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Oct 27, 2012

मोहब्बत करने वाले कम न होंगे,

 7 अक्टूबर- जन्म दिवस: बेगम अख्तर की खनकती यादें

- प्रताप सिंह राठौर 
 मोहब्बत करने वाले कम न होंगे
 तेरी महफिल में लेकिन हम न होंगे
जिन चुनिन्दा ग़ज़ल गायक- गायिकाओं ने भारत में ग़ज़ल गायन की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए बहुत शोहरत पाई, उनमें पद्यभूषण की उपाधि से विभूषित बेगम अख्तर का नाम बड़े ही सम्मान से साथ लिया जाता है। लगभग 50 वर्षों तक  गायन के द्वारा वे अपार जन समूह का मनोरंजन करती रहीं। बेगम अख्तर के गले में वह हुनर था कि वे महफिल में बैठे हजारों का मन मोह लेती थीं। ऐसे में स्वाभाविक ही है कि उनके अनगिनत प्रशंसकों में से कुछ मर्द बेगम का भी मन मोह लें। जब तक आजाद परी की तरह अख्तरी बाई फैजाबादी कभी इस डार पर तो कभी उस डार पर बैठ कर अपनी सुरीली तान छेड़ती रहीं, उनकी ख्याति दिन दूरी रात चौगुनी बढ़ती गई।
7 अक्टूबर 1914 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में जन्म लेने के कारण वे गायन क्षेत्र में अख्तरी बाई फैजाबादी के नाम से मशहूर हुई। अता मोहम्मद खाँ तथा अब्दुल वहीद खाँ से संगीत शिक्षा प्राप्त की। बाद में झंडे खाँ उनके गुरु बने नरगिस की संगीत प्रवीण माँ जद्दन बाई से प्रभावित हो कर ठुमरी गायन की ओर आकर्षित हुई। परिवार बिखरा तो वे कलकत्ता पहुँच गई। कड़ी दिनचर्या और सतत कठिन साधना रंग लाई। पहली बार जब बिहार भूकंप पीडि़त सहायता कोष के लिए आयोजित कार्यक्रम में एकत्र अपार जन समूह के सामने उपस्थित हुई, तो घबरा गई; लेकिन हिम्मत करके आलाप लेते हुए- तूने बुते हरजाई कुछ ऐसी अदा पाई, तकता है तेरी सूरत हर एक तमाशाई .... ग़ज़ल पेश की तो वाह-वाह और तालियों से जनता ने भरपूर स्वागत किया। उनके गायन से प्रभावित होकर श्रोताओं के हुजूम से उठकर आने वाली श्रीमती सरोजिनी नायडू ने प्रशंसा करते हुए उन्हें खादी की साड़ी भेंट की। कठोर और नियमित संगीत साधना से उनका आत्मविश्वास बढ़ता रहा। उनके गायन की लोकप्रियता से प्रभावित होकर मेगाफोन रिकार्ड कंपनी ने उनका पहला रेकार्ड 'वह असीरे- बला हूँ मैं...जारी किया। अख्तरी बाई के गायन-गज़ल, दादरा एवं ठुमरी के अनेकों रिकार्ड मेगाफोन कंपनी ने जारी किए जो बहुत मशहूर हुए। बाद में उन्होंने बहजाद लखनवी की ग़ज़ल 'दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे, वर्ना तकदीर कहीं तमाशा न बना दे... गाई। इसकी रिकार्डिंग में उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ने सारंगी पर संगत की थी। मेगाफोन ने दुर्गा पूजा के अवसर पर कलकत्ता में जब इस रिकार्ड को प्रस्तुत किया तो इसने बिक्री के सारे रिकार्ड तोड़ दिए और इसे प्लेटिनम डिस्क की पदवी मिली। अख्तरी बाई फैजाबादी का नाम संगीत प्रेमियों की जबान पर चढ़ गया। यहीं से अख्तरी बाई सफलता की सीढिय़ाँ तेजी से चढऩे लगीं। थियेटर और सिनेमा के साथ-साथ राज दरबारों में मुजरा करके धन-दौलत और हीरे जवाहरात से आभूषित होने लगीं। साथ ही सिगरेट और शराब भी उनकी जीवनचर्या के अनिवार्य अंग बन गए।
अख्तरी बाई के सुरीले गले ने थियेटर वालों को भी आकर्षित किया और कलकत्ता के कोरिन्थियन थियेटर ने उन्हें 300/-  रुपए प्रतिमाह पर अनुबन्धित कर लिया। अख्तरी बाई पहली बार 'नई दुल्हननाटक में एक परी के रोल में प्रगट हुई। इस  नाटक में उस समय के सबसे प्रसिद्ध मंच कलाकार मास्टर फिदा हुसैन 'नरसी हीरो थे। इस नाटक में अख्तरी बाई ने उस्ताद झंडे खाँ के संगीत निर्देशन में 7 गाने गाए थे। दर्शकों ने अख्तरी बाई के अभिनय और गायन को इतना पसंद किया कि वे प्रत्येक शो में उनके गानों को बार-बार सुनने की फरमाइश करते थे जिसके कारण प्रत्येक शो का समय निर्धारित समय से ज्यादा देर तक चलता था। पहले नाटक से ही अख्तरी बाई ने धूम मचा दी। इसके बाद तो अख्तरी बाई ने उस समय के उर्दू शेक्सपियर कहे जाने वाले गीतकार, नाटककार आगा हश्र कश्मीरी लिखित अनेक नाटकों, जैसे शीरीं फरहाद, नल दमयन्ती, मेनका अप्सरा, लैला मजनूं, श्रवण कुमार, नूरे- वतन, इत्यादि में काम किया। अख्तरी बाई अभिनेत्री के रूप में भी मशहूर हो गई।
यही वह दशक था जिसमें भारत में सवाक् फिल्मों का आविर्भाव हुआ था। तुरंत ही कलकत्ता की ईस्ट इंडिया फिल्म कंपनी ने इस मशहूर गायिका अभिनेत्री को 500/- रुपए प्रतिमाह पर अनुबन्धित कर लिया और उनकी पहली फिल्म आई एक दिन का बादशाह (1933) समझा जाता है कि इस फिल्म में 7 गाने थे जो सभी अख्तरी बाई ने गाए थे। इन गानों के रेकार्ड मेगाफोन ने जारी किए थे। फिल्म तो नहीं चली परंतु मेगाफोन के रेकार्ड खूब बिके और अख्तरी बाई को रायल्टी के रूप में बड़ी रकम मिली। इसके बाद 1933 से 1940 के बीच अख्तरी बाई की अनेक फिल्में जैसे- नल दमयन्ती (33), अमीना (34), मुमताज बेगम (34), रूप कुमारी (34) जवानी का नशा (35, नसीब का चक्कर(36) और अनारबाला(40) एक के बाद एक आई और बॉक्स ऑफिस पर भी सफल सिद्ध हुई।
अब तक अख्तरी बाई फैजाबादी शोहरत और समृद्धि के चरम शिखर पर पहुँच चुकी थीं। इसीलिए महबूब खाँ ने सन् 1942 में उन्हें अपनी फिल्म रोटी के लिए चंद्रमोहन, शेख मुख्तार और सितारा देवी के साथ चुना। इस फिल्म के लिए संगीतकार अनिल बिस्वास ने अख्तरी बाई के 6 गाने रिकार्ड किए। महबूब खाँ ने फिल्म के संगीत का अधिकार हिज मास्टर्स वायस यानी एचएमवी को दे रखा था। परंतु अख्तरी बाई के गाए सभी गीतों को ग्रामोफोन रिकार्डों पर जारी करने का अधिकार केवल मेगाफोन कंपनी के पास था। अत: मेगाफोन कंपनी ने कानूनी दाँव चला। परिणामत: फिल्म से अख्तरी बाई के गाए सभी 6 गाने तो काट दिए गए लेकिन इन्हें मेगाफोन कं. ने अपने द्वारा निर्मित 78 आरपीएम रिकार्डों पर जारी कर दिया। रोटी (1942) अख्तरी बाई के साभिनय गायन की अंतिम हिन्दी फिल्म थी। सन् 1945 में संगीतकार ज्ञानदत्त ने फिल्म पन्नादाई में उनके पार्श्वगायन की एक ग़ज़ल रिकार्ड की थी- फसले- गुल आई, हमें याद तेरी सताने लगी... इसके बाद सिर्फ एक बार सत्यजीत रे की बंगला फिल्म जलसाघर (1958) में अख्तरी बाई मुजरे में उस्ताद विलायत खाँ के संगीत निर्देशन में कजरी गाती दिखाई दी थीं। कजरी के बोल थे 'भर आई मोरी अँखियाँ पिया बिन, घिर-घिर आई कारी बदरिया, जरत मोरी छतियाँ...पार्श्वगायिका के रूप में हिन्दी फिल्मों में आखिरी बार फिल्म दाना पानी 'ऐ इश्क मुझे और तो कुछ याद नहीं...और एहसान 'हमें दिल में बसा भी लो... यह कहती है जवाँ नजरें के लिए अख्तरी फैजाबादी ने ग़ज़लें गाई थीं।
ख्याति के शिखर पर पहुँच कर अख्तरी बाई फैजाबादी ने महसूस किया कि समाज, संगीत के बाजार की मलिका को उसके रंग रूप और गले कि लिए सिर्फ सराहता है जबकि वास्तविक सम्मान सिर्फ एक विवाहित महिला को ही देता है। अत: उन्होंने अख्तरी बाई फैजाबादी से बेगम अख्तर बनने की सोची। इस दिशा में पहला कदम उठाते हुए उन्होंने निकाह करने का पैगाम मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी को भेजा। जिगर मुरादाबादी ने उनके पैगाम को ठुकरा दिया। इसके बाद उन्होंने लखनऊ के बैरिस्टर इश्तियाक अहमद से निकाह कर लिया। लेकिन धन दौलत की बौछार के साथ-साथ प्रशंसकों की तालियों की गडग़ड़ाहट के बल पर शोहरत के आसमान में उडऩे वाले पंछी के सामाजिक सम्मान के ताने-बाने से बने घरेलू पिंजड़े में बंद हो जाने के परिणाम अक्सर घातक होते हैं। समाज-स्वीकृत संतान की चाहत में वर्षों तक असफल रहने के कारण बेगम अख्तर डिप्रेशन की शिकार होकर गंभीर रूप से बीमार हो गईं। बेगम अख्तर की मानसिक स्थिति उन्हीं की गाई इस बेहद मशहूर ग़ज़ल से समझी जा सकती है- 'हमने तो सोचा था बरसात में बरसेगी शराब, आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया...।
डॉक्टरों ने सलाह दी कि बेगम साहिबा की जान बचाने के लिए आवश्यक है कि इन्हें फिर जनता के बीच गाने का अवसर दिया जाए। लेकिन अब्बासी साहब के परिवार में अवध के नवाबी खानदान के तौर तरीकों की मान्यता थी; जिसके अनुसार परिवार की स्त्रियाँ परदे में रहती थीं, अत: यह निश्चित हुआ कि बेगम साहिबा उत्तर प्रदेश में सिर्फ ऑल इंडिया रेडियो, लखनऊ से गाएँगी, वह भी बेगम अख्तर के नाम से (जबकि  बैरिस्टर इश्तियाक अहमद अब्बासी की पत्नी होने के नाते उन्हें बेगम अब्बासी के नाम से संबोधित किया जाना चाहिए था) और यह बंदिश भी कि वे स्टेज पर कभी नहीं गाएँगी।
इस प्रकार से अख्तरी बाई फैजाबादी से बेगम अख्तर बन कर बेगम साहिबा के मलिका-ए- ग़ज़ल के रूप में भारतीय संगीत जगत में जगमगाने का दौर शुरु हुआ। उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो, लखनऊ से नियमित रूप से सन् 1949 से गाना शुरु किया। दिलचस्प बात यह है कि इसी समय मदन मोहन ( जो बाद में फिल्म जगत में मशहूर संगीत निर्देशक बने) बेगम साहिबा के साथ हारमोनियम पर संगत करते थे। इसी के साथ बेगम साहिबा ने मुम्बई, कलकत्ता, दिल्ली, हैदराबाद इत्यादि बड़े शहरों में अपने गायन के कार्यक्रम प्रस्तुत करना शुरू किया और एचएमवी के लिए गीतों के अनेक एलपी रेकार्ड कराए। कराची में उनको प्रसिद्ध दादरा- 'आओ सजन तुम हमरे दुआरे, झगड़ा सारा खत्म हुई जाय...जनता की फरमाइश पर बार- बार सुनाना पड़ा। इतना सब होते हुए भी वह दिल से बेहद अकेलापन महसूस करती थीं। नि:संतान होने का दर्द उन्हें ताउम्र सालता रहा। संगीत सभाओं के बाद लोगों ने उन्हें फूट- फूट कर रोते देखा था। वे सारी जनता को, अपने संगीत को, अपनी संतान जितना प्यार देती रहीं लेकिन अपने दर्द को शराब के प्यालों में डुबोती रहीं। उनका स्वर कानों में हमेशा गूँजता रहेगा-  
'मोहब्बत करने वाले कम न होंगे,
तेरी महफिल में लेकिन हम न होंगे...
सुश्री रीता गांगुली, जो पहले सिद्धेश्वरी बाई की शार्गिद थीं, 1967 में बेगम अख्तर की शागिर्दा बनीं। बेगम साहिबा को भारत सरकार ने सन् 1968 में पद्मश्री की उपाधि से विभूषित किया था। अक्टूबर 1974 में बेगम अख्तर अहमदाबाद में कार्यक्रम करने के लिए पहुँची और वहीं एक होटल में 30 अक्टूबर 1974 को मात्र 60 वर्ष की आयु में ही उन्होंने हृदय आघात से प्राण त्याग दिए। भारत सरकार ने बेगम साहिबा को 1975 में पद्मभूषण (मरणोपरान्त) की उपाधि प्रदान की। मृत्यु से मात्र 8 दिन पूर्व यानी 22 अक्टूबर 1974 को कैफी आजमी की लिखी हुई ये गज़ल आखिरी बार उनकी आवाज में रिकार्ड की गई थी- 'सुना करो मेरी जाँ उनसे उनके अफसाने, सब अजनबी हैं यहाँ किसको कौन पहचाने...
ऐसी हस्तियाँ  मरा नहीं करतीं बल्कि अपने स्वरों द्वारा संगीत प्रेमियों के दिलों में हमेशा जीवित रहती हैं।
बेगम अख्तर की शागिर्दा रीता गांगुली द्वारा अंग्रेजी में लिखी पुस्तक ए मोहब्बत... वास्तव में 'टू इन वनसरंचना है, मलिका-ए-ग़ज़ल बेगम अख्तर की जीवनी के साथ-साथ यह रीता गांगुली की आत्मकथा भी है जिसमें उन्होंने इस कलाकार के साथ बिताए कुछ वर्षों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जन्मजात प्रतिभा के धनी कलाकार असाधारण व्यक्तित्व वाले होते हैंउन्हें मध्यमवर्गीय नैतिकता के तराजू पर तौलना बेमानी है। बेगम अख्तर की जीवनी से यह स्पष्ट संदेश मिलता है कि सिर्फ प्रतिभा से ही कोई कलाकर सफल नहीं हो सकता। प्रतिभा के साथ-साथ लगन और भरपूर आत्मविश्वास का होना भी अनिवार्य है। जिस व्यक्ति में प्रतिभा के साथ लगन और आत्मविश्वास भी समुचित मात्रा में मौजूद हो, वही कला के इतिहास में आकाश में सितारा बन कर चमकता है। तवायफ अख्तरी बाई फैजाबादी के तेरह वर्ष की उमर में अविवाहित माँ बनने से मलिका-ए-ग़ज़ल बेगम अख्तर बनने की कथा में रीता गांगुली ने बेगम के जगमगाते कलात्मक व्यक्तित्व को मध्यमवर्गीय चाल चलन के कपड़े पहनाने का प्रयत्न किया है।
वैसे तो इस पुस्तक में रीता गांगुली ने बेगम साहिबा से ज्यादा स्वयं के जीवन के बारे में लिखा है, फिर भी यह पुस्तक बेगम अख्तर के कई दुर्लभ चित्रों, संस्मरणों आदि के कारण संगीत प्रेमियों के लिए संग्रहणीय है- Ae Mohabbat... Reminiscing begum Akhtar by Rita Ganguly- pp 357 Rs. 695/- (Hard bound) stellar publishers, G-25, Vikas puri, New delhi 110018, phone- 01132001405 (लिस्नर्स बुलेटिन से साभार)
संपर्क: बी-403, सुमधुर-।। अपार्टमेन्ट्स, आजाद सोसायटी के पीछे,    अहमदाबाद- 380 015,  मो. 09428813277,  Email- psrathaur@yahoo.com

Feb 28, 2011

पं. भीमसेन जोशी

- प्रताप सिंह राठौर

पंडित जी जिस तन्मयता से गाते थे उसमें उनके हाथों और चेहरे की मुद्राएं देखकर स्पष्ट हो जाता था कि वे उन स्वरों को अपनी आत्मा की गहराइयों से                                                                                              निकाल कर ला रहे हैं।
पं. भीमसेन जोशी का शायद सबसे प्रिय भजन है 'जो भजे हरि को सदा, वो ही परमपद पाएगा'। पंडित जी के असंख्य भक्तों को भी यह भजन उनके बेमिसाल कंठ से निकला पावन प्रसाद लगता है। 4 फरवरी 1922 को धारवाड़, कर्नाटक में जन्में सुर सम्राट पं. भीमसेन जोशी 24 जनवरी 2011 को शास्त्रीय संगीत जगत में परमपद प्राप्त करके प्रात: 8.05 पर पुणे में चिरनिद्रा में सो गए।
एक संस्कृत शिक्षक की 16 संतानों में से एक पं. भीमसेन जोशी के शैशव या बाल्यकाल में ऐसा कुछ भी नहीं था जो उन्हें संगीत की ओर आकर्षित करता। वास्तव में तो घरेलू वातावरण संगीत में रूचि होने के विरुद्ध था। घर से स्कूल के रास्ते में ग्रामोफोन की दुकान पर बजते रेकार्ड से किराना घराना के उस्ताद करीम खां का गायन सुनकर बालक भीमसेन ने वैसा ही गायक बनने की ठान ली। और 11 वर्षीय बालक भीमसेन घर छोड़कर गुरु की खोज में निकल पड़े। तन पर सिर्फ दो कपड़े- नेकर और कमीज। जेब खाली।
ग्वालियर, कलकत्ता, लखनऊ, रामपुर वगैरह होते हुए वे संगीत गुरु की तलाश में वर्षों भटकते रहे। अमृतसर की वार्षिक म्यूजिक कान्फ्रेंस में बालक भीमसेन जोशी को अपनी तपस्या का मनोवांछित प्रसाद मिला। वहां इन्हें पता चला कि इनके मन की मुराद तो पुणे में किराना घराने के सवाई गंधर्व की शागिर्दी में पूरी होगी। बस फिर क्या था भीमसेन तनमन से सवाई गंधर्व के चरणों में बैठकर संगीत साधना में जुट गए।
उस्ताद करीम खाँ के शिष्य सवाई गंधर्व ने भीमसेन के अंदर भरी जन्मजात प्रतिभा को पहचाना और उसे निखारने हेतु उचित मार्गदर्शन किया। जिससे पं. भीमसेन जोशी संगीत जगत में संगीत मार्तण्ड बनकर चमके।
छह दशकों तक देश विदेश में अपने असंख्य प्रशंसकों को अपने गायन से मंत्रमुग्ध करने वाले पं. भीमसेन जोशी विलक्षण एवं अद्वितीय प्रतिभा के धनी थे। उन्हें मंच पर गायन करते देखना एक अविस्मीरणीय लोमहर्षक अनुभव होता था। पंडित जी जिस तन्मयता से गाते थे उसमें उनके हाथों और चेहरे की मुद्राएं देखकर स्पष्ट हो जाता था कि वे उन स्वरों को अपनी आत्मा की गहराइयों से निकाल कर ला रहे हैं। निस्संदेह पं. भीमसेन जोशी भारतीय शास्त्रीय संगीत के ऐसे अनुपम रत्न थे कि जिनके नाम के साथ जुड़कर भारतरत्न की पदवी सम्मानित होती है। पं. भीमसेन जोशी के असंख्य प्रशंसकों का (मेरा भी) यह विश्वास है कि वे देवी सरस्वती के ऐसे प्रिय पुत्र थे कि देवी स्वयं ही पं. भीमसेन जोशी के कंठ में निवास करती थीं।
पं. भीमसेन जोशी जैसी प्रतिभा के व्यक्तित्व और उपलब्धियों पर जब हम ध्यान देते हैं तो मन में एक प्रश्न उठता है कि प्रतिभा क्या होती है। क्या प्रतिभा की कोई परिभाषा है या हो सकती है? क्या था वह जिसने एक 11 वर्ष के बच्चे के मन में शास्त्रीय संगीत का गायक बनने की ललक भर दी जबकि उसके गरीब घरेलू माहौल में कुछ भी ऐसा नहीं था जो संगीत से दूर का भी रिश्ता रखता हो। शिक्षक पिता के नेतृत्व में घरेलू माहौल तो पूर्णतया जल्दी से जल्दी मैट्रिक तक पढ़कर रोजी- रोटी के जुगाड़ में जुट जाने को प्रेरित करने वाला था। परंतु भीमसेन जी के अंतकरण में कुछ ऐसी प्रतिभा थी जिसके साथ उनका जन्म हुआ था। असलियत तो ये है कि प्रतिभा कुछ ऐसी अवर्णनीय सक्षमता होती है जो किसी- किसी व्यक्ति में जन्मजात होती है। इसे परिभाषित नहीं किया जा सकता। लेकिन हां इसकी पहचान बताई जा सकती है। प्रतिभावान मनुष्य असाधारण व्यक्तित्व के धनी होते हैं और जाने पहचाने रास्तों पर न चलकर नई राह बनाते हैं। प्रतिभावान जिस कला को अपनाते हैं उस पर अपनी अमिट छाप छोड़ते है। पं. भीमसेन जोशी के व्यक्तित्व और जीवन में उपरोक्त सभी विशिष्टताएं जगमगाती हैं।
शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में पं. भीमसेन जोशी जैसी लोकप्रियता शायद ही किसी अन्य कलाकार ने पाई हो। पं. भीमसेन जोशी के असंख्य प्रशंसकों में अधिकांश ऐसे साधारण स्त्री- पुरुष हंै जो शास्त्रीय संगीत के व्याकरण से पूर्णतया अपरिचित है। पं. भीमसेन जोशी अपनी प्रतिभा के चमत्कार से $खयाल हो, अभंग हो, भजन हो या ठुमरी हो- आम श्रोताओं को भी मंत्रमुग्ध कर देते थे। जितने लोकप्रिय पंडितजी भारत में थे उतने ही लोकप्रिय वे विदेशों में भी थे। यही कारण है कि इंग्लैंड की विश्वप्रसिद्ध साप्ताहिक मैगजीन 'दि इकॉनामिस्ट' ने अपने पांच फरवरी 2011 के अंक में पं. भीमसेन जोशी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है।
पंडितजी वास्तव में 'भारतीय शास्त्रीय संगीत' की तरह
अमर हैं।
पता: बी-403, सुमधुर-2 अपार्टमेंट्स, आजाद सोसायटी के पास,
अहमदाबाद- 380015, फोन: 079- 26760367

Dec 25, 2010

यायावरी

ब्रूस मिलसम की  एक दिलचस्प समुद्री यात्रा
राह बनी जब मंजिल
- प्रताप सिंह राठौर
अपने जीवन को इस धरती पर एक तीर्थयात्रा मानने वाले यायावर मनुष्यों के व्यक्तित्व मुझे सदैव आकर्षित करते हैं। शायद इसलिए क्योंकि बचपन से ही मुझे यायावरी सर्वोत्तम मानवीय उद्यम लगने लगा था। यद्यपि कि मैं अपने जीवन में कभी- कभार ही देश- विदेश में यायावरी कर पाया हूं फिर भी चाहत आज भी उतनी ही तीव्र है। ऐसे में जब कभी भी कोई यायावर मिल जाता है तो उसके अनुभवों को सुनकर, जानकर सुखी होता हूं।
बात 1988 की है। मैं वाराणसी में रोजी- रोटी के चक्कर में था। वाराणासी विश्व में यायावरों के प्रिय स्थलों में ऊंचा स्थान रखता है। वहीं एक दिन एक अंग्रेज यायावर नवयुवक ब्रूस मिलसम से भेंट हुई। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके ब्रूस विश्व भ्रमण पर निकल पड़े। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने आस्ट्रेलिया को केंद्र बनाया। वे वहां पर 2-3 महीने काम करके इतना कमा लेते हैं कि वर्ष के शेष 9-10 महीने वे किसी देश का भ्रमण कर सकें या समुद्र में नौकायन करते हुए प्रशांत महासागर में फैले असंख्य टापुओं में भ्रमण का अनिर्वचनीय आनंद ले सकें। मेरे विचार में जीना इसी का नाम है। भारत भ्रमण के संबंध में ब्रूस को मेरे सुझाव बड़े उपयोगी लगे। तबसे वे अपने यायावरी के अनुभवों से पत्रों द्वारा मुझे अवगत कराने लगे। ऐसा ही एक पत्र, जिसमें ब्रूस ने न्यूजीलैंड के आसपास बिखरे टापुओं के बीच नौकायन का वर्णन किया है, का अनुवाद -
पिछले साल समुद्री तूफान में मस्तूल टूट जाने के कारण कैरियाड (ब्रूस की नाव का नाम) बुरी तरह टूट गई थी पर उसे फिर से मरम्मत करके नई जैसी कर लिया है और तब से मेरा समुद्री पर्यटन विचित्र तरह का, पर बहुत ही दिलचस्प रहा है। गर्मी तो (कैरियाड की मरम्मत में) गुजर गई। मैं अब जाड़े में साउथ आइलैंड का समुद्री भ्रमण कर रहा हूं।
गर्मियों में भी मैंने दूसरों की और अन्य मछुआरों की नौकाओं पर जितना हो सका समुद्री पर्यटन किया। मैं टापू के दक्षिणी आधे भाग के आस- पास कई बार गया और उत्तरी आधे भाग की भी कुछ यात्राएं की। मैंने पैदल भी यात्राएं की। मैं एक मित्र के फार्म पर कुछ दिन ठहरा जहां मैंने गायों को दुहने, भेड़ों को चराने तथा भूसा ढोने में उसकी सहायता की। मारापूरी झील में मछली मारने गया तथा दो ट्राउट मछलियां मारी।
वहां से लौटकर कैरियाड में फिर से समुद्री पर्यटन प्रारंभ किया। मेरी पहली यात्रा स्टुअर्ट आइलैंड की थी। मैं एक हफ्ता पैटरसन इनलेट में ठहरा। वहां मुझे दो नाविक और मिल गए और हम सब लोग टापू के चारों ओर नौका में घूमे, इसमें हमें 10 दिन लगे। एक नाविक जो अंग्रेज था, हम लोगों को छोड़कर अपनी यात्रा पर आगे बढ़ गया पर दूसरा नाविक डेव मेरे साथ फियोरलैंड में नौकायान के लिए रूका रहा। हम लोग 23 अप्रैल को मेरे तीसवें जन्मदिन पर नाव से अपनी यात्रा पर निकले। यहां पर पूर्व की ओर बहने वाली हवा का मिलना दुर्लभ होता है लेकिन इस समय हम लोगों की किस्मत बुलंद थी जहां हमें बढिय़ा पुरवइया मिली जो हमारी नाव को पूरे रास्ते तेजी से पश्चिमी तट तक ले गई। हम लोग सीधे डस्की साउन्ड तक गए, क्योंकि रास्ते में पडऩे वाले चॉकी साउन्ड और प्रीजरवेशन इनलेट में मैं पहले ही मछली मारने के लिए घूम चुका था। डस्की साउन्ड में दूसरे दिन हमने कैप्टन कुक (जिन्होंने 18वीं शताब्दी में आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की खोज की थी।) से संबंधित कुछ ऐतिहासिक स्थानों की खोजबीन की। फिर हम लोग ब्लफ़ (एक छोटा सा समुद्री बंदरगाह और मछुआरों की बस्ती) के एक मछुआरे के निमंत्रण पर उसकी नौका पर एक दिन भ्रमण के लिए गये। जब हम लोग समुद्र में थे तो एक नाविक का हाथ कट गया अत: उसे तुरंत हवाई जहाज से चिकित्सा के लिए भेजना पड़ा। उसकी दोस्त भी उसके साथ चली गई। तब कप्तान ने मुझसे और डेव से पूछा कि क्या हम बाकी दिनों में मछली मारने में उसके नाविक का काम करेंगे? हम लोग सहर्ष तैयार हो गये।
लेकिन मछली तो बिल्कुल भी नहीं पकड़ी जा सकीं। अचानक ही सब क्रेफिश अन्र्तध्यान हो गईं। इसलिए हम दोनों पैसा तो कोई खास न कमा सके लेकिन हम लोगों को भोजन मिलता रहा और डाउटफुल साउन्ड तक की मुफ्त सैर भी।
साथ ही एक फ्लोट प्लेन (समुद्र से उडऩे व समुद्र पर उतरने वाला वायुयान) से तेअनाऊ तक की यात्रा और वहां के होटल में एक रात ठहरने को भी मिला। जब हम मछली मार रहे थे तो हम लोगों ने डस्की साउन्ड की खोजबीन भी एक नौका से की। हम लोगों ने मछली मारने का तीन हफ्ते तक काम किया। फिर कप्तान अपनी नौका लेकर ब्लफ़ लौट गया। डेव ने भी तय किया कि उसने फियोरलैंड काफी घूम लिया था अत: वह भी उसी के साथ वापस चला गया।
पर मेरा मन अभी नहीं भरा था अत: एकेरन पैसेज के रास्ते उत्तर की ओर ब्रेकसी साउन्ड की ओर चल दिया। मैं ब्रेकसी साउन्ड के छोर तक गया जहां चारों ओर हिमाच्छादित पर्वत थे। वहां से मैं ब्रेकसी साउन्ड के मुहाने की ओर लौटा तथा एक 110 फीट लम्बे लोहे के जहाज रेन्गिमी के पास अपनी नौका का लंगर डाला। रैन्गिमी वहां पर सदैव के लिए लंगर डाले बंधी हुई है। इसका मालिक एक परिवार है जो उसका प्रयोग गोताखोरी, मछली मारने और मौज मस्ती में छुट्टियां बिताने के लिए करते हैं। स्कूलों की छुट्टियां थी अत: पूरा परिवार रैन्गिमी पर ही था। मैंने भी उनके साथ गोताखोरी की और उन्होंने बाद में मेरा ऑक्सीजन टैंक भी भर दिया। हम लोगों ने एकेरान पैसेज में दो बार गोते लगाये। मैंने कुछ क्रेफिश पकड़ी तथा काला मूंगा भी देखा। आश्चर्य की बात यह है कि काला मूंगा जब तक समुद्र की तलहटी में रहता है सफेद होता है। हम लोगों ने साउन्ड में भी एक गोता लगाया। पर पिघलती हुई बर्फ के ताजे पानी के कारण वहां पर काफी ठंडा था तथा वहां देखने के लिए भी कुछ नहीं था। उस परिवार ने रैन्गिमी जहाज से प्रस्थान के पहले अपने हेलीकाप्टर में भी मुझे एक छोटी सी हवाखोरी कराई। फिर वह सब लोग हेलीकाप्टर से चले गये। मैं भी अपनी नौका खोलकर डाग साउन्ड की ओर चल दिया। चूंकि हवा नहीं चल रही थी अत: यह नौकायन मजेदार नहीं था पर दूरी भी ज्यादा नहीं थी। मैं जब डाग साउन्ड में प्रवेश कर रहा था तो पानी बरसने लगा और साथ ही धूप भी निकली हुई थी। सम्पूर्ण इन्द्रधनुष निकला हुआ था। एक किनारे से दूसरे किनारे तक। पानी में उसकी परछाई नौका के पास से गुजर रही थी। यह इन्द्रधनुष मुझे अपने साये में एक घंटे तक साउन्ड में 5 मील तक लिये चला गया। जब तक कि 19 मिलीमीटर फिशआई लेन्स का कैमरा न हो इस खूबसूरत इंद्रधनुषीय दृश्य का चित्र लेना असंभव होगा।
अगले दिन भी हवा इतनी हल्की थी कि मुझे नौका पूरे दिन नैन्सी साउन्ड तक इंजन से ही चलानी पड़ी। जिस कव में मैंने अपनी नौका का लंगर डाला उसमें आगे पीछे बस इतनी ही जगह थी कि एक नौका ही आ सके। अत: मैं घूमकर टामसन साउन्ड होता हुआ ब्रैडशा साउन्ड पहुंचा। अगले दिन मैं डाउटफुल साउन्ड गया जो बगल में ही थी। अत: मुझे खुले समुद्र में नहीं जाना पड़ा। मुझे पहली बार ढाई घंटे तक फियोरलैंड में आनंददायक नौकायान का मजा मिला। मैं डीप कव पहुंचा और वहां कुछ दिन रूका। मैंने इंजन का पंखा निकाल कर मरम्मत की तथा पंखे को इंजन में मजबूती से बांधे रखने के लिए एक नई चाबी बनाई। यह सब करते हुए अच्छा हुआ कि कोई चीज उस गहरे कव में नहीं गिरी।
रविवार के अपरान्ह में मैं सामने के पन- बिजलीघर को देखने गया। वहां काम करने वाले एक व्यक्ति ने मुझे पूरा पन-बिजलीघर दिखाया। फिर हम लोग मारापुरी झील के आर- पार बिजलीघर की नौका से गये। सोमवार को मैं एक ट्रक में सी अर्चिन लेकर ब्लफ़ तक गया और ट्रक को वापस लाया। एक व्यक्ति ने मेरे साथ मेरी नौका पर सैर करने को कहा तो उसे लेकर हम लोग बुधवार को दक्षिण जाने के लिए तैयार हुए। बृहस्पतिवार को हवा शांत थी अत: पूरे रास्ते हमें इंजन चलाना पड़ा। हम लोगों ने अपनी नौका एकेरान पैसेज में किनारे के वृक्षों से बांधी। हम ने नौका से मछली मारने वाली डोरियां डाली और कुछ ही मिनटों में अपना डिनर पकड़ लिया। शुक्रवार को फिर हवा नहीं चल रही थी अत: हमें इंजन चलाना पड़ा।
इसके बाद हम प्रीजरवेशन इनलेट पहुंचे। शनिवार को इनलेट के छोर तक पहुंच गए और वहां के झरने पर चढ़े। रविवार के लिए मौसम की भविष्यवाणी थी कि पश्चिम से बढिय़ा हवा चलेगी। अत: हम उस उम्मीद से चल निकले पर हवा बहुत हल्की थी अत: हमारी चाल बहुत धीमी रही और कई बार तो हमारी नाव बिल्कुल स्थिर ही हो गई। पर आधी रात के बाद हवा बढिय़ा चलने लगी और हमारी चाल काफी तेज हो गई। फोवोक्स स्ट्रेट के बीच में से हम ब्लफ़ रात को 9 बजे पहुंच गये। इसी के साथ मेरा शीत कालीन नौकायान समाप्त होता है। अब मैं 48 घंटे नौकायान कर सीधे क्राइस्ट चर्च (नगर) पहुंचने की योजना बना रहा हूं जहां मुझे विश्वास है बाकी बचे शीतकाल के लिए कोई काम अवश्य मिल जाएगा।
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देश व दुनिया के बारे में जानने के लिए पढऩे तथा यात्रा के शौकीन प्रताप सिंह राठौर का जन्म स्थान उत्तर प्रदेश फतेहगढ़ (फर्रूखाबाद) है। अंग्रेजी साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने बैंक में नौकरी की। वे भारतीय साहित्य, संस्कृति, इतिहास, समाज शास्त्र तथा नेचरल साईंस से संबधित हिन्दी अंग्रेजी किताबों का निरंतर अध्ययन करते हैं। इतिहास व सामाजिक विषयों पर विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में आलेख एवं संस्मरण प्रकाशित हो चुके हैं, उन्होंने भारत के साथ यूरोप का विस्तृत भ्रमण किया है।
पता- बी-403, सुमधुर-।। अपार्टमेन्ट्स, अहमदाबाद- 380 015,
मोबाइल- 09428813277

Feb 17, 2010

एक सच्चे संत की पुण्य स्मृति


- प्रताप सिंह राठौर
यह निर्विवाद सत्य है कि गेरुआ वस्त्रधारियों के हुजूम में एक सच्चा संत ढूंढ पाना भूसे के ढेर में से सुई ढूंढने से भी ज्यादा मुश्किल है। जिधर देखो उधर ऐसे संतों (?) की भीड़ दिखाई देती है जो धर्मभीरू स्त्री-पुरुषों को सादा जीवन और त्याग का उपदेश देते हुए अपने नाम पर पांच सितारा होटलों जैसी सुख सुविधाओं से युक्त आराम (?) और एयरकंडीशंड कारों के काफिले बनाकर ऐश करते हैं। किसी भी तीर्थ स्थान पर जाइए ऐसे पूंजीवादी संतों की भरमार है। हरद्वार में भी ऐसा ही है। परंतु मैं अपनी पिछली हरद्वार यात्रा में एक सच्चे संत की मधुर स्मृति से अभिभूत हो गया। बचपन की उस स्मृति को आज मैं आपके साथ बांटना चाहता हूं-
मैं अपने जन्म से स्वामी रामानंद जी का स्नेहभाजन रहा हूं। वर्षों से इच्छा थी कि साधना-धाम जाकर स्वामी जी के पुनीत स्मारक के दर्शन करूं और स्वामीजी की पुण्यस्मृति को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करूं। सो स्वामीजी की मेरे परिवार पर स्थायी कृपा के फलस्वरूप सुयोग बन ही गया और मेरी भतीजी का शुभ विवाह संस्कार 15 फरवरी 2007 को हरद्वार में होना निश्चित हुआ, इस प्रकार मुझे साधना धाम के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
मैं अपरान्ह 4 बजे साधना धाम की पुण्य स्थली पहुंचा। इस पुनीत स्थल के सौम्य, शांत एवं पवित्र वातावरण में प्रवेश करते ही स्वामीजी के स्नेहमय सान्निध्य में बीते अपने जीवन की मधुर स्मृतियों का मेरे तनमन में ऐसा उफान उठा- ऐसा भावातिरेक हुआ कि आंखे अश्रुपुरित हो गईं। स्वामीजी की मुस्कुराती, स्नेहमय दिव्य छवि तो मन में सदैव ही विराजती है। लगा कि वह दिव्य पवित्र छवि सजीव होकर मेरे सिर को अपने करकमलों से सहला रही है।
मैं तब चार या पांच वर्ष का रहा होऊंगा। यह बात 1946-47 की होगी। मेरे माता-पिता फतेहगढ़ (फर्रूखाबाद) उत्तरप्रदेश निवासी स्व. श्रीमती राजेश्वरी देवी और स्व. ठा. चंदन सिंह राठौर, एडवोकेट स्वामीजी के अनन्य भक्त थे और स्वामीजी के कृपापात्र थे। स्वामीजी हमारे घर ठहरने की कृपा करते थे। स्वामीजी मुझे गोद में उठाकर दुलारते थे, लाड़ प्यार करते थे। मैं स्वामीजी के साथ प्रात: काल गंगा स्नान को जाता था। स्वामीजी गंगाजी में मेरा हाथ पकड़ कर डुबकी लगवाते थे। मेरा बदन भी पोंछ देते थे। कभी- कभी घर पर भी मेरे धूल से सने हाथ- पांव धोकर तौलिये से पोंछ देते थे। स्वामीजी का आसन बाहर बैठक में पड़े एक तख्त पर लगाया जाता था। उसी पर एक थैले में स्वामीजी का पार्कर पेन जिसमें गोल्डन कैप थी, क्विंक दवात और एक छोटा सा होम्योपैथी की दवाइयों का बॉक्स रहता था।
पिताजी के सुबह 10 बजे कचहरी चले जाने के बाद अपरान्ह 4 बजे उनके वापस आने तक मैं स्वामीजी के आस- पास ही खेलता रहता था। स्वामीजी का पेन और होम्योपैथी का बॉक्स मुझे बहुत आकर्षित करते थे। स्वामीजी अनुपस्थिति में मैं उनके पार्कर पेन से उनके लेटरपैड पर अगड़म बगड़म कुछ आकृतियों बना देता था, इंक फैला देता था और होम्योपैथी की शीशियों में से मीठी गोलियां खा लेता था। इन हरकतों पर मेरे माता- पिता मुझे डांटते थे। लेकिन स्वामीजी हंसते थे, इंक से सने मेरे हाथ धो देते थे और प्यार से गोद में बैठा लेते थे। स्वामीजी का मेरे घर पर ठहरना मेरे लिए उत्सव जैसा होता था। मेरा छोटा भाई अजित तब शायद दो वर्ष का था। स्वामीजी उसे भी अपनी गोद में लेकर प्यार करते थे।
मेरी माता जी का स्वामीजी बहुत सम्मान करते थे। उन्हें बड़े आदर से प्रताप की मां कह कर संबोधित करते थे। मेरे पिताजी से स्वामीजी बहुत स्नेह करते थे। मेरे पिताजी हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं में निष्णात थे तथा धार्मिक ग्रंथों का गहन अध्ययन करते रहते थे। स्वामीजी उन्हें अपना मित्र कहते थे तथा उनसे अंग्रेजी में नियमित पत्र व्यवहार करते थे। बहुत ही सुन्दर हस्तलिपि थी स्वामीजी की। बहुत वर्षों तक मेरे पिताजी को लिखे स्वामीजी के पत्र मेरे परिवार की अमूल्य निधि रहे। स्वामीजी के प्रयाण के उपरान्त संभवतया स्वामीजी के पत्रों के प्रकाशन हेतु संकलक को भेज दिये गये थे।
बहुत ही मधुर, संगीतमय कंठस्वर था स्वामीजी का। संध्या समय होने वाले प्रवचन संकीर्तन की सभा में आसन पर बैठकर आंखे मूंद कर ध्यानमग्न होकर जब स्वामीजी राम का उच्चार करते थे तो वह छवि उस बाल्यावस्था में भी मेरे तनमन को झंकृत कर देती थी। आज भी वह संगीतमय मधुरवाणी मेरे मन में गूंजती रहती है।
उन्हीं दिनों मेरे माता- पिता ने नया मकान बनवाना शुरु किया था। स्वामीजी ने उस प्लाट पर जाकर उस भूमि को अपने चरणरज से पवित्र किया था और मेरे माता- पिता की इस योजना के सफल होने के लिए आशीर्वाद देते हुए कहा था- इस मकान में एक ईंट चांदी की लगेगी तो एक ईंट सोने की लगेगी, कोठी के नक्शे का सबसे महत्वपूर्ण भाग उसका 20x24 का ड्राइंग रूम है जिसमें 8 दरवाजे और एक बहुत बड़ी खिड़की है। इसका यह आकार और इसे इतना हवादार बनाने का उद्देश्य स्वामीजी की साधना गोष्ठियों के लिए उपयुक्त हाल का उपलब्ध होना। मेरे माता -पिता को जीवनभर यह कसकता रहा कि उनकी योजना के परिपूर्ण होने से पहले ही स्वामीजी स्वर्ग सिधार गए।
मुझे वह दुखद दिन भी याद है जब पत्र से स्वामीजी के स्वर्गवास का हृदय विदारक समाचार मेरे माता- पिता को मिला। मुझे अपने माता- पिता की आंखों से बहती अश्रुधारा की स्पष्ट याद है। हम बच्चे भी रोते रहे थे।
स्वामीजी इहलोक से प्रयाण कर गए परंतु मेरे परिवार में वे सदैव आराध्य थे और आज भी हैं। हमारी कोठी के पूजागृह में स्वामीजी का भव्य श्वेतश्याम चित्र अन्य देवी- देवताओं के चित्रों के बीच दैदीप्यमान रहता है।
मैं अपने छह भाई-बहनों में सबसे बड़ा हूं। मेरी दो छोटी बहनों और एक भाई का जन्म स्वामीजी के स्वर्गवास के बाद हुआ। फिर भी हम सभी के हृदयों में पूज्य स्वामीजी की मंगलमय कल्याणकारी छवि सदैव विराजती है। स्वामी जी की हमारे परिवार पर इतनी सघन कृपा और स्नेह के फलस्वरूप ऐसा होना ही था।
जहां तक मेरा विश्वास है तो संत, महात्मा, सन्यासी इन सभी शब्दों का एकमात्र पर्याय पूज्य स्वामी रामानंद जी है।
15.2.2007 के शुभ दिन साधना धाम के पावन परिसर में प्रविष्ट होते ही मुझे महसूस हुआ कि स्वामी जी ने अपने लंबे हाथ बढ़ाकर मुझे उठाकर अपनी गोद में बिठा लिया है। यह एक दिव्य अनुभूति थी। मैं मंत्रमुग्ध हो गया। प्रण किया कि इस पावन स्थल पर बार-बार जाता रहूंगा। पूज्य स्वामी रामानंदजी के चरणों में शत शत प्रणाम।
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स्वामी रामानंदजी
स्वामी रामनंद जी (1916-52 ) का जन्म ललितपुर (उत्तरप्रदेश) के एक संपन्न परिवार में हुआ था। उनके पिता होम्योपैथी के डॉक्टर थे। जन्म के समय उनका नाम शिशुपाल रखा गया। बालक शिशुपाल जब दो वर्ष के थे कि उनकी माता का देहांत हो गया। इसके बाद उनका लालन-पालन उनकी 12 वर्षीय बड़ी बहन और पिता ने किया। कुछ समय बाद यह परिवार तरन तारन पंजाब में आ गया और बालक शिशुपाल की शिक्षा प्रारंभ हुई। शिक्षकों ने पाया कि शिशुपाल एक अत्यंत मेधावी छात्र थे। पंजाब यूनीवर्सिटी की 1933 की मैट्रिक परीक्षा में उन्होंने सर्वोच्च स्थान पाकर एक नया रेकार्ड स्थापित किया। आगे की शिक्षा के लिए उन्हें लाहौर भेजा गया। और वहां भी उन्होंने बीए (आनर्स) संस्कृत में प्रथम श्रेणी के साथ प्रथम स्थान प्राप्त किया। इसी के साथ युवक शिशुपाल के मन में वैराग्य छाने लगा और वे सन्यास लेने की बात करने लगे। उनके परिवार और शिक्षकों की आकांक्षा थी कि वे आई.सी.एस. की परीक्षा में सफल होकर अपनी प्रखर बुद्धि का सदुपयोग करेंगे।
विवेकानंद को आदर्श मानने वाले युवक शिशुपाल ने आई.सी.एस. बनकर विदेशी शासकों के शासन तंत्र की कड़ी बनना अस्वीकार कर दिया और परिवार के आग्रह पर बेमन से एम.ए. संस्कृत में प्रवेश ले लिया। वैराग्य में डूबे मन के बावजूद एम.ए. संस्कृत में भी प्रथम श्रेणी प्राप्त की। इसके एक वर्ष बाद परिवार को मनाने में सफल होकर सन्यासी बन कर सिर्फ एक झोला लेकर वे भारत भ्रमण पर निकल पड़े। स्वामी रामानंद एक यायावर सन्यासी थे और अपने प्रवचनों में अंधविश्वास से बचने और शिक्षा के महत्व का प्रचार करते थे। स्वामी जी ने अनेक पुस्तकें लिखीं और कैलाश की यात्रा की। स्वामी रामानंद ने अपने जीवनकाल में किसी मठ या आश्रम की स्थापना नहीं की। स्वामीजी ने कनखल, हरद्वार में शरीर त्याग दिया। बाद में स्वामीजी के अनुयाइयों ने उनके स्मारक के रूप में कनखल में साधना धाम स्थापित कर दिया है।

Jan 19, 2009

भारतीय संस्कृति के उपासक क्लेजिओ

भारतीय संस्कृति के उपासक क्लेजिओ
- प्रताप सिंह राठौर

ली क्लेजिओ ने उपन्यासकार के तौर पर 1980 में डेजर्ट के साथ सफलता के सोपान की शुरुआत की। उनकी इस कृति के बारे में अकादमी ने कहा कि इसमें उत्तर अमेरिकी रेगिस्तान में खो चुकी संस्कृति के जबर्दस्त बिंब हैं जिसमें यूरोप का निरूपण अवांछित प्रवासियों की आंखों के जरिए किया गया है। ली क्लेजिओ ने इसी कृति के लिए फ्रांसीसी अकादमी से पुरस्कार भी जीता था। स्वीडन की अकादमी के अनुसार ली क्लेजिओ शुरुआत से ही पारिस्थितिकी के पक्षधर लेखक के तौर पर सामने आते हैं जिनका झुकाव द बुक ऑफ लाइट और द जायंट में दिखाई देता है।
क्लेजिओ को भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है अत: वे उपनिषदों का खुल कर उपयोग करते हैं। क्लेजिओ दार्शनिक भी है और भारतीय दर्शन से बहुत प्रभावित हैं।

स्वीडन की साहित्य अकादमी ने वर्ष 2008 के साहित्य का नोबेल पुरस्कार के लिए ज्यां-मरी गस्ताव ली क्लेजिओ को नामांकित करके विश्व के साहित्य जगत को चौंका दिया है। कारण है कि फ्रेंच साहित्य जगत के बाहर क्लेजिओ का नाम शायद ही किसी ने सुना हो और फ्रेंच साहित्य के पाठकों में से भी बहुत ही कम संख्या में इनके प्रशंसक रहे हैं।

लेकिन साहित्य के विद्यार्थी क्लेजिओ को वर्तमान में फ्रेंच साहित्य का सर्वोत्तम साहित्यकार मानते है। अब नोबेल पुरस्कार पाने के बाद क्लेजिओ की पुस्तकों की मांग बढ़ी है तो पाठकों को इस दार्शनिक उपन्यासकार की साहित्यक उत्कृष्टता को स्वीकार करना पड़ा है। नोबेल पुरस्कार देते हुए क्लेजिओ की प्रशस्ति में कहा गया है कि इन्होंने वर्तमान काल की सबसे प्रभावी सभ्यता (पाश्चात्य सभ्यता) से बाहर निकल कर अन्य सभ्यताओं में विकसित मानवता में शोध किया है।

पश्चिमी सभ्यता में जन्म लेने के बावजूद क्लेजिओ के वैश्विक दृष्टिकोण से समृद्ध होने का कारण उनके जीवनी से मिलता है। 68 वर्षीय क्लेजिओ एक अंग्रेज डाक्टर पिता और फ्रेंच मां की संतान हैं। उनका जन्म तो फ्रांस में हुआ परंतु 8 वर्ष की उम्र में अपने पिता के साथ आफ्रीका चले गए। क्लेजिओ की शिक्षा-दीक्षा इंग्लैंड में हुई। क्लेजिओ कई वर्षों तक पनामा (दक्षिणी अमरीका) में आदिवासियों के बीच रहकर उनकी सभ्यता और संस्कृति का अध्ययन करते रहे। इन दिनों क्लेजिओ अमरीका में निवास करते हैं परंतु वास्तव में क्लेजिओ प्रकृति से यायावर हैं अत: दुनियाभर के देशों में भ्रमण करते रहते हैं। इसी कारण से क्लेजिओ अपने को किसी एक देश का मानने के बजाय विश्व का नागरिक मानते हैं। स्वाभाविक है कि ऐसे में क्लेजिओ का दृष्टिकोण वैश्विक है। जब भी उनसे पूछा जाता है कि वह किस देश के नागरिक है तो वह किसी देश की सीमाओं में अपने अस्तित्व को बांधने से इन्कार करते हुए कहते हैं कि बस फ्रेंच भाषा ही एकमात्र ऐसी है जिसके प्रति वे पूर्णतया प्रतिबद्ध हैं। इंग्लैंड के विश्वविद्यालयों में पढऩे के कारण क्लेजिओ अंग्रेजी भाषा पर भी समान अधिकार रखते हैं। फिर भी क्लेजिओ अपनी साहित्य रचनाएं सिर्फ फ्रेंच भाषा में रचते हैं। वे कहते हैं, अंग्रेजी भाषा से, उन्हें साम्राज्यवाद की बू आती है।

क्लेजिओ को भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है अत: वे उपनिषदों का खुल कर उपयोग करते हैं। क्लेजिओ दार्शनिक भी हैं और भारतीय दर्शन से बहुत प्रभावित हैं। 1967 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'मैटीरियल एक्सटैसीÓ में क्लेजिओ ने मुन्डक उपनिषद और ऋगवेद इत्यादि से विस्तृत उद्धहरण दिए हैं। 1969 में प्रकाशित पुस्तक 'द बुक ऑफ लाइट्स' में क्लेजिओ लोभ, दोष की चर्चा करते हुए मोह को सब खराबियों की जड़ बताते हैं। 1985 में प्रकाशित उपन्यास 'द मिसर्फाच्युन स्ट्राइक्स एट नाइट' में क्लेजिओ ने दस्यु अंगुलीमाल के गौतम बुद्ध के शरण में आने के वृत्तांत का उल्लेख किया है। 1985 में ही प्रकाशित उपन्यास 'द प्रासपेक्टर' में शुक और सारिका के आख्यान के साथ-साथ भारतीय नारी की प्रशंसा में वे लिखते हैं 'परंपराओं से आभूषित और प्रकृति में रमी भारतीय नारी का सौन्दर्य और गरिमा झलकती है।' इस प्रकार के असंख्य उदाहरण क्लेजिओ की रचनाओं में बिखरे हुए हैं।

क्लेजिओ की भारतीय सभ्यता और संस्कृतिक से अतरंग प्रेम की जड़ें बहुत गहरी है। मां की शाखा से क्लेजिओ के एक पूर्वज 1789 की फ्रेंच क्रांति में गायब हो गए थे। उस समय तक फ्रांसीसी भारत में पांडिचेरी में पांव जमा चुके थे। अत: क्लेजिओ के पूर्वजों ने परिवार के उस सदस्य की खोज में भारत की यात्रा करने का निर्णय लिया और समुद्री जहाज से चल पड़े। लेकिन मारिशस पहुंचते तक उनका उत्साह काफूर हो चुका था और वे मारिशस में ही बस गए। मारिशस भारत से गिरमिटिया मजदूरों से भरा हुआ था। ये भारतीय अपने साथ अत्यंत समृद्ध भारतीय संस्कृति भी ले गये थे। क्लेजिओ को भारतीय संस्कृति से परिचय मारिशस में प्राप्त हुआ और एक स्थायी प्रेम संबंध में परिवर्तित हो गया। क्लेजिओ की रचनात्मक प्रतिभा और दर्शन मुख्यतया भारतीय दर्शन और संस्कृति से प्रेरित है परंतु उन्होंने अन्य संस्कृतियों में भी शोध किया है। अपने 1980 में प्रकाशित प्रसद्धि उपन्यास 'डेजर्टÓ में क्लेजिओ योरप के भौंडेपन और अज्ञान की तुलना सहारा की विलुप्त तुआरेग कबीले की संस्कृति की उत्कृष्टता से की है। ज्ञात हो कि फ्रांसीसी उपनिवेशवादियों ने तुआरेग संस्कृति नष्ट कर दी थी।


क्लेजिओ ने लगभग 30 उपन्यास लिखे हैं जिनमें से अभी तक 12 उपन्यास अंगे्रजी में अनुवादित किए जा चुके हैं। ऊपर उनकी जिन किताबों का उल्लेख किया गया है वे उनकी किताबों के अंग्रेजी नाम ही हैं। अब तो उनके सभी उपन्यासों के विभिन्न भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध हो जाएंगे जिससे बहुत बड़ी संख्या में लोगों को क्लेजिओ की विलक्षण प्रतिभा से परिचय प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। क्लेजिओ कहते हैं कि वह अपने लेखन में प्रत्येक दिन और प्रत्येक घटना से अपने संबंध का निरुपण करते हैं। उनके अनुसार हम ऐसे संकटपूर्ण युग में जी रहे हैं जिसमें नित्य विचारों और दृश्यों के शोर- शराबे की बमबारी होती रहती है। अत: क्लेजिओ के अनुसार आज साहित्य का उद्देश्य शायद इसी शोर- शराबे को प्रतिध्वनित करना है।

उनकी सबसे हालिया कृतियों में 2007 की बैलेसिनर शामिल है जिसे स्वीडन अकादमी ने उनके जीवन में फिल्म कला के इतिहास और फिल्म के महत्व के बारे में निजी आलेख करार दिया। उनकी पुस्तकों में बच्चों के लिए कई कहानियां भी शामिल हैं जिनमें 1980 की ललेबी और 1985 की बलाबिलोउ प्रमुख हैं। उम्मीद है कि क्लेजिओ की रचनाओं के हिन्दी अनुवाद भी शीघ्र ही उपलब्ध होंगे।
बी-408, सुमधुर-।। अपार्टमेंट्स ,

Nov 23, 2008

भारत भक्त एक अंग्रेज महिला

 इतिहास के कुछ अनछुए पहलू

भारत भक्त एक अंग्रेज महिला- फैनी पार्कस 
(Fanny Parkes)

-प्रताप सिंह राठौर

भारतीय इतिहास के बारे में अनेक विदेशी यात्रियों ने बहुत कुछ लिखा है, उन्हीं में से एक अंगे्रज लेखिका फैनी पाक्र्स ने भी भारत में रहते हुए अपने अनुभवों के माध्यम से भारतीय इतिहास के कुछ अनछुए पहलुओं को उजागर किया है।
अतीत में झांकना सदैव ही है एक लोमहर्षक अनुभव होता है। यही कारण है कि लोग नालंदा, अजंता, एलोरा, चितौडग़ढ़ इत्यादि की ओर आकर्षित होते हैं। संग्रहालयों में रखे प्राचीन अस्त्र-शस्त्र, वस्त्र, चित्र और बर्तन भी इसी कारण हमें आकर्षित करते हैं। प्राचीन काल के इन अवशेषों को देखकर हम अपनी कल्पना से उस काल के जीवन की अपने मन में संरचना करते हैं। लेकिन कहीं न कहीं इस सबको देखकर हमारे मन में अभिलाषा बनी रहती है कि यदि उस समय के जीवन का आंखों देखा हाल पढऩे को मिल जाता तो कितना अच्छा होता।
यही कारण है यात्रा विवरणों की पुस्तकें इतनी लोकप्रिय होती हैं और प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तावेजों के रूप में सम्मानित भी। फाहियान, हुयेत्सांग, मार्कोपोलो, इब्नबतूता और बर्नियर के यात्रा संस्मरण, शताब्दियों पहले के हमारे समाज की दुर्लभ झांकिया प्रस्तुत करते हैं।
अंग्रेजों के भारत में आने के बाद से ऐसी पुस्तकों में अच्छी खासी वृद्धि हुई जिसका मुख्य कारण था कि उस समय पुस्तक छपाई की मशीनों का आविष्कार हो चुका था। भारत में अंग्रेजी राज के समय में बड़ी संख्या में अंग्रेज स्त्री-पुरूष ने भारत में अपने जीवन के संस्मरण लिखे और छपवाये। ऐसे अधिकांश संस्मरण अंग्रेज सिविलियन और फौजी अफसरों द्वारा लिखे भी गये हैं। अत: उनमें अपनी निजी और अंग्रेज नस्ल की श्रेष्ठता जतलाने पर जोर दिया गया है। इसके विपरीत अंग्रेज स्त्रियों के संस्मरण कम संख्या में है परंतु वे भारतीय समाज के काफी विश्वसनीय चित्र प्रस्तुत करते हैं। अंग्रेज स्त्रियां अधिकांशत: पत्नियों के रूप में भारत में आती थीं। उनके सरोकार घर- बार से जुड़े रहते थे। अत: उनका दृष्टिïकोण काफी कुछ शासकीय अहंकार से मुक्त रहता था।
ऐसी ही एक अंग्रेज महिला थी फैनी पाक्र्स (Fanny Parkes)  जो एक अंग्रेज अधिकारी की पत्नी के रूप में भारत में 1822 में आई। फैनी एक अत्यंत साहसी और विलक्षण महिला थी। भारत के लिए प्रस्थान करते समय फैनी की मां ने फैनी से प्रण करवाया कि वह भारत में अपने अनुभवों को विस्तार से लिखकर उन्हें भेजती रहेगी। फैनी ने अपनी मां को दिया वादा पूरी निष्ठा से निभाया और अपने अनुभवों को प्रतिदिन डायरी के रूप में लिखा। फैनी पाक्र्स ने भारत में अपने 24 वर्षों के प्रवास की डायरी को 1850 में लंदन में Wanderings of a pilgrim in search of the Picturesque  (मनमोहक छबियों की तलाश में एक तीर्थयात्री की यायावरी) शीर्षक से आठ सौ से अधिक पृष्ठों की पुस्तक के रुप में प्रकाशित किया।
फैनी के प्रथम चार वर्ष कलकत्ता में बीते। भारत में पहुंचते ही इस देश ने फैनी का मनमोह लिया। फैनी लिखती है 'भारत एक बहुत आनंददायी देश है। ऐसे मनमोहक देश की सभ्यता, संस्कृति और प्राकृतिक सुषमा को निजी अनुभव से जानने और समझने का फैनी ने प्रण किया। याद रखना होगा कि 1822 में भारत में यातायात के साधन घोड़ा, पालकी, बग्घी और नाव थे। इनमें सबसे तीव्र और विश्वस्त साधन घोड़ा था। अतएव कलकत्ता में पहुंचते ही फैनी ने एक घोड़ा खरीदा और सुबह शाम घुड़सवारी करने लगी और निपुण घुड़सवार बन गई।
चार वर्ष बाद 1826 में फैनी के पति का तबादला कलकत्ता से इलाहाबाद हो गया। इससे फैनी को तो मन मांगी मुराद ही मिल गई। इलाहाबाद को फैनी इसके लोकप्रिय प्राचीन नाम प्रयाग से संबोधित करती हुई कहती है 'हमें बहुत प्रसन्नता हुई कि हमारा सौभाग्य हमें प्रयाग ले आया था।Ó
अपने भारतीय प्रवास को एक तीर्थयात्रा मानने वाली फैनी को इलाहाबाद के स्थान पर प्रयाग नाम अधिक प्रिय लगना उचित ही था। प्रयाग पहुंचने के साथ ही फैनी ने हिंदी और उर्दू भाषाएं सीखी और आराम से मुहावरेदार भाषा में बातचीत करने लगी। इस प्रकार हिंदी, उर्दू बोलने समझने में अभ्यस्त होकर फैनी उत्तर भारत की तीर्थयात्रा पर निकल पड़ी।
कानपुर में दिवाली की जगमगाहट देखकर फैनी मंत्रमुग्ध हो गई। फैनी ने लिखा 'दिवाली का असली आनंद पाने के लिए आपको रात के अंधेरे में गंगाजी पर नाव से (मंदिरों, घाटों की छटा के) दर्शन करना चाहिए। मुझे बहुत आनंद आया, ऐसा परी लोक जैसा भव्य दृश्य मैंने भारत आने के बाद आज से पहले कभी नहीं देखा था। न ही मैंने यह सोचा था कि वैसे नीरस दिखता कानपुर इतना सुंदर भी हो सकता है।
फैनी लखनऊ पहुंची और उन्हें वहां नवाब गाजिउद्दीन हैदर के हरम में भी झांकने का मौका लगा। फैनी बताती है कि हरम में पांच विवाहिता बेगमें है। पहली है दिल्ली के बादशाह अकबर शाह की भतीजी। इस 16 वर्षीय बेहद खूबसूरत बेगम से नवाब का विवाह पांच वर्ष पहले हुआ था। परंतु शुरू से ही नवाब ने उसकी उपेक्षा की है। किसी को उससे मिलने की इजाजत नहीं है और वह बेबसी में कैदी जैसा जीवन बिता रही है। दूसरी बेगम का खिताब है मलिका जमानी। पहले ये हाथी का चारा काटने वाले मुलाजिम रमजानी की बीवी थी। रमजानी घसियारे के घर से जल्दी ही ऊब गई और एक हज्जाम से इश्क लड़ा बैठी। उस इश्क की आंच ठंडी पड़ी तो मिर्जा जावेद अली बेग के घर में आठ आने महीने की तनख्वाह पर नौकरानी हो गई। वहां भी उसका मन न लगा तो वहां से भाग कर एक सराय में पिसनहारी हो गई। सराय में नित नये आशिक मिलते रहते थे। यहां उसने पहले एक लडक़े को जन्म दिया। इस लडक़े का नाम तिलुआ पड़ा। फिर उसने एक लडक़ी को जन्म दिया और इसी के बाद उसे नवाब के महल में एक नवजात बच्ची को दूध पिलाने (धाय मां) की नौकरी मिल गई। इस समय तक उसकी उम्र चालीस वर्ष की हो चुकी थी, उसका रंग काला था पर इसके बावजूद इस औरत ने नवाब पर ऐसा जादू डाला कि उन्होंने उसे बेगम बना लिया और मलिकाए जमानी का खिताब दे दिया।
नवाब की पांचवी सबसे पसंदीदा बेगम का जीवन चरित्र भी काफी दिलचस्प है। नवाब के वजीर हकीम मेंहदी को लगा कि नवाब साहब उनके प्रति बेरूखी दिखा रहे हैं। हकीम मेंहदी ने सोचा कि नवाब साहब को खुश करने के लिए कुछ करना चाहिए उन दिनों नवाब साहब की निगाह दरबार में नाचने वाली एक तवायफ पर थी। हकीम मेंहदी ने उस तवायफ को गोद लेकर अपनी बेटी बना लिया और नवाब साहब से उसका ब्याह करा दिया। तो यही है नवाब साहब की पसंदीदा पांचवीं सबसे नयी बेगम।
फैनी तत्कालीन मुगल बादशाह अकबर शाह के दिल्ली के लाल किले स्थित हरम के अंदर जाने में भी सफल हुई । वह बताती है कि गद्दी नशीन बादशाह से पहले के बादशाहों की बेगमें तथा शहजादे, शहजादियां बेहद गरीबी और गंदगी के वातावरण में दिन काट रहे थे। फैनी ने बादशाह और नवाब के हरमों से पर्दा उठाकर एक पुरानी कहावत दूर के ढोल सुहावने होते हैं की सच्चाई को साबित किया है। दिलचस्प बात यह है कि फैनी ने अपनी पुस्तक में हिंदी मुहावरों का काफी प्रयोग किया है।
फैनी एक जीवट महिला थीं। उसमें आत्मबल कूट - कूट कर भरा था, उसने पूर्णतया निडर होकर लंबी-लंबी यात्रायें अकेले घोड़े से की। उसने यमुना पर नाव से इलाहाबाद से आगरा और दिल्ली की यात्रा की। इस यात्रा में आठ दस मल्लाहों और नौकरों के बीच वह अकेली महिला थी। फैनी भारत में 24 वर्ष रही और उसने अधिकांश यात्राएं इसी प्रकार अकेले ही की। फैनी को भारत की हर चीज, पेड़-पौधे, पशु पक्षी, नदी पहाड़, वस्त्र, गहने, स्थापत्य सभी कुछ से प्यार था। उसने अपनी यात्राओं में इन सब चीजों के नमूने इक_ïे किये।
एक मेले में भारतीय स्त्री-पुरुषों के रंग-बिरंगे वस्त्रों की तारीफ करती हुई फैनी कहती है कि इनकी तुलना में अंग्रेज स्त्री-पुरुषों के वस्त्र बेहद भद्दे और कुरूचिपूर्ण हैं।
ताजमहल को देखकर फैनी मंत्रमुग्ध हो गई और तारीफ में एक पूरा अध्याय ही लिख डाला। अंत में ताजमहल के साथ अंग्रेजों के बेहूदे आचरण पर फैनी तीखे शब्दों में अपनी वेदना प्रगट करते हुए लिखती है 'क्या आप इससे भी अधिक घृणित बात सोच सकते हैं? अंग्रेज स्त्री-पुरुष (ताजमहल के) संगमरमर के चबूतरे पर बैंड बजवा कर इस मकबरे के सामने नाचते गाते हैं।
अंगे्रज स्त्री-पुरुषों की वेशभूषा तथा आचार व्यवहार की तुलना फैनी भारतीय स्त्री-पुरुषों की वेशभूषा और आचार व्यवहार से बार-बार करती है। अंग्रेज स्त्रियों की कलफ लगी ड्रेस और विचित्र प्रकार के हैटों को वे बदरंग और भद्दे बताती है। माथे पर बिंदी लगाये और साड़ी पहने भारतीय स्त्रियां फैनी को बेहद खूबसूरत लगती हैं। फैनी को भारतीय स्त्रियों के आभूषण भी बहुत ही उत्तम और आकर्षक लगते थे।
अंग्रेज अधिकारियों द्वारा भारत के बेजोड़ ऐतिहासिक स्मारकों के दुरूपयोग से भी फैनी बहुत क्षुब्ध हुई। आगरा के किले में संगमरमर में बेजोड़ पच्चीकारी से युक्त नूरजहां बुर्ज के साथ अंग्रेजों की बदतमीजी देखकर फैनी कहती है 'कुछ बेहद पतित अंग्रेज अफसरों (भगवान करें वे नरक में जाये) ने इस खूबसूरत कोठे (नूरजहां बुर्ज) को किचन बना दिया। इसलिए छत और बाकी सब रंग-बिरंगे पत्थरों से जड़ा संगमरमर कालिख की परतों में ढंककर विकृत हो गया।
स्पष्टï है कि फैनी को भारत की कला और संस्कृति के प्रति बहुत ही आदर एवं श्रद्धा थी। फैनी ने भारतीय इतिहास का भी गहन अध्ययन किया था। फैनी ने लिखा है, मुुसलमानों के आने के पहले हिन्दू स्त्रियां पर्दा नहीं करती थीं मुसलमान विजेताओं के प्रभाव में हिन्दू स्त्रियां, मुस्लिम स्त्रियों की तरह पर्दा करने को बाध्य हुईं। ज्यादा संभावना यह है कि बिना घूंघट के निकलने पर बेइज्जती होने के कारण हिन्दू स्त्रियां भी पर्दा करने लगीं।
फैनी की ग्वालियर की रानी बैजाबाई से भेंट हुई और वे रानी की घनिष्ठ मित्र बन गईं। अंग्रेज स्त्रियों की सामाजिक स्थिति की चर्चा होने पर फैनी ने बैजाबाई को बताया कि स्त्रियों और खरबूजे की किस्मत एक जैसी होती है। चाहे खरबूजा चाकू पर गिरे या चाकू खरबूजे पर हर हालत में यातना खरबूजे को हो मिलती है। इंग्लैंड के कानून के मुताबिक अंग्रेज पत्नी अपने पति की गुलाम होती है और इस स्थिति से मुक्ति मिलने की कोई उम्मीद नहीं है।
भारत में 24 वर्ष के प्रवास में एक बार मां की बीमारी की खबर पाकर फैनी को कुछ दिन के लिए इंग्लैंड जाना पड़ा। तब तक फैनी भारत में 17 वर्ष रह चुकी थी। इंग्लैंड की धरती पर पांव रखते ही फैनी अपने मन में आये विचार बताती है (जहाज से उतरते ही) सब कुछ कितना घटिया लगता है खासतौर पर मकान जो स्लेट पत्थर के बने हैं ... सर्दी और अंधेरा.... क्या ताज्जुब कि पहुंचते ही मुझे वितृष्णा हुई। भारत की तुलना में फैनी को इंग्लैंड हर तरह से बहुत तुच्छ लगा।
इस प्रकार फैनी ने अपने संस्मरणों में भारतीय समाज की संस्कृति, कला, रीति रिवाज, इतिहास और प्राकृतिक वैभव का इतना विस्तृत वर्णन किया है कि उनकी पुस्तक पढऩे से यह सिद्ध होता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। फैनी की पुस्तक पढ़ते हुए पाठक को ऐसा महसूस होता है कि वह स्वयं ही तत्कालीन भारत में भ्रमण कर रहा है। उन्होंने अपनी पुस्तक को भारत के प्रति भक्ति और श्रद्धा के भाव से लिखा है और अपने भारतीय प्रवास को अपनी तीर्थयात्रा कहा है। फैनी ने अपने भक्तिभाव का प्रमाण अपनी पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर गणेश वंदना लिख कर किया है। वंदना के ऊपर संस्कृत में 'श्रीÓ लिखा, फिर गणेश वंदना अंग्रेजी में और अंत में दस्तखत उर्दू में कि या है। कुल मिला कर फैनी की पुस्तक बहुमूल्य और अत्यंत रोचक ऐतिहासिक दस्तावेज है।
पता: बी. 403, सुमधुर II, अपार्टमेंट्स, अहमदाबाद-380015, , mo. 9428813277

Aug 15, 2008

ओ मेरे सोना रे, सोना रे...

ओ मेरे सोना रे, सोना रे...
- प्रताप सिंह राठौर
कुछ चीजें कभी समझ में नहीं आती है। उन्हीं में से एक है हम भारतवासियों का सोने से प्रेम। इसी के कारण भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था। जबकि भारत में सोने का उत्पादन सदैव से ही नगण्य मात्रा में रहा है। इसके बावजूद भी आदिकाल से भारत विश्व में सबसे अधिक सोने का आयात करने के लिए प्रसिद्ध रहा है। आज भी साधारण से साधारण भारतीय नर-नारी के जीवन में सोने के आभूषण, जीवन यापन की प्राथमिकताओं में सर्वोच्च स्थान रखते हैं। यह परंपरा आदिकाल से आज तक निरंतर चली आ रही है।
प्राचीन ग्रीक इतिहासकारों और चीनी यात्रियों ने अपने ग्रंथों में भारत में स्वर्ण के अकूत भंडार होने की चर्चा की है और भारत को सोने की चिड़िया नाम भी उन्हीं ने दे दिया था। इसी ख्याति से आकर्षित होकर विदेशियों ने सोना लूटने के लिए हमले किये। विदेशी लुटेरों की अंतिम कड़ी थे अंग्रेज जिन्होंने भारत को खूब कस कर लूटा।

इस सबके बावजूद भारतीयों का सोने से लगाव जरा भी कम नहीं हुआ। बीसवीं शताब्दी में सदियों से चली आ रही लूट खसोट के परिणामस्वरूप भारत विश्व के सबसे गरीब देशों में एक बन चुका था। इसके बाद भी भारत बीसवीं शताब्दी में भी विश्व में सबसे अधिक सोने को आयात करने वाला देश बना रहा।
अन्न-जल से भी अधिक प्रेम सोने से होना एक विचित्र स्थिति है जो किसी को भी भौंच का कर देगी। भारत में अपने शासन काल में अंग्रेज भी इस विसंगति से आश्चर्यचित थे।
भारत में प्राचीन काल से ही सोने को जमीन में गाड़कर रखने की प्रथा रही है। यह यथार्थ है कि भारतीय गांवों और नगरों में जमीन के नीचे विशाल मात्रा में सोना गड़ा हुआ है और इसमें से बड़ी मात्रा में ऐसा सोना है जिसे गाड़ने वाले अपने वारिसों को बिना बताये ही चल बसे हैं। शायद इसीलिए कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता जब देश में कहीं न कहीं गड़े हुए सोने के मिलने का समाचार न आता हो।

सोने को सुरक्षित रखने की प्रथा समाज के सभी वर्गों राजा से रंक तक प्रचलित थी। राजा- महराजा भी अपने खजाने को गुप्त ढंग से जमींदोज रखते थे। आपातकाल में जयपुर राजघराने के गुप्त खजाने का पता लगाने के लिए इंदिरा गांधी ने भी जयपुर के राजमहलों में विस्तृत खुदाई करवाई थी।

अंग्रेज भी भारतीयों के जमीन में खजाना गाड़कर रखने की इस प्रवृत्ति से परिचित थे और इनके बारे में काफी दिलचस्पी रखते थे। ऐसे में एक अंग्रेज अधिकारी की मुलाकात लाहौर में लाला मथुरा प्रसाद से हुई। लालाजी ने बताया कि भारतीयों की सोने के लिए अनबुझ प्यास का मुख्य कारण है कि बड़ी संख्या में लोग सोने को गुप्त रूप से जमीन में गाड़ने के बाद इस राज को दिल में छिपाये ही मर जाते हैं। इस सिलसिले में लाला मथुरा प्रसाद ने अंग्रेज अधिकारी को ग्वालियर के सिंधिया राजघराने का एक किस्सा सुनाया- 1857 से कुछ वर्ष पहले सिंधिया की गद्दी डांवाडोल हो गई थी। लेकिन 1857 की जनक्रांति में सिंधिया ने अंग्रेजों का साथ दिया तो अंग्रेजों ने इनाम में सिंधिया को ग्वालियर की राजगद्दी तो दे दी परंतु ग्वालियर के किले पर अपना आधिपत्य बनाये रखा और ग्वालियर के किले को अंग्रेजों ने अपनी फौजी छावनी बना दी। यह स्थिति करीब 30 वर्षों तक बनी रही।

इन तीस वर्षों में ग्वालियर किले पर अंग्रेजों के कब्जे ने महाराजा सिंधिया की नींद हराम कर दी थी। लालाजी के अनुसार सिंधिया महाराज की बेचैनी का कारण था ग्वालियर किले में गुप्त तहखाने में रखा 60 करोड का खजाना, जिसके रास्ते का पता जानने वाले लोगों में से एक को छोंड कर बाकी सभी की मृत्यु हो चुकी थी। वह एकमात्र व्यक्ति भी काफी वृद्ध था और उसकी सांसे कभी भी रूक सकती थी। सिंधिया महाराजा को स्वयं भी इस गुप्त खजाने के रास्ते का पता नहीं था। योंकि इस खजाने को सिंधिया महाराजा के पूर्वजों ने छिपाया था।
सिंधिया महाराजा तीस वर्षों तक अंग्रेजों से किले को छोडने की याचना करते रहे। अंतत: अंग्रेज वाइस राय ने सिंधिया की प्रार्थना स्वीकार कर ली और किले से अंग्रेज फौज हटा ली। बस फिर या था आनन-फानन में सिंधिया महाराजा ने बनारस से राज मजदूर बुलवाये। इन कारीगरों को ग्वालियर स्टेशन से आंखों पर पट्टी बांध कर और अपने काम के बारे में ओंठ सिले रखने की कसम दिला कर बंद गाड़ियों में बैठाकर ग्वालियर किले में ले जाया गया। खजाने के तहखाने का स्थान जानने वाले वृद्ध के इशारे पर इन कारीगरों ने छेनी हथौडे से उस तहखाने का रास्ता खोला। इसके बाद इन कागीगरों को फिर से आंखों पर पट्टी बांधकर बंद गाड़ी में ग्वालियर स्टेशन पर लाया गया और इनाम देकर, बनारस के लिए ट्रेन में बैठा दिया गया। सिंधिया महाराज रातों रात अकूत धन के स्वामी बन गए।

लाला मथुरा प्रसाद ने बताया कि उनके पुरखे कई पीढ़ियों तक सिंधिया राजघराने के कोषाध्यक्ष रहे थे। लाला ने यह भी बताया कि उनके एक पुरखे बहुत बड़ी संपदा के साथ सिंधिया राजघराने की सेवा से निवृत्त हुए थे और उसमें से 15 करोड रूपए की कीमत का सोना वृंदावन के एक मंदिर के नीचे गुप्त तहखाने में दबा हुआ है।

इस कहानी में कितना सच है यह तो आज कहना मुश्किल है। परंतु यह सबको पता है कि भारतीयों का सोने से अटूट प्रेम आज भी बरकरार है और पिछले कुछ वर्षों में जिस एक चीज के दाम भारत में सबसे ज्यादा बढ़े हैं वह सोना ही है। भारतीयों के इस सोना प्रेम को देखकर हिन्दी फिल्म के इस महशहूर गीत ओ मेरे सोना रे, सोना रे, सोना, दे दूंगी जान जुदा मत होना...... को सुन कर यही लगता है कि यह तो भारत की आत्मा की आवाज है।