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Feb 1, 2025

स्वास्थ्यः कितना सेहतमंद है बोतलबंद पानी

  -  सुदर्शन सोलंकी

भारत में पानी की गुणवत्ता का हमारे स्वास्थ्य पर काफी प्रभाव पड़ता है। यदि पेय जल प्रदूषित हो तो यह ज़हर के समान हो जाता है। वर्तमान में पर्यावरण प्रदूषण इस हद तक बढ़ गया है कि ज़्यादातर जल स्रोत प्रदूषित हो गए हैं। समूचा विश्व जल संकट का सामना कर रहा है। ऐसे में सभी लोगों को शुद्ध व स्वच्छ पेयजल मिल पाना अपने आप में एक चुनौती हो गई है।

कुछ सालों पहले से बोतलबंद पानी दुनिया भर के बाज़ारों में बिकना शुरू हुआ। जिसे कंपनियों ने यह कहकर बेचना शुरू किया था कि यह स्वच्छ, शुद्ध और खनिज युक्त है। जिसे वास्तविकता मान कर लोग इसे धड़ल्ले से खरीदने लगे हैं। पर क्या वास्तव में बोतलबंद पानी खनिज युक्त होता है? और क्या यह हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है?

पहले तो यह स्पष्ट करते चलें कि बाज़ार में बिकने वाला हर बोतलबंद पानी मिनरल वॉटर नहीं होता है। मिनरल वॉटर वह पानी होता है जो ऐसे प्राकृतिक स्रोतों से भरा जाता है जहाँ के पानी में कई लाभदायक खनिज तत्त्व पाए जाते हैं। यह स्वास्थ्यवर्धक लवणों, खनिजों से भरपूर और ऑक्सीजन युक्त होता है। जो स्वाद में अच्छा और स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है।

बाज़ार में उपलब्ध अधिकतर बोतलबंद पानी पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर होता है। पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर नल से आने वाला सामान्य पानी होता है जिसे फिल्टर से छान कर, रिवर्स ऑस्मोसिस, ओज़ोन ट्रीटमेंट आदि से साफ करके पैक कर दिया जाता है।

इसी प्रकार, लोगों में आरओ सिस्टम को लेकर भ्रांति है कि इससे नितांत शुद्ध व स्वच्छ जल मिलता है;  किंतु वास्तव में आरओ सिस्टम से गुज़रा हुआ पानी भी सेहत को नुकसान पहुँचा सकता है। कारण, क्योंकि आरओ सिस्टम में लगे फिल्टर कुछ दिनों बाद ही पानी को साधारण तरीके से फिल्टर करने लगते है।

बोतलबंद पानी को लेकर अमेरिका में हुई रिसर्च से पता चला है कि बोतलबंद पानी में प्लास्टिक के खतरनाक कण मिल रहे हैं। अमेरिकी संस्था नेचुरल रिसोर्सेज़ डिफेंस काउंसिल के अनुसार बोतल बनाने में एन्टिमनी का उपयोग किया जाता है। इस वजह से बोतलबंद पानी को अधिक समय तक रखने पर उसमें एन्टिमनी की मात्रा घुलती जाती है। इस रसायन युक्त पानी को पीने से कई तरह की बीमारियाँ होने लगती हैं।

स्टेट युनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क के वैज्ञानिकों ने दुनिया भर में बोतलबंद पानी पर शोध कर बताया है कि भारत सहित दुनिया भर में मिलने वाले बोतलबंद पानी में 93 फीसदी तक प्लास्टिक के महीन कण देखे गए हैं।

इसके अतिरिक्त जिन प्लास्टिक की बोतलों में मिनरल या फिल्टर वॉटर बिकता है। वे पॉलीएथिलीन टेरीथेलेट (PET) की बनी होती हैं। जब तापमान अधिक होता है या गर्म पानी बोतल में भरा जाता है, तो बोतल में डायऑक्सिन का रिसाव होता है, और यह पानी में घुलकर हमारे शरीर में पहुँच जाता है। इसके कारण महिलाओं में स्तन कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।

बोतलबंद पानी पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचा रहा है। पैसिफिक इंस्टीटयूट के अनुसार अमेरिकी लोग जितना मिनरल वॉटर पीते हैं, उसे बनाने में 2 करोड़ बैरल पेट्रो उत्पाद खर्च किए जाते हैं। एक टन बोतलों के निर्माण में तीन टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। मिनरल वॉटर को बनाने के लिए दुगना पानी खर्च करना पड़ता है। अर्थात् एक लीटर मिनरल वॉटर बनाने पर दो लीटर साफ पानी खर्च करना पड़ता है। 

इसके अलावा बोतल का पानी तो हम पी जाते हैं; लेकिन बोतल कहीं भी फेंक देते हैं, जो पर्यावरण को क्षति पहुँचाती है। इसके अतिरिक्त दुनिया भर में जहाँ भी इन कंपनियों ने अपने बॉटलिंग प्लांट लगाए हैं, वहाँ भूजल स्तर बहुत तेज़ी से नीचे चला गया और इसका खामियाजा उस इलाके में रहने वाले लोगों को उठाना पड़ता है। 

स्पष्ट है कि शुद्ध और स्वच्छ जल के नाम पर बिकने वाला बोतलबंद पानी लोगों और पर्यावरण दोनों को नुकसान पहुँचा रहा है। साथ ही प्लास्टिक की बोतल के निर्माण के दौरान होने वाली अतिरिक्त जल की बर्बादी से भूजल स्तर में कमी हो रही है। पेयजल का कोई सुरक्षित विकल्प खोजना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।  (स्रोत फीचर्स) ■

Sep 1, 2024

पर्यावरणः स्वच्छ पानी के लिए बढ़ाना होगा भूजल स्तर

  - सुदर्शन सोलंकी

पानी की कमी दुनिया की प्रमुख पर्यावरणीय समस्याओं में से एक है। दुनिया की अधिकांश आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती है जहाँ पानी सीमित है या अत्यधिक प्रदूषित है। जल प्रदूषण स्वास्थ्य की गंभीर समस्याओं को जन्म दे सकता है।

नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित अध्ययन ने इस ओर ध्यान दिलाया है कि पानी की कमी पर शोध प्रमुखत: पानी की मात्रा पर केंद्रित होते हैं, जबकि पानी की गुणवत्ता को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्यों की प्रदूषण निगरानी एजेंसियों के एक विश्लेषण से पता चला है कि हमारे प्रमुख सतही जल स्रोतों का 90 प्रतिशत हिस्सा अब उपयोग के लायक नहीं बचा है।

प्रदूषित होने के साथ ही जल स्रोत तेज़ी से अपनी ऑक्सीजन खो रहे हैं। इनमें नदियाँ, झरने, झीलें, तालाब व महासागर भी शामिल हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक जब पानी में ऑक्सीजन का स्तर गिरता है, तो यह प्रजातियों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है और पूरे खाद्य जाल को बदल सकता है।

सेंट्रल वॉटर कमीशन और सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड के पुनर्गठन की कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार भारत की कई प्रायद्वीपीय नदियों में मानसून में तो पानी होता है;  लेकिन मॉनसून के बाद इनके सूख जाने का संकट बना रहता है। देश के ज़्यादातर हिस्सों में भूजल का स्तर बहुत नीचे चला गया है, जिसके कारण कई जगहों पर भूमिगत जल में फ्लोराइड, आर्सेनिक, आयरन, मरक्यूरी और यहाँ तक कि युरेनियम भी मौजूद है।

दुनिया भर में लगभग 1.1 अरब लोगों के पास पानी की पहुँच नहीं है, और कुल 2.7 अरब लोगों को साल के कम से कम एक महीने पानी की कमी का सामना करना पड़ता है। अपर्याप्त स्वच्छता भी 2.4 अरब लोगों के लिए एक समस्या है - वे हैजा और टाइफाइड जैसी बीमारियों और अन्य जल जनित बीमारियों के सम्पर्क में हैं। हर साल बीस लाख लोग, जिनमें ज़्यादातर बच्चे शामिल हैं, सिर्फ डायरिया से मरते हैं।

बेंगलुरु जैसे बड़े शहर जल संकट से जूझ रहे हैं, जहाँ इस साल टैंकरों से पानी पहुँचाना पड़ा। दिल्ली की झुग्गियों में रहने वाले लोगों को रोज़मर्रा के कामों के लिए भी पानी की किल्लत झेलनी पड़ती है। राजस्थान के कुछ सूखे इलाकों में तो हालात और भी खराब रहते हैं।

भारत, दुनिया में सबसे ज़्यादा भूजल का इस्तेमाल करने वाला देश है। प्राकृतिक कारणों के अतिरिक्त भूजल स्रोत विभिन्न मानव गतिविधियों के कारण भी प्रदूषित होते हैं। और यदि एक बार भूजल प्रदूषित हो गए तो उन्हें उपचारित करने में अनेक वर्ष लग सकते हैं या उनका उपचार किया जाना संभव नहीं होता है। अत: यह अत्यंत आवश्यक है कि किसी भी परिस्थिति में भूमिगत जल स्रोतों को प्रदूषित होने से बचाया जाए। भूमिगत जल स्रोतों को प्रदूषण के खतरे से बचाकर ही उनका संरक्षण किया जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन दुनिया भर में मौसम और बारिश के पैटर्न को बदल रहा है, जिससे कुछ इलाकों में बारिश में कमी और सूखा पड़ रहा है और कुछ इलाकों में बाढ़ आ रही है। जल संरक्षण की उचित व्यवस्था न होने के कारण भी कभी बाढ़, तो कभी सूखे का सामना करना पड़ सकता है। यदि हम जल संरक्षण की समुचित व्यवस्था कर लें, तो बाढ़ पर नियंत्रण के साथ ही सूखे से निपटने में भी बहुत हद तक कामयाब हो सकेंगे। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि संचित वर्षा जल से भूजल स्तर भी बढ़ जाएगा और जल संकट से बचाव होगा। और साथ ही स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता की स्थिति भी बेहतर हो जाएगी। (स्रोत फीचर्स) ■


Jun 1, 2024

प्रदूषणः ई-कचरे का वैज्ञानिक निपटान

  -  सुदर्शन सोलंकी

कंप्यूटर, टी.वी., वाशिंग मशीन, फ्रिज, कैमरा, मोबाइल फोन जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या इनके पुर्ज़े जब उपयोग योग्य नहीं रह जाते तो इन्हें ई-कचरे की संज्ञा दी जाती है।

भारत ई-कचरा पैदा करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश है। ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर, 2017 के अनुसार, भारत प्रति वर्ष लगभग 20 लाख टन ई-कचरा उत्पन्न करता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, भारत में वर्ष 2019-20 में 10 लाख टन से अधिक ई-कचरा उत्पन्न हुआ था। वर्ष 2017-18 के मुकाबले वर्ष 2019-20 में ई-कचरे में 7 लाख टन की बढ़ोतरी हुई थी। किंतु ई-कचरे के निपटान की क्षमता में बढ़ोतरी नहीं हुई है।

युनाइटेड नेशंस युनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट ‘ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर 2020' में बताया गया है विश्व में वर्ष 2019 में 5.36 करोड़ मीट्रिक टन कचरा पैदा हुआ था जो पिछले पाँच सालों में 21 फीसदी बढ़ गया है। अनुमान है कि 2030 तक इलेक्ट्रॉनिक कचरे की मात्रा 7.4 करोड़ मीट्रिक टन हो जाएगी।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम 2019 के अनुसार दुनिया में प्रति वर्ष लगभग 5 करोड़ टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा होता है, जो वजन में अब तक निर्मित सभी वाणिज्यिक विमानों से अधिक है। संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय की रिपोर्ट के मुताबिक ई-कचरे की मात्रा लगभग 4500 एफिल टावरों के बराबर है। हाल के एक शोध के अनुसार वर्ष 2025 तक सौ करोड़ से भी अधिक कंप्यूटरों की रिसायक्लिंग की व्यवस्था की आवश्यकता होगी।

वर्तमान समय में हम तेज़ी से इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों को उपयोग में लाते जा रहे हैं। इन उत्पादों का जीवन काल छोटा होता है जिस वजह से कुछ ही समय में ये कचरे के रूप में फेंक दिए जाते हैं। इसके अतिरिक्त जब भी कोई नई टेक्नोलॉजी आती है, हम पुराने उपकरणों को आसानी से फेंक देते हैं क्योंकि कई देशों में पुराने उत्पादों की मरम्मत की सीमित व्यवस्था होती है, और जहां संभव है तो बहुत महंगी। ऐसे में जब कोई इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद खराब होता है तब लोग उसे ठीक कराने की जगह बदलना ज़्यादा पसंद करते हैं। 

ई-कचरा ज़हरीला और जटिल किस्म का कचरा है। इसमें पारा, सीसा, क्रोमियम, कैडमियम जैसी भारी धातुएँ, पोलीक्लोरिनेटेड बायफिनाइल आदि और लंबे समय तक टिकाऊ कार्बनिक प्रदूषक होते हैं। ये मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए बेहद हानिकारक होते हैं। ई-कचरा खतरनाक रसायन ही नहीं, बल्कि सोना, चांदी, पैलेडियम, तांबा जैसी बहुमूल्य धातुओं का समृद्ध स्रोत भी है। ज़हरीली और मूल्यवान दोनों धातुओं की मौजूदगी ई-कचरे को अपशिष्टों का एक ऐसा जटिल मिश्रण बना देती है, जिसके लिए एक सजग प्रबंधन प्रणाली ज़रूरी है।

हमारे देश में ई–कचरे के 312 अधिकृत रिसायक्लर हैं, जिनकी सालाना क्षमता लगभग 800 किलोटन है। लिहाज़ा, 95% से अधिक ई–कचरा अब भी अनौपचारिक क्षेत्र ही संभालता है। अधिकांश स्क्रैप डीलरों द्वारा इसका निपटान अवैज्ञानिक तरीके से (जलाकर या एसिड में गलाकर) किया जाता है।

दुनिया के विकसित देश अपना ई-कचरा जहाज़ों में लादकर हमारे बंदरगाहों के निकट छोड़ जाते हैं। इससे भारतीय तटवर्ती समुद्रों में इस कचरे का ढेर लग गया है। इस ई-कचरे में बड़ी मात्रा में प्लास्टिक के उपकरण भी हैं इसलिए इसे जैविक तरीके से नष्ट करना अत्यधिक कठिन हो गया है।

देश में बढ़ते ई–कचरे से निपटने के लिए भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने ई–कचरा प्रबंधन नियम, 2016 लागू किया है। 2018 में इस नियम में संशोधन किया गया, ताकि देश में ई–कचरे के निस्तारण को सही दिशा मिल सके तथा निर्धारित तरीके से ई–कचरे को नष्ट अथवा पुनर्चक्रित किया जा सके।

किंतु आँकड़े बताते हैं कि ई-कचरे की री-साइकलिंग नहीं हो पा रही है और अनुपयोगी वस्तुएँ समुचित निस्तारण के अभाव में आज एक बड़ी समस्या  बन गई हैं। भारत के कुल ई-कचरे का केवल पाँच फीसदी ही री-सायकल हो पाता है, जिसका सीधा प्रभाव पर्यावरण में क्षति और उद्योग में काम करने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने चेतावनी दी है कि भारत और चीन जैसे विकासशील देशों ने ई-कचरे को ठीक से री-साइकिल नहीं किया तो यह किसी बड़ी घातक महामारी को जन्म दे सकता है।

ई-कचरे का सुरक्षित उपचार एवं निस्तारण  

1. सुरक्षित तरीके से दफन

प्लास्टिक की मोटी शीट के अस्तर वाले गड्ढे में ई-कचरा भरकर मिट्टी से ढक दिया जाता है।

2. भस्मीकरण

ई-कचरे को 900 से 1000 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर भट्टी के अंदर एक बंद चैम्बर में जला दिया जाता है। इससे ई-कचरा लगभग नष्ट हो जाता है तथा कार्बनिक पदार्थ की विषाक्तता भी लगभग समाप्त हो जाती है। राख में से विभिन्न धातुओं को रासायनिक क्रिया से पृथक कर लिया जाता है तथा भट्टी से निकलने वाले धुएँ को प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था की मदद से उपचारित किया जाता है।

3. पुनर्चक्रण

लैपटॉप, मॉनिटर, टेलीफोन, पिक्चर ट्यूब, हार्ड ड्राइव, कीबोर्ड, सीडी ड्राइव, फैक्स मशीन, सीपीयू, प्रिंटर, मोडेम इत्यादि उपकरणों का पुनर्चक्रण किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में विभिन्न धातुओं एवं प्लास्टिक को अलग-अलग करके पुन: उपयोग में लाने हेतु तैयार कर लिया जाता है।

4. धातुओं की पुन:प्राप्ति

इस विधि में सोना, चांदी, सीसा, तांबा, एल्युमिनियम, प्लेटिनम आदि धातुओं को लिए सान्द्र अम्ल का प्रयोग करके पृथक कर लिया जाता है।

5. पुनरुपयोग

इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सुधार या मरम्मत करके पुन: उपयोग करने योग्य बना लिया जाता है।

ई-कचरे के खतरे को कम करने के उपाय

इलेक्ट्रॉनिक कचरा प्रबंधन नियमों के अनुपालन में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया है कि नियमानुसार ई-कचरे का वैज्ञानिक निपटान सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

1. बिजली एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के निर्माण में खतरनाक पदार्थों के उपयोग में कमी।

2. ई-कचरे का वैज्ञानिक रूप से नियंत्रण। इसके लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा ई-कचरे से सम्बंधी मानदंड अपनाना होगा।

3. निराकरण और पुनर्चक्रण कार्यों में शामिल श्रमिकों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास सुनिश्चित किया जाना चाहिए। 

Oct 1, 2022

पर्यावरणः दीपावली- पटाखे और प्रदूषण

 - सुदर्शन सोलंकी

दीपावली पर आतिशबाज़ी में अँधाधुँध पटाखे जलाए जाते है जिससे हमारे पर्यावरण को अत्यधिक नुकसान होता है। यही वजह है कि दीपावली के दौरान और इसके बाद वातावरण में प्रदूषण का स्तर कई गुना बढ़ जाता है।

पटाखों में मुख्य रूप से सल्फर के यौगिक मौजूद होते हैं। इसके अतिरिक्त भी पटाखों में कई प्रकार के बाइंडर्स, स्टेबलाइज़र्स, ऑक्सीडाइज़र, रिड्यूसिंग एजेंट और रंग मौजूद होते हैं। रंग-बिरंगी रोशनी पैदा करने के लिए एंटीमनी सल्फाइड, बेरियम नाइट्रेट, एल्यूमीनियम, तांबा, लीथियम, स्ट्रॉन्शियम वगैरह मिलाए जाते हैं।

दीपावली का त्योहार अक्टूबर/नवंबर में आता है और इस समय भारत में कोहरे का मौसम रहता है। इस वजह से यह पटाखों से निकलने वाले धुएँ के साथ मिलकर प्रदूषण के स्तर को और भी ज़्यादा बढ़ा देता है। पटाखों से निकलने वाले रसायन अल्ज़ाइमर तथा फेफड़ों के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियाँ का कारण बन सकते हैं। प्रदूषण का प्रभाव बड़ों की तुलना में बच्चों पर शीघ्र और ज़्यादा पड़ता है। साइंस पत्रिका में प्रकाशित शोध के मुताबिक वायु प्रदूषण शरीर के हर अंग को नुकसान पहुँचा सकता है।

पटाखों में विभिन्न रंगों की रोशनी के लिए अलग-अलग रसायन मिलाए जाते हैं जो पर्यावरण व समस्त जीव जंतुओं को नुकसान पहुँचाते है।

 एल्युमिनियम का प्रदूषण त्वचा सम्बंधी रोग का कारण बनता है। सोडियम, मैग्नीशियम और ज़िंक का प्रदूषण मांशपेशियों को कमज़ोर करता है। कैडमियम रक्त की ऑक्सीजन वहन क्षमता को कम करता है, एनीमिया की संभावना बढ़ाता है। स्ट्रॉन्शियम कैल्शियम की कमी पैदा करके हड्डियों को कमज़ोर करता है। सल्फर सांस की तकलीफ पैदा करता है। और तांबा श्वसन नली में परेशानी पैदा करता है।

 वर्ष 2016 में पुणे के चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन द्वारा अलग-अलग पटाखों से कितना प्रदूषण होता है इसका अध्ययन किया गया था। इसमें पाया गया था विभिन्न पटाखों को जलाने पर अलग-अलग मात्रा में 2.5 माइक्रॉन के कण (PM 2.5) उत्पन्न होते हैं। यह जानकारी तालिका में देखें। 

पटाखा                     जलाने का समय          PM 2.5 की मात्रा  

                                  (मिनट में)                (माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर)

फुलझड़ी                          2                        10,390

सांप की गोली                  3                        64,500

हंटर बम                  3                        28,950

अनार                  3                          4,860

चकरी                  5                         9,490

लड़ (1000 बम वाली)        6                        38,450

जले हुए पटाखों के टुकड़ों से भूमि प्रदूषण की भी समस्या उत्पन्न होती है। पटाखों के कई टुकड़े बायोडीग्रेडेबल नहीं होते, जिस वजह से इनका निस्तारण आसानी से नहीं होता तथा समय बीतने पर ये और भी अधिक विषैले होते जाते हैं और भूमि को प्रदूषित करते हैं।

दिल्ली में हर वर्ष सितंबर महीने के आखिर से दिल्ली व आसपास के क्षेत्रों में हवा की गुणवत्ता खराब होने लगती है क्योंकि इस समय हरियाणा और उत्तर प्रदेश में किसान पराली जलाते हैं। साथ ही यह समय आतिशबाज़ी का होता है। इसलिए दिल्ली सरकार ने पटाखों के उत्पादन, भंडारण, बिक्री और उपयोग पर पूरी तरह रोक लगा दी है। राजधानी दिल्ली में पिछले साल भी पटाखों की बिक्री और आतिशबाज़ी पर प्रतिबंध था किंतु उसके बावजूद लोगों ने पटाखे फोड़े थे। पिछले साल यानी वर्ष 2021 में दिवाली के अगले दिन दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स 462 था जो कि पिछले 5 साल में सबसे बुरा था। एयर क्वालिटी इंडेक्स के 462 होने का मतलब है कि दिल्ली में हवा गंभीर से अधिक खतरनाक स्तर पर प्रदूषित थी।

प्रदूषण की समस्या को कम करने के लिए राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) द्वारा हरित पटाखे बनाए गए हैं। हरित पटाखे दिखने, जलाने और आवाज़ में सामान्य पटाखों की तरह ही होते हैं पर इनके जलने से प्रदूषण कम होता है। अलबत्ता, लोगों में हरित पटाखों को लेकर भ्रम है कि ये पूरी तरह प्रदूषण मुक्त हैं, लेकिन अगर लोग हरित पटाखे अधिक जलाते हैं तो निश्चित ही त्योहारों के बाद प्रदूषण का स्तर बढ़ेगा।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) के अनुसार सरकार को सभी परिवारों के लिए पटाखे खरीदने की एक सीमा निर्धारित करनी चाहिए ताकि लोग एक तय सीमा से अधिक इन पटाखों का इस्तेमाल ना कर सकें। यह विडंबना है कि लोग पटाखों से होने वाले दुष्प्रभावों को जानने के बाद भी इनका उपयोग करते हैं। (स्रोत फीचर्स)

Aug 1, 2022

स्वास्थ्यः जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य

 - सुदर्शन सोलंकी

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर दिखने लगा है। अतिसार, हैजा, पेचिश, तथा मियादी बुखार जैसी संक्रामक बीमारियाँ बढ़ने लगी है। तापमान में वृद्धि के कारण कई बीमारियाँ, ऐसे क्षेत्रों में फैलने लगी हैं जहाँ पहले नहीं होती थीं। जैसे डेंगू बुखार फैलाने वाले मच्छर सामान्यतः समुद्र तल से 2000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले स्थानों पर नहीं पाए जाते थे, किंतु अब ग्लोबल वार्मिंग के कारण ये कोलंबिया में 4500 मीटर ऊंचाई तक वाले स्थानों में भी पाए जाने लगे हैं।

जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित शोध से पता चला है कि विशेष रूप से महिलाएँ और युवा बढ़ती गर्मी और उमस से कहीं अधिक प्रभावित हुए हैं। वातावरण में बढ़ती नमी उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है। वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण लू और नमी की तीव्रता में भी वृद्धि हो रही है।

ये नतीजे 1979 से 2016 तक के 60 देशों के आँकड़ों के आधार पर निकाले गए हैं। इस शोध के अनुसार 40 देशों में आत्महत्या और आर्द्रता के बीच मज़बूत सम्बंध देखा गया है। इसकी वजह से तनाव और चिंता में वृद्धि हो सकती है और आक्रामकता और हिंसा तक बढ़ सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी आँकड़ों के मुताबिक विश्व में प्रति वर्ष 7.03 लाख लोग आत्महत्या कर रहे हैं, अर्थात हर 45 सेकंड में एक आत्महत्या हो रही है। आत्महत्या का मुख्य कारण निराशा या मानसिक अशांति को माना जा सकता है जो जलवायु परिवर्तन के कारण प्रभावित हो रही है। वैसे तो मानव शरीर अपने वातावरण के अनुसार स्वयं ढाल लेता है;  किंतु इसकी भी एक सीमा है। एक सीमा के बाद वातावरण व जलवायु के परिवर्तन मानव शरीर पर प्रभाव डालने लगते हैं।

बाढ़, जंगल की आग और तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं से कुछ मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इन गंभीर आपदाओं से प्रभावित लोग चिंता, तनाव, व्यसन और अवसाद का अनुभव कर सकते हैं। चरम मौसम अनुभव करने से उपजा तनाव अनिद्रा का कारण बन सकता है।

हाल ही में नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन से अगले 50 वर्षों में स्तनधारी जीवों के बीच वायरस संचरण के 15,000 से अधिक नए मामले सामने आ सकते हैं। अनुमान है कि नए वायरस के संचरण की संभावना सबसे अधिक तब होगी जब बढ़ते तापमान के कारण जीवों का प्रवास ठंडे क्षेत्रों की ओर होगा और वे स्थानीय जीवों के संपर्क में आएँगे।

बढ़ती गर्मी और उमस हमें कई तरह से प्रभावित करेगी। पहले से मानसिक परेशानी से गुज़र रहे लोगों की मानसिक परेशानी बढ़ सकती है। इसलिए अब जलवायु परिवर्तन के प्रति हमें अत्यधिक गंभीर होना होगा एवं इसके नियंत्रण के लिए सामूहिक व व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास करने होंगे। (स्रोत फीचर्स)

Jun 1, 2022

पर्यावरणः भयावह है वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव

-  सुदर्शन सोलंकी

93 प्रतिशत भारतीय ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहाँ वायु प्रदूषण का स्तर डब्ल्यूएचओ के मानकों से अधिक है। यह निष्कर्ष अमेरिका के हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टीट्यूट द्वारा जारी वार्षिक स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर रिपोर्ट में शामिल किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार इसके परिणामस्वरूप भारत में औसत आयु लगभग 1.5 वर्ष कम हो गई है।

ऐटमॉस्फेरिक एन्वॉयरमेंट में प्रकाशित अध्ययन से पता चला है कि ब्लैक कार्बन की वजह से समय से पहले मृत्यु हो सकती है। यही नहीं, ब्लैक कार्बन का इंसान के स्वास्थ्य पर अनुमान से कहीं ज़्यादा बुरा असर पड़ता है।

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) द्वारा किए गए एक शोध के अनुसार, एचएसबीसी बैंक के स्वामित्व व हिस्सेदारी वाली कंपनियों द्वारा निर्मित और नियोजित नए कोयला संयंत्रों से होने वाले वायु प्रदूषण से प्रति वर्ष अनुमानित 18,700 मौतें होंगी। अर्थात इन संयंत्रों से प्रतिदिन 51 लोगों की मौत होने की संभावना होगी। इन कोयला संयंत्रों के कारण प्रति वर्ष भारत में अनुमानित 8300, चीन में 4200, बांग्लादेश में 1200, इंडोनेशिया में 1100, वियतनाम में 580 और पाकिस्तान में 450 मौंतें हो सकती हैं।

एक मनुष्य दिन भर में औसतन 20 हज़ार बार सांस लेता है और इस दौरान औसतन 8000 लीटर वायु अंदर-बाहर करता है। यदि वायु अशुद्ध है या उसमें प्रदूषक तत्वों का समावेश है तो वह सांस के साथ शरीर में पहुंचकर विभिन्न प्रकार से शरीर को प्रभावित करती है और अनेक भयंकर रोगों का कारण बन जाती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल 70 लाख लोगों की मृत्यु प्रदूषित हवा के कारण होती है। हेल्‍थ इफेक्‍ट इंस्टीट्यूट के मुताबिक 2015 में भारत में 10 लाख से ज़्यादा असामयिक मौतों का कारण वायु प्रदूषण था। 2019 में वायु प्रदूषण के चलते 18 फीसद मृत्‍यु हुई। इंडियन कॉउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की एक रिपोर्ट के अनुसार 2019 में वायु-प्रदूषण की वजह से भारत में 16.7 लाख मौतें हुई हैं। अब भी भारत के कई राज्यों में प्रदूषण की समस्या साल भर बनी रहती है।

कणीय पदार्थों (पार्टिकुलेट मैटर, पीएम) से होने वाला वायु-प्रदूषण मुख्यतः जीवाश्म ईंधन के जलने का परिणाम होता है। इसे दुनिया भर में वायु प्रदूषण का सबसे घातक रूप माना जाता है, जो सिगरेट पीने से भी ज़्यादा खतरनाक है।

इतना ही नहीं, वायु प्रदूषण का वनस्पति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जैसे अम्लीय वर्षा, धूम-कोहरा, ओज़ोन, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाईऑक्साइड इत्यादि पेड़-पौधों को प्रभावित करते हैं। वायु प्रदूषण के कारण पौधों को प्रकाश कम मिलता है जिसके कारण उनकी प्रकाश संश्लेषण क्रिया प्रभावित होती है। अधिक वायु प्रदूषण के क्षेत्र में पौधे परिपक्व नहीं हो पाते, कलियां मुरझा जाती हैं तथा फल भी पूर्ण विकसित नहीं हो पाते।

डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के टॉप 20 सबसे प्रदूषित शहरों में से 13 भारत के हैं। डब्ल्यूएचओ ने अपनी इस रिपोर्ट में कहा है कि इन शहरों में 2.5 माइक्रोमीटर से छोटे कण (पीएम 2.5) की सालाना सघनता सबसे ज़्यादा है। पीएम 2.5 प्रदूषण में शामिल सूक्ष्म तत्व हैं जिन्हें मानव शरीर के लिए सबसे खतरनाक माना जाता है। आइक्‍यू एयर की रिपार्ट के अनुसार वर्ष 2020 में पूरे विश्‍व में सबसे खराब वायु गुणवत्‍ता वाले देशों की सूची में भारत तीसरे नंबर पर था। वहीं हाल में दिल्ली में प्रदूषक पीएम 2.5 का सूचकांक 462 था, जो 50 से भी कम होना चाहिए। ब्रिटेन की राजधानी लंदन में पीएम 2.5 का स्तर 17, बर्लिन में 20, न्यूयार्क में 38 और बीजिंग में 59 है।

डालबर्ग एडवाइज़र के साथ क्लीन एयर फंड और कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) ने मिलकर काम किया और बताया कि वायु प्रदूषण पर तुरंत कार्रवाई की आवश्यकता है क्योंकि इसकी वजह से भारत की अर्थव्यवस्था पर काफी प्रभाव पड़ रहा है और स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। डालबर्ग का अनुमान है कि भारत के दिहाड़ी मज़दूर वायु प्रदूषण की वजह से सेहत खराब होने के कारण जो अवकाश लेते हैं उसकी वजह से राजस्‍व में 6 अरब अमरीकी डॉलर का नुकसान होता है। वायु प्रदूषण की वजह से दिहाड़ी मज़दूरों के कार्य करने की क्षमता के साथ उनकी सोचने-समझने की शक्ति पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण उनकी श्रम शक्ति भी कम होती है जिससे राजस्‍व 24 अरब डॉलर तक कम हो रहा है।

वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए केन्द्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा वायु प्रदूषण सम्बंधी विभिन्न अधिनियम, नियम और अधिसूचनाएं जारी की गई हैं, किंतु विभिन्न शोधों से पता चलता है कि इन सबके बावजूद भी वायु प्रदूषण पर नियंत्रण पाने में सफलता नहीं मिल पा रही है। प्रदूषण के स्तर में स्थायी कमी लाने के लिए पराली जलाने पर नियंत्रण के साथ ही वाहनों, उद्योग, बिजली संयंत्रों इत्यादि से होने वाले प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए ठोस कार्य योजना बनाने और उनके सही से क्रियान्वयन की आवश्यकता है अन्यथा इसके परिणाम भयावह होंगे।

नदियों में बढ़ता प्रदूषण


विश्व के अधिकांश भागों में पीने का पानी और घरेलू उपयोग के लिए पानी नदियों से मिलता है। एशिया में गंगा, ब्रह्मपुत्र, यमुना, कावेरी, नर्मदा, सिंघु, यांगत्सी नदियां, अफ्रीका में नील, नाइजर, कांगो, जम्बेजी नदियां, उत्तरी अमेरिका में हडसन, मिसिसिपी, डेलावेयर, मैकेंज़ी नदियां, दक्षिणी अमेरिका में अमेज़न नदी, युरोप में वोल्गा, टेम्स एवं ऑस्ट्रेलिया में मरे व डार्लिंग विश्व की प्रमुख नदियां हैं।

नदियां न केवल लोगों की प्यास बुझाती हैं, बल्कि आजीविका का उत्तम साधन भी होती हैं। उद्योगों और सिंचाई हेतु जल प्रमुख रूप से नदियों से लिया जाता है। नदियां न सिर्फ जल की पूर्ति करती हैं बल्कि घरेलू एवं औद्योगिक गंदे व अवशिष्ट पानी को भी अपने साथ बहाकर ले जाती हैं। नदियों पर बांध बनाकर बिजली प्राप्त की जाती है। नदियों से मत्स्य पालन जैसे लाभ हो रहे हैं। नदियों से पर्यटन उद्योग को भी बढ़ावा मिलता है। धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक के अलावा स्वास्थ्य, कृषि, व्यापार, पर्यटन, शिक्षा, चिकित्सा, पर्यावरण जैसे कई क्षेत्रों से सम्बंध रखती है। पारिस्थितिक तंत्र और भूजल स्तर को बनाए रखने में भी नदियां अहम योगदान देती हैं।

हमारे देश में आज शायद ही ऐसी कोई नदी हो जो प्रदूषण से मुक्त हो। नदियों में प्रदूषण के कारण जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव हो रहा है। नदियों पर न केवल प्रदूषण का बल्कि इसके मार्ग में बदलाव, बालू खनन, खत्म होती जैव विविधता और जलग्रहण क्षेत्र के खत्म होने का भी असर हो रहा है। नदियों के अलावा अन्य खुले जलाशय जैसे झील, तालाब आदि में अतिक्रमण हुआ है। कई नदियां और सतही जल स्रोत सीवेज और कूड़े का डंपिंग ग्राउंड बन गए हैं।

हाल ही में नदियों में विभिन्न प्रकार की दवाइयों का प्रदूषण पाया गया है। प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार दवा उद्योग विश्व की लगभग हर नदी के पानी को प्रदूषित कर रहा है। भारत में यमुना व कृष्णा सहित देश की विभिन्न नदियों में इस तरह का प्रदूषण पाया गया है। विभिन्न सरकारी परियोजनाओं के बाद भी गंगा व अन्य नदियों में प्रदूषण को लेकर कोई सकारात्मक परिणाम नहीं मिला है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और राज्यों की प्रदूषण निगरानी एजेंसियों के एक विश्लेषण से पता चला है कि हमारे प्रमुख सतही जल स्रोतों का 90 प्रतिशत हिस्सा अब उपयोग के लायक नहीं बचा है। सीपीसीबी की एक रिपोर्ट के अनुसार “देश की 323 नदियों के 351 हिस्से प्रदूषित हैं।” 17 प्रतिशत जल राशियां गंभीर रूप से प्रदूषित हैं। उत्तराखंड से गंगा सागर तक करीब 2500 किलोमीटर की यात्रा तय करने वाली गंगा 50 स्थानों पर प्रदूषित है।

सीपीसीबी की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार 36 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में से 31 में नदियों का प्रवाह प्रदूषित है। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 53 प्रदूषित प्रवाह हैं। इसके बाद असम, मध्यप्रदेश, केरल, गुजरात, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, गोवा, उत्तराखंड, मिज़ोरम, मणिपुर, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना, मेघालय, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, तमिलनाडु, नगालैंड, बिहार, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, सिक्किम, पंजाब, राजस्थान, पुडुचेरी, हरियाणा और दिल्ली हैं।

सीपीसीबी की एक रिपोर्ट में प्रदूषण के लिए घरेलू सीवरेज, साफ-सफाई की अपर्याप्त सुविधाएँ, खराब सेप्टेज प्रबंधन और गंदा पानी तथा साफ-सफाई के लिए नीतियों की गैर-मौजूदगी को ज़िम्मेदार माना गया है। (स्रोत फीचर्स) 0

Dec 5, 2020

पर्यावरण- हरित पटाखे, पर्यावरण और स्वास्थ्य

-सुदर्शन सोलंकी

दिवाली आई और निकल गई। कुछ राज्यों में पटाखों पर प्रतिबंध लगाए गए थे; लेकिन कुछ राज्यों में समय-सीमा के अलावा और कोई रोक नहीं थी। वैसे तो इस बार दिवाली पर पटाखों का शोर पिछले सालों की अपेक्षा कम था और कुछ लोग शायद खुद को शाबाशी दे रहे होंगे कि उन्होंने हरित पटाखे जलाकर अपना पर्यावरणीय कर्तव्य पूरा किया। यह आलेख हरित पटाखों समेत पूरे मामले की पड़ताल करता है।

हरित पटाखे राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) की खोज हैं, जो वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंघान परिषद (सीएसआईआर) के अंतर्गत आता है। हरित पटाखे दिखने, जलाने और आवाज़ में सामान्य पटाखों की तरह ही होते हैं पर इनके जलने से प्रदूषण कम होता है। इनमें विभिन्न रासायनिक तत्वों की मौजूदगी और हानिकारक गैसों वाले धुएँ का कम उत्सर्जन करने वाले तत्वों का इस्तेमाल किया गया है। इनको जलाने से हवा दूषित करने वाले महीन कणों (पीएम) की मात्रा में 25 से 30 प्रतिशत और पोटेशियम तत्वों के उत्सर्जन में 50 प्रतिशत तक की कमी का अनुमान है।

परंतु पर्यावरणविदों ने इन पटाखों के अधिक उपयोग को भी खतरनाक माना है। लोगों में हरित पटाखों को लेकर कई भ्रम हैं। लोग समझते हैं कि ये पूरी तरह प्रदूषण मुक्त हैं। इसलिए लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता है; क्योंकि अगर लोग इन्हें हरित समझकर अधिक जलाते हैं ,तो निश्चित ही त्यौहारों के बाद में प्रदूषण का स्तर बढ़ेगा।

प्रदूषण कम करने, विषैले रसायन और ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हरित पटाखों के इस्तेमाल के निर्देश दिए थे। अब शिवकाशी ने खुद को ऐसे पटाखों के लिए तैयार कर लिया है। जिस केमिकल को प्रतिबंधित किया गया है, उसका हरित विकल्प पोटेशियम परआयोडेट 400 गुना महँगा है। इसी वजह से हरित पटाखे काफी महँगे होते हैं।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट के अनुसार सरकार को सभी परिवारों के पटाखे खरीदने की एक सीमा निर्धारित करनी चाहिए, जिससे लोग एक तय सीमा से अधिक इन पटाखों का इस्तेमाल ना कर सकें। लोग समूहों में पटाखे जलाएं जिससे कम से कम पटाखों में सबका जश्न हो सके। अधिकतर  त्यौहारों में पटाखे जलाकर जश्न मनाया जाता है किंतु बढ़ते प्रदूषण स्तर के चलते इनके उपयोग को सीमित रखना बेहद आवश्यक है।

बड़े त्योहारों पर व्यापक आतिशबाज़ी से बड़ी मात्रा में हानिकारक गैसें और विषाक्त पदार्थ वायुमंडल में पहुंचते हैं। परिणामस्वरूप, वायु प्रदूषित हो जाती है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेरदायक है। हाल ही के अध्ययन में दिल्ली और गुवाहाटी के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों के शोधकर्ताओं ने दीपावली के दौरान पटाखों से होने वाले अत्यधिक वायु और ध्वनि प्रदूषण और स्वास्थ्य पर उनके प्रभाव का अध्ययन जर्नल ऑफ हेल्थ एंड पॉल्युशन में प्रकाशित किया है।

शोधकर्ताओं ने वर्ष 2015 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, गुवाहाटी परिसर में दीपावली के त्योहार के दौरान हवा की गुणवत्ता और शोर के स्तर का अध्ययन किया था। उन्होंने 10 माइक्रोमीटर या व्यास में उससे छोटे, हवा में तैरते कणों (पीएम-10) के घनत्व को मापा और शोर के स्तर को भी। उन्होंने दीपावली में 10 दिनों की अवधि के दौरान पीएम-10 में मौजूद धातुओं (जैसे कैडमियम, कोबाल्ट, लोहा, जस्ता और निकल) तथा आयनों (जैसे कैल्शियम, अमोनियम, सोडियम, पोटेशियम, क्लोराइड, नाइट्रेट और सल्फेट) की सांद्रता को नापा।

स्वास्थ्य पर इनके प्रभाव का अनुमान लगाने के लिए, शोधकर्ताओं ने उस अवधि के दौरान संस्थान के अस्पताल में जाने वाले रोगियों के स्वास्थ्य का सर्वेक्षण भी किया। इस अध्ययन में प्रदूषकों के स्तर में वृद्धि देखी गई। शोधकर्ताओं के अनुसार दीपावली के दौरान पीएम-10 की सांद्रता अन्य समय की तुलना में 81 प्रतिशत अधिक थी, और धातुओं एवं आयनों की सांद्रता में भी 65 प्रतिशत की वृद्धि पाई गई। शोर का स्तर भी अधिक था। हालाँकि शोधकर्ताओं ने पाया कि अन्य दिनों की तुलना में दीपावली के दौरान पीएम-10 में बैक्टीरिया की सांद्रता 39 प्रतिशत कम थी। सीसा, लोहा, जस्ता जैसी भारी धातुओं की उपस्थिति इसका कारण हो सकती है।

डब्लूएचओ ने सिफारिश की है कि पीएम-2.5 का वार्षिक औसत घनत्व 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से कम होना चाहिए, लेकिन भारत और चीन के शहरी क्षेत्रों में इसका स्तर छह गुना ज़्यादा (क्रमश: 66 और 59 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट से पता चला है कि वायु की गुणवत्ता के मामले में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में भारत और चीन हैं। पीएम-2.5 घनत्व में बीजिंग और नई दिल्ली दोनों ही शहर शामिल है। किंतु बीजिंग ने इसमें सुधार किया है।

वायु में अन्य गैसें और बगैर जले कार्बन कण मिश्रित होकर स्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक बन जाते हैं। सूक्ष्म कण (पीएम-2.5) मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत खतरनाक माने जाते हैं क्योंकि ये फेफड़ों में काफी अंदर तक चले जाते हैं, और इनसे फेफड़ों का कैंसर भी हो सकता है। वर्ष 2015 में पीएम-2.5 के कारण विश्व भर में 42 लाख से भी अधिक लोगों की मृत्यु हुई थी। इनमें से 58 प्रतिशत मौतें भारत और चीन में हुर्इं। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिसीज़ेस नामक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1990 से लेकर अब तक चीन में पीएम-2.5 के कारण असमय मौतों में 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। भारत में यह आँकड़ा तीन गुना अधिक है। पटाखों के अत्यधिक उपयोग से छोटी-सी अवधि में ही हवा की गुणवत्ता खराब हो जाती है। (स्रोत फीचर्स)