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Mar 1, 2026

धरोहरः भो-रम-देव- तुझमें मेरा मन रमा रहे

 - राहुल कुमार सिंह

‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो‘ कहे जाने वाले भोरमदेव में शब्दों के साथ भटक रहा हूँ। यह भटकना, रास्ता भूलना नहीं, रास्ते की तलाश भी नहीं, बल्कि मनमौजी विचरण है। भोरमदेव, शब्द पर बहुत सी बातें कही- लिखी गई हैं, भोरमदेव, बरमदेव है, ब्रह्म, बूढ़ादेव, बड़ादेव, इतने मत-मतांतर कि भरम होने लगे। अलेक्जेंडर कनिंघम 1881-82 में गजेटियर के हवाले से कहते हैं- The Great Temple of Boram Deo or Buram Deo। छत्तीसगढ़ में भिर्रा या भिरहा (Chloroxylon swietenia) कहे जाने वाले पेड़ को पड़ोसी पश्चिमी ओडिशा में ‘भोरम‘ कहा जाता है, इससे कोई रिश्ता बने न बने, शाब्दिक ही सही, मेल बनता है। भोरम के करीब का छत्तीसगढ़ी शब्द है, भोरहा यानी भ्रम, संदेह या भूल। शायद इसी भूल-भटक में राह सूझे, इसलिए फिलहाल इसे यहीं छोड़कर, उसके आसपास, अगल-बगल। कुछ नादान तोड़-फोड़ करनी हो तो ‘भो!रम देव’, ‘भोर-म-देव’, हे देव, भोर होते ही तुझमें मेरा मन रमा रहे।

भोरमदेव मंदिर

भोरमदेव, स्मारक का नाम है न कि गाँव का। इस स्मारक के साथ मड़वा महल और छेरकी महल भी हैं, गाँव हैं- छपरी और चौंरा। इनमें छपरी का छापर, छावनी या छप्पर नहीं, बल्कि सलोनी मिट्टी से से आया होगा। चौंरा का संदर्भ फणिनागवंशी शासक रामचंद्र के मड़वा महल शिलालेख, विक्रम संवत 1406 में है, जहाँ चतुरापुर या चवरापुर का उल्लेख है। ‘चंवरा’ शब्द यज्ञ वेदी के लिए तैयार की गई चौकोर समतल भूमि, ‘चत्वरक’ तद्भव रूप चउंक-चांतर से आता है। सती चौरा या माता चौंरा जेसे शब्दों में इस शब्द का आशय छोटा मंदिर या देवस्थान, निहित है। चौरा का ताल्लुक अब कबीरपंथी मान्यताओं से भी जुड़ गया है। एक गाँव लाटा है, जिसे लाटा-बूटा या लता-नार से संबंधित माना जाना है, मगर यह भी ध्यान रहे कि लाटा, गुफा, सुरंगनुमा, संकरे-बंद घिरे स्थान का- जहाँ लेट कर, सरक कर, रेंग कर जाना पड़े, का भी पर्यायवाची होता है। भोरम और हरम शब्द आसपास हैं, पास ही गाँव है ‘हरमो’, ईंटों वाली महलनुमा संरचना ‘सतखंडा हवेली’ के कारण यह गाँव चर्चित है। इसे कुछ ‘हरम’ से जोड़ कर देखते हैं तो दूसरी ओर एक आस्था ‘महाप्रभु वल्लभाचार्य’ से जुड़ी है, जिससे संबद्ध कर हरमो को ‘हरि-नू’, गुजराती ‘हरि का’ भी मानने वाले हैं। इतिहास में काल-निर्धारण की दृष्टि से यह क्षेत्र फणिनाग, कलचुरि वंशजों, मंडला के गोंड़ तथा मराठों से जुड़ता है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में योद्धा स्मारक और सती स्मारक प्रतिमाएँ शक्ति संतुलन के लिए होने वाले युद्धों का प्रमाण हैं।


सतखंडा हवेली, हरमो 

यह कछारी जमीन वाला इलाका है। जंगल-पहाड़ नदी-नाले और बांध-तालाब से बची रेतीली जगह- कछार, जिस पर छोटी और कंटीली झाड़ियों वाली वनस्पति, कछार में टिकने के लिए जड़ें मजबूत होनी चाहिए। कछार, धान के लिए उपयुक्त नहीं, लेकिन धान से ही तो काम नहीं चलता। जलधाराओं के नजदीक और पानी उतर जाने पर पाल कछार और उससे दूर पटपर कछार। यहाँ एक और कछार है- सरकी कछार, इस नाम की कई शास्त्रीय व्याख्या होती है, यह भी माना जाता है कि छेरकी ही सरकी बन गया, संभव है, क्योंकि स-द, छ-स होता रहता है, ज्यों रायपुर के पास का गाँव छेरीखेड़ी- सेरीखेड़ी। सरकी का जोड़ सरकना है यानी रेंगना या खिसकना, छत्तीसगढ़ी का सलगना- पेट के बल सरक- सरक कर चलना, सरीसृप की तरह। मगर यह भी संभव जान पड़ता है कि यह सरकी- चटाई या टाट (ज्यों टाट- पैबंद या टाटीबंद) यानी समतल-पटपर का समानार्थी है मगर ‘दादर’ से कुछ अलग।

संकरी नदी पर दुरदुरी आता है, जो तुरतुरिया, खरखरा, सुरसुरी की तरह पानी के बहाव से होने वाली ध्वनि से बना शब्द है। मगर यह सोचने का रास्ता दिखाता है कि जलधारा का बहाव कैसा है, स्थान पथरीला, रेतीला, चौड़ा-संकरा, छोटा-लंबा, कम-अधिक ऊँचाई वाला, धाराओं में बंटा हुआ या अन्य कुछ। जिस तरह का नाम है, यानि नामानुरूप ही ध्वनि सबको सुनाई देती है या इस पर सुनने वाले और आंचलिक भाषा का भी प्रभाव होता है। जलधाराओं की बात हो तो गंगा का स्मरण होता ही है और गंगा के लिए कहा जाता है- ‘गं गं गच्छति गंगा’।

बजरहा यादव जी ठेठवार मिले, मैं पूछता हूँ- देसहा, कनौजिया, कोसरिया, झेरिया, बरगाह, महतो? मुस्कुरा कर छोटा सा ‘पॉज’ देते मेरे इस ‘ज्ञान‘ को ध्वस्त करते हुए गर्व से बताते हैं-दुधकौंरा। दुधकौंरा सुनकर पहले तो रायपुर का मठ, दूधाधारी-दुग्धआहारी याद आया फिर ठेठवारों के ‘कौंराई’ का। मैं भी हार मानने को तैयार नहीं, कभी पाली-कटघोरा की ओर किसी कौंराई ठेठवार से मिला था, कौंराई से तुक जमाने की कोशिश करता हूँ, वे टस से मस नहीं होते। मड़वा महल में बैठे हैं, आसपास छेरी चराते हैं। अब इन दोनों महलों मड़वा और छेरकी की ओर ध्यान जाता है। महल, पत्थरों वाली पक्की इमारत के कारण नाम पड़ा होगा और मड़वा, इस मंदिर के साथ जुड़ी रोचक बात कि मंदिर के सामने का स्तंभयुक्त मंडप, शादी के मड़वा जैसा है साथ ही इस स्मारक का एक नाम ‘दूल्हादेव’ मंदिर प्रचलित रहा है। इस मंदिर की बाहिरी दीवार पर जंघा में विभिन्न मिथुन मूर्तियाँ हैं, कुछ अजूबी भी। गर्भगृह के सामने से बाईं ओर परिक्रमा शुरू करें, तो काम-कला वाली मिथुन प्रतिमाओं का ‘अजीबपन’ बढ़ता जाता है और आखिरी पहुँचते तक शिशु को जन्म देती नारी प्रतिमा है। मिथुन प्रतिमाओं के कारण ‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो’ के नाम से इसकी ख्याति रही, खजुराहो काम- कला वाली मिथुन मूर्तियों का पर्याय बन गया। मंडपयुक्त संरचना, मड़वा वाले इस महल की मूर्तिकला से यह मान लिया गया है कि इस मंदिर की दीवार पर विवाह उपरांत गृहस्थ जीवन के काम पुरुषार्थ के लिए ‘कामसूत्र’ का शिल्पांकन किया गया है, जो नर-नारी समागम- संसर्ग से संतानोत्पत्ति करते वंशवृद्धि के ज्ञान देने वाली मूर्तियों में जीवंत प्रशिक्षण वाली पाठशाला जैसा है। कहा जाता है, यहाँ भाई- बहन का साथ जाने का निषेध है, मगर ऐसा अब तक नहीं सुना कि विवाह के बाद इस मंदिर के दर्शन और परिक्रमा करने का नियम है।

पश्चिमाभिमुख मड़वा महल मंदिर
दक्षिणी जंघा पर प्रतिमाएँ

कछार और छेरकी या छेरी यानि बकरी-बकरे को जोड़ कर सोचने का प्रयास करता हूँ। छेरकी महल के लिए कहा जाता है कि छेरी चराते हुए, बरसात हो जाने पर बकरी चराने वाले चरवार इस मंदिर में शरण लिया करते थे, संभव है मगर लगता है कि इस कछारी इलाके में गोपालक भी बड़ी तादाद में बकरा-बकरी पालन करते हैं इसलिए छेरी- चरवार हैं। फिर बात आती है कि क्या कछार और छेरी का रिश्ता शब्द ‘छ-र’ से आगे भी कुछ है। गोवंश और अजवंश के एक खास अंतर की ओर ध्यान जाता है। अजवंश की उपरी और निचली, दोनों दंतपंक्तियाँ होती हैं, जबकि गोवंश की उपरी दंतपंक्ति नहीं होती, इसलिए दोनों की चराई में अंतर होता है। संभव है कि सामान्य मैदानी घास-पात गोवंश के चरने भरण-पोषण के लिए अधिक उपयुक्त होता हो और कछारी भूमि की वनस्पति अजवंश, बकरे, घोड़े और हिरण परिवार के जीवों के लिए। इस क्षेत्र में देसी बकरे ही पाले जाते हैं जो बौनी-नीची झाड़ियों और घास वाली चराई क्षेत्र में graze करते हैं लंबे और लटके कान वाले जमनापारी बकरे, जो graze के बजाय browse करते हैं, ऐसे चराई क्षेत्र के लिए अनुकूल साबित नहीं होते। ‘हरिन छपरा’ गाँव भी दूर नहीं है। उल्लेखनीय कि यहाँ नाम छेरी-छेरकी है, इसी तरह सरगुजा में प्राचीन मंदिर ‘छेरकी नहीं छेरका’ हैं। खैर! अपनी विशेषज्ञता का क्षेत्र न हो तो उस पर बहुत बातें करना अपनी जांघ उघाड़ने जैसा है, फिर भी इतना तो मुँह मारा ही जा सकता है।

छेरकी महल मंदिर

यहाँ एक परत और है, छेरकी महल के आसपास लीलाबाई यादव जी मिल जाया करती थीं और पूछने पर धाराप्रवाह कहानी सुनाती थीं- ‘देवांसू राजा बिना महल के राखय छेरिया, त छेरकिन कहिस, अतका तोर छेरी-बेड़ी ला चराएं देव, फेर एको ठन महल नई बनाए। अभी हमर देवता-देवता के पहर हावय कोई समय मनखे के पहर आहि, त देखे-घुमे ल आही अइसे कहि के। त कस छेरकिन, महूं त एके झन हावंव, कइसे महल बनावंव कथे। चल त एकक कनि तोर छेरिया चराहूं, एकक कनि महल बनान लगहूं। त छेरी चरात-चरात छेरकिन अउ देहंसू राजा बनाय हे एला। बन लिस त भीतरी म दे छेरिया ओल्हियाय हे। त आघू छेरी के लेड़ी रहय इंहा, भीतरी म। ए मडवा महल, भोरमदेव कस भुईयां म गड्ढा रहिसे। त फर्रस जठ गे, माटी पर गे, छेरी लेड़ी मूंदा गे। अब पर्री परया अचानक भकरीन-भकरीन आथे, बकरा ओइले सहिं, तेखर सेती छेरकी महल आय एहर। अउ, भोरम राजा हर न भरमे-भरम में बने हे।’

मैदानी छत्तीसगढ़ के गाँवों में गुड़ बनाने के लिए सामुदायिक गन्ने की पैदावार, सामुदायिक रूप से बरछा में ली जाती थी। बरछा, तालाब के नीचे की भूमि होती थी। अब भोरमदेव, कवर्धा क्षेत्र की एक पहचान शक्कर कारखाना और गन्ना उपजाने वाले इलाके की भी है। यहाँ संकरी नदी है। छत्तीसगढ़ में सांकर, संकरी जैसी संज्ञाधारी कई-एक हैं, जिनमें ओड़ार संकरी, संकरी-भंइसा, संकरी-कोल्हिया जैसे ग्राम नाम और संकरी नदी को इन सब के साथ जोड़ कर देखना होगा। संकरी, वर्णसंकर है? सांकर यानी संकल-जंजीर है? संकरा यानी कम चौड़ा है? छत्तीसगढ़ी में कहा जाता है- ‘अलकर सांकर’। संकरी नदी के करीब का एक नाम चैतुरगढ़-कटघोरा-कोरबा वाली शंकरखोला की जटाशंकरी-अहिरन। इस तरह संकरी, शिव-शंकर के पास भी है। और क्या इसका शर्करा-शक्कर से जुड़ा होना संभव है। पुराने अभिलेखों में शर्करापद्रक, शर्करापाटक, शर्करामार्गीय, गुड़शर्कराग्राम जैसे स्थान-क्षेत्र नाम आते हैं, ये नाम क्या शक्कर से संबंधित हैं या नदी के रेत-कण को महिमामंडित किया गया है- बुझौवल तो है ही, ‘बालू जैसी किरकिरी, उजल जैसी धूप, ऐसी मीठी कुछ नहीं, जैसी मीठी चुप।’

जेन अभ्यास होता है, जिसमें सारे विचार ‘मू’ के अव्यक्त में पहुँचकर मौन हो जाते हैं, ‘चुप’।

Nov 2, 2025

धरोहरः चंदखुरी छत्तीसगढ़ में माता कौशल्या और राम की भूमि होने का प्रमाण

 - राहुल कुमार सिंह

भरोसे पर संदेह हो और भरोसा सच्चा हो तो उस पर किया गया हर संदेह अंततः उसे मजबूती देता है, कमजोर नहीं करता; इसलिए अपने संदेहों पर भरोसा रहे कि वे सत्य का मार्ग प्रशस्त करेंगे। सत्य, तथ्यों की तरह जड़ नहीं होता, जीवंत होता है और वह 'सच्चा-सच' है तो उस पर किया गया हर विचार, आपत्ति, उसके सारे पक्ष-कारक, अंततः उसकी चमक बनाए रखने में सहायक साबित होते हैं।

परलोक में भरोसा करने वाले जन-मानस के लिए इहलोक में प्रत्यक्ष और प्रचलित का महत्त्व कम नहीं होता। कोसल, कौशल्या, भांचा राम, सुषेण पर इसी तरह संदेह-भरोसे से विचार करने का प्रयास है, रहेगा। ध्यान रहे कि रामकथा के ग्रंथों में उसका लोकप्रिय पाठ तुलसीकृत रामचरित मानस है, तो शास्त्रीय मान्यता वाल्मीकि रामायण की है; किंतु पाठालोचन के विद्वान् इसके कम से कम तीन भिन्न पाठों को मान्यता देते हैं, इन पाठों में भी आंशिक भेद है। माना जाता है कि इसका कारण आरंभ में रामकथा का मौखिक रूप ही प्रचलित रहा, बाद में अलग-अलग लिखित रूप दिया गया। इसके साथ रामकथा और उसकी आस्था के लोक-प्रचलन की बहुलता और विविधता को, उस पर विचार-चिंतन के अवसर की तरह सम्मान करना समीचीन है।

रामलला, अयोध्या के साथ छत्तीसगढ़ में ननिहाल, भांचा राम और इससे संबंधित विभिन्न पक्षों की चर्चा फिर से हो रही है। इस क्रम में कुछ आवश्यक संदर्भों की ओर ध्यान दिया जाना प्रासंगिक होगा, इनमें मेरी जानकारी में चंदखुरी में कौशल्या मंदिर के सर्वप्रथम उल्लेख का संदर्भ इस प्रकार है-

The Indian Antiqury, VOL- LVI,-1927 में (राय बहादुर) हीरालाल का शोध लेख 'The Birth Place of the Physician Sushena' प्रकाशित हुआ था। 9 फरवरी 1913 को चंदखुरी में ग्रामवासियों ने उन्हें जलसेना (जल-शयन) तरई के बीच टापू पर रखे कुछ पत्थर बताए, जिन्हें वे बैद सुखेन मानकर पूजते हैं। हीरालाल ने यह भी उल्लेख किया है कि समान नाम के अन्य ग्रामों से इसकी भिन्न पहचान के लिए इसे ‘बैद चंदखुरी‘ कहा जाता है। (एक अन्य चंदखुरी रायपुर-बिलासपुर मार्ग पर है, जिसमें अब बैतलपुर ग्राम नाम से लुथेरन चर्च के अमेरिकन इवेंजेलिकल मिशन द्वारा संचालित कुष्ठ-आश्रम है।) इस विषयक मुख्य लेख की पाद टिप्पणी में कौशल्या के मंदिर का नामोल्लेख है।

प्रसंगवश, पुरातात्त्विक स्थलों के आरंभिक उल्लेख के लिए अलेक्जेंडर कनिंघम के सर्वे रिपोर्ट को खँगालना आवश्यक होता है। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के महानिदेशक कनिंघम ने प्राचीन स्थलों के सर्वेक्षण के लिए 1881-82 में इस अंचल का दौरा किया था, जिसका प्रतिवेदन पुस्तक रूप में वाल्युम-17 में प्रकाशित है। इसमें देवबलौदा, राजिम, आरंग, सिरपुर आदि स्थलों के अलावा आरंग और रायपुर के बीच नवागाँव का उल्लेख मिलता है, किंतु चंदखुरी का उल्लेख नहीं है। 1909 के रायपुर गजेटियर में तुरतुरिया के साथ लव-कुश और कोसल का उल्लेख है; किंतु चंदखुरी का नहीं। इसी प्रकार 1973 में प्रकाशित रायपुर गजेटियर में चंदखुरी का उल्लेख वहाँ के डेयरी फार्म के संदर्भ में हुआ है, न कि सुषेण या कौशल्या माता के लिए। स्थानीय स्रोतों द्वारा बताया जाता है- ‘तालाब के बीच टापू पर स्थित मंदिर अत्यंत प्राचीन है, जिसके गर्भगृह में रामलला को गोद में लिये माता कौशल्या की मूर्ति है। इस मंदिर का पुनरुद्धार सन 1973 में कराया गया।’

चंदखुरी स्थित ‘शिव मंदिर’ को राज्य संरक्षित स्मारक घोषित करने की अधिसूचना तिथि 5.3.1986 दर्ज है। संचालनालय, संस्कृति एवं पुरातत्त्व, छत्तीसगढ़ के प्रकाशन में इस स्मारक का उल्लेख इस प्रकार है-

‘राष्ट्रीय मार्ग क्रमांक 06 नागपुर-सम्बलपुर रोड पर 16 कि. मी. पर स्थित मंदिर हसौद से 12 किलोमीटर दूर चंदखुरी गाँव में बाएँ किनारे पर यह स्मारक अवस्थित है। इस मंदिर का निर्माण 10-11 वीं शती ईस्वी में हुआ था किन्तु इस मंदिर का अलंकृत द्वार तोरण किसी दूसरे विनष्ट हुए सोमवंशी मंदिर (काल- 8वीं शती ईस्वी) का है। इसकी द्वार शाखाओं पर गंगा एवं यमुना नदी देवियों का अंकन है। सिरदल पर ललाट बिम्ब में गजलक्ष्मी बैठी हुई हैं, जिसके एक ओर बालि-सुग्रीव के मल्लयुद्ध एवं मृत बालि का सिर गोद में रखकर विलाप करती हुई तारा का करुण दृश्य प्रदर्शित है। नागर शैली में निर्मित यह पंचरथ मंदिर है। इसमें मण्डप नहीं है। कुल मिलाकर यह क्षेत्रीय मंदिर का अच्छा उदाहरण है।’

इस विभागीय संरक्षित स्मारक का निरीक्षण 1993 में तत्कालीन प्र. उपसंचालक श्री जी. एल. रायकवार द्वारा किया गया था। श्री रायकवार ने इस स्मारक और स्थल के संबंध में जानकारी दी है कि- 

यह मंदिर मूल रूप से परवर्ती सोमवंशी शासकों के काल में निर्मित है, जिसका कलचुरि शासकों ने करवाया। मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। प्रवेश द्वार पर गंगा तथा यमुना का अंकन है। सिरदल पर गजलक्ष्मी तथा धनुष बाण सहित राम लक्ष्मण, बालि सुग्रीव युद्ध, विलाप करती तारा, मिथुन आकृति एवं अंत में अस्पष्ट आकृति है। मंदिर के प्रांगण में पीपल के पेड़ के नीचे अस्पष्ट देव प्रतिमाएँ, नंदी, अस्पष्ट देवी प्रतिमा, नागयुग्म, शैवाचार्य, भारवाहकगण तथा स्तंभ पर अंकित भारवाहक आदि की खंडित प्रतिमाएँ तथा स्थापत्यखंड रखे हैं।

श्री रायकवार ने यह भी उल्लेख किया है कि इस ग्राम में अनेक प्राचीन सरोवर हैं। मंदिर के निकट के एक सरोवर के मेड़ पर पीपल के पेड़ के जड़ के बीच प्राचीन जलहरी लम्बी प्रणालिका सहित तथा एक आदमकद पुरुष प्रतिमा का उर्ध्व भाग, फँसी हुई रखी है। खंडित पुरुष प्रतिमा का ऊर्ध्व भाग संकलन योग्य है। ग्राम में एक स्थान पर परवर्ती काल के 11 वीं 12 वीं सदी ईस्वी के भग्न मंदिर का अवशेष विमान है। इस भग्न मंदिर का अधिष्ठान क्षत-विक्षत होने पर भी आंशिक रूप से बच रहा है। यहाँ पर एक शिवलिंग तथा खंडित नंदी रखा हुआ है। ग्राम के एक घर में खंडित तीर्थंकर की प्रतिमा तथा अत्यधिक क्षरित प्रतिमा रखी हुई है जिसकी ये पूजा करते हैं। चन्दखुरी नाम संभवतः चन्द्रपुरी का अपभ्रंश है। सोमवंशी अथवा कलचुरियों के काल में निःसंदेह यह महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल रहा होगा।

यहाँ उपर्युक्त जानकारियों की प्रस्तुति का उद्देश्य, कि मूल स्रोत, प्राथमिकी-आरंभिक उल्लेख का विशेष महत्त्व होता है। साथ ही किसी स्थल विशेष पर विचार करते हुए, वहाँ से संबंधित दस्तावेज, अभिलेख आदि के साथ उस स्थान की प्रचलित परंपरा, नाम-शब्द, लोकोक्तियाँ, दंतकथाएँ, आस्था का भी न सिर्फ ध्यान रखना आवश्यक होता, बल्कि उनके संकेतों से खुलने वाली संभावनाओं को भी देखना-परखना होता है।

इस दृष्टि से विचारणीय कि छत्तीसगढ़ में ग्राम देवताओं के रूप में सुखेन जैसे नामों में देगन गुरु और परउ बइगा, बहुव्यवहृत और प्रतिष्ठित-सम्मानित है। देगन या दइगन, मूलतः देवगण गुरु अर्थात् वृहस्पति हो सकते हैं। परउ के अलावा अन्य- सुनहर, बोधी, तिजउ, लतेल बइगा जैसे कई नाम लोक में प्रचलित हैं। ऐसा माना जा सकता है कि इन नामों के प्रभावी बइगा, गुनिया, देवार, सिरहा, ओझा हुए, जिनकी स्मृति में थान-चौंरा बना दिया गया, जिसके साथ मान्यता जुड़ गई कि उनका स्मरण-पूजन, उस स्थान की मिट्टी या आसपास की वनस्पति, औषधि का काम करती है।

पारंपरिक-आयुर्वेद चिकित्साशास्त्र में माधव और वाग्भट्ट का नाम कम प्रचलित है, किंतु चरक, सुश्रुत नाम बहुश्रुत हैं। महाभारत में अश्विनीकुमार-द्वय से उत्पन्न वैद्य-चिकित्सक के रूप में जुड़वा नकुल-सहदेव का नाम आता है, उसी तरह रामकथा के संदर्भ में योद्धा, धर्म नामक वानर के पुत्र और वालि (बालि) के श्वसुर सुषेण की प्रतिष्ठा है, जिसने अमोघ शक्ति प्रहार से मूर्च्छित लक्ष्मण के उपचार के लिए संजीवनी बूटी (के साथ विशल्यकरिणी, सावर्ण्यकरिणी जैसे नाम भी मिलते हैं।) के लिए हनुमान को भेजा था। इस आधार पर संभव है कि चंदखुरी में कोई प्रसिद्ध वैद्य हुआ हो, वहाँ रामकथा-प्रसंग का शिल्पांकन है ही, तो उस वैद्य को सम्मान सहित याद करने के लिए उसे रामकथा के वैद्य सुषेण जैसा मानते याद किया जाने लगा हो।

इस प्रकार प्राचीन शिव मंदिर के शिल्पांकन में रामकथा के प्रसंगों के साथ एक अन्य स्थिति पर विचार भी आवश्यक है। कौशल्या के प्रतिमाशास्त्रीय लक्षण सामान्यतः प्राप्त नहीं होते और कहीं हों, तो सुस्थापित नहीं हैं। इसी तरह की स्थिति रामलला के साथ है। राम शिल्प में सामान्यतः द्विभुजी, धनुर्धारी दिखाए जाते हैं, मगर उनके बालरुप के लिए विशिष्ट प्रतिमाशास्त्रीय लक्षण का अभाव है। अतएव किसी नारी प्रतिमा के साथ शिशु रुप की प्रतिमा की पहचान कौशल्या और राम के रूप में की जा सकती है, विशेषकर तब यदि वह शिशु लिये हो और अंबिका का रूप न हो साथ ही तब विशेषकर, जब ऐसा शिल्पांकन रामकथा के अन्य प्रसंगों के साथ उपलब्ध हो।


इसी तरह चंदखुरी स्थल के प्राचीन शिव मंदिर के सिरदल पर रामकथा का बालि-सुग्रीव प्रसंग संबंधी शिल्पांकन, राम की सेना के वानर योद्धा सुषेण, जो बालि के श्वसुर भी हैं और वैद्य भी, इसलिए मूर्तिशिल्प में वानरमुख आकृति की पहचान बालि, सुग्रीव, हनुमान की तरह सुषेण के रूप में की जा सकती है, तो इस स्थान को कौशल्या माता और वैद्य सुषेण से संबद्ध करने का मूर्त आधार इस तरह भी संभव है।

नाम साम्य की दृष्टि से छत्तीसगढ़ के अन्य ग्रामों कोसला, कोसलनार, केसला, कोसिर, कोसा और मल्हार से प्राप्त ‘गामस कोसलिय’ अंकित मृण-मुद्रांक और मल्हार से ही प्राप्त महाशिवगुप्त बालार्जुन के ताम्रपत्र में आए नाम कोसलनगर की चर्चा भी अप्रासंगिक न होगी। साथ ही चंदखुरी नाम पर विचार करते हुए, मरवाही के पड़खुरी, पथरिया के बेलखुरी, बसना के भैंसाखुरी के साथ इसी नाम के अन्य ग्रामों को भी संदर्भ में रखना होगा तथा यह भी उल्लेखनीय है कि जनगणना रिपोर्ट में इस गाँव का नाम Chandkhuri नहीं बल्कि Chandkhurai (चंदखुरई?) इस तरह दर्ज है। स्मरणीय कि महाभारत के वनपर्व में उल्लिखित (दक्षिण) कोसल के ऋषभतीर्थ की पहचान सक्ती के निकट स्थित स्थल गुंजी-दमउदहरा से निसंदेह की जाती है। इसी तरह वायु पुराण के मघ-मेघवंशी कोसल नरेशों के नाम वाले प्राचीन सिक्के मल्हार से प्राप्त हुए हैं। समुद्रगुप्त की प्रसिद्ध, प्रयाग-प्रशस्ति में दक्षिणापथ विजय क्रम में पहले जिन दो राज्यों का नाम आता है, वे कोसल और महाकांतार हैं।

मल्हार से प्राप्त आरंभिक ईस्वी सदी का

ब्राह्मी ‘गामस कोसलिया’ अभिलिखित मृण-मुद्रांक

इन कथा-मान्यताओं का आधार यहाँ शिल्प में तलाशने का प्रयास है, उसी तरह यहाँ ऐसे शिल्प की रचना किए जाने के आधार में, इस स्थल का रामकथा भूमि होने की संभावना को बल मिलता है। स्थानीय अन्य जानकारियों और पार्श्व-परिप्रेक्ष्य की संबंधित कड़ियों को जोड़ने का प्रयास कर आस्था सम्मत इतिहास की छवि के समग्र रूप को निखार सकने की प्रबल और व्यापक संभावना यहाँ है। (सिंहावलोकन से)

Nov 1, 2024

धरोहरः रहस्यमयी लेपाक्षी मन्दिर

  - अपर्णा विश्वनाथ 

भारत मन्दिरों का देश है। हर-एक मंदिर की अपनी एक कहानी है, मान्यताएँ हैं, और विशेषताएँ हैं। उत्तर से दक्षिण तक पूरब से पश्चिम तक भारत के चप्पे-चप्पे में शताब्दियों पुरानी अनगिनत मन्दिर अद्भुत, अनोखी और अविस्मरणीय किस्से-कहानियों को कहते आज भी अडिग अपनी जगह बने हुए हैं।

ऐसे ही अनगिनत कलात्मक मंदिरों की शृंखला में सोलहवीं शताब्दी में बना एक अद्भुत मंदिर लेपाक्षी मन्दिर भी है। यह आंध्र प्रदेश के श्री सत्य साई जिले के एक छोटे से गाँव में है। यह गाँव लेपाक्षी गाँव के नाम से ही जाना जाता है। हिन्दुपुर से लगभग 15  और बेंगलुरु से 120 किलोमीटर दूरी पर स्थित है यह लेपाक्षी मन्दिर है।

वैसे तो पूरा मन्दिर ही अपने आप में अनूठा है। मन्दिर के बेजोड़ संरचना और अद्भुत शिल्पकला को मंदिर के हर-एक पत्थर में देखा और महसूस किया जा सकता है। मन्दिर आश्चर्यचकित, अद्भुत नक्काशियों, मूर्तियों और भित्ति-चित्रों से पटा पड़ा है। इन स्तंभों पर भगवान शिव के 14 अवतारों - नटराज, हरिहर अर्धनारीश्वर,  गौरीप्रसाद, कल्याणसुंदर इत्यादि के भित्तिचित्र उनके विभिन्न रूपों का चित्रण किया गया है। 

साथ ही यहाँ  रहस्यमयी झूलता खम्भा (Hanging pillars) इस मन्दिर का विशेष आकर्षण बिन्दु है। इसके अलावा यहाँ देखने के लिए विशालकाय शिवलिंग व नंदी की विशाल मूर्ति हैं जो एक ही चट्टान को काटकर बनाई गयी हैं। श्रीराम जी के पदचिन्ह, बड़े पत्थरों से बना विशालकाय गणेश और हनुमान जी की मूर्ति की भी अपनी कहानी है।

लेपाक्षी मन्दिर का रहस्य 

अतिश्योक्ति नहीं होगी अगर इसे अजीब और रहस्यमयी मंदिर कहा जाए तो। रहस्यमयी बात यह है कि इसका एक खंभा जमीन से कुछ सेंटीमीटर ऊपर हवा में लटका हुआ है और इसका रहस्य आज तक कोई नहीं सुलझा पाया है।

इसलिए इसे ‘हैंगिंग पिलर (झूलता हुआ स्तंभ) टेंपल’ के नाम से भी जाना जाता है। पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बिन्दु है यह रहस्यमयी तरीके से हवा में लटका हुआ खम्भा।

ब्रिटिश काल में भी ब्रिटिश इंजीनियरों ने इस रहस्य को सुलझाने की कोशिश में लटकते हुए खम्भे पर हथौड़े से वार किया था। बाकी खम्भों में दरारें पड़ीं; लेकिन यह झूलता खम्भा जस-का-तस रहा। आखिरकार यह बात सामने आई कि मंदिर का सारा वजन इस एक खम्भे पर ही है। ब्रिटिश लटकते हुए खम्भे के रहस्यमयी संरचना के सामने घुटने टेक दिए और हारकर वापस चले गए।

अर्ध मण्डप या अंतराल मण्डप 

मण्डप का निर्माण पूरा नहीं हो पाने के कारण इसे अर्ध या अंतराल मण्डप कहा जाता है।

मान्यता है कि इसी जगह भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था और देवताओं ने यहाँ नृत्य किया था।  उन्हीं की याद में विजयनगर राजाओं ने एक नृत्य मंडप का निर्माण किया। इसमें नक्काशीदार कुल सत्तर  (70) खम्भे हैं, जिसमें 69 खम्भे जमीन से जुड़े हुए हैं और एक खंभा छत से तो जुड़ा हुआ है लेकिन जमीन से जुड़ाव नहीं है। इसके पीछे का रहस्य आज तक कोई नहीं जान पाया है। 

इस खम्बे को लेकर किए जा रहे दावे में कितनी सच्चाई है यह जानने के लिए अधिकतर पर्यटक इस खम्बे के नीचे से बहुत सारी वस्तुएँ जैसे कपड़े, कागज़ आदि को खम्भे के नीचे से डालकर इधर से उधर खींचते और निकालते हैं।

बदलते समय में लोगों में मान्यता पनपी कि कोई भी खंभे के इस पार से उस पार तक कोई कपड़ा ले जाए, तो उनकी इच्छाएँ पूरी हो जाती है।

लेपाक्षी का इतिहास 

कुछ किंवदंतियों के अनुसार इसका संबंध #रामायण में श्रीराम और जटायु से है। मान्यता है कि जब रावण और जटायु के युद्ध में, जटायु हार गए और घायल होकर राम- राम चिल्लाते हुए इसी जगह पर गिर पड़े थे। कुछ समय पश्चात् श्रीराम जटायु को खोजते हुए आते हैं; तब उनकी दृष्टि निश्चेष्ट जटायु पर पड़ती है। भगवान राम जटायु का सिर अपनी गोद में रखकर ले-पाक्षी, लेपाक्षी अर्थात् उठो पक्षी (तेलुगु में ले का अर्थ उठो होता है) बार-बार बोलते रहे । अंततः जटायु अंतिम साँस लेते हुए भगवान श्रीराम के गोद में अपने प्राण त्याग दिए।

भगवान राम ने उसी स्थान पर जटायु का अंतिम संस्कार अपने हाथों से किया तब से उस स्थान का नाम लेपाक्षी पड़ गया और वहाँ निर्मित मन्दिर का नाम लेपाक्षी मन्दिर। यहाँ निर्मित तीन विशालकाय मन्दिर भगवान शिव, भगवान विष्‍णु और भगवान वीरभद्र को समर्पित  हैं।

इस मंदिर के निर्माण के पीछे भी कुछेक मान्यताएँ हैं -

मान्यता है कि यह सतयुग के समयकाल का है। इसलिए लेपाक्षी मंदिर का इतिहास अति-प्राचीन है। मान्यता है कि महर्षि अगस्त्य ने शिवजी के वीरभद्र रूप को समर्पित कर इस मंदिर  का निर्माण करवाया था। शिवलिंग के पीछे सात मुहं वाला विशाल नाग भी हैं। यह भारत के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक है जिसे एक ही चट्टान को काटकर बनाया गया है। इस मंदिर को वीरभद्र मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर में भगवान शिव वीरभद्र रूप में स्थित है। यह मन्दिर कुर्मासेलम की पहाडियों पर कछुए की आकार में बना बना हुआ है।

कुछ इतिहासकारों का कहना है कि इस मंदिर का निर्माण 16वीं सदी में विरुपन्ना और विरन्ना नाम के दो भाइयों ने कराया था, जो विजयनगर के राजा के यहाँ काम करते थे। 

मान्यताएँ जो भी हो लेकिन यहाँ की शिल्पकला और अद्भुत नक्काशी पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।

विश्वप्रसिद्ध विशालकाय नंदी

इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर  शिवजी की सवारी नंदी की एक विशाल मूर्ति है। यह विश्व में नंदी की सबसे विशाल मूर्ति है। लंबाई 27 फीट व ऊँचाई 15 फीट के आसपास है।

विश्वप्रसिद्ध विशालकाय नागलिंग 

 यह विश्व का सबसे बड़ा नागलिंग है। दुनिया भर से लोग इस अद्भुत व विशाल नागलिंग को देखने आते हैं। यह शिवलिंग एक पहाड़ पर स्थित है जिसे एक ही चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसे स्वयंभू शिवलिंग के नाम से भी जाना जाता है। शिवलिंग के पीछे सात मुहँ वाला विशाल शेषनाग भी विराजमान है जो इसे और ज्यादा अद्भुत और विशाल रूप देता है।

लेपाक्षी मंदिर पर साड़ियों के डिजाइन

लेपाक्षी मंदिर की एक और विशेषता यह हैं कि यहाँ की दीवारों के भित्तिचित्रों पर शिव के विभिन्न रुपों के अलावा उस समयकाल के कई प्रकार के साड़ियों के डिजाइन भी बने हुए हैं। जिन्हें भारत ही नहीं बल्कि् देश-विदेश के साड़ियों के जानकर देखने और इनका विश्लेषण करने के उद्देश्य से यहाँ आते हैं। 

आज लेपाक्षी साड़ियाँ और डिजाइन पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।

हनुमान जी और भगवान गणेश की विशालकाय मूर्ति जो एक ही पत्थर को तराश कर बनाई गई है भी यहाँ आने वाले सैलानियों का ध्‍यान आकर्षित करती है।

Oct 1, 2024

धरोहरः छत्तीसगढ़ में है माता कौशल्या का एकमात्र मंदिर

भगवान राम का ननिहाल ग्राम चंदखुरी 

हमारे देश में हर जगह भगवान राम के अनेक मंदिर हैं;  लेकिन उनकी माता कौशल्या का इकलौता मंदिर अगर कहीं देखने को मिलेगा, तो वह सिर्फ छत्तीसगढ़ में। कौशल्या माता का यह प्राचीन मंदिर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 27 किलोमीटर दूर ग्राम चंदखुरी में जलसेन तालाब के बीच स्थित है। 

इस स्थान को भगवान राम की माता कौशल्या की जन्मस्थली माना जाता है। प्रभु श्रीराम को गोद में लिये हुए माता कौशल्या की अद्भुत प्रतिमा इस मंदिर को दुर्लभ बनाती है। 1973 में  इस मंदिर का जीर्णोद्धार किए जाने की जानकारी मिलती है । अब पिछले वर्षों में तो माता कौशल्या का यह धाम और भी सुंदर और भव्य हो चुका है। इस प्राचीन मंदिर की खूबसूरती को देखने पर्यटक दूर- दूर से आने लगे हैं।  

माता कौशल्या का जन्मस्थान होने के कारण यह गाँव रामलला के ननिहाल के रूप में प्रसिद्ध है। यही वजह है कि दीपावली के अवसर पर कई दिनों तक ग्राम चंदखुरी  के साथ आस - पास के गाँवों में  घर- घर दिये जलाकर लंका पर विजय और राम जानकी की अयोध्या की वापसी का जश्न मनाते हैं।

भगवान राम की माता कौशल्या कोसल प्रदेश यानी छत्तीसगढ़ की राजकुमारी थी।   पद्म पुराण में उल्लेख है कि कौशल्या कोसलन राजकुमार की बेटी थीं। बाद के ग्रंथों में उन्हें दक्षिण कोसल के राजा सुकौशल और रानी अमृतप्रभा की बेटी बताया गया है। महाकौशल की पूरी प्रजा माता कौशल्या को बहन और भगवान श्रीराम को अपना भानजा मानते हैं। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ के लोग इस रिश्ते को आत्मीयता के साथ निभाते हैं। यहाँ के मूल  निवासी अपने भानजे-भानजियों को भगवान का रूप मानकर उनका बहुत सम्मान के साथ आदर सत्कार करते हैं तथा उनके पाँव छूकर उनका आशीर्वाद लेते हैं। 

पुरातात्त्विक जानकारी के अनुसार इस मंदिर को 8वीं 9वीं शताब्दी में सोमवंशी राजाओं ने बनवाया था, जबकि लोककथाओं के आधार पर यहाँ के राजा को माता कौशल्या ने सपने में दर्शन देकर कहा था कि वे इस स्थान पर मौजूद हैं। तब राजा ने सपने वाली उस जगह पर खुदाई करवाई, तो उन्हें यह मूर्ति प्राप्त हुई।  बाद में राजा ने मंदिर बनवाकर मूर्ति की स्थापना की। 

छत्तीसगढ़ का यह गाँव कौशल्या माता के मंदिर के लिए तो प्रसिद्ध है ही, साथ ही यह छोटा- सा गाँव कभी 126 तालाबों के लिए भी मशहूर रहा है।  इस क्षेत्र में गाए जाने वाले एक गीत में  छह कोरी छह आगर तालाब होने का उल्लेख है। एक कोरी बराबर 20,  अर्थात् छह कोरी मतलब हुआ 120 और छह आगर यानी छह और। इस प्रकार कुल 126 तालाब हुए। 

विभिन्न शोधपत्रों, अभिलेखों में यह भी उल्लेख है कि भगवान श्रीराम ने अपना वनवास काल छत्तीसगढ़ के अनेक स्थानों पर व्यतीत किया था। श्री राम ने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ दंडकारण्य में 10 साल का लंबा समय व्यतीत किया।  राम सबसे पहले अयोध्या से 20 किलोमीटर दूर तमसा नदी के तट पर पहुँचे। तमसा नदी पार करने के बाद  दंडकारण्य (छत्तीसगढ़ ) के घने जंगलों में पहुँचे।  दंडकारण्य में वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम छत्तीसगढ़ के कई जगहों से होकर गुजरे थे,  जिनमें सीतामढ़ी-हरचौका (कोरिया), रामगढ़, अम्बिकापुर (सरगुजा ), किलकिला (जशपुर ), शिवरीनारायण (जांजगीर -चांपा), तुरतिया वाल्मिकी आश्रम (बलौदा बाजार),चंदखुरी (रायपुर), राजिम (गरियाबंद), सिहावा सप्तऋषि आश्रम (धमतरी ),जगदलपुर (बस्तर ), रामाराम (सुकमा ) जैसे अनेक स्थलों में राम वनवास से जुड़ी अनेक स्मृतियाँ देखने को मिलती हैं।  इन साक्ष्यों को ही आधार मानते हुए अब क्षेत्र में राम वनगमन पथ को विकसित करने को लेकर बड़े पैमाने पर कार्य चल रहा है। इसके लिए 51 स्थलों को चिन्हित किया गया है। 

विश्वास है यह कार्य पूर्ण हो जाने के बाद संस्कारधानी छत्तीसगढ़ का नाम पर्यटन के क्षेत्र में प्रमुखता से लिया जाएगा। ( उदंती फीचर्स)

Jul 7, 2024

धरोहरः प्राचीन शहर हम्पी

  - अपर्णा विश्वनाथ 

अतिशयोक्ति नहीं होगी अगर भारत को ऐतिहासिक धरोहरों का कुंभ कहा जाए।

अतुल्य भारत के गौरवशाली इतिहास की आश्चर्यचकित कर देने वाली गाथाएँ भारत के कण- कण में रची बसी है। हरी भरी प्रकृति, इसकी विस्तृत बाहें, कलकल बहती नदियाँ और झरझर बहते झरने मानो भारत के सोने की चिड़ियाँ होने की दास्ताँ सुनाते हैं।

ऐसी ही एक समृद्धशाली इतिहास विशाल और विस्तृत हम्पी की भी है। जो आज के कर्नाटक राज्य में स्थित है।

इसके गौरवशाली और समृद्धशाली इतिहास की गाथा सदियों से अडिग यहाँ की पाँच-दस मंजिला जितनी ऊँची-ऊँची गोल चट्टानों के टीलें सुनाते हैं कि कभी तुंगभद्रा नदी के तट पर बसी हम्पी मध्यकालीन हिन्दू राज्य विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी। 

वर्तमान में यह आंध्र प्रदेश राज्य की सीमा से समीप मध्य कर्नाटक के पूर्वी हिस्से में बसा है।

हम्पी तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित पत्थरों और असाधारण प्रकृति से से घिरा एक पवित्र शहर है। यहाँ लगभग पाँच सौ से अधिक मंदिरों की ख़ूबसूरत शृंखलाएँ है। इसलिए इसे मंदिरों का शहर भी कहा जाता है।

अपने समृद्ध धरोहरों एवं असंख्य आकर्षणों के चलते यह देश दुनिया के प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों में से एक है।

कभी किष्किन्धा कहलाने वाले कर्नाटक के बारे में जानते हैं और अपनी जानकारी में थोड़ा सा इज़ाफ़ा करते हैं।

कहते हैं ना, हमारे भारत का समृद्ध इतिहास हमारे शेष बचे मंदिरों में दिखाई देते हैं।

हम्पी विजयनगर हिन्दुओं के सबसे विशाल साम्राज्यों में से एक था। सन्1336 ई. में इस साम्राज्य की स्थापना हरिहर और बुक्का नामक दो भाइयों ने की थी। 1509 से 1529 के बीच कृष्णदेव राय ने यहाँ शासन किया। विजयनगर साम्राज्य के अन्तर्गत कर्नाटक, महाराष्ट्र और आन्ध्र प्रदेश के राज्य आते थे। कृष्णदेव राय एक महान राजा थे। इनके बल बुद्धि और शासनकाल के अनेक प्रचलित किस्से हैं।

कृष्णदेव राय के दरबार में सलाहकार के रूप में पंडित चतुर तेनालीरामा को कौन नहीं जानता। नंदन और चंदामामा जैसे बाल पत्रिका बच्चों में खासा प्रचलित हुआ करती थी; क्योंकि उसमें नियमित रूप से तेनालीराम के मशहूर और पेट को गुदगुदाने वाले किस्से छपते थे। इन किस्से कहानियाँ के जरिए राजा कृष्णदेव राय के बारे में भी बच्चे जान लिया करते थे।

राज कृष्णदेव राय ने अपने शासनकाल में राज्य का काफी विस्तार किया और अधिकतर स्मारकों का निर्माण भी करवाया।

 वैसे हम्पी की सभी मंदिर अद्वितीय है लेकिन हम्पी के कुछ मन्दिर अद्भुत हैं- 

★विठ्ठल मन्दिर

निःसंदेह आश्चर्यचकित कर देनी वाली स्मारकों में से एक है। विठ्ठल मंदिर द्रविड़ वास्तुकला का अद्भुत नमूना है।

इसमें मुख्य आकर्षण इसकी 56 खम्भों वाला रंगमंडप है। इन्हें संगीतमय खंभे के नाम से जाना जाता है। क्योंकि इन खंभों को थपथपाने पर इनमें से संगीत की लहरियाँ निकलती है। 

★हम्पी रथ

दूसरे हॉल के पूर्वी हिस्से में अद्भुत और प्रसिद्ध शिला-रथ जिसे हम्पी रथ भी कहते हैं है। पत्थर का बना रथनुमा मन्दिर भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ को समर्पित है। यह द्रविड़ वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। ग्रेनाइट पत्थर को तराशकर इसमें मंदिर बनाया गया। यह एक रथ के आकार में है। कहा जाता है कि इसके पहिये घूमते भी थे और वास्तव में रथ पत्थर के पहियों से चलता था। आश्चर्यचकित करने वाला तथ्य यह भी कि शिला रथ का हर हिस्सा खुल जाता था। 

लेकिन अब रथ को बचाने के लिए इसपर सीमेंट का लेप लगा दिया गया है। अब यह अपनी जगह स्थिर है। ना जाने हम्पी ऐसे और कितने रहस्यमय, विस्मयकारी स्मारकों से पटा पड़ा है।

1986 में यूनेस्को ने इस प्राचीन शहर को विश्व विरासत स्थल घोषित कर संरक्षण में ले लिया है। 

★हम्पी वृक्ष

 हेमकूट मन्दिर परिसर में इस वयोवृद्ध वृक्ष को विठ्ठल वृक्ष/ रथ वृक्ष कहा जाता है। इसका नाम तेलुगु में नूर वरहालू ,हिन्दी में गुलचीन/ क्षीर चंपा, कन्नड़ा में देव कनागिले तथा अंग्रेजी नाम प्लूमेरिया है। इस पेड़ की उम्र 158 साल बताई जाती है। इस वैभवशाली पेड़ की विशालता देखते बनती है।

★विरूपाक्ष मन्दिर

 इसका निर्माण राजा कृष्णदेव राय ने 1509 में अपने राज्याभिषेक के समय बनवाया था और हम्पी शहर के भगवान विरूपाक्ष ( विष्णु) को समर्पित किया था। इसे पंपापटी मंदिर भी कहा जाता है। 

Nov 6, 2023

धरोहरः कलचुरी कालीन भगवान शिव का प्राचीन मंदिर देव बलोदा


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 25 किमी की दूरी पर स्थित है देव बलोदा जो भिलाई रेलवे स्टेशन से लगभग 2 मील की दूरी है। यहाँ भगवान शिव का छह मासी प्राचीन मंदिर है। यह भी कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण सिर्फ 6 महीने में हुआ था इसीलिए इसे छह मासी शिव मंदिर भी कहते हैं। कलचुरी काल में बने ग्यारहवीं
बारहवीं शती के इस शिव मंदिर को प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्त्विक महत्त्व का घोषित किया गया है। बलुआ प्रस्तर से बने इस मंदिर में सबसे खास बात कि इस मंदिर का शिखर ही नहीं है। इस मंदिर की तुलना भोरमदेवखजुराहो तथा अजंता की गुफाओं से भी की जाती है। नागर शैली में बने इस मंदिर में विष्णु के दशाअवतारगणेशसरस्वतीशिव-पार्वतीमहिषासुरमर्दिनी सहित पाँच पांडवभैरवकर्ण एवं अर्जुन युद्ध आदि कई विशेष प्रसंगों को मूर्तियों में दर्शाया गया है।
शिव-पार्वतीमहिषासुरमर्दिनी सहित पाँच पांडवभैरवकर्ण एवं अर्जुन युद्ध आदि कई विशेष प्रसंगों को मूर्तियों में दर्शाया गया है।
मंदिर एक ऊंची जगती पर निर्मित है। मंदिर के मंडप में प्रवेश करने के लिए सात सोपानों की व्यवस्था है। मंडप खुले रूप में है। गर्भगृह के बाहर दोनों तरफ दो आले हैं जिसमें अलग-अलग रूप में गणेश जी विराजमान हैं। स्तंभों में भी विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। मंदिर के द्वार के ऊपर गणेश जी की मूर्ति स्थापित है और उसके ऊपर सरस्वती जी की। ऊपर की ओर सात विभिन्न देवी मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। गर्भगृह में प्रवेश करने के लिए 5 सोपान नीचे उतरकर पहुँचा जा सकता है। जहाँ बीच में शिवलिंग प्रतिष्ठित है।
गर्भगृह के द्वार के दायीं तथा बायीं तरफ भी शिव की मूर्तियाँ उत्कीर्ण है। शिव की मूर्ति चतुर्भुजी है। एक हाथ में डमरूएक हाथ में त्रिशूलएक हाथ वरद मुद्रा में तथा एक हाथ में आयुध लिये खड़े हैं। सिर पर जटाजूट है।
कानों में कुंडलगले में हार है। पास में नंदी और नाग का अंकन है। मंदिर की बाह्य दीवारों पर एक के ऊपर एक पाँच पंक्तियों में अनेक तरह के दृश्य उत्कीर्ण है। दीवार के सबसे नीचे भाग में हाथियों का अंकन है। इनमें कहीं-कहीं दो हाथी एक दूसरे की तरफ सूँड किए हैं तो किसी दृश्य में एक के पीछे एक हाथी है तो कहीं हाथी एक दूसरे की तरफ पीठ किए हुए हैं।
मंदिर के प्रवेश द्वार पर नंदी की एक मूर्ति है। मंदिर के गर्भगृह में भूरे रंग का शिवलिंग है। मंदिर के भीतर भगवान शिवभगवान गणेश की मूर्तियों के साथ अन्य देवताओं की मूर्तियाँबाहर की दीवारों में योद्धाओं की मूर्तियाँपुरुषों और महिलाओं के नृत्य करती मूर्तियाँजानवरों की मूर्तियाँ भी शामिल हैं। एक स्थान पर रीछ का आखेट करते हुए दिखाया गया है। दीवारों में कई दृश्यों में रीछ का रूप उत्कीर्ण किया गया है जिन्हें मारने के लिए शिकारी हाथों में बरछा लिये हुए हैं। दीवारों पर अनेक मिथुन मूर्तियाँ भी दर्शायी गई हैं। घुड़सवारों के कई दृश्य हैं। एक दृश्य में दो बैलों को लड़ते हुए दिखाया गया है। एक स्थान पर शिव को त्रिशूल और डमरू लिए हुए दिखाया गया है तो गणेश नृत्य मुद्रा में हैं। एक चित्र में रथ पर सवार हाथ में धनुष-बाण लिए योद्धा का है। शिव अनेक स्थलों पर डमरूत्रिशूलकमंडल लिए अंकित है। एक दृश्य में मूर्ति में शरीर मानव का और मुख पशु का है। मंदिर के प्रवेश द्वार के सोपान के दोनों तरफ एक ही तरह के दृश्य दिखाई देते हैं। दोनों तरफ द्वारपाल का अंकन है। एक दृश्य में सोपान के दोनों तरफ पालकी कंधे पर उठाए दो व्यक्ति हैं। एक दृश्य में पालकी में बैठा व्यक्ति स्पष्ट दिखाई दे रहा हैपरंतु दूसरे दृश्य में पालकी में बैठे व्यक्ति का अस्पष्ट अंकन है। पीछे कोई खड़ा है। हर तरफ की दीवार में दो-दो आले हैंजो रिक्त हैं। तीन व्यक्तियों की दृश्यावली रोचक है मध्य में स्त्री खड़ी हैउसके दूसरी तरफ नृत्य करते हुए और एक तरफ डमरू बजाते हुए नृत्य-गान का दृश्य है। उसके पास वाले दृश्य में पाँच व्यक्ति विविध प्रकार के आयुधों को लिये हुए दिखाए गए हैं। इनमें एक का मुख अस्पष्ट है एक का सिर नहीं है। एक मूर्ति पशु पर सवार अष्टभुजी है। ज्यादातर दृश्य नृत्य-गान तथा आखेट के हैं। मंदिर के भीतर चार स्तंभों पर उत्कीर्ण मूर्तियाँ तथा प्रवेश द्वार के चौखट पर शिल्प का श्रेष्ठ काम किया गया है।
मंदिर परिसर में एक बावड़ीनुमा कुंड है। कहते
इस कुंड का पानी कभी नहीं सूखता। कुंड में नीचे जाने के लिए सीढ़ियाँ भी बनी हुई हैं। देवबलोदा के इस मंदिर प्रांगण में प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि में एक बड़ा मेला भरता है।मंदिर के बारे में कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं- कि मंदिर को बनाने वाला शिल्पी इसे अधूरा छोड़कर ही चला गया थाइसलिए इसका गुंबद ही नहीं बन पाया। तथा कुंड के भीतर ऐसा गुप्त रास्ता हैजो आरंग में निकलता है। मंदिर के निर्माण से जुड़ी एक कहानी यह भी है कि जब इस मंदिर का निर्माण किया जा रहा थाउस दौरान छह महीने तक लगातार रात ही थीलेकिन खगोल के इतिहास में ऐसी घटना का कहीं भी उल्लेख नहीं है।
संस्कृतिविद्‌ एवं शिक्षक रामकुमार वर्मा बताते हैं कि शायद मंदिर के निर्माण में लंबा समय लगा होगा और लोगों ने इस लंबे समय की बात को छमासी रात में बदल दिया।
मंदिर के बारे में एक दूसरी किंवदंती भी है कि जब शिल्पकार मंदिर को बना रहा थातब वह इतना लीन हो चुका था कि उसे अपने कपड़े तक की होश नहीं थी। दिन रात काम करते-करते वह नग्न अवस्था में पहुँच चुका था। उस कलाकार के लिए एक दिन पत्नी की जगह बहन भोजन लेकर आई। जब शिल्पी ने अपनी बहन को सामने देखातो दोनों ही शर्मिंदा हो गए। शिल्पी ने खुद को छुपाने  के लिए मंदिर के ऊपर से ही कुंड में छलांग लगा दी। बहन ने देखा कि भाई कुंड में कूद गया तो इस गम में वह बगल के तालाब में कूद गई। आज भी कुंड और तालाब दोनों मौजूद है और तालाब का नाम भी करसा तालाब पड़ गयाक्‍योंकि जब वह अपने भाई के लिए भोजन लेकर आई थीतो भोजन के साथ सिर पर पानी का कलश भी था। तालाब के बीचोबीच कलशनुमा पत्थर आज भी मौजूद है। कुंड के बारे में लोगों का कहना है कि इस कुंड के अंदर एक गुप्त सुरंग हैजो सीधे आरंग के मंदिर के पास निकलती है। वह शिल्पी जब इस कुंड में कूदातब उसे वह सुरंग मिली और उसके सहारे वह सीधे आरंग पहुँच गया। बताया जाता है कि आरंग में पहुँचकर वह पत्थर का हो गया और आज भी वह पत्थर की प्रतिमा वहाँ मौजूद है। इस कुंड में 23 सीढ़ियाँ है और उसके बाद दो कुएँ है। इसमें से एक पाताल तोड़ कुआँ है जिससे लगातार पानी निकलता है। ( उदंती फीचर्स)

Aug 1, 2023

धरोहरः प्राचीनतम गुफा- नाट्यशाला रामगढ़



 छत्तीसगढ़
कला और संस्कृति का गढ़ माना जाता है । जहाँ की रंग-परंपरा दुनिया में सबसे पुरानी मानी जाती है। आखिर दुनिया की सबसे प्राचीन और एकमात्र  नाट्य शाला छत्तीसगढ़ में जो स्थित है।  रामगढ़ की पहाड़ी पर स्थित सीताबोंगरा और जोगमारा गुफा में प्राचीन नाट्य शाला के प्रमाण मिले है जहाँ आधुनिक थियेटर की तरह सीताबोंगरा गुफा के भीतर मंच , बैठक व्यवस्था आदि के साथ शैल चित्र भी मिले हैं ।  इसीलिए सीताबोंगरा गुफा को छत्तीसगढ़ में रंगकर्म की परंपरा का जीवंत प्रमाण के रूप में देखा जाता है।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 280 किलोमीटर दूर सरगुजा जिले के मुख्यालय अंबिकापुर से 50 किलोमीटर दूर रामगढ़ की पहाड़ियाँ हैं। इन्ही पहाड़ियों में कुछ गुफाएँ हैं। प्राप्त साक्ष्य और अध्ययन के आधार पर कहा जाता है कि यहीं भगवान राम ने अपने वनवास का कुछ समय पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ रामगढ़ के पर्वतों में बिताया था। राम के तपस्वी वेश के कारण दूसरी छोटी गुफा को जोगीमढ़ा कहा जाता है तथा तीसरी गुफा को लक्ष्मण के नाम पर ‘लक्ष्मण गुफा’ का नाम दिया गया है। अनुसंधानों से पता चला है कि लगभग दो हजार साल पूर्व यहाँ नाट्य मण्डप बनाया जाता था, जहाँ  अनुमान है कि उस काल में क्षेत्रीय राजाओं द्वारा भजन-कीर्तन और नाटक करवाए जाते रहे होंगे।

मुख्यगुफा को सीता बेंगरा के नाम से जाना जाता है, अर्थात सीता का गुफा। यही सीता बेंगरा तीन कमरों वाली विश्व की प्राचीनतम नाट्यशाला के रुप में प्रचारित है जिसे ‘रामगढ़ नाट्यशाला’ या ‘रामगिरि’ पर्वत भी कहते हैं। सरगुजा बोली में बेंगरा का अर्थ कमरा होता है। यानी यह सीता का कमरा था। प्रवेश द्वार के समीप खंभे गाड़ने के लिए छेद बनाए हैं तथा एक ओर भगवान राम के चरण चिह्न अंकित हैं। मान्यता है कि ये चरण चिह्न महाकवि कालिदास के समय भी थे। मेघदूतम् में रामगिरि पर अप्सराओं की उपस्थिति का भी उल्लेख मिलता है।

सीता बेंगरा गुफा पत्थरों को गैलरीनुमा आकार में काट कर बनाई गई है। नाट्यशाला को प्रतिध्वनि रहित करने के लिए दीवारों में छेद किया गया है। गुफा तक जाने के लिए पहाड़ियों को काटकर सीढ़ियाँ बनाई गई हैं। जहाँ लगभग 30 लोग आराम से बैठ सकते हैं। इसके प्रवेश द्वार पर बाई ओर ब्राह्मी लिपि और माघी भाषा में दो पंक्तियाँ लिखी हुई हैं।

पुरातत्वेत्ताओं के अनुसार प्राप्त शिलालेखों से पता चलता है कि सीताबेंगरा नामक गुफा ईसा पूर्व दूसरी-तीसरी सदी की है। देश ही नहीं संभवत: पूरी दुनिया में इतनी पुरानी और कोई दूसरी नाट्यशाला कहीं नहीं है। 

1848 में कर्नल आउस्ले ने इस नाट्यशाला को सबसे पहले सबके सामने लाया था। 1903-04 में डॉ. जे. ब्लाश ने इसे आकेलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में प्रकाशित किया। जिसके अनुसार नाट्यशाला की लंबाई 44.5 फीट और चौड़ाई 15 फीट है। प्रवेश द्वार गोलाकार और लगभग छह फीट ऊँचा व दीवारें लम्बवत् है।

गुफा के बाहर दो फीट चौड़ा गड्ढा भी है जो सामने से पूरी गुफा को घेरता है। मान्यता है कि यही लक्ष्मण रेखा है, इसके बाहर एक पाँव का निशान भी है। इस गुफा के बाहर एक सुरंग है। इसे हथफोड़ सुरंग के नाम से जाना जाता है। इसकी लंबाई करीब 500 मीटर है। इस पहाड़ी में भगवान राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान की 12- 13वीं सदी की प्रतिमाएँ भी मिली हैं।

1906 में पूना से प्रकाशित वी के परांजपे के शोधपरक व्यापक सर्वेक्षण के ‘ए फ़्रेश लाइन ऑफ मेघदूत’ में यह बताया गया है कि रामगढ़ (सरगुजा) ही राम की वनवास स्थली और मेघदूतम की प्रेरणास्नोत रामगिरी है।

इतिहासकार भी रामगढ़ की पहाड़ियों को रामायण में वर्णित चित्रकूट मानते हैं। साथ ही संस्कृत के विद्वान्‌ भी रामगढ़ को महाकवि कालिदास की तपोभूमि मानते हैं जहाँ बैठकर उन्होंने अपनी कृति ‘मेघ दूत’ की रचना की थी। मान्यता के अनुसार महाकवि कालिदास ने जब राजा भोज से नाराज हो उज्जयिनी का परित्याग किया था, तब उन्होंने यहीं शरण ली थी और महाकाव्य मेघदूत की रचना इन्हीं पहाड़ियों पर बैठकर की थी।

इसी मान्यता के आधार पर इस स्थान पर प्रति वर्ष आषाढ़ के महीने में बादलों की पूजा की जाती है। देश में संभवत: यह अकेला स्थान है, जहाँ बादलों की पूजा करने की परंपरा प्रचलित है।

रामगिरि के इस अनोखे और एकमात्र नाट्यशाला को देखने के लिए आप बारिश का मौसम चुनेंगे तो आप प्रकृति के बीच वहाँ की सीढ़ियों पर बैठकर उस काल में होने वाले नाट्य अभिनय की कल्पना कर भी सकेंगे। पर्यटन विभाग द्वारा यहाँ आषाड़ के माह में विभिन्न सांस्कृति कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं। ( उदंती फीचर्स) ■■

Apr 1, 2023

18 अप्रैल- विश्व विरासत दिवसः भव्य इतिहास समेटे डीपाडीह का पुरातत्व

  -  डॉ. रत्ना वर्मा

प्राचीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध डीपाडीह छत्तीसगढ़ के सरगुजा सम्भाग के बलरामपुर जिले का महत्त्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल, है जो अंबिकापुर से 73  किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सरगुजा जिले में सरगुजा का 50 फीसदी हिस्सा जंगलों और पहाड़ों से घिरा हुआ है, यहाँ के जंगलों में सरना  के पेड़ बहुतायत से पाए जाते हैं। 

रामायण और महाभारत जैसे महान ग्रंथों में भी सरगुजा का उल्लेख है। दक्षिण कौशल का ये भूभाग पाटलीपूत्र से जगन्नाथपुरी तक जाने का मुख्य मार्ग था। पुराणों के अनुसार यह प्रमाण भी मिलता है कि भगवान राम ने अपने 14 सालों के वनवास का कुछ समय सरगुजा में भी बिताया था।

 सन्‌ 1988 में डीपाडीह के बारे में अध्ययन के लिए जब पुरातत्व विभाग पहुँचा तो डीपाडीह के पहाड़ी टीले में नंदी की एक भव्य मूर्ति (जो छत्तीसगढ़ के अब तक ज्ञात प्रतिमाओं में विशालतम है) तथा सामंत राजा की एक मूर्ति दिखाई दे रही थी। जैसे- जैसे खुदाई का काम आगे बढ़ते गया डीपाडीह का भव्य इतिहास भी सामने आता गया। यहाँ कई मंदिरों के खंडित अवशेष प्राप्त हुए हैं जो प्राचीन इतिहास की कहानी कहते हैं। पुरातात्त्विक प्रमाणों के आधार पर डीपाडीह का सांस्कृतिक वैभव 7-8 वीं से 12-13 वीं सदी ईसवी का माना जाता है जहाँ शैव एवं शाक्य संप्रदाय के पुरातात्त्विक अवशेष बिखरे हुए हैं। खुदाई में अनेक शिवलिंग, नदी तथा देवी दुर्गा की कलात्मक मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।

 लगभग 6 किलोमीटर के दायरे में प्राचीन भग्न मंदिरों के अवशेष टीलों के रूप में यत्र- तत्र बिखरे हुए हैं। लगभग 30 मंदिरों के ध्वंसावशेष, शैव, सौर, वैष्णव, तथा शाक्य धर्म से सम्बंधित अवशेष, मानवाकार विशाल मूर्तियाँ- श्री गणेश, शिव, विष्णु, महिसासुरमर्दिनी, देवी गंगा, यमुना, सूर्य, भेरव, ब्रम्हा, कार्तिकेय, नृसिंह, सामत राजा, सिंह, कुबेर, मिथुन इत्यादि मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं । यहाँ का द्वारशाखा, अति विशिष्ट है इसके सिरदल में गजलक्ष्मी का अंकन है। इस क्षेत्र के दर्शनीय स्थालों में प्रमुख रूप से सामत झरना, रानी पोखर, चामुण्डा मंदिर, पंचायतन मंदिर है।

खुदाई के दौरान प्राप्त अनेक मंदिरों में  अधिकांश शिव मंदिर है। सामत झरना का शिव मंदिर इन मंदिरों में सबसे बड़ा एवं भव्य है। शाक्ये एवं शैव समुदाय के भी पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए हैं। इन अवशेषों में महिषासुर मर्दिनी, शिवलिंग, उमामहेश्ववर, एवं भैरव की रुद्र प्रतिमाएँ शामिल हैं। ब्रह्मा जी की एक मूर्ति भी प्राप्त हुई है, जिसकी दाढ़ी मूँछ नहीं है। इस पहाड़ में एक प्राचीन अभिलेख भी प्राप्त हुआ है, जिस पर नागरी लिपि में "ओम नमो विश्कपर्माय' अंकित है।

 प्राप्त साक्ष्य के आधार पर डीपाडीह प्राचीन काल में भगवान शिव के आराधना का एक बड़ा केन्द्र रहा होगा। खुदाई में प्राप्त विभिन्न देवताओं की प्रतिमाओँ से यह भी पता चलता है कि कलचुरी और सामंती राजा भगवान शिव के बहुत बड़े उपासक थे।

लगभग एक दशक की खुदाई के बाद खुदाई  के दौरान मिले अवशेषों  के आधार पर  पुरातत्वविदों ने इन्हें चार समूहों में बांट दिया है- 

1. सामंत सरना , 2.बीरजा टीला, 3. रानी पोखर मंदिर , 4. उरांव टोला मंदिर

इनमें सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण समूह है सामंत सरना है। इस समूह में एक विशाल  शिवमंदिर, चामुंडा मंदिर और छोटे बड़े आकार के अनेक मंदिर स्थित हैं। प्रमुख शिव मंदिर के प्रवेश द्वार पर द्वारपाल और मंदिर के चारों कोनो में चार अलग- अलग देवता विराजमान हैं। मंदिर के द्वार पर गंगा और यमुना नदी देवियाँ खड़ी है। मंदिर में मंडप के एक कोने में मोर की सवारी करते कार्तिकेय, दूसरी तरफ गणेश, तीसरी तरफ सोलह भुजी विष्णु की मुर्ति और चौथी तरफ महिषासुरमर्दिनी माँ नवदुर्गा की प्रतिमा स्थित है। भगवान शिव के इस विशाल मंदिर के पास ही वर्गाकार चबूतरे पर चामुण्डा मंदिर के भग्न अवशेष मिले हैं।

प्राचीन मंदिरों का दूसरा समूह बीरजा टीला के नाम से जाना जाता है इस समूह में सूर्य देवता को प्रमुख माना गया है। इस मंदिर के पास ही तत्कालीन आवासीय मठों के अवशेष भी मौजूद है। 

तीसरे समूह के रुप में रानी पोखर मंदिर समूह है। यहाँ चार मंदिर थे। लेकिन अब वहाँ सिर्फ चबूतरे ही शेष रह गये हैं। 

 चौथे समूह में उराँव टोला मंदिर आता है जिसका निर्माण 8वीं सदी का माना जाता है। यहाँ के स्तंभों में देव प्रतिमाएँ मिथुन युगल मूर्तियाँ और नायिकाओं की मूर्तियाँ अंकित है।

सोमवंशी, बंगाल और मगध के पालवंशी राजाओं के अलावा त्रिपुरी के कलचुरी राजाओं के बनवाए गए अवशेषों की भी इस जगह पर भरमार है। माना जाता है कि प्राचीन काल में इन मूर्तियों का निर्माण भी यही पर होता था। इस क्षेत्र की खुदाई में प्राप्त अनेक मूर्तियों को सहेजकर मूर्तिशाला में रखा गया है जिनमें भैरव, ब्रह्मा, कालमहेश्वर, गणेश, सूर्य और चामुंडा आदि देवी देवता शामिल हैं।

क्षेत्रीय किंवदंती के अनुसार इस स्थान पर भगवान राम का भव्य महल था जहाँ रात-दिन अखण्ड रूप से एक विशाल दीपक जलता रहता था। इसका कारण इसका नाम दीपा पड़ा तथा बाद में इसका नाम डीपाडीह हो गया। एक दूसरी किंवदंती के अनुसार यहाँ टांगीनाथ और सामत राजा के बीच युद्ध हुआ था जिसमें राजा के वीरगति  प्राप्त होने के बाद उसकी रानियों ने बावड़ी में कूदकर प्राण त्याग दिए थे। 

 पुरातात्विक पर्यटन स्थलों को देखने में रुचि रखने वालों के लिए छत्तीसगढ़ से अच्छा और कोई स्थान हो ही नहीं सकता।  अनेक महत्त्वपूर्ण पुरातन क्षेत्रों के साथ डीपाडीह के प्राचीन मंदिर को देखने के लिए एक बार अवश्य जाना चाहिए। यहाँ पर आपको  मंदिरों के इतने अधिक अवशेष देखने को मिलेंगे कि उस काल के कारीगरों की कला की दाद दिए बगैर आप नहीं रह सरते। यहाँ मंदिरों के अवशेष 5 किमी. के क्षेत्र में बिखरे पड़े हैं। जो एक खुले मैदान में संग्रहालय की तरह है। तो एक बार छत्तीसगढ़ अवश्य आइए और मंदिरों की इस पुरातन नगरी डीपाडीह की भव्यता को निहारते हुए सरगुजा के जंगल और पहाड़ों का आनंद लीजिए। 

Jan 1, 2023

धरोहरः छत्तीसगढ़ के सिरपुर में है विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध विहार


 - डॉ. रत्ना वर्मा
छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों में सिरपुर का विशेष स्थान है।महासमुंद ज़िले में स्थित सिरपुर प्राचीन बौद्ध परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहाँ स्थित विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध विहार आज भी छत्तीसगढ़ की समृद्ध विरासत की कहानी कहता है।

इस बार जब सिरपुर की यात्रा पर जाना हुआ तो लक्ष्मण मंदिर, राम मंदिर और के अलावा जिन स्थानों पर अधिक समय हमने बिताया, वह यहाँ अलग- अलग जगह पर मिले विभिन्न बौद्ध विहारों की यात्रा थी जो अपने आप में बेहद रोमांचक और यादगार रही। मेरे लिए यह गौरव का विषय है कि मैं उस प्रदेश की निवासी हूँ जहाँ सिरपुर है और इसी सिरपुर में विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध विहार है।

पिछले अनेक वर्षों से की जा रही सिरपुर की खुदाई में हर बार कुछ नया देखने को मिलता है यही कारण है कि सिरपुर की यात्रा मेरे लिए हमेशा एक अलग और नया अनुभव देने वाला होता है।  बस यहाँ एक कमी बहुत खलती है और वह है ठहरने और भोजन की समुचित व्यवस्था का न होना। इतनी भव्यता समेटे होने के बावजूद भी पर्यटन के रूप में इस क्षेत्र का जैसा विकास होना चाहिए नहीं हो पा रहा है। शायद हम इसके विश्व धरोहर में शामिल होने की बाट जोह रहे हैं।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 85 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सिरपुर में छठवीं शताब्दी के 184 टीलों को खुदाई के लिए तय किया गया था,  खुदाई अभी भी जारी है जिसमें शिवमंदिर, विष्णु मंदिर, बौद्ध विहार, लक्षमण मंदिर, जैन विहार, राजमहल, सुरंग टीला, बाजार के साथ यज्ञशाला, स्तूप और रहवासी मकानों के अवशेष मिले हैं। आगे की खुदाई में न जाने और क्या क्या  मिलेगा।

केंद्र सरकार ने देश के पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बौद्ध सर्किट तैयार किया है। इसी बौद्ध सर्किट में छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक पुरातात्विक स्थल सिरपुर को शामिल कर लिया गया है।। सिरपुर को बौद्ध सर्किट-3 में जगह दी गई है। ज्ञात रहे कि बौद्ध सर्किट एक में गया, वाराणसी, कुशीनगर, और लुंबनी (नेपाल) की यात्रा  शामिल है। लुम्बिनी - जहाँ भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था, बोधगया- जहाँ उन्होंने आत्मज्ञान प्राप्त किया, सारनाथ, जहाँ उन्होंने प्रचार किया, कुशीनगर जहाँ उन्हें मुक्ति मिली।

जैसा कि इतिहास में दर्ज है ईसा पूर्व छठवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग सिरपुर आए थे। उन्होंने अपने यात्रा वृतांत में जिस राजधानी का जिक्र किया है वह सिरपुर ही है। चीनी यात्री ह्वेनसांग की भारत यात्रा पर थामस वार्ट्स ऑन युवांग चांग की ट्रेवल्स इन इंडिया नामक पुस्तक भी प्रकाशित हुई थी। व्हेन सांग की यात्रा वृत्तांत में सिरपुर का उल्लेख है। ह्वेनसांग ने सन्‌ 618 में छत्तीसगढ़ की पहली यात्रा की थी।  जब इस स्थान की खुदाई की गई तो वे सभी बातें सत्य पाई गई जिनका उल्लेख ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा वृत्तांत में किया है। उनके अनुसार यह तथ्य भी उजागर हुआ है कि भगवान बुद्ध के चरण भी छत्तीसगढ़ में पड़े थे।

ह्वेनसांग ने श्रीपुर के दक्षिण की ओर एक पुराने बिहार एवं अशोक स्तूप का वर्णन किया था, जहाँ भगवान बुद्ध ने शास्त्रार्थ में विद्वानों को पराजित कर अपनी आलौकिक शक्ति का प्रदर्शन किया था। इतिहासकारों के अनुसार यह बात भी प्रमाणित होती है कि जहाँ- जहाँ भगवान बुद्ध के चरण पड़े वहाँ वहाँ अशोक स्तूप का निर्माण कराया गया था। ह्वेनसांग के यात्रा वृतांत में यह बात प्रमाणित भी होती है।

सिरपुर में अब तक 10 बौद्ध विहार और लगभग 10000 बौद्ध भिक्षुओं के अध्ययन के पुख्ता प्रमाण मिल चुके हैं। इसके अलावा यहाँ कई बौद्ध स्तूप और बौद्ध विद्वान नागार्जुन के आने के प्रमाण मिले हैं। यह स्थल गया के बौद्ध स्थल से भी बड़ा है। अभी तक यह माना जाता रहा है कि नालंदा, तक्षशिला और पाटिल पुत्र ही शिक्षा के स्तंभ रहे है तथा नालंदा का बौद्ध विहार ही सबसे बड़ा है। लेकिन सिरपुर में प्राप्त बौद्ध विहारों ने इस बात को गलत साबित कर दिया है। क्योंकि अब तक नालंदा में चार बौद्ध विहार मिले हैं, जबकि सिरपुर में दस बौद्ध विहार पाए गए हैं। जहाँ  छह- छह फुट की बुद्ध की मूर्तियाँ भी मिली हैं। सबसे खास बात है कि सिरपुर के बौद्ध विहार दो मंजिल वाले हैं जबकि नालंदा का विहार एक मंजिला ही हैं । इन विहारों में घूमते हुए आप इस स्थल की भव्यता को महसूस कर सकते हैं। मैं तो सोचने पर मजबूर हो गई कि वाह क्या  दौर रहा होगा और क्या उस दौर के लोग रहे होंगे जिन्होंने ऐसी संरचना रची।

खुदाई में प्राप्त अवशेषों और उनके अध्ययन के बाद यह प्रमाणित हुआ है कि प्राचीन समय में सिरपुर एक अतिविकसित और समृद्ध राजधानी थी, यहाँ से विदेशों के साथ व्यापार किया जाता था। अवशेष बताते हैं कि यहाँ सोने-चाँदी के गहने बनाने के साँचे थे।  अस्पताल, था। इस स्थान पर बंदरगाह होने के प्रमाण भी मिले हैं जो हजारों साल पहले यहाँ जहाज चलने की बात को प्रमाणित करते हैं।

तीवर देव बौद्ध विहार

दक्षिण कोसल में 2002-03 के उत्खनन में प्राप्त अब तक के सबसे बड़े विहार के रूप में तीवर देव बौद्धविहार का नाम लिया जाता है। तीवर देव महाविहार विशाल और भव्य है। इसकी शिल्पकला अद्भुत है। यह बौद्ध विहार लगभग 902 वर्ग मीटर में फैला है। इसे दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम विहार के मध्य में 16 अलंकृत प्रस्तर स्तंभों वाला मंण्डप है। इन पर ध्यान मुद्रा में बुद्ध, सिंह, मोर, चक्र आदि का उकेरे गए हैं।

गर्भ गृह के पश्चिम में भगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थापित है। इन इस विहार में चारों ओर भिक्षुओं के रहने के लिए कमरे हैं। बीच में आंगन है। गर्भगृह है। गर्भगृह के सामने वाले मंण्डप के चारों ओर गलियारा है। इस विहार में जल निकासी के लिए भूमिगत नालियों के अवशेष मिले हैं। इस विहार के प्रवेश द्वार हाथी तथा युगल मूर्तियों से सज्जित द्वार बेहद खूबसूरत है। सिरपुर से बौद्धधर्म से संबंधित पाषाण प्रतिमाओं के अतिरिक्त धातु प्रतिमाएँ तथा मृण्मय पुरावशेष भी उपलब्ध हुए हैं।

मध्यप्रदेश के स्थित साँची के स्तूप की तरह बौद्ध विहारों में जातक कथाओं का अंकन है और पंचतंत्र की चित्रकथाएँ जैसे मगरमच्छ, वानर आदि की कथाएँ उकेरी गई है। एक स्तंभ में कुम्हार द्वारा चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाने का दृश्य उस दौर के व्यवसाय एवं उसके महत्त्व को दर्शाते हैं। सिरपुर की सभी मूर्तियाँ पत्थर से बनी हुई है। यहाँ हंस और मयूर के चित्र बहुतायत से मिलते हैं। शिव पार्वती और गणेश की प्रतिमा तथा महिषासुरमर्दिनी की मूर्तियों के साथ गंगा की मूर्तियाँ भी है।

इस स्थान में विहार के साथ एक बौद्ध भिक्षुणी विहार भी स्थित है। कहते हैं कि जब वज्रयान संप्रदाय का उद्धव हुआ तब से भिक्षुणियों के लिए अलग विहार बनाकर उनके रहने की व्यवस्था की गयी। उत्खनन में वज्रयान का प्रतीक धातु का वज्र भी प्राप्त हुआ है। साथ ही यहाँ बड़ी संख्या में सीपी तथा काँच की चूडियाँ मिली है। प्राप्त मुद्राओं पर बौद्ध धर्म से संबंधित सूक्तियाँ अंकित है। बुद्ध के अलावा अन्य मूर्तियों में सातवीं शताब्दी के बौद्ध बीजमंत्र उत्कीर्ण है। गंधेश्वर मंदिर में मिली बुद्ध की प्रतिमा में आठवीं शताब्दी के अक्षरों में बौद्धमंत्र उत्कीर्ण है। बताया जाता है कि आनंद प्रभु कुटी विहार का उपयोग बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों द्वारा आवास हेतु किया जाता था।

इस विहार में सीढ़ियाँ भी मिली हैं, जिससे अनुमान लगाया गया कि यह विहार दो मंजिला रहा होगा। क्योंकि ह्वेनसांग ने 10,000 बौद्ध भिक्षुओं के सिरपुर में निवास करने का जिक्र किया है। हर मठ में एक सीढ़ी है। जिससे ऊपर जाया जा सकता है। यहाँ एक प्रवेश द्वार है। इससे लगा कमरा कोषागार लगता है। इसलिए कि कोषागार में जाने के लिए समीप ही एक कमरे की दीवार के आधार के साथ खिड़कीनुमा पल्ला होने का संकेत मिलता है। अन्न भंडार और कोषागर की व्यवस्था हर मठ में देखने को मिलती है। सामूहिक अध्ययन के लिए एक बड़ा कमरा है। कुछ कमरे छोटे तथा कुछ बड़े हैं।

सिरपुर में सभी बौद्ध विहार उच्चकोटि की ईटों से निर्मित हैं। विहारों की तल योजना में गुप्तकालीन मंदिर तथा आवासीय भवन का निर्माण किया गया है। विहार में भिक्षुओं के ध्यान, निवास, स्नान के अलावा अध्यापन की सुविधाएँ थी। खुदाई में 43 रिहायशी कमरों के अवशेष मिले हैं। प्रत्येक विहार के सामने बरामदा और सभागृह है। पीछे की ओर भिक्षुओं के निवास स्थल है। कुछ कमरे बड़े हैं, कुछ बहुत ही छोटे हैं। महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासन काल में आनंद प्रभु नामक बौद्ध भिक्षु ने विहार का निर्माण कराया था। आनंद प्रभु कुटी विहार में 16 पत्थर के स्तंभ हैं। सभा मंडल, छज्जा और मूर्तियाँ इसी पर आधारित हैं। बुद्ध की एक प्रतिमा है जो बंद कमरे में है। इस प्रतिमा के दक्षिण दिशा में पद्मपाणि की पूर्ण आकार की प्रतिमा है। देव मंदिर के दक्षिण में गंगा की और वाम में यमुना की प्रतिमा है। मठ के बरामदे में 14 कमरे हैं। सभी में आले हैं। एक आला दरवाजे की सांकल के लिए, दूसरा दीपक के लिए, तीसरा ताले के लिए और चौथा वहाँ निवास करने वाले भिक्षुओं के सामान रखने के लिए था।

स्वस्तिक विहार

पास ही एक और ध्वस्त विहार भी उत्खनन से प्रकाश में आया है। तल योजना के आधार पर इसे स्वस्तिक विहार के नाम से जाना जाता है। यहाँ भी भूमिस्पर्श मुद्रा में बुद्ध की प्रतिमा प्रस्थापित है। यह विहार भी बौद्ध भिक्षुओं के रहने की व्यवस्था, उनके ध्यान के लिए अलग अलग कमरे की व्यवस्था दिखाई देती है।

सबसे बड़ा बाजार

सबसे अनोखा है उत्खनन में प्राप्त विश्व के सबसे बड़े सुव्यवस्थित बाजार को देखना, जो यह बताता है कि छठी-सातवीं शताब्दी में सिरपुर एक अति विकसित राजधानी थी जहाँ देश- विदेश से व्यापार होता था। खुदाई में अष्टधातु की मूर्तियाँ बनाने के कारखाने के प्रमाण मिले हैं। इस कारखाने में धातुओं को गलाने की घरिया और मूर्तियों को बनाने में प्रयुक्त होने वाली धातुओं की ईटें प्राप्त हुई हैं।  सिरपुर के पास ही महानदी पर नदी बंदरगाह आज भी विद्यमान है। इन प्रमाणों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि पहले महानदी में पानी की मात्रा ज्यादा होती होगी कि उसमें जहाज आया जाया करते थे।

 सातवीं शताब्दी के पश्चात इस क्षेत्र में जबरदस्त भूकंप आया, जिसके कारण पूरा सिरपुर ध्वस्त हो गया। यहाँ के पुरातात्विक उत्खनन में इस बाढ़ और भूकंप के प्रमाण के रूप में सुरंग टीले के मंदिरों में सीढ़ियों के टेढ़े होने और मंदिरों व भवनों की दीवालों पर पानी के रुकने के साथ बाढ़ के महीन रेत युक्त मिट्टी दीवारों के एक निश्चित दूरी पर जमने के निशान मिलते हैं।