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Jul 1, 2026

शिक्षाःआखिर क्या सीख रहे हैं ये ‘बाल विज्ञानी’?

जंगल मास्टर के साथ प्रकृति का
 अध्ययन करते बच्चे
 - बृजेंद्र दुबे

ओडिशा के ढेंकानाल के चार गॉंव ऐसे हैं जहां के बच्चे जंगलों की सैर कर जीव-जंतुओं और प्रकृति के बारे में हर हफ्ते कुछ नया सीखते हैं। जानिए क्या-क्या सीखते हैं ये बच्चे…

ओडिशा के ढेंकानाल के चार गाँव ऐसे हैं, जहाँ के बच्चे जंगलों की सैर कर जीव-जंतुओं और प्रकृति के बारे में हर हफ्ते कुछ नया सीखते हैं। जानिए क्या-क्या सीखते हैं ये बच्चे…

ओडिशा, ढेंकानाल (कंकड़हाड) : गाँव में हर बच्चे का सपना होता है कि बड़े होकर किसी बड़े शहर में जाएगा, वहाँ पढ़ाई करेगा और अपने पैरों पर खड़ा होगा। और ये सपने साकार भी होते हैं; लेकिन इन सपनों के साकार होने के साथ-साथ एक चीज है जो पीछे छूट जाती है। वो है गाँव व आसपास के क्षेत्रों का इतिहास और भूगोल। और अगर गाँव व आस-पास के क्षेत्रों में ज्ञान का समुंदर हो, तो समझ लीजिए अकसर वहाँ के ज्ञान की लहरें उनसे दूर हो जाती हैं।   

ओडिशा के ढेंकानाल में कुछ गाँव ऐसे हैं, जो घने जंगलों से घिरे हुए हैं। इन जंगलों में विभिन्न प्रकार की वनस्पति पाई जाती है और यहाँ इंसानों और जानवरों के बीच एक अनूठा रिश्‍ता है। यह रिश्‍ता आगे चलकर कमजोर नहीं पड़े, इसके लिए यहाँ बच्चों की एक अनोखी पाठशाला चलती है - “विज़डम वॉक”। जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों को समझने के लिए चलाई जाने वाली पाठशाला, किसी स्कूल में नहीं; बल्कि घने जंगलों में चलती है।  

दरअसल ढेंकानाल जिले में पहाड़ों से घिरे चार गाँव - दानापासी, हडगारी, कंटोल गाँव और बालीकुमा गाँव के बच्चों के लिए यह पाठशाला चलती है। इस पाठशाला की शुरुआत बालीकुमा गाँव से हुई थी। गाँव वाले मानते हैं कि यहाँ के युवा निर्माण- कार्य, औद्योगिक मजदूरी और होटल सेवा व अन्य नौकरियों के लिए बाहर चले जाते हैं। नतीजतन, जंगलों से जुड़ा उनका पारंपरिक ज्ञान उन तक पहुँचा नहीं पाता। ऐसे में इस ज्ञान के लुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है। प्रकृति से जुड़ा यह ज्ञान आजीवन साथ रहे इसके लिए जंगल मास्टर बच्चों को विज़डम वॉक पर ले जाते हैं। 

कौन होते हैं ओडिशा के जंगल मास्टर? 

ओडिशा के इन गाँवों में एक नहीं, दो नहीं बल्कि कई दर्जन जंगल मास्टर हैं। ये जंगल मास्टर किसी स्कूल के टीचर नहीं; बल्कि यहाँ के बुजुर्ग हैं, जो अब अपने काम से रिटायर हो चुके हैं। यहाँ के आदिवासी समुदायों के कुछ बुजुर्ग गाँव के बच्चों को हर सप्ताहांत ‘विज़डम वॉक’ पर जंगल में ले जाते हैं। इन्‍हीं बुजुर्गों को जंगल मास्टर कहा जाता है।

क्या सिखाते हैं ढेंकानाल के जंगल मास्टर? 

जैसे हमारे दादा-नाना कहानियों के जरिए हमें लाइफ स्किल्स सिखाते हैं। ठीक वैसे ही यहाँ के जंगल मास्टर प्रकृति के बारे में बच्चों को रोचक ज्ञान देते हैं। जंगल की सैर के दौरान, यहाँ के बुजुर्ग बच्चों को दिखाते हैं कि रोजमर्रा के जीवन में जंगल से मिले संसाधनों का उपयोग कैसे करते हैं। कुछ उदाहरण जो जंगल मास्टर ने हमें बताए-    

पौधे, जो दूर कर देते हैं सिरदर्द 

कक्षा में बच्चों को पढ़ाते मास्टर जी
जंगल मास्टर बताते हैं कि इंद्रजाल और महाकालरे जैसे पौधों का उपयोग लोग सिरदर्द को ठीक करने के लिए करते हैं। वहीं महासिंदु वह औषधि है, जो हर प्रकार के दर्द से राहत देती है। 

मधुमेह और हृदय रोग व पेट की समस्या से दूर रखने वाले पौधे 

अर्जुन के पेड़ की छाल का उपयोग मधुमेह, हृदय और पेट की समस्याओं के इलाज के लिए किया जाता है। जंगल मास्टर केवल इन पौधों के नाम ही नहीं बताते हैं; बल्कि कैसे इन पौधों की पत्तियों व छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है यह भी बताते हैं। 

त्वचा संबंधी रोगों में काम आने वाले औषधि-युक्त पौधे 

विज़डम वॉक पर नियमित रूप से जाने वाले 10 वर्षीय इंद्रमणि दास ने बताया कि उन्होंने सीखा कि कैसे जयसंदा का पौधा शरीर पर पड़ने वाले चकत्तों से राहत देता है और त्वचा की चोटों को ठीक करता है।

जंगल के पेड़ कैसे देते हैं बारिश के संकेत? 

विज़डम वॉक पर चर्चा करते हुए गाँव के सोहम दास ने बाताया कि बच्चों को अलग-अलग प्रकार के पौधों और जानवरों की पहचान करना और उन्हें मौसम का अंदाजा लगाना भी सिखाया जाता है। उन्‍होंने कहा, “हमें पता है कि अगर बारिश होने वाली होती है, तो दीमक पेड़ों से उतरना शुरू कर देती हैं। सूखे मौसम में अर्जुन के पेड़ की पत्तियों से पानी का टपकना भी बारिश के आने का संकेत देता है। ये सब बातें बच्चों को तो तभी पता चलेंगी, जब हम उन्हें बताएँगे।” 

किन पेड़ों से निकलता है नारियल पानी जैसा पौष्टिक पानी?  

सोहम दास ने आगे बताया कि इस दौरान बच्चों को दिखाया जाता है कि पीने के पानी के लिए किन पेड़ों का उपयोग किया जा सकता है और कैसे? उदाहरण के लिए, पलाश पेड़ की छाल में बने वी-आकार का कट लगाकर रस निकाल कर प्यास बुझाई जा सकती है। वहीं अटांडी लता के तने के सबसे मोटे हिस्से में एक सीधा कट लगाने से पानी निकलता है, जिसे इकट्ठा किया जा सकता है। ये पानी नारियल पानी जितना पौष्टिक होता है। इनके अलावा खजूर, बाँस और सियाली झाड़ी भी पानी देने वाले पौधे हैं।

विज़डम वॉक करते स्थानीय बच्चे 

विज़डम वॉक की हर सैर होती है दिलचस्प 

गाँव के रहने वाले दयाशंकर बहेरा बताते हैं कि बच्चे हर सैर पर कुछ नया खोजते हैं जो इसे दिलचस्प बनाता है। उन्‍होंने कहा, “हम उन्हें बताते हैं कि फल और अन्य खाद्य पौधे कहाँ मिलेंगे और हम छोटे-छोटे खेल खेलते हैं, जैसे पत्तियों को ढूँढना और उन्हें मालाओं में पिरोना।” 

दयाशंकर ने बताया कि किशोरों और युवा वयस्कों को जंगल के बारे में जानने में उतनी दिलचस्पी नहीं है जितनी बच्चों को होती है। बच्चे न केवल हमारे ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने में हमारी मदद करते हैं बल्कि प्राकृतिक संपदा के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक भी करते हैं। 

कब से शुरू हुई ओडिशा की विज़डम वॉक? 

दयाशंकर ने बताया कि बीते दो दशकों में लोगों का पलायन बढ़ा है। दूसरों को शहरों में नौकरी करते देख यहाँ के युवाओं का मन भी उधर ही लगने लगा और जंगलों से ध्‍यान लगभग हट गया। और तो और जिनका भविष्‍य अधर में लटक गया वो बुरी संगत में पड़ने लगे। ऐसे में यहाँ के बुजुर्गों को अहसास हुआ कि अगर इस ज्ञान को संजोकर रखना है तो बच्चों को छोटी उम्र से ही हमारी प्राकृतिक संपदा का महत्त्व बताना होगा। बस इसी बात को ध्‍यान में रखते हुए बुजुर्गों ने बच्चों को जंगलों की जानकारी देना शुरू किया।  

दयाशंकर के अनुसार इस मुहिम ने औपचारिक रूप करीब सात साल पहले लिया जब गाँव वालों ने पद यात्रा शुरू कीं। शुरुआत में ये पद यात्राएँ गाँव तक सीमित रहती थीं और धीरे-धीरे ये यात्राएँ जंगल की ओर बढ़ गईं और फिर इसका नाम पड़ा विज़डम वॉक। उन्होंने बताया कि बच्चे अब जंगल जाने को लेकर काफी उत्साहित रहते हैं। उनमें से कई खुद ही जंगल में चले जाते हैं, और कुछ ने तो अपने आंगन में पेड़ उगाना भी शुरू कर दिया है। हम अपने वनों में रुचि लौटती देखकर उत्साहित है। (इंडिया वॉटर पोर्टल )

Nov 1, 2022

शिक्षाः लीक से हटकर पढ़ाया जाएगा सोच का पाठ

- प्रमोद भार्गव 

देश का भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मद्रास ऐसा उच्च शिक्षण संस्थान है, जिसे केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने लगातार चौथी बार देश का श्रेष्ठ शिक्षण संस्थान घोषित किया है। यह देश का एक मात्र ऐसा संस्थान है, जो शिक्षा में नवाचारी प्रयोगों के लिए आगे रहा है। विज्ञान के आविष्कार और श्रेष्ठ साहित्य लेखन की बुनियाद ‘विचार’ या ‘सोच’ है। परंतु सोच का पाठ्यक्रम देश में कहीं पढ़ाया जाता हो, ऐसा अब तक देखने-सुनने में नहीं आया है ? यही कारण है कि 900 के करीब उच्च शिक्षण संस्थान होने के बावजूद हम नए शोध, प्रयोग और आविष्कार के क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं। लेकिन अब यह खुशी की बात है कि आईआईटी मद्रास ने गणित के माध्यम से ‘लीक से हटकर सोच’ अर्थात ‘आउट ऑफ द बाक्स थिंकिंग’ पर आधारित पाठ्यक्रम शुरू किया है। इसके जरिए नवोन्मेषी सोच को बढ़ावा दिया जाएगा। अपनी तरह की इस अनोखी पहल के तहत संस्थान का विद्यालय और महाविद्यालयों के करीब 10 लाख विद्यार्थियों को जोड़ने का लक्ष्य है। इसके अलावा शोधकर्ताओं और व्यवसायियों को भी जोड़ा जाएगा। यदि छात्र की सोच को ठीक से प्रोत्साहित किया गया तो तय है, देश के 70 प्रमुख शोध-संस्थानों में 3200 वैज्ञानिकों के पद खाली हैं उनके भरने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। बैंगलुरु के वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (सीएसआइआर) से जुड़े संस्थानों में सबसे ज्यादा 177 पद रिक्त हैं। पुणे की राष्ट्रीय रसायन प्रयोगशाला में 123 वैज्ञानिकों के पद खाली हैं।

कहते हैं कि पक्षियों के पंख प्राकृतिक रूप से ही सम्पूर्ण रूप में विकसित हो जाते हैं, लेकिन हवा के बिना उनमें पक्षी को उड़ा ले जाने की क्षमता नहीं होती है। अर्थात उड़ने के लिए वायु आवश्यक तत्व है। इसी तथ्य के आधार पर हम कह सकते हैं, आविष्कारक वैज्ञानिक को सोच के धरातल पर जिज्ञासु एवं कल्पनाशील होना जरूरी है। कोई वैज्ञानिक कितना भी शिक्षित क्यों न हो, वह कल्पना के बिना कोई मौलिक या नूतन आविष्कार नहीं कर सकता। शिक्षा संस्थानों से विद्यार्थी जो शिक्षा ग्रहण करते हैं, उसकी एक सीमा होती है, वह उतना ही बताती व सिखाती है, जितना हो चुका है। आविष्कार सोच एवं कल्पना की वह श्रृंखला है, जो हो चुके से आगे की अर्थात कुछ नितांत नूतन करने की जिज्ञासा को आधार तल देती है। स्पष्ट है, आविष्कारक लेखक या नए सिद्धांतों के प्रतिपादकों को उच्च शिक्षित होने की कोई बाध्यकारी अड़चन पेश नहीं आनी चाहिए।

अतएव हम जब लब्ध-प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों की जीवन-गाथाओं को पढ़ते हैं, तो पता चलता है कि न तो वे उच्च शिक्षित थे, न ही वैज्ञानिक संस्थानों में काम करते थे और न ही उनके इर्द-गिर्द विज्ञान-सम्मत परिवेश था। उन्हें प्रयोग करने के लिए प्रयोगशालाएँ भी उपलब्ध नहीं थीं। सूक्ष्मजीवों का अध्ययन करने वाले पहले वैज्ञानिक ल्यूवेनहॉक द्वारपाल थे और लैंसों की घिसाई का काम करते थे। लियोनार्दो विंची एक कलाकार थे। आइंस्टीन पेटेंट कार्यालय में लिपिक थे। न्यूटन अव्यावहारिक और एकांतप्रिय थे। उन्होंने विवाह भी नहीं किया था। न्यूटन को मंदबुद्धि भी कहा गया है। थॉमस अल्वा एडिसन को मंदबुद्धि बताकर प्राथमिक पाठशाला से निकाल दिया गया था। इसी क्षीण बुद्धि बालक ने कालांतर में बल्व और टेलीग्राफ का आविष्कार किया। फैराडे पुस्तकों पर जिल्दसाजी का काम करते थे; लेकिन उन्होंने ही विद्युत-मोटर और डायोनामा का आविष्कार किया। प्रीस्टले पुरोहित थे। लेवोसिएर कर विभाग में कर वसूलते थे। संगणक (कंप्यूटर) की बुद्धि अर्थात् सॉफ्टवेयर बनाने वाले बिलगेट्स का शालेय पढ़ाई में मन नहीं रमता था, क्योंकि उनकी बुद्धि तो सॉफ्टवेयर निर्माण की परिकल्पना में एकाग्रचित्त से लगी हुई थी। स्वास्थ्य के क्षेत्र में अनेक रोगों की पहचान कर दवा बनाने वाले आविष्कारक भी चिकित्सा विज्ञान या चिकित्सक नहीं थे। आयुर्वेद उपचार और दवाओं का जन्म तो हुआ ही ज्ञान परंपरा से है। गोया, हम कह सकते हैं कि प्रतिभा जिज्ञासु के अवचेतन में कहीं छिपी होती है। इसे पहचानकर गुणिजन या शिक्षक प्रोत्साहित कर कल्पना को पंख देने का माहौल दें, तो भारत की धरती से अनेक वैज्ञानिक-आविष्कारक निकल सकते हैं।

पुरानी कहावत है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है; लेकिन नूतन आविष्कार वही लोग कर पाते हैं, जो कल्पनाशील होते हैं और ‘लोग क्या कहेंगे’ इस उपहास की परवाह नहीं करते। बस वे अपने मौलिक इनोवेटिव आइडियाज़ को आकार देने में जुटे रहते हैं। अतएव संस्थागत स्तर पर सोच को शैक्षिक ज्ञान का धरातल मिलेगा तो परिकल्पनाएँ आविष्कार के रूप में आकार लेने लग जाएँगी। कुछ समय पहले हमने जाना था कि कर्नाटक के एक अशिक्षित किसान गणपति भट्ट ने पेड़ पर चढ़ जाने वाली बाइक का आविष्कार करके देश के उच्च शिक्षित वैज्ञानिकों व विज्ञान संस्थाओं को हैरानी में डालने का काम कर दिया था। गणपति ने एक ऐसी अनूठी मोटरसाइकल का निर्माण किया, जो चंद पलों और कम खर्च में नारियल एवं सुपारी के पेड़ों पर आठ मिनट में चढ़ जाती है। इस बाइक से एक लीटर पेट्रोल में 80 पेड़ों पर आसानी से चढ़ा जा सकता है। यह एक उत्कृष्ठ नवाचार था, जो सोच के बूते अस्तित्व में आया।

दरअसल बीते 75 सालों में हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी अवधारणाओं का शिकार हो गई है, जिसमें समझने-बूझने के तर्क को नकारा जाकर रटने की पद्धति विकसित हुई है। दूसरे संपूर्ण शिक्षा को विचार व ज्ञानोन्मुखी बनाने की बजाय, नौकरी अथवा कैरियर उन्मुखी बना दिया गया है। मसलन शैक्षिक उपलब्धियों को व्यक्ति केंद्रित बना दिया गया, जो संकीर्ण सोच और निजी विशेषज्ञता को बढ़ावा देती हैं। नए आविष्कार या अनुसंधानों की शुरुआत अकसर समस्या के समाधान से होती है, जिसमें उपलब्ध संसाधनों को परिकल्पना के अनुरूप ढालकर क्रियात्मक अथवा रचनात्मक रूप दिया जाता है। यही वैचारिक स्रोत आविष्कार के आधार बनते हैं; किंतु हमारी शिक्षा पद्धति से इन कल्पनाशील वैचारिक स्रोतों को तराशने का अध्यापकीय कौशल कमोबेश नदारद रहा है। लिहाजा सोच कुंठित होती रही है। अंग्रेजी का दबाव भी नैसर्गिक प्रतिभाओं को कुंठित कर रहा है। देर से ही सही आईआईटी मद्रास ने सोच का पाठ्यक्रम शुरू करके एक आवश्यक पहल की है।

यह पाठ्यक्रम आईआईटी मद्रास प्रवर्तक तकनीकी फाउंडेशन के माध्यम से शुरू किया गया है। इसमें परीक्षा में बैठने वाले विद्यार्थियों को मामूली शुल्क देने के बाद श्रेणी आधारित प्रमाण-पत्र मिल जाएगा। इसकी अंतिम परीक्षा भारत के चुनिंदा शहरों में होगी। पाठ्यक्रम ऑनलाइन प्रारूप में उपलब्ध होगा, जो निशुल्क होगा। भारत समेत दूसरे देशों में रहने वाले छात्र भी इस शिक्षा का लाभ उठा सकते हैं। चार श्रेणी वाला यह स्वतंत्र स्तर का यह पाठ्यक्रम विद्यार्थियों, व्यवसायियों और शोधार्थियों के लिए आसानी से उपलब्ध होगा। अतएव इस पाठ्यक्रम के जरिए

, जो छात्र अपनी मौलिक सोच के बूते कोई नूतन आविष्कार करते हैं, तो यह परिकल्पना साकार रूप में कैसे अवतरित हो, इस लक्ष्यपूर्ति के लिए लिए प्राध्यापक ज्ञान के मार्ग सुझाएँगे। मौलिक शोध लिखने की प्रवृत्ति बढ़ेगी, एम. फिल .और पीएच.डी .का आधार बनेंगे। जो आविष्कार उपकरण के रूप में विकसित कर लिए जाएँगे, उन्हें बाजार में उपभोक्ता उपलब्ध कराने के लिए व्यवसायी मार्ग दर्शन करेंगे। छात्र, व्यापारी और शोधार्थियों का यह ऐसा गठजोड़ साबित हो सकता है, जो वैज्ञानिक आविष्कार के क्षेत्र में क्रांति लाने के साथ, संस्थानों में वैज्ञानिकों की कमी पूरी कर सकता है। इसीलिए आइआइटी मद्रास के निर्देशक वी कामकोटी का कहना है - अपने तरह का यह पाठ्यक्रम भारत में पहला है और आने वाले दिनों में इसका व्यापक प्रभाव दिखाई देगा। इस पाठयक्रम का स्कूल और कॉलेज के छात्रों, खासकर ग्रामीण भारत में रहने वालों को काफी लाभ होगा। लीक से हटकर सोच या तर्क शक्ति का उपयोग करके छात्र अप्रत्यक्ष एवं रचनात्मक माध्यम से समस्याओं का समाधान करते हैं, तो वे तत्काल जाहिर नहीं होते है।; क्योंकि इसमें विचार की आवश्यकता होती है, जिसे केवल पारंपरिक तरीके से साकार करना मुश्किल होता है। इसीलिए इस अनूठे पाठ्यक्रम में तार्किक रूप से गणित के ज्ञात एवं अज्ञात तथ्यों को पुनः तलाशने वाली सोच पर जोड़ दिया जा रहा है, जिससे विचारशील छात्र की रुचि विकसित हो। वाकई यह ज्ञान के क्षेत्र में जड़ता को तोड़ने की उल्लेखनीय कोशिश है।

यहाँ गौरतलब है कि 1930 में जब देश में फिरंगी हुकूमत थी, तब देश में वैज्ञानिक ‘शोध का बुनियादी ढाँचा न के बराबर था। विचारों को रचनात्मकता देने वाला साहित्य भी अपर्याप्त था और गुणी शिक्षक भी नहीं थे। अंग्रेजी शिक्षा शुरुआती में दौर में थी। बावजूद सीवी रमन ने साधारण देशी उपकरणों के सहारे देशज ज्ञान और भाषा को आधार बनाकर काम किया और भौतिक विज्ञान में नोबेल दिलाया। जगदीशचंद्र बसु ने पेड़ों में रेडियो और सूक्ष्म तरंगों की प्रकाशिकी पर महत्त्वपूर्ण कार्य किया। भारत के वे पहले ऐसे वैज्ञानिक थे, जिन्होंने अमेरिकी पेटेंट प्राप्त किया। उन्हें रेडियो विज्ञान का जनक माना जाता है। जीवन की खोज के साथ सत्येंद्रनाथ बसु ने आइंस्टीन के साथ काम किया। मेघनाथ साहा, रामानुजम, पीसी रे और होमी जहाँगीर भाभा ने अनेक उपलब्धियाँ पाईं। रामानुजम के एक-एक सवाल पर पीएच.डी. की उपाधि मिल रही हैं। ए.पी.जे. कलाम और के. शिवम जैसे वैज्ञानिक मातृभाषा में आरंभिक शिक्षा लेकर महान वैज्ञानिक बने। लेकिन वर्तमान में उच्च शिक्षा में तमाम गुणवत्तापूर्ण सुधार होने और अनेक प्रयोगशालाओं के खुल जाने के बावजूद गंभीर अनुशीलन का काम थमा है। अतीत की उपलब्धियों को दोहराना मुमकिन नहीं हो रहा है। विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में हम पश्चिम के प्रभुत्व से छुटकारा नहीं पा, पा रहे ? हालाँकि मंगल अभियान इस दिशा में अपवाद के रुप में पेश आया है, जिसे स्वदेशी तकनीक से अंतरिक्ष में छोड़ा गया है। तय है, सोच का पाठ्यक्रम इस दिशा में मौलिक प्रयोग व आविष्कार सामने लाने की दिशा में अहम् पहल करेगा। 

                            

सम्पर्कः शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र.

मो. 09425488224, 09981061100    

May 1, 2022

शिक्षाः निजी स्कूलों से अभिभावकों का मोहभंग

- डॉ. महेश परिमल

एक खबर, कोरोना के चलते देश की ज्यादातर निजी स्कूलों का राजस्व 20 से 50 प्रतिशत कम हो गया है। इसके अलावा नए शिक्षण सत्र में नए एडमिशन भी बेहद कम हुए हैं। इससे साफ है कि निजी स्कूलों की मनमानी और खुली लूट से अभिभावकों का मोहभंग होने लगा है। उनका झुकाव अब सरकारी स्कूलों की तरफ होने लगा है। सरकारी स्कूलों में एडमिशन के लिए बढ़ती भीड़ इसी बात का परिचायक है।

हम सब कोरोना की महामारी से गुजरकर अब कुछ राहत की साँस ले रहे हैं। पर यह भी सच है कि खतरा अभी टला नहीं है। पर हम सब मजबूर हैं, अपने कदमों को घर के बाहर ले जाने के लिए। आखिर कब तक इसे रोका जाए। रोजी-रोटी भी तो चलानी है। अब सब कोरोना से बचने के लिए अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की बात कर रहे हैं। दूसरी तरफ शिक्षा को लेकर भी लोग सचेत होने लगे हैं। दसवीं-बारहवीं के विद्यार्थियों को प्रमोशन देने की बात हो या फिर ग्रेड के साथ परिणाम देने की बात हो, ऑनलाइन शिक्षा का क्षेत्र बढ़ाने की बात हो, इन समस्याओं ने सभी का ध्यान आकर्षित किया है। नया शिक्षण सत्र शुरू हो गया है। अभिभावक अपने बच्चों के एडमिशन के लिए तत्पर हैं। इस बार अभिभावक सतर्क हैं। निजी स्कूलों की खुली लूट के आगे बेबस अभिभावकों का रुझान अब सरकारी स्कूलों की ओर बढ़ रहा है। इसलिए वे अपने बच्चों के एडमिशन के लिए सरकारी स्कूलों की शरण में पहुँच रहे हैं। हर अभिभावक की चाहत होती है कि उनकी संतान को अच्छी शिक्षा मिले, अच्छे संस्कार मिलें। अब तक उच्च मध्यम वर्ग और हाइनेट वर्थ वाले अपने बच्चों को लाखों रुपये देकर निजी स्कूलों में भेज रहे थे। निजी शालाओं का आकर्षण इतना जबरदस्त है कि वे स्कूल किसी फाइव स्टॉर होटल जैसी लगते हैं। अभिभावकों की इस चाहत को निजी स्कूलों ने खूब भुनाया। इसके बाद ये स्कूल अपने कर्त्तव्यपथ से दूर होते गए। फिर शुरू हो गई उनकी मनमानी। जिसके आगे अभिभावक बेबस हो गए। कोरोना ने सारे परिदृश्य को बदल दिया। इससे पालकों की सोच भी बदली। यही कारण है कि अब पालक निजी स्कूलों का मोह छोड़कर बच्चों का एडमिशन सरकारी स्कूलों में करवा रहे हैं।

पहले हालात ये थे कि संतान के जन्म के तुरंत बाद पालक 5 लाख रुपये अलग से उनकी प्रारंभिक शिक्षा के नाम पर रख लेते थे। दूसरी ओर बच्चे के जन्म के साथ उसकी स्कूल को लेकर पालक चिंतित दिखाई देते थे। किस स्कूल में एडमिशन कराया जाए, वहाँ के लिए किसकी पहचान ठीक रहेगी। यह एक ऐसा जहरीला ट्रेंड था कि इसमें मध्यम वर्ग अनजाने में ही फँसता चला जाता था। उधर सरकारी स्कूलों की हालत भी उतनी अच्छी  नहीं थी। वहाँ शिक्षा का स्तर ठीक नहीं था, स्वच्छता का अभाव था, इसके अलावा विद्यार्थियों में अनुशासन की कमी दिखाई देती थी। शिक्षक भी गैरहाजिर रहते। इस कमजोरी का पूरा लाभ  निजी स्कूलों ने उठाया। देखते ही देखते गाँव-गाँव में निजी स्कूलों का कब्जा हो गया। एक तरह से शिक्षा का व्यापार ही शुरू हो गया।

निजी स्कूलों की बढ़ती संख्या के पीछे राजनीति थी। हर स्कूल से कोई न कोई जन प्रतिनिधि संबद्ध ही होता था। निजी स्कूलों की मनमानी के खिलाफ कई बार अभिभावक लामबंद हुए;  पर राजनीतिक संरक्षण के कारण उनकी आवाज दब गई। सरकार भी लाचार हो गई। बाद में अभिभावकों को यह खयाल आया कि यह सब धन का खेल है। इसके बाद सरकारी शालाएँ नींद से जागी। स्कूलों में सुधार दिखाई देने लगा। वहाँ बुनियादी सुविधाएँ बढ़ने लगी। स्वच्छता अभियान चलाया गया। शिक्षकों को यह ताकीद की गई कि वे रोज स्कूल आएँ। इन स्कूलों में भी डिजिटल सुविधाएँ मिलने लगीं। कोरोना काल में पालकों को यह अहसास हो गया कि जब सरकारी स्कूलों में ही बच्चों को बुनियादी सुविधाएँ मिल रही हैं, तो फिर इतनी राशि क्यों खर्च की जाए? इस सोच ने शिक्षा माफिया को एक तरह से हिलाकर रख दिया।

निजी स्कूलों में आपसी प्रतिस्पर्धा इतनी तीव्र थी कि हमारी शाला ही सर्वश्रेष्ठ है, इसके लिए वे विज्ञापनों पर ही लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करने लगे थे। लोग विज्ञापन पढ़कर और देखकर ही गद्गद् होने लगे थे। शिक्षा माफिया का सीधा सम्बन्ध नेताओं से होने के कारण निजी स्कूलों के हौसले बुलंद होने लगे थे। फिर तो लोग गर्व से यह कहने से नहीं चूकते थे कि हमारा बच्चा इस स्कूल में पढ़ता है। इसके बाद स्कूल में बाल मंदिर से लेकर कॉलेज तक की पढ़ाई होने लगी। यानी बच्चे को तीन साल की उम्र में एडमिशन दिला दो, फिर कॉलेज तक फुरसत।

अब तक लोग दिखावे के कारण निजी स्कूलों की मनमानी सह रहे थे। पर कोरोना काल के बाद पालक का मोहभंग होने लगा। यह स्वाभाविक था कि पालकों को यह अहसास हो गया कि दिखावे से कुछ नहीं होने वाला। इसलिए वे अब अपने बच्चों को निजी शालाओं निकालकर सरकारी स्कूलों में भेजने लगे हैं। मध्यम वर्ग ने इस परिवर्तन को सहजता से स्वीकार कर लिया है। अब गेंद सरकारी स्कूलों के पाले में है। सरकार को यह समझना होगा कि वह इन स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं के अलावा हर तरह की सुविधाएँ दे, जो निजी स्कूलों में दी जाती हैं। शिक्षा के स्तर को बढ़ाने पर विशेष ध्यान दे; ताकि बच्चों का भविष्य सँवर सके। इस दिशा में यदि अधिकारी वर्ग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजे, तो तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी। इसी वर्ग ने सरकारी स्कूलों की सबसे अधिक उपेक्षा की है, इसलिए सरकारी स्कूलों की दुर्गति हुई। अब परिदृश्य बदल रहा है, तो उन्हें अपनी गलती को सुधारने का एक अवसर मिला है। पालकों की नींद टूट गई, अब सरकार की भी नींद टूटनी चाहिए।

सम्पर्कः टी 3 सागर लेक व्यू, वृन्दावन नगर , भोपाल- 462022, मोबा. 09977276257

Apr 4, 2021

पहलः आप भी जुड़ सकते हैं इस अभिनव प्रयास में

छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्र बस्तर के कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा गाँव में साथी समाज सेवी संस्था नाम से स्थापित संस्था लगभग 40 वर्षों से आदिवासियों के जीवन के संवर्धन- संरक्षण, स्वास्थ्य एवं शिक्षा के लिए निरंतर काम कर रही है।

2004 में इस संस्था ने बस्तर के आदिवासी बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने के साथ- साथ बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य एक विद्यालय का प्रारंभ किया। स्कूल का आरंभ नर्सरी के बच्चों को पढ़ाने से हुआ था। उद्देश्य था उन आदिवासी बच्चों के लिए शिक्षा उपलब्ध कराना जिनके माता- पिता आर्थिक अभाव या जागरुकता की कमी के कारण अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते। एक छोटे से कमरे से चालू हुआ स्कूल धीरे- धीरे आकार लेने लगा और अब इस स्कूल में बच्चे, कक्षा 8 तक की शिक्षा ग्रहण करते हैं। साथी राउंड टेबल गुरुकुल के नाम से स्थापित इस स्कूल में विगत 16 वर्षों से हजारों बच्चे शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं। वर्तमान में यहाँ 400 बच्चे अध्ययनरत हैं।

2020 का साल इस विद्यालय के लिए भी मुसीबतों से भरा रहा। कोरोना के कारण लॉकडाउन के बाद से ही स्कूल की शिक्षण- व्यवस्था डगमगा गई है। कुछ माह तक तो स्कूल के शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों के वेतन की व्यवस्था संस्था ने अपने व्यक्तिगत प्रयास से करने की कोशिश की;  पर धीरे- धीरे मुश्किलें बड़ी होती गईं और नौबत स्कूल बंद करने की आ गई।  फिर भी स्कूल के संचालकों ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने शुभचिंतकों के नाम एक पत्र लिखकर अपील जारी की,  कि इस संकट की घड़ी में वे विद्यालय संचालन के लिए कुछ आर्थिक सहयोग कर विद्यालय को बंद होने से बचाने में आर्थिक सहयोग करें।

इस अपील का तुरंत प्रभाव पड़ा- पिछले कई वर्षों से जो शुभचिंतक इस विद्यालय को अनुदान देते आ रहे थे, वे सब तो तुरंत सहयोग के लिए आगे आए, साथ ही मासिक पत्रिका उदंती.com’  के लेखकों को जैसे ही इस स्कूल के संकटकाल का पता चला, उन्होंने भी दिल खोलकर संस्था का साथ दिया। इसमें भाई रामेश्वर काम्बोज हिमांशुजी की विशेष भूमिका रही। इस प्रकार कुछ समय के लिए विद्यालय का संकट टल गया। हम उम्मीद करते हैं जब तक संकट टल नहीं जाता तब तक अनुदान देने वालों की संख्या इसी तरह बढ़ती जाएगी और आदिवासी बच्चों की शिक्षा बीच में नहीं रुकेगी। साथ ही स्कूल संचालन में भागीदारी करने वाले अनेक कर्मचारी और शिक्षक बेरोजगार होने से बच जाएँगे।

पिछले कई वर्षों से जो सदस्य नियमित अनुदान दे रहे हैं उनके नाम इस प्रकार हैं- प्रियंका-गगन सयाल- लंदन मैनचेस्टर,  सुमन परगनिहा- रायपुर,  डॉ. प्रतिमा- अशोक चंद्राकर- रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, राजेश चन्द्रवंशी- रायपुर, क्षितिज चन्द्रवंशी- रायपुर, आयुश चन्द्रवंशी- रायपुर, अक्षत वर्मा- रायपुर।

कोरोना काल में आई मुसीबत के समय उदंती के जिन रचनाकारों ने तुरंत अपना अमूल्य सहयोग देकर विद्यालय को सहायता पहुँचाई उनके नाम हैं- रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, सुकेश कुमार साहनी, कमला निखुर्पा, डॉ. शिवजी श्रीवास्तव, सुदर्शन रत्नाकर, डॉ. सुषमा गुप्ता एवं विजय जोशी।

बहुतों को अनुदान देने वालों का नाम प्रकाशित करने पर आपत्ति हो सकती है। आपको बता दें कि इनमें से कोई भी नहीं चाहता कि उनका नाम उजागर किया जाए; परंतु नाम देकर न तो हम उनकी भावनाओं को आहत करना चाहते हैं, न ही हम किसी का गुणगान करना चाहते हैं। हमारा उद्देश्य मात्र उनके इस अमूल्य सहयोग के प्रति आभार व्यक्त करना है, धन्यवाद देना हैं। इस नेक र्काय में यदि आप भी अगर सहयोग करने के इच्छुक हैं तो, मोबाइल नम्बर  9425524044 और Email- drvermar@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।

Feb 1, 2021

आलेख-ः शिक्षा- स्कूल खोलें या न खोलें

-डॉ. सुशील जोशी

पिछले 10 माह से देश के स्कूल कमोबेश बंद पड़े हैं। कहने को तो रिमोट शिक्षा की व्यवस्था की गई है ; लेकिन उसकी अपनी समस्याएँ  हैं। वैसे तो केन्द्र  सरकार ने अक्टूबर में आदेश जारी कर दिए थे कि राज्य अपने विवेक के अनुसार स्कूल खोलने का निर्णय ले सकते हैं;  किंतु अधिकतर राज्यों ने स्कूल न खोलने या आंशिक रूप से खोलने का ही निर्णय लिया है। इस संदर्भ में मुख्य सवाल यह है कि स्कूल खोलने या बंद रखने का निर्णय किन आधारों पर लिया जाएगा।

पहले तो यह देखना होगा कि हमारे सामने विकल्प क्या हैं। पहला विकल्प तो यही है कि सब कुछ सामान्य हो जाए और सारे स्कूल पहले की भाँति (जैसे लॉकडाउन से पहले थे) चलने लगें। इसका मतलब यह तो नहीं लगाया जा सकता कि सब कुछ ठीक हो गया; क्योंकि देश में शिक्षा की हालत को लेकर कई अन्य चिंताएँ  तो बनी रहेंगी।

दूसरा विकल्प है- स्कूलों को पूरी तरह बंद रखना और तीसरा विकल्प है- स्कूलों को आंशिक रूप से खोलना यानी कुछ कक्षाएँ  शुरू कर देना या प्रत्येक कक्षा में सीमित संख्या में छात्रों को आने देना। स्कूल बंद रखने का मतलब होगा कि देश के 15 लाख से ज़्यादा स्कूलों में दाखिल 28 करोड़ बच्चे घरों में बंद रहेंगे और संभव हुआ तो ऑनलाइन कुछ सीखने की कोशिश करेंगे ; लेकिन इसके साथ जुड़े कई मसले हैं।

सबसे पहला मुद्दा तो ऑनलाइन शिक्षा तक पहुँच का है। यूनिसे की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में मात्र 23 प्रतिशत घरों में इंटरनेट कनेक्शन हैं, जिनके माध्यम से ऑनलाइन शिक्षा तक पहुँच बनाई जा सकती है। दुनिया भर में देखें तो ऐसे डिजिटल-वंचित बच्चों की संख्या 50 करोड़ के आसपास है। इस मामले में विशाल ग्रामीण-शहरी अंतर भी है। इंटरनेट उपलब्धता में इस अंतर का स्पष्ट परिणाम यह होगा कि सीखने के मामले में खाई और बढ़ेगी। स्मार्ट फोन वगैरह भी काफ़ी कम परिवारों के पास हैं और यदि हैं भी, तो वे पूरे परिवार के इस्तेमाल के लिए हैं। ज़ाहिर है, ग्रामीण बच्चे, लड़कियाँ  और शहरी गरीब बच्चे पिछड़ जाएँगे।

यह सही है कि शासन की ओर से यह प्रयास किया गया है कि इंटरनेट से स्वतंत्र प्लेटफ़ार्म्स (जैसे टेलीविज़न) पर भी शिक्षा का उपक्रम किया जाए ; लेकिन उसकी समस्याएँ  भी कम नहीं हैं। एक तो इस शैली में मानकर चला जाता है कि पर्दे पर किसी जानकार को सुनकर शिक्षा पूरी हो जाती है। इस माध्यम में बच्चों और शिक्षक के बीच किसी वार्तालाप के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती। दूसरी बात यह है कि लगभग सारे शिक्षक बताएँगे कि बच्चे कक्षा में लगातार ध्यान केंद्रित नहीं करते/कर पाते। शिक्षक की नज़र रहती है कि किसका ध्यान कब व कहाँ भटक रहा है। टेलीविज़न जैसा माध्यम तो इसमें कोई मदद नहीं कर सकता। यानी यह रिमोट शिक्षा एक ओर तो शिक्षा की गुणवत्ता को बिगाड़ेगी और साथ ही गरीब-अमीर, ग्रामीण-शहरी बच्चों के बीच तथा लड़के-लड़कियों के बीच असमानता को बढ़ाएगी।

यूनिसेफ की उक्त रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि रिमोट शिक्षा के माध्यम उपलब्ध होने के बावजूद शायद बच्चे उतने अच्छे से न सीख पाएँ ; क्योंकि घर के परिवेश में कई अन्य दबाव भी काम करते हैं। यदि बच्ची/बच्चा स्कूल चला जाए, तो उतने घंटे तो समझिए, ‘सीखने’ के लिए आरक्षित हो गए ; लेकिन वह घर पर ही है, तो कई अन्य प्राथमिकताएँ  सिर उठाने लगती हैं।

अधिकतर लोग शायद यह तो स्वीकार करेंगे कि बच्चे स्कूल सिर्फ़ ‘पढ़ाई’ करने नहीं जाते। स्कूल हमजोलियों से मेलजोल का एक स्थान भी होता है, जहाँ तमाम तरह के खेलकूद होते हैं, रिश्ते-नाते बनते हैं। स्कूल बंद रहने से बच्चे इन महत्त्वपूर्ण सामाजिक अवसरों से वंचित हो रहे हैं। यह बात कई अध्ययनों में उभरी है कि सतत माता-पिता की निगरानी में रहना और हमउम्र बच्चों के साथ मेलजोल न होना बच्चों के लिए मानसिक दबाव पैदा कर रहा है और मनोवैज्ञानिक समस्याएँ  भी। माता-पिता के लिए जो समस्याएँ  सामने आ रही हैं, वे तो सूद के रूप में हैं। वॉशिंगटन स्थित चिल्ड्रन नेशनल हॉस्पिटल की डॉ. डेनियल डूली ने कहा है कि स्कूल बंद होने की वह से शिक्षा का तो नुकसान हुआ ही है, मानसिक स्वास्थ्य, कुपोषण वगैरह के खतरे भी बढ़े हैं।

एक मुद्दा मध्याह्न भोजन यानी मिडडे मील का भी है। मिडडे मील को दुनिया का सबसे बड़ा पोषण कार्यक्रम कहा गया है। इसके तहत दिन में एक बार कक्षा 1 से 8 तक के सारे स्कूली बच्चों को पौष्टिक भोजन प्राप्त होता है। इनकी संख्या करीब 6 करोड़ होगी। इतने ही बच्चों को आँगनवाड़ी से भोजन दिया जाता है और वे भी बंद हैं। यह उनके पोषण स्तर को बेहतर करने में एक महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। हो सकता है, यह योजना बहुत अच्छी तरह से लागू न हुई हो, फिर भी इसने स्कूली बच्चों की सेहत पर सकारात्मक असर डाला है। स्कूल बंद मतलब मिड डे मील भी बंद। भारत में कुपोषण की स्थिति को देखते हुए यह एक बहुत बड़ा व महत्त्वपूर्ण नुकसान है।

कुल मिलाकर स्कूल बंद रहने का मतलब बच्चों के लिए संज्ञानात्मक विकास और तंदुरुस्ती में ज़बरस्त नुकसान। इसके साथ-साथ खेलकूद का अभाव, हमउम्र बच्चों से मेलजोल के अभाव वगैरह का मनोवैज्ञानिक असर तो हो ही रहा है। इसके अलावा, कई संस्थाओं ने आशंका व्यक्त की है कि यदि यह साल इसी तरह गया तो 2021 में बड़ी संख्या में बच्चे शायद स्कूल न लौटें, नए दाखिलों की तो बात ही जाने दें। स्कूलों में दाखिलों को लेकर जो प्रगति पिछले एक-डेढ़ दशकों में हुई है, वह शायद वापिस पुरानी स्थिति में पहुँच जाए। लैंसेट के एक शोध पत्र में यह भी शंका व्यक्त की गई है कि इस तरह स्कूल बंद रहने से बाल-विवाह में भी वृद्धि की संभावना है।

तो स्कूलों को जल्द से जल्द बहाल करने के पक्ष में काफ़ी दलीलें हैं ; लेकिन यदि सरकारें स्कूलों को नहीं खोल रही हैं, तो यकीनन कुछ कारण होंगे। सरकार तो सरकार, माता-पिता भी कह रहे हैं कि स्कूल खुलेंगे, तो भी वे अपने बच्चों को नहीं भेजेंगे। एक सर्वेक्षण में 70 प्रतिशत अभिभावकों ने यह राय व्यक्त की है। वैसे यदि पालकों को कहा जाएगा कि वे बच्चों को स्कूल अपनी ज़िम्मेदारी पर ही भेजें, तो पालकों का कोई अन्य जवाब हो भी नहीं सकता। कई स्कूल प्रबंधन भी ऐसा ही सोचते हैं। और इन सबकी हिचक का प्रमुख (या शायद एकमात्र) कारण है कि स्कूल में भीड़-भाड़ होगी, बच्चों के बीच निकटता होगी, बच्चे मास्क वगैरह भूल जाएँ गे और खुद संक्रमित होंगे, और संक्रमण को घर ले आएँ गे। कहा जा रहा है कि स्कूल संक्रमण प्रसार के अड्डे बन जाएँगे। इसी मूल चिंता के चलते समाज में स्कूल खोलने के विरुद्ध माहौल बना है। तो सवाल है कि यह चिंता कितनी जायज़ है।

पिछले दिनों कई देशों में स्कूल पूर्ण या आंशिक रूप से खोले गए हैं। भारत में भी कुछ राज्यों ने स्कूल खोले हैं। कहना न होगा कि स्कूल खोलने को लेकर केन्द्र सरकार द्वारा प्रोटोकॉल जारी किए गए हैं और शायद शत प्रतिशत नहीं; लेकिन इनका पालन भी हुआ है, तो उनसे किस तरह के आँकड़े व अनुभव मिले हैं।

स्विटज़लैंड स्थित इनसाइट्स फॉर एजूकेशन नामक एक संस्था ने स्कूल खोलने के बाद के अनुभवों का एक अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन किया था। उनके अध्ययन में 191 देशों के अनुभवों का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट का पहला चौंकाने वाला निष्कर्ष यह है कि कोविड-19 वैश्विक महामारी ने दुनिया भर में बच्चों की शिक्षा के 3 खरब स्कूल दिवसों की हानि की है।

बहरहाल, रिपोर्ट का सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि स्कूलों के खुलने और संक्रमण दर में वृद्धि के बीच कोई सम्बन्ध  नहीं है। इनसाइट्स फॉर एजूकेशन की मुख्य कार्यकारी अधिकारी रैण्डा ग्रोब-ज़कारी का कहना है कि यह तो सही है कि स्कूल खोलने या ना खोलने का निर्णय तो स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा ; लेकिन कुछ मान्यताओं की छानबीन आवश्यक है। जैसे यह मान लिया गया है स्कूल खुले तो संक्रमण फैलने की दर में उछाल आएगा और स्कूल बंद रखने से संक्रमण फैलने की दर कम रहेगी। देखना यह है कि विभिन्न देशों का अनुभव क्या कहता है। इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने 191 अलग-अलग देशों में अपनाए गए तरीकों और उनके परिणामों का विश्लेषण किया है।

जिन देशों का अध्ययन किया गया उनमें से कम से कम 92 देशों में स्कूल खोले गए हैं। इनमें से कुछ देश तो ऐसे भी थे ज्हाँ  कोविड-19 काफी अधिक था। रिपोर्ट में बताया गया है कि फ्रांस व स्पैन समेत 52 देशों में बच्चे अगस्त और सितंबर में स्कूल आने लगे थे। ये सभी वे देश हैं जहाँ लॉकडाउन के दौरान संक्रमण दर बढ़ रही थी ; लेकिन स्कूल खुलने के बाद और नहीं बढ़ी थी। दूसरी ओर, यू.के. व हंगरी में स्कूल खुलने के बाद संक्रमण दर बढ़ी थी। 52 देशों का विश्लेषण बताता है कि संक्रमण दर बढ़ने का स्कूल खुलने से कोई सम्बन्ध  नहीं दिखता। इसके लिए अन्य परिस्थितियों पर विचार करना होगा। यूएस में भी स्कूल खुलने और संक्रमण दर में वृद्धि का कोई सीधा सम्बन्ध  स्थापित नहीं हुआ है।

भारत में कुछ राज्यों ने स्कूल खोलने का निर्णय लिया है ; राज्यों में कक्षा 9 तथा उससे ऊपर की कक्षाओं को ही शुरू किया गया है। इस संदर्भ में आंध्र प्रदेश की रिपोर्ट है कि वहाँ स्कूल खुलने के बाद राज्य के कुल 1.89 लाख शिक्षकों में से लगभग 71 हज़ार की जाँच की गई और उनमें से 829 (1.17 प्रतिशत) पॉज़िटिव पाए गए। कुल 96 हज़ार छात्रों की जाँच में 575 (0.6 प्रतिशत) पॉज़िटिव निकले। राज्य के शिक्षा आयुक्त ने माना है कि ये आँकड़े कदापि चिंताजनक नहीं हैं; क्योंकि पहली बात तो यह है कि शिक्षकों की जाँच स्कूल खुलने से पहले की गई थी,  जिसके परिणाम स्कूल खुलने के बाद आए हैं।

मिशिगन विश्वविद्यालय चिकित्सा अध्ययन शाला की संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रीति मालनी ने स्कूल खोलने के बारे में कहा है कि अब तक उपलब्ध आँकड़ों से नहीं लगता कि स्कूल सुपरस्प्रेडर स्थान हैं। दरअसल ऐसा लगता है कि स्कूल अपने इलाके के सामान्य रुझान को ही प्रतिबिंबित करते हैं। स्पैन के पोलीटेक्निक विश्वविद्यालय के एनरिक अल्वारेज़ ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि स्पैन में दूसरी लहर में संक्रमणों में वृद्धि स्कूल खुलने से कई सप्ताह पहले शुरू हो गई थी और स्कूल खुलने के तीन सप्ताह बाद गिरने लगी थी। कहीं भी यह नहीं देखा गया कि स्कूल खुलने से संक्रमण के प्रसार में वृद्धि हुई हो। और उनके आँकड़े बताते हैं कि स्कूल संक्रमण फैलाने के हॉट-स्पॉट तो कदापि नहीं बने हैं। अलबत्ता, उन्होंने स्पष्ट किया है कि यह स्पैन की बात है जहाँ जाँच और संपर्कों की खोज काफी व्यवस्थित रूप से की जाती है। इसके अलावा स्पैन में मास्क पहनना, शारीरिक दूरी बनाए रखना तथा साफ-सफाई का भी विशेष ध्यान रखा जा रहा है।

इसी प्रकार से थाईलैंड व दक्षिण अफ्रीका में स्कूल पूरी तरह खोल दिए गए और संक्रमण के फैलाव पर इसका कोई असर नहीं देखा गया। वियतनाम व गाम्बिया में गर्मी की छुट्टियों में मामले बढ़े ; लेकिन स्कूल खुलने के बाद कम हो गए। जापान में भी पहले तो मामले बढ़े ; लेकिन फिर घटने लगे। इस पूरे दौरान स्कूल खुले रहे। सिर्फ यू.के. में ही देखा गया कि स्कूल खुलने के समय के बाद से संक्रमणों में वृद्धि हुई।

अधिकतर  देशों में, और खासकर यू.एस. व यू.के. में वैज्ञानिकों का मत है कि कहीं-कहीं स्कूल खुलने के बाद संक्रमण दर में वृद्धि हुई है ; लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि ऐसा स्कूल खुलने के कारण हुआ है। साथ ही वे कहते हैं कि इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं है कि इसमें स्कूलों की कोई भूमिका नहीं रही है।

महामारी और स्कूल खोलने के संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण सवाल यह उठता रहा है कि क्या बच्चे कम संक्रमित होते हैं और संक्रमण को कम फैलाते हैं। सामान्य आँकड़ों से पता चला है कि संक्रमित लोगों में बच्चे सबसे कम हैं। इसकी कई व्याख्याएँ  प्रस्तुत की गई हैं और काफी मतभेद भी हैं। कुछ विशेषज्ञों का मत है कि बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली अप्रशिक्षित होने की वजह से वे सुरक्षित रहते हैं। इसके विपरीत कुछ लोगों का कहना है कि यदि ऐसा होता तो वे अन्य संक्रमणों से भी सुरक्षित रहते ; लेकिन हकीकत अलग है। कुछ लोगों को कहना है कि बच्चों के फेफड़ों की कम कोशिकाओं में वे ग्राही (ACE2 ग्राही) होते हैं जो कोरोनावायरस को कोशिका में प्रवेश का रास्ता प्रदान करते हैं। यह भी कहा गया है कि बच्चे संक्रमण को बहुत अधिक नहीं फैलाते;  क्योंकि उनके फेफड़े छोटे होते हैं और उनकी छींक या खाँसी के साथ निकली बूँदों में वायरस की संख्या कम होती है और ये बूँदें बहुत दूर तक नहीं जातीं।

बहरहाल, मामला यह है कि  अधिकतर  आँकड़े दर्शाते हैं कि स्कूल कोविड-19 वायरस फैलाने के प्रमुख या बड़े स्रोत नहीं हैं। यह भी स्पष्ट है कि स्कूलों के बंद रहने का शैक्षणिक व स्वास्थ्य सम्बन्धी खामियाजा खास तौर से गरीब व वंचित तबके के बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। इसलिए इस मुद्दे को मात्र प्रशासनिक सहूलियत के नज़रिए से न देखकर व्यापक अर्थों में देखकर निर्णय करने की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)

Mar 8, 2020

संथाल आदिवासी बच्चों का स्कूल

संथाल आदिवासी बच्चों का स्कूल
- बाबा मायाराम

जब हम गाँवों में जाते थे, नागरिक अधिकारों पर बात करते थे, लिखा हुआ दिखाते थे, तो लोग पूरी तरह समझ नहीं पाते थे, मन में शंका रह जाती थी। हमें महसूस हुआ कि यह शिक्षा की कमी की वजह से है। इसलिए हमने तय किया कि हम अगली पीढ़ी को शिक्षित करेंगे, यहीं से बच्चों के स्कूल की सोच बनी और यह स्कूल बना। यह रेवा मुरमू थीं, जो मुझे उनके गाँव के स्कूल की कहानी सुना रही थीं।
पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले के गाँव छाचनपुर में यह स्कूल स्थित है। इस स्कूल का नाम लक्ष्मी मुरमू स्मृति शिशु विद्यालय है। कोलकाता के पश्चिम में 250 किलोमीटर दूरी पर यह गाँव है। छाचनपुर, एक छोटा संथाली गाँव है।  दारकेश्वर नदी के किनारे बसा है। यही नदी साल के जंगल और गाँव को विभक्त करती है।
मैं इस स्कूल को देखने 21 सितंबर (2019) को गया था। मध्यप्रदेश से कोलकाता ट्रेन से लम्बी यात्रा की थी। कोलकाता से छातना गया और फिर वहाँ से छाचनपुर पहुँचा। दिल्ली के आंबेडकर विश्वविद्यालय में एम. फिल. की छात्रा अंकिता सान्याल के साथ मैं गया था। अंकिता, उनके फील्ड वर्क के लिए छाचनपुर आती रहती हैं। इस चार घंटे की ट्रेन यात्रा में हमने मसाला नींबू चाय का खूब आनंद लिया। मुझे यहाँ की झालमुड़ी भी पसंद है, जो उस दिन नहीं मिली।
उस दिन मौसम साफ व खुशनुमा था। आकाश में सफेद बादलों के गाले छितरे हुए थे। सुसनिया पहाड़ गहरा हरा दिख रहा था। कहीं भी हो, पहाड़ सदैव आत्मा पर छा जाते हैं। मेरी नजरें बार-बार पहाड़ पर जाकर टिक जाती थीं। धान के हरे-भरे खेत लहलहा रहे थे। लेकिन बारिश कम होने से यहाँ धान की खेती कमजोर थी। वहीं दूसरी ओर मध्यप्रदेश में हम अति वर्षा से फसलें बर्बाद हुई हैं। यह विचार आते ही मैं थोड़ा मायूस हो गया।
इस स्कूल की कहानी शुरू होती है एक सपने से, जिसे दो आदिवासी युवतियों ने देखा था। ये थीं लक्ष्मी मुरमू और रेवा मुरमू। दोनों ही संथाल आदिवासी और गाँव में उनके समुदाय में पहली पीढ़ी की पढ़ी लिखी लड़कियाँ थीं। दोनों ने ही कक्षा 10 तक पढ़ाई की थी। रेवा ने तो बाद में अनौपचारिक तरीके से पढ़ाई पूरी की।
यह दोनों दोस्त पुरूलिया जिले में स्वयं सहायता समूह ( एस.एस.जी.) का काम करती थीं। लेकिन इस दौरान उन्हें महसूस हुआ कि उनकी बातें पूरी तरह गाँववाले नहीं समझ पाते हैं। अगर पर्चों व किताब में लिखा हुआ बताते हैं तो वे पढ़ नहीं पाते, इसका एक कारण उन्हें शिक्षा से वंचित होना लगा।
रेवा मुरमू, छाचनपुर गाँव की थीं और लक्ष्मी मुरमू हापनिया गाँव की, जो छाचनपुर से 25 किलोमीटर दूर है। रेवा की मुलाकात लक्ष्मी से तब हुई जब वे वर्ष 1998 में पुरूलिया के एक गाँव में गैर सरकारी संस्था में काम करती थीं। वे यहाँ संथाली महिलाओं के साथ स्वयं सहायता समूह में काम करती थीं।
रेवा और लक्ष्मी खुद भी संथाली आदिवासी थीं, इसलिए जल्द ही उनका महिलाओं के साथ अच्छा रिश्ता बन गया। वे उनमें घुल मिल गईं। उनकी पहल से यहाँ महिलाओं में जागरूकता आई। उनका काम बहुत अच्छा चल रहा था कि अचानक संस्था का काम छूट गया। 
कुछ समय बाद दोनों छाचनपुर आ गईं, जो रेवा का गाँव था। यहाँ उन्होंने घर बनाने के लिए जमीन खरीदी और धीरे-धीरे खुद अपने हाथों से कच्चा मिट्टी का घर बनाया। घर आँगन की लिपाई पुताई की। थोड़ी स्थिति संभली तो फिर बच्चों को पढ़ाने का सपना जागा, अनौपचारिक स्कूल चलने लगा।
छाचनपुर में 43 घर हैं। छोटे-छोटे मिट्टी के खपरैल वाले और कहीं घास-फूस की झोपड़ियाँ भी। सुघड़ और साफ-सुथरे। घरों के आगे पीछे हरे-भरे पेड़ पौधे हैं और हरी सब्जियाँ भी। यहाँ एक तालाब भी है। जो पश्चिम बंगाल की संस्कृति का हिस्सा है। यहाँ हर गाँव में पोखर तालाब होते हैं। मछली-भात  ( माछ-भात, भात यानी चावल) यहाँ का प्रमुख भोजन है। यहाँ की अधिकांश आबादी गाँवों में रहती है। 
यहाँ स्कूल नहीं है, 5 किलोमीटर दूर डुमडुमी गाँव जाना पड़ता है। ज्यादातर आदिवासी छोटे किसान हैं या मजदूरी करते हैं। सभी आदिवासी हैं, दो परिवार करमाकर के हैं। सरई पत्ता से दोना पत्तल बनाकर बेचते थे। सरकारी स्कूल में पढ़ाई का स्तर अच्छा नहीं है।
मैंने अंकिता के साथ गाँव का एक चक्कर लगाया। लोगों से मिला, बातें कीं। यहाँ के बुजुर्ग लखीराम हेम्राब ने बताया कि पहले यहाँ शांति थी, सुकून था, अब चीजों की भूख बढ़ गई है। पहले हम कम चीजों से ही काम चला लेते थे।” 
यह इलाका पहले जंगल से आच्छादित था। साल का घना जंगल था। अब उजड़ गया है। आदिवासियों का जीवन पूरी तरह जंगल पर ही आधारित है। तेंदू, जाम, आम जैसे फल मिलते थे। जड़ी-बूटियों से लोग छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज कर लेते थे। रेवा के पिता खुद जड़ी-बूटी के जानकार थे।  यानी आदिवासियों के पास जंगल, पेड़ पौधे, जड़ी-बूटी का पारंपरिक ज्ञान, जैव विविधता की जानकारी और पर्यावरण संरक्षण की परंपरा थी। जब जंगल नहीं रहा तो अधिकांश लोग मजदूरी करने लगे।
रेवा मुरमू बताती हैं कि इन स्कूलों में एक संथाली भाषा नहीं पढ़ाई जाती, इसलिए हमारे बच्चों को भाषा की दिक्कत का सामना करना पड़ता है। वे संथाली जानते हैं और पढ़ाई होती है बांग्ला में, इसलिए वे समझ नहीं पाते हैं। दूसरी बात यह है कि 5 वीं कक्षा के छात्र ठीक से लिख-पढ़ नहीं सकते, यानी वे स्कूल तो जाते हैं, पर वहाँ ठीक से पढ़ाई नहीं होती। इसलिए हमने बच्चों की पढ़ाई शुरू की।
शाम को जब काम धंधे से बच्चे घर लौटते तो वे रेवा के घर इकट्ठे होते, गपशप करते और पढ़ते। स्कूल चलने लगा। लेकिन इस बीच एक झटका तब लगा जब लक्ष्मी मुरमू को कैंसर हो गया और उनकी वर्ष २०१३ में असमय मृत्यु हो गई ।
लेकिन रेवा मुरमू ने हिम्मत नहीं हारी। उन्हें एक्शन एड नामक संस्था से फैलोशिप मिली और अरूणपोल सील का साथ भी, जो एक्शन एड से जुड़े थे। अरूणोपोल जैसे संवेदनशील युवा शोधकर्ता का साथ मिलने से फिर स्कूल की रचनात्मक सोच को पंख लग गए।
अनौपचारिक शिक्षा के काम में कई व्यक्तियों व संस्थाओं ने सहयोग किया। कोलकाता के गाँधीवादी कार्यकर्ता काजल सेनगुप्ता ने इसमें मदद की। उन्होंने शिक्षा की इस पहल पर लेख लिखा जिसका असर हुआ कि किशोर भारती ट्रस्ट भी इस काम में जुड़ गया। इस ट्रस्ट के सदस्यों ने यहाँ का दौरा किया और इस काम में मदद करने का निर्णय लिया। शैक्षणिक पाठ्यक्रम तैयार करने में और आर्थिक रूप से भी सहयोग किया। और अंत में तय किया गया कि लक्ष्मी मुरमू की याद में एक स्कूल शुरू किया जाए, क्योंकि वह संथाली समुदाय में सामाजिक बदलाव की एक प्रेरणा बन गई थी।
इस स्कूल का नाम भी लक्ष्मी मुरमू की याद में रखा गया- लक्ष्मी मुरमू स्मृति शिशु विद्यालय। इसकी शुरूआत 26 जनवरी, 2015 में हुई।
यह एक छाचनपुर और पड़ोसी गाँवों के लोगों के लिए यह एक सामूहिक प्रयास है। यह संथाली बच्चों का स्कूल है, जिसकी पहल गाँव की ही आदिवासी महिलाओं ने की थी। यह एक ऐसा स्कूल है जिसे आदिवासी महिलाएँ चला रही हैं। लोहार और करमाकर समुदाय की महिलाओं का भी सहयोग है। इस स्कूल का मुख्य जोर आदिवासी और हाशिये के समुदायों के बच्चों को पढ़ाना है, जो अब तक शिक्षा से वंचित रहे हैं।
इस संस्था का उद्देश्य है ऐसा अनुकूल वातावरण बनाना जिसमें छाचनपुर और उसके आसपास के गाँव की महिलाएँ एक साथ बैठकर उनकी उम्मीदें, सोच, सपने, दुख-दर्द और समस्याओं पर बात कर सकें। इस पर चर्चा करना कि किस तरह उनकी आदिवासी संस्कृति दूसरी ओर मुड़ रहीं है, जो सालों से विकसित हुई थी। समुदाय में विकास और सेवाओं से जुड़ी जागरूकता पैदा करना और इस पर बातचीत के लिए अनुकूल माहौल बनाना। सामूहिक रूप से वैकल्पिक ढाँचा विकसित करना जिसमें सामूहिक खेती, किचिन गार्डन, शिक्षा के बारे में विचार करना। यहाँ स्कूल परिसर में नींबू, लीची, कटहल, आम, दालिम, कमरंगा, खजूर, पीपल, कनेर, नीम आदि के पेड़ लगे हैं। स्कूल के किचन गार्डन में भिंडी, करेला, बरबटी, फूलगोभी, बंद गोभी, कद्दू, लौकी, टमाटर, खीरा है। स्कूल में दोपहर का भोजन दिया जाता है, जिसमें इस सब्जी का इस्तेमाल होता है।
इस स्कूल में शिक्षण पद्धति में खासतौर पर ध्यान दिया जाता है-
परिवेश का अध्ययन- आसपास के वातावरण, नदी, नाले, पेड़ पौधे, जंगल और वनस्पतियों का अध्ययन।
बांग्ला भाषा- पहली कक्षा से ही बांग्ला भाषा में अक्षर ज्ञान और पढ़ना लिखना सिखाया जाता है।
गणित- अंक पहचानना और सरल गणित सिखाना।
क्षेत्रीय संस्कृति- नृत्य औऱ लोकगीत।
अंग्रेजी- अंग्रेजी के अक्षर और कहानियाँ पढ़ना- लिखना।
यहाँ संथाली भाषा की लिपि ओलचिकी ( संथाली लिपि) भी सिखाई जाती है। इस भाषा के जानकार शिक्षक भी यहाँ हैं।
वर्तमान में यहाँ 3 से 9 वर्ष तक के बच्चे पढ़ते हैं। कक्षा 4 तक स्कूल है जिसमें 92 बच्चे हैं। स्कूल का संचालन छाचनपुर महिला कल्याण समिति करती है। इस समिति में 11 सदस्य हैं। स्कूल में अब 4 नए कमरे बन गए हैं। शौचालय है, कुआँ है। जिस जमीन पर स्कूल है, उसे खरीदा गया है। छाचनपुर महिला कल्याण समिति के नाम पर जमीन है।
इस स्कूल में प्रतिमाह 100 रू. शुल्क है। रेवा मुरमू बताती हैं कि इन परिवारों की हालत ऐसी है कि वे बच्चों के लिए यूनिफार्म नहीं खरीद पाते। एक चौथाई बच्चे फीस भी नहीं दे पाते।
इस स्कूल में 10 से किलोमीटर दूर गाँव के बच्चे आते हैं। मुसिदीही, तामीलीपाड़ा, सुअराबकड़ा, लेदापोलाश, रांगागोड़ा, लोहा गढ़, खरबना, धौडांगा, घोषेरग्राम, मनकाडीह, दोलपुर, दुमदुमी आदि। स्कूल की गाड़ी है, जो दूर गाँव के बच्चों को घर से लाती है, छोड़ती है।
किशोर भारती ट्रस्ट फार एजूकेशन रिसर्च संस्था ने पाठयक्रम बनाया है। छाचनपुर महिला कल्याण समिति के नाम से स्कूल का बैंक अकाउंट है। इसके अलावा, अंकुर कला ने भी मदद की है। यह महिला कल्याण समिति महिला सशक्तीकरण का काम करती है। आजीविका और महिला अधिकारों पर जागरूकता लाने का काम करती है।
इस स्कूल में 6 शिक्षक हैं। माला तुडु, रीना तुडू, संदीप मंडल, प्रदीप बाघ, गौर चंद्र मंडल और सौमित्र मंडल हैं। इसके अलावा, कुछ रिसर्च फैलो और इंटर्न भी हैं, जो समय समय पर यहाँ आकर रिसर्च करते हैं और स्कूल में मदद करते हैं। सिंदुनिल चटर्जी, अंकिता सान्याल और देवारती कुन्डू हैं। अंकिता सान्याल इनमें से एक हैं, जो साल में करीब 6 महीने यहाँ रहकर बच्चों को पढ़ाती हैं और उनके साथ  शिक्षा की नई गतिविधियाँ करवाती हैं।
इस स्कूल की एक छोटी लायब्रेरी है, जो विकसित हो रही है। अभी इस लायब्रेरी में 700 किताबें हैं जिनमें कहानी, कविता, नाटक की बांग्ला और अंग्रेजी किताबें उपलब्ध हैं।
किताबों के अलावा यहाँ बच्चों को गतिविधि आधारित सीखने-सिखाने पर जोर दिया जाता है। अंकिता सान्याल ने बच्चों के साथ कई नए प्रयोग किए हैं, जिसमें बच्चों को मजा भी आता है। सीखते भी हैं। जैसे पत्थरों को रंग लगाना, छोटे से बड़े क्रम में जमाना। पीपल की पत्तियों को गलाकर उसे रंगना और उससे पत्तों में प्रकाश संश्लेषण और वाष्पीकरण की प्रक्रिया को समझना। खेल खेल में फलों, पत्तों व सब्जियों के नाम जानना और लिखना।
मुझे यहाँ की अपराजिता मुरमू, अंजली सोरेन, सुजाता मोदीकोडा, शिवानी टुडू, पूजा मुरमू आदि बच्चों ने रंग किए पत्थर दिखाए। पीपल के रंगीन सुंदर पत्ते दिखाए और कविताएँ सुनाईँ। वे कहानी को नाटक के रूप में भी खेलते हैं। शिक्षक गौर चंद्र मंडल ने बताया कि आदिवासी बच्चे अन्य बच्चों की अपेक्षा ज्यादा ध्यान से पढ़ते हैं।
इस स्कूल की सोच गाँधी और टेगौर से प्रभावित है। सोच यह है कि गाँव के बच्चे, गाँव की परिस्थिति में पढ़े, और श्रम के कामों से भी जुड़े, उसी से सीखें भी। जो गाँधी की नई तालीम की भी सोच रही है। गाँधीवादी काजल सेन गुप्ता जैसे लोगों के जुड़ने का भी सीधा असर शैक्षणिक पद्धति पर दिखता है। जबकि मुख्यधारा के शासकीय स्कूल हाथ से काम करने को तरजीह नहीं देते हैं।
स्कूल के कमरे इस तरह से बने हैं कि बच्चों और प्रकृति का सीधा रिश्ता बने। स्कूल की दीवारें तीन-चार फुट ही ऊँची है, जिससे बच्चे स्कूल की दीवारों के अंदर कैद न हो। वे पेड़ पौधे, फूल, पत्ते, चिड़िया और खुला आसमान देख सकें। जो आदिवासी जीवन में सहज है। क्योंकि आदिवासियों का पूरा जीवन प्रकृति पर ही है। यह टेगौर की शिक्षा दर्शन से मेल खाती है। शांतिनिकेतन में आज भी पेड़ों के नीचे कक्षाओं में पढ़ाई होती है। टेगौर ने भी संथाली आदिवासियों से बहुत कुछ सीखा था। उनकी लोक कला, प्रकृति के साथ सहअस्तित्व, गीत, नृत्य आदि से टेगौर बहुत प्रभावित थे।
यहाँ कहना उचित होगा कि अधिकांश लोगों की जिंदगी जीवन की आपाधापी और जीविकोपार्जन में ही गुजर जाती है, जिसके कारण वे शिक्षा, साहित्य, संगीत आदि से वंचित रह जाते हैं। जैसे ही लोगों की स्थिति संभलती है वे शिक्षा की ओर मुड़ते हैं। छाचनपुर में जैसे शिक्षा की भूख जगी है, वह अब जगह देखी जा रही है। स्कूल भी हैं, पर उनमें से ज्यादातर में शिक्षा प्राप्त करने का माहौल नहीं है।
कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि छाचनपुर का स्कूल कई मायनों में अलग है। एक तो यहाँ के सभी शिक्षक स्थानीय हैं, स्थानीय ज्ञान, परिवेश, गाँव कृषि संस्कृति की समझ बनाई जा रही है। आदिवासी संस्कृति जो सबको जोड़ती है, जिसमें सामूहिकता है, सहकार है, एक दूसरे की मदद करने की परंपरा है, उसे फिर से स्थापित किया जा रहा है। गाँधी की नई तालीम जिसमें हाथ से उत्पादक काम कर सीखने पर जोर दिया जाता है, इस ओर प्रयास किया जा रहा है। आधुनिक शिक्षा में जहाँ हाथ से, श्रम को तरजीह नहीं दी जाती है, यहाँ इस पर जोर दिया जाता है। आदिवासियत, जो कम ऊर्जा में, कम संसाधनों में बहुत सुघड़ और सादगी से जीवन जीने की पद्धति है, उसे वापस लाया जा रहा है। एक और बात है वह स्थानीय शिक्षकों की प्रतिबद्धता, वे बहुत ही कम वेतन पर आदिवासियों की पहली पीढ़ी को शिक्षित कर रहे हैं, यह मिसाल है। इस स्कूल के बच्चे जंगल, जैव विविधता, पर्यावरण की समृद्ध विरासत को सहेज सकें, यह प्रयास किया जा रहा है। यहाँ 4-5 वीं कक्षाओं में शासकीय पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है, जिससे ये पढ़कर दूसरे स्कूलों में जाएँ तो उन्हें दिक्कत नहीं आती।
चूंकि यह प्रयास नया है, अभी कुछ भी निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। कुछ चुनौतियाँ भी हैं। जैसे समुदाय आधारित संस्कृति व मूल्यों की वापसी, अभिभावक भी बच्चों को हाथ से काम करने को अभी अच्छा नहीं मानते। किताबी ज्ञान की जगह गतिविधि आधारित ज्ञान से सीखना। पारंपरिक ज्ञान को मान्यता दिलाना।  लगातार स्कूल का प्रबंधन करना, आर्थिक मदद जुटाना आदि।  लेकिन इन सबके बावजूद स्कूल चल रहा है, यह बड़ी उम्मीद है। (विकल्प संगम से साभार)