी कंपनियों को कहना पड़ा कि सरकार के इस फैसले का भार ग्राहक की जेब पर सीधा असर डालेगा।
इन परिस्थितियों में जब हम आत्मनिर्भर भारत की बात करते हैं, तो मंज़िल काफी दूर और लक्ष्य बेहद कठिन प्रतीत होता है। इसलिए अगर हम आत्मनिर्भर भारत को केवल एक नारा बना कर छोड़ने के बजाय, उसे यथार्थ में आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं तो हमें जोश से नहीं होश से काम लेना होगा। इसके लिए सबसे पहले हमें सच को स्वीकार करना होगा और सत्य यह है कि आज की तारीख में साइंस और टेक्नोलॉजी ही चीन का सबसे बड़ा हथियार है, जिसमें हम चीन को टक्कर देने की स्थिति में नहीं हैं। यानी हम बिना हथियार युद्ध के मैदान में कूद रहे हैं, तो फिर जीतेंगे कैसे?
दरअसल युद्ध कोई भी हो, उसे जीतने के लिए अपनी कमजोरियाँ और ताकत दोनों पता होनी चाहिए। अपनी कमजोरियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए और अपनी क्षमताओं का दोहन। यह सच है कि आज की तारीख में विज्ञान और प्रौद्योगिकी हमारी कमजोरी है,  लेकिन भारत जैसे देश में क्षमताओं और संभावनाओं की कमी नहीं है और यही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। हमारी सबसे बड़ी ताकत है -हमारी कृषि और हमारे किसान दोनों को ही मजबूत बनाने की जरूरत है। सरकार ने इस दिशा में घोषणाएँ भी की हैं लेकिन भारत की अफसरशाही का इतिहास देखते हुए उन्हें क्रियान्वित करके धरातल पर उतारना सरकार की मुख्य चुनौती होगी। हमारी दूसरी ताकत है हमारी सदियों पुरानी चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस देश में इस पूर्णतः वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति का उद्भव हुआ, उसी देश में उसे यथोचित सम्मानजनक स्थान नहीं मिल पाया। लेकिन वर्तमान कोरोना काल में इसने समूचे विश्व को अपनी ओर आकर्षित किया है। इस मौके का सदुपयोग करके आयुर्वेद की दवाइयों पर सरकार अनुसंधान को बढ़ावा देकर आयुर्वेदिक दवाओं को एक नए और आधुनिक स्वरूप में विश्व के सामने प्रस्तुत करने के लिए वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करे। इसी प्रकार आज जब पूरा विश्व प्लास्टिक के विकल्प ढूँढ रहा है, तो हम पत्तों के दोने पत्तल बनाने के लघु उद्योगों को बढ़ावा देकर उनकी निर्यात योग्य क्वालिटी बनाकर ग्रामीण रोजगार और देश की अर्थव्यवस्था दोनों को मजबूती दे सकते हैं।  हमारी भौगोलिक और सांस्कृतिक विरासत भी हमारी ताकत है। दरअसल हर राज्य की सांस्कृतिक और भौगोलिक तौर पर अपनी विशेषता है। कुदरत ने जितनी नेमत इस धरती पर बख्शी है, उतनी शायद और किसी देश पर नहीं। अभी हमारे देश में विदेशी अधिकतर भारतीय ध्यात्म से प्रेरित होकर शांति की खोज में आते हैं लेकिन अगर हम अपने देश के विभिन्न राज्यों को एक टूरिस्ट स्पॉट की तरह दुनिया के सामने प्रस्तुत करने के लिए आवश्यक कदम उठाएँ  तो हमारी धरती ही हमारी सबसे बड़ी ताकत बन जाएगी। यह सभी उपाय अपने साथ देश में विदेशी मुद्रा भंडार और रोजगार दोनों के अवसर साथ लेकर आएँगे।
अब बात करते हैं कमजोरियों की। तो हमारा सबसे कमजोर पक्ष है साइंस और टेक्नोलॉजी। आज के इस वैज्ञानिक युग में इस पक्ष को नजरअंदाज करके विश्वगुरु बनने की बात करना बेमानी है। विश्व के किसी भी ताकतवर देश को देखें उसने विज्ञान और टेक्नोलॉजी के दम पर ही उस ताकत को हासिल किया है चाहे वो जापान चीन रूस अमेरिका कोई भी देश हो। हम दावे जो भी करें हकीकत यह है कि भारत इस क्षेत्र में इन देशों के मुकाबले बहुत पीछे है। हाँ यह सही है कि पिछले तीन चार सालों में हम कुछ कदम आगे बढ़े हैं लेकिन इन देशों से अभी भी हमारा फासला काफी है। इसलिए आवश्यक है कि भारत में वैज्ञानिक अनुसंधानों और वैज्ञानिकों दोनों को प्रोत्साहन दिया जाए टेक्नोलॉजी पर रिसर्च को फोकस किया जाए। शिक्षा नीति में ठोस बदलाव किए जाएं ताकि कॉलेज से निकलने वाले युवाओं के हाथों में खोखली डिग्रीयों के बजाए उनके दिलों में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो। उनकी रुचि रिसर्च अनुसंधान खोज करने की ओर बढ़े और हमें अधिक से अधिक प्रतिभावान युवा वैज्ञानिक मिलें। और यह तभी संभव होगा जब हमारे देश के योग्यता से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा। जब प्रतिभावान युवा आरक्षण एवं भ्रष्टाचार के चलते अवसर ना मिल पाने के कारण विदेशों में चले जाने को मजबूर नहीं होंगे। दूसरे शब्दों में हमारा देश जिस ब्रेन ड्रेनेज का शिकार होता आया है उसे रोकना होगा। ताकि हम भविष्य के सुंदर पचाई और सत्या नडेला जैसे युवाओं को भारत में रोक सकें।
आज से अगर हम इन दिशाओं में सोचेंगे तो कम से कम पांच छः सालों में हम अपनी कमजोरियों पर विजय प्राप्त कर के आत्मनिर्भर भारत का स्वप्न साकार कर पाएँगे। 
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Apr 21, 2020

विज्ञान नहीं अध्यात्म से जीतता भारत

विज्ञान नहीं अध्यात्म से जीतता भारत
-डॉ. नीलम महेन्द्र 
मानव ही मानव का दुश्मन बन जाएगा
किसने सोचा था ऐसा दौर भी आएगा।
जो धर्म मनुष्य को मानवता की राह दिखाता था
उसकी आड़ में ही मनुष्य को हैवान बनाया जाएगा।
इंसानियत को शर्मशार करने खुद इन्सान ही आगे आएगा
किसने सोचा था कि वक्त इतना बदल जाएगा

शक्ति कोई भी हो दिशाहीन हो जाए तो विनाशकारी ही होती है लेकिन यदि उसे सही दिशा दी जाए तो सृजनकारी सिद्ध होती है। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री ने 5 अप्रैल को सभी देशवासियों से एकसाथ दीपक जलाने का आह्वन किया जिसे पूरे देशवासियों का भरपूर समर्थन भी मिला।। जो लोग कोरोना से भारत की लड़ाई में प्रधानमंत्री के इस कदम का वैज्ञानिक उत्तर खोजने में लगे हैं वे निराश हो सकते हैं क्योंकि विज्ञान के पास आज भी अनेक प्रश्नों के उत्तर नहीं हैं। हाँ लेकिन संभव है कि दीपक की लौ से निकलने वाली ऊर्जा देश के 130 करोड़ लोगों की ऊर्जा को एक सकारात्मक शक्ति का वो आध्यात्मिक बल प्रदान करे जो इस वैश्विक आपदा से निकलने में भारत को संबल दे। क्योंकि संकट के इस समय भारत जैसे अपार जनसंख्या लेकिन सीमित संसाधनों वाले देश की अगर कोई सबसे बड़ी शक्ति, सबसे बड़ा हथियार है जो कोरोना जैसी महामारी से लड़ सकता है तो वो है हमारी "एकता"। और इसी एकता के दम पर हम जीत भी रहे थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेष दूत डॉ डेविड नाबरो ने भी अपने ताज़ा बयान में कहा कि भारत में लॉक डाउन को जल्दी लागू करना एक दूरदर्शी सोच थी, साथ ही यह सरकार का एक साहसिक फैसला था। इस फैसले से भारत को कोरोना वायरस के खिलाफ मजबूती से लड़ाई लड़ने का मौका मिला।
लेकिन जब भारत में सबकुछ सही चल रहा थाजब इटलीब्रिटेनस्पेनअमेरिका जैसे विकसित एवं समृद्ध वैश्विक शक्तियाँ कोरोना के आगे घुटने टेक चुकी थींजब विश्व की आर्थिक शक्तियाँ अपने यहाँ कोविड 19 से होने वाली मौतों को रोकने में बेबस नज़र आ रही थींतब 130 करोड़ की आबादी वाले इस देश में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या लगभग 500 के आसपास थी और इस बीमारी के चलते मरने वालों की संख्या 20 से भीकम थीतो अचानक तब्लीगी मरकज़ की लापरवाही सामने आती है जो केंद्र और राज्य सरकारों के निर्देशों की धज्जियाँ उड़ाते हुए निज़ामुद्दीन की मस्जिद में 3500 से ज्यादा लोगों के साथ एक सामूहिक कार्यक्रम का आयोजन करती है। 16 मार्च को दिल्ली के मुख्यमंत्री 50 से ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर प्रतिबंध लगाते हैं, 22 मार्च को प्रधानमंत्री जनता कर्फ्यू की अपील करते हुए कोरोना की रोकथाम के लिए सोशल डिस्टनसिंग का महत्व बताते हैं लेकिन मार्च के आखरी सप्ताह तक इस मस्जिद में 2500 से भी ज्यादा लोग सरकारी आदेशों का मख़ौल उड़ाते इकट्ठा रहते हुए पाए जाते हैं। सरकारी सूत्रों के अनुसार मस्जिद को खाली कराने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को सामने आना पड़ा था क्योंकि ये स्थानीय प्रशासन की नहीं सुन रहे थे। पूरे देश के लिए यह दृश्य दुर्भाग्यजनक था जब सरकार और प्रशासन इनके आगे बेबस नज़र आया। और अब जब इन लोगों की जांच की जा रही है तो अबतक इनमें से 300 से अधिक कोरोना से संक्रमित पाए गए हैं और बाकी में से कितने संक्रमित होंगे उनकी तलाश जारी है। जो खबरें सामने आ रही हैं वो केवल
निराशाजनक ही नहीं शर्मनाक भी हैं क्योंकि इस मकरज़ की वजह से इस महामारी ने हमारे देश के कश्मीर से लेकर अंडमान तक अपने पैर पसार लिए हैं। देश में कोविड 19 का आंकड़ा अब चार दिन के भीतर ही 3000 को पार कर चुका है, 75 लोगों की
इस बीमारी के चलते जान जा चुकी है और इस तब्लीगी जमात की मरकज़ से निकलने वाले लोगों के जरिए देश के 17 राज्यों में कोरोना महामारी अपनी दस्तक दे चुकी है। देश में पहली बार एक ही दिन में कोरोना के 600 से ऊपर नए मामले दर्ज किए गए।बात केवल इतनी ही होती तो उसे अज्ञानता नादानी या लापरवाही कहा जा सकता था लेकिन जब इलाज करने वाले डॉक्टरों, पैरा मेडिकल स्टाफ और पुलिसकर्मियों पर पत्थरों से हमला किया जाता है या फिर उन पर थूका जाता है जबकि यह पता हो कि यह बीमारी इसी के जरिए फैलती है या फिर महिला डॉक्टरों और नरसों के साथ अश्लील हरकतें करने की खबरें सामने आती हैं तो
प्रश्न केवल इरादों का नहीं रह जाता। ऐसे आचरण से सवाल उठते हैं सोच पर, परवरिश पर, नैतिकता पर, सामाजिक मूल्यों पर, मानवीय संवेदनाओं पर। किंतु इन सवालों से पहले सवाल तो ऐसे पशुवत आचरण करने वाले लोगों के इंसान होने पर ही लगता है। क्योंकि आइसोलेशन वार्ड में इनकी गुंडागर्दी करती हुई तस्वीरें कैद होती हैं तो कहीं फलों, सब्ज़ियों और नोटों पर इनके थूक लगाते हुए वीडियो वायरल होते हैं। ये कैसा व्यवहार है? ये कौन सी सोच है? ये कौन से लोग हैं जो किसी अनुशासन को नहीं मानना चाहते? ये किसी नियम किसी कानून किसी सरकारी आदेश को नहीं मानते। अगर मानते हैं तो फतवे मानते हैं। जो
लोग कुछ समय पहले तक संविधान बचाने की लड़ाई लड़ रहे थे वो आज संविधान की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। पूरा देश लॉक डाउन का पालन करता है लेकिन इनसे सोशल डिस्टनसिंग की उम्मीद करते ही पत्थरबाजी और गुंडागर्दी हो जाती है। लेकिन ऐसा खेदजनक व्यवहार करते वक्त ये लोग भूल जाते हैं कि इन हरक़तों से ये अगर किसी को सबसे अधिक नुकसान पहुँचा रहे हैं तो खुद को और अपनी पहचान को। चंद मुट्ठी भर लोगों की वजह से पूरी कौम बदनाम हो जाती है। कुछ जाहिल लोग पूरी जमात को जिल्लत का एहसास करा देते हैं। लेकिन समझने वाली बात यह है कि असली गुनहगार वो मौलवी और मौलाना होते हैं जो इन लोगों को ऐसी हरकतें करने के लिए उकसाते हैं।  तब्लीगी जमात के मौलाना साद का वो वीडियो पूरे देश ने सुना जिसमें वो
 तब्लीगी जमात के लोगों को कोरोना महामारी के विषय में अपना विशेष ज्ञान बाँट रहे थे। दरअसल किसी समुदाय विशेष के ऐसे ठेकेदार अपने राजनैतिक हित साधने के लिए लोगों का फायदा उठाते हैं।
काश ये लोग समझ पाते कि इनके कंधो पर देश की नहीं तो कम से कम अपनी कौम की तो जिम्मेदारी है। कम पढ़े लिखे लोगों की अज्ञानता का फायदा उठाकर उनको ऐसी हरकतों के लिए उकसा कर ये देश का नुकसान तो बाद में करते हैं पहले अपनी कौम और अपनी पहचान का करते हैं। उन्हें समझना चाहिए कि आज मोबाइल फोन और सोशल मीडिया का जमाना है और जमाना
बदल रहा है। सच्चाई वीडियो सहित बेनकाब हो जाती है। शायद इसलिए उसी समुदाय के लोग खुद को तब्लीगी जमात से अलग करने और उनकी हरकतों पर लानत देने वालों में सबसे आगे थे। सरकारें भी ठोस कदम उठा रही हैं। यही आवश्यक भी है कि ऐसे लोगों का उन्हीं की कौम में सामाजिक बहिष्कार हो साथ ही उन पर कानूनी शिकंजा कसे ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनावृत्ति रुके। इन घटनाओं पर सख्ती से तुरंत अंकुश लगना बेहद जरूरी है क्योंकि वर्तमान परिस्थितियों में हमने देखा कि तब्लीगी जमात की सरकारी आदेशों की नाफरमानी से कैसे हम एक जीतती हुई लड़ाई हारने की कगार पर पहुचं गए। लेकिन ये अंत नहीं मध्यांतर है क्योंकि ये वो भारत है जहाँ की सनातन संस्कृति निराशा के अन्धकार को विश्वास के प्रकाश से ओझल कर देती है। आखिर अँधेरा कैसा भी हो एक छोटा सा दीपक उसे हरा देता है तो भारत में तो उम्मीद की सवा सौ करोड़ किरणें मौजूद हैं। 

Mar 8, 2020

कोरोना वायरस

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का कुत्सित रूप
कोरोना वायरस
-डॉ. नीलम महेन्द्र 
आज जब एशिया के एक देश चीन के एक शहर वुहान से कोरोना नामक वायरस का संक्रमण देखते ही देखते जापान, जर्मनी, अमेरिका, फ्रांस, कनाडा, रूस समेत विश्व के 30 से अधिक देशों में फैल जाता है तो निश्चित ही  वैश्वीकरण के इस दौर में इस प्रकार की घटनाएँ हमें ग्लोबलाइजेशन के दूसरे डरावने पहलू से रूबरू कराती हैं। क्योंकि आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि कोरोना वायरस के संक्रमण से विश्व भर में अब तक 2012 मौतें हो चुकी हैं और लगभग 75303 लोग इसकी चपेट में हैं  जबकि आशंका है कि यथार्थ इससे ज्यादा भयावह हो सकता है। लेकिन यहाँ बात केवल विश्व भर में लोगों के जीवन और स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान तक ही सीमित नहीं है बल्कि पहले से मंदी झेल रहे विश्व में इसका नकारात्मक प्रभाव चीन समेत उन सभी देशों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ना है जो चीन से व्यापार करते हैं जिनमे भारत भी शामिल है। बात यह भी है कि जेनेटिक इंजीनियरिंग, रोबोटिक्स और आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस के इस अति वैज्ञानिक युग में जब किसी देश में एक नए तरह का संक्रमण फैलता है जो सम्भवतः एक वैज्ञानिक भूल का अविष्कार होता है, जिसके बारे में मनुष्यों में पहले कभी सुना नहीं गया हो और उसकी उत्पत्ति को लेकर बायो टेरेरिज्म जैसे विभिन्न विवादास्पद सिद्धान्त सामने आने लगते हैं तो यह ना सिर्फ हैरान बल्कि परेशान करने वाले भी होते हैं। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि विज्ञान के दम पर प्रकृति से खिलवाड़ करने की मानव की क्षमता और उसके आचरण को सम्पूर्ण सृष्टि के हित को ध्यान में रखते हुए गंभीरता के साथ नए सिरे से परिभाषित किया जाए।
क्योंकि चीन में कोरोना वायरस का संक्रमण जितना घातक है उससे अधिक घातक वो अपुष्ट जानकारियां हैं जो इसकी उत्पत्ति से जुड़ी हैं। शायद इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के चीफ को कहना पड़ा कि ," विश्व स्वास्थ्य संगठन में हम  केवल वायरस से ही नहीं लड़ रहे बल्कि साज़िश की अफवाहों से भी लड़ रहे हैं जो हमारी ताकत को कमजोर कर रही हैं।" 
दरअसल चीन के वुहान से शुरू हुए इस कोरोना संक्रमण को लेकर अलग अलग देश अलग अलग दावे कर रहे हैं। जहाँ एक ओर रूस,  अरबसीरियाजैसे देश चीन में फैले कोरोना वायरस के लिए अमेरिका और इजरायल को दोष दे रहे हैं वही अमेरिका खुद चीन को ही कोरोना का जनक बता रहा है। मज़े की बात यह है कि सबूत किसी के पास नही हैं लेकिन अपने अपने तर्क सभी के पास हैं। रूस का कहना है कि कोरोना वायरस अमेरिका द्वारा उत्पन्न एक जैविक हथियार है जिसे उसने चीन की अर्थव्यवस्था चौपट करने के लिए उसके खिलाफ इस्तेमाल किया है। इससे पहले रूस 1980 के शीत युद्ध के दौर में एच आई वी के संक्रमण के लिए भी अमेरिका को जिम्मेदार बता चुका है। जबकि अरबी मीडिया का कहना है कि अमेरिका और इजरायल ने चीन के खिलाफ मनोवैज्ञानिक और आर्थिक युद्ध के उद्देश्य से इस जैविक हथियार का प्रयोग किया है। अपने इस कथन के पक्ष में वो विभिन्न तर्क भी प्रस्तुत करत है। सऊदी अरब समाचार पत्र अलवतन लिखता है कि मिस्र की ओर से इस घोषणा के बाद कि कुछ दिनों बाद वो चिकन उत्पादन में आत्मनिर्भर हो जाएगा और निर्यात करने में भी सक्षम हो जाएगा इसलिए अब वह अमेरिका और फ्रांस से चिकन आयात नहीं करेगा, अचानक बर्ड फ्लू फैल जाता है और मिस्र का चिकन उद्योग तबाह हो जाता है। इसी तरह जब चीन ने 2003 में घोषणा की कि उसके पास दुनिया का सबसे अधिक विदेशी मुद्रा भंडार है तो उसकी इस घोषणा के बाद चीन में अचानक सार्स फैल जाता है और चीनी विदेशी मुद्रा भंडार विदेशों से दवाएँ खरीद कर खत्म हो जाता है। इसी प्रकार सीरिया का कहना है कि कोरोना वायरस का इस्तेमाल अमेरिका ने चीन के खिलाफ उसकी अर्थव्यवस्था खत्म करने के लिए किया है। सीरिया के अनुसार इससे पहले भी अमेरिका एबोलाजीकाबर्ड फ्लूस्वाइन फ्लूएंथ्रेक्समैड
काऊ, जैसे जैविक हथियारों का प्रयोग अन्य देशों पर दबाव डालने के लिए कर चुका है। जैसे कि पहले भी कहा जा चुका है,जो लोग कोरोना वायरस को एक जैविक हथियार मानते हैं उनके पास इस बात का भी तर्क है कि आखिर वुहान को ही क्यों चुना गया। मिस्र की वेबसाइट वेतोगन के अनुसार वुहान चीन का आठवाँ सबसे बड़ा औद्योगिक शहर है। आठवें स्थान पर होने के कारण चीन के अन्य बड़े शहरों की तरह इस शहर में स्वास्थ्य सेवाओं पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया जाता इसलिए इसे संक्रमण फैलाने के लिए चुना गया।
जबकि इज़राइल का कहना है कि कोरोना वायरस चीन का ही जैविक हथियार है जिसने खुद चीन को ही जला दिया। अपने इस कथन के समर्थन में इज़राइल का कहना है कि कोरोना का संक्रमण वुहान से शुरू होना कोई इत्तेफाक नहीं है  जहाँ पर वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलोजी नामक प्रयोगशाला है जो  वहाँ की सेना के साथ मिलकर इस प्रकार के खतरनाक वायरस पर अनुसंधान करती है। हालांकि चीन का कहना है कि वुहान के पशु बाजार से इस वायरस का संक्रमण फैला है। लेकिन विभिन्न जाँचों से अब यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि जिन साँपों और  चमगादड़ों से इस वायरस के फैलने की बात की जा रही थी वो सरासर गलत है क्योंकि साँपों में यह वायरस पाया ही नहीं जाता और चमगादड़ का जब सूप बनाकर या पकाकर उसका सेवन किया जाता है तो पकाने के दौरान अधिक तापमान में यह वायरस नष्ट हो जाता है। इस सिलसिले में अमेरिका के सीनेटर टॉम कॉटन का कहना है कि कोरोना वायरस वुहान के पशु बाजार से नहीं फैला। हम नहीं जानते कि वो कहाँ से फैला लेकिन हमें यह जानना जरूरी है कि यह कहाँ से और कैसे फैला क्योंकि वुहान के पशु बाजार के कुछ ही दूरी पर चीन का वो अनुसंधान केंद्र भी है जहां मानव संक्रमण पर अनुसंधान होते हैं। उन्होंने अपने इस बयान के समर्थन में कहा कि हालांकि उनके पास इस बात के सबूत नहीं है कि कोरोना वायरस चीन द्वारा बनाया गया जैविक हथियार है लेकिन चूंकि चीन का शुरू से ही कपट और बेईमानी का आचरण रहा है  हमें चीन से साक्ष्य मांगने चाहिए। यहाँ यह जानना भी रोचक होगा कि जब अमेरिका में चीनी राजदूत से टॉम कॉटन के बयान पर प्रतिक्रिया मांगी गई तो उनका कहना था कि चीन में लोगों का मानना है कि कोरोना अमेरिका का जैविक हथियार है। वैसे पूरी दुनिय जानती हैं कि खबरों पर चीन की कितनी सेंसरशिप और चीन से बाहर पहुँचने वाली सूचनाओं पर उसकी कितनी पकड़ है। अतः काफी हद तक चीन के इस संदेहास्पद आचरण का इतिहास भी चीन
के द्वारा ही किए जाने वाले किसी षड्यंत्र का उसी पर उल्टा पड़ जाने की बात को बल देता है। कहा जा रहा है कि चीन में कोरोना संक्रमण फैलने के कुछ सप्ताह के भीतर ही चीन के इंटरनेट पर इसे अमेरिकी षड्यंत्र बताया जाने लगा था। जानकारों का कहना है कि चीन द्वारा इस प्रकार का प्रोपोगेंडा जानकर फैलाया गया ताकि जब भविष्य में उस पर उसकी लैबोरेटरी से ही वायरस के फैलने की बात सामने आए तो यह उसकी काट बन सके। वैसे कोरोना वायरस खुद चीन की लैबोरेटरी से फैला है इस बात को बल इसलिए भी मिलता है कि जब चीन के आठ डॉक्टरों की टीम ने एक नए और खतरनाक वायरस के फैलने को लेकर सरकार और लोगों को चेताने की कोशिश की थी तो चीनी सरकार द्वारा उन्हें प्रताड़ित किया गया। कुछ समय बाद इनमें से एक डॉक्टर की इसी संक्रमण की चपेट में आकर मृत्यु हो जाने की खबर भी आई। इतना ही नहीं जब 12 दिसंबर को चीन में कोरोना वायरस का पहला मामला सामने आया था तो चीन ने उसे दबाने की कोशिश की। चीन की सरकारी साउथ चाइना यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के मुताबिक संभव है हुबेई प्रांत में सेंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोलने रोग फैलाने वाली इस बीमारी के वायरस को जन्म दिया हो। स्कॉलर बोताओ शाओ और ली शाओ का दावा है कि इस लैब में ऐसे जानवरों
को रखा गया जिनसे बीमारियां फैल सकती हैं, इनमें 605 चमगादड़ भी शामिल थे। उनके मुताबिक हो सकता है कि कोरोना वायरस की शुरुआत यहीं से हुई हो। इनके रिसर्च पेपर में यह भी कहा गया कि कोरोना वायरस के लिए जिम्मेदार चमगादड़ों ने एक बार एक रिसर्चर पर हमला कर दिया और चमगादड़ का खून उसकी त्वचा में मिल गया। इन बातों से इतना तो स्पष्ट है कि कोरोना वायरस आज के वैज्ञानिक युग का बेहद गंभीर एवं दुर्भाग्यपूर्ण दुष्प्रभाव है। चाहे किसी अन्य देश ने इस जैविक हथियार का प्रयोग चीन के खिलाफ किया हो या चीन दूसरे  देशों के लिए खोदे जाने वाले गड्ढे में खुद गिर गया हो घायल तो मानवता हुई है। इसी मानवता को बचाने के लिए जब विश्व युद्ध के काल में जैविक हथियारों के प्रयोग से बहुत बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों को बिना किसी कसूर के अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा था, तो बायोलॉजिकल वेपन कन्वेंशन की रूपरेखा तैयार की गई। मानवता की रक्षा के लिए  भविष्य में जैविक हथियारों के प्रयोग को प्रतिबंधित करने वाला यह नियम1975 से अस्तित्व में आया। इस जैव शस्त्र अभिसमय पर 180 देशों ने हस्ताक्षर किए । इसके
अनुसार इस पर हस्ताक्षर करने वाले देश कभी भी किसी भी परिस्थिति में किसी भी प्रकार के जैविक हथियार का निर्माण उत्पादन या सरंक्षण नहीं करेंगे। लेकिन यह अभिसमय देशों को यह अधिकार देता है कि वो अपनी रक्षा के लिए अनुसंधान कर सकते हैं दूसरे शब्दों में एक वायरस को मारने के लिए दूसरा वायरस बना सकते हैं। इसी की आड़ में अमेरिकारूस,चीन जैसे देश जैविक हथियारों पर अनुसंधान करते हैं। लेकिन कोरोना वायरस के इस ताज़ा घटनाक्रम से अब यह जरूरी हो गया है कि वैज्ञानिक विज्ञान के सहारे नए अनुसंधान करते समय मानवता के प्रति अपने कर्तव्य को भी समझें और अपनी प्रतिभा एवं ज्ञान का उपयोग सम्पूर्ण सृष्टि के उत्थान के लिए करें उसके विनाश के लिए नहीं।
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Jan 15, 2020

जो हम देते हैं वो ही हम पाते हैं

व्यक्तित्व निर्माण में सहायक सिद्ध होता है दान

जो हम देते हैं वो ही हम पाते हैं
- डॉ. नीलम महेन्द्र 
दान के विषय में हम सभी जानते हैं। दान, अर्थात् देने का भाव, अर्पण करने की निष्काम भावना। भारत वो देश है जहाँ कर्ण ने अपने अंतिम समय में अपना सोने का दाँत ही याचक को देकरऋषि दधीचि ने अपनी हड्डियाँ दान करके और राजा हरिश्चंद्र ने विश्वामित्र को अपना पूरा राज्य दान करके विश्व में दान की वो मिसाल प्रस्तुत की जिसके समान उदाहरण आज भी इस धरती पर अन्यत्र दुर्लभ हैं।
शास्त्रों में दान चार प्रकार के बताए गए हैं , अन्न दान,औषध दान, ज्ञान दान एवं अभयदान
एवं आधुनिक परिप्रेक्ष्य में अंगदान का भी विशेष महत्त्व है।
दान एक ऐसा कार्य, जिसके द्वारा हम न केवल धर्म का पालन करते हैं ; बल्कि समाज एवं प्राणी मात्र के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन भी करते हैं; किन्तु दान की महिमा तभी होती है जब वह निस्वार्थ भाव से किया जाता है।  अगर कुछ पाने की लालसा में दान किया जाए, तो वह व्यापार बन जाता है 
यहाँ समझने वाली बात यह है कि देना उतना जरूरी नहीं होता, जितना कि 'देने का भाव '। अगर हम किसी को कोई वस्तु दे रहे हैं; लेकिन देने का भाव अर्थात् इच्छा नहीं है, तो वह दान झूठा हुआ, उसका कोई अर्थ नहीं।
इसी प्रकार जब हम देते हैं और उसके पीछे कुछ पाने की भावना होती है- जैसे पुण्य मिलेगा या फिर परमात्मा इसके प्रत्युत्तर में कुछ देगा, तो हमारी नजर लेने पर है, देने पर नहीं , तो क्या यह एक सौदा नहीं हुआ  ?
दान का अर्थ होता है देने में आनंद,एक उदारता का भाव प्राणी मात्र के प्रति एक प्रेम एवं दया का भाव; किन्तु जब इस भाव के पीछे कुछ पाने का स्वार्थ छिपा हो तो क्या वह दान रह जाता है ?
गीता में भी लिखा है कि कर्म करो, फल की चिंता मत करो । हमारा अधिकार केवल अपने कर्म पर है उसके फल पर नहीं।
हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है यह तो संसार एवं विज्ञान का साधारण नियम है ; इसलिए उन्मुक्त ह्रदय से श्रद्धा पूर्वक एवं सामर्थ्य अनुसार दान एक बेहतर समाज के निर्माण के साथ साथ स्वयं हमारे भी व्यक्तित्व निर्माण में सहायक सिद्ध होता है और सृष्टि के नियमानुसार उसका फल तो कालांतर में निश्चित ही हमें प्राप्त होगा।
आज के परिप्रेक्ष्य में दान देने का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है कि आधुनिकता एवं भौतिकता की अंधी दौड़ में हम लोग देना तो जैसे भूल ही गए हैं।
हर सम्बन्ध को हर रिश्ते को  पहले प्रेम समर्पण त्याग सहनशीलता से दिल से सींचा जाता था लेकिन आज !आज हमारे पास समय नहीं है क्योंकि हम सब दौड़ रहे हैं और दिल भी नहीं है क्योंकि सोचने का समय जो नहीं है !
हाँ, लेकिन हमारे पास पैसा और बुद्धि बहुत है , इसलिए अब हम लोग हर चीज़ में निवेश करते हैं , चाहे वे रिश्ते अथवा सम्बन्ध ही क्यों न हो ! पहले हम वस्तुओं का उपयोग करते थे और एक दूसरे से प्रेम करते थे; किन्तु आज हम भौतिक वस्तुओं से प्रेम करते हैं तथा एक दूसरे का उपयोग करते हैं।
इतना ही नहीं, हम लोग निस्वार्थ भाव से देना भूल गए हैं। देंगे भी तो पहले सोच लेंगे कि मिल क्या रहा है  और इसीलिए परिवार टूट रहे हैं, समाज टूट रहा है। जब हम अपनों को उनके अधिकार ही नहीं दे पाते तो समाज को दान कैसे दे पाएँगे  ?
अगर दान देने के वैज्ञानिक पक्ष को हम समझें-
जब हम किसी को कोई वस्तु देते हैं तो उस वस्तु पर हमारा अधिकार नहीं रह जाता, वह वस्तु पाने वाले के आधिपत्य में आ जाती है । अत: देने की इस क्रिया से हम कुछ हद तक अपने मोह पर विजय प्राप्त करने की कोशिश करते हैं । दान देना हमारे विचारों एवं हमारे व्यक्तित्व पर एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालती है ;इसलिए हमारी संस्कृति हमें बचपन से ही देना सिखाती है न कि लेना 
हर भारतीय घर  में दान को  दैनिक कर्तव्यों में ही शामिल  करके इसे एक परम्परा का ऐसा स्वरूप दिया गया है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे बच्चों में संस्कारों के रूप में शामिल हैं, जैसे भोजन पकाते समय पहली रोटी गाय को, आखिरी रोटी कुत्ते को , चिड़ियों को दाना  आदि।
यह कार्य हमें अपने बच्चों के हाथों से  करवाना चाहिए; ताकि उनमें यह संस्कार बचपन से ही आ जाए और खेल खेल में ही सही, वे देने के सुख को अनुभव करें । यह एक छोटा-सा कदम कालांतर में हमारे बच्चों के व्यक्तित्व एवं उनकी सोच में एक सकारात्मक परिणाम देने वाला सिद्ध होगा।
दान धन का ही हो , यह कतई आवश्यक नहीं , भूखे को रोटी , बीमार का उपचार , किसी व्यथित व्यक्ति को अपना समय, उचित परामर्श , आवश्यकतानुसार वस्त्र , सहयोग , विद्या  यह सभी जब हम सामने वाले की आवश्यकता को समझते हुए  देते हैं और बदले में कुछ पाने की अपेक्षा नहीं करते ,  यह सब दान ही है 
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि परहित के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को कष्ट देने के समान कोई पाप नहीं है।
दानों में विद्या का दान सर्वश्रेष्ठ दान होता है क्योंकि उसे न तो कोई चुरा सकता है और न ही वह समाप्त होती है बल्कि कालांतर में विद्या बढ़ती ही है और एक  व्यक्ति को शिक्षित करने से हम उसे भविष्य में दान देने लायक एक ऐसा नागरिक बना देते हैं ,जो समाज को सहारा प्रदान करे न कि समाज पर निर्भर रहे ।
इसी प्रकार आज के परिप्रेक्ष्य में रक्त एवं अंगदान समाज की जरूरत है।जो दान किसी जीव के जीवन के प्राणों की रक्षा करे उससे उत्तम और क्या हो सकता है ?
देना तो हमें प्रकृति रोज सिखाती है , सूर्य अपनी रोशनी, फूल अपनी खुशबू , पेड़ अपने फल,नदियाँ अपनी जल, धरती अपना सीना छलनी करि कर भी दोनों हाथों से हम पर अपनी फसल लुटाती है।
न तो सूर्य की रोशनी कम हुई ,न फूलों की खुशबू , न पेड़ों के फल कम हुए न नदियों का जल, अत: दान एक हाथ से देने पर अनेकों हाथों से लौटकर हमारे ही पास वापस आता बस शर्त यह है कि निस्वार्थ भाव से श्रद्धापूर्वक समाज की भलाई के लिए किया जाए । आचार्य विनोबा भावे भी कहते थे कि दान का अर्थ फेंकना नहीं ,बोना होता है।
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